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छम्मकछल्लो की दुनिया में आप भी आइए.

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Monday, September 28, 2009

हां जी, हमसे अलग रहें, हम ‘कपडे’ से हैं!

छम्मक्छल्लो क्या करे! प्रकृति ने भी उसके साथ नाइंसाफी की है. वर्षों पहले आचार्य देवेंद्रेनाथ शर्मा का एक लेख उसने पढा था, जिसमें महिलाओं से ईर्ष्या जताते हुए लिखा गया था कि महिलाओं के कितने सुचिक्कन, कोमल गाल होते हैं, जबकि पुरुषों की इतनी बडी बडी दाढी. कहीं भी जाओ आओ, यह दाढी एक समस्या बन कर खडी हो जाती है. आचार्य देवेंद्रेनाथ शर्मा छम्मक्छल्लो के पसंदीदा लेखकों में से एक हैं, इसलिए उसे उनकी इस बात पर बडा मज़ा आया. वह सच में सोचने लगी कि सचमुच, प्रकृति ने पुरुषों के साथ क्या अन्याय कर दिया. उसके भी गाल स्त्रियों की तरह ही सुचिक्कन रहने देते.

तभी छम्मक्छल्लो का ध्यान अपनी सामाजिक रीति नीति पर पडा. तब वह बहुत छोटी थी, इतनी कि कभी भी कुछ भी पूछने पर उसे डांटकर भगा दिया जाता था. उसके मोहल्ले में एक परिवार रहता था. छम्मक्छल्लो को वहां हर महीने तीन चार दिनों के लिए खाना बनाने के लिए बुला लिया जाता था. पूछने पर वही डांट या जवाब कि "बडी हो कर सब समझ जाओगी." या फिर, "बडों के बीच में क्या आ जाती हो सुनने के लिए?" सचमुच बडी होने पर समझ में आया कि उसे वहां खाना बनाने के लिए क्यों बुलाया जाता था? इसलिए कि वहां की बहू हर महीने अपने स्वाभाविक ऋतु चक्र से गुजरती थी. यह चक्र एक वैज्ञानिक शारीरिक प्रक्रिया है, जिससे हर स्वस्थ लडकी और स्त्री को वैसे ही गुजरना होता है, जैसे हर लडके या पुरुष के चेहरे पर मूंछ दाढी का उगना. लेकिन मूंछ दाढी का उगना या उसका बढना अछूत की परम्परा में नहीं आता.

तो उस बहू को महीने के हर तीन चार दिन खाना तो बनाने नहीं ही दिया जाता था, उससे अछूतों से भी बदतर व्यवहार किया जाता था. उसके लिए अलग से ज़मीन पर एक चटाई दे दी जाती थी और एक फटी पुरानी सी चादर और एक तकिया. उसके लिए थाली अलग होती थी. वह घर के नल पर खुद से हाथ मुंह नहीं धो सकती थी. उसे खाना पानी सब कुछ एक हाथ ऊपर से दिया जाता था. तीन दिन के बाद नहाने के बाद अपने ही नहाए कपडे वह नहीं छू सकती थी. धोबी आ कर उन कपडों को ले जाता था. गर्मी उसे ताड के एक टूटे पंखे के सहारे बितानी होती थी और सर्दी में तो उसकी हालत और भी दयनीय हो जाती थी. उसे उसी चटाई अपने एक फटे पुराने कम्बल के सहारे गुजारनी होती थी. उसकी गोद में एक छोटी सी बच्ची थी. महीने के उन तीन दिनों में उस बच्ची के लिए भी वही व्यवस्था होती थी. उसे किसी के पास नहीं जाने दिया जाता था और उसे भी तीन दिन अपनी मां के साथ वैसे ही गुजारने पडते थे.अगर किसी ने उस बच्ची को गोद ले लिया तो उसे उसी समय नहाना पडता था.

अपना देश धार्मिक है, इतना कि हर काम धर्म के छन्ने से ही छन कर आता है. ऋतुचक्र की यह स्वाभाविक प्रक्रिया कब धर्म और छुआ छूत से जोड दी गई, इसका पता छम्मक्छल्लो को नहीं है. वैज्ञानिक और चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि कहती है कि इस समय में अतिरिक्त स्राव से कमज़ोरी आने के कारण तनिक आराम की ज़रूरत है. लेकिन आराम की इस प्रक्रिया से गुजरना वैसा ही है, जैसे कोई आपको चार तमाचे लगा कर मिठाई खिलाए.

छम्मक्छल्लो के घर में संयोग से यह परम्परा नहीं थी, शायद मां के कामकाजी होने की वज़ह से. मगर अन्य बातें, जैसे तीन दिनों तक पूजा घर में नही जाना, पूजा नहीं करना, भंडार से सामान नहीं निकालना, घी और अचार के बोइयाम को तो हाथ भी नहीं लगाना, बदस्तूर जारी था. आज भी कई घरों में यह जारी है. छम्मक्छल्लो से बहुत कम उम्र की एक लडकी ने कहा, "आंटी, सच में अगर आपने पीरियड्स में अचार छू दिया तो उसका रंग खून की तरह ही लाल हो जाता है. भगवान को छू लो तो उनके कपडे दाग़ से भर जाते हैं. इतनी ख़राब होती है यह ‘चीज़.’ सच में इतनी ख़राब चीज़ यह होती है. गुपचुप बात ही इस पर की जा सकती है, खुल कर नहीं. पता नहीं क्यों औरतों की हर बात ही गुपचुप सी कर दी गई है, यहां तक कि उसकी शख़्सियत को भी.

छम्मक्छल्लो ने भी प्रयोग किया. मगर उसकी बदक़िस्मत कि अचार का रंग कम्बख़्त लाल हुआ ही नहीं और ना ही भगवान के कपडे दागदार हुए. छम्मक्छल्लो ने यह भी किया कि दशहरा, दीवाली, तीज़ आदि में भी भगवान की पूजा कर ली. उसने तो भगवान को चुनौती दे डाली कि पूजा करानी है तो अब तो इसी हालत में करानी होगी. इतनी ही शुद्ध पूजा चाहिये थी तो दो-चार दिन अवधि आगे बढा देते अपने प्रताप से.

छम्मक्छल्लो समझ नहीं पाती कि शुद्धता- अशुद्धता का यह खेल महिलाओं के साथ क्यों? और आप सब सावधान, छम्मक्छल्लो एक और बोल्ड बात कहने जा रही है. शुद्धता- अशुद्धता का यह खेल महिलाओं के साथ शादी के बाद भी होता है. नई-नई शादी, सुबह-सुबह उठना और सुबह उठने पर सबसे पहला फर्मान यह कि नहाओ. बग़ैर नहाए उसे कुछ छूने नहीं दिया जाता, उसे रसोई में नहीं जाने दिया जाता. कहा जाता है कि उसकी देह अशुद्ध हो गई है. यह अशुद्धता उसके पति के साथ नहीं लागू होती. नहाना-धोना शारीरिक स्वछता हो सकती है. यह सेहत के लिए अनिवार्य है. यह भी सही है कि सुबह सुबह के स्नान से मन दिन भर ताज़ा और हल्का बना रह्ता है. मगर बात शुद्धता- अशुद्धता की आ जाती है. गर्मी में तो सुबह-सुबह नहाना फिर भी चल जाता है, मगर सर्दी में?

छम्मक्छल्लो को एक दोहा याद आता है, जो छम्मक्छल्लो जैसी दुखी आत्माओं को खुश करने के लिए किसी ने लिख दिया होगा-
"नारी निन्दा मत करो, नारी नर की खान
नारी से नर होत हैं, ध्रुव- प्रह्लाद सुजान"
लेकिन कूढमगज छम्मक्छल्लो को तो इसके बदले यही लगता है
"नारी की निन्दा करो, नारी नरक की खान
भले नारी पैदा करे ध्रुव- प्रह्लाद सुजान"
इसलिये समाज के कर्णधारो, हमारी देह के नरक में मत पडो. यह भी मत सोचो कि इस नारी में कोई ना कोई नारी तुम्हारी मां, बहन, बीबी, बेटी भी होगी ही. पता नहीं, अपनी ही मां, बहन, बीबी, बेटी को नर की खान कहने के बजाय उसे नरक की खान कहने में बुरा क्यों नहीं लगता? छम्मक्छल्लो को तो लगेगा, अगर कोई उसके पिता, भाई, पति, बेटे के लिए ऊल-जुलूल बोले.
भला हो विज्ञापनवालों का कि उसने धीरे-धीरे टीवी पर सेनिटरी नेपकिन के प्रचार करने शुरु कर दिए. इसके लिए भी बडी चिल्ल-पों मची. कच्छे बनियान के प्रचार के लिए नहीं मची जी. वही भारतीय संस्कृति, कि टीवी पूरा परिवार देखता है, ऐसे विज्ञापन लोगों को शर्मसार करते हैं. शर्मसार करने के लिए सिर्फ औरतें ही तो बनी हैं या उनसे जुडी चीज़ें या बातें. फिर भी यह प्रचार बडे दबे-छुपे तरीके से होता था- इशारे में. इधर पहली बार एक सेनिटरी नेपकिन के प्रचार में देखा कि ‘पीरियड्स’ शब्द का बडे खुल कर, मगर बडे अच्छे तरीके से इस्तेमाल किया गया है. छम्मक्छल्लो इसके लिए सभी को धन्यवाद देना चाहती है. कहना चाहती है कि हम या हमारी देह या देह के कार्य-व्यापार शर्म की वस्तु नहीं है. इसलिये इतना घबडाइये नहीं, शर्माइये नहीं. शालीनता से कही बात हमेशा शालीन ही होती है.

Sunday, September 27, 2009

कन्या जिमाइये, छुट्टी पाइए!

