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Sunday, October 25, 2009

“दयाशंकर” की डायरी देखी है? नहीं तो अब देखिए

http://janatantra।com/2009/10/25/review-of-dayashankar-ki-diary/

http://www.artnewsweekly.com/substory.aspx?MSectionId=1&left=1&SectionId=31&storyID=102#

जब भी कोई नाटक किया जाता है तो उसे एक टीम के रूप में ही तैयार किया जाता है. मगर कई बार हो यह जाता है कि एक नाटक शुद्ध रूप से निर्देशक का नाटक हो जाता है तो कई बार वह एक्टर का हो कर रह जाता है. एकजुट थिएटर ग्रुप, मुंबई द्वारा प्रस्तुत नाटक “दयाशंकर की डायरी” देखते समय यही लगा कि यह नाटक निर्देशक और टीम से निकल कर एक्टर के प्लेट्फॉर्म पर आ कर खड़ा हो गया है. “दयाशंकर की डायरी” नाम से लगता है कि डायरी के पन्नों में दर्ज किस्सों की परतें खुलेंगी, मगर यह डायरी से अलग दयाशंकर की आत्मकथा कहने लगती है.
इस एक पात्रीय नाटक के कलाकार हैं जाने माने कलाकार आशीष विद्यार्थी. सपना देख रहे एक आम आदमी की त्रासदी उसे पागलपन से लेकर मौत के मुंह तक धकेल देती है और यह स्थिति समाज से यह सवाल पूछती है कि क्या आम आदमी को आज सपने देखने की भी इज़ाज़त नहीं है? इस त्रासदी पर आप मायूस हो सकते हैं, मगर आज की हक़ीक़त यही है. जी हां, आज आम आदमी सपने से भी महरूम कर दिया गया है. उसे कोई हक़ नहीं कि वह सपने देखे. और अगर वह देखने की जुर्रत करता है तो दयाशंकर की तरह ही अपने हश्र के लिए तैयार रहे. इस आम आदमी की तरह ही एक दूसरे आम आदमी के पास इतनी फुर्सत नहीं है कि वह दयाशंकर जैसे आम आदमी के हालात को, उसके मनोभाव को, उसके सपने को समझे और तदनुसार उसके साथ व्यवहार करे. आज आम आदमी में भी एक वर्ग ऐसे आम आदमी की है जो इन सबके मज़े लेता है और पान की पीक की तरह उस पर थूक कर चला जाता है.
नादिरा ज़हीर बब्बर ने इसकी स्क्रिप्ट भी लिखी है और इसका निर्देशन भी किया है. “दयाशंकर की डायरी” नाटक 1998 में नेहरु सेंटर थिएटर फेस्टिवल में ओपन किया गया था और अबतक देश व विदेशों में इसके लगभग 150 से 200 तक शो हो चुके हैं. इस नाटक को तैयार करने में नादिरा जी की मेहनत भी झलकती है और आशीष विद्यार्थी की भी. एकपात्रीय नाटक गहरे धैर्य, समझ, सम्वेदनशीलता, कलाकार की अभिनय क्षमता के साथ साथ शो को अपेक्षित समय तक ले जाने की कुशलता की भी मांग करता है. आशीष ने इस सभी का परिचय इसमें देने की कोशिश की है और उसमें सफल भी हुए हैं.
आशीष राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पास आउट हैं. अभिनय पर उनकी मास्टरी है. दिल्ली में उन्होंने पीयूष मिश्रा और एन के शर्मा के ‘एक्ट1” के साथ कई नाटक किए. मुंबई में भी अपने संघर्ष के दिनों में वे पृथ्वी फेस्टिवल में और वैसे भी काफी प्लेटफॉर्म पर शो किए. फिर आम एनएसडीयन की तरह वे भी फिल्मों का रुख कर गए. ‘द्रोहकाल” और “इस रात की सुबह नहीं” से उन्हें अधिक पहचान मिली. उन्हें नेशनल अवार्ड भी मिला है. 2009 की उनकी फिल्में हैं, ‘रेड अलर्ट’, रंगरसिया’ और ‘लाहौर’. वे अबतक 64 -65 फिल्में कर चुके हैं, जिनमें नकारात्मक भूमिकाएं उन्हें अधिक मिली है. पता नहीं, मुंबई की हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का क्या गणित है कि उत्तर भारत से आनेवाले अधिकतर कलाकारों को निगेटिव भूमिकाएं ही मिलती हैं, चाहे वे आशुतोष राणा हों या गोविंद नामदेव या मुकेश तिवारी या अखिलेंद्र मिश्र या वीरेंद्र सक्सेना. आशीष समेत ये सभी बेहतरीन कलाकार हैं, मगर इंडस्ट्री को शायद ऐसे ज़हीन कलाकारों की या तो ज़रूरत नहीं या उसको इन सबका उपयोग करने की कला ही नहीं आती. फिर भी, सभी फिल्मों का रुख करते हैं. क्यों? इस पर फिर कभी.
पूरे नाटक में आशीष एक कुशल अभिनेता की तरह दिखे, लेकिन साथ ही, कहीं कहीं वे चूके भी. खासकर लड़की या महिला का अभिनय करते वक़्त. लडकियां सभी समय एकदम नाजुक, कोमलांगी नहीं रहतीं. पर यह हमारी साइकी है. सम्वाद अदायगी बहुत अच्छी थी, मगर भदेस बोली के चक्कर में वे पूर्वी उत्तर प्रदेश के बदले कभी कभी हरियाणा के लग जा रहे थे. प्रकाश व्यवस्था कहीं कहीं तो बेहद सटीक थी. नादिरा जी के नाटकों में प्रकाश पर काफी ध्यान दिया जाता है, एक साथ वे कई कई लाइट्स के प्रयोग करती हैं. संगीत थोडा लाउड था, जो नाटक की गम्भीरता के बदले उसे कहीं कहीं तमाशाई फील दे रहा था.
मुंबई के थिएटर का एक पक्ष यह भी हो गया है कि स्क्रिप्ट में लाफ्टर्स डाले जाने लगे हैं. इससे दर्शकों को फौरी तौर पर सुकून तो मिल जाता है, मगर उसी पल वे विषय की गम्भीरता से भी हट जाते हैं और फिर विषय की गम्भीरता तक पहुंचने में उन्हें जितना वक़्त लगता है, उतने में नाटक बहुत आगे निकल जाता है और नाटक किताब तो है नहीं कि जहां से छूट गया, वहां से आप दुबारा पकड लें. और थिएटर भी केवल मनोरंजन नहीं है कि उसे बस उसी के खांचे में देखा जाता रहे.
नादिरा जी के पूर्ववर्ती नाटकों की वह गम्भीरता और मेहनत इस नाटक में दिखती है, जिस गम्भीरता और मेहनत ने उन्हें मुंबई के थिएटर परिदृश्य में एक अलग मुकाम दिलाया है. दयाशंकर जैसे व्यक्ति की एक त्रासदी यह भी है कि वह दयाशंकर है. उसकी यह त्रासदी बाद में भी बनी रहेगी. मान लीजिए कि दयाशंकर को उसके एमएलएसाहब की बेटी स्वीटी मिल भी जाती तो क्या वह उसके साथ विवाह करके सुखी और सहज रह लेता? क्या वह एक नए फ्रस्ट्रेशन का शिकार नहीं होता कि उसकी बीबी उसके हिसाब से नहीं रहती कि वह अपने बाप के पद और पैसे के मद में है कि उसे उसकी और उसके पोजीशन की परवाह ही नही है, जैसा कि आम जीवन में होता है या ‘राजा हिंदुस्तानी’ तक की फिल्मों में यह अहम दिखता रह्ता है? दयाशंकर जैसे लोग अपनी ही त्रासदियों के जाल में घिरे रहने को अभिशप्त होते हैं. यह नाटक का दूसरा पक्ष है. इसे अलग कर दें तो “दयाशंकर की डायरी” हो सकता है कि आपमें से कइयों को अपने जीवन के करीब लगे, बेहद क़रीब.

Saturday, October 24, 2009

देख भाई देख, ताल ठोंक के देख!

पिछले दिनों मोहल्ला लाइव पर रवीश कुमार ने दो तसवीरें भेजी थीं जिनमें माँ बहन की गाली देते हुए लोगों से उस स्थान पर लघुशंका न कराने के लिए कहा गया था। छम्मक्छल्लो के लिए भी यह एक अनोखी बात थी। उस तस्वीर और उस पर आधारित लेख पर यह प्रतिलेख। मोहल्ला लाइव पर भी यह है। लिंक है- http://mohallalive.com/2009/10/24/vibha-rani-react-on-ravish-mobile-photo/ पढ़ें और अपनी राय दें।

हा हा हा हा! छम्मक्छल्लो की हंसी रुक नहीं रही. वह दाद पर दाद दे रही है. वाह रवीश जी वाह और वाह अविनाश जी वाह! और वाह वाह इस लघुशंका निषेध के लेखक जी के लिए भी. मान लीजिए इन्हें भी लेखक. इतने अभिनव विचार तो किसी बडे व महान लेखक के पास भी नहीं होंगे कि वह इतने मर्दाना अंदाज़ में देह की प्राकृतिक ज़रूरत से फारिग होने पर किसी को लानत मलामत भेजे. जिन साहबानों ने लिखा होगा, वे वाकई ओरिजिनल राइटिंग और थॉट के लिए पुरस्कार के पात्र हैं. यह भी बेखटके और बेखौफ कहा जा सकता है कि इतनी उच्च और विरल लेखनी किसी साहबान की ही होगी, किसी साहिबा की नहीं.
देखिए, आप सब नाहक माथापच्ची कर रहे हैं. छम्मक्छल्लो ने पहले भी लिखा था कि गाली देना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और उसमें मां बहन का इस्तेमाल हमारा आपद धर्म. इससे आप हमें बेदखल नहीं कर सकते. दूसरे हमारे भीति भाव को तो तुलसीदास जी भी अपने समय में अनुभव कर गए थे, इसीलिए लिख भी गये कि ‘बिन भय होंहि न प्रीति’ तो, जबतक आप किसी बात का भय नहीं दिखाएंगे, लोग आपकी बात नहीं मानेंगे. गांधी जी के सत्य, अहिंसा और प्रेम के मार्ग पर चलते हुए किसी से अनुरोध वाली भाषा में कहेंगे कि भाई साहब, यहां पर अपनी शंका का समाधान मत करें तो वह पलट कर आपसे ही कह बैठेगा कि “क्यों? यह ज़मीन क्या तेरे बाप की है?” फिर आप क्या कर लेंगे?
यह हमारा देश है और हमें हर तरह की अभिव्यक्ति की आज़ादी मिली हुई है, सो हम अपनी आज़ादी का प्रदर्शन कर रहे हैं. छम्मकछल्लो जब छोटी थी तो देखती थी कि शहर के कुछ लडके और मर्द ऐसे होते थे, जिन्हें किसी लडकी या औरत को देखते ही अपनी मर्दानगी को आज़ादी देने की ऐसी सख्त ज़रूरत आन पडती थी कि देह को वस्त्र से आज़ाद किए बगैर उनकी आत्मा को चैन नही आता था. ऐसी आज़ादी का प्रदर्शन महिलाओं और स्त्रियों के सामने ही किया जाता है और वे सब अपनी इस आज़ादी का भरपूर इस्तेमाल बेखटके और निस्संकोच करते थे. अब जब आप ऐसी वैसी ज़बान में लिखेंगे तो हो सकता है, लोग डर जाएं या तनिक शर्मा ही जाएं. वो कहते हैं ना कि नंगे से तो ख़ुदा भी डरता है.
डरने को तो लोग भगवान से भी डरते हैं और नहीं भी डरते. अब बेचारे भगवान को भी ऐसे सार्वजनिक जगह पर अपनी अपनी छवियों की प्रदर्शनी करनी होती है ताकि लोग उन जगहों पर थूके नहीं, अपनी लघु या दीर्घ शंकाओं का समाधान ना करें. असली सर्व धर्म सम भाव यहीं पर दिखता है. असली सर्व धर्म सम डर भी. एक धर्म के भगवान को लगाओगे तो दूसरे धर्मवाले उसपर अपनी शारीरिक क्षमता की मिसाल छोड देंगे. सो वहां राम भी हैं, वाहे गुरु भी, सांईबाबा भी हैं, यीशू मसीह भी, काबा भी है और रजनीश भी.
नियम कानून की बात ना करें. उसे तोडने में हमसे सिद्धहस्त और कौन हो सकता है? नियम हमारे यहां बनाए ही इसीलिए जाते हैं कि उसे तत्क्षण कैसे तोड दिया जाए? अब गाली देना सभ्य समाज की निशानी नहीं मानी जाती है. तो हमें आप बताइये कि हम सभ्य हैं क्या? अगर हम सभ्य ही हुए रहते तो गाली को भूल ना चुके होते? सभ्य ही होते तो राह चलती लडकी, महिला को उठा कर उसके साथ रेप करने से बाज़ ना आते? सभ्य ही होते तो दिन दहाडे किसी का खून होते देख उसके रक्षार्थ उठते नहीं? सभ्य ही होते तो किसी भी औरत को दिन दहाडे नग्न करके घुमाने की घटना पर चुल्लू भर पानी में डूब ना जाते? सभ्य ही होते तो धर्म, जाति, वर्ण आदि के नाम पर चल रहे खूंरेजी खेल से बाज़ ना आते? काहे को सभ्य भई? और किसलिए हों? हमारे देश के संविधान में कहीं यह लिखा हुआ है कि हमें सभ्य होना ही है?
और छम्मकछल्लो को तो और भी खुशी हो रही है. कम से कम इस प्रसंग में देश की आधी आबादी को तो मुक्ति मिल गई. भई, यह आधी आबादी मज़ाल है जो बीच सडक पर दिन दहाडे अपनी नैसर्गिक ज़रूरत पूरी करने के लिए बैठ जाएं? उनकी ही तरह उनकी अनिवार्य प्राकृतिक ज़रूरतें भी देह के किसी कोने में सिमटती, घुटती कई कई बीमारियों तक को जन्म दे देती हैं. वे तो एक गुपचुप सा कोना तलाशती हैं, फुसफुसाकर अपनी ज़रूरत का बयां करती हैं. निपट आने पर कुछ क्षण नज़रें नहीं उठातीं.
छम्मकछल्लो 20 साल पहले दिल्ली में थी. तब की नौकरी में उसे तमाम सरकारी दफ्तरों, उपक्रमों व बैंकों में सम्पर्क कार्य करना होता था. वह नई थी, इसलिए उसकी एक दोस्त उसे अपने साथ जगह जगह ले जा रही थी. तब नेहरु प्लेस भी नया ही था. उन दोनों को घूमते घूमते सुबह से दोपहर हो गई. कहीं किसी जगह प्रसाधन का कोई बोर्ड नहीं दिखा. उन दोनों का बुरा हाल, ज़रूरत से निपटने के लिए भी और शर्म से भी कि कैसे किसी आदमी से पूछें (कोई औरत नज़र नहीं आ रही थी). अंत में उसकी दोस्त ने एक आदमी से अंग्रेजी में पूछा (अंग्रेजी में भदेसपन थोडा कम आता है ना). उस सज्जन ने कहा कि उनके दफ्तर में अलग से महिलाओं के लिए कोई प्रसाधन नहीं है. अंत में वे दोनों उसी प्रसाधन के इस्तेमाल के लिए मज़बूर हुईं और जब बाहर निकलीं तब सर ऐसे झुके हुए थे कि उन सज्जन का चेहरा देखे बगैर ही उन्हें धन्यवाद करके भाग लीं. रवीश जी ने जो तस्वीरें भेजीं हैं, उसमें क्रिया भी पुल्लिंग है. इसलिए कम से कम छम्मकछल्लो को तो सुकून मिला कि यह उन जैसों के लिए नहीं है. हां, अब गाली में यह आधी आबादी है तो इसके लिए क्या

Thursday, October 22, 2009

रेप हथियार है! फौज़ तैयार करें!

http://janatantra।com/2009/10/22/vibha-rani-article-on-rape-and-women/
आज आप किसी को भी रेप के नाम पर डरा सकते हैं, धमका सकते हैं. रेप के मामले में कौन सच्चा है, कौन झूठा, यह तय करना मुश्किल है. न्याय, धर्म, प्रेम मानवता आदि की बातें इस संदर्भ में ना करें. घटना सामाजिक परिप्रेक्ष्य में घटे कि राजनीतिक. रेप के घिनौने पक्ष से कोई इंकार नहीं कर सकता. सवाल यह है कि इस घिनौने पक्ष का हमारे समाज में बने रहने का क्या कोई औचित्य है? तो जवाब है कि औचित्य है. हर उस कारक का इस समाज में औचित्य है, जिसका आपके अस्तित्व से, आपके मान से, आपके सम्मान से, आपकी निजता से वास्ता है.
बलात्कार का डर दिखाना या बलात्कार करना कोई आज की बात नहीं है. इसे आप अपने मिथकीय पात्रों में भी पा सकते हैं और अपने आज के राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक और ताक़तवर परिवेश में भी. ऋषि गौतम की पत्नी अहिल्या का देवर्षि इंद्र ने बलात्कार किया तो सती वृन्दा का स्वयं भगवान विष्णु ने. दुर्योधन भी पांचाली को नग्न करने में सफल हो जाता तो इसके बाद की परिणति शायद बलात्कार ही होती.
बलात्कार एक मानसिक स्थिति है, अपनी ताकत को, अपनी शक्ति को प्रदर्शित करने की स्थिति. सामनेवाले को अपने से कमतर देखने की जुगुप्सा भरी तालिबानी खुशी और संतोष. सभी को मालूम है कि यह गलत है, मगर नागासाकी, हिरोशिमा की तरह इस पर अणुबम का इस्तेमाल हो रहा है. नागाशाकी, हिरोशिमा तो दो जगहें हुईं और इनके परिणाम से दुनिया वाकिफ है और अभी तक कम से कम फिर से इस घटना की पुनरावृत्ति नहीं हुई है. हर नारी देह एक नागाशाकी, एक हिरोशिमा है, उस पर जबर्दस्ती करने का तालिबानी आतंक है, मगर इस नागाशाकी, हिरोशिमा पर बलात्कार के अणुबम गिराए और गिराए चले जा रहे हैं.
दुर्भाग्य से इसे मन से कम और शरीर से अधिक जोड दिया गया है, वह भी स्त्री देह से. बलात्कार शब्द आते ही सबसे पहले नारी की ही परिकल्पना सामने आती है. किसी पुरुष पर बलात्कार जैसी अवधारणा अभी विकसित नहीं हुई है. प्रार्थना कीजिए कि ऐसी स्थिति आए भी नहीं, क्योंकि खराब हर हालत में खराब है, उसका भोक्ता चाहे जो भी हो. आप स्वयं देखें कि किसी काम को अगर हमसे बलात करवाया जाता है तो हमारा मन कितना क्षुब्ध होता है. कई कई दिनों तक हम उस स्थिति के घेरे में रहते हैं. मगर चूंकि उसमे शरीर और यौनजनित प्रक्रिया नहीं है तो उसे काम, काम की अनिवार्यता, जीवन जीने की मज़बूरी, समझौता और पता नहीं क्या क्या नाम देकर उसे भूल जाने की सलाह दी जाने लगती है.
एक दुर्भाग्य यह भी है कि बलात्कार को व्यक्ति के स्व सम्मान पर आघात से अधिक उसे घर, परिवार, समाज, देश की प्रतिष्ठा के रूप में देखा जाता है. ऐसे में यह केवल एक अपराध या एक शारीरिक या यौनजनित प्रक्रिया भर नहीं रह जाती, बल्कि यह एक अमोघ हथियार हो जाता है. एक जाति, समाज, धर्म, देश का किसी दूसरी जाति, समाज, धर्म, देश के साथ बदला लेने का सबसे अमोघ हथियार. युद्ध की तो यह अघोषित नीति है और इसके लिए सैनिकों पर कोई कार्रवाई नहीं होती. प्रथम विश्व युद्ध से लेकर आज तक विश्व में जितने भी युद्ध हुए हैं, पराजित देश की स्त्रियों को बलात्कार की नारकीय पीडा से गुजरना पडा है. अब इस क्षेत्र में थोडी से सुगबुगाहट आई है. राजाओ, महाराजाओं के समय में भी औरतें लूट के माल के रूप में विजेता राजाओं के रनिवास में, सैनिकों के खेमों में और सामान्य नागरिकों के लिए वेश्यालयों में भेज दी जाती थीं. सनद रहे कि उनसे कोई सम्मानजनक व्यवहार नहीं किया जाता था. आज भी सवर्ण अवर्ण की लडाई में महिलाओं के साथ पाशविकता का यह नंगा खेल खेला जाता है. विरोधी पक्ष इसमें अपनी विजय समझते हैं. यह समझ में नहीं आता कि एक ओर जिस स्त्री को कमजोर, अबला की संज्ञा दी जाती है, उसी के तन पर जबरन कब्ज़ा करके विजय के किस भाव को व्यक्त किया जाता है. पर सोचने के बाद लगा कि विजय का भाव आता है, क्योंकि यह विजय नारी देह के मर्दन के भाव से नहीं है, यह विजय भाव अपने दुश्मन के विशिष्ट सम्मान के मर्दन से है. औरत को घर की मर्यादा मानना बंद कर दीजिए, उसका बलात्कार होना बंद नहीं तो कम अवश्य हो जाएगा.
मज़बूत से मज़बूत लडकी और स्त्री भी आज अणु बम विस्फोट से उतना नहीं डरती होंगी, जितना बलात्कार शब्द से. इसके पीछे वही लगातार चलने वाली मानसिक अशांति, पीडा, दुख और क्षोभ की त्रासदी है. एक सामाजिक अवहेलना, पुरुष ताक़त का जबरन स्थापन उसके अस्तित्व को खंगाल डालता है. एक अजाने डर और अविश्वास से वह जीवन भर जूझती रहती है और उस पर से समाज के लम्पटों के कुत्सित इशारे और हाव भाव कि अब तो एक मन लकडी झेल ही आई, दस मन और उठा लोगी तो तुम पर क्या फर्क़ पडेगा. तुम्हारा तो जो जो होना था, हो गया, जो जाना था, चला गया. रेप या बलात्कार हथियार है और हर कोई इस हथियार का प्रयोग अपने रक्षार्थ करना चाहता है. प्रतिपक्षी अगर लडकी है तो इस आधार पर उसे डराना धमाकाना और आसान हो जाता है. सत्ता का मद इस भाव पर मोटा रेशमी पर्दा डाल देता है. उस पर्दे के भीतर सनीली सरसराहट होती है. सनीली सरसराहट सांप की भी होती है. सत्ता के आस्तीन में सांप हमेशा छुपा बैठा होता है. अपनी सुविधा के हिसाब से कभी वह उस सांप की लपलपाती जीभ दिखा देती है, कभी उसकी फुंफकार सुना देती है और इतने से भी बात नहीं अगर बन पाती है तो वह आस्तीन के अपने दोस्त को आगे के काम को अंजाम देने के लिए छोड देती है. सत्ता की ज़बान या ताक़त में नर या मादा का भेद नहीं देखा जाता. बलात्कार करना या करवाना सदा से ताक़तवरों का प्रिय शगल रहा है और जो आपके तन, मन, सब पर भारी पडे, वह भी बिना हर्र फिटकरी के तो उस चोखे रंग के लिए कौन आगे आना पसंद नहीं करेगा?

