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Friday, October 2, 2009

बापू के नाम की यह चिट्ठी

बरसों पहले एक फिल्म आई थी- "बालक." उस फिल्म के लिए यह गीत सम्भवत: पं. प्रदीप ने लिखा था. लोग कहते हैं, सब कुछ बदल गया है, बहुत कुछ बदल गया है. गीता में जो कहा गया, आज तक नहीं बदला, कबीर ने जो कहा, आज तक वही हालात हैं. शहीद भगत सिंह जो बयान कर गये, देश के सामाजिक हाल अब भी वहीं के वहीं हैं. बापू भी जो कह गये, क्या उस पर हमारा ध्यान है? बापू के नाम यह पत्र आज भी हमारे हालात के बयान क ज़िन्दा दस्तावेज़ है.
सुन ले बापू ये पैग़ाम, मेरी चिट्ठी तेरे नाम
चिट्ठी में सबसे पहले, लिखता तुझको राम- राम,
लिखता तुझको राम
काला धन, काला व्योपार, रिश्वत का है गरम बाज़ार
सत्य अहिंसा करे पुकार, टूट गया चरखे का तार
तेरे अनशन सत्याग्रह के बदल गये असली बर्ताव
एक नई विद्या उपजी है, जिसको कहते हैं घेराव
तेरी कठिन तपस्या का ये निकला है कैसा अंजाम
चिट्ठी में सबसे पहले, लिखता तुझको राम- राम
प्रांत प्रांत से टकराता है, भाषा से भाषा की लात
मैं पंजाबी, तू बंगाली, कौन करे भारत की बात
तेरी हिन्दी के पैरों में अंग्रेजी ने बान्धी डोर,
तेरी लकडी ठगों ने ठग ली, तेरी बकरी ले गये चोर,
साबरमती सिसकती तेरी, तडप रहा है सेवाग्राम
चिट्ठी में सबसे पहले, लिखता तुझको राम- राम
राम-राज्य की तेरी कल्पना, उडी हवा में बन के कपूर
बच्चों ने पढ-लिखना छोडा, तोड-फोड में हैं मगरूर
नेता हो गये दल-बदलू, देश की पगडी रहे उछाल,
तेरे पूत बिगड गए बापू, दारुबन्दी हुई हलाल
तेरे राजघाट पर फिर भी, फूल चढाते सुबहो-शाम
चिट्ठी में सबसे पहले, लिखता तुझको राम- राम
हां, आज हमारे भूतपूर्व प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री का भी जन्म दिन है, जिन्होंने देश के कठिन समय में देशवासियों से अपील की थी कि आप सब सप्ताह में एक शाम का भोजन ना करें, इससे देश में अनाज की जो बचत होगी, उससे अनाज के आयात का संकट टाला जा स्कता है. और मुझे याद है, क्योंकि मैने भी तब एक शाम नहीं खाया था, लोगों ने स्वेच्छा से सप्ताह में एक शाम का खाना छोडा था. स्कूलों तक में इसका प्रचार लिया गय था. टीकरों ने बच्चों को समझाया था. मुझे भी टीचर के मार्फत ही यह सन्देश मिला था. शास्त्री जी की सादगी और देश के प्रति निष्ठा लोगों के दिलों तक पहुंची थी. मुझे अभी भी याद है कि उनकी मृत्यु पर हमारे घर काम करनेवाली चनिया दाई भी फूट-फूट कर रो पडी थी. दर असल उसी ने सुबह-सुबह काम पर आते समय मोहल्ले के चौक पर बज रहे रेडियो और उस पर आये समाचार से खलबली मच गये मोहल्ले की भी जानकारी दी थी. शहर में जैसे मातम छा गया था. लोगों ने उस दिन खाना नहीं खाया था और ताशकन्द शब्द लोगों के दिल-दिमाग में खुभ गए थे. स्कूलों- कॉलेजों के अलावा गृहणियों ने भी उनकी पत्नी श्रीमती ललिता शास्त्री को सम्वेदना भरे पत्र लिखे थे और उन सबके लिए बहुत बडा सुकून और संतोष का बायस बना ललिता जी की तरफ से आय आभार-पत्र. "जय जवान, जय किसान" का नारा लोग अंग्रेजो, भारत छोडो जैसे नारे की तर्ह उचारते थे. अच्छा है कि छुटपन में ही सही, इनलोगों के समय में हम थे और इनसे जुडे चन्द लम्हे अपने जीवन की भी थाती हैं.
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