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Friday, March 24, 2017

आज के लिए नहीं, कल के क्लासिक के लिए बनी आज की फिल्म है-“अनारकली ऑफ आरा”।

       मैं यहाँ अविनाश दास निर्देशित और स्वरा भास्कर सहित सभी नए-पुराने कलाकारों द्वारा पर्दे पर अभिनीत और पर्दे के पीछे से अभिनीत फिल्म “अनारकली ऑफ आरा” पर अपनी बात रखने जा रही हूँ। इसे फिल्म की समीक्षा के रूप में न लिया जाए, क्योंकि मैं फिल्म समीक्षक नहीं हूँ। लेकिन, फिल्म हमारे जीवन में नस की तरह काम करती है। फिल्में हमें जीवन का नया राग, रंग और संचेतना देती है। मैं फिल्मों की इसतरह मुरीद हूँ कि हर फिल्म में अपने लायक के कलाकार को अपने में गढ़ लेती हूँ और उसकी कहानी के साथ अपने आपको देखने-खोजने और बुनने लगती हूँ। 
      बचपन में दुर्गा पूजा के अवसर पर हमारे शहर में रात भर खेले जानेवाले नाटकों में मुजफ्फरपुर, बनारस और कभी-कभी कोलकाता से बाई जी मंगाई जाती थीं- नाटक के दृश्यों के बीच में नाचने के लिए। यह दृश्यों के लिए आवश्यक नहीं होता था, दर्शकों को नाच के लोभ की शहद में लपेटे रखने के उद्देश्य से इसे रखा जाता था। पूरे समय यह चर्चा का विषय रहता था कि इस साल कहाँ से बाई आनेवाली हैं? कौन उनसे साटे का लेनदेन करता था, कौन उन्हें लेने जाता था, कौन उनकी इन तीनों दिन देखरेख करता था, हमें नहीं पता। लड़कियों को यह सब जानने-समझने का अधिकार कहाँ? हमें तो सातवीं-आठवीं कक्षा के बाद दर्शक दीर्घा में बैठने का भी मौका नहीं मिला। दरअसल, दर्शक दीर्घा में महिलाओं के बैठने के लिए जगह बनाई तो जाती थी, मगर उसमें केवल दूर-दराज से आई गाँव की बूढ़ी महिलाएं ही बैठती थीं। बुड्ढों से हम सुरक्षित रहें या नहीं, लेकिन ये बूढ़ियाँ तब सुरक्षित मानी जाती थीं। उनके साथ की आई बहू-बेटियाँ हमारे साथ नाटक देखती थीं- घरों की छटों से। शहरी बहुएँ और बेटियाँ तो उधर पाँव रखने की सोच भी नहीं सकती थीं। और अपने घर की बेटियाँ हमेशा रक्षणीया होती हैं। सो, हम सबके लिए, पंडाल के आसपास बने घरों की छतें ही नसीब थीं, जिसपर खड़े होकर रात भर या अपनी खड़े होने की शक्ति के मुताबिक नाटक देखा जाता था। शायद ही कोई स्त्री रात भर नाटक देख पाती थीं। भोर होते ही नाटक देखकर लौटे थके-मांदे घर के महान पुरुषों के लिए उन्हें चाय-नाश्ता बनाना होता था, अष्टमी, नवमी की पूजा की तैयारी करनी होती थी और घर-द्वार, बाल-बच्चों की सँभाल तो रूटीन के मुताबिक करनी ही करनी होती थी।
      मैंने देखा था, वे बाइयाँ नाचते हुए अश्लील इशारे भी करती थीं। जो जितने ज्यादा इशारे करतीं, वे उतनी ही पोपुलर होतीं। सभी उन्हें देखने के लिए बेताब रहते। मुझे याद है, एक बाई जी ने नाचने से पहले सबको प्रणाम किया और तनिक शास्त्रीय पद्धति से नाचना चाहा कि लोगों की फब्तियाँ शुरू हो गईं- “आप यहाँ से चली जाइए, हाथ जोड़ते हैं।“
      “अनारकली ऑफ आरा” फिल्म देखने से पहले मैं इन यादों को ताज़ा करती रही। जाने कितने यूट्यूब वीडियो देखे। पॉर्न भी। और मैं हैरान कि इनकी दर्शक संख्या लाखों में है। कमबख्त हम अपने वीडियोज़ डालते हैं तो हजार पर भी संख्या नहीं पहुँचती। महेश भट्ट ने सही कहा था, “जबतक आप जख्म नहीं देखेंगे, हमें मर्डर बनाने पर मजबूर होते रहना पड़ेगा।“ ऐसा भी नहीं है कि इन वीडियोज़ की क्वालिटी बहुत अच्छी हो। लेकिन, इन लड़कियों को देखने और छूने की लालसा इतनी बलवती है कि सभी अपना मान-सम्मान भी भूल जाते हैं।
      सवाल यह है कि आप अपना मान-सम्मान भूल जाएँ तो क्या ये लड़कियां भी भूल जाएँ? मान लिया जाए कि इन लड़कियों की कोई इज्ज़त नहीं? वे चूंकि सभी के सामने उत्तेजक नाच नाचती हैं तो वे सभी के लिए सहज उपलब्ध हैं? जिस देह और देह की आजादी का प्रेत हमारे तथाकथित सभ्य समाज की स्त्रियॉं को सताता रहता है, उसकी दीवार इन लड़कियों के सामने ढही होने के बाद भी ऐसा क्या है जो उन्हें उद्वेलित करता है? ....वह है, उनका अपना मान-सम्मान, जिसके लिए मैं अक्सर कहा करती हूँ कि इज्ज़त तो एक भिखारी और वेश्या की भी होती है।
      आप मानें या न मानें, लेकिन यह सच है कि स्त्रियाँ कभी भी केवल देह के वशीभूत होकर कहीं नहीं जाती। अनारकली भी रंगीला से एक भाव के साथ ही बंधी है। स्त्री अपनी देह का सौदा करते हुए भी उसमें भाव खोजती रहती है और लोलुप आँखों और लार छुलाती देह हर तबके और वर्ग की स्त्री के मन में लिजलिजापन भरता रहा है। ऐसे में अनारकली क्या सिर्फ इस बिना पर समझौता कर ले कि वह रसीले, रँगीले गाने गाती और उनपर कामुक नृत्य करती है?
