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chhammakchhallo kahis

Thursday, January 3, 2013

हमारा टुन्‍नू

'शुक्रवार' पत्रिका के 3 जनवरी, 2013 के अंक में छपी यह कहानी पढ़ें और अपनी राय दें।  
हे आनंदघन!
      बहुत दिनों से आपके बारे में सोच रहे हैं- तमाम ख्‍यालातों से लबरेज. सोचना शब्‍द कुछ अजीब और बेमानी सा लग रहा है। तय नहीं कर पा रहे कि हम आखिरकार आपके बारे में सोच क्‍यों रहे हैं?  मगर फूल की ख़ुशबू या कीचड की बदबू की तरह आप हमारे दिल-दिमाग में आए चले जा रहे हैं और मन में सोच के कई-कई दाग़ चस्‍पां किए जा रहे हैं।
      हे आनंदघन! विश्‍वास कीजिए, हम आपको बहुत चाहते हैं। इसे कहने की जरूरत भी नहीं है। इसका गुमान आपको है। आप जब-तब इसके बाबत कहते भी रहे हैं। तबसे, जब मुफलिसी और संघर्ष, जिसे आपकी ज़बान में स्ट्रगल कहा जाता है, की झांइयों से गुज़र रहे थे। हम जैसों के और आपके स्ट्रगल में बहुत अंतर होता है। हम स्ट्रगल करते हैं एक अदना सी नौकरी पा लेने के लिए, जिससे कि हमारी दाल-रोटी ठीक-ठाक चल जाए, एक अच्‍छे लड़के या लड़की से शादी हो जाए, हमारे बाल-बच्‍चे ठीक-ठाक स्‍कूल में पढ़ लें और वे भी एक ठीक-ठाक सी नौकरी पा लें, जिसे हम अपनी जबान में कैरियर बना लेना कहते हैं। उसके बाद तो जिंदगी अपनी रफ्तार में चलती रहती है - एकरस।
आपके स्‍पेस के आगे तो यह कुछ है ही नहीं। आपके जीवन का स्ट्रगल हमलोगों से कहीं ज्‍यादा है। हम एक नौकरी में लग जाते हैं और वहीं रहना हमारी नियति हो जाती है। बहुत से बहुत, दो-चार नौकरियां बदल लेते हैं, ताकि जीवन में कुछ हजार रुपए महीने की आमद बढ़ जाए। आप लोगों का स्ट्रगल तो हर पल का है। हमारी तो बस नौकरी की राजनीति चलती रहती है, जो अपने ही दफ्तर तक महदूद रहती है। आपको तो हर पल पूरी दुनिया के फलक पर बने रहना होता है। किसी दिन आपकी तस्‍वीर अखबारों में ना आए तो शायद आपको खालीपन लगे, हमलोगों की तो जिंदगी में अखबार केवल पढने तक ही रहता है और तस्‍वीर अपने घर के अलबम या शो-केस तक। यह भी सच है कि आप जैसा स्‍ट्रगल हमारे बस की बात नहीं। हम सैल्‍यूट करते हैं आपकी इस लगन और ऊर्जा को। हर दिन चढता सूरज बने रहने का दवाब- लोगों का दवाब, मीडिया का दवाब, काम का दवाब, बाजार में खुद को बनाए रखने का दबाव, अपने से पहले की पीढ़ी, फिर अपनी, फिर अपने बाद की, फिर उसके भी बाद की पीढ़ी का दवाब और इन सबके बीच खुद को सफलतम बना कर चलते रहने का दबाव। सलाम है आपको हे आनंदघन! सौ-सौ बार सलाम- आपकी जिजीविषा को, आपके महानायकत्‍व को।
      इसी बात का तो कायल है हमारा टुन्‍नू! आपका दीवाना हमारा टुन्‍नू...! महज़ नौ साल का! पढ़ने का बेहद शौकीन! इस उम्र में, जब बच्‍चे हैरी पॉटर और टॉम एंड डिक में लगे होते हैं, हमारा टुन्‍नू आपकी सारी मोटी-मोटी जीवनियां पढ़ गया। अपने जन्मदिन पर उसने ये किताबें ही तो हमसे गिफ्ट में मांगी. कितने तो पोस्‍टर चिपका रखे हैं उसने अपने कमरे में। हां आनंदघन! अपनी कमाई से हम उसे आठ बाई दस का एक कमरा ही दे पाए, जिसमें बैठकर वह अपने बारे में सोच -समझ सके। उसे उसकी ज़िन्दगी में अपनी एक स्‍पेस दिलाने की एक नन्‍हीं सी कोशिश हमारी।
इतनी छोटी उम्र में ही कहता, 'पापा! विदाउट स्‍ट्रगल, नो लाइफ!' अब क्‍या कहें कि तकदीर ने उसके साथ-साथ हमारे माथे पर भी नॉन-स्टॉप स्‍ट्रगल लिख दिया। इस स्‍ट्रगल में आगे बढ़ने का उछाह या कुछ पा लेने की खुशी नहीं, दुख की गहराती सांझ का काला धुआं और दिल-दिमाग पर पल-पल तारी होते भय का ख़ौफनाक़ साया था। भय से बुरी तरह जकडे हुए हम। जिस सूक्ष्‍म और अदृश्‍य स्‍पेस की हम बात कर रहे हैं, उसे केवल महसूस भर कर पा रहे थे। स्‍थूल और दृश्‍यमान था- अपने टुन्नू को कृष्ण पक्ष के चांद की तरह तिल-तिल घटता देखना। हे आनंदघन! एक आम आदमी की तकलीफ की बयानबाजी हम यहां नहीं कर रहे. निश्चित रूप से आप आम आदमी नहीं हैं और आम और खास पर ख्‍याल- विचार करने के लिए हम यहां नहीं बैठे हैं। यह अपनी-अपनी नियति है। आपकी- खास होने की, हमारी आम बने रहने की।
      सुनहले-रूपहले पर्दे के अलावा जीवंत रूप में, अपनी आंखों से हमने आपको पहली बार देखा। जगह खुशनुमा नहीं कही जा सकती। हम दोनों ही अपने-अपने कारणों से वहां थे। वहां का प्रशासन अफरा-तफरी में आ गया था। सुरक्षा घेरा तैयार था। एक लिफ्ट रोकी जा चुकी थी। आपकी कार के रूकने के पहले ही आपके सुरक्षाकर्मी अपनी-अपनी चलती कार से उतर आए आपको कवच देने। आपके ड्राइवर ने भी उतनी ही तत्‍परता से उतरते हुए लपककर आपकी तरफ का दरवाजा खोला और आप जब अपनी गाड़ी से निकले तो पूरी जनता एक तुमुल ध्‍‍वनि कर ही बैठी, बावजूद इसके कि वह एक अस्‍पताल था और सभी अपने-अपने मरीजों के लिए वहां हलकान-परेशान थे।