मोहल्ला लाइव पर पढ़ें यह लेख। http://mohallalive.com/2009/09/27/vibha-rani-satirical-article-on-male-female-debate/

छम्मक्छल्लो की तरह आप भी इस कहावत से होंगे कि बारह बरस पर घूरे के भी दिन फिरते हैं। मगर हमारा धर्म उदार है। वह इतनी लंबी तपस्या नहीं कराता। वह स्त्रियों के बारे में भी बडा उदार है। वह कहता है कि जहां नारियों की पूजा होती है, वहां ईश्वर का वास होता है। वह तेज़, तप, शक्ति, बल, चरित्र, ममता, प्रेम सतीत्व – सभी के लिए स्त्री की पूजा करता है। इसके लिए वह किसी लड़की के स्त्री बनने तक की प्रतीक्षा नहीं करता। जन्म के बाद से ही उसकी आराधना करना शुरू कर देता है।
अभी नवरात्रि की धूम है। इसके पहले गणपति का उत्सव था। उसमें गणपति के साथ-साथ गौरी की पूजा हुई। उसके एक दिन पहले हरतालिका होती है। उसमें शंकर के साथ साथ पार्वती की पूजा हुई। इसके पहले जन्माष्टमी पर कृष्ण के साथ राधा की और श्रावण में शंकर के साथ पार्वती की हुई। सीता और राधा के लिए तो अलग से राधाष्टमी और जानकी नवमी है ही। नवरात्रि के बाद दीवाली आएगी। उसमें लक्ष्मी और काली की पूजा होगी। सभी में नारी या कह लें कि देवी के विविध रूपों की पूजा होती है। बड़ी श्रद्धा व भक्ति से इन तमाम देवियों की आराधना की जाती है। नवरात्रि में सप्तमी से ले कर नवमी तक घर-घर कुंआरी कन्याएं जिमायी जाती हैं। सभी उन्हें जिमाते हैं, दान-दक्षिणा देते हैं। और तो और, उनके पैर भी छूते हैं।
बस जी बस, इसके आगे नहीं। अपन ने की आराधना और पायी छुट्टी। इससे अधिक अपने बस की बात नहीं है। देवी को पूज लिया या कन्या जिमा लिया, तो इसका यह मतलब मत निकालिए कि हम कन्याओं या बेटियों के प्रति ज़िम्मेवारियों से भर गये। न जी न, यह बैठे-बिठाये रोग पालने वाली बातें हमसे न करो। जी, यह तो पूजा-पाठ की बातें हैं। सो पूजा पाठ कर लिया, धर्म निभा लिया। इसके लिए अपने घर में बेटी तो नहीं पैदा की जा सकती न। अखिर अपने घर की बेटी को तो हम कन्या जिमाने के लिए बिठाते नहीं। उसके लिए तो दूसरे के घर की बेटियों को ही लेते हैं। बेटा ब्याहने के लिए भी दूसरे के घर की बेटी को लाते हैं। बेटी पैदा करने या उसे पालने-पोसने, उसकी रखवाली करने, उसे सुरक्षित रखने के इतने सारे ताम-झाम हमसे नहीं होते जी। इसलिए हम तो अपने घर में बेटियां पैदा ही नहीं होने देते। सरकार कहती रहे कि लिंग जांच अपराध है, समाजसेवी ढिंढोरा पीटते रहें कि कन्या भ्रूण हत्या न करें। आंकड़े बताते रहें कि देश में 1000 लड़के पर केवल 833 लड़कियां रह गयी हैं। अपन को इन सबसे क्या?
कहावत है न कि जहां चाह, वहां राह। सो न तो डॉक्टरों की कमी है न क्लिनिकों की। कमी है तो सिर्फ अपनी इच्छा शक्ति की। मेरी सलाह मानिए, अपनी इच्छा शक्ति जगाइए और कन्या गर्भ से मुक्ति पाइए। देवी-पूजा और कन्या भोजन की चिंता ना करें, देवी तो तय ही है, न तो वो बदलनेवाली हैं, न तो उनकी संख्या में कोई कमी या इज़ाफा होनेवाला है। रह गयी कन्याएं, तो देश में सिरफिरों की कमी तो है नहीं। कोई न कोई कन्या पैदा करेगा ही। आप उसी को जिमा कर पुण्य कमा लीजिएगा। आखिरकार, सभी तो मंदिर नहीं बनाते न। मंदिर तो कोई-कोई ही बनाता है, पूजा तो मगर सभी करते हैं कि नहीं। सो मेरी सलाह पर गौर फरमाइए। अभी भी समय है, अभी भी कुछ बिगड़ा नहीं है। अपनी ज़‍िंदगी संभाल लीजिए और इन सब पचड़े में मत पड़‍िए। बस सीधे-सीधे कन्या जिमाइए, छुट्टी पाइए!

Saturday, September 26, 2009

तुलसीदास जी, अच्छा हुआ, आप मोहल्‍ला युग में नहीं हैं!

पढ़े यह लेख इस पर भी। लिंक है- http://mohallalive.com/2009/09/26/vibha-rani-writeup-on-carbon-copy-literature/
हे गुसाईं बाबा, अच्छा हुआ जो आप इस युग में नहीं हैं। यह युग बहुत उन्नत है, नयी नयी तकनीक है, नये नये लोग हैं। एक समय था, जब लिखने की परंपरा नहीं थी, इसलिए गुरु अपने शिष्यों को सबकुछ कंठस्थ करा देते थे। फिर भोज पत्र आया। लिखने की नयी नयी तकनीक विकसित हुई और अब तो कागज कलम की ज़रूरत भी नहीं है। बस एक अदद पीसी हो, टाइप करने आता हो, मन में भाव का अभाव भी हो तो कोई बात नहीं। इतनी सारी बातें हैं कि भाव अपने आप पैदा हो जाएंगे। नहीं हुए तो मन, तन, दिल, दिमाग सबका सेजेरियन करवा देंगे भाई साब! यह महिलाओं की ही प्रसव पीर नहीं है, इसमें बड़े बड़े दिग्गज सद्पुरुष हैं जो ताल ठोक कर लेखन के अखाड़े मे उतरते हैं और धरती की सारी औरतों की ऐसी तैसी करते हुए अपने मर्दाने लेखन पर क़ुर्बान कुर्बान जाते हैं। औरतें तो हैं ही गालियां खाने के लिए। कायरता की प्रतीक, औरत की चूडियां, कमज़ोरी की निशानी, औरतों के आंसू। उन मर्दाना लेखक और उससे भी बढ़के उस वेबसाइट के माननीय मॉडरेटर महोदय कि उसे जस का तस छाप देते हैं। शायद यहां भी टीआरपी का सवाल है।
यही हाल लेखकों का है। एक तो हिंदी जगत में सभी महान लेखक हैं। वे ब्रह्मा और वेदव्यास से भी बड़े हैं। वे जो लिख देते हैं, वह परम और चरम सत्य हो जाता है। इतना परम और चरम कि उनकी केवल स्तुति ही की जा सकती है, उसके खिलाफ कुछ बोला या लिखा तो यक़ीन मानिए कि आपके सात जनम के पुरखों तक का तर्पण हो जाएगा।
अब मोहल्ला लाइव ने एक नया बिगुल छेड़ दिया है। वह अचानक लेखकों के लेखन के असली और नकलीपन की शिनाख्त में लग गया है। शब्दों और समय के धनी पिल पड़े हैं अपनी अपनी ज़ोर आजमाइश में। पहले अरविंद चतुर्वेद और प्रदीप सौरभ की कविताओं को ले कर हुआ, अब फिर से गीत चतुर्वेदी और किसी और की कविता को ले कर हो रहा है। कहा जा रहा है कि यह नकल है। अरे, ज़िंदगी नकल करते बीत जाती है, अब किसी ने किसी की कविता के भाव चुरा लिये कि नकल कर ली तो ऐसा कौन-सा कहर बरपा हंगामा हो गया जनाब! यह नहीं सोचते कि नकल नहीं करते तो अब तक बंदर ही बने घूम रहे होते।
छम्मक्छल्लो ने ये कविताएं पढीं। कविता में उसका हाथ वैसे भी ज़रा तंग है, फिर भी उसे नहीं लगा कि यह नकल है। हम सभी क्रिएटिव हैं और यह बहुत संभावनापूर्ण हो सकता है कि कई लोगों के मन में एक स्थिति को ले कर विचार पैदा हों और लिखने में एक समानता आ जाए। अभी-अभी हिंदी दिवस गुजरा है। सभी की नज़र में यह एक अनुष्ठान भर था। सभी ने अपने अपने तरीके से इसकी खील बखिया उधेरी। एक बात सभी कहते रहे कि हिंदी को बाज़ार के साथ जोड़ दो, अंग्रेजी की तरह यह सबकी भाषा अपने आप बन जाएगी। अब इसमें नकल को ले कर कोई अखाड़ेबाजी करने लगे तो कोई क्या कर सकता है? अख़बारों में भी एक घटना पर सभी लिखते हैं। कभी-कभी तो दो अखबारों के शीर्षक भी इतने एक से होते हैं कि लगने लगता है कि किसी एक ने ही लिखा है। जी नहीं, छम्मकछल्लो प्रेस विज्ञप्ति की बात नहीं कर रही कि एक ही प्रेस विज्ञप्ति सभी जगह गयी और सभी ने उसे जस का तस छाप दिया। अगर इस समान से शीर्षक को ले कर दो अखबार आपस में पिल पड़ें तो?
छम्मकछल्लो बहुत सुकून से है कि गोस्वामी तुलसीदास इस समय में नहीं हुए वरना क्या पता ऋषि वाल्मीकि उन पर अपनी रामायण की नकल का आरोप लगा देते। नरेंद्र कोहली और तुलसीदास के समय में बड़ा फर्क़ है, वरना गोंसाईं जी उन पर आरोप लगा देते। भगवान सिंह भी बच गये और अभी अभी ‘विश्वामित्र’ उपन्यास लिखनेवाले ब्रजकिशोर वर्मनभी। प्रतिभा राय और वेद व्यास में भी समय का बड़ा अंतर है, नहीं तो वेद व्यास भी कहते कि प्रतिभा राय ने द्रौपदी पर उपन्यास लिखते समय उनकी नकल मार ली है। जब लोग बौद्धिक हैं तो किसने कौन सा साहित्य कब पढ़ा और कब किसकी बात मन पर खुब गयी, किस साहित्य से कौन प्रभावित हो कर क्या लिख जाएगा, इस पर आज तक किसी का कोई एख्तियार रहा है क्या? जैसे कहा जाता है कि पुस्तक की चोरी, चोरी नहीं होती, वैसे ही विचार की चोरी, चोरी नहीं होती। विचार एक दूसरे से मेल खाते हैं। आप और हम उनसे प्रभावित होते हैं। विचार अच्छे लगते हैं तो हम उनका अनुसरण करते हैं, जैसे बुद्ध, महावीर, गांधी, सुभाष आदि के विचार हमारे प्रेरणास्रोत हैं। मगर कोई इनके विचारों को ताक पर रख कर इनकी वेश भूषा अपना ले तो उसे नकल ही कहा जाएगा। आरोप लगाते वक़्त इतना तो सोचें कि आरोप का आधार क्या है? कुछ शब्द किसी से मिल गये तो क्या शब्द किसी की बपौती है? लिखनेवाले ने उनका पेटेंट करा लिया है? और अगर ऐसा ही है तो फिर ऐसा क्या हम और आप लिख रहे हैं जो वेद पुराण या रामायण महाभारत में नहीं लिखा गया है कि जिसे आज के शेक्सपियर, लू शुन, प्रेमचंद, गोर्की या लिओ तॉल्सतॉय नहीं लिख गये हैं?
बहरहाल, छम्मकछल्लो को बड़ा मज़ा आ रहा है। वह लेखक तो नहीं है, फिर भी वह गर्व के साथ कह रही है कि उसने आजतक जो कुछ भी लिखा है, सब नकल कर के लिखा है। उसने तो अपनी आंख खुलने के बाद ही सब कुछ की नकल की है। नकल करके उसने चलना, बोलना, बात करना, लिखना पढ़ना सीखा है। स्कूल कॉलेज के सभी टीचर उसकी नकल के घेरे में इस तरह आ जाते कि कभी वह किसी यू सी झा की तरह अंग्रेज़ी पढ़ाने की नकल करती तो कभी डॉ रामधारी सिंह दिवाकर की तरह कथा साहित्य पढ़ाने की। और तो और, फिल्म देख कर घर आने पर वह सबसे पहले अपनी बहन के सामने उस फिल्म के अभिनेता अभिनेत्री के अभिनय की नकल करती, हेलेन के डांस की नकल उतारती। पहले वह इसे प्रेरणा समझती थी, मगर अभी अभी उसके ज्ञान चक्षु खुले हैं कि नहीं, यह सब प्रेरणा में नहीं, नकल के घेरे में आते हैं। छम्मकछल्लो को लगता है, इससे अच्छे तो हिंदी फिल्म इंडस्ट्री है। भाई लोग पूरी की पूरी फिल्म नकल कर के बना डालते हैं, सेट दर सेट, संवाद दर संवाद, संगीत दर संगीत, मगर लोग उसे “इंस्पायर्ड बाइ” बोलते हैं। “इंस्पायर्ड बाइ” भी बोल दिया तो बड़ी बात हो गयी। अभी हॉलीवुड में बॉलीवुड की बहार है। उसे भी लोग “इंस्पायर्ड बाइ” कहते हैं। ना कहें तो क्या घमासान मचाएं? मचा कर फायदा? मगर शायद मोहल्ला लाइव को है, लोगों को है। आखिर, धींगा मुश्ती देखने का मज़ा ही कुछ और है ना! किसी के दिल के तेल में अपने घर का भी दिया जला लो भाई!

