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छम्मकछल्लो की दुनिया में आप भी आइए.

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Friday, May 21, 2010

हिंदुओं, पहले अपना ही हिंदुपन तो तय कर लो!

http://www.janatantra.com/news/2010/05/19/a-comment-on-hinduism-of-hindus/#comments
छम्मकछल्लो की समझ में नहीं आता कि वह अपने ही धर्म के भाई लोगों को क्या कहे? भाई लोग कहते हैं कि वे सच्चे हिंदू हैं, नारे भी देते हैं कि “गर्व से कहो, हम हिंदू हैं” और अपने इसी गौरवांवित धर्म की ऐसी की तैसी कर देते हैं।

हिंदू धर्म कहता है, “कर्मण्येवाधिकारस्ते…” और हिंदू भाई लोग अपने ही इस मंत्र के विरुद्ध चले जाते हैं। धर्मकहता है, ‘कर्म किये जाओ, फल की चिंता मत करो’ और मानने की बात पर हिंदू भाई लोग अपने जन्म पर आधारित धर्म और जाति की बात करने लगते हैं। यह इन पढे-लिखे, उच्च विचार वाले हिंदुओं से कैसे कहा जाए कि हिंदू होना अपने कर्म के ऊपर नहीं है। जिस तरह से अपने मां बाप को चुनना किसी के बस में नहीं है, उसी तरह किसी धर्म विशेष में जन्म लेना भी। हमने-आपने जिस मां-बाप के यहां जन्म ले लिया, ले लिया, इसी तरह जिस धर्म या देश के परिवार में पैदा हो गए, हो गए। उस लिहाज़ से छम्मकछल्लो भी एक हिंदू घर में पैदा हो गई, इसलिए वह भी हिंदू हो गई। और छम्मकछल्लो को अपने हिंदू होने पर गर्व है, जब वह अपने ही धार्मिक ग्रंथों में इतनी इतनी प्रगतिशील बातें पाती हैं।
लेकिन, हिंदू भाई लोग धर्म की बात आने पर राधा-कृष्ण को पूजेंगे और अपने बच्चों के प्रेम की बात आने पर उसे धमकी देंगे और निरुपमा पाठक की तरह उसे जान से भी मार देंगे।

देखिए न, सभी धर्म-परायण हिंदू भाई लोग अपने यहां की स्त्रियों से साल में एक दिन हरतालिका व्रत करने की बात करते हैं। जो इस व्रत को जानते हैं, उन्हें पता है कि हिमराज ने जब अपने पुत्री पार्वती का ब्याह विष्णु के साथ तय कर दिया तो शिव को चाहनेवाली पार्वती तुरंत घर छोडकर चली जाती है। देवी-देवताओं की उम्र शायद हज़ारों-लाखों साल की होती है, इसलिए पार्वती हज़ारों–हज़ारो साल तपस्या करके शिव को प्राप्त करती है- पति रूप में। छम्मकछल्लो अपनी मां से पूछती थी कि अगर आज कोई लडकी ऐसे अपने पति या प्यार को पाने के लिए घर छोडकर चली जाए तो? मां तो मुस्कुरा कर रह जाती थी, मगर आज छम्मकछल्लो के सामने जवाब के रूप में है- निरुपमा पाठक जैसी कई-कई लडकियां। छम्मकछल्लो ने भी अपने शिव को पाने के लिए क्या-क्या नहीं झेला. शुक्र था कि वह निरुपमा बनने से बच गई.

