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छम्मकछल्लो की दुनिया में आप भी आइए.

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Thursday, October 28, 2010

भ्रष्टाचार का 87वां पादान और हम भारतीय महान!

आहाह! आज छम्मकछल्लो को मज़ा आ गया. यह मज़े वह होश सम्भालने के बाद से ही लेती आ रही है. यह दीगर बात है कि अब वह होश खो बैठी है. आज वह कई बांस ऊपर उछल गई, जब उसे पता चला कि हमारा प्यारा, न्यारा, महान देश भ्रष्टाचार के मामले में 87वें नम्बर पर है. इसका मतलब यह कि हम इस मामले में भी 86 देशों से पिछडे हैं. हाय रे! सारे जहां से अच्छा, सच्चा हमारा यह देश! सौ में से 90 बेईमान, फिर भी मेरा भारत महानवाले इस देश में यार! ये क्या बात हुई! कहीं भी लोग हमें आगे नहीं रहने देते. इतनी मेहनत से कॉमनवेल्थ गेम्स में एक मौका बटोरा. उस पर भी पानी फेर दिया? कितना अच्छा मौका था! मेहनत कम और रिजल्ट ज़्यादा. इंस्टैंट का ज़माना है. फटाफट. ईमानदारी में तो जिंदगी घिस जाती है, और तकदीर भी. बेईमानी की तो प्रेस, मीडिया सभी घर, रास्ते, थाने, जेल के आगे लाइन लगाए बैठे रहते हैं. भूल गए तेलगी और हर्षद मेहता को ना? बडी छोटी याददाश्त है आप सबकी भी.

छम्मकछल्लो को अभी भी याद है, अभी कुछ दिन पहले ही देश की सर्वोच्च न्याय व्यवस्था भ्रष्टाचार के सुरसा रूप पर खीझी थी. दुखी और कातर हुई थी, आम जनता की सोच कर हाल से बेहाल हुई थी. अब छम्मकछल्लो को खुशी है कि अब माननीय लोग परेशान नहीं होंगे. 86 देश हमसे आगे हैं.
इस देश के वासियो! अब आप निश्चिंत रहिए. चिंता की कोई ज़रूरत नहीं. लोग खामखा व्यवस्था को कोसते हैं. व्यवस्था में लोग व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए होते हैं. अगर आपको अपनी वसीयत अपने नाम लिखानी है. जमीन जायदाद खरीदनी बेचनी है, बच्चेका जन प्रमाणपत्र लेनाहै, राशन कार्ड बनवाना है, मसलन पता नहीं, कितने कितने काम करने करवाने हैं. हर काम का एक दस्तूर है जो बिना दस्तूरी के नहीं होता. छोटे से लेकर बडे तक की अपनी अपनी हैसियत है. आपकी नही है तो इसके लिए वे तो ज़िम्मेदार नहीं? लोग नाहक पुलिस और ट्रैफिक पुलिस को बदनाम करते हैं. ट्रैफिक पुलिस तो हमारे द्वारा ट्रैफिक नियम तोडने पर हमें पकडती है. मगर ये जो अलग अलग हैसियतदार लोग हैं, वे तो बस, “कलम से गोली” मारते हैं.

ऊंहू, इनको भी बदनाम मत कीजिए. ये आपका काम करने के लिए बैठे हैं. आपका काम कर भी रहे हैं. छम्मकछल्लो जब अपना घर बेच रही थी, तब उसे एक एजेंट ने आ पकडा. उसने कहना शुरु किया- “ये जो अफसर मैडम है ना, उनकी फीस ही साइन करने की तीन हज़ार है. वो तो मैं आपसे अढाई ही ले रहा हूं. ... वो जो बेचारा तब से आपके 36 पेज के डॉक्यूमेंट पर शुरु से आखिर पेज तक ठप्पा लगा रहा है. कितनी मेहनत कर रहा है आपके लिए? तो उसको उसकी फीस दीजियेगा कि नहीं? और ये जो मैडम है, आपकी फाइल को रिलीज करेंगी, वे खुद से कुछ नहीं लेती. मगर हमारा तो फर्ज़ बनता है कि नहीं उनको देने का. सो आप उनके ड्रॉअर में ये नोट डाल दीजियेगा. अब ये जो मैडम से साइन कराके लाया है. जानती हैं, आज मैडम कितनी बिजी हैं? ये तो अपने ये भाई हैं कि मैडम उनकी बात को कभी खारी नहीं करती. तो उसको कुछ तो दीजियेगा न? बूढा हो गया है, कहां जाएगा बेचारा! ....और अब इन सबके बाद आपको जो लगे, हमको खुशनामा दे दीजिए. हम नहीं होते तो आज आपका काम होता भी नहीं. कौन कराता? मैं आप से जो लिया है, उसमें मुश्किल से दो सौ भी मेरा नहीं बना होगा. आगे आपकी जो खुशी.”