Wednesday, September 23, 2009

फ़िल्म हिन्दी में, चर्चा अंगरेजी में- जवाब में- "हा, हा, ही ही, फिस्स-फिस्स!" !

http://reporterspage.com/miscellaneous/230-4
आज राजा मेनन की फिल्म "बारह आना" देखने गई. इसका आयोजन एंलाइटेन फिल्म सोसाइटी ने किया था. एंलाइटेन फिल्म सोसाइटी मुंबई में दो जगह हर रविवार को विश्व की सभी भाषाओं की बेहद स्तरीय फिल्में दिखाती हैं. ये सभी फिल्में अपने कथ्य, क्राफ़्ट, मेकिंग में इतनी उम्दा होती हैं कि इनके सामने जब हिन्दी फिल्में (कभी-कभी) दिखाई जाती हैं तो वे इन विश्व सिनेमाओं के पासंग में भी नहीं ठहरतीं. इसका सबसे बडा प्रमाण तो यह होता है कि जिस दिन हिन्दी फिल्म दिखाई जाती हैं, उस दिन हॉल में दर्शकों की उपस्थिति नगण्य हो जाती है.

बहरहाल, फिल्म "बारह आना" की बात ना पूछें. "बारह आना" फिल्म के पात्र शुक्ला जी यानी नसीरुद्दीन शाह कह देते हैं- यह ज़िन्दगी बारह आना ही है.. हिसाब लगाएं तो सोलह आना का एक रुपय होता है. यहां बारह आना मतलब- तीन चौथाई रुपया तो मतलब पौनी ज़िन्दगी. फिल्म में ही मुख्य तीन पात्र हैं, यानी इस हिसाब से भी फिल्म पौनी है. और उस पर से फिल्म में से अगर नसीरुद्दीन शाह को निकाल दें तो फिल्म की यह चौथाई क्या, पूरी की पूरी फिल्म ही निकल जाएगी.

हिन्दी फिल्में भी ऐसे ही पौनी-पौनी बनती हैं, जिसमें फिल्म की भाषा, गीत हिन्दी में होते हैं, मगर काम नहीं. स्क्रिप्ट से लेकर सारी बहसें अंग्रेजी में होती हैं. आपके पास फिल्म का प्रोपोजल (जान बूझ कर इस शब्द का इस्तेमाल किया गया है) है, तो उसका अंग्रेजी में होना अनिवार्य है. उस प्रस्ताव में क्या है, यह बताने के लिए भी आपका अंग्रेजी में बात करना आना अनिवार्य है. फिल्म बन गई तो उसके प्रोमो से ले कर उसके प्रचार-प्रसार और उस पर चर्चा, बहस तक सब कुछ अंग्रेजी में होना अनिवार्य है. फिल्म के सारे टाइटल्स तो वैसे ही अंग्रेजी में देने का रिवाज़ है. पूछने पर कह देते हैं कि हिन्दी फिल्म के दर्शक बहुभाषी हैं, इसलिए उन्हें हिन्दी नहीं आती या हिन्दी में पढने में दिक्कत होती है, इसलिए टाइटल्स अंग्रेजी में दिए जाते हैं. फिल्मवाले कहते तो हैं कि फिल्में वे लोगों को जागरुक बनाने के लिए, उन्हें सन्देश देने के लिए बनाते हैं, मगर जिस भाषा में बनाते हैं, उसी भाषा के प्रति लोगों को जागरुक बनाने की बात वे सिरे से भूल जाते हैं. भूल क्या जते हैं, यह उनकी प्राथमिकता में है ही नहीं. न निर्माता-निर्देशकों की, न अभिनेता-अभिनेताओं की.

दरअसल यह सवाल या हिन्दी के बारे में कुछ पूछना ही बडा बेवकूफाना मान लिया जाता है, जिसे छम्मकछल्लो जैसे बेवकूफ जब-तब उठाते रहते हैं. हिन्दी फिल्मों से हिन्दी को प्रचार-प्रसार मिलने की बात कहनेवाले फिल्म निर्माण की इस पूरी प्रक्रिया पर ग़ौर फर्माएं. किसी को भी हिन्दी से लेना-देना नहीं होता है. चूंकि फिल्म हिन्दी में बननी है, इसलिए उसके संवाद और गीत हिन्दी में होने ज़रूरी हो जाते हैं. अब तो वैसे भी फिल्में कस्बे और गांवों के लिए नहीं बनतीं, इसलिए अब सम्वाद भी शुद्ध हिन्दी के न हो कर हिदी-अंग्रेजी के हो गए हैं. यही हालत गीतों की है. तारीफ यह है कि हर भारतीय भाषा-भाषी, यहां तक कि अब विदेशी भी हिन्दी फिल्मों में काम करने का ख़्वाहिशमन्द है, मगर हिन्दी सीखने के नहीं. विदेशी तो फिर भी हिन्दी सीखने की इच्छा ज़ाहिर करते हैं, मगर अपने लोग तो हिन्दी के नाम से ही ऐसा मुंह बनाते हैं, जैसे करेले का जूस पिला दिया गया हो. बडे से बडे नाट्य व अभिनय संस्थानों मेँ फिल्म, नाटक, अभिनय, निर्देशन आदि के सभी पक्षों पर बडी गहराई से जानकारी दी जाती है, मगर भाषा के बारे में सभी चुप रहते हैं.

आज भी यही हुआ. फिल्म "बारह आना" को दिखाए जाने के बाद राजा मेनन से गुफ्तगू कार्यक्रम रखा गया था. चूंकि परिचय देनेवाले से लेकर सवाल-जवाब सभी कुछ का माहौल ही अंग्रेजीमय कर दिया जाता है, इसलिए हिन्दी में सवाल पूछनेवाले आम तौर पर चुप ही रह जाते हैं. यह भी देखा जाता है कि हिन्दी में सवाल करनेवालों को यूं ही टालकर उसे इग्नोर भी कर दिया जाता है. बरसों पहले दिल्ले में साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित कार्यक्रम "मीट द ऑथर" के तहत गिरीश कर्नाड को बुलाया गया था. रु-ब-रु के तहत सवाल-जवाब के कार्यक्रम में एक ने जब अपना सवाल हिन्दी में पूछा तो वे यह बोले कि "मैं आपके सवाल पर आता हू", और आज तक वे आ ही रहे हैं.

आज भी छम्मक्छल्लो ने सवाल रखा कि "आखिर क्या बात है कि सभी हिन्दी फिल्म "मेकर्स" फिल्में तो हिन्दी में बनाते हैं, मगर सारी की सारी बहसें अंग्रेजी में करते हैं? क्या हिन्दी में बहस करने से विषय की गम्भीरता कम हो जाती है?"

जवाब पूरे हॉल के साथ-साथ राजा मेनन से भी मिला और वह यह था- "हा, हा हा हा, ही ही, फिस्स-फिस्स!"

Tuesday, September 22, 2009

“कम्बख्त इस आम आदमी को पैदा किसने कर दिया?”