रेप हथियार है! फौज़ तैयार करें!

http://janatantra।com/2009/10/22/vibha-rani-article-on-rape-and-women/
आज आप किसी को भी रेप के नाम पर डरा सकते हैं, धमका सकते हैं. रेप के मामले में कौन सच्चा है, कौन झूठा, यह तय करना मुश्किल है. न्याय, धर्म, प्रेम मानवता आदि की बातें इस संदर्भ में ना करें. घटना सामाजिक परिप्रेक्ष्य में घटे कि राजनीतिक. रेप के घिनौने पक्ष से कोई इंकार नहीं कर सकता. सवाल यह है कि इस घिनौने पक्ष का हमारे समाज में बने रहने का क्या कोई औचित्य है? तो जवाब है कि औचित्य है. हर उस कारक का इस समाज में औचित्य है, जिसका आपके अस्तित्व से, आपके मान से, आपके सम्मान से, आपकी निजता से वास्ता है.
बलात्कार का डर दिखाना या बलात्कार करना कोई आज की बात नहीं है. इसे आप अपने मिथकीय पात्रों में भी पा सकते हैं और अपने आज के राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक और ताक़तवर परिवेश में भी. ऋषि गौतम की पत्नी अहिल्या का देवर्षि इंद्र ने बलात्कार किया तो सती वृन्दा का स्वयं भगवान विष्णु ने. दुर्योधन भी पांचाली को नग्न करने में सफल हो जाता तो इसके बाद की परिणति शायद बलात्कार ही होती.
बलात्कार एक मानसिक स्थिति है, अपनी ताकत को, अपनी शक्ति को प्रदर्शित करने की स्थिति. सामनेवाले को अपने से कमतर देखने की जुगुप्सा भरी तालिबानी खुशी और संतोष. सभी को मालूम है कि यह गलत है, मगर नागासाकी, हिरोशिमा की तरह इस पर अणुबम का इस्तेमाल हो रहा है. नागाशाकी, हिरोशिमा तो दो जगहें हुईं और इनके परिणाम से दुनिया वाकिफ है और अभी तक कम से कम फिर से इस घटना की पुनरावृत्ति नहीं हुई है. हर नारी देह एक नागाशाकी, एक हिरोशिमा है, उस पर जबर्दस्ती करने का तालिबानी आतंक है, मगर इस नागाशाकी, हिरोशिमा पर बलात्कार के अणुबम गिराए और गिराए चले जा रहे हैं.
दुर्भाग्य से इसे मन से कम और शरीर से अधिक जोड दिया गया है, वह भी स्त्री देह से. बलात्कार शब्द आते ही सबसे पहले नारी की ही परिकल्पना सामने आती है. किसी पुरुष पर बलात्कार जैसी अवधारणा अभी विकसित नहीं हुई है. प्रार्थना कीजिए कि ऐसी स्थिति आए भी नहीं, क्योंकि खराब हर हालत में खराब है, उसका भोक्ता चाहे जो भी हो. आप स्वयं देखें कि किसी काम को अगर हमसे बलात करवाया जाता है तो हमारा मन कितना क्षुब्ध होता है. कई कई दिनों तक हम उस स्थिति के घेरे में रहते हैं. मगर चूंकि उसमे शरीर और यौनजनित प्रक्रिया नहीं है तो उसे काम, काम की अनिवार्यता, जीवन जीने की मज़बूरी, समझौता और पता नहीं क्या क्या नाम देकर उसे भूल जाने की सलाह दी जाने लगती है.
एक दुर्भाग्य यह भी है कि बलात्कार को व्यक्ति के स्व सम्मान पर आघात से अधिक उसे घर, परिवार, समाज, देश की प्रतिष्ठा के रूप में देखा जाता है. ऐसे में यह केवल एक अपराध या एक शारीरिक या यौनजनित प्रक्रिया भर नहीं रह जाती, बल्कि यह एक अमोघ हथियार हो जाता है. एक जाति, समाज, धर्म, देश का किसी दूसरी जाति, समाज, धर्म, देश के साथ बदला लेने का सबसे अमोघ हथियार. युद्ध की तो यह अघोषित नीति है और इसके लिए सैनिकों पर कोई कार्रवाई नहीं होती. प्रथम विश्व युद्ध से लेकर आज तक विश्व में जितने भी युद्ध हुए हैं, पराजित देश की स्त्रियों को बलात्कार की नारकीय पीडा से गुजरना पडा है. अब इस क्षेत्र में थोडी से सुगबुगाहट आई है. राजाओ, महाराजाओं के समय में भी औरतें लूट के माल के रूप में विजेता राजाओं के रनिवास में, सैनिकों के खेमों में और सामान्य नागरिकों के लिए वेश्यालयों में भेज दी जाती थीं. सनद रहे कि उनसे कोई सम्मानजनक व्यवहार नहीं किया जाता था. आज भी सवर्ण अवर्ण की लडाई में महिलाओं के साथ पाशविकता का यह नंगा खेल खेला जाता है. विरोधी पक्ष इसमें अपनी विजय समझते हैं. यह समझ में नहीं आता कि एक ओर जिस स्त्री को कमजोर, अबला की संज्ञा दी जाती है, उसी के तन पर जबरन कब्ज़ा करके विजय के किस भाव को व्यक्त किया जाता है. पर सोचने के बाद लगा कि विजय का भाव आता है, क्योंकि यह विजय नारी देह के मर्दन के भाव से नहीं है, यह विजय भाव अपने दुश्मन के विशिष्ट सम्मान के मर्दन से है. औरत को घर की मर्यादा मानना बंद कर दीजिए, उसका बलात्कार होना बंद नहीं तो कम अवश्य हो जाएगा.
मज़बूत से मज़बूत लडकी और स्त्री भी आज अणु बम विस्फोट से उतना नहीं डरती होंगी, जितना बलात्कार शब्द से. इसके पीछे वही लगातार चलने वाली मानसिक अशांति, पीडा, दुख और क्षोभ की त्रासदी है. एक सामाजिक अवहेलना, पुरुष ताक़त का जबरन स्थापन उसके अस्तित्व को खंगाल डालता है. एक अजाने डर और अविश्वास से वह जीवन भर जूझती रहती है और उस पर से समाज के लम्पटों के कुत्सित इशारे और हाव भाव कि अब तो एक मन लकडी झेल ही आई, दस मन और उठा लोगी तो तुम पर क्या फर्क़ पडेगा. तुम्हारा तो जो जो होना था, हो गया, जो जाना था, चला गया. रेप या बलात्कार हथियार है और हर कोई इस हथियार का प्रयोग अपने रक्षार्थ करना चाहता है. प्रतिपक्षी अगर लडकी है तो इस आधार पर उसे डराना धमाकाना और आसान हो जाता है. सत्ता का मद इस भाव पर मोटा रेशमी पर्दा डाल देता है. उस पर्दे के भीतर सनीली सरसराहट होती है. सनीली सरसराहट सांप की भी होती है. सत्ता के आस्तीन में सांप हमेशा छुपा बैठा होता है. अपनी सुविधा के हिसाब से कभी वह उस सांप की लपलपाती जीभ दिखा देती है, कभी उसकी फुंफकार सुना देती है और इतने से भी बात नहीं अगर बन पाती है तो वह आस्तीन के अपने दोस्त को आगे के काम को अंजाम देने के लिए छोड देती है. सत्ता की ज़बान या ताक़त में नर या मादा का भेद नहीं देखा जाता. बलात्कार करना या करवाना सदा से ताक़तवरों का प्रिय शगल रहा है और जो आपके तन, मन, सब पर भारी पडे, वह भी बिना हर्र फिटकरी के तो उस चोखे रंग के लिए कौन आगे आना पसंद नहीं करेगा?

Tuesday, October 20, 2009

टैगोर, नारी मन और असम का संगम- नाटक 'मध्यबर्तिनी' में

http://mohallalive.com/2009/10/19/nehru-centre-theatre-festival-last-day-last-play/#comments
रवींद्रनाथ टैगोर की नारी प्रधान कहानी हो तो दिल अपने आप भर आता है। और उस पर जब असम के लोक रंग का बाना हो, तो उसका असर दुगना होते देर नहीं लगती। नेहरु सेंटर थिएटर फेस्टिवल के आखिरी दिन दोपहर दो बजे मराठी नाटक “टेंग्शेच्या स्व्पनात ट्रेन” था और शाम सात बाजे असम के सीगल ग्रुप का नाटक “मध्यबर्तिनी”। असम के नाटक की खासियत है उसका लोकरंग तत्व। “मध्यबर्तिनी” भी इसका अपवाद नहीं था। अपनी बीमारी से त्रस्त और पति को दिन रात अपनी सेवा में लगा देख आत्मग्लानि से भरी निस्संतान हरासुंदरी अपने विवाह के सत्ताइस साल बाद अपने पति निबारन का विवाह शैलबाला नामक युवती से करा देती है, ताकि पति के जीवन में कुछ तो सुख आये। साथ ही सूना घर-आंगन बच्चे की किलकारी से गूंजे। इतना बड़ा त्याग किसी स्त्री से ही संभव है और किसी स्त्री से ही संभव है कि उस त्याग का प्रतिदान वह उसके सर्वस्व को अपने बस में करके ले ले। नयी पत्नी के प्रेम में आसक्त निबारन के संकट के समय नयी, गर्भवती पत्नी उसके संकट को कम नहीं करती, बल्कि गहने के बदले अपनी जान देकर उसका संकट और घर के अवसाद को और भी बढ़ा ही देती है।

नाटक के स्क्रिप्ट पर बात करते हुए हरासुंदरी की भूमिक निभा रही और ग्रुप की महत्वपूर्ण सदस्या भागीरथी बताती हैं कि मूल कथा में कोई भी फेरबदल नहीं किया गया है, लेकिन इसे पूरी तरह से असम के परिप्रेक्ष्य में रखा गया है। इसलिए यहां आप असम का संगीत, असम का लोक रंग पाएंगे। यहां तक कि इसमें सर्कस शैली का भी इस्तेमाल किया गया है और इसके लिए सर्कस खेलनेवाले धूलिया को भी इस नाटक में लाया गया है।

नाटक की प्रयोगधर्मिता अपने चरम पर थी। मन की उलझन और जीवन की आसक्ति में मन का जीवन जाल में फंसने के प्रतीक के रूप में जाल का इतना सुंदर प्रयोग हुआ है कि बस, मुंह से वाह निकल जाए। अब तक नाटक में इतना लंबा प्रणय दृश्य मैंने नहीं देखा था। लेकिन उस प्रणय दृश्य की कलात्मकता देखिए कि आप उसे किसी प्रेम कविता की तरह महसूस करते हैं। आप खुद भी उस प्रणय काव्य का एक भाग बन कर रह जाना चाहेंगे। इतनी सुंदर और अश्लीलता से कोसों दूर प्रेम की विकलता, विह्वलता का ऐसा बांसुरीमय तान कि देह का रेशा-रेशा इस तान में पूरे-पूरे उतर जाने को चाहे। और यह प्रणय दृश्य सवा घंटे के नाटक में दो बार आता है और दोनों ही बार कलात्मकता के शिखर पर। चार स्त्रियां, जिन्हें आप पुतलियां भी कह सकते हैं या जिन्हें आप पात्र के रूप में देख सकते हैं और चार धूलिया नाटक को सूत्रधार और नटी के रूप में कथा को आगे तो बढ़ाते हैं, मगर पारंपरिक सूत्रधार या नटी नहीं रहते।

नाटक के विजुअल्स को असम का लोक नृत्य बहुत बढ़ाता है। भाव से अपने को अभिव्यक्त करना इस नाटक की भी खासियत रही है। मक्खन बिलोती हरासुंदरी मन को मथ रही होती है। हरासुंदरी के रूप में भागीरथी ने अपनी छाप छोड़ी है। असम का अकलुष सौंदर्य आप इस नाटक में देख सकते हैं। बेदाग पवित्र सौंदर्य जैसे छन-छन कर आ रहा था। संगीत में स्थानीय पुट था और वह संगीत इतना मनोरम था कि आप मुग्ध हुए बिना नहीं रह सकते। गुनाकर देवगोस्वामी की कोरियोग्राफी मन:रंजक थी। सबसे अच्छा लग रहा था महिलाओं का पारंपरिक परिधान – मेखला चादर।

नाटक के निर्देशक बहरुल इस्लाम भी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के 1990 के स्नातक हैं। असमी में इन्होंने चार नाटक लिखे हैं और थिएटर पर एक किताब आयी है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय द्वारा स्थापित “मनोहर सिंह स्मृति अवार्ड 2005″ के ये विजेता रहे हैं। इस फेस्टिवल में उनकी अनुपस्थिति खटकी, मगर इनके निर्देशन ने वह कमी पूरी कर दी।

मुख्य पात्र हरासुंदरी के रूप में भागीरथी भी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की ही पास आउट और बहरुल इस्लाम की जीवन संगिनी हैं। मूलत: कर्णाटक की भागीरथी अभी असमी में नाटक कर रही हैं और हिंदी भी बड़े आत्मविश्वास के साथ बोल लेती हैं। मगर स्टेज उदघोषणा के रूप में जिस भी भाषा का इस्तेमाल किया जाए, उसकी शुद्धता पर ध्यान देना ज़रूरी होता है, क्योंकि औपचारिक भाषा में अशुद्धता खटकती है और अकारण ही लोगों को हंसने का मौका देती है।
नाटक चूंकि असमी में था और असमी भाषा में स का प्रयोग नहीं होता, इसलिए हरासुंदरी “हॉराहुंदरी” और शैलबाला “हॉल्लबाला” हो गयी थीं। कुछ देर तो पात्रों के नाम के साथ तालमेल बिठाने में ही लग गया। असमी पर बांग्ला का प्रभाव है, इसलिए अगर असमी से परिचिति न होने पर भी अगर आप बांग्ला जानते हैं तो भाषागत आनंद ले पाते हैं, जैसे मैंने लिया।

यह नाटक हिंदी और असमी दोनों ही भाषा में खेला जाता है। भागीरथी बताती हैं कि हिंदी में खेलते समय हमें अधिक रिहर्सल की ज़रूरत होती है। इस नाटक को देखना थिएटर में गीत, नृत्य, भाव, शैली, मंच सज्जा, नये नये प्रयोग इन सबके साथ एक सुखद अनुभव से जुड़ने जैसा है।

(पुनश्‍च : दोपहर दो बजे हुए मराठी नाटक में जिस कदर भीड़ थी, उसे देखते हुए लगा था कि इस असमी नाटक में और वह भी अंतिम दिन लोगों का सैलाब रहेगा। मगर अफ़सोस कि इस नाटक में दर्शकों की संख्या और भी नगण्य थी। हिंदी नाटकों की तुलना में इन भाषाई नाटकों (मराठी के अलावा) को मिले लगभग शून्य दर्शक कहीं यह तो नहीं कह रहे कि हम अब प्रयोग के लिए तैयार नहीं? बस आएंगे, नाटक देखेंगे, नाटक में काम कर रहे सेलेब्रेटी के दर्शन करेंगे, थोड़ा हंसेंगे और चल देंगे। अगर ऐसा है, तो थिएटर के लिए यह एक बड़े खतरे की ओर इशारा करता है। उम्मीद थी कि नाटक के अंत में नेहरु सेंटर थिएटर फेस्टिवल के समापन का बीज वक्तव्य यहां के अधिकारियों द्वारा दिया जाएगा, मगर वह नहीं दिया गया। शायद न्यून दर्शक इसके मूल में रहे हों। लेकिन अगर नाटक न्यूनतम संख्या के दर्शकों के लिए हो सकता है तो वक्तव्य भी हो सकता था। आखिर, सौ ही सही, दर्शक तो थे ही न!)