      हमने देखा हे आनंदघन, कि लोग-बाग काई की तरह अपने-आप दो किनारों में छंटते चले गए और आप दरिया के पानी की तरह आगे बढ़ते चले गए। हमारी बगल से जब आप गुजरे तो हमारे पूरे बदन में एक सनसनाता रोमांच भर आया। आप हमारे इतने करीब से होकर गुजर सकते हैं, हमने तो इसकी कल्‍पना तक नहीं की थी। अस्‍पताल का पूरा जन सैलाब आपको देखे जा रहा था। हम भी इसी सैलाब के एक विन्‍दु भर थे। यह विंदु हमारी नियति थी।
कहने की बात है कि प्रारब्‍ध लिखकर आता है। सच्‍चाई तो यह है कि अपनी इच्‍छा, लगन, दृढ़ शक्ति, समर्पण और प्रतिबद्धता के बल पर हम उसे लिखते हैं। आपने अपना प्रारब्‍ध खुद लिखा था, जभी तो आपने अपनी लगी-लगाई नौकरी छोड़कर चौपाटी की रेत फांकना मंज़ूर किया, जबकि हम अपनी उसी नौकरी में बने रहने, उसी को पकड़े रहने में अपने-आपको होम करते आए हैं। एक खास और एक आम आदमी में यही तो फर्क होता है न हे आनंदघन!
      आपके सम्‍मोहन में जकड़ी पूरी जनता पत्‍थर की तरह जड़ और निस्‍पंद थी. हम भी भूल गए कि हम यहां अपने प्‍यारे टुन्‍नू के लिए आए हैं. उस मासूम पक्षी के लिए, जिसने अभी अपने पंख पसारे भी नहीं हैं। अभी तो उसकी नर्सरी राइम की तुतलाती आवाज हम भूले भी नहीं हैं। अभी वह पांचवीं क्‍लास में आ गया है.हर रोज़ कभी अपनी तो कभी अपने दोस्तों की शरारतें बयान करता है. इंटेलिजेंट भी बहुत है. हम तो अपने मोबाइल पर फोन करने या मेसेज भेजने तक ही महदूद रह जाते हैं, वह तो घर के सारे गैजेट्स हैंडल करने में माहिर है. क्रिकेट का तो वह दीवाना है, मेरी तरह. क्रिकेट का पूरा इतिहास उसे ज़बानी याद है. वैसे ही आपके बारे में हर बात उसकी ज़बान पर होती है. कभी- कभी तो हमें हैरानी होती कि आप उससे तीन पीढी ऊपर के हैं. दूसरे बच्चों के आनंदघन दूसरे हैं, लेकिन, उसकी जान आप में ही क्यों बसती है, इसका जवाब शायद आपके पास भी नहीं हो.
      मेरे छेड़ने पर वह कभी-कभी बड़ा वाइल्‍ड हो जाता है, कभी-कभी नाराज भी -'पापा, प्‍लीज डोंट टेल एनीथिंग निगेटिव अबाउट हिम.ही इज माई गॉड,माई आइकन, माई इंसपिरेशन, एवेरीथिंग! आई लव हिम वेरी मच।‘उसे खुश करने के लिए हमें शहर की सबसे महंगी आईस्‍क्रीम उसे खिलानी पडती.
       टुन्नू के घर-बाहर की दुनियां रंग-बिरंगे फूलों की माला जैसी है। अपनी दुनिया में वह उस चूजे की तरह है, जिसने अभी अपनी आंखें भी नहीं खोली है। उसी नन्‍हें, नाजुक, कोमल, प्‍यारे, दुलारे टुन्‍नू पर रोग के दानव ने ऐसा धावा बोला कि हमारे पैरों तले की सारी जमीन खिसक गई। चांद की तरह ही टुन्‍नू को रोज तिल-तिल घटना देखने को अभिशप्‍त हम।
       आप लिफ्ट से खटाखट ऊपर चले गए। लिफ्ट बंद होने और उसके ऊपर तक जाने, छठे माले पर उसके रुकने के कारण छह नंबर पर हो रही टिमटिमाहट को देखने और उसके बाद आई खाली लिफ्ट को देखने तक लोग-बाग चित्र की तरह स्थिर खड़े रहे। बाद में वे झुंड में बिखर अपने-अपने स्‍वजनों से बातें करने लगे। अपने-अपने मरीजों की हालत पर बहस करने लगे। डॉक्‍टर क्‍या कह रहा है, इसकी पड़ताल करने लगे। मुफ्त के सलाहकर्ता अपने अमूल्‍य सुझाव से लोगों को धन्‍य-धन्‍य करने लगे। लेकिन इन सबके बीच भी वे उत्तेजित आवाज़ में अपने लोगों को फोन कर-कर के बताने लगे कि उन लोगों ने आपको देखा है- यहां, एकदम अपने पास से गुजरते हुए.
हम तो टुन्‍नू के लिए दवाई लेने निकले थे। हमें उसका ख्‍याल आया भी था, जिसे एक पल के लिए मैंने परे कर दिया था। अचानक से मुझे कुछ सूझा और लपक कर मैं दवाई की दुकान पर गया। वहां मैं इस तरह से जल्‍दी मचाने लगा, जैसे टुन्‍नू को अभी के अभी दवा अगर न मिली तो उसे कुछ हो जाएगा।
      दवा लेकर मैं भागा-भागा टुन्‍नू के बेड पर पहुंचा। उसकी मां को दवा पकड़ाई. उत्तेजना से मेरी सांसें फूल रही थीं। टुन्‍नू की मां घबड़ा गई। मैंने उसे आश्‍वस्‍त करते हुए आपके बारे में बताया। टुन्‍नू बोला - 'पापा मुझे भी उन्‍हें देखना है।'
      'पर कैसे? तुम्‍हें तो...'
      'आप उन्हें यहां ले आइए। बोलिए कि मेरा बेटा बस मरने...'
कैसा लगता है आनंदघन अपने छोटे से बच्‍चे के मुंह से यह सुनकर? आजकल के बच्‍चे! हमारे और डॉक्‍टर के न बताने के बावजूद उसे पता चल गया कि उसका ब्‍लड कैंसर अंतिम स्‍टेज पर है। शायद डॉक्टरों के गंभीर चेहरों से निकलीं बातों का फीकापन, उनकी खोखली मुस्‍कान और बस थपथपाने भर के लिए थपथपाते उसके कंधे या माथा या बदन का कोई भी हिस्‍सा उसे सबकुछ बता देता होगा.
      कल ही तो टुन्‍नू ने डॉक्‍टर का हाथ पकड़ लिया -'अंकल, प्‍लीज लेट मी नो, हाऊ मेनी डेज आई हैव विद मी।'
डॉक्‍टर को टुन्‍नू जैसी छोटी उम्र के बच्‍चे से शायद ऐसे सवाल की उम्‍मीद नहीं थी। वे ड़बड़ा गए। तुरंत दिलासे के मूड में आए और जल्‍द ही सूफी बन गए- 'गॉड इज ग्रेट।'
      मेरे लिए तो आप ही ग्रेट हैं, हे आनंदघन! महान, बहुत महान। हमें मालूम है, यह महानता आपने एक दिन में हासिल नहीं की है। वर्षों के संघर्ष, साधना, तपस्‍या का फल है यह। हां, साथ में हम जैसे मुरीदों के प्‍यार, मोहब्‍बत और दीवानगी का भी इसमें हाथ है. आप भी तो कहते रहे हैं कि यह हमलोगों के प्यार का ही फल है। तो क्या इसे झूठ मान लिया जाए हे आनंदघन?