मोहल्ललाइव पर पढ़ें छम्मक्छल्लो का आलेख। लिंक है- phttp://mohallalive।com/2009/09/21/vibha-rani-on-common-man-status/

छम्‍मकछल्‍लो ने हर बार की तरह इस बार भी ऊपरवाले को दोष देते हुए उन्हें कोसना शुरू कर दिया कि तभी चमत्कार हो गया। ऊपरवाला एकदम ऊपर से उतर कर नीचे वैसे ही आया, जैसे बड़े-बड़े लोग किसी भी बात पर गुस्सा हो कर एकदम से अपने घर की उपरी मंज़िल से नीचे उतर आते हैं, चाहे वह घर की सीढ़‍ियों से उतर कर नीचे आना हो या अपनी हरकत में नीचे आना हो। ऊपरवाला बड़े तैश में था। झट से पूछने लगा, “ऐ! मेरे को ये बता कि क्यों तूने बोला कि मैने आम आदमी क्यों बनाया?”
छम्‍मकछल्‍लो उसकी भाषा और तेवर पर हैरान। वह कुछ बोलना चाहती थी कि ऊपरवाले ने फिर कहा, “मेरी ज़बान पर मत जा छमिया। यह सब तेरी ही करतूत है। जब तू अपना नाम छम्‍मकछल्‍लो रख सकती है, तो क्या मैं ऐसी ज़बान नहीं बोल सकता?”
छम्‍मकछल्‍लो अभी भी पेसोपेश में थी। ऊपरवाले ने फिर कहा, “यह मत भूल कि यह दुनिया अब तुमलोगों की है, मेरी नहीं। मुझे तो जैसा बनाना आता था, बना कर दे दिया। और क्या नहीं दिया तुम लोगों को? प्यार, मोहब्बत की भाषा, आदर के गुर, सहानुभूति के तार, विनम्रता के एहसास, सहनशीलता की चादर। रहने के लिए इतनी बड़ी धरती, पीने के लिए इतने तालाब, जलाशय, झरने, खेती-बारी के लिए इतने बड़े भू खंड, छांव के लिए इतने बड़े-बड़े वृक्ष, चढ़ने के लिए हिमालय जैसा पर्वत। ऐसा क्या नहीं था जो नहीं दिया तुमलोगों को। और तुमलोग? अपने में ही मार-काट मचा-मचा कर एक-दूसरे के दुश्मन बन बैठे। सबको ज़्यादा चाहिए और इस दौड़ में जो आगे निकल गया, वह महान बन गया, खास बन गया, बाकियों को आम बना गया। मैंने तो सभी को एक ही जैसा बनाया था। आम और ख़ास तो तुम सबकी पैदाइश है। ग़लती करो तुम और गाली सुनें हम?”
छम्‍मकछल्‍लो के पास शब्द नहीं थे, उसे याद आ रहा था, खास लोगों द्वारा उचारे जानेवाले शब्द, आम लोगों के लिए, ये लोग जानवर हैं, सुअरबाड़े में रहते हैं। हवाई जहाज़ को भी पशुशाले में तब्दील कर देते हैं। अंग्रेज़ी में एक शब्द चल गया है – इकॉनॉमी। यह आपके आर्थिक स्तर से जुड़ जाता है। जहां किफायत की बात आती है, यह शब्द उसके साथ जुड़ जाता है। अब किफायत की बात तो आम आदमी ही करेगा ना। उसी की आमदनी सीमित है, उसे ही अपनी सीमित आमदनी में घर चलाना होता है, दुनिया के सारे कर्म निपटाने होते हैं। तरह-तरह के टैक्स भरने होते हैं। खास लोगों को इन सबसे मतलब नहीं होता। वे आम जन के पैसे पर अपने खास मकसद पूरे करते हैं, जैसे कोई बहुत बड़े-बड़े पद पर पहुंच जाते हैं और पांचतारा होटलों में रहने लगते हैं। उनका बंगला तैयार नहीं हुआ, तो वे क्या दोस्तों, रिश्तेदारों के यहां रहने जाएंगे? आम आदमी की तरह लिचरई करने लगे आप भी! अब आम आदमी क्या करे? उसके पास सिवा एक अफसोस के और हसरत है ही क्या कि काश, वह भी एक आम आदमी से खास आदमी बन पाता।
ऊपरवाले ने छम्‍मकछल्‍लो को उदास देखकर कहा, “लगता है, तुम्हें मेरी बात का बुरा लग गया। मगर तुम खुद सोच कर देखोगी तो पाओगी कि ख़ास आदमी बनने के बहुत फायदे हैं। लोग आपको पहचानने लगते हैं, आप किसी के पास रुक कर उससे दो बात कर लेते हैं तो वह आम आदमी अपने को धन्य-धन्य मानने लगता है। अगर उसके साथ चाय पी ली, या कुछ खा लिया या उसके साथ कहीं चले गये तो वह आपसे चाय के, रिक्शे के पैसे हर्गिज़-हर्गिज़ नहीं लेगा। वह तो इसी में “मन मेरो मुदित भयो आज” के तर्ज पर नाचता फिरेगा कि आप आज उसके साथ थे। आप उसके साथ फोटो खिंचवा लेते हैं तो वह आपको देवता से भी अधिक बढ़ कर पूजने लगेगा। तुम्हारे बारे में अख़बारों में छपेगा। बुरी भी बात छपी तो क्या हुआ? प्रचार तो होगा न? वो कहते हैं न कि बदनाम हुए तो क्या नाम नहीं होगा। नेता हो, अभिनेता हो, कुछ भी कर सकते हो। तुम्हारे देश में फिलहाल तो इन्हीं दोनों के पौ बारह हैं। हां, एक क़ौम और आ गयी है – खिलाड़‍ियों की। लेकिन सभी नहीं, केवल क्रिकेटर हो तो फायदे हैं। अब तनिक टेनिस की पूछ हुई है। लेकिन तुम तो ठहरी जनी जात, महिला क्रिकेटर की दुर्गत आम आदमी से कम नहीं। टेनिस खेल लो तो खेल लो, बाकी में कोई दम नहीं।”
ऊपरवाले ने छम्‍मकछल्‍लो से फिर कहा, “मेरी मानो, आम आदमी बने रहने पर गाली और अपमान के अलावा और कुछ भी नहीं मिलनेवाला। तुम ख़ास बन जाओ। सभी तुम्हें हाथो-हाथ लेंगे। अभी से इसकी क़वायद में लग जाओ।”
ऊपरवाले की ज़बान बदलने लगी थी। छम्‍मकछल्‍लो को समझ में आने लगा था कि उसके ख़ास बनने की प्रक्रिया शुरू होने लगी है। तभी तो ऊपरवाले की ज़बान बदलने लगी है। छम्‍मकछल्‍लो तनिक ऐंठी, ख़ास होने के भाव में तनिक अकड़ी कि नींद खुल गयी। ऊपरवाले का तो पता नहीं, मगर सोये-सोये में छम्‍मकछल्‍लो की कमर कचक गयी। अब वह सोच रही है कि किस नेता, अभिनेता, खिलाड़ी या अन्य खास आदमी को वह बुलाये कि उसकी कमर ठीक हो और वह चल-फिर सके। कल उसे अपनी ड्यूटी पर भी तो जाना है कि नहीं?

Thursday, September 17, 2009

एक पहेली- वे हमारा छुआ खाते है, मगर हम नहीं तो कौन बडा, कौन बडा?

mohallalive।com पर पढ़े छम्मक्छल्लो का यह लेख। लिंक है- http://mohallalive.com/2009/09/17/vibha-rani-on-social-distance/

छम्मकछल्लो बचपन से कुछ बातों को ले कर हैरान है, परेशान है। बचपन से उसने कई लोगों से इस बाबत पूछा, मगर कहीं से ऐसा कोई जवाब नहीं मिला जो उसे संतुष्ट कर जाता। “बावरा मन अहेरी खोजे पिऊ कहां, पिऊ कहां?” आप सबके सामने भी वह अपनी परेशानी रख रही है।
छम्मकछल्लो के घर में शब्बीर मास्टर, उस्तानी जी, यूसुफ मियां आते थे। ये सब जब आते थे, तब उन्हें अलग से रखे चीनी-मिट्टी के कप-प्लेट में चाय-नाश्ता दिया जाता था। उनके जाने के बाद उसे फिर से धो कर अलग से रख दिया जाता। कभी अगर भूले से उस कप-प्लेट को उठा लेता घर के या अन्य लोगों के प्रयोग के लिए, तो बड़े चौकन्ने भाव से “हां-हां, हां-हां” कह कर मनाही की जाती।
छम्मकछल्लो के शहर में एक घीवाला था। उसका भी नाम शकूर या रहमान या कुछ ऐसा ही था। पूजा-पाठ हो या सामान्य दिन- पूरे मोहल्ले में घी उसी के यहां से आता था, क्योंकि उसके यहां के घी की क्वालिटी अच्छी होती थी। वजन भी अच्छा होता था। उधार भी दे देता था। तगादा भी कम करता था।
हमारे यहां जलेश्वरी भी आती थी। उसका काम होता था- पर्व-त्योहार के आने पर पूरे घर को गोबर-मिट्टी से लीपना। उसके यहां गाय थी, इसलिए वह गोबर भी अपने यहां से ले आती थी। उसे या हमारे घर के शौचालय को साफ करनेवाली को जब रोटी या कुछ भी दिया जाता था, तो देनेवाला अपना हाथ उससे कम से कम दो से तीन फीट की दूरी पर रखता।
शहर में एक मजिस्ट्रेट साहब आये। सभी उन्हें तो मजिस्ट्रेट साहब कहते, मगर उनकी पत्नी को चाची। पूरे परिवार की पढाई-लिखाई, रहने सहने के तौर-तरीके से सभी प्रभावित। मोहल्ले की चाचियां अपनी-अपनी बेटियों को स्वेटर बुनने, कढाई-सिलाई सीखने के लिए उनके पास भेजने लगीं। चाची भी बड़े प्रेम से यह सब सिखातीं। वे जब घर पर आतीं तो उनके लिए भी वही चीनी-मिट्टीवाला कप-प्लेट निकाला जाता। सभी महिलाएं उनके यहां उसी दिन जातीं, जिस दिन उनका कोई व्रत होता, ताकि उनके हाथ का खाना-पीना खाने से बचा जा सके। क्रिस्मस में वे खास तौर पर बिना अंडे का रोज केक बनाती, सभी के यहां भेजतीं, मगर उसे भी किसी शकूर, किसी जलेश्वरी, किसी हरखू को दे दिया जाता।
एक बार शहर में कोई बहुत बड़े हाकिम आये। नाम था ए राम। सभी ने घृणा से कहा – “ए राम? अब उसके साथ उठना-बैठना पड़ेगा? खाना-पीना पड़ेगा?” सभी आपस में ही खुसुर-फुसुर कर रहे थे। हिम्मत तो किसी में थी नहीं कि कोई उनके सामने यह कहता। फिर यही श्री ए राम घर पर आये। तब फूल की थाली में खाना परोसा जाता था। खाना परोसा गया और उनके जाने के बाद उस थाली-ग्लास आदि को आग में जला कर पवित्र किया गया।
ये सभी शब्बीर मास्टर, उस्तानी जी, यूसुफ मियां, शकूर या रहमान, मजिस्ट्रेट साहब, ए राम साहब वगैरह छम्मकछल्लो या अन्यों के घरों का सब कुछ खाते-पीते। न खाना किसी क्रांति जैसी घटना होती और उस शहर में ऐसी कोई क्रांति आई नहीं। सब इसी में मगन थे कि ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई उनके हाथ का नहीं खाए? हमने भी खुद को बड़ा मान लिया और खाने से मना कर दिया।हमने भी खुद को बड़ा मान लिया और खाने से मना कर दिया।हमने भी खुद को बड़ा मान लिया और खाने से मना कर दिया। मगर यही शब्बीर मास्टर, उस्तानी जी, यूसुफ मियां, शकूर या रहमान, मजिस्ट्रेट साहब, ए राम साहब वगैरह जब ईद या शबे बरात में सेवई, बर्फी आदि भेजते तो उसे कोई नहीं खाता था। उसे जलेश्वरी, फुलेसरी, सोमीदास या ऐसे ही किसी को दे दिया जाता। खुद जलेश्वरी के यहां से कोई प्रसाद या पकवान आता तो उसे किसी और जलेश्वरी या फुलेसरी या चनिया के हवाले कर दिया जाता।
चलते-चलते एक और ताज्जुब की बात कि शब्बीर मास्टर, उस्तानी जी, यूसुफ मियां, शकूर या रहमान मियां के यहां से खजूर आता, तो उसे सब खा लेते। उसी तरह जलेश्वरी के घर से आम, केले, ताड़ के फल आते तो उसे सब खा लते। तब यह कह दिया जाता कि फल में छूत नहीं होती, जैसे शकूर या रहमान मियां के यहां के घी में कोई छूत नहीं होती। छम्मकछल्लो को एक वाकया और भी याद आता है कि घर में पूजा-पाठ के समय महिलाओं के लिए हमेशा नयी साड़ी आती। अगर किसी वजह से नयी साड़ी नहीं है तो कह दिया जाता कि बनारसी साड़ी पहन लो, उसमें नये-पुराने का भेद-भाव नहीं रहता। छम्मकछल्लो की मंद बुद्धि में यही आया कि मंहगी चीज़ों में छूत नहीं लगती, चाहे वह फल हो या साड़ी।

