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छम्मकछल्लो की दुनिया में आप भी आइए.

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Wednesday, April 28, 2010

मुंबई ब्लॉगर्स मीट- बोलती तस्वीरें! भूल सुधार! माफी-माफी!बार-बार माफी!

भूल, भूल, बहुत बडी भूल! माफी, माफी, सबसे माफी! न कोई इरादा, न कोई मंशा, मगर भूल मंशे के साथ तो नहीं की जाती. छम्मकछल्लो की उतावली अपने पहले ब्लॉगर्स मीट की चन्द तस्वीरें ब्लॉग पर डालने की. आधी रात में उसे समय मिला, आधी रात में उसने डाल दी. एक तस्वीर में घुघुती जी की साइड प्रोफाइलवाली तस्वीर चली गई. छम्मकछल्लो ने उन्हें कहा था कि वह उनकी तस्वीर हर्गिज़ नहीं डालेगी, अगर वे नहीं चाहती. किसी के निजी जीवन की बातों की मर्यादा तो निभाई ही जानी चाहिये. मगर यह तस्वीर चली गई और यार लोगों को जैसे एक छुपा खज़ाना मिल गया. बच्चों से किलक उठे कि भई हां जी, हमने घुघुती जी आपको देख लिया. तस्वीर की जगह भी बता दी. छम्मकछल्लो शाम में ही ब्लॉग से मुखातिब हो पाती है. लेकिन शाम में घर जाने के रास्ते पर थीं कि एक भाई का फोन आ गया. छम्मकछल्लो ने कहा कि वह घर जा कर सबसे पहला काम यही करेगी. कि तभी एक दूसरे शुभचिंतक का आ गया. छम्मकछल्लो के कहने के बावज़ूद वे पांच मिनट तक अपनी अमृतवाणी से छम्मकछल्लो को आप्यायित करते रहे. फिर फोन रखा और फिर तुरंत फोन किया. नसीहत दी, फिर फोन धर्मपत्नी को पकडा दिया. आखिर उन्हें भी तो अपनी मर्यादा निभानी थी. पति और पत्नी दो अर्धांग मिलकर पूर्णांग बनते हैं, इसलिए दोनों की लानत-मलामत से छम्मकछल्लो कबीर के अनह्द नाद की तरह ऊपर से नीचे तक सराबोर हो गई. अभी वह ब्लॉग को एडिट कर रही है. घुघुती जी वाली तस्वीर निकाल दी है. अब छम्मकछल्लो अपने पूरे होशो-हवास के साथ पत्नी जी के आदेशों का पालन करते हुए यह माफीनामा लिख रही है. जान लीजिए कि उसका मकसद घुघुती जी को तस्वीर के माध्यम से जग जाहिर नहीं करना था. करना ही होता तो सामने के प्रोफाइलवाली कई तस्वीरें उसके पास हैं, वही लगा देती. लेकिन इतनी मर्यादा का तो उसे भी पता है. पर नहीं जी. शायद अपनी दुनिया में ऐसा नहीं होता. कहावत है- "छमा बडेन को चाहिये, छोटन को अपराध!" तो आप सब ब्लॉगर सुधिजन, इस नाचीज़ छम्मकछल्लो को मा कर दीजिये. क्षमा! क्षमा!! क्षमा!!!

