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Saturday, October 10, 2009

पानी में आग!

पढ़ें एक व्यंग्य रचना- पानी में आग! लिंक है- http://rachanakar.blogspot.com/2009/10/blog-post_10.html


कहते हैं, मुंबई शहर हादसों का शहर है। इन हादसों में सबसे बड़ा हादसा यह हुआ कि यहाँ पानी में आग लग गई। अब तक तो आग जंगल में लगती थी, पेट में लगती थी। पुराने जमाने में भी तीन तरह की आग के बारे में बताया गया है- दावानल, बड़वानल, जठरानल। आग और आगे बढी। फिर यह दिलों में लगने लगी। आश्चर्य कि पहले इतने प्रेमिल रीतिकालीन रसिक कवियों और सहृदयों में से किसी ने भी हृदयानल की बात नहीं की। किसी ने यह ज़रूर कहा कि दिल का खेल अज़ीब होता है- लड़ती हैं आंखें, घायल होता है दिल और जलता है बदन। दिल भी जलता है। दिल की आग भी भड़कती है। नफ़रत का पूट ज्यादा हो तो घर, प्रेम, भाईचारे सभी को लील जाती है। इस आग में सभी नाते रिश्ते झुलस जाते हैं।
आग लगती है घरों में। ये घर मजदूरों के होते हैं। झोपड़पट्टियाँ जलती हैं। कभी नेता, कभी बिल्डर, कभी अपने लिए कुछ भी करने मरने को उतारू लोग, अपने आकाओं को तुष्ट करने की कोशिश में अति उत्साही दिखनेवाले छुटभैये - दिल में लगी स्वामिभक्ति की आग, आकाओं से प्रशंसा के फ़द्नल पाने की आग, अपने आप को जनता का सबसे बड़ा हमदर्द मानने और मनवाने की आग- यह आग कैसे दिखाएँ! काश सबके पास हनुमान जी जैसा हुनर रहता - यूं चीरी छाती, वो दिखाई स्वामिभक्ति, फिर पाट ली छाती, जैसे श्वेत-श्याम टीवी के जमाने में खुलने और बंद होनेवाले दरवाजे। दिल की बात सामने आना जरूरी है। इसलिए आग लग जाती है।
आग भी बड़ी अजीब है। अपनों के दिलों में लगती है तो तुरंत पानी बनकर ऑंखों से निकल जाती है। दुश्मनों के दिलों में लगती है तो ज्वाला भड़का देती है। अपना नाश होता है तो आग भड़क उठती है। दुश्मनों का होता है तो ठंढक पहुँचती है।
लोग कहते हैं, आग और पानी में जनम-जनम का वैर है। लेकिन कभी -कभी आप देखेंगे कि दोनों का मेल कितना अद्भुत है, चमत्कारी है। जैसे लड़ती है ऑंखें और घायल होता है दिल, इसी तरह से लगती है आग, बुझाने के लिए दमकल नहीं होता तो लोग ऑंसुओं से ही बुझाने की कोशिश करते हैं। कुछ तेज-तेज छाती पीटते हैं। बेजबान तो ऐसे ही आंसू बहाकर आग बुझाते हैं। बड़बोले बुझाने से पहले जोर-जोर से उसकी ढोल पीटते हैं।
आग और पानी के बीच अंतराष्ट्रीय संबंध है- चाहे वह अमर्त्य सेन हो या योग। राष्ट्रीय जल के लिए अंतर्राष्ट्रीय आग का होना जरूरी है। इसलिए लंदन में बम की आग फैली तो भारत के गुजरात में पानी की लहर फैल गई। लंदन सात दिनों में सामान्य हो गया। हम हो जाएँ तो हमारी खासियत ही क्या? प्रकृति भी देश के, लोगों के मिजाज को समझती है। पड़ोसी धर्म तो सबसे ज्यादा। विज्ञापनवाले ऐसे ही नहीं कहते अपना टीवी चले, पड़ोसी क दिल जले। गुजरात की प्रकृति ने अपना बरसों पुराना राजनैतिक बदला चुका लिया। हमसे अलग हुए थे, अब लो - और धीमे से पानी महाराष्ट्र की ओर सरका दिया। महाराष्ट्र तो महा-राष्ट्र ही है। उसने सोचा, पानी को पानी ही रहने दिया जाए तो हम अलग कैसे हुए। आखिर यहीं पर तो मुंबई भी है, मायानगरी - फिल्म नगरी । सो यहाँ पानी में आग लग गई। फिल्मवाले यूँ ही नहीं लिख डालते न कि रिमझिम बरसा पानी, पानी में आग लगाए। मुंबई पानी में डूबती रही और उधर पानी में आग लग गई। लंदन में आग, मुंबई में आग - अंतर्राष्ट्रीय संबंध जुड़ गए। गुजरात में पानी, महाराष्ट्र में पानी - पड़ोस धर्म सध गया।
सधने में बहुत कुछ सधा। पानी और आग की भावना में लोग बह गए। गांधी, सावरकर जबतक कुछ सोचते, समझ पाते तबतक सरकार ने मुंबई हाई के सभी लोगों के तर्पण भी कर दिए। उनके घरवालों को संवेदनाएँ भी दे डाली। आग हाई पर, पानी ऑंखों में, शब्द जबान पर। क्या करे! राजनीति की अपनी मजबूरी है। मीडिया हो, प्रेस हो तो बोलना जरूरी होता है। गनीमत रही कि आग तो लगी, लेकिन प्रकृति ने थोड़ी उदारता दिखाई, नेवल कोस्टल गार्ड जैसे तंत्रों ने चुस्ती दिखाई और 355 से ज्यादा लोग बचा लिए गए। कोई न्यूज नहीं। इंसान के जिंदा बचने पर न्यूज थोड़े बनती है। वह बनती है उनके मरने पर, घायल होने पर, घर ढहने पर, जान-माल का नुकसान होने पर। मीडिया भी तभी आती है। समाज -कल्याण के काम के प्रचार- प्रसार के लिए वह अपना तंत्र या साधन क्यों बर्बाद करे!
फिल्मवाले गाते रहे - रिमझिम बरसा पानी, पानी में आग लगाए। ये दोनों प्रेमी युगल की तरह गलबहियाँ डाले गाते रहेंगे।
आग और पानी का संबंध यूँ ही अगर चलता रहे तो वह दिन दूर नहीं, जब आग जलने पर पानी पेट्रोल का काम करगी। वैसे भी प्रज्ज्वलनशील पेट्रोल व अन्य र्प्ट्रोलियम पदार्थ अपने भाव के कारण और भी प्रज्जवलनशील होता जा रहा है।
लंदन में सात दिन में सबकुछ सामान्य सा हो गया। बॉम्बे हाइ में भी साढ़े तीन सौ से ज्यादा लोग बचा लिए गए। लेकिन धोबिया जल बिच मरत पियासा की तरह मुंबई वासी आज भी 'पानी-पानी रे' कर रहे हैं। आखिर रहीम भी कह गए है ज्ञ्
रहिमन पानी राखियो, बिन पानी सब सून
पानी गए न ऊबरौ, मोती, मानुस चून।
जो आग पानी की भेंट चढ़ गए, चढ़ गए। जो बच गए, वे महामारी, बीमारी, डेंगू और जाने किस - किस दर्द और डर की आग मे जलने का खतरा लिए जी रहे हैं - जीते रहते हैं, जीते रहेंगे। आखिरकार यह भारत है और हम भारतवासी, जिनमें सहनशीलता की मात्रा हद से ज्यादा होती है! यकीन नहीं होता तो खुद से ही पूछ लीजिए।

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