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Wednesday, October 7, 2009

मेरे महबूब, मुझसे पहली सी मुहब्बत ना मांग

http://janatantra.com/2009/10/07/nehru-centre-theatre-festival-layla-majnun/

http://www.artnewsweekly.com/

जीव जब तक धरती पर हैं, तबतक प्रेम भी है। इंसान की दुनिया में प्रेम पर जब तब रोक टोक लगती रहती है, मगर प्रेम का कभी खात्मा नहीं होता. आज भी प्रेम की गाथाएं राधा कृष्ण से ले कर रोमियो जूलियट, शीरीं फरहाद, लैला मजनू के किस्सों के रूप में जन मानस में जीवित है. आज भी जब कोई प्रेम के पागलपन में पडता है, उसके लिए तत्काल कह दिया जाता है, “लैला मजनू बन गये हैं.” क़िस्सागोई भी हमारे जीवन में रक्त की तरह समाई हुई है. गाथा आल्हा ऊदल की हो या लैला मजनू की, जिसमें भी रस तत्व होता है, लोग उसे गाथा बना देते हैं और फिर उसकी आवृत्ति और पुनरावृत्ति होती रहती है. प्रेम पर लोगों की नाक भौं चाहे जितनी सिकुडे, मगर लेखन, नाटक, फिल्म, टीवी में इसी की भरमार है.