भई, क्या हुआ, गर छम्मकछल्लो तनिक सुस्त है और झट से पोस्ट नहीं डाली. कहावत है ना कि देर आयद दुरुस्त आयद! शायद दिल बहल्लने को ग़ालिब ये ख़्याल अच्छा है. जब बात अपने से ना बने तो च्चा घालिब पर छोड दो. तो साहबानो, ये कोई पहला मीट नहीं था, गोय छम्मकछल्लो अलबता इस मुगालते में थी. हां, वह अपने जीवन के पहले ब्लॉगर्स मीट में थी. सारी बात रश्मि रविजा ने अपने ब्लॉग rashmiravija.blogspot.com पर लिखना ही दिया है. मैं उससे बेहतर तो लिखना नहीं पाऊंगी. बस, कुछ तस्वीरमय रिपोर्ट है. वो कहते हैं ना- "बोलती तस्वीरें. सबसे युवा ब्लॉगर कोशी भी थीं. दरअसल वह अपने स्कूल की यादें ताज़ा करने आई ठीक और अपनी हथेलियां फैला कर बता रही ठीक कि इस पोज़ में वह पिटाई खाने के लिए तैयार रहती थी. इस मीट की एक ज़द्दोज़हद यह भी रही कि घुघुती बासुती जी को कैसे कैमरे से अलग भी रखा जाए और उनकी तस्वीर न दिखाई जाए. और सबसे बडी बात यह कि जिस कारक के कारण इस मीट की व्यवस्था की गई थी, उसका ज़िक्र ही नहीं हुआ. और जब हुआ तो इतने चलताऊ तरीके से कि उसे आधे लोग रजिस्टर कर पाए, आधे नहीं. कारक नहीं बताएगी छम्मक्छल्लो. कभी-कभी कुछ बातों का छुपा रहना भी आनन्ददाई होता है. हूं...........! समझे?







Sunday, April 25, 2010

अब बेटियां बोझ नहीं!

छछम्मक्छल्लो को अभी तक याद है, वह उनकी दूसरी बेटी थी, जिसके जनम के समय वह वहां थी. पहली संतान भी बेटी थी. अभी भी कई घरों में दो बेटियां स्वीकार कर ली जाती थीं. वहां भी स्वीकार ली गईं कि साल भर बाद फिर से उनके मां बनने की खबर आई. समझ में आ गया कि इस तीसरी संतान का मकसद क्या है? मगर ऊपरवाले के मकसद को भला कौन पहचान पाया है? पता नहीं क्यों, ऐसेमाता-पिता के प्रति छम्मकछल्लो एक कटुता से भर जाती है और कह बैठती है कि तीसरी संतान भी बेटी ही हो! आखिर ऐसा क्या है जो बेटियां नहीं कर सकतीं. मगर लगा कि हां, बेटियां बेटों की तरह मां-बाप को एक निश्चिंतता नहीं दे सकतीं कि ऐ मेरे माता-पिता, हमारी तरफ से तुम बेफिक्र रहो. मुझे कभी कोई ताने नहीं देगा, कभी कोई राह चलते नहीं छेडेगा, कभी मेरे दहेज के लिए नहीं सोचना होगा, कभी मेरे कहीं आने-जाने से तुम्हें चिंतित नहीं होना पडेगा, कभी कुल का नाम रोशन करनेवाले के बारे में नहीं सोचना होगा, कभी मुखांगि देने वाला कौन होगा, इसके बारे में नहीं सोचना होगा, कभी रात आंखों में नहीं काटनी होगी कि इन बेटियों का पार घाट कैसे लगेगा?

छम्मकछल्लो क्या करे! यहां तीसरी संतान भी बेटी का ही रूप धरकर आ गई. पता नहीं, फिर क्या हुआ? अगर यह सुना कि तीनों अच्छे से पढ-लिख रही हैं. अभी दो की शादी भी हो गई. तीसरी पत्रकार है. कमाती है. कमाती पहले की दोनों भी थीं. मगर शादी के बाद छूट गया. बेटियां यह नहीं कह सकतीं कि मैया री, मुझसे पर तेरा हक तो मेरे ब्याह के बाद भी रहेगा. मैं पहले जैसी ही कम करती रहूंगी, उतनी ही आज़ाद भाव से विचरती रहूंगी.