Monday, October 19, 2009

टेंग्चे के सपनों में मुंबई की लोकल की नाट्य त्रासदी

http://mohallalive.com/2009/10/19/tengshe-chya-swapnat-train-in-nehru-theatre-festival/

नेहरु सेंटर थिएटर फेस्टिवल का पांचवां मराठी नाटक था – समन्‍वय, पुणे का “टेंग्शेच्या स्वप्नात ट्रेन” यानी टेंचे के स्वप्‍न में ट्रेन, ट्रेन मुंबईकर के बदन में धड़कन की तरह समायी हुई है। यह ट्रेन जीवन है, धड़कन है, समय है, समय के साथ भागती दौडती ज़‍िंदगी है, ज़‍िंदगी के आगे निकल गया समय है, समय के आगे निकल गया जीवन है। मतलब जिस भी रूप में आप चाहें, ट्रेन को अपने साथ जोड़ सकते हैं। कालांतर में व्यक्ति और ट्रेन एक दूसरे के साथ गड्ड मड्ड हो जाते हैं।
एक मोटरमैन का बेटा सिद्धिविनायक टेंग्चे अपने आसपास ट्रेन का ही माहौल पाता है। इसी ट्रेन में नौकरी पाकर उसका पिता उसका भरण-पोषण करता है और इसी ट्रेन से किसी दूसरे मोटरमैन द्वारा कुछ बच्चों के कुचल जाने का गुस्सा उसके पिता को अपनी जान दे कर झेलनी होती है। ट्रेन के सभी हादसे अब टेंग्चे के सपनों का हिस्सा बन गये हैं। आप इन हादसों के साथ खुद को पा सकते हैं, चाहे वह चलती ट्रेन मे किसी लड़की का बलात्कार हो या छीनाझपटी या धर्म के नाम पर एक विशेष वर्ग की जामाझाड़ नंगातलाशी।
यह नाटक हमारी मध्यवर्गीय या कह लें के हमारे संभ्रांत वर्ग की कलई खोलता है, जहां हम बदलाव तो चाहते हैं, मगर उस बदलाव का कारक, कारण या उसका हिस्सा बनना नहीं चाहते। बुद्धिजीवी वर्ग में यह खोखलापन कुछ और भी ज़्यादा है। टेंग्चे लेखक है और वह यह ज़ोर दे कर कहता है कि वह लेखक है, इसलिए वह केवल लेखन करेगा, क्रांति नहीं। और जब वह अपने ही धर्म और समाज के अपने ही लोगों के आतंक का खुद भुक्तभोगी बनता है, तब वहां से पलायन कर जाता है। यह एक आम मध्यवर्गीय या संभ्रांत वर्ग का चरित्र है।
शशांक शेंडे का निर्देशन कसा हुआ है। पात्र के ऊपर पात्र और चरित्र के ऊपर चरित्रों का गुंफन स्वप्न की जटिलता को दर्शाता है – साथ ही स्वप्‍न में डूबे व्यक्ति को कितना लाचार और पंगु बना देता है, यह भी बताता है। प्रकाश व्यवस्था बहुत अच्छी है। सिर्फ एक रोशनी की लकीर के सहारे ट्रेन की पटरी, तेज भागती ट्रेन की आवाज़, ट्रेन के हेडलाइट्स की पास आती रोशनी और तखत के बीच में बैठी तीनों बहनें ये बता देते हैं कि यहां आत्महत्या होने जा रही है। यह आपको जड़ बना देने के लिए काफी है। इसी तरह से तखत पर ही बैठे लोगों के ट्रेन में बैठने का आभास दे कर आत्महत्या से लेकर धार्मिक अंधत्व को बड़ी कुशलता से बुना गया है। मन के अंतर्द्वद्व और बेचैनी को प्रकाश के जरिये ही पूरी की पूरी ट्रेन और उसके कंपार्टमेंट के सहारे दिखाना और उसके साथ-साथ दर्शक के मन में भी वह अंतर्द्वद्व और बेचैनी पैदा करना एक कुशल निर्देशन की मांग करता है। बीच-बीच में चुटीले संवाद और हालात हास्य बिखेरने का काम करते रहे।
संगीत पक्ष भी नाटक को पूरा पूरा सपोर्ट करता है। मन की वेदना, बेचैनी, उलझन को आप महसूस कर सकते हैं। समन्वय पुणे का एक ऐसा ग्रुप है, जिसे 1992 में सत्यदेव दुबे के वर्कशॉप से निकले कुछ उत्साहियों ने मिल कर शुरू किया था। एकांकी प्रतियोगिताओं के आयोजन से अपनी गतिविधियां शुरू करके यह शीघ्र ही अपने नाटक में लग गया और थिएटर के अनुरूप ही निहायत प्रतिकूल परिस्थिति में अपनी रंगयात्रा शुरू करके जल्द ही राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच गया है।
“टेंग्शेच्या स्वप्नात ट्रेन” के नाट्य लेखक जयंत पवार मराठी के बहुप्रसिद्ध नाट्य लेखक, साहित्यकार व नाट्य समीक्षक हैं। अपनी रचनाओं में वे सामाजिक परिप्रेक्ष्य नये तरीके से ले कर आते हैं। भूमंडलीकरण, बदलते पारिवारिक सिस्टम व जीवन शैली आदि के कारण आदमी से छूट गये अपने ही आदमी की बड़ी सघन जांच करते हैं। “अधांतर”, “माझा घर”, “काय डेंजर वारा सुटले” आदि उनके कुछ बहुचर्चित नाटक हैं। “टेंग्शेच्या स्वप्नात ट्रेन” भी सामाजिक उथल-पुथल के नये आयाम खोलता है। रंगमंच से प्रेम रखनेवालों को यदि मराठी न आती हो तो भी नाट्य अनुभव के लिए मराठी नाटक ज़रूर देखने जाना चाहिए।
(पुनश्‍च : दोपहर दो बजे का शो और नेहरु सेंटर का खचाखच भरा हॉल इस बात का संकेत था कि मराठीभाषी अभी भी नाटक के प्रति कितने गंभीर हैं। दर्शकगण में अधेड़, वृद्ध से लेकर आज के युवा तक थे, जिन्हें एक दिन पहले ही “हम कहें आप सुनें” में कोसा गया था। नाटक को जल्‍दी ख़त्म होना था। हुआ। इतने दिनों में लगातार मुझे देखनेवाले नेहरु सेंटर के कर्मियों ने मुझसे हंसते हुए पूछा – “आता तीन तास काय करायचे?” अब ये तीन घंटे आप क्या करेंगी? क्योंकि अगला शो शाम सात बजे था। हमने अगले शो की तैयारी देखी और बहुत कुछ और भी, जिसकी चर्चा फिर कभी।)

'आ'एम हैप्पी'

http://rachanakar.blogspot.com/2009/09/blog-post_30.html
'आ'एम हैप्पी' किसी भी भाषण की बड़ी अच्छी शुरूआत है। हर समारोह में अतिथि वक्ता यह जरूर कहते हैं कि 'आ'एम हैप्पी' । आय एम हैप्पी कि मुझे आप लोगों ने यहाँ बुलाया। आए एम हैप्पी कि मुझे आप सबसे मिलने का मौका मिला। आएम हैप्पी कि मुझे आप सबसे बातें करने का, आप सबको जानने समझने का मौका मिला।
आयोजक भी हैप्पी कि वे इतने हैप्पी थे। हैप्पी होकर बोले। हैप्पी होकर खाया, हैप्पी होकर पिया. हैप्पी हो कर आयोजक की गाड़ी से विदा हुए. समारोह खतम होने के बाद किसी ने आयोजक से पूछा कि भई, वे हैप्पी थे, यह तो दिखा ही नहीं। आयोजक बोले – “ हैप्पी दिखने के लिए नहीं, बोलने के लिए बोला जाता है। “
हैप्पी होने के कई कारण हैं। भारत समारोहों वाला देश है। भारतीय तिथि में हर दिन दो-चार अवसर के, पावन-त्यौहार के होते हैं. कैलेंडर देखें तो हर दिवस एक न एक दिवस। इन दिवसों का सरकारी दफ्तरों में बड़ा महत्व है। सभी दिवसों पर समारोह होते हैं, महत्वपूर्ण व्यक्ति बुलाए जाते हैं। वे आते हैं और कहते हैं, 'आ'एम हैप्पी'। सुरक्षा दिवस, संरक्षा दिवस, उत्पादकता दिवस, हिंदी दिवस, यह दिवस, वह दिवस. सभी दिवसों पर शपथें भी ली जाती हैं। सच्चे भारतीय की तरह हम सभी दिवस पर शपथ लेते हैं और लेने के बाद तिलांजलि की तरह उसे त्याग भी देते हैं. शपथ खाने और खाकर भूल जाने के लिए होता है. यह मिठाई नहीं है कि उसका स्वाद लोग बरसों याद रखे.
उस दिन भी सुरक्षा दिवस पर सबने शपथ ली, समारोह के बाद मिले समोसे, बर्फी खाई। यह सब करते करते घर जाने का समय हो गया। सबने अपनी-अपनी दुकान जल्दी-जल्दी समेटी और फूट लिए। कुछ ने बिजली जलती छोडी, कुछ ने कम्प्यूटर। बिजली रानी भी उतनी ही नटखट और शैतान। निगोड़ी शोडषी नायिका की तरह इठलाकर बाहर निकली, बाहर निकल कर इधर उधर झांका, फिर लाँग से शार्ट हुई. शॉर्ट कुछ भी हो, निकर कि स्कर्ट, लोगों को ऐसे ही झटके देती है। सो, शॉर्ट होकर उसने भी झटका दिया और अपने सर्किट से बाहर निकल गई। जान का नुकसान तो नहीं हुआ, क्योंकि सभी सुरक्षा की शपथ को समोसे-बर्फी के स्वाद में मिला कर समय से पहले अपने अपने ठिकाने को पहुंचा कर उसे उपकृत कर रहे थे। बस माल में कुछ कम्प्यूटर जले, कुछ फाइलें। तो उससे लोगों को तकलीफ नहीं हुई. आखिर दफ्तर के नुक्सान के लिए कोई क्यों सोग मनाए? कंप्यूटर दफ्तर का, फाइलें दफ्तर की। बल्कि फाइलें जलने से सभी को बड़ी तसल्ली मिली. कोई भी फाइल मांगने पर कह दिया जाता- “ साब जी, अमुक फाइल? तमुक फाइल? वो फाइल तो आग में... ” यहां तक कि आग लगने के बाद की तारीख वाली फाइलें न मिलने पर भी कह दिया जाता – “ सर जी, याद है न वो जो आग लगी थी, उसमें... ” हां, कुर्सी जल जाने से लोगों को बडी तकलीफ हुई थी. आखिर को सारा खेल तो कुर्सी का ही है ना. कुर्सी नहीं रही तो बैठें कहां? चाय सुडकते हुए राजनीति और महंगाई जैसी सदाबहार और मुफतिया बातों पर अपने अपने अमूल्य विचारों के चंदोबे कैसे ताने जाएं? कैंटीन का नुकसान तो सबसे ज़्यादा दुखदाई था. हाय, समय पर चाय नहीं, नाश्ता नहीं. घरवाली एक बार के लिए रोटी का डब्बा पकडा देती है. उससे अधिक के लिए मांगने पर कटखनी बिल्ली की तरह कूदती है.
इन सबके बावजूद आ’ एम हैप्पी कि मुझे आपने सदभावना दिवस कि सांप्रदायिक एकता दिवस कि इस दिवस कि उस दिवस पर बुलाया। उस दफ्तरवाले को देखिए. वे तो कम्बख़्त हमें बुलाते ही नहीं। राजनीति करते हैं सब! साले, चोर, उचक्के। यहां के लिए वे हैप्पी हैं कि दूसरी जगहों जैसी राजनीति यहाँ नहीं खेली गई. इसका सुखद परिणाम यह रहा कि यहां के समारोह के लिए उन्हें यहाँ बुला लिया गया। इससे यह भी पक्का हो गया कि अगली बार वे उन्हें अपने यहाँ बुलाएंगे। और ये भी पक्का ही पक्का जानिए कि वहाँ जाने पर ये भी कहेंगे - 'आ'एम हैप्पी' कि आपने मुझे बुलाया।
सभी हैप्पी हैं। वे इसलिए हैप्पी हैं कि आपने उन्हें बुलाया, अपने लोगों से मिलने का मौका दिया, जिसमें वे केवल मंच पर बैठे लोगों से मिले। बाकियों के लिए मंच की माइक ही और उनके सद्ववाक्य कि आ एम हैप्पी कि मुझे आपसे मिलने का मौका मिला। पूरे समारोह में दर्शक दीर्घा में बैठे किसी से भी उनकी बात नहीं होती। किसी की शकल पर नजर भी नहीं जाती, किसी का नाम भी नहीं मालूम होता, मगर वे कहते हैं कि 'आ'एम हैप्पी' कि मुझे आप सबसे बात करने का, आप सबको जानने-समझने का मौका मिला।
वे बोलते तो हैं कि 'आ'एम हैप्पी', मगर बोलते वक्त ऐसा लगता है, जैसे बोलने से पहले उन्हें कैस्टर ऑयल पिलाया गया है या बोलने के बाद उन्हें सप्रेम नीम के जूस का भरा ग्लास पिलाया जानेवाला है। वे नहीं जानना या समझना चाहते कि हैप्पी या खुश महज शब्द नहीं, भावना की वीणा और अभिव्यक्ति की जलतरंग है। देह की भाषा, यानी बॉडी लैंग्वैज बोलने वाली भाषा से ज्यादा जानदार और प्रामाणिक होती है। इसलिए बोलने में आप कहते हैं, 'आ'एम हैप्पी', और देह बताती है, जैसे शोक-सभा में आए हैं।
वैसे हर अवसर पर 'आ'एम हैप्पी' बोलने वाले भी कम नहीं हैं। एक बड़े साहित्यकार दिवंगत हो गए। उनके लिए एक शोक सभा आयोजित हुई। यही एक ऐसा सम्मान है जिसे हम लेखक एक दूसरे को देना सबसे ज़्यादा पसंद करते हैं. मगर दिक्कत तो यह है कि हिंदी के लेखक और प्रकाशक में ऐसा छत्तीस का आंकडा रहता है कि प्रकाशक से मिली रायल्टी से वे शोक सभा स्थल तक भी नहीं जा सकते. बाकी का इन्तज़ाम कहां से और कैसे हो? लिहाज़ा, एक बड़े ही रसूख वाले व्यक्ति को वहाँ बुलाया गया, ताकि आयोजन का खर्चा निकल सके । जो धन देगा, वह बोलेगा भी. सो बोलने के वक़्त उन्होंने कहा – “ आ’ एम हैप्पी कि इस शोक सभा की अध्यक्षता करने के लिए मुझे बुलाया गया। “
एक अधिकारी की बॉस से खटपट हो गई, दफ्तर के एक आयोजन को लेकर। बॉस नाराज कि उन्हें 'वेल इन एडवांस' क्यों न बताया गया। छोटा अधिकारी मिमियाया - 'सर, आप नहीं थे सर, इसलिए सर ... ।' 'व्हाट आप नहीं थे? दफ्तर में फोन नहीं था कि मैं नहीं था?' इसी पर छोटे अधिकारी की पूरी लानत-मलामत हुई। बस, जी चार्जशीट नहीं मिली, मगर फर्मान मिला कि बॉस समारोह में शरीक नहीं होंगे। छोटे अधिकारी के काफी मिन्नत-चिरौरी के बाद वे गए। जाना ही था. आखिर उनकी भी तो गोपनीय रिपोर्ट लिखी जानी थी. बॉस मंच पर पहुंचे - तना चेहरा, जुड़ी भौंहें, कड़ी और रूखी निगाहें, मगर माइक थामते ही बोले -'आ एम हैपी टू बी हेयर।'
हैप्पी कहना उनकी नियति है। सचमुच की खुशी जब चेहरे पर आती है, तब शब्द भावनाओं के मुंहताज नहीं रहते। देह की भाषा उन शब्दों की पुष्टि करती हैं। हैप्पी कहने या दिखने से जरूरी है हैप्पी होना। यह हैप्पी होना अपने अंदर से आता है।
बहरहाल, कल फिर एक समारोह है.- मुझे मालूम है, वक्ता पूरी भीड़ को यही कहेंगे -'आ’ एम हैप्पी'. 'हैप्पी हैप्पी' का दौर यूँ ही चलता रहेगा, हर कोई जुमलेबाजी करते रहेंगे, इसलिए मैं भी बता दूं कि 'आ’ एम हैप्पी।'

Saturday, October 17, 2009

दास्‍तानगोई उर्फ हम कहें आप सुनें

http://mohallalive.com/2009/10/17/daastangoi-in-nehru-theatre-festival/

नेहरु सेंटर थिएटर फेस्टिवल में नाटक की अलग अलग प्रस्तुतियों के बाद इस बार दास्‍तानगोई पर एक प्रस्तुति "हम कहें आप सुनें" नादिरा ज़हीर बब्बर ने अपने "एकजुट थिएटर ग्रुप" की तरफ से की. लिलेट दुबे के 'ब्रीफ कैंडल' के बाद यह दूसरा नाटक रहा, जो किसी महिला निर्देशक का था. नादिरा बब्बर सज्जाद ज़हीर और रज़िया सज्जाद ज़हीर की बेटी, राज बब्बर की पत्नी, जुही और आर्य बब्बर की मां हैं. यह एक लाइन उन लोगों के लिए, जो नादिरा बब्बर का नाम आते ही तरह तरह से ये सवाल पूछने लगते हैं, जिनके जवाब पहले ही दे दिए गए.
सामान्यत: होता यह है कि लोग कहते हैं, आप कहें, हम सुनें, मगर चूंकि यह नाटक था, जिसमें नाट्यकर्मियों को अपनी बात कहनी होती है, इसलिए वे कहते हैं, दर्शकगण सुनते हैं. यह नाटक भी दर्शकता से ऊपर उठकर श्रोता के स्तर पर पहुंचकर अपनी बात कहता है, क्योंकि यह् नाटक है ही दास्तानगोई यानी किस्सागोई अर्थात स्टोरी टेलिंग पर. नादिरा बब्बर आज के युवाओं के प्रति और उनकी अपनी संस्कृति के प्रति की विमुखता से चिंतित हैं. दास्तानगोई भी हमारी एक परम्परा है, जो खतम सी हो रही है. यह इसलिए खतम हो रही है, क्योंकि इसके लिए अब लोगों के पास वक़्त नहीं. दास्तानगोई की इस परम्परा से जोडने के लिए तीन अलग अलग इलाके के किस्सों को तीन अलग अलग पात्र के द्वारा कहानी कथन के माध्यम से कहने की कोशिश की गई है. ये तीन कलाकार हैं- युद्धवीर दहिया, अनंत महादेवन और स्वयं नादिरा बब्बर. नाना हाव भाव के ज़रिये कहानी कही गई. इस कहानी कथन के लिए एक कहानी गढी गई कि किस तरह एक युवा खुर्रम (युद्दवीर दहिया) को उसका अभिभावक चाचा (अनंत महादेवन) एक पुरानी किस्सागो फनकारा (नादिरा बब्बर) के पास उसका गंडा बन्धवाने ले जाता है. युवा खुर्रम की अनिच्छा के बावज़ूद उसे वहां जाना पडता है, जा कर अपनी कहानीगोई की बानगी पेश करनी होती है. किस्सागो फनकारा उसमें से किस्सागोई के झोल निकालती हैं. चाचा भी एक कहानी कहते हैं और अंत में किस्सागो फनकारा अपनी दास्तानगोई करती है और युवा खुर्रम उनकी किस्सागोई से प्रभावित हो कर उन्हें अपना गुरु मान लेता है.
किस्सागोई आज बेशक किसी पेशे के रूप में उतनी मुखरित न हो, मगर आज भी दादी, नानी और अब एकल परिवार के कारण मां बच्चों को किस्से सुनाती ही हैं. आज के भारतीय युवाओं की अपनी अपनी समस्याएं हैं. फिर भी, कई युवा हैं जो आज भी अपनी सभ्यता, संस्कृति, कला, रीति रिवाज़ से जुडे हुए हैं. किस्सागो फनकारा आज के युवाओं को खूब लानतें मलामतें भेजती हैं. अचानक से वे एकदम से आज की ज़बान भी बोलने लग जाती हैं.
नादिरा बब्बर भी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की स्नातक और इब्राहिम अलकाजी की शिष्या हैं. वे उन चन्द एनएसडीयनों में से एक हैं, जो बम्बई या मुंबई में रहकर फिल्मों के ग्लैमर से बचते हुए अपने को थिएटर कर्म में लगाए रखा. उनका एकजुट अब 28 साल का हो गया है. उनके पास रंगकर्म के उत्सुक बच्चे आते रहते हैं और उनका रंगकर्म का कारवां चलता रहता है.
व्यक्ति जब व्यक्ति से ऊपर उठ कर संस्थान में तब्दील हो जाता है, तब उससे लोगों की अपेक्षाएं बढ जाती हैं. नादिरा बब्बर अब एक ब्रांड नेम बन चुकी हैं तो ज़ाहिर है कि लोगों की उनसे उम्मीदें भी बढी हैं. वे प्रयोगधर्मा हैं, इस लिहाज़ से उनसे यह अनुरोध किया जा सकता है कि किस्सागोई बचपन से ही डाली गई एक आदत है. इसलिए "हम कहें आप सुनें" को बडी उम्र के कलाकारों से न करवा कर बच्चों से करवाया जाए तो न केवल बच्चों के मुख से इस किस्सागोई का आनन्द दुगुना होगा, बल्कि हमारे किशोर और युवा अपनी उम्र के लोगों से और भी ज्यादा प्रभावित होंगे.
अभिषेक नारायण का प्रकाश सन्योजन अच्छा है. खुर्रम आज का युवा है, और किस्सागो फनकारा भी आज की ज़बान बोलती हैं. ऐसे में उनके सेवक एकदम पीरियड कॉस्ट्यूम में समझ में नहीं आते. वे आम गंवई वेश भूषा में भी रह सकते थे. (पुन: मुंबई में नाटक पर भी ग्लैमर हावी हय, यह इस शो में भी देखने को मिला. एक दर्शक ने कहा कि वे यह शो केवल नादिरा बब्बर को देखने के लिए आए हैं, क्योंकि वे राज बब्बर की वाइफ हैं. मेरे पीछे बैठी महिलाओं की फौज़ सारे समय इस बात को ले कर बहस करती रहीं कि स्टेज के पास खडी लडकी नादिरा बब्बर की बेटी जुही बब्बर है या नहीं. गनीमत हुई कि जुही नातक का परिचय देने के लिए मंच पर आईं, तब वे तसल्लीशुदा हुईं. कुछ मराठीभाषी दर्शक सह थिएटरदां ने कहा कि यह तो बस केवल कहानी कहना था, कह दिया, अब इसपर क्या बोलना? जुही की घोषणा "हम कहें आप सुनें" पर एक पीछे से बोलीं, "वही करने तो आए हैं" सोमवार का कार्य दिवस होने के बावज़ूद हॉल भरा हुआ था, क्योंकि नाटक हिन्दी में था.)