      लोग कितने बेचैन हुए थे, मन्‍नतें मानी थीं, पूजा-पाठ किए थे आपके जीवन के लिए। 23 दिनों तक मौत के साथ आपकी लुका-छिपी चलती रही और अन्‍तत: हम जीते, हमारा विश्वास जीता, हमारी प्रार्थना जीती। हां आनंदघन! आपके जीवन के लिए प्रार्थना करनेवालों में एक अदना मैं भी था। ऊपरवाले ने हमारी प्रार्थना सुन ली। आप जब स्‍वस्‍थ होकर अस्‍पताल से बाहर निकले, तब मैंने भी हनुमान मंदिर में ग्यारह रुपए के लड्डू चढ़ाए और ग्यारह बार हनुमान चालीसा पढ़ा।
मगर आज अपने ही टुन्नू के लिए हमारी सारी प्रार्थनाएं निष्‍फल जा रही थीं आनंदघन! उस दिन टुन्‍नू ने बहुत इसरार किया। वह अपने बेड पर अकेले रहने को भी तैयार हो गया, ताकि मैं आपको उसके पास ले आऊं और वह आपसे मिल सके। उसकी हर इच्छा पूरी करना ही जैसे हमारा ध्येय बन गया था. उसके इसरार को देखते हुए हम दोनों नीचे लाउंज में आए। टुन्‍नू को उसकी मम्‍मी ने अपना मो‍बाइल दे दिया कि कुछ भी होने पर वह तुरंत हमें कॉल करे। मुझे मालूम था कि वह हमें फोन नहीं करेगा। कहीं उसने फोन किया, हम ऊपर आ गए और इसी बीच आप निकल गए तो?.... मैंने कहा न, वह बड़ा समझदार बच्‍चा है। हम बेचैन थे। हमें तो यह भी नहीं पता था कि आप यहां किसे देखने के लिए आए हैं? नीचे, लिफ्ट के पास खड़े सिक्‍यूरिटी गार्ड से पूछने पर पता चला कि आपकी माता जी यहां भर्ती हैं।
साइंस स्‍टूडेंट होने के बावजूद साहित्‍य में मेरी रुचि थी। रुचिरा, मेरी पत्‍नी, धड़ाधड़ आपकी माता जी की सारी कविताएं, कहानियां, लेख मुझे सुनाने लगी। एक बार वे उसके कॉलेज में भी आई थीं. सारी घटना का वह बखान करने लगी. वह भूल गई कि वह यहां नीचे आपसे मिलने आई है, अपना आंचल आपके पैरों तले पसारने आई है, उसके इकलौते बेटे की सांस डोर खिंचते-खिंचते एकदम पतली हो गई है और किसी भी समय टूट सकती है, यह बताने आई है। वह चाह रही है, वही क्‍या हम दोनों चाह रहे हैं कि उसकी सांस की डोर मजबूत हो जाए, इतनी कि मजबूत से मजबूत आंधी में भी उसके पैर जमीन पर जमे रहें। हर मां-बाप चाहेगा।
      लॉबी में खड़े-खड़े हम कई बार सिक्‍यूरिटी गार्ड से पूछ चुके थे कि आप इसी रास्‍ते से जाएंगे या कोई अन्‍य रास्‍ता भी है वीआईपीज के लिए? सिक्‍यूरिटी गार्ड ने आश्‍वस्‍त किया- यही रास्‍ता है, सभी इसी से आते-जाते हैं। रुचिरा बार-बार टुन्‍नू को फोन कर ले रही थी। टुन्‍नू भी बीच-बीच में फोन कर रहा था -'आए? दिखे?'
अंतत: आप दिखे। दो घंटे की हमारी साधना सफल हुई। तमाम सुरक्षा घेरों को चीरता मैं आगे बढ़ा कि रुचिरा ने मुझे रोक लिया -'मैं जाती हूं। आप पर सिक्‍यूरिटीवाले शायद कुछ शक करें। मैं औरत हूं, लेस हार्मफुल।" ऐसे संकट में भी उसके सेंस ऑफ ह्यूमर पर मेरी मुस्‍कान छूट गई।
'सर!' वह लपकी- इतनी तेजी से कि सिक्‍यूरिटीवाले भी उसे नहीं रोक पाए - 'सर! आपसे एक रिक्‍वेस्‍ट है। मेरा नौ साल का बेटा इसी अस्‍पताल में है। अंतिम सांसें... आपका बहुत बड़ा फैन है। एक बार उससे मिल लें प्‍लीज! उसे फिर से जीवन मिल जाएगा, सर। प्‍लीज सर! प्‍लीज!' एक ही सांस में वह इतनी तेज़ी से बोल गई कि हांफने लगी. उसके भीतर की सारी करुणा उसके चेहरे पर चिपक आई. हांफती सांसों के बीच भी उसकी एक सांस आपके रेस्पॉंस की राह में ऊपर ही ऊपर अटकी हुई थी.
      हे आनंदघन! आपके सूफियाना दर्शन में शायद यह बात आई होगी कि जीवन और मृत्‍यु तो विधाता देता है, आप कहां से दे या ले सकते हैं? आप सही हैं आनंदघन! जीवन और मृत्‍यु विधाता देता है, मगर जीवन की लौ घटाने-बढ़ाने में बहुत से कारक असरकारी होते हैं। आप भी उनमें से एक हैं आनंदघन! आपमें कितना असर है, आप भी जानते हैं। आपके विज्ञापन से देश की जनता उस ब्रांड का इस्‍तेमाल करने लगती है। आपके सरकारी आग्रह पर देश की माताएं अपने बच्‍चों को लेकर हेल्‍थ सेंटर्स पहुंच जाती हैं। आपके अभिनय और स्‍फूर्ति को देखकर बूढ़े होते जा रहे लोग फिर से अपने भीतर नई हरकत और चेतना महसूस करने लगते हैं। यस सर! यह है हम साधारण जनता पर आपका असर तो क्‍या मौत के मुंह में जा रहे एक बच्‍चे की सांस पर आपके विजिट का असर नहीं पड़ता?
अवश्‍य पड़ता। यह हमारा विश्‍वास है। विश्‍वास से पर्वत हिल सकता है तो विश्‍वास से मौत के भागते आ रहे पांव भी कुछ ही देर के लिए सही, रूक जाते, तनिक धीमे पड़ जाते। हर कोई अपने प्रिय के प्रति उतना ही साकांक्ष होता है, जैसे आप अपनी मां के लिए थे। बुरा ना मानें, आप एक जाती हुई पीढ़ी की थकी, बूढ़ी हड्डियों को देख रहे थे, उसमें जीवन के संचार का अथक प्रयास कर रहे थे और हम आज की कली को कल के फूल के रूप में खिलते देखना चाह रहे थे।