      यहाँ सही कहा जा सकता है कि स्त्री मन को कोई नहीं समझ पाता। उसके लिए स्त्री का मन बनकर उसमें घुसना पड़ता है, प्याज के छिलके की तरह उसे परत दर परत खोलना पड़ता है, तब शायद एकाध प्याजी ललछौंह आपको मिले।
      बाकी इस फिल्म को आप ठेठ बिहारी माहौल, गंध, गीत, रस, रास, साज, आवाज के लिए भी पसंद करेंगे। बिहारी बोल और तों, बिहारी मुहावरे और संदर्भ आपको गुदगुदाएंगे और आपको बिहार को समझने का मौका देंगे। आरा के लिए मशहूर उक्ति है, जो इस फिल्म में भी है कि- “आरा जिला घर बा, कौना बात के डर बा?” और उसी तरह यह उक्ति भी बिहार के लिए बड़ी जबर्दस्त है-“एक बिहारी, सब पर भारी।“
और यह फिल्म तो बिहारियों का गढ़ है। यहाँ तक कि ठेठ राजस्थानी लेखक और कलाकार रामकुमार सिंह को भी इसने बिहारी बना दिया, इसके गीत लिखवाकर और इसमें अभिनय करवाकर।
      रूपा चौरसिया का कॉस्ट्यूम कौतुक भरता है और पूरी फिल्म को सम्मोहन की गिरफ्त में ले लेता है। कास्टिंग कमाल की है, यहाँ तक कि घर की मालकिन और अनवर का बाप भी ऐसे मुफीद हैं कि आप उसमें बंधे रह जाते हैं। अलबता मकान-मालकिन की भूमिका में मैं खुद को खोजती और देखती रही एक कलाकार होने के नाते और अंतिम अभियान गीत की गायिका के रूप में भी- एक लोक प्रस्तोता होने के नाते।  
      यहाँ मैं फिल्म की नायिका स्वरा भास्कर के लिए कुछ नहीं लिखने जा रही, क्योंकि मुझे पता है, हर कोई उनके उम्दातं काम की तारीफ करेगा। मैं तो बस उन्हे इस साल के राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता के रूप में देख रही हूँ। मेरे यह कामना पूरी हो।
      आइये, अन्य चरित्रों पर तनिक बात करें। हीरामन का चरित्र सही में तीसरी कसम के हीरामन की याद दिला देता है- भोला और अपनी अनारककली के प्रति आदर और श्रद्धा से भरा हुआ। उसका शुभचिंतक। रंगीला और अनारकली के रूप में पंकज त्रिपाठी और स्वरा भास्कर की केमिस्ट्री तो गज़ब ढा ही रही है, बुलबुल पांडे और वीसी साब के रूप में विजय कुमार और पंकज मिश्रा भी एक-दूसरे को कॉम्प्लिमेंट करते नजर आते हैं। फिल्म की सबसे अच्छी बात यह भी होती है कि वह अपने सभी कलाकारों को कितना स्पेस देती है और इस फिल्म ने सभी कलाकारों को अपने हिस्से का करने का पूरा स्पेस दिया है। सभी चरित्र अपना ध्यान खींचते हैं। वे आपके चेहरे पर मुस्कान भी लाते हैं, आपको रुलाते भी हैं और आपमें वह भाव भरते हैं कि बस, हो गई जुल्म की इंतहाँ कि “हर ज़ोर जुल्म के टक्कर में, संघर्ष हमारा नारा है!”
      स्त्रियॉं का देह के प्रति का यह संघर्ष मिथकीय काल से चला आ रहा है और चलता रहेगा अनंत अनंत काल तक, क्योंकि जबतक स्त्रियॉं के प्रति हम अपना रवैया नहीं बदलेंगे, तबतक स्त्रियॉं की देह से परे जाकर कुछ भी सोचा नहीं जा सकता। घुटन के इसी गैस चेम्बर में से हर उस अनारकली की चीख एक ब्रह्म नाद की तरह निकलेगी, जो अपनी देह को भोग की वस्तु माने जाने से इंकार करती है और अपने अस्तित्व के लिए सचेत है।
      यह फिल्म सभी को देखनी चाहिए। 18 की उम्र से लेकर हर आयु-वर्ग के लड़के- लड़कियों, स्त्री-पुरुषों को। केवल देखनी ही नहीं चाहिए, देखकर समझनी भी चाहिए और उसपर अमल भी करना चाहिए। “अनारकली ऑफ आरा” की पूरी टीम शत प्रतिशत बधाई की पात्र है। इस फिल्म के साथ तो ऐसा है कि अगर कोई मुझे दस बार भी कहे तो मैं देखने के लिए तैयार हूँ और यह भी आश्वस्त हूँ कि जितनी बार इसे देखूँगी, उतनी बार इसकी नई- नई परतें मुझे मिलेंगी। वैसे दो बार तो देख ही चुकी हूँ। आप सब भी देखकर आइये। और आगे जितनी बार भी मन करे, देखिये, कि कैसे एक फिल्म किसी मोनोटोनी को तोड़कर अपना एक नया इतिहास रचती है। “अनारकली ऑफ आरा” आज के लिए नहीं, कल के क्लासिक के लिए बनी आज की फिल्म है।  एक बात और, सफलता जब आती है तो सबसे पहले पर्दे के पीछे की औरत को ही बहाकर ले जाती है, जो जाने कितने कष्टों को सहकर सबका साथ देती रहती है। अविनाश की सफलता के पीछे खामोश भाव से लगी उनकी पत्नी स्वर्णकान्ता (मुक्ता) के योगदान को भी कतई नहीं भूला जाना चाहिए। #### 