कई बार ऐसा होता है कि रामायण, महाभारत की तरह ही हम कथानक को जानते हुए भी उसकी प्रस्तुति पुनर्प्रस्तुति को देखते पढते हैं ताकि नया क्या है, यह देखा जा सके. लैला मजनू की दास्तान भी कोई नई बात नहीं है, मगर इसके मूल में छिपे इश्क़ को उजागर करने की चाहत बार बार लोगों को इस विषय पर ले आती है. इश्क़ की इसी दास्तानगोई को प्रो. राम गोपाल बजाज ने नेहरु सेंटर थिएटर फेस्टिवल में ‘शब्दाकार’ द्वारा प्रस्तुत नाटक ‘लैला मजनू’ के माध्यम से एक बार फिर उजागर करने की कोशिश की. इस्माइल चूनारा के मूल अंग्रेजी नाटक का उर्दू तर्ज़ुमा साबिर इरशद उस्मानी ने किया है.
उर्दू ज़बान की साफगोई और रवानगी इस नाटक में है, जिसके साथ कलाकारों ने भी लगभग न्याय किया, वरना आज के कलाकारों के मुंह से उर्दू सुनकर रोना आने लगता है. प्रो. राम गोपाल बजाज रंगमंच जगत में न भूलनेवाला नाम है. ये राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक भी रह चुके हैं और 2003 में पद्मश्री से सम्मनित भी किए जा चुके हैं. अपने लोगों के बीच ये “बज्जू भाई” के रूप में ज्यादा जाने पहचाने जाते हैं.
डॉ. राम गोपाल बजाज के फॉर्म से जो परिचित होंगे, वे जानते होंगे कि वे अपने कथ्य, मंच सज्जा, पात्रों, परिवेश, गीत, संगीत, वेश विन्यास, मेकअप आदि को काफी विस्तार देते हैं. इससे नाटक में एक फैलाव आता है और दर्शक इस प्रसार को महसूस कर पाते हैं. सम्वाद पर भी वे काम करते हैं.
इस नाटक में भी खालिस उर्दू के बड़े बड़े, लम्बे लम्बे सम्वाद निरंतरता में पात्रों से बुलवाए गए हैं. सम्वाद में कहीं तीव्रता है तो कहीं ठहराव. कहीं ऊंचाई है तो कहीं गहराई. पूरे नाटक में एक प्रवाह दिखता है. मध्यान्तर के पहले तक नाटक इसी प्रवाह में बहता दिखता है. ग्रीक संस्कृत शैली के माध्यम से इश्क़े मजाज़ी से इश्क़े हक़ीक़ी तक का सफर एक शायराना अंदाज़ में होता जाता है. इसमें प्रेम के शारीरिक स्तर से उतर कर उसके आध्यात्मिक रूप तक पहुंच जाना कि जब लैला अपने क़ैस से मिलती है तो वह उस हाड मांस की बनी लैला को पहचानने से इंकार कर देता है. औरत एक मज़बूर शब्द है और इसे भी लैला की मां के सम्वाद के साथ बताए जाने की कोशिश की गई है. नाटक की खूबियां ही कभी कभी इसकी सीमाएं भी बन जाती हैं.
मध्यांतर के बाद सबकुछ छूटता बिखरता, थकाऊ, उबाऊ सा लगने लगता है. लम्बे लम्बे सम्वाद और मुंबई के आज के माहौल में ऐसी उर्दू से लोग बावस्ता नहीं हो पाते. अगर अकादमिक प्रस्तुति हो तो इसके माध्यम से छात्रों और सीखनेवालों को रंगमंच की सभी बारीकियां समझाई जा सकती हैं, मगर आज के समय में, जब देश और लोग बाग तरह तरह की विषमताओं से जूझ रहे हैं, इश्क़ की यह क़िस्सागोई फैज़ की याद दिला देता है कि “मेरे महबूब, मुझसे पहली सी मुहब्बत ना मांग”। पांच कथावाचिकाएं पारम्परिक शैली में कथा बांचती रहती हैं. कथा की अतिशय गम्भीरता को तोडने के लिए दो क़िस्सागो भी है, जो मनोरंजन तो करते हैं, मगर नाटक को बेवज़ह लम्बा खींचते हैं.
इश्क़ के नाम पर इतना तड़पने के बावज़ूद उस तड़प का अहसास बदक़िस्मती से नहीं हो पाता. सभी पात्रों ने अपना अपना किरदार निभाया सिवाय मजनू के. उसके पूरे हाव भाव में अपने को मंच पर प्रस्तुत करने का भाव था, जो नाटक को एकदम से कमज़ोर कर देता था. लम्बे लम्बे सम्वाद भाव की गहराई को खा जा रहे थे.
एक समय था, जब पारसी थिएटर में बडी नाटकीय शैली में सम्वाद बोले जाते थे, मगर आज भाव के भूखे लोगों को इशारे में समझना अधिक अच्छा लगता है. उसमें भी महाराष्ट्र में, जहां नाटक का मतलब होता है, कम से कम शब्दों का खर्च. वरना मराठी के सुप्रसिद्ध नाटककार भालचंद्र झा के शब्दों में कहें कि तब स्टेज नाटक और रेडियो नाटक में फर्क़ ही क्या रह जाएगा? फिर भी, फेस्टिवल का नाटक है. मान कर चलिये कि फेस्टिवल में सब अच्छा अच्छा ही होता है. आगे भी होगा. बस, आते रहिए.
(पुन: मेरा एक दोस्त आधे में ही नाटक छोड कर चला गया. मेरे सामने एक सज्जन सोते रहे. मध्यांतर के बाद दिखे ही नहीं. एक अन्य दोस्त कहते रहे, मैं तो मराठी थिएटर से बावस्ता रखता हूं ना. इतने सारे सम्वाद? शायद हिंदी में ऐसा ही होता हो. एक दिन पहले ही मराठी नाटक अकादमी ने मराठी के मूल भाव गीत संगीत को ले कर गिरीश कर्नाड के नाटक ‘फ्लावर्स’ पर आधारित अपनी प्रस्तुति ‘मदन भूल’ की थी. सामन्यत: देर तक चलनेवाले संगीत प्रधान मराठी नाटक में नए प्रयोग तो किए ही, उसे महज डेढ घंटे में भी सहेज दिया. मेरा दुर्भाग्य कि किसी वज़ह से इसे देख नहीं सकी.)

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