क्‍या हो जाता आनंदघन! यदि आप एक बार हमारे टुन्‍नू को देख लेते? रुचिरा तो बिछ गई आपके पैरों पर. वह मुझसे ज्‍यादा प्रैक्टिकल है, फिर भी मां है और कोई भी मां अपने बच्‍चे के जीवन के लिए कुछ भी कर सकती है। वह जल्‍दी-जल्‍दी बता रही थी कि हमारा टुन्‍नू किस कदर आपका दीवाना है कि आपको वह कभी नाम से नहीं बुलाता, हमेशा नाम के आगे अंकल लगाता है कि उसके पास आपकी तस्‍वीरों के ढेर सारे कटिंग्‍स हैं कि आपकी सभी फिल्‍मों की डीवीडी उसके पास है। सोचिए न आनंदघन कि आज का बच्‍चा आज की पीढ़ी के नायकों के बदले हमारी भी एक पीढ़ी पहले के नायक के प्रति इस कदर दीवाना है।
हमारे बच्चे के प्रेम ने हमें आपके पैरों पर झुकने को मजबूर कर दिया आनंदघन! रुचिरा आपकी तेज कदम से हमकदम होती उतनी ही जल्‍दी-जल्‍दी टुन्‍नू की हालत बयां कर रही थी। मैं भी पीछे-पीछे भाग रहा था। रुचिरा की आवाज आ रही थी- 'सर, एक बार मेरे बच्‍चे से मिल लीजिए। उसे जीवन की चन्‍द सांसें और मिल जाएंगी। एक बार सर, बस एक बार!'
शायद कोई और मौका होता तो मैं उसे खींच लेता। डांटता भी। इस तरह किसी से भीख मांगने का मतलब? माना कि हम आम आदमी की श्रेणी में आते हैं तो क्‍या आम आदमी की कोई इज्‍जत नहीं? और मैं तो एक आम आदमी में ही तनिक सा ऊंचा तो हूं ही। मैं भी एक प्रतिष्ठित कंपनी का जनरल मैनेजर हूं। मेरे पास भी शोफर ड्रिवेन कार है, केबिन है. चपरासी मुझे भी झुककर सलाम करता है, मेरे एक इशारे पर मेरे सौ कर्मी हाथ बांधे खड़े हो जाते हैं। और यही पोजीशन रुचिरा की भी है। वह भी एक बडे संस्‍थान में डायरेक्‍टर है।
      मगर यहां हम दोनों केवल और केवल मां-बाप थे, अपने बच्‍चे की ममता में बंधे. यह वही ममता थी जो हमसे भीख मँगवा रही थी। रुचिरा कहती जा रही थी, 'सर प्‍लीज सर, एक बार सर! एक मिनट के लिए सर!'
      दो घंटे तक टुन्‍नू को अकेला छोड़ने और आपके अपनी गाड़ी में बैठकर चले जाने के बाद हम बेहद थकान महसूस करने लगे। नहीं, यह थकान नहीं थी। यह थी निराशा से उपजी पीड़ा। हमारे पैर मनो भारी हो रहे थे। नजरें झुकी हुई थीं। हम एक-दूसरे से नजरें चुरा रहे थे। क्‍या कहेंगे हम टुन्‍नू से? क्या बीतेगी उसपर, जब वह हमें अकेला देखेगा?
टुन्‍नू का फोन बज उठा। रुचिरा ने मुझे देखा, मैंने उसे। कैसे उसका कॉल रिसीव करूं, कैसे बात करूं, क्‍या कहूं? मेरी समझ में कुछ नहीं आया। मैंने फोन रुचिरा की ओर बढ़ा दिया। रुचिरा ने पल भर मुझे देखा, फिर बोली - 'हां, हां, हम अभी लिफ्ट में हैं। आवाज सुनाई नहीं दे रही। आने पर बात करती हूं।' कितनी कुशलता से रुचिरा संकट को संभाल लेती है! हम लॉबी में थे और वह लिफ्ट में होने की बात कर रही थी। हमसे यह झूठ बुलवाने का अपराध तो आपके मत्‍थे चढ़ ही गया न हे आनंदघन!
      हमने बाद में अखबारों से जाना कि आपकी माता जी को अस्‍पताल से छुट्टी मिल गई। छुट्टी तो हमारे टुन्‍नू को भी मिल गई आनंदघन! अस्‍पताल से छुट्टी के बाद आप उनको घर ले गए। अखबारों से ही पता लगा कि जब भी आप शहर में होते हैं, उनकी खूब सेवा करते हैं। दो-तीन घंटे उनके साथ जरूर बिताते हैं। कितनी खुशनसीब हैं आपकी मां हे आनंदघन!
      हम नहीं हुए वैसे खुशनसीब। क्या करें! हम दोनों के साथ आपको न देख टुन्‍नू का चेहरा उतर गया। बात फिर से रुचिरा ने ही संभाली- 'बेटा, यू नो, वो आने के लिए एकदम तैयार थे। लेकिन उनका अर्जेंट शूट था सो... तुम तो यहां का ट्रैफिक जानते ही हो ना? तुम्‍हें ढेर सारी ब्‍लेसिंग्‍स देकर गए हैं। कहा है कि तुम जल्‍दी ठीक हो जाओगे, यस! बिलीव मी।' टुन्‍नू हल्‍के से मुस्‍कुराया। रुचिरा एकदम से चुप हो गई। उसके झूठ की पोल टुन्‍नू की मुस्‍कान ने खोल दी।
उसी रात टुन्‍नू की तबीयत बिगड़ी, और बिगड़ी और बिगड़ी... डॉक्‍टरों की भीड़ लग गई, दवाओं, सुइयों के अम्‍बार लग गए, हम और रुचिरा सांस रोके सब देखते रहे और टुन्‍नू...। हम उसे घर नहीं ले जा सके। हमें श्मसान जाना पड़ा। कितनी भारी होती है पिता के कन्‍धे पर उसके बच्‍चे की अर्थी! क्या आप समझ सकते हैं हे आनंदघन!
      हम आज भी जीवित हैं आनंदघन! टुन्‍नू की यादों को अपने भीतर संजोकर। ऐसा कि हम उसके लिए कभी पास्‍ट टेंस का इस्‍तेमाल नहीं करते। पर, आपके लिए करते हैं। आपके होर्डिंग्‍स अब हममें तेज नफरत भरते हैं। टीवी पर आपके या आपके विज्ञापन या कार्यक्रम आने पर रुचिरा या तो उसे बंद कर देती है या किचन में चली जाती है। हम अपनी नजरें उधर से फेर लेते हैं। अब हम आपके गीत नहीं सुनते। अखबारों में आप पर छपी खबरें नहीं पढ़ते। यह है हमारे विरोध का एक नपुंसक तरीका । हमें मालूम है, इससे कुछ नहीं होनेवाला। लेकिन, हम इससे अधिक और कर भी क्‍या सकते हैं हे आनंदघन! एक बात और करते हैं- आपका जिक्र आने पर खुले आम कहते हैं -'आई हेट यू, आई हेट यू।' नहीं कर सके हैं तो इतना कि टुन्‍नू के सामान से आपको बाहर नहीं फेंक सके हैं। आखिर, वह हमारे टुन्‍नू की सहेजी हुई चीज है न! कैसे फेंक दें भला! बताए तो आनंदघन!! हे आनंदघन!!! ####