छम्मकछल्लो का बैग खाली हो गया. मन भर गया, लोगों की काम के प्रति निष्ठा और ईमानदारी देखकर. इस बैग के बगीचे में से दसेक हजार पान, पत्ते, फल, फूल के लिए निकल गये तो क्या हुआ? सारी बागवानी आप अपने से तो नहीं कर सकते ना! तो जो करेगा, वह तो लेगा ही ना. बाग के लिए उन्हें नियुक्त किया गया है, इसी अधिकार से तो वे ले रहे हैं. कुर्सी का वह अधिकार नहीं रहता तो आप तो उसे खडे भी नहीं होने देते. इसलिए, पग पग पर पैर पुजाई देनी पडती है तो दीजिए. पैर है तो पूजना ही होगा. नहीं तो अपने पैरों को सालों इस टेबल से उस टेबल तक, इस आसन से उस आसन तक दौडाते रहिए. चप्पल भी घिस जाएगी, तलवे भी, और दिल के साथ दिमाग भी फिर जाएगा. इसलिए, अपने पैरों का ख्याल रखिए, वरना बीमार पडने पर छम्मकछल्लो को मत बताइयेगा. बीमार पडने पर इलाज के लिए जाना होगा और छम्मकछल्लो बताए देती है कि वहां भी अपने पैर और दिल को मज़बूत करके रखना होता है, वरना एक सर्दी खांसी में ही हज़ारो हजार की चपत लगते देर नहीं लगती.

अंत में आप सभी छम्मकछल्लो की तरह ही इस रामनामी चादर में डूब जाइये. डूबने से पहले सोचिए कि आप अपने तई ईमानदार रह सकते हैं, आपको घूस, दहेज नहीं लेने की छूट है. मगर देने पर आपका बस नहीं है. वैसे अपनी भारतीयता में ‘द’ यानी देने, मतलब दान का बहुत महत्व है. घूस, दहेज आदि को दान की श्रेणी में डाल दीजिए और भूल जाइए. मन हो तो कभी कभी प्रार्थना की लाइन की तरह दुहरा लीजिए-

करप्शन की लूट है, लूट सके सो लूट

अंत काल पछताएगा, जब प्राण जाएंगे छूट.

Sunday, October 10, 2010

यह “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” क्या है जज साब?

http://mohallalive.com/2010/10/10/vibha-rani-react-on-priyadarshini-mattu-case-verdict/comment-page-1/#comment-15027