आप छम्मकछल्लो को कह सकते हैं कि यह तब की बात होगी। आज ऐसा नहीं है। तो छम्मकछल्लो का शिद्दत से ये मानना है कि आज भी इस भाव में कमी नहीं आयी है। छम्मकछल्लो की ही अपनी बहन उसके घर पूरे 15 दिन रही और खुद रोटी बना कर खाती रही, क्योंकि छम्मकछल्लो की खाना बनानेवाली का नाम फातिमा है। वैसे फातिमा पर छम्मकछल्लो का सारा घर फिदा है, क्योंकि वह बहुत अच्छा खाना बनाती है।
तो पहेली यह कि शब्बीर मास्टर, उस्तानी जी, यूसुफ मियां, शकूर या रहमान, मजिस्ट्रेट साहब, ए राम साहब वगैरह छम्मकछल्लो या अन्यों के घरों का सब कुछ खाते-पीते रहे तो बड़ा या दिलदार कौन? हमने नहीं खाया तो छोटा या संकीर्ण कौन? बूझो तो जानें।

Tuesday, September 15, 2009

यह लेडीगिरी छोडिए छम्मकछल्लो जी!

रिपोर्टर्स पेज पर देखिए छम्मक्छल्लो का यह आलेख। लिंक है- http://reporterspage.com/inhuman/701
छम्मकछल्लो फिर से मुदित है. उसके सपने में कल रात एक पति आये. पति तो पति होते हैं. वे किसी के भी सपने में आ सकते हैं, चाहे वह अपनी पत्नी के सपने में आये या दूसरे की पत्नी के सपने में. पति सभी एक जैसे हों या नहीं, कम्बख्त सारी पत्नियां एक जैसी होती हैं. उनकी चाहत के पोर पोर में बसी होती हैं इच्छाओं की अतल गहराई कि उनके पति केवल उनके बने रहें, उनकी हर बात मानें, उन्हें टूट टूट कर प्यार करे. उन्हें फूल से भी न छुएं. एक लडकी थी. उसने शादी के दो महीने बाद ही यह कह कर पति को छोड दिया कि आज तक उसने नहीं जाना कि पति का प्यार क्या होता है? छम्मक्छल्लो ने उसे समझाने की हर चन्द कोशिश की कि उसे जब 26 साल में नहीं पता चल पाया कि पति का प्यार क्या होता है, तो वह तो अभी अभी ब्याह कर आई ही आई है. पर ना जी, उसे नहीं मानना था. सो नहीं मानी. बाद में फिर पता नहीं कैसे उसे यह पता चल गया कि उसके पति का प्यार कैसा होता है और वह एक दिन अपने-आप बिना किसी शर्त के पति के घर लौट आई.
मगर सभी पति ऐसे नहीं होते. हर पति की अपनी-अपनी क्वालिटी होती है. एक पति को उसकी पत्नी ने उस पर नपुँसकता का आरोप लगाते हुए उसे छोड दिया और एक दूसरे विवाहित पुरुष से शादी भी कर ली. उस विवाहित पुरुष की पत्नी और घरवालों की काफी चिरौरी के बाद उस महिला ने उसके पति को छोड दिया और दुबारा अपने पति के घर आ गई. पति ने बडी दिलदारी दिखाते हुए उसे रख लिया. इस बात के करीबन 15-16 साल हो गए होंगे. वे दोनों बडा सुखी जीवन जी रहे हैं.
लेकिन सभी पति ऐसे नहीं होते और ऐसे न हो कर वे इन पतियों के लिए बडी सांसत खडी कर देते हैं. अभी दो तीन पहले छम्मकछल्लो ने अखबार में पढा कि एक पति ने पत्नी द्वारा पैसे ना देने पर ना केवल अपनी गर्भवती पत्नी की लातों से पिटाई की, बल्कि उसे बिजली के शॉक लगा कर उसे घायल कर दिया. अब वह अस्पताल में पडी है और पति जेल में. छम्मकछल्लो के सपने में यही पति आ गया. छम्मकछल्लो ने उससे पूछा कि उसने ऐसा क्यों किया? उत्तर में उसने अपने ही जैसे एक और पति को खडा कर दिया. उस दूसरे पति ने कहा कि "मैडम जी, बीबी को मारना तो कॉमन बात है. इसके लिए हमको हमारे नींद से जगा कर अपने सपने में काहे को बुलाया? मैं अपनी बीबी को मारता हूं, मेरा भाई मारता है. ये देखो." उसने एक और पति को छम्मकछल्लो के सामने ला खडा कर दिया और बोला, "ये मेरा बाप है, मगर मेरी मां का मरद है. यह भी मेरी माँ को मारता है."
छम्मकछल्लो की समझ में आया कि बीबी को मारना पति का जन्मसिद्ध अधिकार है. वह पति ही क्या, जो बीबी की ठुकाई ना करे. छम्मकछल्लो का जी फिर भी नहीँ माना. उसने सपने में आये पहले पति से पूछा कि तुमलोग तो कहते हो कि बीबी कम अक्ल की होती है, कमज़ोर होती है तो कमज़ोरों से मुकाबला करके या उस पर ज़ोर दिखा कर तुम्हें क्या मिलता है. पति बहुत बडे ज्ञानी संत की तरह मुस्कुराया और फिर बोला, "यह तो हमारी परम्परा है. बीबी तो बीबी, हम तो माँ को भी मारते हैं." "कैसे?" छम्मकछल्लो ने पूछा. पति बडी हिकारत भरी नज़रों से छम्मकछल्लो को देखते हुए बोला, "लगता है, आप शाश्त्र-वास्त्र नहीं पढतीं. नास्तिक हैं या कम्यूनिस्ट? अरे भगवान परशुराम ने अपने पिता के कहने पर अपनी माता का सर अपने फरसे से काटा था कि नहीं?" पति आगे बोला, "हमने तो अपनी बीबी को मारा ही हैं ना, ‘मारा’ तो नहीं है ना." छम्मकछल्लो ने इस पंक्ति का अर्थ पूछा. पति छम्मकछल्लो के मूढ मगज पर हँसते हुए बोला- "पहले मारने का मतलब पिटाई करना है और दूसरे मारने का मतलब जान से मारना है." छम्मकछल्लो ने पूछा "तो क्या तुम उसकी जान लेना चाहते थे? वह भी तब, जब वह तुम्हारे बच्चे की माँ बननेवाली है?" पति बोला, "शुक्र कीजिए कि मारा ही, राजा रामचन्द्र की तरह घर से तो नहीं निकाला अपनी हामिला बीबी को? वह बडा कि मैं? राम ने तो सीता को आग में ही झोंक दिया. मगर मैंने तो केवल बिजली के झटके ही लगाए. वह बडा कि मैं? अब मारने से बीबी को थोडी चोट कग गई, बिजली के झटके लगाने से थोडी बहुत घायल हो गई तो क्या हुआ? रसोई में काम करते समय जल जाती है कि नहीं? पानी भरते समय फिसल जाती है कि नहीं? सब्ज़ी काटते समय उंगली कट जाती है कि नहीं? मैडम, बहुत लेडिगिरी कर ली. दूसरे की बीबी हो, यह जान कर छोड रहा हूं. अपने सपने से मुझे विदा करो. देखना है कि बीबी के पास पैसे आये कि नहीं. बहुत सारे काम करने हैं. इनको (अपने साथ लाए अन्य पतियों को दिखाते हुए) भी यहां से विदा करो.
छम्मकछल्लो की नींद खुल गई. वह उन पतियों के प्रति श्रद्धा से भर उठी जो अपनी या दूसरों की बीबियों को इंसान समझते हैं, उसके सुख-दुख के साझीदार बनते हैं. छम्मकछल्लो की पडोसन आंटी का अभी दो दिन पहले निधन हुआ है. उसने देखा अँकल को उनके लिए रोते हुए. इन अच्छे-अच्छे पतियों के लिए छम्मकछल्लो का मन से आभार. मगर क्या कीजियेगा सपने में आए हुए इन पतियों का, जो अपनी करतूत से दूसरे पतियों की छवि भी खराब करते हैं. छम्मकछल्लो इन अच्छे पतियों को देख कर मुदित है. आप हैं कि नहीं, बताइयेगा.