आज लडकियां बिन ब्याहे मां बन जाए तो भूचाल आ जाता है। मगर हिंदू धर्मवाले जानते हैं कुंती को, वेदव्यास की माता सत्यवती को। सत्यवती ने बाद में अपनी ही बहुओं को वेदव्यास के पास भेजा, संतान प्राप्ति के लिए। बहुओं से बात नहीं बनने पर दासी को भेज दिया। बहुओं ने धृतराष्ट्र और पांडु दिए तो दासी ने विदुर। अब कोई बताए कि जाति या पद से ओछा होने से क्या संतान निर्बुद्धि पैदा होता है, क्या विदुर बेवकूफ थे? लोग कहते हैं दूसरी जाति में ब्याह करने पर संतान वर्ण संकर होता है। इस वर्ण संकर के भी बडे लफडे हैं भाई। इस पर फिर कभी।

पांडु-पत्नी कुंती कुंवारी मां बनी और ब्याह के बाद भी अन्य पुरुषों के संसर्ग से संतान पैदा किए। यही नहीं, मन में कहीं कोई चोर बैठा होगा, इसलिए अपनी सौत माद्री को भी दूसरे पुरुषों के संसर्ग से संतान उत्पन्न करवाए और अपनी बहू द्रौपदी को भी अपने पांच बेटों में बांट दिया। द्रौपदी आजन्म कृष्ण को अपना सखा मानती रही। आज कोई ब्याहता किसी अन्य पुरुष के लिए ऐसा सोचे तो उसका अपना ही पति उसे सबसे पहले दुश्चरित्र ठहराएगा।

श्री राम रावण के मरने के बाद मंदोदरी का ब्याह विभीषण से और बाली के मरने के बाद उसकी पत्नी तारा का ब्याह उसके देवर सुग्रीव से करवा देते हैं और भाई लोग कहते हैं कि अपने हिन्दू धर्म में विधवा ब्याह वर्जित है। इंद्र द्वारा गौतम पत्नी अहिल्या से व्यभिचार करने के बाद श्रीराम अहिल्या को व्यभिचारिणी और दुश्चरित्रता के आरोप से मुक्त कराते हैं। यहां किसी की हिम्मत नहीं कि वह ऐसा कर ले? उल्टा उस लडकी को माल समझ कर उसे भद्दे प्रस्ताव देंगे. हिन्दू धर्म के किसी भी बडे चरित्र ने याद नहीं कि कभी ऐसा किया हो.

इन सबसे यह तो पता चलता है कि समाज जिसे स्वीकार कर ले, उसपर कोई आंच नहीं उठाता। आज के हिंदू दावा तो करते हैं बडे हिंदू होने का, मगर कैसा दावा और किसका दावा यार! सच्चे हिंदू हो तो अपनी ही परम्परा का पालन करो ना। अपनी बेटियों को कुंती, अहिल्या, द्रौपदी, तारा, मंदोदरी जैसी पन्चकन्या या पार्वती जैसी प्रेम की पक्की होने तो दो। बिना ब्याह के भी वेदव्यास जैसा तपस्वी पैदा तो करने दो। अगर नहीं तो अपने हिंदूपने पर गर्व करना छोड दो। अपने इस तथाकथित हिंदुत्व को भी छोड दो। सनातन धर्म क्या कहता है, क्या पता। परंतु हिंदू ग्रंथ तो ये सब कहते ही हैं ना। अब या तो इन धर्म ग्रंथों को मिटा दो या अपनी विचारधारा में भर आए कूडे-कर्कट को साफ करके उसे स्वच्छ-शुद्ध कर लो। शास्त्रों में कुछ और, और अपनी करनी-कथनी में कुछ और! महान हिंदू धर्म यह तो कतई नहीं कहता। हिंदू धर्म की बातों को ही गलत ठहरानेवाले और उसी हिंदू धर्म पर गर्व से सर को हिमालय से भी अधिक ऊंचा करनेवाले हे तथाकथित हिंदुओ! तुम्हारी जय (?) हो!

Tuesday, May 18, 2010

एयर होस्टेस कितना बतियाती हैं?

छम्मकछल्लो देश की तरक्की से बहुत खुश है. उस दिन उसने अखबार में पढा कि भारत की तरक्की देखकर ओबामा के पसीने छूटे. छम्मकछल्लो के भी पसीने छूट जाते हैं, अपने देश की तरक्की देख कर. अमेरिका कह्ता है कि भारत दूसरी विश्व शक्ति बनने जा रहा है. अमेरिका जो कहता है, सही कहता है. उससे इंकार करने की ज़ुर्रत हममें नहीं है.

