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Saturday, May 31, 2014

श्रद्धांजलि - मेरे शिक्षक और लेखक जय दीक्षित -महेश भट्ट


जगदंबा प्रसाद दीक्षित हमारे बीच नहीं रहे। फिल्म निर्माता, निर्देशक महेश भट्ट ने उन्हें याद किया है अपने तरीके से। जगदंबा प्रसाद दीक्षित बहुत अच्छे वक्ता थे, एक्टिविस्ट थे, उम्दा दरेजे के लेखक थे। 1999 में देश में राजभाषा की स्वर्ण जयंती मनाई जा रही थी। कई आयोजनों के बीच लेखकों से मिलिए कार्यक्रम भी रखा गया था, जिसके लिए हमारे दफ्तर की ओर से उन्हें बुलाया गया। कार्यालयीन भाषा की बात थी। जाहिर है, अनुवाद पर सवाल उठे। दीक्षित जी ने कहा कि औद्योगीकरण इस देश की देन नहीं है। इसलिए हमारे पास उद्योगों के लिए मौलिक शब्द नहीं हैं। शब्द वहाँ से बनते हैं, जहां से काम शुरु होता है। हमारे यहाँ दूसरे काम हुए, उनके शब्द हमारे पास हैं, जैसे योग और उससे बने योगासन, प्राणायाम आदि। उनके अनुवाद नहीं हो पाते। वे बोले, "बाहर के शब्दों को लेने से कभी भी हिचकिचाना नहीं चाहिए। इससे हमारा ही विस्तार होता है।"

"मुरदाघर" जब पढ़ा तो भीतर तक हिल गई। ऐसी भदेस भाषा और उनके भीतर दबा हुआ इतना सारा दर्द कि आँसू भी छलकने ना दे और मन अवसाद से भर जाए।

ये बातें दीक्षित जी को सोचते हुए याद आ गईं। आप यहाँ चवन्नीचैप से लिया गया महेश भट्ट का संस्मरण और श्रद्धांजलि पढ़ें।    
http://chavannichap.blogspot.in/2014/05/blog-post_30.html

श्रद्धांजलि - मेरे शिक्षक और लेखक जय दीक्षित
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महेश भट्ट

 
महेश भट्ट की सर’,‘फिर तेरी कहानी याद आई’,‘नाराज’,‘नाजायजऔर क्रिमिनलजैसी फिल्मों के लेखक जय दीक्षित हिंदी के मशहूर लेखक जगदंबा प्रसाद दीक्षित का फिल्मी नाम था। उनके उपन्यास  ‘मुर्दाघरऔर कआ हुआ आसमानकाफी चर्चित रहे। पिछले हफ्ते मंगलवार को जर्मनी में उनका निधन हो गया। उन्हें याद करते हुए महेश भट्ट ने यह श्रद्धांजलि लिखी है।

   
कहते हैं कि अगर आप नहीं चाहते कि मरने के साथ ही लोग आप को  भूल जाएं तो पढऩे लायक कुछ लिख जाएं या फिर लिखने लायक कुछ कर जाएं। मेरे शिक्षक, लेखक, दोस्त जय दीक्षित ने दोनों किया।
 
   
मेरे सेलफोन पर फ्रैंकफट में हुई उनकी मौन की खबर चमकी तो यही खयाल आया। जय दीक्षित की मेरी पहली याद अपने शिक्षक के तौर पर है। वे कक्षा में शुद्ध हिंदी में पढ़ा रहे थे। उनका सुंदर व्यक्तित्व आकर्षित कर रहा था। यह सातवें दशक की बात है। वे सेंट जेवियर्स कॉलेज में फस्र्ट ईयर के छात्रों को हिंदी पढ़ा रहे थे। उनमें एक अलग धधकता ठहराव था। बहुत बाद में समझ में आया कि वे दूसरे अध्यापकों से क्यों भिन्न थे? एक दिन अखबार में मैंने खबर पढ़ी कि सेंट जेवियर्स कॉलेज के एक प्रोफेसर को राष्ट्रद्रोह के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया गया है। इस खबर ने मुझे चौका दिया था। मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था कि जय दीक्षित नक्सल थे। 