Friday, October 16, 2009

“अजिंठा” में कब्र से निकल आई “पारो”

http://mohallalive।com/2009/10/16/ajintha-in-nehru-theatre-festival/

http://www.artnewsweekly.com/substory.aspx?MSectionId=1&left=1&SectionId=31&storyID=९६

http://janatantra.com/2009/10/16/ajintha-in-nehru-theatre-festival/

नेहरु सेंटर थिएटर फेस्टिवल में इस बार मुंबई विश्वविद्यालय के अकादमी ऑफ थिएटर आर्ट की प्रस्तुति "अजिंठा" रही. विश्वविख्यात अजंता की पृष्ठभूमि पर एक आदिवासी प्रेम कथा इस नाटक का उत्स है. नाटक मराठी के सुप्रसिद्ध कवि ना धो महानोर के दीर्घ काव्य पर अधारित है. चूंकि नाटक अकादमी ऑफ थिएटर आर्ट की प्रस्तुति थी, इसलिए इसे एक अकादमिक रूप से तैयार किया गया. नाटक के निर्देशक मिलिन्द इनामदार बताते हैं कि इसके लिए उन्होंने बच्चों के साथ स्टडी टूर किया. अजंता तो वे गए ही, वहां के आदिवासी समाज से भी मिले. उनके उठने, बैठने, बात करने आदि के तौर तरीकों को देखा. साथ ही, वे सब ना धो महानोर के गांव पलसखेर भी गए. ना धो महानोर कहते हैं कि यह काव्य सत्य घटना पर अधारित है और मिलिन्द इनामदार बताते हैं कि नाटक की मुख्य पात्र पारो की उपेक्षित कब्र उन सबको मिली. रॉबर्ट गिल, जो अजंता के भित्तिचित्रों की पेंटिंग करने आए थे, वहां 10-12 साल रहे और इसके भी प्रमाण हैं. शायद अपने चित्रों में वे वह भारतीय भाव नहीं ला पा रहे थे, इसलिए पारो के प्रेम के रूप में उन्हें वह भाव मिला. यह नाटक एक नाटक से अधिक एक अनुभव के रूप में अधिक है.
सत्य घटना पर आधारित इस दीर्घ काव्य में भी आवश्यकतानुसार कल्पना का सहारा लिया गया है और नाटक में भी. तकरीबन डेढ सौ साल पहले की घटना पर आधारित इस प्रेम गाथा में आदिवासी चरित्र होने के कारण अहिरानी बोली का प्रयोग किया गया है. अहिरानी बोली का प्रयोग 1980 में मराठी के सुप्रसिद्ध नाटककार भालचन्द्र झा ने अपनी एकांकी "चित्रकथी" में भी किया था. संयोग की बात है कि "अजिंठा" की तरह "चित्रकथी" भी मनोहर वाकोडे के काव्य पर आधारित है. अहीरानी का प्रयोग आज की आधुनिक भाषा बोल रहे लोगों के लिए एक चुनौती भरा काम होता है. मराठी सम्वाद के लिए तो अहीरानी का प्रयोग किया गया, मगर हिन्दी गंवई ज़बान के लिए बम्बैया हिन्दी फिल्मोंवाली ज़बान इस्तेमाल कर ली गई, जो मखमल में टाट के पैबन्द की तरह लगती रही.
'अजिंठा' के निर्देशक मिलिन्द इनामदार भी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के 1993 के स्नातक हैं. इस नाटक के पहले उन्होंने "खेल" नाटक किया था और उसके पहले असगर वज़ाहत के सुपर्सिद्ध नाटक "जिन लाहौर नई वेख्या समझो जम्याई नहीं" को लेकर लाहौर भी गए थे. वे क्रिएटिव हैं और नाटकों में प्रयोग करना उन्हें पसन्द है. यह नाटक फ्री स्टाइल में था, जिसमें रीयलिज्म के साथ स्टाइलाइजेशन को ले कर चलना था. साथ ही, रीयलाइजेशन को तोडने के लिए उन्होंने सेलोरामा का भी प्रयोग किया. हालंकि नाटक में सेलोरामा का प्रयोग नाटक की एकाग्रता और उसके स्वाद को तोडता है.
नाटक में पात्रों द्वारा मां-बहन की गाली का भरपूर प्रयोग बुरी तरह से खटका. मिलिन्द बताते हैं कि डेढ सौ साल पहले भी ये गालियां थीं तो अब लगता है, जब से मां बहन की अवधारणा बनी होगी, तब से गाली भी अस्तित्व में आ गई होगी. यथार्थ के नाम पर इसका प्रयोग करना सही माना जा सकता है, मगर इसके प्रयोग से बचने पर भी नाटक के असर में कोई कमी नहीं आती. 'अजिंठा' को बहुभाषी नाटक का दर्ज़ा दिया गया, क्योंकि रॉबर्ट गिल अंग्रेजी बोलते हैं और नाटक के आदिवासी पात्र कभी कभी अचानक से हिन्दी फिल्म वाली गंवई ज़बान बोलने लग जाते हैं. चूंकि पूरा नाटक मराठी मे चल रहा होता है, इसलिए दर्शक मानसिक रूप से तैयार रहते हैं कि वे मराठी सुन रहे हैं, ऐसे में अचानक हिन्दी पहले तो समझ में ही नहीं आती. जबतक समझ में आती है, तबतक पात्र हिन्दी की सीढी से उतरकर मराठी के दरिया में गोते लगाने लगते थे.
'अजिंठा' में कई गीत आदिवासी समाज से लिए गए हैं, जिसके कारण लोक का स्वाद और लचक मिलता है. नृत्य अभिरामी थे. सभी पात्र चूंकि अकादमी के छात्र ही थे, इसलिए युवा एनर्जी से नाटक सराबोर था. मराठी नाटक की एक खासियत होती है, कम शब्दों में अधिक से अधिक कहना, 'अजिंठा' में भी यह दिखा. रंग, कला, शिल्प, मंच आदि के माध्यम से अपनी बात कहना रंगमंचीय नाटक को बहुत अच्छी अभिव्यक्ति देता है. संजय गीते का संगीत नाटक के साथ दर्शक को जोड कर रखता था.
सूत्रधार के रूप में वामन केन्द्रे का नाम लिया गया. वामन भी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के स्नातक हैं और वर्तमान में अकादमी ऑफ थिएटर आर्ट के निदेशक भी हैं. उनके बारे में कहा जा सकता है कि वे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के उन चन्द लोगों में से हैं, जिनके पास थिएट्रिकल सेंस जबर्दस्त है. शायद इसकी एक वज़ह रतन थियम जैसे गुरु का मिलना हो. उनका विजुअल सेंस बहुत समृद्ध है. देवदासी प्रथा पर आधारित चेतन दातार के 'झुलवा' से वामन को जबर्दस्त प्रसिद्धि मिली. अकादमी ऑफ थिएटर आर्ट से वे इस कदर जुडे हुए हैं कि अकादमी का नाम आते ही लोग यह पूछते हैं-"वामन केन्द्रे वाला?" किसी संस्था की किसी व्यक्ति के साथ इस तरह से परिचिति व्यक्ति को मज़बूत करता है तो संस्था को कहीं से प्रभावित भी करता है. (पुन: नाटक देखने के लिए पूरा हॉल भरा हुआ था. वामन केन्द्रे अकादमी के निर्देशक और इस नाते सूत्रधार के रूप में संस्था और नाटक पर बात कर सजकते थे. मगर अनुरोध के बावज़ूद बात करने पर रुचि नहीं दिखाई. नाटक अकादमी के बच्चों ने किया था और अच्छा किया था, इसलिए उसे कर पाने का आनन्द सभी के चेहरों पर दिख रहा था. यही संतोष दर्शकों के चेहरों पर भी दिख रहा था. मलयाली नाटक 'आयुस्संति पुस्तकम" के बाद थिएटर की भाषा में यह दूसरा नाटक था, जिसे नेहरु सेंटर थिएटर फेस्टिवल की एक और उपलब्धि कही जा सकती है.)

Tuesday, October 13, 2009

रुकती नहीं "हमसफ़र" की कहानी कभी भी

http://mohallalive.com/2009/10/13/nehru-centre-theatre-festival-8th-day/

http://janatantra।com/2009/10/12/review-of-hum-safar/

नेहरू सेंटर थिएटर फेस्टिवल की अगली प्रस्तुति के रूप में सलीम आरिफ निर्देशित और जावेद सिद्दीक़ी लिखित नाटक “हम सफ़र” का मंचन किया गया। इस बार के नेहरू सेंटर थिएटर फेस्टिवल में मंचित अब तक के नाटकों में से यह पहला नाटक रहा है, जो आपके अपने जीवन के ज़्यादा नज़दीक है। रिश्ते जीवन का आधार होते हैं। इसमें टूटन इंसान से ही नहीं, बल्कि उससे संबंधित अन्य रिश्तों से भी बहुत कुछ छीन लेता है। पति व पत्नी के रिश्ते वैसे भी बहुत बारीक धागे से बंधे होते हैं, जिस पर अहम की मोटी-मोटी बोशीदा चादरें टांग दी जाती हैं। नतीज़न धागे को टूटना ही होता है।
“हम सफर” भी रिश्तों की इसी दरकन, टूटन और उसके बाद छीजे हुए जीवन की कहानी है। भले ही दोनों को लगे कि तलाक के बाद जीवन नये सिरे से शुरू किया जा सकता है, मगर एक दूसरे से अलग होने की टीस और खालीपन, अकेलेपन को मन से महसूस ही किया जा सकता है। भले दिल बहलाने के लिए आप गालिबन बहुत से रास्ते खोज लें और कहें कि जी हम बड़े सुखी हैं और जी हमें कोई फर्क़ नहीं पड़ता।
नाटक इस रूप में सुखांत कहा जा सकता है कि अंत में सोनल अपने पति समीर को दुबारा स्वीकार कर लेती है। पति भी इसके लिए अपने तईं बड़ी कोशिश करता है। और अंत में एक परंपरावादी सामाजिक हिंदी सिनेमा की तरह सब कुछ सुखांत : “मेरा पिया घर आया, हो राम जी।”
जावेद सिद्दीक़ी हिंदुस्तान के मर्द और अब बुज़ुर्ग हो चुके लेखक हैं। हिंदुस्तानी आदमी कभी नहीं चाहता कि वह जो कर रहा है, वही उसकी बीवी भी करे। जावेद साहब ने सोनल को थोड़ा-सा “साहब, बीबी, गुलाम” की मीना कुमारी बना कर उसे सिगरेट व शराब की तरफ मुड़ता दिखा दिया है, मगर महेश भट्ट के “अर्थ” की तरह दरवाज़े पर आये पति को यह कहलाने का साहस नहीं रच सके कि जो तुमने किया, अगर वही मैं करके तुम्हारे पास आती, तो क्या तुम मुझे स्वीकार कर लेते?” बल्कि हुआ तो यह कि अपने अकेलेपन से छुटकारा पाने की कोशिश में सोनल जब समीर के दोस्त सागर से दूसरी शादी करने की सोचती है, तो न केवल समीर अपने अधिकार की लड़ाई की बात करके उसे रोकने की कोशिश करता है, बल्कि उस शादी को रोकने के लिए सोनल की सत्रह वर्षीया बेटी सागर के बेटे से रिश्ता क़ायम कराके बिन ब्याहे उसके बच्चे की मां बना दिया जाता है।
ऐसी सोच किसी बुज़ुर्ग की ही हो सकती है। आज का युवा लेखक तो बेटी से कहलवाएगा कि जिस आदमी ने तुम्हारी फिक्र नहीं की, उसके पीछे अपने आप को होम करने का फायदा? आज की युवा पीढ़ी शादी टूटने के बाद दूसरे जीवन की सोचती है और कहती है कि मेरी अपनी ज़िंदगी नहीं है क्या? भले ही इसका अनुपात कम है, मगर यह है। यह आज के युग का बदलता सच है, जिसे हमें मानना है। जावेद साहब “आपकी सोनिया” में भी पिता से नफरत कर रही सोनिया से अपने पिता के लिए अंत में कहलवा ही देती है, “मेरे पापा।”
सलीम आरिफ भी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पास आउट हैं और फिल्म, थिएटर, अकादमिक गतिविधियों से एक साथ जुड़े हुए हैं। इनके खाते में डिज़ाइनर के रूप में “सरदार पटेल”, “हु तु तु”, “माचिस”, “गुरु” आदि फिल्में हैं, तो “भारत एक खोज”, “चाणक्य” जैसे सीरियल भी हैं। थिएटर निर्देशक के रूप में भी “ताजमहल का टेंडर”, क़ैफी साब”, खराशें”, “आपकी सोनिया”, श्याम रंग” आदि नाटक हैं, जो बेहद प्रसिद्ध हैं। इनका काम अलग से इन पर लेख की मांग करता है।
लुबना सलीम अच्छी अभिनेत्री हैं और अपने चंचल और मुस्काते व्यक्तित्व के साथ नाटक में एक नया लुक देती हैं। "बकरी" नाटक में बकरी की भुमिका के लिए वे बहुत चर्चित रही हैं। आपने उन्हें “बा, बहू और बेबी” सीरियल में लीला भाभी के रूप में देखा होगा। इसी तरह से इस नाटक के नायक किरण करमरकर को “कहानी घर घर की” के ओम अग्रवाल के रूप में नहीं भूले होंगे। क्या कीजिएगा जनाब कि सीरियल की प्रसिद्धि नाटक से अधिक होती है, इसलिए यह परिचय भी देना पड़ता है। फिल्म, सीरियल में काम करके लोग प्रसिद्ध और सेलेब्रेटी बन जाते हैं और तब उनका बाज़ार भाव भी बढ़ जाता है। मुंबई थिएटर आजकल इसकी गिरफ़्त में कुछ ज़्यादा ही है। यह बाज़ार के साथ-साथ निर्देशक की भी मजबूरी है।
नेहरू सेंटर थिएटर फेस्टिवल में अब तक दिखाये गये नाटकों के बड़े-बड़े सेट के बाद अत्यंत सीमित सेट डिजाइन के कारण मन को बडा सुकून मिला। एक पात्रीय या दो पात्रीय नाटक इंटीमेट थिएटर के लिए ज़्यादा मुनासिब होते हैं। सलीम आरिफ ने इंटीमेट थिएटर का फील देने के लिए सेट को मंच के आधे से लगाया, जिससे फैलाव थोड़ा कम हुआ और भाव की सघनता बढी।
इस नाटक की सबसे बडी उपलब्धि रही, गुलज़ार की अपनी आवाज़ में उनकी ही कुछ नज़्में। दृश्य से जो कुछ बचा रह जाता था या यूं कह लें कि दृश्य जो नहीं कह पाते थे, उसकी कमी गुलज़ार की नज़्में पूरी कर दे रही थीँ। उम्‍मीद है कि गुलज़ार अपनी सघन आवाज़ का दिलकश इस्तेमाल औरों के लिए भी करेंगे। “एसे कम्यूनिकेशंस” की यह प्रस्तुति लोगों को इसलिए भी भायी कि लोग इस विषय से अपने आप को अपने आप ही जोड़ ले रहे थे।
(पुनश्‍च : मुंबई के ट्रैफिक पर यहां की बारिश की तरह ही ऐतबार नहीं किया जा सकता। ट्रैफिक में फंस कर आधे घंटे देर से पहुंचने के बाद भी नेहरू सेंटर को धन्यवाद की अन्दर जाने दिया। विषय को भी धन्यवाद कि कुछ छूटा सा नहीं लगा। एक दर्शक ने कहा कि वह कुछ देर बाद यह इंतज़ार करने लगा कि कब दृश्य ख़त्म हो और गुलज़ार बोलें। भाषाई थिएटर के खाली हॉल को यह नाटक भर रहा था। तो कहीं ऐसा तो नहीं कि नाटक की भाषा के ही रूप में सही, हिंदी को सर्वमान्यता मिल गयी?)