Thursday, March 23, 2017

मेरे प्रेम का पहला पाठ- राम और रोमियो !

 मुझे भारतीय संस्कृति से बड़ा गहरा प्रेम है। रामायण से तो और भी। आखिर को, सीता हमारे प्रदेश मिथिला से थीं। सीता हमारी बेटी थीं और बेटी हो या बेटा, समय के अनुसार सभी की उम्र बढ़ती ही है। उम्र हो जाती है तो ब्याह की चिंता भी हमारी भारतीय संस्कृति का अमिट हिस्सा है। लिहाजा, सीता की बढ़ती उम्र ने राजा जनक को भी चिंता से सराबोर कर दिया-
            “जिनका घरे आहो रामा, बेटी होय कुमारी,
            सेहो कैसे सुतले निचिंत!”

सो नींद राजा जनक की भी गुम हो गई। माता सुनयना की भी हुई ही होगी। स्त्रियॉं को तो ठोक-पीटकर उन सभी तरह की चिंताओं के लिए जिम्मेदार बना दिया जाता है, जिससे उनकी छवि प्रतिकूल हो तो हो, औरों की अनुकूल बनी रहे।

सीता ने न जाने कैसे धनुष उठा लिया और राजा जनक को एक बहाना मिल गया- सीता से बेहतर वर खोजने का। आखिर, वधू कैसे वर से श्रेष्ठ हो सकती है! हुई तो भी उसे अपनी श्रेष्ठता छुपानी या मारनी पड़ती है। राजा जनक से शस्त्र-शास्त्र की शिक्षा और माता सुनयना से घर-गृहस्थी की शिक्षा लेकर भी सीता राम से बड़ी नहीं हो सकती। इसलिए, अब तो वर वो हो, जो धनुष नहीं उठाए, बल्कि धनुष तोड़े।

विश्वामित्र जी भी राम को लेकर पहुँच गए। राम भाई के संग घूमते-घामते सीता वाटिका भी पहुँच गए। अब, ये न पूछिएगा कि लड़कियों के बाग में लड़कों का क्या काम! वे भगवान हैं। कोई रोमियो या मजनू या राँझा नहीं। वहाँ दोनों के नैन से नैन मिले, दिल धड़के, होठों पर मुस्कान आई, मन में कोमल भावना ने जन्म लिया और सलज्ज रेख दोनों के चेहरे पर खींच गई। यह तो बहुत ही स्वाभाविक है भाई। कुछ भी अच्छा लगने पर दिल में खुशी और चेहरे पर मुस्कान आती ही है।

मिथिला में राम –सीता के ब्याह से बढ़कर दूसरा ब्याह कोई नहीं। और सीता वाटिका में राम –सीता का मिलन प्रेम का पहला पुष्प तो नहीं था न-
            “ये मेरे पहले प्यार की खुशबू....!”
मन्नत मनाने की भी परंपरा हम यहीं से मान लें? गोसाई जी मानस में लिख भी गए हैं कि वाटिका में राम के दर्शन के बाद सीता जी गौरी पूजने जाती हैं। सीता जी मन्नत मानती हैं कि ये ही मुझे पति के रूप में मिलें और गौरी जी प्रकट होकर कहती हैं-
            “सुनू सिय सत्य असीस हमारी, पूजही मन-कामना तुम्हारी!”