पिता रिटायर हो गए. सभी जमा-पूंजी दोनों के ब्याह में खर्च हो गए. पेंशन मात्र हज़ार बारह सुअ की है. डेढ हज़ार तो मां के इलाज़ में ही खर्च हो जाते हैं. अब तीसरी ने कमान संभाली है. हर महीने निष्ठा पूर्वक घर पैसे भेजती है. मां का सीना गर्व से चौडा है. कहती है-" पहले बहुत लगता था कि तीन-तीन बेटियां हैं. अब नहीं लगता. अब तो मेरी ये तीनों ही मेरे आंख, नाक और काँच हैं. अभी तो यह छुटकी अहमारा खाना खर्चा चला रही है. तो अब बेटी और बेटे का क्या फर्क़!

मां की आंखों में झिलमिलाता गर्व छम्मकछल्लो को सुकून दे जाता है. फिर चिंता की एक रेख भी छोड जाता है. अभी ना! शादी के बाद? समाज अभी भी कहां यह अधिकार देता है कि शादी के बाद भी लडकियां अपने मां-बाप का ख्याल रख सकें. छम्मकछल्लो की मां भी कमाती थीं. उसके नाना मास्टर थे. तब मास्टरों के कमाई की आज के लोग सोच भी नहीं सकते थे. नाना को पेंशन नहीं मिलती थी. मामा पैसे नहीं भेजते थे. मां हर महीने मात्र 75 रुपए भेजती थी. इसके लिए भी हर माह वह इतना विरोध झेलती कि उस 75 रुपए के लिए उन्हें शायद 75 बार आंसू बहाने पडते थे. वह एक ही बात कहती कि क्या बेटी का अपने मां-बाप के लिए इतना भी कर सकने का अधिकार नहीं.

आज उनकी आंखों में तीन तीन बेटियों की मां होने का गर्व है और छम्मकछल्लो उस गर्व की ली हवा में बांसुरी की तरह बजना चाहती है. बस, भविष्य भी उन्हें यह गौरव देता रहे. आपके पास भी ऐसी बेटियां होंगी, उनकी ऐसी ही कहानियां होंगी. बांटिए ना उन्हें हम सबके साथ कि बेटियों के मा_बाप होने के गौरव से आकाश पट जाए, धरती हरी-भरी हो जाए, हवा में सुरीली खनक भर जाए! आखिए धान का बीज़ हैं बेटिया! सुनहली, खनकती, झनकती, फलसिद्धा बेटियां!  

Saturday, April 24, 2010

सरकारी अधिकारी के ताब? बाप रे बाप!