Monday, September 14, 2009

आप करते रहें हिंदी हिंदी, हिंदी हमारे ठेंगे पे

mohallalive.com पर पढ़े छम्मक्छल्लो का यह लेख। लिंक है- http://mohallalive.com/2009/09/14/vibha-rani-writeup-on-hindi/
हमारे साहित्यकार बंधु लोग हिंदी के रूपों के लिए बहुत चिंतित और परेशान हैं। वे हिंदी के स्वरूप निर्धारण की बात करते हैं, हिंदी की घटती लोकप्रियता का रोना रोते हैं, युवाओं में हिंदी के प्रति घटते जा रहे आकर्षण पर सर पीटते हैं, किताबों के न बिकने की हाय-तोबा मचाते हैं, पुरस्कारों पर राजनीति को कोसते हैं, कोई लेखक-पत्रकार कुछ कह दे तो उसके आज तक के सारे रचना कर्म को टॉयलेट तक में डाल आने की बात करते हैं, मगर यह नहीं सोचते कि यह सब क्यों हो रहा है? आखिर सोचें भी क्यों? वे साहित्यकार हो गये, यही क्या कम एहसान कर दिया हिंदीवालों पर कि अब इन सब वाहियात बातों पर सोच-सोच कर अपनी सृजनात्मकता का घोटाला करें? वे सब परम संत हैं, संतों की तरह जो लिख देते हैं, वह अखंड और अक्षर ब्रह्म बन जाता है। अब उस पर कोई अपनी कुदीठ डाले तो वह तो जल कर भस्म होगा ही न उनकी क्रोधाग्नि में?
वे हिंदी की बात करते हैं, मगर राजभाषा हिंदी, बाज़ार की हिंदी, हिंदी के साहित्येतर रूपों से अभी भी बेज़ार हैं। वे सोचते हैं कि उन्होंने साहित्य लिख दिया तो सबको साहित्यानुरागी हो ही जाना चाहिए और उनके लेखन को तो घोल घोल कर पीना ही चाहिए। वे साहित्य और साहित्यिक हिंदी के लोभ से उबर नहीं सके हैं। वे यह जानने समझने की कोशिश ही नहीं करते कि दुनिया कितनी बदल गयी है, लोग कहां से कहां तक पहुंच गये हैं, लोगों की प्राथमिकताएं कितनी बदल गयी हैं। वे तो बस यह चाहते हैं कि लोग देश और भाषा के गर्व में डूब कर हिंदी को गले से लगाये फिरते रहें। इसका सबसे बड़ा घातक परिणाम तो यह सामने आ रहा है कि आज के बच्चे और युवा हिंदी से कटे जा रहे हैं। वे अंग्रेजी में पढ़ते हैं और अपने कोर्स के अलावा भी पढ़ने के लिए अंग्रेजी में इतनी सामग्री है कि हिंदी में उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। आप दलील भले ही दें दें, मगर जो साहित्य हिंदी में है, वह आज के बच्चों के काम का नहीं है। खास तौर पर शहर में और अंग्रेजी माध्यम से पढ़नेवाले बच्चों के लिए। और युवाओं और बच्चों से उपेक्षित भाषा के विकास की कल्पना उतनी ही बेमानी है, जितनी बगैर पानी के बीज के अंकुरने की सोचना। वैसे भी हिंदी और इसकी विधाओं को इन महान लोगों ने इतने खानों और खांचों में बांट दिया है कि हिंदी की सर्वांगीण तस्वीर सामने आ ही नहीं पाती। अंग्रेजी की तो छोड़‍िए, अपनी ही भाषाओं, बांग्ला, मराठी, मलयाली, उर्दू आदि को देखिए। सत्यजित रे ने फिल्में भी बनायी और बाल साहित्य भी लिखे और दोनों ही क्षेत्र में उतने ही आदरणीय रहे। उर्दू के साहिर लुधियानवी, क़ैफी आज़मी, मज़रूह सुलतानपुरी आदि ने उर्दू अदब भी लिखा और फिल्मी गाने भी। मगर फिल्मी गाने लिखने के कारण उनका अदबी रूप उर्दू ने बर्खास्त नही कर दिया। हिंदी में ऐसा नहीं हो पाता। यहां साहित्य की मुख्यधारा में वही शामिल हो पाता है, जो लोकप्रियता के तराज़ू पर कठिनता से उतरे। नीरज साहित्यकार नही बन पाये, वीरेंद्र मिश्र गीतकार होने के कारण साहित्यिक कवि नहीं बन पाये। गुलज़ार फिल्म के ग्लैमर के कारण तनिक पूछ भले लिये जाते हैं, मगर साहित्यकार की पंगत उन्हें भी नसीब नहीं। बाल साहित्य जिसने लिख दिया, उसकी साहित्य में कोई पूछ ही नहीं। नाटक लिखनेवाला साहित्यकार नहीं होता। वह बिचारा तो कवि-कथाकार से भी अधिक दुर्गत झेलता है। कवि-कथाकारों की रचनाएं यहां तक कि उपन्यास भी पत्र-पत्रिकाओं में छप जाते हैं, मगर नाटक के छपने की बात पर सभी इसके आकार का रोना ले कर बैठ जाते हैं और नहीं छापते।
हिंदी के साहित्यकारों द्वारा कहा जाता है कि मीडिया और बाजार द्वारा प्रयोग की जाने वाली हिंदी मीडिया और बाज़ार के ही लाभ के लिए होती है। तो भैया, जो चीज़ आज बाज़ार से जुड़ी नहीं रहेगी, वह मांग से दूर हो जाएगी। अब हाथ कंगन को आरसी क्या? अखबारों में एक समय साहित्य होता था, अब वहां से वह दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल दिया गया है। सिनेमा पर एक पृष्ठ, खेल पर तीन-तीन पन्ने होते हैं, मगर साहित्‍य के लिए एक कोना तक नहीं।
बच्चे आखिर कौन सा साहित्य पढ़ें? अंग्रेजी में पढ़े बच्चे हिंदी की किताबों में कोई नवीनता वैसे ही नहीं देखते, जैसे हिंदी फिल्मों में वे नहीं पाते। फिर उनके लिए यह समय पहले के समय से कई कई गुना अधिक चुनौतियों से भरा है। पहले तो लोगों को सरकारी नौकरी मिल जाती थी। पढ़ाई, कैरियर का इतना बड़ा दवाब है उन पर कि वे अव्वल तो कोर्स के अलावे कुछ पढ़ ही नहीं पाते, जब पढ़ने का वक़्त मिलता भी है तो उस समय में वे अधिक से अधिक जानकारी हासिल कर लेना चाहते हैं। फिर सोशल नेटवर्किंग भी है। अपने यार-दोस्त भी हैं। और इन सबसे ऊपर तो यह है कि वे क्या पढ़ें ऐसा कि पढ़ कर उन्हें लगे कि हां, नहीं पढ़ता तो कुछ छूट सा जाता। आपसी झगडे, एक दूसरे की छीछालेदर, एक दूसरे पर प्रहार और अपने को श्रेष्ठतम दिखाने की होड़। ये सभी आज के लोगों के लिए अनुत्पादक तत्व हैं और अनुत्पादक बातों में अपना समय जाया करने का न तो वक़्त है और न ही मंशा। कोई बता दे कि इन सबसे क्या किसी को कोई रोज़गार मिल सकता है, किसी का पेट एक शाम भर सकता है? मानसिक जुगाली है और यह मानसिक जुगाली भरे पेट का शगल होता है।
अंग्रेजी से बाज़ार है, इसलिए उसकी मांग है कि एक गरीब मजूर भी अपने बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाना चाहता है। जिस दिन लोगों को यह भरोसा हो जाएगा कि केवल अंग्रेजी की तरह केवल हिंदी पढ़ लेने से भी काम, नाम, दाम, सम्मान मिल जाएगा, लोग अपने-आप हिंदी की ओर मुड जाएंगे। ऐसी हिंदी को लाने का जिम्मा क्या उन साहित्यकारों का नहीं, जो अपने-आप को हिंदी का सबसे बड़ा सेवक मानते हैं? पत्रिकाओं में पता नहीं, किन-किन विषयों पर बहसें चलाते रहते हैं। दुखद सच्चाई है कि पढ़े-लिखे अहिंदीभाषियों के घरों में अंग्रेजी के साथ-साथ उनकी मातृभाषा के भी अखबार व पत्रिकाएं आती हैं, जबकि हिंदीभाषी शिक्षित होने के बाद सबसे पहले हिंदी का अखबार, पत्रिका लेना बंद कर देते हैं।
हिंदी में हम केवल कविता, कहानी, उपन्यास लिख कर साहित्य की खानापूरी करते रहते हैं। विषय विविध हैं, मगर उस पर लिखने का वक़्त नहीं है। वक़्त से ज़्यादा उन पर लिखने-काम करनेवालों का सम्‍मान नहीं है। शब्दकोश, विकासात्मक, विज्ञान, समाज, रहस्य-रोमांच जैसे विषयों पर मौलिक किताबें नहीं हैं। हैरी पॉटर जैसी किताबें किशोरों के लिए आज कहां हैं? नर्सरी राइम्स जैसी किताबें भी हिंदी में बमुश्किल मिलती हैं। अभी भी लेखकों की लंबी क़तार है, जो नेट और उसके फायदे से कोई साबका नहीं रखते।
राजभाषा हिंदी से तो साहित्यकारों का खासा बैर भाव है ही। सरकार के बड़े-बड़े पदों पर रहे स्वनामधन्य लेखक भी यही कहते रहे कि राजभाषा हिंदी तो केवल हिंदी अधिकारी ही समझ सकता है। मैं यही पूछना चाहती हूं कि जब वे ऐसे बड़े बड़े पदों पर थे, तब उन्होंने ही राजभाषा हिंदी के स्वरूप में कोई रचनात्मक परिवर्तन क्यों नहीं किये कि राजभाषा हिंदी सरल और सहज हो जाती। कोसने से ही अगर सब कुछ हो जाता तब तो कोई समस्या ही नहीं रहती जीवन में।
हमारे साहित्यकार यह कह रहे हैं कि हिंदी गरीबों, वंचितों की भाषा रही है। यह जनपथ की ज़बान है। तो क्या मेरे भाई, इस जनपथ को राजपथ पर जाने और उससे मिलने का कोई हक़ नहीं? सत्ता जिनके हाथ में रहती है, जो नीति-निर्णायक हैं, हिंदी को उनके पास जाने दीजिए। हिंदी को अपने हिसाब से फलने-फूलने दें। हिंदी के पाठकों का रोना तब रोएं, जब उन्हें वैसी चीज़ दें। मगर सारा दोष साहित्यकार बंधुओं का ही नहीं है। हमारी अपनी मानसिकता भी है। आज हर सामान्य या अति असाधारण गैरहिंदीभाषी अंग्रेजी के साथ-साथ अपनी भाषा क एक अखबार, एक पत्रिका ज़रूर खरीदता है। हिंदी वाले सबसे पहले इसे ही बंद करते हैं। फिर आप दूसरी भाषाओं के अखबार देखें, इतनी सामग्री, इतने कलेवर होते हैं कि पूछें मत। हिंदी के अखबारों को देखें। कुछ कहने की ज़रूरत नहीं।
लेकिन क्या है न कि कहने के लिए हमारे पास कुछ नहीं होता तो हम इस-उस देशी-विदेशी भाषाओं का उदाहरण देने लग जाते हैं। आज सबसे बडी ज़रूरत आत्ममंथन की है। मगर इस आत्ममंथन, आत्मचिंतन के लिए वक़्त कहां है। और अगर कुछ वक़्त है तो चलें, उस वक़्त में किसी को गरिया आएं, किसी की खाल उतार आएं, प्रगतिशीलता के नाम पर किसी की धज्जियां उतार आएं। हिंदी का क्या है! वह अमेरिका के माध्यम से, बिल गेट्स के माध्‍यम से, गूगल के माध्‍यम से, इंटरनेट के माध्यम से आ ही रही है, आएगी ही। हमारे लिए तो अभी भी साहित्य के भावों के जंगल में अहेरी बन भटकता बावरा मन है, जो अभी भी पिऊ कहां, पिऊ कहां रटता रहता है।