कामना फलीभूत हुई और यही कामना मय-सूद सोलह सोमवार के रूप में फलीभूत हुआ। हर सीता को राम जैसा पति चाहिए, इसलिए, सोलह सोमवार, सोलह शुक्रवार, महाशिवरात्रि आदि सब उसे ही करने चाहिए। मगर हर राम को? शायद कोई भी चलेगी? नहीं, नहीं! कोई भी नही चलेगी। जो चलेगी, वह उनकी पसंद की होनी चाहिए और उसके लिए उन्हें सोलह सोमवार, सोलह शुक्रवार, महाशिवरात्रि आदि करने की कोई ज़रूरत नहीं।

तो भैया! प्रेम की परिभाषा यहीं से गढ़ी गई। अब वाटिका में मिले राम को कोई लैला-मजनू, सीरी-फरहाद या रोमियो-जूलियट कहने लगे तो अपन को दोष मत दीजिएगा। वैसे भी राम और रोमियो नाम में उतना ही साम्य है, जितना लोग हनुमान और हैनिमन में मानते हैं। मुझे अपने मिथक और इतिहास का ज्ञान नहीं है- इसलिए कालीदास जैसे “शेक्सपियर ऑफ संस्कृत” कहलाते हैं, वैसे ही मेरे लिए ये दोनों लैला-मजनू, सीरी-फरहाद या रोमियो-जूलियट! अपने को तो प्रेम की दुनिया में फैलाव दिखाई दे रहा है। राम और सीता हमारे आदर्श हैं और हम उन्हीं के आदर्शों का पालन करेंगे। उन्होने प्रेम किया, हम भी करेंगे। शादी से पहले नजरें- दो-चार हुईं, हम भी करेंगे। शादी के लिए मन्नत मांगी, हम भी मांगेंगे। शादी के लिए स्वयंवर हुआ, हम भी स्वयंवर करेंगे। हम अपनी महान भारतीय संस्कृति की परंपरा के अनुसार ही कर रहे हैं। इसलिए, विश्व और देश के समस्त गुरु, योगी, भोगी! हमें आशीर्वाद दीजिये कि प्रेम के इस पाठ में हम भी सफल हों! बाद में भले राम को सीता का त्याग करना पड़े या सीता को धरती में समाना पड़े। लेकिन अभी तो हम प्रेम के सागर में गोता लगाने जा रहे हैं। गोता लगाने दीजिये-
                  “मेरे पिय में साईं बसत हैं, हिय में बसत है सपना
                  जाए छूट जो घर, मात-पितु, छूटे ना प्रेम का गहना!” 

Friday, February 10, 2017

मियां से झगड़े करने के फायदे*..🌞🌞🌞🌞

बीबियों पर जोक्स आम है यहां बीवी के बदले मियां कर दीजिए और देखिए जोक्स का फन
मियां से झगड़े करने के फायदे*..🌞🌞🌞🌞
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*🌞1. नींद में कोई व्यवधान नहीं आता* : सुन रहे हो क्या,  लाइट बंद करो, पंखा बंद करो, चादर इधर दो, इधर मुह करो, टाइप कुछ भी बाते नहीं होती🌞🌞🌞
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*🌞2. पैसे की बचत* : जब बीवी से झगड़ा हुआ रहता है इस दौरान बीवी पैसे नहीं मांगती,🌞🌞🌞🌞🌞
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*🌞🌞3. तनाव से मुक्ति* : झगड़े के दैरान बातचीत बंद होती है जिससे किचकिच कम होती है और पति तनाव से मुक्त रहता है,🌞🌞🌞🌞
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*🌞4.आत्मनिर्भरता आती है*: जो अपना काम आप कर सकते हैं वो इसलिए नहीं करते कि बीवी कर देती है, झगड़े के बाद वो छोटे मोटे काम (खुद ले कर पानी पीना, नहाने के बाद अपने कपडे खुद निकालना, अपने लिए खुद चाय बनाना) खुद कर के आदमी आत्मनिर्भर हो जाता है,🌞🌞🌞🌞🌞
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*🌞5. काम में व्यवधान नहीं होता* : झगडे के दौरान काम के समय आपको बीवी के फ़ालतू कॉल (जानू क्या कर रहे हो, मन नहीं लग रहा है, आज बहुत गर्मी है, इस प्रकार के) नहीं आते, जिससे आप अपने काम में ध्यान केंद्रित कर सकते है🌞🌞🌞🌞
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*🌞6. घर जल्दी जाने की चिंता से मुक्ति :* ( अधिकांश पतियो को काम के बाद जल्दी घर आने के लिए घर से बारम्बार फ़ोन आते है मगर एक बार झगड़ा हो जाने के बाद आप कुछ दिन तक इस चिंता से दूर रह सकते है,🌞🌞🌞🌞
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*🌞7. आप का मूल्य बढ़ता है* : ये इंसान का मनोविज्ञान है कि जो चीज नहीं होती उसके मूल्य का अहसास तभी होता है, झगडे के दौरान बीवी को आपकी मूल्य का अहसास होता है🌞🌞🌞🌞
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*🌞8. प्यार बढ़ता है* : आपस में झगडे से प्यार बढ़ता है, क्योकि अक्सर देखा गया है एक बार बारिश हो जाए तो मौसम सुहाना हो जाता है..
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और भी फायदे हैं.
मगर समयाभाव के कारण लिखना मुश्किल है.
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तो आइये प्रण लें कि आज के बाद हम सभी पति महीने में एक न एक बार अपनी बीवी से झगड़ा जरूर करेंगे *(बीवी तो हमेशा तैयार रहती है)* ताकि महीने में कुछ दिन पति लोग भी कुछ शांति से गुजार सकें.
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*बेबस पुरुष जाति के हित में जारी.*
😂😂😜😜😂😂😄