सरकारी नौकरी के बडे नखरे हैं भाई! छम्मक्छल्लो भी कभी सरकारी नौकरी में थी. मगर तब वह छोटी थी, उसे समझ में नही आते थे ये नखरे या उसे करना नहीं आता था. यह अनभिज्ञता अभी तक बरकरार है. ख़ुदा करम करें कि यह बनी रहे.
छम्मक्छल्लो अभी भोपाल गई थी. वहां उसकी पहचान के एक कहानीकार हैं. नाम है, इनाम है, इकराम है, सभी बडे साहित्यकार उन्हें जानते हैं, पहचानते हैं, मानते हैं, इसलिए बड़ी भी हैं. सभी बडी पत्रिकाओं में छपते हैं, सभी बड़े  प्रकाशक उन्हें छापते हैं. देश से विदेश तक सभी उन्हें पुरस्कारों से नवाज़ते हैं. तो यह छम्मक्छल्लो  का सौभाग्य ही था कि ऐसे लोग उसे ना केवल सम्मान देते थे, बल्कि उसे बहन भी कहकर बुलाते थे. छम्मक्छल्लो की आदत का क्या कहिये कि किसी ने किसी को बहन बोल दिया तो बस जी, उसमें और अपने सगे भाई में वह कोई फर्क़ ही नहीं कर पाती. इस चक्कर में वह कैयों से धोखा भी खा चुकी है, एकदम फिल्मी स्टाइल में. एक भाई ने एक लडकी को न केवल बडी दीदी कहा, बल्कि छम्मकछल्लो के सामने सालो-साल उससे राखी बन्वाता रहा. छम्मक्छल्लो  उनके इस भाई-बहन के प्यार पर बलिहारी जाती रही कि अचानक उसने सुना कि वे दोनों शादी करने जा रहे हैं. जी, पुरानी बात है, मगर आज का यथार्थ यह है कि वे अब पति-पत्नी हैं. ऐसे बहुत से हादसे हुए हैं उसके साथ.
यह भी एक हादसा ही था. छम्मक्छल्लो  हाल ही में भोपाल गई ठीक अपने इसी ब्लॉग के लिए यूएनएफपीए-लाडली मीडिया अवार्ड लेने के लिए. हमेशा की तरह उसने लपक कर अपने उस लेखक भाई को फोन किया, उत्साह से अपने आने का कारण बताया, आने का अनुरोध किया. तो जी, स्वर में ऐसा ठंढापन कि जाने किस कम्बख्त ने फोन कर लिया. आने की बात पर कहने लगे कि "अब मैं ऐसा-वैसा तो हूं नहीं कि जो जहां भी कहे, बुलाए, मैं सडक छाप कवियों की तरह मुंह बाए चला जाऊं." छम्मक्छल्लो की समझ में नहीं आया कि वह इस बात पर क्या प्रतिक्रिया दे? आखिर यह एक सम्माननीय कार्यक्रम था और मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री इस पुरस्कार को देने आनेवाले थे.
लेकिन तभी छम्मक्छल्लो के ध्यान में यह बात आई कि अब उस पर सरकारी अधिकारी के रुतबे का तमगा लग चुका है. यह तमगा अपना मन, मिजाज़, बोली, भाव सब बदल देता है. अगर आप भी इस श्रेणी में हैं तो बधाई आपको. कभी याद कीजिए कि क्या आपके इस व्यवहार से कभी किसी का जी दुखा है? अगर अभी तक इस साए से बचे रहे हैं तो भगवान ही मालिक है आपका. लोग तो कहेंगे ही कि देखी लो जी, अफसर भी बन गए और गऊ के गऊ ही बने रहे.

Friday, April 23, 2010

सरकारी अफसर हैं तो क्या हुआ?

