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छम्मकछल्लो की दुनिया में आप भी आइए.

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Monday, February 21, 2011

सौ के पौ


सौ में बहुत बडा दम है भैया. शताब्दी, सदी, सेनेटेनरी और पता नहीं क्या क्या! देव लोक में तो सुनते हैं, लोग मरते ही नहीं. अपनी माइथोलॉजी में भी लोग हज़ारो-लाखो साल जीते हैं. पर, आज कलियुग है, सौ भी खेप लिए तो बहुत बडी बात! बडे बुजुर्ग कहते हैं कि पहले खान पान, आबोहवा सब बढिया था, सो लोग जीते थे. हर पीढी को अपना समय हमेशा अच्छा लगता है, इसमें अजगुत क्या? आज की रिपोर्ट कहती है, आज औसत आयु जीने की बढ गई है.
तब लोग सौ की उम्र तक जीने की सोचते थे. अब नहीं सोचते. इतनी मंहगाई है, जितनी जल्दी टें बोलोगे, घरवालों को मंहगाई से उतनी जल्दी राहत दिलाओगे.
दुनिया पहले भी क्षणभंगुर थी, आज भी है. पहिले लोग एक चीज खरीदते थे और पीढी दर पीढी उसका इस्तेमाल करती थी. अब जमाना बदल गया है. पुरानी चीज़ों से मोह पुरातनपंथी की निशानी है. आज इंस्टैंट युग का समय है, यूज एंड थ्रो का ज़माना है, इसलिए लोग अब पुराना कुछ भी नहीं रखते, न मां-बाप, ना सरो सामान.
फिर भी सौ की महिमा बडी न्यारी है भैया. इस सौ के आंकडे पर शून्य पर शून्य बिठाते जाइए और मर्ज़ी के रईस बनते रहिए. पहिले का समय था कि सिनेमा सिनेमाघरों में हफ्ते के हिसाब से चलता था, 25 तो रजत जयंती, पचास तो स्वर्ण, साठ तो हीरक और सौ तो शतक. अब वह दिनों में चलता है. सौ दिन चल गया सिनेमाघरों में तो ट्रेड मार्केट की बडी खबर बन जाती है. क्रिकेट में भी शतक की बडी महिमा थी. अब तो खेल ही 10 ओवर तक हैं. सरकार भले पांच साल के लिए बनती है, लेकिन 100 दिन चलने पर भर भर पन्ने के समाचार छपते हैं. हनुमान चालीसा है- यह सतबार पाठ कर जोई, छूटही बंदी महासुख होई. हनुमान जी के लिए भी सौ का पहाडा बन गया. इसलिए हनुमान भक्तों के लिए भी सौ बार का पाठ है.छम्मकछल्लो को लगता है कि अब दिन में नहीं, घंटे और मिनट और सेकेंड मे सौ का हिसाब होना चाहिए. सौ मिनट की नौकरी, सौ सेकेंड का राज्य.  
आप भी सौ का पाठ कीजिए, धन से हनुमान तक, जमीन से आसमान तक, सत्ता से सम्मान तक, सौ की उम्र या सौ की गिनती तक पहुंचकर छम्मकछल्लो को बताइयेगा शतबार की महिमा. 

Sunday, February 20, 2011

पचासे में पैदा करो, बुढारी मे छेडखानी नहीं होगी!