विशेष :- झगडा अपनी रिस्क व सामर्थ्य से करे ।

इसके साइड इफेक्ट्स की कोई गारंटी हमारी नही होगी 😂😂😂😂😂😂😂😂

Monday, January 9, 2017

सीमा व ओम

6 जनवरी की सुबह। फॉलो अप के लिए मैं अजय को अस्पताल लेकर जा रही थी। रस्ते में नेट खोला। व्हाट्सएप पर एक मेसेज आया- ओम पुरी का निधन। मैं सकते में आ गयी। अभी कल ही दोपहर में उनकी पत्नी सीमा कपूर से बात हुई थी। सीमा और मैं पिछले कई सालों से दोस्ती के तार में बंधे हुए हैं। नहीं मिलते हैं तो नहीं मिलते हैं। मिलते हैं तो 3-4 घंटे से कम में हमारा कुछ होता-हवाता नहीं। 5 की दोपहर में भी हमारी काफी बातें हुईं। सीमा का सदाबहार चहकता स्वर-"हां जी।"
6 को फिर उनसे बात होनी थी और मैंने दोपहर का समय तय किया हुआ था कि अचानक....! मैंने उन्हें तुरंत फोन लगाया। मोबाईल व्यस्त था। लैंड लाइन लगाया। किसी और की आवाज थी। सीमा को उन्होंने फोन दिया और .....सीमा की आवाज सबकुछ बयां कर रही थी। मैं आवाज की उस कमजोरी को नकारना चाह रही थी। इसलिए तस्दीक की-"जो सुना, सच है क्या?" वे कमजोर आवाज में बोलीं-"हां। सच है।" अब बारी मेरे हाथ-पैर ठंढे पड़ने की थी।
ओम पुरी जी से मेरा कोई सीधा सम्बन्ध नही रहा। उतना ही,जितना किसी प्रशंसक का एक कलाकार के प्रति रहता है। कुल जमा मैं उनसे दो बार मिली थी- पहली बार जब अजय को इन्डियन एक्सप्रेस का अवार्ड मिला था। अजय के लेख को ओम  पुरी जी ने ही प्रस्तुत किया था। एक तो उम्दा लेख और उस पर से उनकी उतनी ही दमदार आवाज़।
दूसरी बार मिली, तकरीबन 6-7 साल पहले, जब सीमा ने उनके जन्मदिन की पार्टी रखी थी। दो-तीन दफे फोन पर सीमा के माध्यम से बातेँ हुईं। उनकी आवाज अपने लिए सुनना और विभा जी का सम्बोधन!
सीमा के माध्यम से ओम जी के बारे में इतनी बातें होती थीं कि ओम जी अब इतने बड़े कलाकार नहीं, अपने जीजा सरीखे लगने लगे थे। सीमा जब उनकी बातें बतातीं, उनके संग साथ हम भी खिलखिला पड़ते।
टूटकर किसी से प्यार कैसे किया जाता है, यह कोई सीमा से पूछे। हिम्मत करके कल गयी। सूनी आँखों से एक ही शब्द बोली- "खत्म" । सीमा के घर में एक बड़ा सा फ्रेम है, जिसमे सभी की तस्वीरें हैं। ओम जी के साथ की भी। ओम जी की सिंगल भी। मैं उस फ्रेम को देख रही थी। सीमा धीरे धीरे खुलती गईं- "अब किससे रूठूंगी?" आँखों में नमी आती गयी, टिशु भीगते गए।
1979 से सीमा ने ओम जी से प्यार किया। वे अक्सर कहतीं- "सब मुझसे यही पूछते कि क्या देखकर मैंने उनसे प्यार किया?" उम्र में बड़े। न पैसा,न नौकरी।" अब मैं क्या कहती! प्यार ये सब देखकर तो किया जाता नहीं।
1990 में सीमा की शादी ओम जी से हुई। सीमा की सादगी और मासूमियत उनके ब्याह की तस्वीर में भी दिख रही थी।
कल उनके घर पर पहुंची, ओम जी की तस्वीर लगी हुई थी। फूल चढ़े हुए थे। धूप अगरबत्ती जल रही थी। सीमा के घर पर हमेशा एक पेट रहती है। पेट से मेरा डर सीमा की पेट "सखी" से ही दूर हुआ। सखी तो अब नहीं रही। दूसरी है। घर के माहौल से गुमसुम वह मेरे घुसते ही मेरे पैरों से लिपट गयी। लग रहा था, सीमा की तरह ही उसे भी सांत्वना के दो बोल चाहिए। उसने मेरे पैरों को चाटा। मैं उसे देर तक सहलाती रही। फिर वह मेरे पैरों से लिपटकर सो गयी।
सीमा अपनी मासूमियत के साथ ही अपने निश्चय की दृढ हैं। अपने दम ख़म पर अपना कैरियर बनाया है। ओम जी के साथ को वह अपने सुकून का बैन मानती रही हैं। जब जब विवादों में वे घिरे, इन्होंने कभी आगे बढ़ कर उसमे पलीता नहीं लगाया। ऐसे समय में वे प्रेस और मीडिया से अलग रही। आज भी कई मीडिया वालों के फोन आए। वे सभी को पूरी शालीनता से मना करती गईं। सीमा इसी में खुश और मस्त थीं कि पुरी साब उनके साथ हैं। उन्हें वे शुरू से "पुरी साब" ही कहकर बुलाती रहीं।