Saturday, December 29, 2012

पैदा करना बेटियों को है रेयरेस्ट ऑफ रेयर जुर्म!


आज भी लोग बलात्कार के लिए ठहरा रहे हैं लड़कियों को दोषी।
कोई उनकी नज़रों को
कोई छोटे, खुले, तंग कपड़ों को
कोई घूँघट को,
कोई पर्दे को,
कोई साड़ी को,
कोई बिकनी को,
कोई दोस्ती को,
कोई प्यार को,
कोई उनके खुले व्यवहार को,
कोई उनके बंद जकड़न को,
कोई मोबाइल को
कोई नेट को।
अब हम थक गए हैं अपने लिए बचाव करते-कराते।
अब हम भी मानते हैं, हम हैं सबसे दोषी।
हे इस समाज के इतने महान विचारक,
नियामक
एक ही उपाय कर दें आपलोग,
निकाल दें ऐसा कानून,
जुर्म है बेटियों का पैदा होना,
उससे भी बड़ा जुर्म है उसके माँ-बाप का
उसे धरती पर लाने का दुस्साहस करना
आप हे हमारे माई-बाप!
घोषित कर दें पैदा करना बेटियों को
है रेयरेस्ट ऑफ रेयर जुर्म!
हम अभी गला घोंट आते हैं अपनी बेटियों का
साथ-साथ अपना भी।
क्या करेंगे हम जीवित रहकर,
जब हमारी बेटियाँ ही नहीं रहेंगी इस धरती पर।
रहो साफ, पाक, पवित्र बेटी-विहीन धरा पर,
लेकिन, यह धरती भी तो है बेटी ही,
कैसे रहोगे इस पर,
इसलिए बसेरा बनाओ कही और, किसी और खगोलीय दुनिया में,
चाँद, मंगल, शनि, बुध, सूरज- कहीं भी
बस, अब छोड़ दो हमें और हमें धारण करनेवाली धरा को।

Wednesday, December 19, 2012

देवी और बलात्कार


लड़की,
मत निकलो घर से बाहर।
देवियों की पूजावाला है यह देश।
हम बनाते है बड़ी-बड़ी मूर्तिया, देवी की-
सुंदर मुंह,
बड़े- बड़े वक्ष
मटर के दाने से उनके निप्पल,
भरे-भरे नितंब
जांघों के मध्य सुडौल चिकनाई।
उसके बाद ओढा देते हैं लाल-पीली साड़ी।
गाते हैं भजन- सिर हिला के, देह झूमा के।
लड़की,
तुम भी बड़ी होती हो इनही आकार-प्रकारों के बीच।
दिल्ली हो कि  बे- दिल
तुम हो महज एक मूर्ति।
गढ़ते हुए देखेंगे तुम्हारी एक-एक रेघ
फिर नोचेंगे, खाएँगे,
रोओगी, तुम्ही दागी जाओगी-
क्यों निकली थी बाहर?
क्यों पहने तंग कपड़े?
क्यों रखा मोबाइल?
लड़की!
बनी रहो देवी की मूर्ति भर
मूर्ति कभी आवाज नही करती,
बस होती रहती है दग्ध-विदग्ध!
नहीं कह पाती कि आ रही है उसे शर्म,
हो रही है वह असहज
अपने वक्ष और नितंब पर उनकी उँगलियाँ फिरते-पाते।
सुघड़ता के नाम पर यह कैसा बलात्कार?
लड़की- तुम भी देवी हो-
जीएमटी हो कंचक,
पूजी जाती हो सप्तमी से नवमी तक
लड़की-
कभी बन पाओगी मनुष्य?