Sunday, October 11, 2009

"किरात पर्व"- बांग्ला नाटक की इतनी लचर प्रस्तुति?

http://mohallalive।com/2009/10/11/nehru-centre-theatre-festival-7th-day/

http://reporterspage.com/miscellaneous/23-24

नेहरु सेंटर थिएटर फेस्टिवल में 1970 में उत्पल दत्त द्वारा स्थापित पीपल्स लिटिल थिएटर (पीएलटी) ने उन्हीं का लिखा नाटक "किरात पर्व" प्रस्तुत किया. उत्पल दत्त इसके पहले लिटल थिएटर ग्रुप (एलटीजी) की स्थापना कर चुके थे. पीपल्स लिटिल थिएटर अबतक 60-61 नाटक प्रस्तुत कर चुका है. यह ग्रुप बांग्ला के शम्भू मित्र के "बहुरूपी", अजितेश बनर्जी के "नन्दीकार" या बादल सरकार के थिएटर से अलग है. इसके अपने आदर्श हैं.
बंगाल कला, संस्कृति की धरती है और यहां के बच्चे बच्चे में इसके प्रति रुझान देखी जा सकती है. बांग्ला थिएटर भारत मे एक समृद्ध थिएटर के रूप में माना जाता है और हिन्दी थिएटर की परिपक्वता, मानसिकता, निरवहन आदि की बात आने पर बांग्ला और मराठी थिएटर से उसकी तुलना कर के हिन्दी की अपरिपक्वता की बात की जाती है. इस नाटक को देखते हुए इस पर अब बहस की जा सकती है, मगर यहां नहीं.
कथावस्तु के मूल में कह लें कि शासक और शोषित की चली आ रही और कभी भी खत्म ना होनेवाली परम्परा है. आर्य और अनार्य, ब्राह्मण और शूद्र और आर्यों द्वारा अनार्यों पर अपना जवबरन अधिकार मगर उनके प्रति उतनी ही घृणा, जो आज के ब्राहमणवाद के बहुत करीब है. जिन अनार्यों, किरात, निषाद, राक्षस आदि से शरीर के छू जाने पर भी उन्हें तत्काल मृत्युदंड दे देना बदन पर पडी धूल झाड देने के समान है, युद्ध के समय उन्हीं लोगों के युवाओं को मरने के लिए भेज देना आम बात है. युद्ध में मारे गए पांच पुत्रों की मां का प्रश्न बहुत सहज है, जिसका उत्तर आज तक कोई नहीं दे सका है कि "जीवन तो ले लेते हो, जीवन क्या वापस ला कर दे सकते हो?" वेद पाठ करनेवाले शूद्रों को जीवित जला देना शास्त्र सम्मत मान लिया जाता है. महाभारत काल की कथा के माध्यम से इनके प्रति भेदभाव और ब्राहमणवाद, क्षत्रियवाद या यों कह लें कि सुविधाभोगी समाज में सुविधाभोगियों द्वारा सभी कायदे कानून अपने हिसाब से बना लेना और उस पर चलना यह सत्ताधारियों या तथाकथित बडे लोगों का सबसे मनोरंजक शगल है.
यह प्रश्न सहज ही उठता है कि आखिर क्या बात है कि पौराणिक आख्यानों का बार बार हम मँचन करते हैं, इसके उत्तर में कहा जा सकता है, उनमें से अज के लिए कुछ सटीकता की खोज. यह नाटक भी इसी की एक खोज है. मैने यह नाटक पढा नही है, मगर महाभारत की प्रस्तुति और आर्य अनार्य की चर्चा के बाद अचानक हिटलर का प्रसंग ले आना और फिर महाभारत प्रसँग ला कर नाटक खत्म करना एकाएक नाटक की तन्द्रा में बडा भरी झोल पैदा करता है. हो सकता है कि हिटलर के समय में भी वही शुद्धतावादी रक्त का आग्रह था, इसलिए इसे यहां डाला गया हो, मगर यह आग्रह तो अभी भी अपने समाज में ही है. आज भी शूद्रों पर ताने कसना, अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों की मेधा पर सन्देह करना आम बात है. अगर अपने ही देश की इस तरह की घटनाओं को लेकर इसे जोडा जाता तो यह अधिक सटीक बन पडता. महाभारत के आख्यान की तरह ही यदि कोई ग्रीक, जर्मन पौराणिक आख्यान जोड जाता तब भी आख्यानों की सटीकता के साथ उसके सन्दर्भ को देखा जा सकता था. मगर हिटलर प्रसंग तो एक ऐतिहासिक प्रसंग है. उससे इस पूरे नाटक में एक अजीब सा घालमेल पैदा हो गया.
नाटक बहुत ही धीमी गति में था. कलाकारों में ऊर्जा (एनर्जी) का भयंकर अभाव दिखा. शायद ऐसा लगभग सभी कलाकरों के उम्रदराज होने की वज़ह से भी हो सकता है. सम्वाद की बहुलता तो हिन्दी नाटकों को भी मात कर रही थी. कृष्ण की हंसी कंस की हंसी जैसी थी और अर्जुन अपने मद में चूर दिखे. सबसे अधिक कोफ्त पैदा कर रही थी शबरी की भूमिका में रीता चक्रवर्ती. नाटक से पूरी तरह असम्पृक्त सारे समय अपने कपडे ठीक करने में लगी रही. सम्वाद बोलने के समय बस बोल दिया और छुट्टी.
वेश भूषा ठीक थी, मगर अस्त्र-शस्त्र को देख कर हंसी आ जाए ऐसे, जैसे रामलीला हो रही हो. शूद्र संत पालुका पर फेंके जा रहे थर्मोकोल के पत्थर करुणा के बदले हास्य उत्पन्न कर रहे थे. इतने पुराने नाट्य ग्रुप से ऐसी प्रस्तुति की उम्मीद नहीं थी. (पुन: इस नाटक की दर्शकता का हाल भी दो दिन पहले खेले गए मलयालम नाटक जैसा ही था. सभागार के कर्मियों ने ही हंसते हुए कह दिया कि आप कहीं भी बैठ सकती हैं. सभागार के बाहर लगनेवाली क्यू का कहीं नामो-निशान नहीं था. खुद नेहरु सेंटर के अधिकारीगण मध्यांतर के बाद नहीं दिखे. अकादमी ऑफ आर्ट के छात्र भीड दिखाने में ज़रा कामियाब रहे, क्योंकि उन्हें इस फेस्टिवल पर प्रोजेक्ट करना है. अधिकांश दर्शक बांग्लाभाषी थे. मध्यांतर के बाद उनमें से भी कई चले गए. पत्रकार दीर्घा लगभग खाली था. एक युवा मराठी दर्शक ने कहा कि ये लोग इतना क्यों बोलते हैं? मेरे पास इसका जवाब नहीं था, इसलिए मैं भी गोल गोल मुंह बनाकर रह गई. निर्देशक असित बासु ने बातचीत करने में कोई रुचि नहीं दिखाई. धन्यवाद उनके एक कलाकार प्रताप घोष का, जिन्होंने बात की, जानकारियां दीं और बहुत मुद्दे की बात यह कही कि हमलोग थिएटर से पैसे लेते नहीं, बल्कि ज़रूरत पडने पर देते ही हैं और यह भी कि हम थिएटर से पैसे नहीं, बस केवल नाम् और यश चाहते हैं.)

Saturday, October 10, 2009

राजा होना सुखी होने का मार्ग नहीं है, कदापि! - चाणक्य

http://www.hindimedia.in/index.php?option=com_content&task=view&id=8414&Itemid=202
http://reporterspage.com/miscellaneous/23-23
http://mohallalive.com/2009/10/10/nehru-centre-theatre-festival-6th-day/

नेहरु सेंटर थिएटर फेस्टिवल की अगली प्रस्तुति थी मनोज जोशी कृत नाटक- चाणक्य. नीति और राजनीति के बात आने पर कौटिल्य चाणक्य का नाम ना आये, यह असम्भव है. राजनीति और छल प्रपंच राजनीत का अभिन्न हिस्सा है. यह राजनीति जब व्यक्ति से उठकर समाज की ओर जाती है तो यह हितकारी होती है. इसी हित की साधना में, आर्यावर्त को एक सूत्र में पिरोने का सपना देखा था चाणक्य ने. चाणक्य के चरित्र का तेज, तप, उसकी निष्ठा, उसकी ज़िद, उसकी लगन, उसका आत्माभिमान एक बारगी ऋषि विश्वामित्र की याद दिलाता है. ज़ाहिर है कि ऐसे चरित्र, जिसमें परस्पर विवाद हो, लोगों को लुभाता है और अपने अपने क्षेत्र में उस पर काम करने के लिए उकसाता है.
चाणक्य भी एक ऐसा ही चरित्र है, जिसपर मशहूर अभिनेता मनोज जोशी ने नाटक की विधा में काम किया है. इससे पहले हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक मुद्राराक्षस ने चाणक्य पर लिखा था. जयशँकर प्रसाद के चन्द्रगुप्त नाटक में चाणक्य के चरित्र को उकेरा गया है. डॉ. चन्द्र प्रकाश द्विवेदी अपना सुप्रसिद्ध टीवी सीरियल "चाणक्य" बना ही चुके हैं. इस बीच एक और नाटक आया "चाणक्य शास्त्र" जिसमें राजेन्द्र गुप्ता ने चाणक्य की भूमिका निभाई है.
जो बडा अभिनेता होता है, या जिसका प्रोडक्शन होता है, वह सामान्यत: केन्द्रीय चरित्र निभाता है. डॉ. चन्द्र प्रकाश द्विवेदी ने भी स्वयं चाणक्य की भूमिका निभाई थी. लिहाज़ा मनोज जोशी ने भी अपने इस नाटक में चाणक्य का केन्द्रीय चरित्र निभाया है. पीरियड ड्रामा करते समय काल, पात्र, वेशभूषा, भाषा आदि का बडा ध्यान रखना होता है. इस नाटक में भी इसे निभाने की पूरी कोशिश की गई है. पीरियड ड्रामा में एक और बन्धन होता है, पात्रों की बहुतायत. चाणक्य में भी है. लेकिन नाटक में एक पात्र से कई- कई चरित्र करवा लेने की भी सुविधा रहती है, जिसका लाभ इस नाटक में भी लिया गया है. संगीत कई जगह सीरियल "चाणक्य" की याद दिलाता रहा. यह भी एक तरीके से अच्छा था, क्योंकि डॉ. द्विवेदी पात्र, पीरियड और उसके डिटेल्स आदि में बडी गहराई तक जाते हैं. उनके हाथों निकली चीज़ों में प्रामाणिकता अधिक रहती है. इस लिहाज़ से इस नाटक के संगीत और वातावरण में एक प्रामाणिकता और भी जुड जाती है.
मुद्राराक्षस ने अपने नाटक में महामात्य राक्षस की महिमा का गुणगान किया है और यह बताया है कि महामात्य राक्षस के सहयोग के बिना मगध कितना अधूरा है. इस नाटक में भी महामात्य राक्षस को महिमामंडित किया गया है. चाणक्य का सच और हमारे आज के सच में अभी भी कोई अंतर नही आया है. जगह जगह पर चाणक्य के सम्वाद इस स्थिति को उजागर कर रहे थे. राजा होना सुखी होने क मार्ग नहीं है, कदापि." यही स्थिति आज भी है, जहां हर कोई सत्ता में आना इसलिए चाहता है ताकि वह उसका उपभोग कर सके.
इस नाटक में मनोज जोशी ने एक बहुत ही अच्छी बात की और वह यह कि उन्होंने भाषा के साथ कोई समझौता नहीं किया है. लोग समझ सकें, इसलिए आज की चलताऊ हिन्दी देने का प्रयास उन्होंने कतई नहीं किया है, जो इस पीरियड ड्रामा की बहुत बडी विशेषता है. भाषा की कठिनता के कारण डॉ. द्विवेदी की भी बडी आलोचना हुई थी, मगर बाद में लोग उनके वातायन को समझने लगे थे. यहां भी लोग समझ रहे थे और समझ कर तालियां बजा रहे थे. इसलिए यह तो अब लोग ना कहें कि हिन्दी बडी कठिन है.
परंतु, भाषा पर जितना काम करना चाहिए था, वह नहीं हुआ है. स्क्रिप्ट पर मराठी गुजराती वाक्य-विन्यास का इतना अधिक प्रभाव है कि वह हिन्दी के प्रवाह को तोडता है. औरस संतान को "अनौरस", सन्धि-विच्छेद को सन्धि-रोह", विस्मृत को विस्मरित, निर्बुद्धिपन या बुद्धिहीनता को निर्बुद्धिपन, विनती को विनंति, दुन्दुभी को तुतुम्भी आदि कहना रस भंग करता था. कुछ और बानगी- "कृष्ण के पास समय, सैन्य्, शक्ति अमर्याद (असीमित के अर्थ में) थे. "नाशवंत मानव के प्रति", "आपका वैधव्य का सम्मान कीजिए. आप अपना मस्तक ढंक लीजिए.". "राजदंड का स्वीकार कीजिए". "मैं मेरे प्रतिशोध का उपाय कर लूंगा.". "स्वार्थ ही राजाओं का चालकमान था." मनोज जोशी जी से विनम्र आग्रह कि वे हिन्दी के किसी अच्छे जानकार से स्क्रिप्ट को दिखवा लें. उनसे यह भी आग्रह कि हिन्दी बुलवाते समय पात्रों के उच्चारण पर ध्यान दें. रीती, नीती, पाटलीपुत्र, चाणक्या तो सामांन्य बाते हैं. उच्चारण की मराठी, गुजराती परुषता और हर अक्षर पर बल दे कर बोलना नाटक के आनन्द में व्यवधान उत्पन्न करता है. फिल्म और टीवीवाले तो इन सब पर ध्यान नहीं ही देते, किंतु नाटककार को तो इस पर ध्यान देना होगा, क्योंकि नाटक इस सबसे अलग विधा है और यह दर्शकों के साथ उसी समय अपना सम्बन्ध बना लेता है.
(पुन: नाटक देखने के लिए पूरा हॉल भरा हुआ था. यह सुखद था, मगर यह मलयाली नाटक के निर्देशक सुवीरन की इस बात की पुष्टि भी कर रहा था कि अब वहां भी लोग मोहनलाल जैसे अभिनेताओं को लेने की कोशिश कर रहे हैं. नाटक का ग्लैमर की चपेट में आ जाना शुद्ध थिएटर को नुक्सान तो कर ही रहा है, गुमनाम, मगर प्रतिभावान कलाकरों की जगह को भी घेरे जा रहा है. इसका एक उदाहरण तो यही था कि थिएटर की भाषा में किए गए मलयाली नाटक को देखने के लिए हॉल लगभग खाली था. इस नाटक को प्रायोजक भी मिले हुए थे. कितना सुखद हो कि ऐसे प्रायोजक छोटे छोटे ग्रुपों को भी मिले. उन्हें इसकी अधिक आवश्यकता है.)

पानी में आग!

पढ़ें एक व्यंग्य रचना- पानी में आग! लिंक है- http://rachanakar.blogspot.com/2009/10/blog-post_10.html


कहते हैं, मुंबई शहर हादसों का शहर है। इन हादसों में सबसे बड़ा हादसा यह हुआ कि यहाँ पानी में आग लग गई। अब तक तो आग जंगल में लगती थी, पेट में लगती थी। पुराने जमाने में भी तीन तरह की आग के बारे में बताया गया है- दावानल, बड़वानल, जठरानल। आग और आगे बढी। फिर यह दिलों में लगने लगी। आश्चर्य कि पहले इतने प्रेमिल रीतिकालीन रसिक कवियों और सहृदयों में से किसी ने भी हृदयानल की बात नहीं की। किसी ने यह ज़रूर कहा कि दिल का खेल अज़ीब होता है- लड़ती हैं आंखें, घायल होता है दिल और जलता है बदन। दिल भी जलता है। दिल की आग भी भड़कती है। नफ़रत का पूट ज्यादा हो तो घर, प्रेम, भाईचारे सभी को लील जाती है। इस आग में सभी नाते रिश्ते झुलस जाते हैं।
आग लगती है घरों में। ये घर मजदूरों के होते हैं। झोपड़पट्टियाँ जलती हैं। कभी नेता, कभी बिल्डर, कभी अपने लिए कुछ भी करने मरने को उतारू लोग, अपने आकाओं को तुष्ट करने की कोशिश में अति उत्साही दिखनेवाले छुटभैये - दिल में लगी स्वामिभक्ति की आग, आकाओं से प्रशंसा के फ़द्नल पाने की आग, अपने आप को जनता का सबसे बड़ा हमदर्द मानने और मनवाने की आग- यह आग कैसे दिखाएँ! काश सबके पास हनुमान जी जैसा हुनर रहता - यूं चीरी छाती, वो दिखाई स्वामिभक्ति, फिर पाट ली छाती, जैसे श्वेत-श्याम टीवी के जमाने में खुलने और बंद होनेवाले दरवाजे। दिल की बात सामने आना जरूरी है। इसलिए आग लग जाती है।
आग भी बड़ी अजीब है। अपनों के दिलों में लगती है तो तुरंत पानी बनकर ऑंखों से निकल जाती है। दुश्मनों के दिलों में लगती है तो ज्वाला भड़का देती है। अपना नाश होता है तो आग भड़क उठती है। दुश्मनों का होता है तो ठंढक पहुँचती है।
लोग कहते हैं, आग और पानी में जनम-जनम का वैर है। लेकिन कभी -कभी आप देखेंगे कि दोनों का मेल कितना अद्भुत है, चमत्कारी है। जैसे लड़ती है ऑंखें और घायल होता है दिल, इसी तरह से लगती है आग, बुझाने के लिए दमकल नहीं होता तो लोग ऑंसुओं से ही बुझाने की कोशिश करते हैं। कुछ तेज-तेज छाती पीटते हैं। बेजबान तो ऐसे ही आंसू बहाकर आग बुझाते हैं। बड़बोले बुझाने से पहले जोर-जोर से उसकी ढोल पीटते हैं।
आग और पानी के बीच अंतराष्ट्रीय संबंध है- चाहे वह अमर्त्य सेन हो या योग। राष्ट्रीय जल के लिए अंतर्राष्ट्रीय आग का होना जरूरी है। इसलिए लंदन में बम की आग फैली तो भारत के गुजरात में पानी की लहर फैल गई। लंदन सात दिनों में सामान्य हो गया। हम हो जाएँ तो हमारी खासियत ही क्या? प्रकृति भी देश के, लोगों के मिजाज को समझती है। पड़ोसी धर्म तो सबसे ज्यादा। विज्ञापनवाले ऐसे ही नहीं कहते अपना टीवी चले, पड़ोसी क दिल जले। गुजरात की प्रकृति ने अपना बरसों पुराना राजनैतिक बदला चुका लिया। हमसे अलग हुए थे, अब लो - और धीमे से पानी महाराष्ट्र की ओर सरका दिया। महाराष्ट्र तो महा-राष्ट्र ही है। उसने सोचा, पानी को पानी ही रहने दिया जाए तो हम अलग कैसे हुए। आखिर यहीं पर तो मुंबई भी है, मायानगरी - फिल्म नगरी । सो यहाँ पानी में आग लग गई। फिल्मवाले यूँ ही नहीं लिख डालते न कि रिमझिम बरसा पानी, पानी में आग लगाए। मुंबई पानी में डूबती रही और उधर पानी में आग लग गई। लंदन में आग, मुंबई में आग - अंतर्राष्ट्रीय संबंध जुड़ गए। गुजरात में पानी, महाराष्ट्र में पानी - पड़ोस धर्म सध गया।
सधने में बहुत कुछ सधा। पानी और आग की भावना में लोग बह गए। गांधी, सावरकर जबतक कुछ सोचते, समझ पाते तबतक सरकार ने मुंबई हाई के सभी लोगों के तर्पण भी कर दिए। उनके घरवालों को संवेदनाएँ भी दे डाली। आग हाई पर, पानी ऑंखों में, शब्द जबान पर। क्या करे! राजनीति की अपनी मजबूरी है। मीडिया हो, प्रेस हो तो बोलना जरूरी होता है। गनीमत रही कि आग तो लगी, लेकिन प्रकृति ने थोड़ी उदारता दिखाई, नेवल कोस्टल गार्ड जैसे तंत्रों ने चुस्ती दिखाई और 355 से ज्यादा लोग बचा लिए गए। कोई न्यूज नहीं। इंसान के जिंदा बचने पर न्यूज थोड़े बनती है। वह बनती है उनके मरने पर, घायल होने पर, घर ढहने पर, जान-माल का नुकसान होने पर। मीडिया भी तभी आती है। समाज -कल्याण के काम के प्रचार- प्रसार के लिए वह अपना तंत्र या साधन क्यों बर्बाद करे!
फिल्मवाले गाते रहे - रिमझिम बरसा पानी, पानी में आग लगाए। ये दोनों प्रेमी युगल की तरह गलबहियाँ डाले गाते रहेंगे।
आग और पानी का संबंध यूँ ही अगर चलता रहे तो वह दिन दूर नहीं, जब आग जलने पर पानी पेट्रोल का काम करगी। वैसे भी प्रज्ज्वलनशील पेट्रोल व अन्य र्प्ट्रोलियम पदार्थ अपने भाव के कारण और भी प्रज्जवलनशील होता जा रहा है।
लंदन में सात दिन में सबकुछ सामान्य सा हो गया। बॉम्बे हाइ में भी साढ़े तीन सौ से ज्यादा लोग बचा लिए गए। लेकिन धोबिया जल बिच मरत पियासा की तरह मुंबई वासी आज भी 'पानी-पानी रे' कर रहे हैं। आखिर रहीम भी कह गए है ज्ञ्
रहिमन पानी राखियो, बिन पानी सब सून
पानी गए न ऊबरौ, मोती, मानुस चून।
जो आग पानी की भेंट चढ़ गए, चढ़ गए। जो बच गए, वे महामारी, बीमारी, डेंगू और जाने किस - किस दर्द और डर की आग मे जलने का खतरा लिए जी रहे हैं - जीते रहते हैं, जीते रहेंगे। आखिरकार यह भारत है और हम भारतवासी, जिनमें सहनशीलता की मात्रा हद से ज्यादा होती है! यकीन नहीं होता तो खुद से ही पूछ लीजिए।