 ओम जी अपने बेटे से बहुत गहरे से जुड़े हुए थे। सीमा बताती हैं कि एक माँ की तरह उन्होंने उसकी परवरिश की है। वे अक्सर पूछते थे, "आप मेरे बेटे से प्यार करेंगी न!" सीमा कहतीं -"मैं तो एक पक्षी से भी प्यार करती हूँ। फ़िर यह तो आपका बेटा है पुरी साब।"
वाकई, मैंने देखा है सीमा को पशु पक्षियों को जान से प्यार करते हुए। एक बार उनके यहाँ कबूतर का एक बच्चा घायल होकर आ गिरा। सीमा ने उसे कई दिनों तक कलेजे से सटाकर रखा। उसकी तीमारदारी की। उसके लिए खिचड़ी बनती। अपने हाथों से उसकी चोंच खोलकर खिलाती। जब वह ठीक हो गया तब एक दिन सीमा ने उसे उड़ा दिया। उसके बाद वे भूल गयी। एक दिन,सीमा बताती हैं कि वह अपनी बिल्डिंग में नीचे उतरी तो देखा कबूतरों का एक दल वहां दाना चुग रहा है। उस कबूतर के बच्चे ने उसे देखा और वहीँ से उसे देख कर जैसे आँखें मटकाता और गर्दन हिलाता रहा।" सीमा ने कहा, ये ही है मेरी पहचान। बिल्डिंग में कोई भी जानवर या पक्षी घायल हो जाए, बच्चे भी उसे उठाकर मेरे पास ले आते हैं।
ओम जी पिछले कई सालों से फिर से सीमा के साथ रहने लगे थे। मैंने देखा था, जितनी देर हम साथ रहते थे, उतनी देर में कई दफे उनके फोन आ जाते थे। फोन खत्म करने के बाद वे खिलखिला पड़तीं। कहतीं - "पता नहीं, ये मेरे बगैर इतने दिन कैसे रह लिए?"
अब सीमा कह रही हैं -"कैसे रहूंगी अब? किससे रूठूंगी? मेरे न खाने पर कौन मुझे डांटकर खिलाएगा?" आज भी जब मैं गयी तब वे कुछ भी नहीं खा रही थीं। उनके छोटे भाई नोनी ने कहा-"दीदी, खा लीजिये, वरना पुरी साब हमें डाँटेंगे।"
जीवन में कभी किसी की भरपाई नहीं हो पाती- न कलाकार की। न इंसान की। ओम पुरी एक कलाकार के रूप में अद्वितीय थे। अपने बाद के दिनों में सीमा के साथ प्यार की सभी सीमाएं तोड़ चले थे। मुझे याद है,एक शाम हमारा सीमा से मिलना तय हुआ। उसके तुरंत बाद शायद पुरी साब सीमा से मॉल चलने के लिए कहने लगे। सीमा ने शायद कहा हो कि मैं आनेवाली हूँ। थोड़ी देर बाद फिर से सीमा का फोन आया। मैने आदतन अपनी रो में कहा -"हाँ जी। रास्ते में हूँ। बस, 10 मिनट में पहुँच रही हूँ।" कि उधर से आवाज आई- "विभा जी। मैं ओम पुरी बोल रहा हूँ। सीमा बता रही हैं कि आप अभी उनके पास आनेवाली हैं। लेकिन, मैं इन्हें अभी मॉल ले जाना चाहता हूँ, अगर आपकी इजाजत हो तो...!"
भला बताइये, मैं कैसे दोनों के बीच में दीवार बनती! । ओम जी कहते रहे,आप एक दिन आइये। हम सब बैठकर खूब बातें करेंगे।
मगर हमारी अपनी बेकार की व्यस्तता। दिन निकलते चले गए और अब तो वे ही चले गए। हमारी मिलने की, बातें करने की ख्वाहिशें ख़्वाब बनकर रह गईं। फिर भी, मुझे मालूम है, पुरी साब कि आप सीमा के दिल में हैं। इसलिए, हमारे भी पास हैं। सीमा के माध्यम से हम मिलते रहेंगे ओम जी। बस, थोड़ा अपना ध्यान धर लेते। थोड़ा और ख्याल कर लेते हमारी सीमा का तो आज हम आपसे हंसी मजाक करते रहते और सुनाते रहते अपने गाली गीत-
"एही मोरा ओम जी के बड़े बड़े आँख रे,
ओही आँखे देखलन सीमा हमर रे,
मारू आँख फोड़ू उनके ईहाँ से भगाऊ रे.....!"
यह प्यार भरा, दुलार भरा, हंसी-मजाक से भरा गीत गाते हुए आपको टीज करना था ओम जी। मुझे यकीं है,आप सीमा की ओर प्यार भरी नज़रों से देखते हुए मुस्कुराते रहते और मैं गाती रहती और उकसाती सीमा को भी कि वे भी गाएं। सीमा बहुत बढ़िया गाती हैं। ज़रूर सीमा गाती-
"हमसफ़र मेरे हमसफ़र,
पंख तुम, परवाज हम,
जिन्दगी का गीत हो तुम,
गीत की आवाज तुम।"###