छम्मकछल्लो की भी यह ज़ुर्रत नहीं है कि वह किसी भी बात से इंकार करे. तब तो और भी नहीं, जब मामला किसी लडकी, उसके रूप-रंग, उसकी प्रतिभा (?), उसकी काबिलियत से जुडा हो. विमान सेवा भी एक सेवा है. इसे सुंदर बनाए रखने के लिए सुंदर-सुंदर विमान परिचारिकाएं होती हैं. सुंदर तो कुछ भी हो, किसी भी जगह या क्षेत्र में हो, मन को भाती है. ऐसे में हर क्षेत्र में काम करनेवाली महिलाओं का सुंदर होना लाजिमी हो जाना चाहिये, चाहे वह नर्स हो, डॉक्टर हो, वैज्ञानिक हो, इंजीनियर हो. सुंदर तो घर की बहुओं का होना भी लाजिमी है. आखिर अगली संतति सुंदर होनी चाहिये कि नहीं?

छम्मकछल्लो के मूढ मगज़ में नहीं आता कि एयर होस्टेस के लिए तथाकथित सुंदर होना लाजिमी क्यों है? क्या एयरलाइंस उसकी सुंदरता के बल पर चलते हैं? क्या कम सुंदर लडकियों द्वारा दी जानेवाली सेवाएं कुरूप या कम असरकारी होती हैं? एयर होस्टेस का काम आखिर अपने अतिथियों (किंगफिशर एयरलाइन को धन्यवाद कि उसके द्वारा ‘अतिथि’ के प्रयोग के कारण अब सभी एयलाइनों के पैसेंजर, यानी यात्री लोग अतिथि रूप में बदल गए.) को उडान के दौरान आवश्यक सेवाएं देना होता है. और यह सेवा कोई दुर्वासा भाव से न तो करवाता है और ना कोई रम्भा या मेनका भाव से करती है. मगर लोग अपनी मानसिकता ही बदल दे तो कोई क्या करे? पता नहीं राजा राम के समय के पुष्पक विमान की क्या स्थिति थी? सुंदरता के इसी दुराग्रह के कारण छम्मकछल्लो भी एयर होस्टेस बनते- बनते रह गई. उसकी इस इच्छा पर सभी ने छूटते ही कहा था कि “शक्ल देखी है अपनी?”

शकल के साथ साथ अकल भी देख लेने की बात कही गई. और अकल तो अपने देश में उसी के पास होती है, जिसके पास अंग्रेजी की ताक़त होती है. अंग्रेज गए तो शासन की ताक़त ले गए. मगर भाषा की ताक़त यहीं छोड गए. वे जानते थे कि किसी को मन से गुलाम बना कर रखना है तो उसकी ज़बान में घुस जाओ. देश छोड दिया, राजनीतिक ताक़त छोड दी, मगर हमारे मन में बसे रहे- प्रीतम आन बसो मेरे मन में. इतने कि देश के आज़ाद होने के बाद भी हम यह नहीं मानते कि हमारे देश की अपनी एक भाषा है, या हो सकती है. लोग अपने ही देश की भाषाओं पर आपसी लडाई करते हैं, अंग्रेजी के खिलाफ नहीं बोलते. बोलें भी कैसे? आखिर वह अतिथिकी भाषा है और अपने देश में “अतिथिदेवो भव:” होता है. देश गुलाम था तो लोग आज़ादी की बात हिंदी में करते थे. देश अब आज़ाद है तो लोग अपनी बात अंग्रेजी में कहते हैं. देश जब आज़ाद हुआ, तब महात्मा गांधी ने पहला संदेश यह दिया कि बता दो दुनिया को कि गांधी अंग्रेजी भूल गया. कुछ साल पहले देश के एक भूतपूर्व गृह मंत्री ने कह दिया कि अंग्रेजी इस देश से जानेवाली नहीं. लोगों को अंग्रेजी सीखनी चाहिये. जान लें कि भारत सरकार की राजभाषा नीति गृह मंत्रालय के अधीन ही आती है.