   
फेड आउट ़ ़ ़ फेड इन ़ ़ सालों बाद। सुंदर व्यक्तित्व के मेरे प्रोफेसर एक बार फिरके निर्देशक विनोद पांडे के साथ एक दिन मेरे घर आए। उनकी स्थिति अच्छी नहीं दिख रही थी। वे मुझे अर्थकी बधाई देने आए थे। क्या मुझे पहचान पाए?’ उन्होंने पूछा। उनकी आवाज में स्नेह और आदर दोनों था। आपने मुझे हिंदी पढ़ाया था। आप को कैसे भूल सकता हूं,’ मैंने कहा था। लेकिन यह बताएं कि आप जैसा क्रांतिकारी मनोरंजन की दुनिया में क्या कर रहा है?’ मैंने सुना था कि वे विनोद पांडे की अगली फिल्म के संवाद लिख रहे हैं। उनका जवाब था। यह लंबी कहानी है। क्रांति मर चुकी है और वह व्यक्ति भी मर गया। जरूरतों ने मुझे सीधा कर दिया है।

   
कुछ सालों के बाद उनका फोन आया, ‘मैं आप का शिक्षक जय दीक्षित बोल रहा हूं। सॉरी,मैं आपका समय ले रहा हूं, लेकिन कुछ जरूरी बात करनी है। क्या आप मुझे कोई काम दे सकते हैं, कोई भी। मैं अभी हताशा के भंवर में फंसा हुआ हूं।उनकी आवाज ऐसी लरज रही थी कि मैं कांप गया। मैंने तुरंत उन्हें काम सौंपा। फिर लंबे समय तक हम ने साथ काम किया। वे प्राय: कहा करते थे, ‘ये रहा मेरा छात्र, जो अभी मेरा शिक्षक है। अगर इन्होंने साथ नहीं दिया होता तो मैंने आत्महत्या कर ली होती।हमलोगों ने कई फिल्में एक साथ कीं। उनमें से एक सरथी, जिसके लिए उन्हें संवाद लेखन का फिल्मफेअर पुरस्कार मिला था। पर उससे भी अधिक उनके संग-साथ की याद के लिए दो अविस्मरणीय पुस्तकें हैं। यूजी कृष्णमूर्ति पर लिखी दो पुस्तकों - न खत्म होने वाली कहानीऔर सारांशके अनुवाद उन्होंने ही किए थे। 

   
उनकी अंतिम याद उनके एक जन्मदिन की है। उनके एक दोस्त ने उनके जन्मदिन समारोह के लिए विशेष तौर पर मुझे आमंत्रित किया था। मुझे उस दिन मुंबई से बाहर जाना था, लेकिन जय दीक्षित सर के लिए मैंने अपने कार्यक्रम में बदलाव किया। उस शाम मैंने अपने जीवन में उनके योगदान को रेखांकित किया था। मेरी बातें सुन कर उनका चेहरा किसी उपलब्धि के एहसास से दीप्त हो उठा था। मैंने बताया था कि मेरे व्यक्तित्व के निर्माण में उनकी क्या भूमिका रही है?

   
वे कहा करते थे, ‘मुझे मौत से डर लगता है।मेरा जवाब होता था, ‘मौत से कौन नहीं डरता दीक्षित साहब, यहां तक कि जो ईश्वर,अगली जिंदगी और स्वर्ग की धारणा में विश्वास करते हैं, उनहें भी मृत्यु से डर लगता है। लेकिन जैसा कि कहा जाता है कि जिस ने मौत की सच्चाई को अंगीकार कर लिया हो, वह जिंदगी जीने लगता है।उन्होंने कहा था, ‘अपने बारे में तो मुझे नहीं मालूम, लेकिन आपकी जिंदगी देख कर खुशी होती है।

   
जय दीक्षित, मेरे शिक्षक, मेरे दोस्त, मेरे लेखक और अनुवादक की जिंदगी कुछ दिनों पहले पूरी हो गई। वे अपनी मातृभूमि से कोसों दूर थे। चूंकि मैं स्वर्ग और मृत्यु के बाद के जीवन में यकीन नहीं करता, इसलिए उनसे दोबारा मुलाकात की कोई उम्मीद नहीं है। लेकिन सर, आप बेहिचक मेरे सपनों में मुझ से मिलने आएं। कहीं भी और कभी भी आप से मिलने में खुशी होगी। 