Sunday, December 25, 2016

बापू! सेहत के लिए ऐसा हानिकर तू हमेशा बना रह!

जब मैं कोई अच्छी फिल्म या अच्छा नाटक देखती हूं या कोई अच्छी कहानी पढ़ती या कोई अच्छा गीत सुनती हूँ तो उससे मुझे बहुत खुशी मिलती है । मेरा सारा दिन प्रफुल्लित रहता है।  मैं चार्ज महसूस करती हूं और बहुत सी ऊर्जाएं, बहुत सी भावनाएं मेरे अंदर कुलबुलाने लगती हैं । आज आमिर खान की 'दंगल' फिल्म देखी । स्पोर्ट्स पर बनी फिल्में वैसे भी मुझे बहुत आकर्षित करती हैं । उनमें जीवन होता है । जूझने की प्रवृति होती है और ऊर्जा होती है । मुझे यह सारी चीजे बेहद पसंद है। मैंने अपने जीवन में शायद सबसे पहली फिल्म sports पर बांग्ला में देखी थी कोलकाता में शायद 1985 या 1986 में । 'कोनी' नाम से यह एक स्विमर लड़की की कहानी थी और जैसा कि फिल्म में होता है संघर्ष, जुझारूपन और उन सब के बाद मिली सफलता। दंगल भी कुछ इन्हीं बातों को लेकर चलती है । लेकिन यह एक अलग किस्म की फिल्म मुझे लगी । वो इसलिए कि मैं फिल्म देखते हुए यह लगातार सोच रही थी कि यह वही हरियाणा है जो लड़कियों के मामले में बहुत बदनाम सा है । कहा जाता है कि यहां लड़कियों के ऊपर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है - न उनकी पढ़ाई लिखाई पर ना उनके व्यक्तित्व विकास पर। उन्हें प्रेम की भी आजादी नहीं है । लड़कियों को जन्मते ही या पेट में ही मार दिया जाता है । ऐसे माहौल में कोई एक पिता अपनी बेटियों को आगे बढ़ाने के लिए इस हद तक जा सकता है, यह अपने आप में बहुत रोमांचित करता है और यह बताता है कि अगर घर के लोग और खास करके घर का पुरुष  चाहे तो अपने परिवार में, अपनी जिंदगी में और खास तौर से अपनी बेटियों की जिंदगी में बहुत बदलाव ला सकता है । मैं फिल्म के किसी भी और दूसरे पहलू पर नहीं जा रही, बस एक मनोविज्ञान को पकड़ने की कोशिश कर रही हूं । एक पिता जो खुद नहीं बन पाया, उसकी इच्छा कुलबुलाती रहती है और यह एक बहुत स्वाभाविक इच्छा है । हर माता-पिता के मन में होता है कि जो वे नहीं बन पाए,  उसे अपनी संतान में देखना चाहते हैं। कई बार परंपरागत रिवाज़ों के तहत यह सोच लिया जाता है कि लड़कियां इन कामों के लायक नहीं है। दंगल के पिता के मन में भी यही बात है । लेकिन अपनी धारणा वह बदलता है।  फिल्म ने एक और नई चमक लड़कियों के प्रति पैदा की है कि लड़कियां सब कुछ कर सकती हैं और यह फिल्म के एक संवाद में भी था जहां पिता कहते हैं कि तुम्हारी आज की जीत केवल तुम्हारी नहीं है केवल देश की नहीं है बल्कि हजारों लाखों लड़कियों की जीत है । यह एक जीवन राग है। लड़कियों के लिए संदेश तो है ही, लड़कियों से ज्यादा उनके माता पिता के लिए संदेश है और आज के समय में जबकि हम नंबर और परसेंट के गेम में उलझे हुए हैं हम बच्चों को बस 3 साल 4 साल 5 साल की प्रोफेशनल पढ़ाई करवा कर उन्हें कंपनी में दे कर यह संतोष कर लेते हैं कि बच्चे हमारे कमा रहे हैं और बच्चे 16 -16 18 -18 घंटे वहां अपनी सारी ऊर्जा देकर और 10 साल में बिल्कुल चुक से जा रहे हैं, वहां ऐसी फिल्में और ऐसी सोच एक सहारा देती है कि नहीं, जीवन में काम करने के और भी अलग-अलग क्षेत्र हैं, जहां बच्चे हमारे कुछ कर सकते हैं ।जरूरत सिर्फ इतनी हैं कि माता पिता बच्चों को आगे बढ़ने दें, खास तौर से लड़कियों को । हमारा समाज पुरुष प्रधान समाज है । मैं उन पुरूषों का बहुत सम्मान करती हूं, जो अपने घर के प्रत्येक सदस्य को एक व्यक्ति के रूप में देखते हैं और उसकी इच्छा का सम्मान करते हैं । कहा जा सकता है कि इस फिल्म में पिता अपनी इच्छा बेटियों पर लादता है उससे बड़ी मेहनत करवाता है बड़े-बड़े टास्क करवाता है। बच्चियां इन सबसे कंटाल जाती हैं और एक समय आता है कि ना करने के अलग अलग बहाने रचती हैं । लेकिन उसी की एक दोस्त जब उन्हें यह समझाती है कि तुझे तुम लोगों को तुम्हारे पिता अपनी संतान समझ रहे हैं । यहां तो हमें लड़कियों को लड़की ही समझा जाता है उसके आगे कुछ समझा ही नहीं जाता तो ऐसे में एक विश्वास उभर कर आता है कि घर में पिता या भाई अगर चाहे तो अपने घर की महिलाओं की लड़कियों की तकदीर बदल सकते हैं। हमारे हर घर में गीता और बबीता है । बस हर घर में ऐसे महावीर सिंह फौगाट होने चाहिए। जिस दिन हर घर में ऐसे ऐसे फोगाट होने लगेंगे,ऐसी ऐसी गीता और बबीता हर क्षेत्र में होती रहेंगी। एक बहुत अच्छी फिल्म देख पाने के सुख, सुकून और आनंद से भरी हुई हूं। 