ज साब, मैं प्रियदर्शिनी मट्टू। अभी आपके जेहन से निकली नहीं होऊंगी। अभी अभी तो आपने मेरी तकदीर का निपटारा किया है। जज साब, कानून के प्रति मेरी आस्था थी, तभी तो उसकी पढ़ाई कर रही थी। चाहा था कि कानून पढ कर मैं भी लोगों को न्याय दिलाने में अपनी व्यवस्था को सहयोग दूंगी। मेरी अगाध भक्ति और श्रद्धा इस देश पर, इस देश के कानून पर, इस देश के प्रजातांत्रिक स्वरूप पर और इस देश की न्याय व्यवस्था पर है।
लेकिन अपनी तकदीर को ही दोष दूंगी जज साब कि मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ। इंसान के साथ जब कुछ उसके हिसाब का नहीं हो पाता, तब वह अंतत: अपनी तकदीर को दोष दे कर चुप बैठ जाता है। मैं भी ऐसा ही कर रही हूं।
नहीं पता जज साब कि किसी केस का “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” क्या होता है? शायद किसी काम को कोई बहुत ही क्रूर तरीके से अंजाम देना। शायद इसीलिए रेप जैसे मामले में भी “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” की संकल्पना कर ली गयी। जज साब, क्या आपको लगता नहीं कि रेप अपने आप में “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” है? एक ऐसा कर्म, जिसमें तन से ज्यादा मन आहत होता है, जिसकी भरपाई उम्र भर मुमकिन नहीं? मैं तो यह भी मान लेती हूं कि किसी के हाथ से खून अनजाने में हो सकता है, मगर किसी के द्वारा रेप अनजाने में किया गया हो, जज साब, मेरी छोटी सी बुद्धि में नहीं आयी आजतक यह बात। फिर, जो अपराध जान-बूझ कर किया गया हो, वह “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” की श्रेणी में कैसे नहीं आया साब?
क्या मेरा या मुझ जैसी हजारों अभागनों का मामला तभी “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” माना जाएगा, जब वह दरिंदगी की सारी हदें पार कर दे? मेरे या मुझ जैसियों के अंग-प्रत्‍यंग काट कर अलग अलग बिखेर दिये जाते, उन्हें पका कर किसी पार्टी में परोस दिया जाता, हमारे एक एक अंग की भरे बाजार में नीलामी होती, हमारे एक एक अंग का सौदा किया जाता, या उस पूरे घटनाचक्र की फिल्म बनाकर मंहगे दामों में बेचकर उससे घर की छत तक दौलत का अंबार लगा लिया जाता। तब तो प्रकारांतर से संदेशा जाता है लोगों तक कि ऐ इस देश के वीर वासियों, आओ, और इस देश की लड़कियों से खेलो, तनिक सावधानी के साथ, इतना तक कि उसे “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” की श्रेणी में मत आने देना। बस, तुम काम को अंजाम देते रहो और मौज मस्ती भी करते रहो, घर परिवार भी बसाते रहो। अगर कहीं ताकतवर की औलाद हो तब तो और भी फिक्र करने की जरूरत नहीं।
जज साब, हमारी तकदीर की लाल चुन्नियां सजने के पहले ही काली पड़ गयीं। फिर भी, झुलसी नहीं थीं। अब उस काली चुन्नी को मैं खुद ही झुलसा आऊंगी।
अब मुझे उन मांओं पर कोई अफसोस नहीं, जो जन्म से पहले या जनमते ही अपनी बेटियों को मार देती हैं। मैं अपने निरीह पिता की आंखों की बेबसी देख भर पा रही हूं। मेरी काली चुनरी भी तब अगर बची रह जाती, तो शायद उनकी आंखों में एक सुकून आता। हर लड़की के मां-बाप यही कहते दुहराते मर जाते हैं कि रेप के मुजरिमों को ऐसी सख्त सजा दी जाए, ताकि अगला कोई भी इस तरह की जुर्रत करने से पहले दस बार सोचे। मगर हर बार हम ही उसे ऐसी ‘महान जुर्रत’ करने के हौसले और बहाने देते रहते हैं।
क्या मैं यह कहूं कि “जाके नाहीं फटे बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई?” तब तो कई और लड़कियों को मेरी जैसी स्थिति का सामना करना पड़ेगा और यह मैं कैसे चाह सकती हूं जज साब?
माननीय न्याय व्यवस्था पर मेरा पूरा भरोसा है, मैं उसका आदर करती हूं, तो बस जज साब, एक विनती मेरी सुन लीजिए, रेप को ही “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” की संज्ञा दे दीजिए और हम प्रियदर्शिनी, प्रतिभा, रुचिका जैसी जाने कितनी अभागनें हैं इस धरती पर भी और इस धरती से ऊपर भी, उन्हें सुकून की एक सांस दे दीजिए। एक भरोसा तो दीजिए कि उनकी पीर को समझनेवाला भी कोई है। बाकी हम परमादरणीय न्याय और न्यायालय की आदर रेखा से अलग तो हैं नहीं।
हां, हमारे जजमेंट के दिन हमारे शहर में बारिश हुई जज साब। यह बारिश नहीं, हम अभागनों के आंसू थे। इसमें मेरे मां-बाप और हमारे शुभचिंतकों के भी सम्मिलित हैं।

Wednesday, October 6, 2010

संजीवनी देता मधुबनी का “हार्ट हॉस्पिटल”







पिछले दिनों मधुबनी जाना हुआ. पता चला कि मधुबनी के नवरतन गांव में एक “हार्ट हॉस्पिटल” खुला है, जो स्थानीय लोगों के लिए संजीवनी का काम कर रहा है. हम अपनी उत्सुकता नहीं रोक पाए और पहुंच गए “हार्ट हॉस्पिटल”. वहां जानकारी मिली कि पटना के मशहूर हार्ट स्पेशलिस्ट डॉ. ए के ठाकुर ने यह अस्पताल बनवाया है. इसके पीछे भी एक कहानी कही जाती है. डॉ. ठाकुर की मां हृदय रोग से पीडित हैं. वे मधुबनी में ही रहती हैं. इलाज के लिए उन्हें बार-बार पटना जाना पडता था. इस बार बार के आने जाने से परेशान हो कर उन्होंने अपने बेटे डॉ. ए के ठाकुर से कहा कि वे क्यों नहीं हार्ट का एक अस्पताल ही मधुबनी में बनवा देते हैं? वे बार बार पटना जाने के चक्कर से बच जाएंगी. माता के प्रति पुत्र का यह प्रेम कहें या डॉ. ए के ठाकुर के अपने विचार कि यदि ऐसा होता है तो जाने कितने लोगों को इससे मदद मिलेगी, ने इस अस्पताल को यहां जन्म दिया.