Sunday, September 13, 2009

आखिर हिंदी वंचितों और शोषितों की भाषा ही क्यों रहे, शासन की क्यों नहीं?

रिपोर्टर्स पेज पर पढें छम्मक्छल्लो का यह लेख. लिंक है- http://reporterspage.com/glimpse/23-22#more-687

छम्मक्छल्लो हैरान-परेशान है कि आखिर क्यों कहा जाता है कि हिन्दी वंचितों और शोषितों की भाषा है? आखिर क्यों "राजभाषा” हिंदी का प्रयोग नहीं किया जा सकता? क्यों मान लिया गया है कि "राजभाषा” हिंदी दुरूह और ना समझ में आनेवाली भाषा है? इसके सीधे-सीधे कारण हैं. सबसे पहला तो यह कि जबरन यह मान लिया गया है कि हिन्दी गरीबों, निचले तबके और अनपढ नसमझ लोगों की भाषा है. हिन्दी को इसी गरीब की भाषा मान लिये जाने के कारण इसे ऊपरी वर्ग तक जाने का मौका नहीं मिल पा रहा है. दूसरे, अगर हिन्दी में यह ऊपरी वर्ग का काम भी होने लगे तो ऊपरी वर्ग का वर्चस्व खत्म हो जायेगा, जिसे यह वर्ग क़तई नहीं चाहेगा. कौन अपनी गद्दी छोडना चाहता है? तीसरे, हिन्दी के अलग- अलग रूपों की चर्चा कर-कर के यह साबित करने के कोशिश की जाती रही है कि हिन्दी गम्भीर विषयों के लिए नहीं है. आप कहानी-कविता, नाटक, फिल्म तो हिन्दी में लिख-बना सकते हैं, मगर इन पर चर्चा करनी हो तो वह हिन्दी में नहीं हो सकती. मतलब, मनोरंजन हिन्दी में, मगर विचार अंग्रेजी में.

सवाल है कि राजभाषा हिन्दी का प्रयोग क्यों नहीं होना चाहिये? क्यों इसे भी हिन्दी का एक सामान्य स्वरूप मानकर स्वीकार नहीं किया जाता? क्यों यह तर्क दिया जाता है कि राजभाषा हिन्दी बहुत कठिन होती है और यह सभी के सर के ऊपर से निकल जाती है. दर असल, हिन्दी को स्वीकार न करनेवाले कुछ लोगों ने हिन्दी को चन्द मज़ाकिया जुमले में ढाल कर यह कहने की कोशिश की कि देख लो, अगर हिन्दी में काम करना पडा तो ऐसी हिन्दी बोलनी पडेगी. ज़ाहिर है कि ऐसी हिन्दी से सभी बिदक गये. जो हिन्दी नहीं चाहते थे, उनकी बन आई. हम वैसे भी कुछ करने से पहले सोचते कम हैं, सो कुछ ने कोई फतवा दे दैया तो ले उदे, जैसे कोई कहे कि कौआ कान ले उड तो बगैर अपने कान जांचने के, कौए के पीछे भाग चले. कहीं भी आप जाये, कोई भी भाषा बोलें, वह अपने व्याकरण और विन्यास में एक ही होती है, सिर्फ उसके प्रयोग के स्थल अलग-अलग होने से उसके स्वरूप में परिवर्तन होते रहते हैं. सोचिए कि एक सब्ज़ीवाले और एक कॉलेजवाले से एक ही तरीके से बात की जा सकती है क्या? क्या आवेदन पत्र और प्रेम पत्र की एक ही भाषा हो सकती है?

राजभाषा हिन्दी के लिए यह भी कुतर्क दिया जाता रहा है कि इसके शब्द बहुत कठिन होते हैं, जबकि शब्दों के ज्ञाता जानते हैं कि प्रयोग से ही शब्दों से अजनबियत मिटती है. सुनामी या कटरीना के आने से पहले किसी ने इसका नाम भी नहीं सुना था, मगर आज सभी इसे जानते हैं. गूगल, ऑर्कुट, याहू, रेडिफ से क्या आज हम परिचित नहीं हुए हैं? 20 साल पहले ये सब शब्द बडे डरावने लगते थे. लोग तो तब ऑफिस के कम्प्यूटर तक नहीं छूते थे. शब्द हमारी ज़रूरत के मुताबिक बनते हैं, गढे जाते हैं, प्रयोग में लाए जाते हैं. आज़ादी के बाद हमें अपनी भाषा गढनी थी, हमने गढी, मगर उसे स्वीकार करने के बजाय हम उसे मज़ाक में लेते रहे. इस बात पर बल देते रहे कि सरल हिन्दी का प्रयोग करें. इस सरलता की तह में जाने पर पता चलता था कि अंग्रेजी के शब्दों को जस के तस बोलते चले जाओ. सरक हिन्दी हो जायेगी. नतीजा यह हुआ कि हम बोलते तो हैं हिन्दी, मगर इस्तेमाल करते हैं मैनेजर, डायरेक्टर, ऑफिस, प्रिंसिपल, न कि प्रबँधक, निदेशक, कार्यालय, प्राचार्य. ध्यान दें कि ये सभी शब्द हिन्दी में पहले से ही हैं, फिर भी इनका प्रयोग करने से हमें हिन्दी के कठिन होने का भय दिखाया जाता रहा.

राजभाषा हिन्दी के लिए भी सारे कुतर्क गढने में माफ करें, हमारे हिन्दीभाषियों ने ही अधिक भूमिका निभाई है. हिन्दी उनकी भाषा रही है और इसका खामियाज़ा यह कह कर उन्होंने दिया कि हिन्दी-विन्दी पढने से क्या होत है? हिन्दी में काम करना बकवास है. राजभाषा हिन्दी के क्षेत्र में काम करते हुए यह मेरा अनुभव रहा है कि अहिन्दीभाषी हिन्दी को जितना अधिक महत्व देते हैं, हिन्दीभाषियों को मैने हिन्दी की उपेक्षा करते या उसका मज़ाक उडाते ही अधिक देखा. जब कभी हिन्दीभाषी अफसरों से सामना हुआ, वे निखालिस अंग्रेजी में बोलते रहे और साथ ही साथ यह भी जताते रहे कि उन्हें अंग्रेजी आती है और यह कि हिन्दी में काम करना? "बुलशिट." लेकिन जब कभी अहिन्दी भाषी अफसरों से सामना हुआ. वे अपनी टूटी-फूटी हिन्दी में न केवल बतियाते रहे, बल्कि यह भी बताया कि कब-कब, कहां-कहां वे हिन्दी का प्रयोग कर लेते हैं.