Thursday, December 15, 2016

“प्रियतमा” और “प्रेतात्मा”- पति-पत्नी के जोक्स का उल्टा-पुल्टा रूप-30


“प्रियतमा” और “प्रेतात्मा”

"हिन्दी विषय में शुरू से ही कमजोर रहा हूँ। आज गड़बड़ कुछ ज्यादा हो गई। बीबी को मेसेज भेज रहा था। “प्रियतमा” की जगह “प्रेतात्मा” सेंड  हो गया। .....तब से भूखा-प्यासा बैठा हूँ। चाय तक नहीं दी है पीने को।"

पत्नियों पर जोक्स चलते ही रहते हैं। सभी जी खोलकर उनका आनद लेते हैं। छम्मकछल्लो इन्हें ज़रा सा उलट पलट कर पत्नी के बदले पति कर देती है। आनंद कितना बढ़ जाता है, आप बताएं। शेयर करें। कॉमेंट करें। ये रहा ऊपारवाले जोक्स का उलटा रूप-

"हिन्दी विषय में शुरू से ही कमजोर रही हूँ। आज गड़बड़ कुछ ज्यादा हो गई। पति को मेसेज भेज रही थी। “प्रियतम की जगह “प्रेतात्म” सेंड हो गया। .....तब से भूखी –प्यासी बैठी हूँ। चाय तक नहीं पीने दी है ।" ###

Wednesday, October 19, 2016

स्वभाव से अच्छे- पति पत्नी के जोक्स का उलटा पुलटा रूप-29

 आज करवा चौथ का व्रत है। हर वार मुझे इस दिन यशपाल की कहानी 'करवा का व्रत" याद आती है। वह कहानी तो नहीं, हाँ,पति पत्नी के जोक्स का उलटा पुलटा रूप छम्मकछल्लो दे रही है। हर बार की तरह, सम्मान लेने के लिए सम्मान दें। शेयर करें। विचार दें।

एक महिला अपनी सहेली से

कल दिन भर नेट ही नहीं चला

सहेली : ओह !! फिर तूने क्या किया

कुछ नहीं क्या करती दिन भर पति से बातें कर के निकाला ।
"अच्छा आदमी लगा रे स्वाभाव से" ###

अब इसका दूसरा रूप-

एक पुरुष अपने दोस्त से-

कल दिन भर नेट ही नहीं चला

दोस्त : ओह !! फिर तूने क्या किया

कुछ नहीं क्या करता! दिन भर पत्नी से बातें कर के निकाला ।
"अच्छा आदमी लगी रे स्वभाव से"##

स्वभाव की इस मिठास को पकड़िये और पति पत्नी के जोक्स से मुक्ति पाइए।