सरकार भी न! अजीबोगरीब कायदे-कानून बनाती रह्ती है. एक नियम बना कर पाबंदी लगा दी कि सरकारी नौकरियों में अधिकतम दो बच्चों को ही जन्म दिया जा सकता है. पाबंदी इस अर्थ में कि इन नौकरियों को करनेवाले कर्मचारियों को सरकार की ओर से दी जानेवाली सुविधाएं केवल दो बच्चों तक ही सीमित रहेंगी. मगर हमारे लोग बडे उदारमना हैं. वे दो संतान से खुश नहीं होते. सात-आठ भाई-बहनोंवाले देश के लोगों से आप दो की संख्या पर ही खुश होने को कहते हैं? जैसे सात-आठ रोटियां खानेवाले से आप दो रोटियों में ही संतुष्ट हो लेने को कहें. लेकिन लोग सरकार की बात मानते हैं. आखिर नौकरी का सवाल है. इसलिए दो पर खुश रहने की कोशिश करते हैं, अगर वे दोनों अगर बेटे हों. मगर ईश्वर की नाराज़गी से अगर दोनों संतानें बेटियां हो गईं, तब तो मरने के किनारे तक भी आपका निस्तार नहीं, कुछ इस लोकगीत की तरह कि “ऐ बांझिन, तेरी तो मौत में भी मुक्ति नहीं”. दो बेटियों की मां होना बांझ से कमतर नहीं.
तब लोग सरकार को और उनके नियम, कायदे, कानून को भी धता बताने से बाज नहीं आते. बेटे की इस चाहत के पीछे शिक्षित- अशिक्षित का कोई भेद-भाव नहीं. छम्मकछल्लो का मन प्रसन्न हुआ कि चलो, इसमें तो कम से कम पढे-अनपढ का कोई भेद-भाव नहीं. आखिर कुल का नाम सभी को रोशन करना है. सभी को अपना अंतिम संस्कार अपने बेटे से करवाना होता है.
छम्मकछल्लो एक बहुत बडे अधिकारी के पास बैठी हुई थी. बडे अधिकारी अपने एक अपेक्षाकृत कम उम्र के अधिकारी से मिल रहे थे. स्नेहवश पूछ लिया कि “कितने बाल-बच्चे हैं?” उसने जवाब दिया कि “दो बेटियां हैं.” देश में मुफ्त के सलाहकार भरे पडे हैं. सो इन्होंने तपाक से सलाह दे डाली कि “भाई, दो बेटियां हैं. समाज, घर सभी ताने दे-देकर मार देंगे. एक बेटा पैदा कर लो. यू आर स्टिल यंग. डोंट लूज अपोर्चुनिटी.” वह बिचारा कहने लगा कि “हमारे घर में ऐसा कोई भेद-भाव नहीं है.” तो वे तपाक से कहने लगे कि “अरे, नहीं है तो क्या हुआ? गांव-घर तो जाते होगे ना! वहां तो लोग सुनाते ही होंगे ना. और तुम्हें क्या! तुम तो आदमी हो. सुनाते तो होंगे तुम्हारी पत्नी को. सोचो, बेचारे कैसे यह सब सहती होगी? और इतना कमाते हो. सपोज कि तीसरी अगर फिर से बेटी ही हो गई तो पाल लेना. इतने तो पैसे मिलते हैं.”
आप अगर बेटियों के समर्थक हैं तो सर धुनते रहिए. छम्मकछल्लो भी बेटे के ना होने का अफसोस आजतक सुनती है, जब गांव घर जाती है. लेकिन अगर लोग यह कहें कि कौआ कान लेकर उडा जा रहा है तो कौए के पीछे भागें कि अपने कान देखें? भई, ऐसी क्या खराबी है बेटी में? आपके ही जिगर का तो अंश है वह भी? उसके हाथ का खाते-पीते हैं कि नहीं? तो उसके नाम से कुल खानदान चल गया या उसने हमें मुखाग्नि दे दी, तो कौन सा ज़ुल्म हो गया? हर बात के लिए सरकार को कोसनेवाले हम क्या कभी अपने-आपको कोसने की ज़हमत उठाएंगे? सरकार तो नियम-क़ायदे-क़ानून ही बना सकती है. लेकिन उसे मानेंगे तो हम ही ना! यह प्रजातांत्रिक देश है तो हम सभी अपने अपने स्तर पर सरकार और व्यवस्था हुए कि नहीं? अगर नहीं तो कीजिए तीसरी-चौथी संतान पैदा. कहनेवाले तो इसके लिए भी दलील दे ही देते हैं कि “भई, यही संतान तो अपनी है, बाकी दोनों तो सरकारी हैं.” छम्मकछल्लो के कई सहकर्मी यही दलील दे-देकर तीसरी संतान पैदा कर चुके हैं. संयोग से उनकी वह तीसरी संतान बेटा हुई. बेटी होती तो शायद चौथी की भी सोच लेते. और मन में कोई मलाल मत लाइए. जी हां, ये इस देश के पढे-लिखे लोगों के विचार और कार्य हैं. सरकार अगर इससे दुखी होकर पढने-लिखने की योजना पर कुठाराघात करने लगे तो? तो फिर ये पढे-लिखे ही सरकार की लानत-मलामत उठाने से बाज़ ना आएंगे. आखिर क्या करे सरकार?