Friday, October 9, 2009

थियेटर की भाषा में तैयार मलयाली नाटक - ‘आयुस्सिंते पुस्तकम‘


नेहरू सेंटर थिएटर फेस्टिवल की अबतक की उपलब्धि के रूप में मलयालम नाटक आयुस्सिंते पुस्तकम (The Book of Life) को माना जा सकता है। रविवर्मा कलानीलयम थिएटर के लिए प्रतिबद्ध लोगों का मंच है। मूलत: की वी बालाकृष्णन के उपन्यास पर आधारित यह नाटक धर्म और इसके आडंबर तले कुचले सेक्स की धारणा की धज्जियां उड़ाता है। कथा केरल के एक गांव के ईसाई समुदाय के लोगों की है। वर्जनाओं और दमित इच्छाओं की सामाजिक, मनोवैज्ञानिक अवधारणा और उनसे उपजे सवाल और हालात इस पूरे नाटक का आधार है। हर धर्म त्याग, सादगी, मोक्ष का पाठ पढ़ाता है, मगर सेक्स को लेकर हर कोई दुनिया भर की कुंठाओं से ग्रस्त रहता है, नतीजन धर्म से बंधा समाज सेक्स के नाम पर सारे आडंबर रचता है। उसे पाप की संज्ञा देता है। लेखक का सवाल है कि पाप क्या है? और वह यह कहता है कि बाइबल से ही इसकी शुरुआत मानी जा सकती है। धर्म, लोग, समाज की आंखों में इसके स्वरूप बदलते चलते हैं, इसकी व्याख्याएं बदलती रहती हैं। सेक्स आज भी हमारे समाज के लिए वर्जनीय है।
नाटक के निर्देशक सुवीरन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के 2000 के पास आउट हैं। सुवीरन नाटक के बारे में बताते हुए कहते हैं कि भाषा इसकी दीवार नहीं होगी, क्योंकि इसे थिएटर की भाषा में तैयार किया गया है। उनकी बातों में, उनकी आंखों में अपने काम के प्रति गहरा विश्वास नाटक देखते हुए चरितार्थ होता है। इतने बिंब, भाव, शैली इस नाटक में प्रयुक्त हैं, एक दृश्य से दूसरे दृश्‍य तक जाने में इतने सारे फॉर्मों का प्रयोग है कि आपके मुंह से बरबस वाह निकल आये! इस नाटक को महिंद्रा एक्सीलेंसी इन थिएटर अवार्ड मिल चुका है। इसके कलाकार थिएटर से नहीं हैं, बल्कि अपने जीवनयापन के लिए अलग-अलग काम करते हुए बाक़ी समय में थिएटर करते हैं। मगर कलाकारों की प्रस्तुति को देख कर यह क़तई नहीं कहा जा सकता कि ये शौक़‍िया थिएटर कलाकार हैं। इसके बावजूद सुवीरन कहते हैं कि वे लोग भी अब मोहनलाल जैसे प्रसिद्ध एक्टरों को ले कर नाटक करने की सोच रहे हैं, ताकि प्रसिद्धि और पैसा दोनों आये। मगर सुवीरन, तब यह मौलिकपन और यह प्रयोग शायद छूट न जाए।
कहानी के केंद्र में 10 वर्षीय योहान्नन है, जिसका दादा पाओलो अपने ही पड़ोस की एक बच्ची का यौन शोषण करता है। इस घटना से क्षुब्ध उसका बेटा थोमा उसे मारता है और इस बात से आहत और उपेक्षित पाओलो आत्महत्या कर लेता है। योहान्नन दादा की आत्महत्या की वजह समझ नहीं पाता है। बाद में उसके सामने एक के बाद एक सभी यौन से संबंधित घटनाएं घतती हैं और वह इस भ्रम में पड़ जाता है कि आखिर सेक्स, प्यार और पाप क्या है? गांव का पुजारी एक लड़की से प्यार करता है, मगर उसे शादी की इजाज़त नहीं। हाल ही में हुई विधवा सारा गांव के बड़े पुजारी से मिलती है। इसे देख अब बड़ा हो चुका योहान्नन एक गहरी उत्सुकता से भर जाता है और पहली बार वह इस वर्जित फल से साक्षात्कार करता है। अब पिता थोमा इसे जान कर पुजारी को इसकी सूचना देता है, जो योहान्नन से इतना भर ही पूछता है कि “क्या तुम उसके साथ सोये थे?” इस बात से आहत योहान्नन पिता पर हाथ उठा देता है और पिता को याद आता है, अपने द्वारा अपने पिता पर उठाया हाथ। इतनी ख़ूबसूरती और इतने प्रतीकात्मक तरीके से इसे सामने लाया गया कि बिना संवाद के सब कुछ अभिव्यक्त हो जाता है। सेक्स के प्रतीक के रूप में सेब और सांप का उपयोग बहुत प्रतीकात्मक है। पिता द्वारा सारा की हत्या फिर से एक सवाल पैदा करता है कि पापी को नष्ट किया या पाप को? क्या पापी को मार देने से पाप का अंत हो जाता है? यह भी बड़ी शिद्दत से उभरता है कि पापी को मारने में, उसे सज़ा देने में हम इतने उतावले हो जाते हैं कि भूल जाते हैं कि हमने भी जीवन में कई-कई पाप किये होते हैं। जिसने पाप न किया हो, वह पहला पत्थर मारे।
दादा पाओलो की भूमिका में सुधीर सीके ने जान डाल दी थी। अन्य सभी कलाकार अपनी अपनी भूमिकाओं में बेहद संतुलित थे। थिएटर की जो सबसे बड़ी खूबी है कि कम से कम शब्दों में और भाव, शिल्प, फॉर्म, प्रतीक आदि के माध्यम से अपनी बात कही जाए, इसका खूब दोहन इस नाटक में किया गया। क्या आप यक़ीन कर सकते हैं कि नाटक की थीम सेक्स पर आधारित होने और दादा पाओलो के एक नग्न दृश्य के बावजूद न कहीं अश्लीलता थी, न कहीं हल्कापन। प्रिया की वेशभूषा बेहद सटीक थी। वलसाराज का प्रकाश संयोजन तो इतना सधा हुआ था कि एक दृश्य से दूसरे दृश्य या एक स्थिति से दूसरी स्थिति में जाते हुए उसके सटीकपन पर मुग्ध ही हुआ जा सकता था।
सुनील सीके की मंच सज्जा भी बहुत प्रयोगात्मक थी। बारिश का दृश्य कह लें या उसे प्रतीक के रूप में अपने मन की बहती इच्छा की धार! पानी ऊपर से धार की तरह बह रहा है। पात्र उस पानी में भीग रहे हैं। मन का नर्तन मंच के बीचोबीच रखे रिवॉल्विंग मंच के नर्तन के साथ कई कई परतें और आयाम खोलता था। यह नाटक इस बार के नेहरु सेंटर थिएटर फेस्टिवल मे खेले गये अब तक के नाटकों के बीच की उपलब्धि कही जा सकती है।
(पुनश्‍च : मुंबई के नाटक परिदृश्य में कल हॉल में उपस्थिति न के बराबर रही। इसका एक कारण तो इसका मलयालम में होना था। दूसरी वजह थी, ग्लैमरस लोगों का अभाव। सामने की वीआईपी दीर्घा लगभग खाली थी। हिंदी के पत्रकार तो वैसे भी नहीं दिखते, जो इक्के-दुक्के दिखते हैं, वे भी नहीं दिखे। मेरा मानना है कि थिएटर की अपनी ज़बान होती है और जो थिएटर के प्रेमी हैं, उन्हें थिएटर की भाषा का भी प्रेमी होना चाहिए। जो इस नाटक को देखने नहीं आये, वे नहीं जानते कि उन्होंने एक अच्छा नाटक देखने का मौका गंवा दिया। एक महिला मेरे पास आयीं कि इसकी सिनॉप्सिस कहां से मिल सकती है, क्योंकि भाषा समझ में नहीं आ पाएगी। ग्रुप को इस ओर तनिक ध्यान देना चाहिए। खास कर उन जगहों पर, जहां दर्शक आपके नाटक की भाषा से परिचित न हों।)
http://mohallalive।com/2009/10/08/nehru-centre-theatre-festival-5th-day/
http://www.artnewsweekly.com/substory.aspx?MSectionId=1&main=1&SectionId=31&storyID=94

Thursday, October 8, 2009

जीवन की घटती लौ, पिघलती मोमबती- लिलेट दुबे का नाटक “ब्रीफ कैंडल”

http://mohallalive.com/2009/10/07/nehru-centre-theatre-festival-4th-day/

http://www.artnewsweekly.com/substory.aspx?MSectionId=1&main=1&SectionId=31&storyID=९३

नेहरू सेंटर थिएटर फेस्टिवल के चौथे दिन लिलेट दुबे ने अपने थिएटर ग्रुप ‘द प्राइम टाइम थिएटर कम्पनी’ के बैनर तले स्वयं निर्देशित अंग्रेजी नाटक “ब्रीफ कैंडल” प्रस्तुत किया. 1991 में लिलेट दुबे ने ‘द प्राइम टाइम थिएटर कम्पनी’ की स्थापना करते हुए थिएटर जगत को अंग्रेजी में अच्छे नाटक देने की कोशिश की है. अभी जुलाई में ही उनके थिएटर ग्रुप ने 15वां थिएटर फेस्टिवल मनाया. ‘द प्राइम टाइम थिएटर कम्पनी’ के कुछ मशहूर नाटक हैं, ‘वुमेनली व्यॉसेस’, जिसमें तीम महिला लेखकों वाज़ेदा तबस्सुम, महाश्वेता देवी और गीता मेहता की रचनाएं हैं, महेश दत्तानी के ’30 देज इन सेप्टेम्बर’, ‘डांस लाइक अ मैन’ प्रताप शर्मा का ‘सैमी’ सहित ‘द वेडिंग अलबम’,
“ब्रीफ कैंडल” भी महेश दत्तानी द्वारा ही लिखा गया है. लगता है, महेश दत्तानी इस ग्रुप के पसंदीदा लेखक हैं. यह होता भी है कि कई बार ग्रुप के साथ लेखक का अपनापा बनता है, दोनों एक दूसरे को समझते हैं और इस परस्पर समंवय से दोनों अपना अपना सर्वोत्तम देने की कोशिश करते हैं. इस नाटक को देखते हुए शफात खान की “शोभा यात्रा” और विजय तेन्दुलकर के ‘शान्तता कोर्ट चालू आहे’ की बहुत याद आई. इन दोनों ही नाटकों में पात्रकिसी और मकसद से सामने आते हैं और कालांतर में उनके वे काम उनके अपने ही जीवन की परते उघाडने लगते हैं. ‘शोभा यात्रा’ में एक झांकी के लिए हमारे राजनीतिक चरित्रों में सजे धजे कलाकार धीरे धीरे अपने ही जीवन और उनकी त्रासदियों में खो जाते हैं, इसी तरह जस्ट टाइम पास के लिए खेला जानेवाला नाटक ‘शान्तता कोर्ट चालू आहे’ के पात्र भी किस तरह से अपने जीवन की दुरुहताओं में जकडते चले जाते हैं, यह अनुभव करने लायक है. “ब्रीफ कैंडल” भी नाटक के भीतर नाटक की इसी अवधारणा को प्रस्तुत करता है.
जीवन के आखिरी पल गिन रहे मरीजों की आश्रय स्थली जीवन ज्योति अस्पताल अपने स्थापना दिवस के अवसर पर एक सान्स्कृतिक कार्यक्रम करने के क्रम में वहीं के एक मर चुके मरीज़ द्वारा लिखे नाटक को करने की सोचता है. इस नाटक में एक एयरलाइन द्वारा अपने यात्रियों को एक होटल में ठहराए जाने और उससे उपजी विसन्गतियों से उपजा हास्य है. अस्पताल के मरीज़ के साथ साथ वहां की एक डॉक्टर और एक अटेडेंट भी इस नाटक में भाग लेते हैं. रिहर्सल के दौरान सभी महसूस करते हैं कि उनके द्वारा निभाया जानेवाला किरदार किस तरह से उनके अपने जीवन से मेल खाने लगा है.
नाटक में प्रयोग किए गए हैं. जैसे, नाटक लिखनेवाला मृतक मरीज़ का आना. नाटक जैसे उसके ही अनुसार और उसके ही इर्द गिर्द होने लगता है. वार्षिकोत्सव का नाटक पीछे छूट जाता है और परत दर परत खुलती जाती है सभी के जीवन की अपनी अपनी विडम्बनाएं. प्रेम की अनुभूति के लिए छटपटाते लेखक और अब मृतक मरीज़ और जीवन जीने की उत्कट चाह से भरे सभी शेष मरीज़. कोई मरना नहीं चाहता. यह भाव ही जीवन पर मौत की सबसे बडी विजय है. जीवन और मौत के बीच का द्वंद्व चलता रहता है. मौत एक बार फिर से उनमें से एक और मरीज़ को लील जाती है. रिहर्सल के दौरान मर गए उस मरीज के पात्र का ज़िक्र आने पर उसका इस प्रस्तुति को पर्दे के उस पार मानो संसार के उस पार से देखना, जैसे वह अहसास करवा रहा हो कि वह है, इन लोगों के बीच में ही है. दर्शकों की विचार यात्रा साथ साथ चलती रहती है.
नाटक में हास्य के पल आते हैं, जब मृतक मरीज़ द्वारा लिखे गए नाटक का रिहर्सल होता है. कुछ तथाकथित बोल्ड दृश्य भी हैं और कुछ बोल्ड सम्वाद भी, जो भाषाई दर्शकों को शायद थोडा असहज करता है, मगर अंग्रेजी के दर्शकों के लिए यह सामान्य है. भाषाई दर्शकों में भी थिएटर या रचनात्मकता के आग्रहियों के लिए ऐसे सम्वाद सामान्य हैं. फिर उन सम्वादों के साथ विषय की गम्भीरता तुरंत ही उन सम्वादों पर से ध्यान हटा कर विषय वस्तु पर केंद्रित कर देती है.
अमर तलवार, सुचित्रा पिल्लई, जॉय सेनगुप्ता, ज़फर कराचीवाला, मानसी पारेख और सत्चित पुराणिक परिचित अभिनेता हैं. दर्शक उन्हें फिल्म खासकर टीवी पर देखते रहे हैं. नाटक में सबसे अधिक प्रभावित किया कुलकर्णी और तावडे की भूमिका में सत्चित पुराणिक ने और निराश किया केंद्रीय पात्र यानी मृतक मरीज़ की भूमिका में ज़फर कराचीवाला ने. अरे यार, मरे हुए की भूमिका निभा रहे हो, मगर इसका मतलब यह तो नहीं कि मर मर कर निभाओ.
इनायत सामी की प्रकाश व्यवस्था सही थी. कभी कभी कलाकार प्रकाश व्यवस्था में दिग्भ्रमित हो सही स्थान पर नहीं पहुंच पाते थे. सेट लिलेट दुबे और भोला शर्मा का था. एक ही बेड कभी अस्पताल और कभी होटल के बेड के रूप में इस्तेमाल किया जाता था. स्क्रीन के साथ भी ऐसे ही प्रयोग किए गए थे. आधुनिक और प्रयोगवादी थिएटर की यह ख़ासियत है और इससे दर्शकों की कल्पनाशीलता में इज़ाफा होता है.
निर्देशन लिलेट दुबे का था. लिलेट दुबे फिल्म, टीवी और रंगमंच की जानी मानी अभिनेत्री हैं, हालांकि उनके अभिनय की अपनी सीमाएं हैं. यह शायद अंग्रेजी परिवेश की गहनता का असर हो. उनकी चंद चर्चित फिल्में रही हैं, ‘चलते चलते’, ‘मॉनसून वेडिंग’, ’गदर’, ‘ज़ुबेदा’, ‘बागबान’, पिंजर’ आदि. थिएटर डायरेक्टर के रूप में उन्होंने अपनी पहचान बनाई है. ‘सैमी’ नाटक के लिए इन्हें बेस्ट आय्रेक्टर अवार्ड मिल चुका है.
नाटक या ग्रुप का विवरण जानने के लिए homspuntheatre@yahoo.com पर सम्पर्क कर सकते हैं. अगर आप शो बुक कराना चाहते हैं तो ऑनलाइन बुकिंग करवा सकते हैं www.bookmyshow.com पर.
(पुन: हमारे कई हिंदीदां थिएटर प्रेमी इस नाटक में नहीं दिखे. पूछने पर बोले, “अब.. अंग्रेजी नाटक में क्या देखने को मिलेगा! वही सब..! उस ‘वही सब” का खुलासा नहीं किया गया. नेहरु सेंटर के अधिकारीगण शायद नेट, ऑनलाइन, ईमेल आदि से बावस्ता नहीं रखते. ऑनलाइन कवरेज, वेबसाइट कवरेज, ब्लॉग्स कवरेज शायद अभी भी उनके कॉन्सेप्ट में नहीं आया है और ना ही थिएटर ग्रुपों के ही. इसलिए निश्चिंत रहिये, हिंदुस्तान में कागज पर कार्रवाई होती रहेगी और अखबार भी निकलते रहेंगे.) इसके लिए भी तैयार रहिए कि आपके नेट कवरेज के लिए आपसे इसका प्रिंट आउट मांगा जा सकता है.)

इस्मत आपा, कितनी कुशल बुनकर हैं आप !

http://mohallalive.com/2009/10/07/nehru-centre-theatre-festival-third-day/

http://www.artnewsweekly.com/substory.aspx?MSectionId=1&left=1&SectionId=31&storyID=८७