Sunday, December 9, 2012

हम हमेशा शिवरानी - वे हमेशा प्रेमचंद


हे भगवान! आज मैं बहुत खुश हूँ कि मैं महुआ माजी की तरह खूबसूरत नही। हिन्दी जगत में खूबसूरत लेखिका होना मतलब- उसके चरित्र की धज्जियों का उड़ जाना है।  हिन्दी जगत में स्त्री का होना ही फांसी पर चढ़ा जानेवाला अपराध है। खूबसूरत लेखिका होना भयंकरतम अपराध है। इसकी सज़ा उसके चरित्र की खील -बखिया उधेड़ कर दी जा सकती है। ऐ औरत! एक तो तू हव्वा!। सारे फसादात की जड़! दूसरा फसाद- कि तू सुंदर भी है। यह ऊपरवाला भी- बहुत हरामी है। उसकी कमीनगी देखिये कि वह इस दो टके की औरत को दिमाग नाम की चीज़ भी दे देता है। अब भला कहिए तो! रूप दे दिया तो दे दिया। उससे हमारा मन सकूँ पाता है। आँखों को ठंढक पहुँचती है। दिल को राहत मिलती है। अगर वह पट गई तो देह की पोर-पोर खिल जाती है। नहीं भी पाती तो उसे गाली देकर, बदनाम करके हमारी जीभ और रूह सकून पाती है। ए कम अक्लों ! कितने खुश हैं हम यह स्थापित करते हुए कि ऐसों-ऐसों की अक्कल घुटने में होती है। घुटने पर साड़ी अच्छी लगती है। दिमाग को भी हमने घुटने पर देकर हमने उनकी इज्ज़त ही बढाई है। असल में उनके पास दिमाग तो होता ही नही! और ज़रूरत भी क्या है भला! वे रूपसी है, कामिनी हैं, दामिनी हैं, मतवारी हैं, छममकछल्लो हैं, छमिया हैं। ये सब हमारे रस-रंजन के लिए हैं। उनकी खुशकिस्मती कि हम उन्हें अपने साथ होने-सोने-खोने के लिए रख लेते हैं। अब इनकी यह मजाल कि लिखने भी लगें, बोलने भी लगें, हुंकारने भी लगें। दुर्गा-काली कैलेंडरों और शास्त्रों में अच्छी लगती हैं। जीवन में नही। महुआ हो कि कमलेश, गीता हो कि विभा- जो बोलेगी, भाड़ में जाएगी। यह भाड़ हमने बनाया है, इसमें हिंसा, कामुकता, रासलीला की आग हम सदा जला के रखते हैं। हम एक छींटे से अपने ही अन्य लोगों का भी खात्मा करने की ताकत रखते हैं, जिनकी नज़र में स्त्री सम्माननीय है। अरी ऐ औरत!  संभाल जा! तू मादा है, मादा रहेगी। मादा बनकर हमारे साथ रहेगी तो तेरे रूप पर तनिक दिमाग का दान भी कर देंगे।
इसलिए हे भगवान! अबतक अपनी कुरूपता से दुखी आज मैं बहुत खुश हूँ। पर, क्या सचमुच खुश हूँ? नहीं। रूप तो एक और विशेषण है। हमारे लिए तो औरत का होना ही अपराध है। हम औरत बनकर सेवाभाव से दासी बने रहें, तो किसी को कोई आपत्ति नही होगी, न किसी गोस्वामी जी की आत्मा में किसी प्रकाश का पुंज लहराएगा, न किसी के मन में किसी के प्रति राग-रंजन का अनिल या अनल बहराएगा। न किसी रण का बांका छलिया रूप अंधेरगर्दी मचाएगा। हमें कहा जाता है कि ना, ना, ना! हमारे विमर्श को नारीवादी रूप मत दीजिए। हम भी कहते हैं कि ना जी ना, हम तो अपने को रूप-अरूप से अलग-विलग रखकर सिर्फ और सिर्फ अपने कर्म और अपने लेखन और अपने प्रोफेशन पर ध्यान देते हैं। तब भी पेट में मरोड़ होने लगती है।
हे भगवान! अब हम तुमको गरिया रहे हैं। क्यों, तूने हमें बनाया? दिन-रात की इस इज़्ज़तपोशी के लिए! एक बार इन इज़्ज़तदानों को भी औरत बना दे और ऐसे ही विभूषणों से विभूषित कर दे। हमारी साड़ी, हमारी देह, हमारी नाक, हमारी आँख, हमारी चितवन, हमारी गढ़न! सब उनमें भर दे! सुनने दे उन्हें भी ये सब कुछ! फिर हम भी पूछें कि 'आब कहू, मोन  केहेन लगइए।"
वैसे हिन्दी में किसी की किसी भी उपलब्धि पर पड़ोसी के पेट में दर्द उठाना स्वाभाविक है। हमारी भिखारी और लोलुप प्रवृत्ति किसी को खुश, और परवान चढ़ा नही देख सकती। उसे यह रोने में अच्छा लगता है कि हिन्दी में पैसा नही, नाम नहीं, और जैसे ही किसी को यह मिलता है, हम उसके खिलाफ लामबंद होने लगते हैं। मतलब साफ है कि उसकी साड़ी कि उसकी कमीज मेरे से सफ़ेद कैसे? वह चाहे महुआ माजी हो या सुरेन्द्र वर्मा। हमें कभी भी अपने नाम, दाम, काम का चाँद नही चाहिए। न न न! हमें तो चाहिए, किसी महुआ को या किसी सुरेन्द्र वर्मा को नहीं। हमें मिले तो हमी सबसे लायक, कोई और है तो घनघोर नालायक!
महुआ का उपन्यास अच्छा नही है, तो उसे अपनी मौत मर जाने दीजिये। चोरी का है तो चोरी का इलज़ाम लगाये। उपन्यास के लिखने, घटिया या बढ़िया होने का उसके रूप या उसकी साड़ी -शृंगार से क्या वास्ता! वैसे हम भी ना! हम हिंदीवालों को सजने-सँवरने से भी बहुत परहेज है। एक मंत्री जी भी चार बार कपड़े बदलते हैं तो सुर्खियों में आ जाते हैं। टीवी उनके काम पर नही, उनके कपड़ों पर उतर आता है। हमारी यह फितरत है। महुआ कि कमलेश कि गीता कि विभा कि मैत्रेयी कि शीला कि मुन्नी कि इमरती कि जलेबी- हमारे काम पर नहीं, हमारे रूप पर जाइए। अगर हमने कुछ कर लिया तो हम शिवरानी हो जाएंगे, जिनकी कहानी प्रेमचंद ही लिखते थे। हमारे तो घर के मर्दों में भी इतनी ताब नही कि वे कहें कि हाँ जी हाँ! उनकी पत्नी एक शख्स नहीं, एक शख्सियत है। मन के भीतर इतना डर और कहने को इतने रणबांकुरे!

Saturday, December 8, 2012

मंडी- रंडी, देह -दुकान....!


कि हम हैं केवल और केवल-
मंडी- रंडी, देह -दुकान....!