Wednesday, April 21, 2010

मि जिन्‍ना : मंच पर एक राजनीतिक त्रासदी

http://mohallalive.com/2010/04/21/a-criticism-on-mr-zinna/

इतिहास से उठाकर जिन्ना को देखिए – एक बाप के रूप में, एक पति के रूप में, एक भाई के रूप में और इन सबसे ऊपर एक व्यक्ति के रूप में। व्यक्ति की अपनी अभिलाषा जब लोकहित को लांघ जती है, तब जिन्ना जैसे व्यक्तित्व का उदय होता है और तब देश को, उपनिवेश को, विश्व को विभाजन, दंगे, हत्या, लूटपाट जैसी मानव निर्मित त्रासदी से गुजरना पड़ता है। हिंदुस्तान-पाकिस्तान आज जिन्ना जैसे लोगों की जिद का नतीजा है और आज पूरा विश्व इसकी त्रासदी को झेलने को मजबूर है।

एक ही व्यक्ति पर पूरे हालात का ठीकरा फोड़नेवाली मानसिकता में इस पर भी गौर किये जाने की जरूरत है कि क्यों एक व्यक्ति अपनी उदारता और तरक्कीपसंद बातें छोड़ कर इतना कट्टर हो जाता है कि उसके आगे कोई राह ही नहीं बच पाती है। सामने बन रही तस्वीर के पीछे हालात और लोगों के कौन कौन से रंग भरे जा रहे हैं, इन पर अब नये सिरे से विचार किये जाने की जरूरत है।

शायद इन्हीं सबको ध्यान में रखकर डॉ नरेंद्र मोहन ने “मि जिन्ना” नाटक लिखा। इसमें जिन्ना की जिद के साथ साथ उसके व्यक्तित्व के अलग और अनछुए पहलुओं को देखने की कोशिश की गयी है। बताया गया है कि कांग्रेस के हठ ने किस तरह से गांधी को भी अलग-थलग कर दिया। नागपुर अधिवेशन में मिले अपमान की आग में जलते हुए जिन्ना जिद्दी बने तो उस जिद की ज्वाला में तत्कालीन दूसरे नेताओं ने आग में घी का काम किया और वे सब भी अपनी अपनी महत्वाकांक्षा की आग में जलते हुए देश को ही सांप्रदायिकता और अब कभी न खत्म होनेवाली नफरत की आग में झोंक दिया।

“मि जिन्ना” का मंचन दिल्ली के अस्मिता थिएटर द्वारा किया जानेवाला था, मगर ऐन वक्‍त पर इस पर बैन लग गया। नाटक चर्चित हो गया। बैन के ये अपने फायदे हैं। अभिव्यक्ति के खतरों पर फिर से बहसें शुरू हुईं और उसके बाद सब कुछ शांत पड़ गया। मगर 2007 में हिंदी थिएटर के सुप्रसिद्ध निर्देशक आरएस विकल ने इस नाटक में सम्भावित तमाम खतरों को जानते हुए भी इसके मंचन की सोची और “विराट कलोद्भव” के बैनर से इसे मुंबई में मंचित किया। तीन-चार प्रायोगिक मंचन के बाद फरवरी, 2008 में मुंबई के कालाघोड़ा फेस्टिवल में इस नाटक की शानदार प्रस्तुति हुई। इसके बाद एकाध और प्रस्तुति के बाद अभी विगत 4 अप्रैल, 2010 को इंदौर के सामाजिक मंच “सूत्रधार” के सौजन्य से यहां के माई मंगेशकर हॉल में ‘मि जिन्ना’ के दो शो हुए।

हम आपको बता दें कि मि जिन्ना न तो राजनैतिक नाटक है, न ऐतिहासिक। यह उस व्यक्ति के मनोविज्ञान को गहराई से समझने का प्रयास है, जिसने अपने वक्‍त में इस भारतीय महाद्वीप को हिला कर रख दिया था। जिन्ना न तो नायक थे और न ही खलनायक, बल्कि वे ऐसी शख्‍सीयत थे, जो अपने ही विचारों के शिकार बनते चले गये।