छम्मकछल्लो बहुते खुश है. उमिर के इस पडाव पर. उमिर की वसंत की मार झेल आई बहुत पहिले. उस नई उमिर में सपना क्या देखती, सपना भरमानेवाले सबसे देह बचाती रही. अपने देश मे त देहे पर दुनिया टिका है ना. सब पाप मन से करते रहिए, देह एकदम शुद्ध रहना चाहिए. सो, चलती सडक पर तो नज़र झुका के, देह निहुरा के, बोली बानी बचा के चलती थी,  तैयो टोकारा पडिए जाता था, देह छुआइये जाता था, टिहकारी-पिहकारी पडिए जाता था. देह देखाइये जाता था. मनचलवा सब कुकुर लेखा भोंकबे करता था, आन्हर लेखा टो टो के देखने का कोशिश करता था. बुढबा लोक पोल खोलने पर बाप बन जाता था और जवान लोग भाई. भले केसव बाबा कह गए अपना उमिर के बुढियाने पर कि
      केसव असि करी का कहुं, असि करी कह्यो न जाई
      चंद्र बदन मृगलोचनी बाबा कहि कहि जाए.
ई सभ जवान, बुढबा सबका दुख है. सबको लगता है कि जवानी का उमिर जवानी का खेल खेलने के लिए है. ईहे एगो जनम मिला है, खेल लो भाई लोगिन. सो लोग खेलते हैं. अब उससे छम्मकछल्लो सहित सभी लडकी औरत डेराई डेराई रहती हैं, असुरक्षित रहती हैं तो रहें. हम उसका ठेका लिए हैं? बल्कि बढिये है, हमारा धौंस बना रहेगा. अरे, अपना आतमा देखें, अपना मनोरंजन देखें कि सबको बहीने, भौजी कहते रहें?
लडकी सभ बहुते पिरीसान रहती है. छम्मकछल्लो भी जब उस उमिर मे थी, बहुते पिरीसान रही. बादो मे शंका संदेह जोंक लेखा चिपका ही रहा- किसी से बतिया लिए तो आफत, मुस्कुरा लिए तो मुसीबत, डीयर डार्लिंग बोल के पुकार लिए तब तो सांसत में सांसत. कोई गंगा में पैसके भी दावा करे कि उसके संगे कोनो बदसलूकीनहीं हुआ है, छम्मकछल्लो नहीं पतियाएगी.
लडकी माल मसाला शुरुए से रही है. अंग्रेजी बोलने से कोई बहुत बडका आ आधुनिक थोडे न हो जाता है. लोक कहते हैं कि जबतक भाव नहीं रहता, शब्द नहीं बनते. राक्षस की अंग्रेजी मिल जाती है, मगर कोई तनिक ब्रह्मराक्षस की अंग्रेजी बता कर बतावे. अंग्रेजी में जनी जात के लिए ऑर्गैज्म है, पर कोई तनिक हिंदी में बतावे. भाव है त शब्द है, इसलिए टिहकारी-पिहकारी से ले के छेडखानी तक बहुते पर्यायवाची शब्द है. अंग्रेजीयो मे है ईव टीजिंग’. तो जब अंग्रेजीयो पढ के ईवे टीजिंग करेंगे त काहे के आधुनिक हुए भाई?
छम्मकछल्लो खुश है कि अब उसके संगे ई सब नहीं है. 50 के पार की छम्मकछल्लो या उस जैसी उमिर की मेहरारू, जनी जात छेड छाड से बच जाती है. मेहरारू सभ भी न! उमिर बढ जाता है त सबको बेटवा, बचवा कहने लगती है. त कहिए, कोनो कैसे कुछो औरो बोले. जनी जात सभ बाबा केसव तो है नहीं कि अपनी उमिर का धक्का खा के सोग मनाए आउर हाय हाय करे. उल्टा ऊ त लोग सबको समझाने बुझाने लग जाती है, दवाई बीरो करने लग जाती है, चिंता से माथा सहलाने लग जाती है.
जनी जात की बढती उमिर का ईहे एगो फायदा है. ए बहिनी लोगिन. इसका सुख उठाइए. छम्मकछल्लो तो ईहो दरयाफ्त करती है ऊपरवाले से कि ऊ हम औरत लोग को सीधे 50 की उमिर में ही पैदा करे. बच्चे से छेडखानी, बलात्कार, संदेह, ताने सबसे बच तो जाएंगे ना.    

Friday, February 11, 2011

थिएटर की भाषा में प्रस्तुत नाटक “मैं कृष्णा कृष्ण की”


पिछले दिनों विभा रानी लिखित व अभिनीत एकपात्रीय नाटक मैं कृष्णा कृष्ण कीका मंचन मुंबई के सुप्रसिद्ध काला घोडा आर्ट फेस्टिवल, 2011 के तहत नैशनल गैलरी ऑफ्र मॉडर्न आर्ट के सभागार में किया गया. मिथक और मिथकीय पात्र अपने समय के साथ साथ आज भी प्रासंगिक हैं. यही कारण है कि आज भी मिथकीय चरित्रों को लेखक, कलाकार आदि अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाते रहे हैं. इन चरित्रों की वर्तमान प्रासंगिकता कहती है कि भले ही आज हम अपने आपको आधुनिक कहलाने का दम्भ भर लें, सच तो यह है कि हम आज भी अपनी पुरानी सोच की जंजीरों से जकडे हुए हैं.
मैं कृष्णा कृष्ण कीद्रौपदी और कृष्ण के सखा भाव पर आधारित नाटक है. महाभारत की पात्र द्रौपदी जीवन भर अनेक तरह के उथल पुथल का शिकार रही. उसे तथाकथित धर्म के नाम पर बार बार बलि होना पडा, अपनी इच्छा के विरुद्ध सभी काम करने पडे. द्रौपदी को उसके सांवले रंग के कारण कृष्णा की संज्ञा दी गई. वह कृष्ण से प्रेम करती है और उससे विवाह करना चाहती है. परंतु धर्म का वास्ता दे कर कृष्ण उसे अर्जुन से विवाह करने को कहते हैं. विधि के वशात उसे अर्जुन सहित अन्य चारो भाइयों से भी विवाह करना पडता है जो उसे जीवन भर सालता है. धर्म के नाम पर अपने साथ हो रहे विविध व्यवहार से व्यथित वह नाना प्रश्न कृष्ण के सम्मुख रखती है. अंतिम प्रयाण पर कृष्णा अपने पतियों के साथ है. जिन पतियों के लिए उसने जीवन भर तरह तरह के दुख झेले, वे ही उस पर विभिन्न आरोप लगाकर उसे वहीं छोड आगे निकल जाते हैं.
अपनेअस्तित्व व व्यक्तित्व के लिए साकांक्ष द्रौपदी सीता की तरह मूक भाव से धरती में नहीं समाती, बल्कि नारी सशक्तिकरण का दृढ स्वर बनकर उभरती है. नाटक आज भी स्त्रियों को एक उपभोग की वस्तु के रूप में दिखाए जाने को रेखांकित करता है. स्त्री और पुरुष के बीच की मित्रता को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है. आज भी स्त्री को भोग्या या वस्तु, कमज़ोर और कमतर समझा जाता है और दूसरी ओर उसे अपमानित करके अपनी विजय का पर्व भी मनाया जाता है. बदला लेने और अपनी वासना मिटाने के लिए आज भी उसे बलात्कृत और निर्वस्त्र किया जाता है.