हिन्दी कबतक दुख-दर्द और नाटक मनोरंजन का माध्यम बनी रहेगी? कबतक यह केवल वंचितों की ज़बान बनी रहेगी? ध्यान रहे कि जबतक यह केवल वंचितों की ज़बान बनी रहेगी, कोई इस पर गम्भीरता से नहीं सोचेगा. राजभाषा हिन्दी के प्रयोग में दिक्कत क्या है? दफ्तरों में एक तयशुदा तरीके से काम होता है. सभी तरह के पत्रों के तय प्रारूप होते हैं. आप अंग्रेजी में लिखें या हिन्दी में, प्रारूपों को कोई फर्क़ नहीं पडनेवाला. महज 200-300 अंग्रेजी शब्दों में सारा काम होता है. हिन्दी में भी लगभग इतने ही शब्द रहते हैं. जब हम अंग्रेजी सीख सकते हैं तो क्या इतनी हिन्दी नहीं सीख सकते? दूसरी बात कि भारत में अंग्रेजी का एक सीखा सिखाया रूप ही प्रयुक्त होता है, जबकि हिन्दी अपनी भाषा होने के कारण इसकी व्यापकता बडी हो जाती है. अलग अलग तरीके से लोग एक ही शब्द का प्रयोग करते हैं. आखिर सीखी हुई सीमित अंग्रेजी और स्वाभाविक रूप से फैली-पसरी हिन्दी का यह भेद तो उसकी सम्रृद्धि का दस्तावेज़ है, जिस पर गर्व करने के बदले उस पर शर्म करने जैसी स्थिति बना दी गई है. तीसरी बात, कोई भी भाषा सुनने से अधिक प्रचलन में आती है. हम आज कहने को तो हिन्दी बोलते हैं, मगर उसके वाक्य विन्यास ही केवल हिन्दी की प्रकृति के अनुसार होते हैं, पूरे वाक्य में जितना मुमकिन हो सकता है, अंग्रेजी के शब्द घुसा दिए जाते हैं. हम यह कहते हैं कि "आज एमडी ने अर्जेंट मीटिंग कॉल की है." यह नही कहते कि "प्रबंध निदेशक ने आवश्यक या अत्यावश्यक बैठक बुलाई है." कोई यह बताए कि इसमें ऐसा कौन सा शब्द है, जो लोगों की समझ में नहीं आता? मगर इस्तेमाल न करने की वज़ह से यह सुनने में अटपटा लगता है और तब हम सीधा-सीधा फतवा दे देते हैं कि राजभाषा हिन्दी है ही ऐसी. कोई बोले तो उसका इस कदर मजक उडाया जाने लगता है कि वह बोलने से तौबा कर ले और फिर हम दुन्दुभी बजा-बजा कर कहने लगते हैं कि राजभाषा हिन्दी- बाबा रे बाबा!
यह सोचिए कि ऐसा कह कर हम हिन्दी के ही एक स्वरूप को नष्ट करते आये हैं और अभी तक कर रहे हैं. राजभाषा हिन्दी का प्रयोग राज-काज के लिए है तो उसका प्रयोग भी राज-काज में ही होगा. कानून की भाषा का प्रयोग घर में सब्ज़ी बनाते समय या पार्टी मनाते समय् तो नही किया जा सकता है, जैसे बनारसी साडी पहन कर बाजार-हाट नहीं जाया जाता. लेकिन शादी-ब्याह पर भी अगर इसे नहीं पहना जाय तो घर में ऐसे कपडों के होने का मतलब क्या है? राज-काज में हिन्दी का प्रयोग होगा तो हिन्दी का वर्चस्व बढेगा और तब शासन की ऊंची कुर्सियों पर बैठे हुकमरान इसकी ज़रूरत को समझने पर बाध्य होंगे और झक मार कर इसका प्रयोग करेंगे. वैसे कहनेवाले जितना भी कहें, हिन्दी बडी जीवट भाषा है और तमाम बाधाओं के बाद भी अपनी मंज़िल तय करती ही आ रही है. जिस तरह से वह सम्पर्क भाषा के रूप में अपनी पहचान बनाती जा रही है, उसी तरह से वह राजभाषा हिन्दी के क्षेत्र में भी आगे बढती आ रही है. आज से 20-25 साल पहले तक अफसरान हिन्दी बोलना पसन्द तक नहीं करते थे, आज दफ्तरों में देखिए, अंग्रेजी से कब वे हिन्दी में उतर आते हैं, उन्हें भी पता नहीं चलता. पहले हिंन्दी के नाम पर सभी कडुआ मुंह बनाते थे. हिन्दी में पत्र लिख दिया तो उसका अनुवाद मांगा जाता था, लिखनेवाले से यह तक कह दिया जाता था कि अंग्रेजी में पत्र लिख कर लाओ. आज यह जागरुकता अधिकारियों के बीच बढी है और अब वे ऐसी मांग नहीं करते. राजभाषा नियम और नीति से भी वे पहले से अधिक परिचित हुए हैं. कम्प्यूटर पर हिन्दी अने से और इंग्लिश फोनेटिक में हिन्दी में टाइप करने की सुविधा के कारण अब उनकी निर्भरता अपने स्टाफ पर से खत्म हुई है. अब वे ख़ुद भी हिन्दी में काम कर लेते हैं. हिन्दी के शब्दों से उनकी परिचिति बढी है और वे खुद भी (ख़ासकर अहिन्दीभाषी) खिचडी भाषा के बदले शुद्ध हिन्दी के प्रयोग को असधिक वरीयता देते हैं. अब यह हम पर है कि हम अब भी राजभाषा हिन्दी कठिन है का रोना रोते रहें या उसे सत्ता के ऊंचे और ऊंचे पायदान पर ले जाने की कोशिश करें. राजभाषा हिन्दी कोई लाल कपडा नहीं है और ना ही हम भैंस. फिर भी उसे देख कर हम बिदकते हैं तो यह हमारी ही ख़ामी है.

Friday, September 4, 2009

हम बहुत धार्मिक हैं. इसलिये हम कुछ नहीं करेंगे.

हम बहुत धार्मिक हैं. इतने कि जब-तब हमारी धार्मिक भावना आहत होती रहती है. ज़ाहिर है कि यह आहत करने का काम कोई दूसरा ही करेगा. हम कभी भी अपने -आप से आहत नहीं होते. कोई अपने पैरों पर खुद से कुल्हाडी मारता है क्या?
देश धार्मिक है, हम धार्मिक हैं तो सारे समय देश में धर्म की धज फहराती रहती है. श्रावण मास के आते ही पूजा-पाठ, व्रत-उपवास के अम्बार लग जाते हैं. जिसकी जैसी श्रद्धा, वैसी भक्ति. आखिरकार यह धर्म और उससे उपजी श्रद्धा का मामला है.
मुँबई में ग़नपति यानी गणेश चतुर्थी का बहुत महत्व है. इसकी महिमा तो अब इतनी है कि अब मुंबईकर या महाराष्ट्रीयन से अधिक गैर मुंबईकर या ग़ैर महाराष्ट्रीयन इसे मनाते हैं. चलिये, इससे कोई फर्क़ नहीं पडता कि कौन सा पर्व कौन मना रहा है. छम्मक्छल्लो को अपना कलकता-प्रवास याद आता है, जब उत्तर भारतीयों का एक दल अष्टयाम के लिए चन्दा मांगने पहुंचा था और इस बिना पर अधिक चन्दा चाह रहा था, क्योंकि यह "अपनी" पूजा है. गैर की पूजा कौन सी हुई, यह पूछने पर तपाक से उत्तर भी मिला था कि वही, जो बंगाली लोग सब करता है, यानी कि दुर्गा पूजा. छम्मक्छल्लो को हंसी आ गई थी यह सुनकर कि अब दुर्गा पूजा खालिस बंगालियों की पूजा हो गई.
पूजा कोई भी हो, कोई भी करे, श्रद्धा जैसा तत्व सभी में एक समान रहता है. सभी अपनी अपनी श्रद्धा, आस्था से पूजा करते हैं, मगर बस पूजा तक. सभी पूजा में विसर्जन की भी प्रथा है. विसर्जन के बाद देवी-देवता का आसन हिला दिया जाता है, कह दिया हाता है-"स्वस्थानम गच्छतु:" यानी," हे देव, आप जहां से आये थे, वहीं के लिए पुन: प्रस्थान कीजिये". टपोरी ज़बान में कहें तो " जा रे बाबा, अपने घर जा, बहुत किया तेरा, खाली-पीली अब ज्यास्ती मुंडी पर बैठने का नहीं". और फिर देव प्रतिमा जा कर पानी में डाल आइये. पानी में डालने तक तो खूब जय-जय, खूब-खूब श्रद्धा का प्रदर्शन, और पानी में डालने के बाद पीठ फेरते ही देव, तू जा खड्डे में.
गणपति का विसर्जन दूसरे दिन, पांचवे दिन, सातवें दिन और दसवें दिन यानी कि अनंत चतुर्दशी के दिन होता है. हर दिन के विसर्जन के दूसरे दिन समुद्र का किनारा छम्मक्छल्लो ने देखा - फूल, पत्ते, माला, के अलावे अंग-भंग हुई प्रतिमा. सिर कहीं तो हाथ कहीं तो सूंढ कहीं. समुद्र तो अपनी लहरों में कुछ बहा कर ले जाता नहीं. वह दूसरे दिन "त्वदीयं वस्तु गोविन्दे, तुभ्यमेव समर्पिते" की तरह किनारे पर सबकुछ छोड देता है. भक्तों की श्रद्धा यहां काम नहीं करती. वह इन सबसे भी दूर रहती है कि इन मूर्तियों के बनने या उनके सजावट में कितने केमिकल्स का इस्तेमाल हुआ? इन केमिकल्स से समुद्रे जीव का कितना नुकसान होगा? आस-पास कितनी गन्दगी फैलेगी, उससे कितनी बीमारियां होंगी? यह सब होता है, होने दो. ग्लोबल वार्मिंग बढ रही है, बढने दो. देश भर में बारिश कम हुई, होने दो, पर्यावरणवादी लाख प्रदूषण -प्रदूषण चिल्लाते रहें, चिल्लाने दो. अपन का क्या? अपन इन सबले लिए थोडे ना बने हैं. इन सबके लिए एनजीओ और पागल लोग हैं जो कुछ ना कुछ करते रहते हैं. आखिर उनको भी तो काम-नाम मिलना चाहिये कि नहीं?
एक ने कहा कि पूजा-पाठ पर इतना खर्च ना करके ये सार्वजनिक वले इन पैसों से स्कूल-कॉलेज, अस्पताल क्यों नहीं खुलवाते? असमर्थ बच्चों की फीस क्यों नहीं भर देते? गरीबों का इलाज क्यों नहीं करा देते? फिर खुद ही उत्तर भी दे दिया कि तब लोग उनके बारे में जानेंगे कैसे? या फिर इन सब पचडे में कौन पडे? अपन का काम तो बस मस्ती करने का है, सो करेंगे. बाकी दुनिया जहन्नुम में जाये. एक ने कह, सरकार को फिक्स कर देना चाहिये कि इतनी संख्या से और इतनी ऊंचाई से ज़्यादा की मूर्ति नहीं बनेगी. फिर खुद ही उत्तर भी दे दिया- " धर्म के मामले में तो सरकार भी नहीं बोलेगी"
छम्मक्छल्लो को एक लतीफा याद आ गया. अलग-अलग धर्मों के कुछ आदमी एक नाव पर सवार थे. नाव में छेद हो गया. पानी भर गया. नाव डूबने लगी. सभी ने अपने-अपने धर्म के भगवानों को याद किया और सभी धर्म के देवता आ कर उनकी जान बचा गये. एक ने गणपति को पुकारा. गणपति आये और नाचने लगे. आदमी ने गुस्से से कहा, "मेरी जान जा रही है, मैने अपनी जान बचाने के लिए आपको पुकारा औअर आप हैं कि जान बचाने के बदले नाच रहे हैं? गणपति ने कहा, "याद करो, जब मैं डूब रहा होता हूं तब तुमलोग भी इसी तरहे से नाच रहे होते हो." और गणपति वहां से अंतर्ध्यान हो गये. हम भी उनके विसर्जन के बाद वहां से अंतर्ध्यान हो जाते हैं. अपनी-अपनी श्रद्धा है. कोई कचरा लगाता है, भगवान के नाम पर तो कोई उसकी साफ-सफाई करता है, भगवान के ही नाम पर.