अपने प्रायोगिक मंचन के लिए प्रसिद्ध आरएस विकल ने तरह तरह के बिंब के जरिये इस नाटक को अदभुत रूप देने का सफल प्रयास किया। बिना किसी विशेष मंचीय तामझाम, वेश-भूषा और संगीत के यह नाटक अपने बिंबों के माध्यम से अपनी बात कहने में सफल रहा। 110 मिनट के नाटक में उन सभी पहलुओं को सामने लाने की कोशिश की गयी, जिसके कारण विभाजन और फिर दंगे हुए। नाटक का जोर सेट अप और गेट अप पर बिल्कुल ही नहीं था, यह कहना गलत होगा। दरअसल एक नये प्रयोग के कारण नाटक को ऐसा फॉर्म दिया गया था, जिसमें कलाकार का काम, उसके संवाद, उसकी पोशाक, उसके हाव-भाव एक डिजाइन के रूप में सामने आएं और अपनी बात असरदायक तरीके से कह जाएं।

इसका एक प्रमुख निर्देशकीय कथ्य यह भी रहा कि हम कैसे एक व्यक्ति को अपना सब कुछ मानकर उसके हाथों में अपने जीवन की बागडोर थमा देते हैं और उसके हाथ की कठपुतली बनने को विवश हो जाते हैं। मूर्तिपूजा का यह रूप आज तो और भी भयंकर रूप में चल पड़ा है। नायक, महानायक का चोला पहिना देनेवाला समाज खुद ही यह नहीं समझ पाता है कि कैसे अब इस मकड़जाल से बाहर आया जाए। नाटक में छतरी का अनूठा प्रयोग किया गया। गांधी को सफेद और फातिमा को हरी और जमशेद को लाल छतरी देकर उसे नये प्रतीक में बांधने की कोशिश की गयी।

बावजूद इसके, इस नाटक की अपनी सीमाएं रहीं, जो इसकी लेखकीय सीमाओं के साथ जुड़ता है। इतिहास गांध, जिन्ना, नेहरु, पटेल और जिन्ना की बेटी दीना को भी जानता है, इसलिए उनके चरित्रों को समझने में उन्हें आसानी हुई। मगर नाटक के दो प्रमुख किरदार – जिन्ना की बहन फातिमा और जिन्ना के दोस्त जमशेद के साथ दर्शक संबंध स्थापित नहीं कर पाते हैं। बहुत कम लोगों को शायद मालूम हो कि फातिमा की अपनी ख्वाहिश एक इस्लामिक स्टेट बनाने की रही और इसके लिए उसने जिन्ना का इस्तेमाल किया। यहां तक कि उसके लिए उसने जमशेद का भी त्याग कर दिया। मगर नाटक में फातिमा को एक नाराज, गुस्सैल, तुनकमिजाज, ईर्ष्यालु, कुटनी महिला के इतने नकारात्मक किरदार में दिखाया गया है कि बालाजी के सीरियल्स याद आने लगते हैं। लगता ही नहीं कि वह महिला इतनी कंपोज्ड रही होगी कि उसने एक देश के भीतर एक दूसरा देश बनवा दिया। वह भी एक कौम विशेष की खातिर। चूंकि इतिहास में भी फातिमा पर बहुत अधिक नहीं मिलता, नाटक में उसके स्वरूप का कुछ खुलासा ही नहीं हो पाता। जमशेद, जिससे फातिमा प्रेम करती है, उसके प्रति भी वह सहज नहीं है और केवल उसके बल पर आगे बढ़ने के ख्‍वाब देखती है। उससे पेंटिंग के मार्फत की जानेवाली और की जा सकनेवाली कमाई की बात पूछती है। सवाल यह है कि अगर उसका चरित्र इतना नकारात्मक है, तो उसे इस नाटक में जगह देने की जरूरत ही क्यों है, जबकि यह भी खुलासा नहीं हो पाता है कि वह पाकिस्तान बनवाने के लिए कितनी मरी जा रही थी?