एकपात्रीय नाटक की प्रस्तुति अत्यंत चुनौती और जोखिम से भरी होती है. पूरे समय पर मंच पर अकेले स्वयं को प्रस्तुत करना और नाटक में आए सभी चरित्रों को उसके स्वरूप, स्वर व प्रस्तुति से साकार करना और इससे भी बढकर दर्शकों को पूरे समय बांधे रखना बहुत कठिन होता है. विभा ने इस कठिनतम चुनौती को स्वीकार किया और द्रौपदी के मूल चरित्र के अतिरिक्त आए अन्य स्त्री पात्रों सहित पुरुष पात्रों, यथा द्रुपद, युधिष्ठिर, अर्जुन और कृष्ण के रूप को अपने अभिनय, भाव भंगिमा, मुद्राओं तथा स्वर के साथ साकार किया. सम्वाद अदायगी में विभा ने अपना लोहा मनवा लिया. कमर्शियल नाटकों के बोझ से कराहती मुंबई में इस तरह के नाटक तपती रेत पर पानी की धार हैं.
नरेंद्र रावल की प्रकाश व्यवस्था मंच, नाटक और कृष्णा के विभिन्न मूड्स को दर्शाने में सफल रहा. क्रोध, प्रेम, घृणा, भय, वीभत्सता के सभी भाव के साथ प्रकाश संयोजन नाटक को प्रभावी बनाता रहा. संगीत के रूप में मुख्यत: बांसुरी का प्रयोग किया गया व सहायक के रूप में वीणा और ढोल का, जो कृष्णा के मूड्स को उजागर करने में सफल हुए.
हिंदी और मैथिली की लेखक व नाट्यकार विभा विगत 24 सालों से थिएटर से जुडी हुई हैं. दुलारीबाई,’, सावधान पुरुरवा’, पोस्टर’, मि. जिन्ना उनके अभिनीत कुछ नाटक हैं. मि. जिन्ना में वे सचमुच जिन्ना की बहन फातिमा जिन्ना का अहसास दिलाती हैं. एकपात्रीय नाटकों के लेखन व अभिनय में विभा ने अपनी क्षमता दर्शाई है. उनके अन्य लिखित व अभिनीत एकपात्रीय नाटक हैं- लाइफ इज नॉट ए ड्रीम, बालचंदा’, बिम्ब-प्रतिबिम्ब और अब मैं कृष्णा कृष्ण की”. “रंग जीवनके दर्शन के साथ विभा ने थिएटर को वंचित तबके के बीच अभिव्यक्ति के माध्यम के साथ साथ कॉर्पोरेट प्रशिक्षण से जोडा है. थिएटर के माध्यम से वे जेल बंदियों के साथ थिएटर कार्यशालाएं नियमित रूप से करती हैं. मिथिला के लोक गीतों व लोक कथाओं पर उनके नाटक हैं.
मैं कृष्णा कृष्ण कीनाटक का निर्देशन किया है बॉम्बे कण्णन ने. तमिल थिएटर व टीवी से पिछले 30 से भी अधिक सालों से जुडे बॉम्बे कण्णन का यह पहला हिंदी नाटक है. बॉम्बे कण्णन का हिंदी और विभा का तमिल न जानते हुए भी थिएटर की भाषा पर विश्वास ने चेन्नै, तमिलनाडु  की धरती से इस अद्भुत प्रस्तुति को जन्म दिया. कहा जा सकता है कि यह उनका और विभा का उत्तर और दक्षिण के रंगमंच को संगमित करने का प्रयास है. तमिल क्लासिक साहित्य व तमिल लोक कथा व लोक कला को समर्पित बॉम्बे कण्णन तमिल क्लासिक साहित्य को ऑडियो विजुअल के माध्यम से लोगों के समक्ष ला रहे हैं. 
प्रस्तुति: नरेंद्र  

Thursday, February 3, 2011

मां

आज मां की बहुत याद आ रही है. उनके लिए बहुत पहले लिखी थीं कुछ पंक्तियां.
निष्ठा, ममता, दृढता, समता
अपनेपन की मूरत से
जीवन में भर गई उजाला
शक्ति, प्रेरणा, करुणा से

मां होती जब पास किसी के
शक्ति स्वरूप बन जाती है
देकर मन की सारी पूंजी
जीवन ज्योति जगा जाती है.