 chavanni chap    


Thursday, May 29, 2014

बिल टेलर की डायरी

अबतक अपनी बात कहती आई है छममकछल्लो। आज वह आपको दे रही है आधुनिक मैथिली कथा साहित्य की वरिष्ठतम महिला लेखक लिली रे की कहानी- "बिल टेलर की डायरी"। लिली जी का जन्म 26/1/1933 को मधुब­नी, बिहार में हुआ। प्राथमिक शिक्षा स्कूल में। तदुपरांत घर में ही।इनके उपन्यास  हैं- मरीचिका (बृहत उप­न्यास, 2 भागों में), पटाक्षेप (­नक्सल आंदोल­न पर अप­नी तरह का अ­नोखा उप­न्यास), जिजीविषा, विशाखन।200 से अधिक कहानियां। अपने समय की मैथिली की पहली बोल्ड कहानी ’रंगी­न परदा’ से बेहद चर्चित व विवादास्पद।  बाल साहित्य का भी लेख­न। कुछ नाटकों का भी सृजन। "मरीचिका" उप­यास पर साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त। मैथिली की पहली महिला साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता। प्रबोध सम्मान की प्रथम विजेता।देश-विलिदेश का भ्रमण और उसे अपने साहित्य में समावेशित करनेवाली लिली जी दार्जीलिंग में रहती हैं। हिन्दी में कहानी संग्रह "बिल टेलर की डायरी" वाणी प्रकाशन और उपन्यास "पटाक्षेप" भारतीय ज्ञानपीठ और "जिजीविषा" रेमाधव पब्लिकेशन्स से प्रकाशित हैं। सीधी, सरल और सहज भाषा व छोटे-छोटे वाक्य इनके लेखन की खासियत है। परंतु इन छोटे छोटे वाक्यों में जीव­न के बड़े बड़े सार तत्व छुपे होते हैं, जो पाठकों को कहीं स्तब्ध करते हैं तो कहीं सम्मोहित। इनकी कहानियां विश्व क्लासिक में रखी जा सकती हैं। इनकी कहानियां का अंत पाठकों को चौकाता है। आप भी पढ़िये और अपनी राय देना न भूलिए। 