नेहरू सेंटर थिएटर फेस्टिवल के तीसरे दिन नसीरुद्दीन शाह के थिएटर ग्रुप “मोटली” ने “इस्मत आपा के नाम – II” प्रस्तुत किया। नाटक प्रस्तुत करने से पहले नसीरुद्दीन शाह अपने ग्रुप और नाटक का तआर्रुफ करने के लिए आये। उन्होंने बहुत अच्छी बात कही कि ऐसा नहीं है कि इनकी रचनाएं या ये खुद किसी परिचय की मोहताज़ हैं। मगर उनको इस रूप में याद करना उनके प्रति हमारी श्रद्धांजलि है। दूसरी महत्व की बात कही कि हमारी आज की पीढी अपने लेखकों के बारे में कम जानती है और हमारी कोशिश है कि ऐसे महान लेखकों की कृतियों को हम दर्शकों तक ले कर आएं।
स्क्रिप्ट दमदार हो तो वह सुनने में भी देखने जैसा लुत्फ देती है। इस्मता चुग़ताई उर्दू या यों कह लें कि हिंदुस्तानी ज़बान की ऐसी अदीबा रही हैं कि उनकी लेखनी से लफ्ज़ जैसे अपने आप बन कर, संवर कर, लरज लरज कर बाहर आते हैं। तरक्कीपसंद इस्मत आपा ने बहुत कुछ लिखा। कहानियां, फिल्में, उपन्यास। फिल्मों में काम भी किया। अपने समय की वे बेहद तरक्कीपसंद अदीबा थीं, जिनसे मर्द लेखक भी ख़ौफ खाते थे। उनकी अपनी तरक़्क़ीपसंदगी का आलम यह था कि अपनी आखिरी ख्वाहिश मे उन्होंने कहा था कि उनके मरने के बाद उन्हें दफनाने के बदले उन्हें जला दिया जाए और उनकी ख़ाक़ को गंगा के सुपुर्द कर दिया जाए। यह एक ऐसा क़दम था, जिसने मुंबई के बड़े से बडे तरक़्क़ीपसंद साहित्यकारों और लोगों को हिला कर रख दिया था। नेहरू और गांधी के प्रति तो वे श्रद्धा भाव से कूट कूट कर भरी हुई थीं। यह हमारे अदब की बदक़िस्मती है कि जब भी उस पर कोई नये तरीक़े से सोचता है तो उस पर लानत-मलामत की जाती है। इस्मत आपा भी गुलेरी जी की तरह एक ही कहानी “लिहाफ” से जानी जाने लगीं और यह कहानी उनके अदब के साथ-साथ उनके जीवन का भी एक अजीबोगरीब पन्ना बनकर रह गयी। उन पर इल्ज़ाम लगे कि वे फाहश लेखन करती हैं। मंटो की तरह उन पर इसके लिए मुकदमा तक चला।
यह सब लिखने के पीछे मक़सद महज़ इतना था कि आप तनिक इस्मत आपा की खुसूसियतों से वाक़िफ हो लें। यह हिंदुस्तान का भी दुर्भाग्य रहा है कि यहां अपने ही नामचीन लेखकों की क़द्र नहीं, क्योंकि इन नामचीन लेखकों ने अपनी-अपनी मादरी ज़बान में लिखना ज़्यादा मुनासिब समझा और अंग्रेजों के मारे हम अभी तक अपने को अंग्रेज कहलाने और अंग्रेजी पढ़ने, लिखने, बोलने में बड़े गुमान में भर जाते हैं।
कहानी का मंचन हिंदी थिएटर के लिए कोई नयी बात नहीं है। देवेंद्रराज अंकुर को तो कहानी मंचन का विशेषज्ञ ही माना जाता है। प्रसिद्ध कथाकारों की कृतियों पर काम करने में एक आश्वस्ति स्क्रिप्ट की रहती है। क़िस्सागोई तो वैसे भी हमें बचपन से विरासत में मिल जाती है। इसलिए गये कुछ अरसे से थिएटरदानों ने हिंदी, उर्दू आदि के लेखकों की कहानियों की थिएट्रिकल प्रस्तुति करनी शुरू की है। ‘मोटली’ भी इनमें से एक है। मोटली की “इस्मत मंटो हाज़िर हों” और “इस्मत आपा के नाम” में सादत हसन मंटो और इस्मत चुग़ताई के अफ़सानों की रंगमंचीय प्रस्तुति है।
“इस्मत आपा के नाम – II” में इस्मत आपा के 3 अफसानों “अमरबेल” “नन्हीं की नानी” और “दो हाथ” की नाटकीय प्रस्तुति की गयी, जिन्हें क्रमश: मनोज पाहवा, लवलीन मिश्रा और सीमा पाहवा ने प्रस्तुत किया। अफ़सानागोई करते हुए पात्र में बदल जाना और फिर पात्र से अफ़सानागो बन जाने की इस अंतर्यात्रा को इन तीनों कलाकारों ने बडी कुशलता से पेश किया। सभी अफसाने इतने दमदार थे और उनमें समाज और उसकी रवायतों के प्रति इतना तंज भरा हुआ था कि सभी कहानियां व्यंग्य की शक्‍ल लेते हुए कभी टीस तो कभी हास्य पैदा कर रहे थे। सभी कलाकार अपनी बयानबाज़ी और अभिनय में सहज थे। लवलीन और सीमा तो आज भी दूरदर्शन के पहले सोप ‘हमलोग” की बड़की और छुटकी के रूप में ही जाने जाते हैं। तब सीमा पाहवा सीमा भार्गव के नाम से जानी जाती थीं। इसका उदाहरण मंच पर उनके प्रवेश के साथ ही मिल गया, जब दर्शकों ने उन्हें छुटकी और बड़की कहना शुरू किया।
“इस्मत आपा के नाम – II” के अफ़सानों का परिवेश मुख्य रूप से मुस्लिम है, इसलिए मंच पर भी वह परिवेश देने की कोशिश की गयी थी। सादी, सीधी और सरल उर्दू सभी को समझ में आयी और सभी ने इसका पुरअसर लुत्फ उठाया। प्रकाश व्यवस्था भी बहुत तेज़ और आंखों को चुभनेवाली नहीं थी। बीच-बीच में एकाध ठुमरी के चंद बोलों ने नाटक में एक अलग ही रस घोल दिया।
नसीरुद्दीन शाह ने कला फिल्मों से काम आरंभ करके व्यावसायिक फिल्मों में आ कर भी नाम कमाया। वे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के चंद गिने चुने लोगों में से हैं, जो प्रसिद्धि के इतने ऊंचे मुकाम पर पहुंचने के बाद फिर से नाटक की ओर लौटे हैं और नाटक के प्रति गंभीर हैं। यह गंभीरता उनकी शख्सियत के साथ-साथ उनके नाट्य निर्देशन में भी दिखती है। कभी मौका मिले तो आप ये प्रस्तुतियां ज़रूर देखें और हां, इनलोगों को पढ़ें भी।
(पुन : “इस्मत आपा के नाम – II” नाटक को देखने के बाद एक दर्शक ने बहुत लंबी सांस छोडी। दूसरे ने इसकी वजह पूछी। उसने बताया, कल के ‘लैला मजनूं’ के बाद मुझे लगा था कि उर्दू इतनी ही भारी-भारी लैंग्वेज होती होगी। दूसरे दर्शक ने बताया कि कल के भारी भारी सेट, कॉस्ट्यूम, ज़बान, मौसीक़ी से अलहदा आज का नाटक कितना हल्का और दिल तक पहुंचनेवाला लग रहा है। बिचारे मुंबईकर, जीवन की आपाधापी में इस क़ाबिल नहीं रह गये कि कोई भारी सा कुछ भी अपने ऊपर ले सकें!)

Wednesday, October 7, 2009

मेरे महबूब, मुझसे पहली सी मुहब्बत ना मांग

http://janatantra.com/2009/10/07/nehru-centre-theatre-festival-layla-majnun/

http://www.artnewsweekly.com/

जीव जब तक धरती पर हैं, तबतक प्रेम भी है। इंसान की दुनिया में प्रेम पर जब तब रोक टोक लगती रहती है, मगर प्रेम का कभी खात्मा नहीं होता. आज भी प्रेम की गाथाएं राधा कृष्ण से ले कर रोमियो जूलियट, शीरीं फरहाद, लैला मजनू के किस्सों के रूप में जन मानस में जीवित है. आज भी जब कोई प्रेम के पागलपन में पडता है, उसके लिए तत्काल कह दिया जाता है, “लैला मजनू बन गये हैं.” क़िस्सागोई भी हमारे जीवन में रक्त की तरह समाई हुई है. गाथा आल्हा ऊदल की हो या लैला मजनू की, जिसमें भी रस तत्व होता है, लोग उसे गाथा बना देते हैं और फिर उसकी आवृत्ति और पुनरावृत्ति होती रहती है. प्रेम पर लोगों की नाक भौं चाहे जितनी सिकुडे, मगर लेखन, नाटक, फिल्म, टीवी में इसी की भरमार है.

कई बार ऐसा होता है कि रामायण, महाभारत की तरह ही हम कथानक को जानते हुए भी उसकी प्रस्तुति पुनर्प्रस्तुति को देखते पढते हैं ताकि नया क्या है, यह देखा जा सके. लैला मजनू की दास्तान भी कोई नई बात नहीं है, मगर इसके मूल में छिपे इश्क़ को उजागर करने की चाहत बार बार लोगों को इस विषय पर ले आती है. इश्क़ की इसी दास्तानगोई को प्रो. राम गोपाल बजाज ने नेहरु सेंटर थिएटर फेस्टिवल में ‘शब्दाकार’ द्वारा प्रस्तुत नाटक ‘लैला मजनू’ के माध्यम से एक बार फिर उजागर करने की कोशिश की. इस्माइल चूनारा के मूल अंग्रेजी नाटक का उर्दू तर्ज़ुमा साबिर इरशद उस्मानी ने किया है.
उर्दू ज़बान की साफगोई और रवानगी इस नाटक में है, जिसके साथ कलाकारों ने भी लगभग न्याय किया, वरना आज के कलाकारों के मुंह से उर्दू सुनकर रोना आने लगता है. प्रो. राम गोपाल बजाज रंगमंच जगत में न भूलनेवाला नाम है. ये राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक भी रह चुके हैं और 2003 में पद्मश्री से सम्मनित भी किए जा चुके हैं. अपने लोगों के बीच ये “बज्जू भाई” के रूप में ज्यादा जाने पहचाने जाते हैं.
डॉ. राम गोपाल बजाज के फॉर्म से जो परिचित होंगे, वे जानते होंगे कि वे अपने कथ्य, मंच सज्जा, पात्रों, परिवेश, गीत, संगीत, वेश विन्यास, मेकअप आदि को काफी विस्तार देते हैं. इससे नाटक में एक फैलाव आता है और दर्शक इस प्रसार को महसूस कर पाते हैं. सम्वाद पर भी वे काम करते हैं.
इस नाटक में भी खालिस उर्दू के बड़े बड़े, लम्बे लम्बे सम्वाद निरंतरता में पात्रों से बुलवाए गए हैं. सम्वाद में कहीं तीव्रता है तो कहीं ठहराव. कहीं ऊंचाई है तो कहीं गहराई. पूरे नाटक में एक प्रवाह दिखता है. मध्यान्तर के पहले तक नाटक इसी प्रवाह में बहता दिखता है. ग्रीक संस्कृत शैली के माध्यम से इश्क़े मजाज़ी से इश्क़े हक़ीक़ी तक का सफर एक शायराना अंदाज़ में होता जाता है. इसमें प्रेम के शारीरिक स्तर से उतर कर उसके आध्यात्मिक रूप तक पहुंच जाना कि जब लैला अपने क़ैस से मिलती है तो वह उस हाड मांस की बनी लैला को पहचानने से इंकार कर देता है. औरत एक मज़बूर शब्द है और इसे भी लैला की मां के सम्वाद के साथ बताए जाने की कोशिश की गई है. नाटक की खूबियां ही कभी कभी इसकी सीमाएं भी बन जाती हैं.
मध्यांतर के बाद सबकुछ छूटता बिखरता, थकाऊ, उबाऊ सा लगने लगता है. लम्बे लम्बे सम्वाद और मुंबई के आज के माहौल में ऐसी उर्दू से लोग बावस्ता नहीं हो पाते. अगर अकादमिक प्रस्तुति हो तो इसके माध्यम से छात्रों और सीखनेवालों को रंगमंच की सभी बारीकियां समझाई जा सकती हैं, मगर आज के समय में, जब देश और लोग बाग तरह तरह की विषमताओं से जूझ रहे हैं, इश्क़ की यह क़िस्सागोई फैज़ की याद दिला देता है कि “मेरे महबूब, मुझसे पहली सी मुहब्बत ना मांग”। पांच कथावाचिकाएं पारम्परिक शैली में कथा बांचती रहती हैं. कथा की अतिशय गम्भीरता को तोडने के लिए दो क़िस्सागो भी है, जो मनोरंजन तो करते हैं, मगर नाटक को बेवज़ह लम्बा खींचते हैं.
इश्क़ के नाम पर इतना तड़पने के बावज़ूद उस तड़प का अहसास बदक़िस्मती से नहीं हो पाता. सभी पात्रों ने अपना अपना किरदार निभाया सिवाय मजनू के. उसके पूरे हाव भाव में अपने को मंच पर प्रस्तुत करने का भाव था, जो नाटक को एकदम से कमज़ोर कर देता था. लम्बे लम्बे सम्वाद भाव की गहराई को खा जा रहे थे.
एक समय था, जब पारसी थिएटर में बडी नाटकीय शैली में सम्वाद बोले जाते थे, मगर आज भाव के भूखे लोगों को इशारे में समझना अधिक अच्छा लगता है. उसमें भी महाराष्ट्र में, जहां नाटक का मतलब होता है, कम से कम शब्दों का खर्च. वरना मराठी के सुप्रसिद्ध नाटककार भालचंद्र झा के शब्दों में कहें कि तब स्टेज नाटक और रेडियो नाटक में फर्क़ ही क्या रह जाएगा? फिर भी, फेस्टिवल का नाटक है. मान कर चलिये कि फेस्टिवल में सब अच्छा अच्छा ही होता है. आगे भी होगा. बस, आते रहिए.
(पुन: मेरा एक दोस्त आधे में ही नाटक छोड कर चला गया. मेरे सामने एक सज्जन सोते रहे. मध्यांतर के बाद दिखे ही नहीं. एक अन्य दोस्त कहते रहे, मैं तो मराठी थिएटर से बावस्ता रखता हूं ना. इतने सारे सम्वाद? शायद हिंदी में ऐसा ही होता हो. एक दिन पहले ही मराठी नाटक अकादमी ने मराठी के मूल भाव गीत संगीत को ले कर गिरीश कर्नाड के नाटक ‘फ्लावर्स’ पर आधारित अपनी प्रस्तुति ‘मदन भूल’ की थी. सामन्यत: देर तक चलनेवाले संगीत प्रधान मराठी नाटक में नए प्रयोग तो किए ही, उसे महज डेढ घंटे में भी सहेज दिया. मेरा दुर्भाग्य कि किसी वज़ह से इसे देख नहीं सकी.)

Monday, October 5, 2009

क़ैदियों की ज़िंदगी में “निर्मल धारा सेतु”

http://janatantra.com/2009/10/05/avitako-programme-for-prisoners/

अक्सर यह होता है कि जेल के लिए कोई भी कार्यक्रम करते समय वक्ता, अभिनेता, कलाकार, कविगण इस बात के लिए आशंकित रहते हैं कि जेल के लोग यानी कि क़ैदी उनकी बातें समझेंगे या नहीं. पिछले 6 सालों से जेल में काम कर रही छम्मक्छल्लो के लिए अनुभव एकदम अलग है. उसकी नज़र में सबसे पहले तो जेल में बन्द सभी इंसान हैं. छम्मक्छल्लो को नहीं मालूम कि वे अपराधी हैं भी या नहीं. कोर्ट सबूतों के आधार पर फैसला सुनाती है. छम्मक्छल्लो को यह भी नहीं मालूम कि इन फैसलों के कारण सजा काट रहे लोग वास्तव में अपराधी हैं या नहीं. उन्होंने अपराध खुद से किया या किसी के उकसाने पर किया, या वे उस खेल के नामालूम से मोहरे रहे, जिनके कन्धे पर बन्दूक चला कर सभी अपनी-अपनी गोलियां दागते रहे. दुर्भाग्य से छम्मक्छल्लो को यह कुछ भी नहीं पता. उसे पता है तो सिर्फ़ यह कि जेल में बन्द लोग भी इंसान है, उनके भीतर भी दिल धड़कता है, वे भी अपने किये के लिए पछताते हैं, वे भी वहां से निकल कर सम्मान की ज़िन्दगी बसर करना चाहते हैं. मतभेद हो सकते हैं, मगर ग्लास आधा खाली देखने के बजाय ग्लास आधा भरा हुआ देखे जाने की ज़रूरत है.
छम्मक्छल्लो यही करने का प्रयास करती है. इसी क्रम में ‘अवितोको’ द्वारा गान्धी और शास्त्री जयंती यानी 2 अक्तूबर के ठीक एक दिन बाद यानी, 3 अक्तूबर, 2009 को ठाणे सेंट्रल जेल में भारतीय पीनल कोड की भिन्न भिन्न धाराओं के तहत बन्द 35 बन्दियों के लिए ‘निर्मल आनन्द सेतु’ पर एक दिवसीय कार्यशाला रखी गई. इसका मूल उद्देश्य व्यक्ति के अपने ‘स्व’ का विकास करना था. जेल जैसी विषम जगह में रहकर भी अगर कोई अपने विकास की बात सोचता और समझता है तो यह उसके जीवन की कभी ना भूलनेवाली घटना हो जाती है. रविदत्त गौड़ ने इस कार्यशाला का संचालन किया. रवि भारतीय मिथकों के सहारे आज के जीवन की परतों को तह दर तह खोलने में माहिर हैं. जीवन की जटिलता उनकी प्रवाहमयी भाषा और विचारों के प्रभाव में आ कर अपने आप अपने गिरह खोलने लगती है.
कार्यशाला के सहभागी व्याख्यान के विन्दुओं को अपने जीवन से जोड़ कर देखने का प्रयास कर रहे थे और वे उसमें सफल भी हुए. सहभागियों को एक अभ्यास कराया गया. कागज से उन्हें एक सेतु बनाने को कहा गया, जिसके नीचे से एक जहाज को गुजरना था और जिसके ऊपर सामान को भी टिकाए रखना था. तीन ग्रुपों में यह अभ्यास कराया गया. सभी ग्रुपों को अपने ग्रुप का नाम रखने और अपनी टीम का नेता यानी लीडर चुनने के लिए कहा गया. ग्रुप ने अपने अपने ग्रुप का नाम रखा- ए-1, क्रिएटिव और ईगल. ईगल ग्रुप ने बडा सा सेतु बनाया, मगर उसके नीचे से ना तो जहाज गया और ऊपर ना ही सामान टिक सका. क्रिएटिव ग्रुप के सेतु के साथ भी यही बात हुई. ए-1 ग्रुप के सेतु के नीचे से जहाज तो नहीं गया, मगर उसके ऊपर सामान आ गया. जीवन वही एक सेतु है, जिसके नीचे से हमारे अपने अन्दर के लोगों की भी समाई हो और जिसे अपने ऊपर से बड़े से बड़ा असला भी रख सकने की कूव्वत हो. सहभागियों ने जीवन के इस तत्व को इतनी आसानी से समझा कि वे इस कथन के मर्म तक तुरंत पहुंच गए.
सहभागियों ने इस कार्यशाला के लिए नमित होने से लेकर कार्यशाला स्थल तक आने और यहां आकर उन्हें कैसा लगा और उन्होंने इससे क्या हासिल किया, पर अपने विचार दिए. ये विचार फिर कभी आपको अलग से दिए जाएंगे. ‘अवितोको’ सहभागियों को अपनी भाषा में बात करने देने के लिए स्वतंत्र रखता है. यहां भी सहभागियों ने हिन्दी, मराठी, गुजराती, अंग्रेजी में अपनी बातें रखीं. सहभागियों का बारम्बार यही अनुरोध रहा कि आप यहां जल्दी जल्दी आएं, ताकि इस कार्यशाला की बातों को और गहराई से सीखा जा सके. और आगे सकारात्मक तरीके से सोचा, समझा और किया जा सके.
आप भी ‘अवितोको’ के इस अभियान से कला, थिएटर, साहित्य य अन्य किसी भी क्रिएटिव और सकारात्मक तरीके से जुडना चाहते हैं तो आपका स्वागत है. आप हमें avitoko@rediffmail.com या gonujha.jha@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं

Saturday, October 3, 2009

गैलिलियो - नेहरु सेंटर, मुंबई के सराहनीय प्रयास की ढीली प्रस्तुति के बावज़ूद

खगोलशास्त्र वर्ष के उपलक्ष्य पर नेहरु सेंटर, मुंबई ने 30 सितम्बर, 2009 को बर्टोल्ड ब्रेख्त लिखित "गैलिलियो" नाटक की प्रस्तुति की. गैलिलियो इतालवी भौतिकशास्त्री और खगोलशास्त्री थे, जिन्होंने उस समय की मान्यता के खिलाफ अपने सिद्धान्त प्रस्तुत किए थे कि चांद चिकना नहीं, बल्कि रुखडा है और कोपरनिकस की मान्यता को सही ठहराया कि सूर्य स्थिर है और पृथवी और अन्य ग्रह उसकी परिक्रमा करते हैं. यह उस समय के कैथोलिक चर्च धार्मिक संगठनों की मान्यता के खिलाफ था. गैलिलियो का बहुत कडा विरोध हुआ. उन पर इतना दवाब बनाया गया कि अंत में उन्हें अपने शब्द वापस लेने पडे. उन्हें आजीवन कारावास की सज़ा हुई. गैलिलियो की मृत्यु के लगभग सौ साल बाद यही सिद्धांत मान्य हुआ और इस तरह से गैलिलियो ने खगोल जगत को सर्वथा एक नई खोज का उपहार दिया.
मुंबई का नेहरु सेंटर पं. जवाहरलाल नेहरु के "डिस्कवरी ऑफ इंडिया" के साथ साथ अपनी आर्ट गैलरी व तारांगण के लिए मशहूर है. सैलानियों के लिए यह एक आकर्षण का केन्द्र है. साथ ही इसके अपने ऑडीटोरियम हैं, जहां विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं. इस लिहाज़ से गैलिलियो पर नाटक करवा कर नेहरु सेंटर ने बहुत ही सराहनीय कार्य किया है.
इस नाटक को शिवदास घोडगे ने निर्देशित किया है. शिवदास घोडगे भारतीय नाट्य विद्यालय के बहुत वरिष्ठ पास आउट हैं. नाट्य निर्देशन के क्षेत्र में वे एक जाना- पहचाना नाम हैं. मगर इस नाटक में कसे निर्देशन की कमी बेहद खली. मराठी नाटक आज भी लम्बी अवधि के खेले जाते हैं, मगर हिन्दी में अब लम्बी अवधि के नाटक बहुत ही खास स्थिति में ही खेले जाते हैं. कसे निर्देशन के अभाव में नाटक की अवधि ने दर्शकों को जम्हाइयां लेने पर मज़बूर कर दिया. कई दर्शकों को तो मध्यांतर में ही नाटक खत्म सा लगा.
इस नाटक को मुंबई विश्वविद्यालय के अकेडेमी ऑफ थिएटर के छात्रों से करवाया गया था. हॉल में उपस्थित छात्रों की संख्या भी इसका प्रमाण थी. गैलिलियो की मुख्य भूमिका में अशोक लोखंडे थे. अशोक लोखंडे मंजे हुए कलाकार हैं और वहां उपस्थित कमलाकर सोनटक्के ने बहुत सही कहा कि एक केन्द्रीय भूमिका में बहुत दिनों के बाद अशोक लोखंडे को देखना एक सुखद अनुभव रहा. लेकिन, अफसोस यह रहा कि अशोक लोखंडे नाटक के अंतिम चरण के 20-25 मिनट को छोड कर सारे समय अशोक लोखंडे ही बने रहे. कलाकार का यह रूप किसी भी प्रस्तुति को कमज़ोर करने के लिए काफी होता है.
बर्टोल्ड ब्रेख्त लिखित "गैलिलियो" नाटक का हिन्दी अनुवाद वी के शर्मा (पास पर नाम व्ही के शर्मा) का था. भाषा आज की हिन्दी से मेल नहीं खाती, जिसे आज की हिन्दी के अनुरूप करने का निर्देशकीय समाधान होना चाहिये था. विदेशी पृष्ठभूमि, पात्र विदेशी, चरित्राँकन विदेशी, विषय गम्भीर- ऐसे में भाषा का रूखापन और स्क्रिप्ट का ढीलापन इसे और नीरस बनाता गया. उस पर से कलाकारों के उच्चारण. फिल्मों की तरह ही नाटकों में भी भाषा पर काम नहीं किया जाता. लगभग सभी कलाकार गैर हिन्दी भाषी थे, इसलिए उनकी अपनी मातृभाषा का इतना गहरा असर सम्वाद अदायगी पर था कि कई बार कोफ्त होने लगती थी. ऐसे में उर्दू के तलफ्फुज़ की तो बात ही छोड दीजिए. स्क्रिप्ट और सम्वाद अदायगी नाटक ही क्या, किसी भी फिल्म, टीवी आदि के लिए भी उतना ही ज़रूरी है. कसी स्क्रिप्ट पढने या सुनने में भी पूरे नाट्क का आनन्द दे देती है.
सबसे बडी दिक़्क़त यह रही कि यह नाटक सम्वेदना के स्तर तक पहुंच नहीं पाया, जबकि वही उसके मूल में था. आखिर ऐसी क्या स्थितियां पैदा की गईं कि गैलिलियो को अपना वक्तव्य् बदलना पडा? आखिर पोप, पादरी, धर्म संस्थानो, चर्चों का किस तरह का वर्चस्व था, जो एक वैज्ञानिक को झुकने पर बाध्य कर देता है. यह दोनो दो ध्रुव थे, जिनकी दो अलग-अलग धाराएं थीं. नाटक में इन दोनों ध्रुवों का खिंचाव इतना सतही था कि दृश्य देखते समय कहीं कोई बेचैनी नहीं हुई. मतलब, नाटक का उतार-चढाव सतह पर ही चलता रहा.
कलकार सभी या तो छात्र थे या अकादमी से बस पास हो कर निकले थे. तो बिचारे बच्चे अपनी भूमिका में लगे हुए थे. अपनी वेशभूषा में कई असहज दीखे. पीरियड ड्रामा के कॉस्ट्यूम पहन कर काम करने के लिए उसका अभ्यास भी ज़रूरी है, जिसकी कमी दीखी. गनीमत थी कि मंच पर भारी भारी प्रॉप्स नहीं थे. सह निर्देशन में स्मिता ठाकूर और सुलेखा दोशी के नाम रहे. इन्हें नाटक की टाइमिंग का भी अन्दाज़ा नहीं रहा और पर्दा गिरने से पहले ही वे स्टेज पर आ खडी हुईं. और उनकी उद्घोषणा ने तो नाटक का रहा- सहा स्वाद भी बिगाड दिया. अकादमी के छात्रों को इस पर तो ध्यान देना ही चाहिये, शिक्षकों को भी इस पर सोचने की ज़रूरत है.
संगीत अमोद भट्ट का था और वे अपना प्रभाव छोड सके. गायक वृन्द की आवाज़ में पता नहीं क्यों अपेक्षित उमंग का अभाव दीखा. प्रकाश व्यवस्था अच्छी थी. खास कर सूरज का गोला सूरज, छंद, धरती, ब्रह्मांड सब कुछ बनकर प्रभावित तो करता था ही, दर्शकों तक वह अपनी तरंग भी छोड जाता था. बावज़ूद इन सबके, यह नाटक अति महत्वपूर्ण है. इसलिए इसे तनिक और सरल और कस-मांज कर दिखाया जाना चाहिये- हर वर्ग और हर उम्र के लोगों तक, क्योंकि थिएटर केवल मनोरंजन का नहीं, शिक्षा और विकास का सबसे बडा माध्यम है.

Friday, October 2, 2009

बापू के नाम की यह चिट्ठी

बरसों पहले एक फिल्म आई थी- "बालक." उस फिल्म के लिए यह गीत सम्भवत: पं. प्रदीप ने लिखा था. लोग कहते हैं, सब कुछ बदल गया है, बहुत कुछ बदल गया है. गीता में जो कहा गया, आज तक नहीं बदला, कबीर ने जो कहा, आज तक वही हालात हैं. शहीद भगत सिंह जो बयान कर गये, देश के सामाजिक हाल अब भी वहीं के वहीं हैं. बापू भी जो कह गये, क्या उस पर हमारा ध्यान है? बापू के नाम यह पत्र आज भी हमारे हालात के बयान क ज़िन्दा दस्तावेज़ है.
सुन ले बापू ये पैग़ाम, मेरी चिट्ठी तेरे नाम
चिट्ठी में सबसे पहले, लिखता तुझको राम- राम,
लिखता तुझको राम
काला धन, काला व्योपार, रिश्वत का है गरम बाज़ार
सत्य अहिंसा करे पुकार, टूट गया चरखे का तार
तेरे अनशन सत्याग्रह के बदल गये असली बर्ताव
एक नई विद्या उपजी है, जिसको कहते हैं घेराव
तेरी कठिन तपस्या का ये निकला है कैसा अंजाम
चिट्ठी में सबसे पहले, लिखता तुझको राम- राम
प्रांत प्रांत से टकराता है, भाषा से भाषा की लात
मैं पंजाबी, तू बंगाली, कौन करे भारत की बात
तेरी हिन्दी के पैरों में अंग्रेजी ने बान्धी डोर,
तेरी लकडी ठगों ने ठग ली, तेरी बकरी ले गये चोर,
साबरमती सिसकती तेरी, तडप रहा है सेवाग्राम
चिट्ठी में सबसे पहले, लिखता तुझको राम- राम
राम-राज्य की तेरी कल्पना, उडी हवा में बन के कपूर
बच्चों ने पढ-लिखना छोडा, तोड-फोड में हैं मगरूर
नेता हो गये दल-बदलू, देश की पगडी रहे उछाल,
तेरे पूत बिगड गए बापू, दारुबन्दी हुई हलाल
तेरे राजघाट पर फिर भी, फूल चढाते सुबहो-शाम
चिट्ठी में सबसे पहले, लिखता तुझको राम- राम
हां, आज हमारे भूतपूर्व प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री का भी जन्म दिन है, जिन्होंने देश के कठिन समय में देशवासियों से अपील की थी कि आप सब सप्ताह में एक शाम का भोजन ना करें, इससे देश में अनाज की जो बचत होगी, उससे अनाज के आयात का संकट टाला जा स्कता है. और मुझे याद है, क्योंकि मैने भी तब एक शाम नहीं खाया था, लोगों ने स्वेच्छा से सप्ताह में एक शाम का खाना छोडा था. स्कूलों तक में इसका प्रचार लिया गय था. टीकरों ने बच्चों को समझाया था. मुझे भी टीचर के मार्फत ही यह सन्देश मिला था. शास्त्री जी की सादगी और देश के प्रति निष्ठा लोगों के दिलों तक पहुंची थी. मुझे अभी भी याद है कि उनकी मृत्यु पर हमारे घर काम करनेवाली चनिया दाई भी फूट-फूट कर रो पडी थी. दर असल उसी ने सुबह-सुबह काम पर आते समय मोहल्ले के चौक पर बज रहे रेडियो और उस पर आये समाचार से खलबली मच गये मोहल्ले की भी जानकारी दी थी. शहर में जैसे मातम छा गया था. लोगों ने उस दिन खाना नहीं खाया था और ताशकन्द शब्द लोगों के दिल-दिमाग में खुभ गए थे. स्कूलों- कॉलेजों के अलावा गृहणियों ने भी उनकी पत्नी श्रीमती ललिता शास्त्री को सम्वेदना भरे पत्र लिखे थे और उन सबके लिए बहुत बडा सुकून और संतोष का बायस बना ललिता जी की तरफ से आय आभार-पत्र. "जय जवान, जय किसान" का नारा लोग अंग्रेजो, भारत छोडो जैसे नारे की तर्ह उचारते थे. अच्छा है कि छुटपन में ही सही, इनलोगों के समय में हम थे और इनसे जुडे चन्द लम्हे अपने जीवन की भी थाती हैं.

व्यक्ति को कोसिए, संस्था को नहीं

http://mohallalive.com/2009/10/02/vibha-rani-react-on-royalty-statements-controversy/


जी, आज छम्मक्छल्लो नहीं, विभा रानी कह रही है, क्योंकि बात पर बात जब निकलेगी तब विभा रानी के लेखन पर भी आएगी। हिंदी का साहित्य जगत शायद अभी तक छम्मक्छल्लो से वाक़िफ नहीं हुआ है। भारतीय ज्ञानपीठ में भी विभा रानी की किताबें हैं और “नया ज्ञानोदय” में रचनाएं।
मगर पहले तो यह तय कर लें कि बात रॉयल्टी और स्टेटमेंट की की जा रही है या संस्थान की। संस्थान को कभी भी उसे आज के चलानेवाले के साथ बराये मेहरबानी जोड़ कर न देखें। भारतीय ज्ञानपीठ आज भी बहुत प्रतिष्ठित संस्थान है। सिर्फ यह हो गया है कि उसे चलानेवाले संस्थान के नाम पर अपनी दुकान, अपनी लिप्सा, अपनी चाहत चला रहे हैं, अपनी राजनीति और चापलूसी की जुगलबंदी बजा रहे हैं।
भारतीय ज्ञानपीठ से दो मैथिली उपन्यास (अनुवादक : विभा रानी) के अनुवाद छपे हैं : प्रभास कुमार चौधरी का “राजा पोखरे में कितनी मछलियां” और लिली रे का “पटाक्षेप”। ये दोनों ही लेखक साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता हैं। आज तक यहीं से पूरा स्टेटमेंट व रॉयल्टी मिलती रही है। यह वह सगर्व सभी को बताती रही है। हां, अभी के स्टेटमेंट पर ध्यान नहीं दिया है।
बात संस्थान की नहीं है। बात हमेशा उसे चलानेवाले की होती है। संस्थान की स्थापना हमेशा अच्छे उद्देश्यों को ले कर की जाती है। जब तक उस पर अच्छे लोग बैठे रहते हैं, संस्थान अच्छे कलेवर में रहता है। लेकिन जब उस पर बैठकर अपने सपनों की नैया अपने चहेतों को ले कर खेने जाने की इच्छा बलवती होती है, तो संस्थान का नाम खराब होता है। यह किसी भी संस्थान पर लागू होता है। जो संस्थान जितना अधिक प्रतिष्ठित होता है, उस पर ऐसी आंच उतनी ही अधिक तेज आती है।
दूसरे, बात केवल रॉयल्टी की ही न करें। जिसने भी मोहल्ला पर बेनामी पोस्ट डाला है और जिसके लिए लोग हाय तौबा कर रहे हैं कि अगर वह ख़ुद इतना बड़ा ईमानदार है तो नाम बताये, तो भैया, ऐसे मामलों में नाम छुपाना लेखक के लिए ज़रूरी हो जाता है। क्योंकि बाक़ी समय भले प्रकाशक एक दूसरे पर छींटाकशी करते रहें, मगर हैं सभी एक ही थैले के चट्टे-बट्टे। और पैसों के मामले में सभी दूध शक्कर हो जाते हैं। मुंहामुंही बात फैलती है कि अमुक लेखक पैसे के लिए बहुत किच-किच करता है और सभी प्रकाशक लामबंद हो जाते हैं और एक अघोषित नीति के तहत उस लेखक को छापना बंद कर देते हैं। अब हर लेखक प्रकाशक तो नहीं हो सकता। जैसे किसी को चीनी की ज़रूरत होने पर वह चीनी की ही दुकान खोल कर बैठ जाए, यह संभव नहीं।
अभी अभी एक नये से प्रकाशक से अपनी पांडुलिपि की बात करने पर उसने मुझसे कहा कि अब अगर उसे कहीं से एकमुश्त ऑर्डर मिल जाते हैं, तो वह किताब तुरंत छाप देगा। यानी कि प्रकाशक तो पहले से ही व्यवसायी हैं, अब वे आज के ढर्रे की पूरी की पूरी मार्केटिंग पर उतर आये हैं। नौकरी चाहिए तो बिजिनेस लाइए की तर्ज पर किताब छपानी है तो ऑर्डर लाइए! एक प्रकाशक ने कहा कि वह यह देखता है कि फलां लेखक बिकाऊ है, तभी वह उसकी किताब छापता है। उस लेखक/प्रकाशक को मेरी मैथिली की कहानियां पसंद आती हैं। उन्हें वे छापते भी हैं। मैथिली साहित्य में मेरा स्थान निर्धारण भी करते हैं, मगर हिंदी कहानियों या कथा संग्रह के नाम पर कहते हैं कि मेरा नाम तथाकथित रूप से बिकाऊ नहीं है तो भारतीय ज्ञानपीठ ने तो तब मेरी किताबों को छापा, जब मेरा नाम सचमुच उतना परिचित नहीं था। या यह भी हो सकता है कि आज भी यह ख़ामख्याली में मैं जी रही हूं कि लोग मुझे और मेरे नाम को जानते हैं।
लेकिन जैसा कि कहा कि संस्थान के साथ जब अलग क़िस्म के लोग जुड़ जाते हैं, तब संस्थान का नाम खराब होता है। भारतीय ज्ञानपीठ ने जब “नया ज्ञानोदय” प्रभाकर श्रोत्रिय के संपादकत्व में निकालना शुरू किया, तब मैं भी इससे जुड़ी। श्रोत्रिय जी ने बड़े-बड़े प्रयोग भी किये। मसलन, जेल के कैदियों की कविताएं छापीं। मुझसे कहकर जेल के बच्चों पर स्टोरी करवायी। चूंकि मैं जेलों में काम करती हूं, इसलिए उनकी अगली योजना जेल की महिला क़ैदियों पर स्टोरी करवाने की थी। लेकिन उनके जाने के कारण यह योजना क्रियान्वित नहीं हो सकी।
श्रोत्रिय जी के ही समय में मैंने एक कहानी “होठों की बिजली” भेजी थी। संयोग कि कुछ समय के बाद वे वहां से चले गये। कालिया जी के आने के बाद मैंने उनसे उस कहानी की स्थिति के बारे में जानना चाहा, मगर उनकी ओर से केवल आश्वासन मिला। श्रोत्रिय जी के समय में ही मैंने मैथिली की सुप्रसिद्ध लेखक लिली रे की कहानी “चक्र” भेजी थी, जिसे कालिया जी के संपादकत्व में “नया ज्ञानोदय” के सितंबर, 2007 के अंक में छापा गया, मगर उसका शीर्षक कर दिया गया, “बारिश और पावरोटी”। हो सकता है, कथा की ओर ध्यान खींचने के लिए उसका शीर्षक ज़रा ग्लैमरस कर दिया गया हो, मगर लिली जी के लेखन व उनके स्वभाव को देखते हुए यह शीर्षक उनकी कथा के उपयुक्त नहीं था। इस ओर और अपनी कहानी “होठों की बिजली” की स्थिति के बारे में जानने तथा अपनी कहानियों तथा नाटक की पांडुलिपि भेजने के बारे में मैंने रवींद्र कालिया जी को 10/10/2007 को एक पत्र लिखा था। मगर अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि आज तक इस पत्र का जवाब देना गवारा तक नहीं किया गया।
मैं इस बात से पूरी तरह से सहमत हूं कि प्रकाशक और संपादक को यह पूरा का पूरा अधिकार है कि वह अमुक किताब या रचना छापे या न छापे। मगर यह लेखक के भी उतने ही अधिकार में है कि उसके पत्र पर कार्रवाई हो और उसे तदनुसार सूचित किया जाए। मैं अपनी रचना की बाबत जवाब न आने तलक उसे किसी और को नहीं भेजती। मगर पहली बार मैंने भारतीय ज्ञानपीठ से बग़ैर कोई सूचना के “होठों की बिजली” जनमत को भेजी। पाठकों का बड़प्पन कि इसके छपते ही छम्मक्छल्लो के पास बधाइयों के फोन पर फोन आने लगे। मगर आज तक कालिया जी की तरफ से 10/10/2007 के पत्र का कोई जवाब नहीं आया।
आप लामबंद होना चाह रहे हैं तो होइए, मगर व्यक्ति के खिलाफ उठिए, संस्थान के खिलाफ नहीं। क्योंकि कल को कोई बेहतर संचालन करनेवाला आ गया तो आप ही फिर इस संस्था के गुनगान करने लग जाएंगे। इसलिए भारतीय ज्ञानपीठ को मत कोसिए। बाकी के लिए इशारा ही काफी है। आखिर को आप सभी समझदार हैं, बहुत अधिक

Thursday, October 1, 2009

नेहरु सेंटर, मुंबई का 13वां थिएटर फेस्टिवल

http://janatantra.com/2009/10/01/nehru-centre-theatre-festival/

नेहरु सेंटर, मुंबई का 13वां थिएटर फेस्टिवल 3 से 14 अक्तूबर, 2009 तक आयोजित हो रहा है। 12 दिनों तक चलने वाले इस फेस्टिवल में मलयालम, उर्दू और बांग्ला के कुछ पुरस्कार विजेता नाटकों की भी प्रस्तुति होगी। 3 अक्तूबर, 2009 को फेस्टिवल की शुरुआत मराठी संगीत नाटक के “मदन भूल” से की जाएगी। “मदन भूल” गिरीश कर्नाड के मशहूर नाटक “फूल”या ‘फ्लावर्स’ से अभिप्रेरित है। इसे नेहरु सेंटर, मुंबई प्रस्तुत कर रहा है। इसके अलावा इस फेस्टिवल में अलग अलग भाषाओं के 14 नाटक प्रस्तुत किए जा रहे हैं। यह फेस्टिवल नेहरु सेंटर की ओर से मुंबईकरों के लिए एक उपहार है। इसलिए इसके पास पर “निमंत्रण” शब्द छपा है, जो दर्शकों को एक भावात्मक संतुष्टि देता है। विस्तार से जानने के लिए आप इस लिंक का उपयोग कर सकते हैं।
थियेटर फेस्टिवल का ब्योरा
पास न होने पर भी निराश होने की अधिक आवश्यकता नहीं होती है। ऐसा देखा गया है कि लोग बाग अपने अपने बंधु बांधवों के लिए पास ले कर रख लेते हैं, मगर जब वे लोग नहीं पहुंच पाते, तब वे बिना पास के आए लोगों को अपने पास दे देते हैं। नेहरु सेंटर का ऑडिटोरियम भी काफी बडा और नाटक के अनुकूल है। इसलिए एक बार सभी पास धारियों के अंदर चले जाने के बाद अगर सीट बची रहती है तो वे दूसरों को भी अंदर ले लेते हैं। कई कई बार तो लोगों ने खडे होकर भी नाटक देखे हैं। नेहरु सेंटर ऐसे थिएटर प्रेमियों को सामान्यत: निराश नहीं करता।