एक बीघे में इस अस्पताल का निर्माण हुआ है. प्रशासनिक व अन्य व्यवस्था दरभंगा मेडिकल कॉलेज के सेवा निवृत्त प्रोफेसर डॉ. जी सी ठाकुर कर रहे हैं. अस्पताल में हृदय जांच की सभी आरम्भिक सुविधाएं हैं. एक्स-रे, ईसीजी, आईसीयू, ऑपरेशन थिएटर से लेकर सभी कुछ की. मरीजों के लिए विशेष वार्ड भी हैं और जेनरल वार्ड भी. सबसे बडी बात है कि खुद डॉ. ए के ठाकुर सप्ताह में तीन दिन यहां आकर मरीजों को देखते हैं. इससे इस अस्पताल के प्रति लोगों का विश्वास बढा है. दूसरी और सबसे व्यावहारिक खासियत है इसकी फीस. मात्र 100/- की फीस में आप अपनी जांच करवा सकते हैं, 125/- रुपए देकर एम्बुलेंस की सुविधा ले सकते हैं. पटना की फीस का लगभग 25 से 30 %तक ही यहां लिया जाता है. डॉ. जी सी ठाकुर बताते हैं कि इस अस्पताल का उद्देश्य पैसा कमाना नहीं, यहां के रोगियों की जान बचाना और उनकी मदद करना है. इसलिए नो प्रॉफिट नो लॉस के आधार पर यह अस्पताल चलाया जा रहा है. सूचना मैथिली में भी है और हिंदी में भी.

अबतक इससे कई सौ लोगों की जान बचाई जा चुकी है. अपनी भौगोलिक दूरी से मधुबनी से पटना जाने में ही लगभग सात घंटे लग जाते हैं. अगर आप गांव में हैं तो समय और लगेगा मधुबनी तक ही पहुंचने में. हृदय रोग इतना समय नहीं देता. नतीज़ा यह होता था कि पटना पहुंचने के पहले ही कई मरीज़ दूसरी दुनिया में पहुंच जाते थे. इस अस्पताल से अब यह होने लगा है कि बीमारी की आरम्भिक रोकथाम हो जाती है. अगर मरीज को एंजियोग्राफी, एंजियोप्लास्ट या बाईपास या अन्य इलाज की आवश्यकता है, तभी वह पटना जाए. उसके पहले की स्थिति तक के लिए यह अस्पताल तैयार है. अस्पताल में ही डॉक्टरों और नर्सों के रहने की व्यवस्था है. कैंटीन व्यवस्था भी यहां है.

लोग कहते हैं, यह सब प्रशासन में सुधार और व्यवस्था में सुरक्षा के कारण ऐसा हो सका है. लोगों के पास पैसे हैं, सेवा करने के भाव भी हैं, मगर भय ऐसा करने से रोक रहा था. अब वह भय खत्म हुआ है. लोग सेवा भाव से आगे बढ रहे हैं, जैसे कि यह अस्पताल. अब ज़रूरत है इस अस्पताल को युवा डॉक्टरों, सहृदयों और स्थानीय लोगों के सहयोग की. जीवन की आस का जो पौधा डॉ. ए के ठाकुर ने रोपा है, उसे परवान चढाने का.

Tuesday, October 5, 2010

बच्चे

बच्चे झुक जाते हैं, धान रोपने


बर्तन धोने, पॉलिश करने

उठते हैं जबतक कमर सीधी करने

तबतक आंखें धुंधली और बाल

सफ़ेद हो गए होते हैं

हैरत है कि बच्चे इतनी ज़ल्द तय कर लेते हैं फ़ासला

नहीं पाट पाते केवल दो इंच के मुंह और बित्ते भर के पेट

के बीच की दूरी

बच्चे बोते हैं धान के संग अपनी भी उमर

बालियां और बचपन गुम हैं खोई हुई किताबों की तरह।
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Friday, October 1, 2010

रक्त दान- दादागिरी से.


ग्रहण दान, कन्यादान, रक्तदान, यह दान, वह दान. हम भारतीय हर तरह के दान में विशवास करते हैं. रक्त दान मानवता की दिशा में एक सार्थक कदम है. १८ साल की उम्र पूरी होने पर आप भी रक्तदान कर सकते हैं. 
लगभग सभी अस्पताल्पों में रक्तदान के बारे में अपील मिल जाएगी, अलग अलग भाषा में. मगर मुम्बई के जसलोक अस्पताल के रक्तदान की एक अपील तो मारक है, आप हंसें, आप बिदकें, आप मज़े लें, आप भाषा पर तरस खाएं, मगर यह है तो है. अस्पताल का नाम आप इस अपील में पढ़ सकते हैं. छम्मक्छल्लो को तो पढ़ कर मज़ा आ गया था. आप भी मजे लें, कुछ सुझाना हो तो सुझाएँ.