बिल टेलर की डायरी
---: लिली रे
बिल टेलर ने टॉर्च जलाकर एक बार फिर से मानचित्र देखा। रास्ता सही था। मगर जगह का नाम नहीं था। चलते रहने से यही रास्ता आगे 'रोपवेमें पहुंचता था। उतनी देर तक खुद को रोक नहीं सकतेथे। इधर चारों ओर जंगल ही जंगल। कहीं किसी शौचालय का अता-पता नहीं। बिल टेलर नाली के किनारे वाली झाड़ी में चले गए। पेट लगातार मरोड़ें दे रहा था। माथा घूम रहा था। मन को मजबूत करके पैंटखोली।
किसी किसी तरह से निवृत्त होकर झाड़ी से बाहर निकले। पैर शिथिल हो गए थे। वहीं पहाड़ पर लेट गए। संयोग से थापा दम्पति घास काटकर उसी मार्ग से जा रहे थे। एक साहेब पर्यटक को मिट्टी परपड़े देखकर ठिठक गए।
'साहेब सिकहोटल नेम?' - घसकट्टे ने टूटी-फूटी अंग्रेजी और हाथ के संकेत से पूछा।
'टेलिविस्टा होटलवेरी फार। टेक मी टू योर हाऊस।' - बिल टेलर इशारा करते हुए बोले।
'मी वेरी पुअर।'
'मी वेरी सिक।'
और बिल टेलर ने आँखें मूँद लीं। पेट में फिर से मरोड़ें उठ रही थी। थापा ने अपनी पत्नी की ओर देखा। वह पहले से ही थापा की ओर ताक रही थी। थापा अपना डोको खोलकर झाड़ी के भीतर सुरक्षितस्थान पर रख आया। डोकोवाली रस्सी से बिल टेलर को बाँधकर अपनी पीठ पर लादा। दोनों पैरों को उसकी पत्नी ने पकड़ लिया। बिल टेलर को कोई होश नहीं था। जब पीठ पर से उतारा गया तब नींद टूटी।बोले- 'नॉमर्ल सलाइन दो।'
'नहीं है।'
बिल टेलर ने फिर इशारे से समझाते हुए कहा -'उबला हुआ पानी है?
'नहीं हैमगर उबाला जा सकता है।'
'बीस मिनट उबालो। मुझे जरा शौचालय ले चलो।'
थापा अपने नालीवाले शौचालय में ले गया। उन्हें थामे रखा। कपड़े-लत्ते पहना कर भीतर ले आया। उसकी पत्नी पानी उबाल रही थी।
'तुम्हें घड़ी देखने आता है?'
'आता है साहेब' - थापा ने अपने ताखे पर रखी छोटी सी मेज घड़ी दिखाई।
'पानी बीस मिनट तक उबालना। फिर इसके बाद एक मुट्ठी चीनी और एक चुटकी नमक डालकर मुझे हर दस मिनट पर पिलाओ। मैं बेहोश रहूं तब भी।'
थापा ने अपनी पत्नी को नेपाली में समझाया। पत्नी समझ गई। थापा काफी डर गया था। यदि दैव के प्रकोप से कुछ हो गया तोपड़ोसियों के घर बहुत नीचे थे। फिर भी जो सबसे नजदीक थावहांगया। वहां से जोर-जोर से हाँक लगाकर अन्य पड़ोसियों को बुलाया। सबने बीमार साहेब को देखा। थापा का अनुरोध था कि सभी मिलकर अभी ही साहेब को उनके होटल पहुँचा आएँ। लेकिन कोई भी राजी नहींहुआ।
'रात भर रख लो। भोर में पहुँचा देंगे।'
'यदि मर-मरा गया तो पुलिस पकड़ेगी' - थापा गिड़गिड़ाया।'
'हमलोग गवाही देंगे। अभी तो कोई अस्पताल भी खुला नहीं होगा।'
'घुप्प अंधेरा है। सुबह मुँह अंधेरे ही पहुँचा आएँगे।'
'यदि पहले ही मर गया तो?'
'तो उसी रास्ते पर रख आएंगे।'
'तुम्हें लाना ही नहीं चाहिए था।'
सभी चले गए।
थापा ने सलाइन बनाकर साहेब को जगाया 'साहेबसलाइन।थापा ने साहेब की देह हिलाते हुए कहा।
ऊँ.. ऊँ.. ऊँ.. - गोंगियाते हुए साहेब ने आँखें खोली। पैंट खराब हो गई थी। थापा अपनी पत्नी को साहेब के मुँह में चम्मच से सलाइन पिलाने का आदेश दे कर स्वयं सफाई में जुट गया। दार्जीलिंग केलोगों के लिए पेट का रोग अपरिचित नहीं है। मगर अपने और गैर में फर्क होता है। उस पर भी गैर यदि विदेशी साहेब हो तो। मगर दूसरा कोई उपाय भी तो नहीं था।
थापा और उसकी पत्नी सारी रात जागकर साहेब को सलाइन वाटर पिलाते रहे। साहेब को अपनी लुंगी लपेट दीसाहेब के लिए गोहाल से घास-फूस और कागज लाकर उसका धड़िया बना दिया। साहेब कापेट जब थोड़ा सा बहतातब आंखें खोलतेक्षीण स्वर में सलाइन वाटर माँगते। थापा और उसकी पत्नी तुरंत हाजिर करते।