सबकी मौत का एक मुअईन है
लेकिन मैं.....
मरती हूँ हर रात... (प्रतिमा सिन्हा)
(इसमें अपनी बात जोड़ रही हूँ- )

घर -बाहर, दुकान दफ्तर-चौराहा-पार्क
हर जगह हम हैं केवल मंडी- रंडी, देह -दुकान....!
हम कहते रहें की हमने उन्हें देखा
मित्रवत, पुत्रवत, भतृवत, मनुष्यवत....
लेकिन, जिन्हें हम ये सब कहते हैं, वे ही हमें बताते हैं-
कि हम हैं केवल और केवल-
मंडी- रंडी, देह -दुकान....!
अब हम भी कह रहे हैं, कि आओ और उपयोग करो- हमारा-
कि हम हैं केवल और केवल-
मंडी- रंडी, देह -दुकान....!
आँसू बहते हों तो पी जाओ।
दर्द होता हो तो निगल जाओ।
सर भिन्नाता हो तो उगल आओ अपने देह का दर्द, जहर, क्रोध -
अपनी ही माँद में।
कहीं और जाओगी तो सुनेगा नहीं कोई
अनहीन, नहीं, सुनहेगे सभी,
फिर हँसेंगे, तिरिछियाएंगे और
फिर फिर छेड़ेंगे धुन  की जंग-
कि हम हैं केवल और केवल-
मंडी- रंडी, देह -दुकान....!

Monday, December 3, 2012

राजेन्द्र बाबू का पत्र- पत्नी के नाम


राजेन्द्र बाबू का पत्र- पत्नी के नाम -साभार- पुन्य स्मरण- समर्पण- उनके जन्म दिन पर- तेरा तुझको सौंपत, क्या लागे है मोय?एक बार फिर से अपने ही इसी ब्लॉग से।

इस पत्र से पता चलता है कि तब के नेता देश के लिए कितने प्रतिबद्ध रहते थे। घर-परिवार , पैसे उनके लिए बाद की बातें होती थी। मूल भोजपुएरी में लिखा पत्र यहाँ प्रस्तुत है-
आशीरबाद,
आजकल हमनी का अच्छी तरह से बानी। उहाँ के खैर सलाह चाहीं, जे खुसी रहे। आगे एह तरह के हाल ना मिलला, एह से तबीयत अंदेसा में बातें। आगे फिर। पहले कुछ अपना मन के हाल खुलकर लीखे के चाहत बानीं। चाहीं कि तू मन दे के पढी के एह पर खूब बिचार करिह' और हमारा पास जवाब लिखिह''। सब केहू जाने ला कि हम बहुत पढली,  बहुत नाम भेल, एह से हम बहुत पैसा कमाएब। से केहू के इहे उमेद रहेला कि हमार पढ़ल-लिखल सब रुपया कमाय वास्ते बातें। तोहार का मन हवे से लीखिह्तू हमारा के सिरिफ रुपया कमाए वास्ते चाहेलू और कुनीओ काम वास्ते? लड़कपन से हमार मन रुपया कमाय से फिरि गेल बाटे और जब हमार पढे मे नाम भेलत' हम कबहीं ना उमेद कैनीं कि इ सब पैसा  कमाए वास्ते होत बाटे। एही से हम अब ऐसन बात तोहरा से पूछत बानी कि जे हम रुपया ना कमाईं, त' तू गरीबी से हमारा साथ गुजर कर लेबू ना? हमार- तोहार सम्बन्ध जिनगी भर वास्ते बातें। जे हम रुपया कमाईं तबो तू हमारे साथ रहबू, ना कमाईं, तबो तू हमारे साथ रहबू। बाक़ी हमरा ई पूछे के हवे कि जो ना हम रुपया कमाईं त' तोहरा कवनो तरह के तकलीफ होई कि नाहीं। हमार तबीयत रुपया कमाए से फ़िर गेल बातें। हम रुपया कमाए के नैखीं चाहत। तोहरा से एह बात के पूछत बानीं, कि ई बात तोहरा कइसन लागी? जो हम ना कमैब त' हमारा साथ गरीब का नाही रहे के होई- गरीबी खाना, गरीबी पहिनना, गरीब मन कर के रहे के होई। हम अपना मन मी सोचले बानीं कि हमारा कवनो तकलीफ ना होई। बाक़ी तोहरो मन के हाल जान लेवे के चाहीं। हमारा पूरा विश्वास बातें कि हमार इस्त्री सीताजी का नाही जवना हाल मे हम रहब, ओही हल में रहिहें- दुःख में, सुख में- हमारा साथ ही रहला के आपण धरम, आपण सुख, आपण खुसी जनिःहें । एह दुनिया में रुपया के लालच में लोग मराल जात बाते, जे गरीब बाटे सेहू मरत बाटे, जे धनी बाटे, सेहू मारत बाटे- फेर काहे के तकलीफ उठावे। जेकरा सबूर बाटे, से ही सुख से दिन काटत बाटे। सुख-दुःख केहू का रुपया कमैले और ना कमैले ना होला। करम में जे लिखल होला, से ही सब हो ला।
अब हम लीखे के चाहत बानी कि हम जे रुपया ना कमैब त' का करब। पहीले त' हम वकालत करे के खेयाल छोड़ देब, इमातेहान ना देब, वकालत ना करब, हम देस का काम करे में सब समय लगाइब। देस वास्ते रहना, देस वास्ते सोचना, देस वास्ते काम करना- ईहे हमार काम रही। अपना वास्ते ना सोचना, ना काम करना- पूरा साधू ऐसन रहे के। तोहरा से चाहे महतारी से चाहे और केहू से हम फरक ना रहब- घर ही रहब, बाक़ी रुपया ना कमैब। सन्यासी ना होखब, बाक़ी घरे रही के जे तरह से हो सकी, देस के सेवा करब। हम थोड़े दिन में घर आइब,त' सब बात कहब। ई चीठी और केहू से मत देखिह', बाक़ी बीचार के जवाब जहाँ तक जल्दी हो सके, लीखिह'। हम जवाब वास्ते बहुत फिकिर में रहब।
अधिक एह समय ना लीक्हब।
राजेन्द्र
आगे ई चीठी दस-बारह दीन से लीखले रहली हवे, बाक़ी भेजत ना रहली हवे। आज भेज देत बानी। हम जल्दीये घर आइब। हो सके टी' जवाब लीखिः', नाहीं टी' घर एल पर बात होई। चीठी केहू से देखिः' मत। - राजेन्द्र
पाता- राजेन्द्र प्रसाद, १८, मीरजापुर स्ट्रीट, कलकत्ता
(अब आप सोचें कि ऐसे पत्र को पाकर उनकी पत्नी के क्या विचार रहे होंगे और देश को पहला राष्ट्रपति देने में उनकी क्या भुमिका रही होगी?)