हाल में एक खबर आई कि देश में एक लडकी, कहा गया कि वह अनुसूचित जाति से थी, ने अपने कैरियर के रूप में एयर होस्टेस के पेशे को अपनाना चाहा. उसने इसका प्रशिक्षण देनेवाली अकादमी में नाम भी लिखा लिया. प्रशिक्षण पूरा भी हो गया. मगर नौकरी की बात आने पर कहा गया कि ना जी, उसका ‘फिजिकल अपीयरेंस’ एयर होस्टेस के लायक नहीं था और दूसरे यह कि उसकी अंग्रेजी अच्छी नहीं थी. खुशी की बात तो यह है कि ऐसा एयरलाइन के साथ साथ देश की व्यवस्था भी कह गई. अंग्रेजी में भसपन नहीं है ना. हो भी तो हमें पता नहीं. वरना सीधे सीधे कहो ना कि छोकरी बदसूरत है.

छम्मकछल्लो जानती है कि हम अपनी पुरानी परम्परा से बहुत प्यार करते हैं. सौंदर्य प्रेम और अंग्रेजी प्रेम उसी परम्परा में आता है. अब वह क्या करे कि उस लडकी पर ख्याल सवाल बन जाता है कि अगर रूप और अंग्रेजी इस नौकरी के लिए इतना ही महत्वपूर्ण है तो उस अकादमी ने उसे अपने यहां प्रशिक्षण देने के लिए भर्ती ही क्यों किया? उसे क्यों नहीं बताया कि बच्ची, तू मन से अच्छी हो सकती है, दिमाग से तेज भी हो सकती है, मगर तेरा रूप रंग इस पेशे के माकूल नहीं है. अकादमी ने अपने प्रशिक्षण के दौरान उसे इतनी अंग्रेजी की ट्रेनिंग क्यों नहीं दी कि वह सामान्य बातचीत अंग्रेजी में कर सकती? क्या यह कहा जा सकता है कि तब अकादमी का शुद्ध उद्देश्य पैसा कमाना होगा? आखिर क्यों रूप और भाषा से मिसफिट एक लडकी को उसमें भर्ती किया गया?

अब जब नौकरी देने की बात आई तब उसके रूप और भाषा का हवाला देते हुए उसे नौकरी नहीं दी गई? क्या एयर होस्टेसों को विमान में भाषण देना होता है? विमान प्रचालन और तकनीकी जानकारी के लिए उसे जो बोलना होता है, वह लिखा होता है, जिसे वह पढ कर सुनाती है. बाकी समय बमुश्किल वह अपने अतिथियों से 4-5 लाइनें बोलती हैं? तो क्या नौकरी देनेवाली एयर लाइन उसे इतने का भी आत्मविश्वास नहीं दे सकता था? लोग कहते हैं कि “संगत से गुन आत है, संगत से गुन जात.” अंग्रेजी की चाशनी में पगी दूसरी एयर होस्टेसों के साथ रह कर वह इतनी अंग्रेजी तो सीख ही लेती. मगर नहीं. इतनी मेहनत कौन करे? इतना परेशान होकर अकादमी या एयर लाइन चलाने के लिए हम थोडे ना बैठे हैं और ना ही समाज सेवा करने के लिए.

अब एक अधिनियम यह पास हो ही जाना चाहिये कि इस देश में जिसे अपनी प्रतिष्ठा से रहना हो, उसे अंग्रेजी हर हाल में आनी चाहिये. लडकियो! तुम्हारे लिए इसके साथ साथ तुम्हारा सुंदर होना भी अनिवार्य है. अगर तुम सुंदर नहीं हो तो तुम्हारा जीना बेकार है. मन से अच्छी हो तो हो, मन दिखता थोडे ना है. हम तन देखते हैं, उसे देखने, छूने, भोगने की लालसा रखते हैं. इसलिए या तो सुंदर बनकर जनमो, या फिर जनमो ही मत. जनम भी गई तो मर जाने के लिए तुम आज़ाद हो. अपनी आज़ादी का प्रयोग करो इस देश की बदसूरत लडकियो!