पौ फटने से पहले ही थापा के पड़ोसी झोलंगा लेकर पहुँच गए। साहेब को टाँगकर होटल ले गए। होटल मैनेजर ने तुरंत अस्पताल में भर्ती करवा दिया। प्रत्येक को धन्यवाद के साथ-साथ दो-दो रूपए कीबख्शीश भी मिली।
थापा दूध का व्यापार करता था। दो जर्सी गायें थीं। तीन बच्चे थे, जो म्यूनिसिपल स्कूल में पढ़ते थे। काम के लिए किसी बाहरी व्यक्ति को नहीं रखा था। खुद ही सब मिल- जुलकर सारे काम निपटालेते थे। आज तो काम बहुत बढ़ गया था।
थापा की पत्नी अदृष्ट का खेल बूझ काम में लग गई।
अंग्रेज साहेब! बख्शीश तो देंगे हीमन ही मन सोचती थापा की बहू साहेब का सामान सहेजने लगी। पॉकेट खोलकर रूपए गिने। पूरे पाँच हजार थेमन गदगद हो गया। जेब में पाँच हजार तो बैंक मेंकितना?
थापा की पत्नी ने बिना किसी उपालंभ के साहेब के कपड़े खूब अच्छी तरह से धोए।
तीसरे दिन सारा सामान लेकर थापा अस्पताल पहुँचा। बिल टेलर आँखें मूँदकर पड़े हुए थे।
'नमस्ते साहेब। कैसे हैं?' थापा ने टेबुल पर झोला रखा।
'करीब-करीब ठीक हो गया। मगर शायद दो-तीन दिन और रहना पड़ेगा।'
'हुजूर' - थापा ने सिर डुलाते हुए झोले से बटुआ निकालकर साहेब को दिया। कहा- 'गिन लीजिए हुजूर।'
साहेब ने गिना। उसके बाद बटुआ थापा की ओर बढ़ाते हुए बोले - 'इसमें से तुम्हारी जितनी इच्छा होले लो।'
'नहीं साहेब। आप हाथ उठाकर जो दे दीजिए।'
'जान बचाने की कीमत कौन आँक सकता है। यदि अमीर रहता तो सारा दे देता। फिर भी तुम्हारा ऋणी ही रहता।'
'आप अमीर हैं साहेब।'
'नहींमुझे कोई नौकरी नहीं मिलीइसलिए भूटान चला आया। सामची में टीचर हूँ।'
'सामची में?'
'हाँवहीं एन आई  में।'
'हुजूर'
'इससे ज्यादा नहीं दे सकता।'
'रहने दीजिए साहेब। अभी तो आपको अस्पताल का बिल भी देना पड़ेगा। बहुत सारे खर्चे हैं। मैं तो यहाँ दूध बेचने आता हूँ। रॉबिन साहेब मुझे पहचानते हैं। पूछिएगा - थापा दूधवाला।'
'रॉबिन साहेब कौन?'
'केवेन्टर साहेब। वहीं मैं दूध बेचता हूँ। आप दूसरी बार आइएगातब दीजिएगा।'
'अब मैं कभी भी नहीं आऊँगा। ठगों का देश है दार्जीलिंग। सब चोर हैं।'
थापा का मुँह उतर गया। दबे स्वर में बोला, 'मैंने तो जैसा पायावैसा ही ले आया। रूपए कम हैं क्या?'
'नहीं-नहींबिल टेलर ने थापा का हाथ पकड़ लिया। समझाया- 'देखो न। रेस्तँरा में 'स्टेककहकर  जाने क्या खिला दिया। मेरा पेट खराब हो गया। उस शाम यदि तुम नहीं मिलते तो मैं तो मर ही गया होता। मैं तुम्हारा आभारी हूँ। लेकिन सभी तो तुम्हारे जैसे नहीं हैं न!'
थापा ने सहमति में सर डुलाया। बिल टेलर उसका हाथ पकड़े रहे। थोड़ी देर बाद थापा बोला- 'मैं गरीब हूँ  पैसे रहते तो आपके देश घूम आता। उस देश मेंजहॉँ एक भी ठग या बेईमान नहीं हैं। हमलोगतो भरे पड़े हैं पापियों से।'
बिल टेलर उसे ठीक से समझाना चाह रहे थे। तभी पेट गुड़गड़ाने लगा। बिल टेलर थापा का हाथ छोड़कर अपना पेट हँसोथने लगे। गुड़गुड़ी ठीक हुई, तब अपने देश की ठगी अच्छी तरह से याद आने लगीथापा को समझाने के लिएउसके संग हँसने के लिए। साहेब को अस्वस्थ समझकर थापा खड़ा हो गया। 'चलता हूँ साहेब। नमस्तेकहकर झटककर बाहर निकल गया।
बिल टेलर को समझने में देर हो गई। चिल्लाकर पुकार सकेंयह भी नहीं हो सका। बड़ी कमजोरी लग रही थी।
सुस्थिर होने पर बिल टेलर ने झोले में से चीजें निकाली। सभी वस्तुएँ चुस्त-दुरूस्त थीं। धपधप धोए कपड़ेदबाकर इस्त्री की हुई। टॉर्चकलमघड़ीमानचित्रडायरीसाबुनतौलियासबकुछ।
बिल टेलर ने अपनी डायरी में लिखा -
'मैं ठग हूँ।' ###
                                                             अनुवाद: विभा रानी