Monday, October 8, 2012

ई देस है वीर बलात्कारियों का, इस देश का यारो किया कहेना!


हे लो। फिर हिंदुस्तान के वीर बहादुर लोग सब अपने देश की महान संस्कृति का पालन करते हुए एगो इज्जत लूट गिया। फिर एगो इज्जत लुट गिया। फिर एगो जान चला गिया। फिर टीवी अखबार का मौसम आ गिया। फिर माई-बाप लोग के गरीब के घर आने-जाने का दिन आ गिया। गाँव में मेला लगेगा। ठेला लगेगा। कुछ ठेलाएंगे, कुछ बिकाएंगे, कुछ सेरांगे, कुछ गरमाएंगे। फिर ताबतक में कौनों आउर बात आ जाएगा, फिर सब उसको भुतिया जाएंगे। फिर कोनो एगो माई-बाप के पच्छ में बोल गिया। फिर कोनो चार गो उसके खिलाफ उगिल गिया।
माई-बाप तो माई-बाप है। लोग और को सरमो नहीं आता है उसको उछन्नर करते हुए। आपलोग कहियो अपना बूढ़ा गए माय-बाप को एतना तंग करेंगे? ईहो तहमरे माए-बाप सब है न। एकके गो तो मौका मिलता है अपना माय-बाप भोट दे के अपने से चुनने का। भगवान तो देता नही है। बस, डिक्टेटर जैसा अपना टेंट में से माई-बाप निकालता है आ बाल-बच्चा सबको पकड़ा देता है। ले रे अभगवा, ले!
ई माई-बाप आजकल बहुते - बहुते रूप मे बदल गिया है। मुनसी, मोकदमा, लाट, खाप, बाप। हे, सुने, एगो बाप कह रहा था- लडिका-लड़िकी का बियाह का ऊमीर कम कर दो। हे, हे हे हे...! छम्मकछल्लो का तो खुसी से दमे फूल गिया। कम क्या! जनमते ही कर दो। जनमते ही उसको बता दो, देखो रे बबुआ, तुम्हारा जनम पढ़ने-लिखने, कुछ करने के लिए नही हुआ है। उसके लिए देश-बिदेश में बहुत पगला लोग सब बैठा हुआ है। तुम तो जनमते बियाह रचाओ, आ डूब जाओ रंग-रभस में, जिससे कि तुम्हारे जीसीम की आग सेराती रहे आ आगे तुम किसी के इज्ज़त लूटने जैसा काम मत करना। जैसे एक बेर कोनो एगो बाप बोले थे कि गाँव में सबको टीवी दे दो। लोग देर तक टीवी देखेंगे तो देर से सोएँगे। देर से सोएँगे तो उत्पादन के काम में नहीं लगेंगे। आ देश की जनसंख्या में इजाफा नही होगा। बिदियार्थी सबको जनसंख्या रोकने में टीवी का महत योगदान जैसा बिसय देना चाहिए, निबंध लिखने के लिए।
छम्मकछल्लो को तो अभिए से बियाह का सब गीत मोन पड़ने लगा- बेटा का है तो गाओ- साजहु हो, बाबा मोर बरियतिया। बेटी का है तो पाया के ओटे गे बेटी, क्यों गे खड़ी, अपना बाबा के मुंह देखि, रोने लगी।
बेटी सब का मुंह ऐसे ही बनरचोथ जैसा होता है। जिसको देखती है, रोने लगती है। बाप को भी आ बलात्कारी को भी। एक बाप बनकर बोलता है, लड़की पर सिक्कड़ कस दो। फिलिम में ताला मार दो। छम्मकछल्लो ताला, सिक्कड़ लेकर हाजिर। हो हमारे बाप-भाई। हम सब तो तुम्हारे ही बाग की चिड़िया हैं। मार दो, काट दो। तनिको न कुछ बोलेंगे। बेटी जनम मुफ़त में थोड़े न लिए हैं।
लबरघोघवा सब जीभ लपलपाता कहता है- लड़की है रे! छम्मकछल्लो हुआं भी कहती है- हाँ रे, हैं ना। अब जो करना है, कर लो। इज्ज़त लूट लो, नंगा नचा दो, कसम धरा लो जो हम कुच्छो बोले तो! हम कुच्छो बोले न तो चाहे जलती चिता में से, चाहे गाड़े गए कबर में से हमरी लाश निकाल कर उसका फिर से इज्ज़त लूट लेना। कमाल है भाई। ऊ सब बड़का लोग सब होता है। हम लड़की सबका औकाते कौन जो कुछो बोलें? ऊ लोग का लूटने का काम- ऊ लोग करे। हमारा लुटने का धंधा- हम करें। मामिला एकदम फरीच्छ! बूझे कि नहीं? धुर रे बुड़बक। लगता है तू भी किसी का इज्ज़त उतारिए के आवेगा अभागा नहितन!  
एगो बोलता है- साजिश है। छम्मकछल्लो कहती है, जी माई-बाप, एकदम है। एगो बोलता है, राजा को गद्दी से उतार दो। छम्मकछल्लो कहती है, ना माई-बाप। क्या फायदा? आप गेरन्टी दोगे कि आप राजा बनकर आओगे तो हमारी इज्ज़त हिफाजत से रहेगी। अपने लिए तो तुलसी बाबा कहिए गए हैं- कोऊ नृप होही, हमें का हानी, चेरी छांड़ि की होयब रानी?
लेकिन, ई इज्ज़त का भी ग्रेडेसन होता है, छम्मकछल्लो को पता चलता है। इसलिए, जब –जब इज्ज़त लूटने का बात आता है वो लड़की का बिशेषन लगाना नाही भूलता- मुसलमान लड़की, दलित लड़की। छम्मकछल्लो को अककिल तो है नहीं। उसको लगता है, ज़रूर इज्ज़त उतारने का तरीका या इज्ज़त जाने का तरीका ई सब बिशेषन लगाने से बदल जाता है। औरत का इज्ज़त तो आइयसे जाता है सो तो जाता अही है, ई सब बिशेषन लगा के और क्या मिलता है, छम्मकछल्लो यही पूछना चाहती है- इज्ज़त उतारनेवाले से भी और उस इज्ज़त का चीर-फाड़ करवाले से भी।