यही स्थिति जमशेद के साथ है। जिन्ना का वह जिगरी दोस्त, जिसके लिए जिन्ना पाकिस्तान बन जाने के बाद आर्ट, कल्चर सेंटर खुलवा देने की बात करता है, दर्शकों के साथ एक अभिनेता के रूप में तो पहचान लिया जाता है, मगर जमशेद के रूप में अपना संवाद स्थापित नहीं करवा पाता। नतीजन, दर्शक जमशेद या फातिमा के चरित्र को याद ही नहीं रख पाते। यह ऐतिहासिक रचनाओं की अपनी सीमाएं होती हैं, जिनमें दर्शक या पाठक परिचित चेहरे ही पहचान पाते हैं।

फिर भी यह नाटक दर्शकों में एक उत्सुकता पैदा करता है और उस समय के भारतीय नेताओं को कठघरे में ला खड़ा करता है। अब वह वक्‍त आ गया है, जब इतिहास के इन भयंकरतम भूलों को लोग फिर से देखें, समझें और अपने पूर्वग्रह से मुक्त हो कर नये सिरे से इस पर चर्चा करें और धर्म और मजहब, जात-पात से ऊपर उठकर प्रेम और सौहार्द्र की बोली भाषा समझे।

नाटक का जो डिजाइन था, उसमें इसके सभी पात्र एक सम भाव से, पूरे समन्वय के साथ इस नाटक के साथ जुटे रहे। अपने किरदार की वजह से जिन्ना के रूप में हर्ष प्रसाद, गांधी के रूप में सतीश ठाकुर और दीना के रूप में श्रुति वैद्य दर्शकों का ध्यान खींच सके। सबसे अधिक सराहना मिली बदरु का चरित्र निभा रहे सुबोध श्रीवास्तव को, जो एक आम आदमी के रूप में इस तरह की तमाम ज्यादतियों का शिकार होता है।

Saturday, April 17, 2010

"लाडली मीडिया अवार्ड "- chhammakchhallokahis.blogspot.comको


आए हाए हाए! बहुत दिन बाद छम्मकछल्लो आपसे मुखातिब है. अरे बस यूं ही, एक जान दिल जहान! सब कुछ कर लेने की ख्वाहिश! पता है ना कि एक ही जनम है, सो उसी में भरपूर जी लेने की चाहत! अभी दो-दो नाटक "बिम्ब-प्रतिबिम्ब" और "मि. जिन्ना" में लगी थी. जेलों में थिएटर वर्कशॉप कर रही थी. कॉर्पोरेट हाउसेस में विकासात्मक प्रशिक्षण कार्यक्रम ले रही थी.  

बस जी, ज़्यादा नहीं. महीने भारत की ही तो चुप्पी ! इस ब्लॉग पर मुखातिब नहीं रही. मगर ब्लॉग चर्चा में रहा. याद आता है, "बेटियों का ब्लॉग" पर 31/3/2008 को पोस्ट किया गया एक पोस्ट. और उस पोस्ट से शुरु  हुई "लाडली मीडिया अवार्ड " की कहानी. उस साल के लिए "बेटियों का ब्लॉग" को  "लाडली मीडिया अवार्ड " मिला. इस बीच छम्मकछल्लो के इस ब्लॉग पर वह जो भी लिखती रही, उसे आप सबने बडे ज़ज़्बात से लिया और उसका नतीज़ा रहा, वर्ष 2009-10 का "लाडली मीडिया अवार्ड ". इसे 14 अप्रैल, 2010 को भोपाल में मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान और भोपाल की मेयर श्रीमती कृष्णा गोर के हाथों प्रदान किया गया. प्रशस्ति पत्र ज्यों का त्यों आपके सामने प्रस्तुत है- 

In recognition of her efforts to question gender issues through her blog using humour and satire 

"In her blog on "chhammakchhallokahis.blogspot.com", Vibha Rani draws excellent analogies and anecdotes from mythology and raises thought provoking questions related to women's status in society. 

for her satirical style and use of humour on contemporary gender issues, Vibha Rani is awarded The UNFPA-Laadli Media Award for Gender Sensitivity 2009-10

Laadli is Population First's Girl Child Campaign that addresses an important social issues- the bias against the girl child which makes her unwelcome in many families.  The UNFPA-Laadli Media Award for Gender Sensitivity were instituted by Population First to highlight, acknowledge and celebrate the commendable efforts by various media at providing gender just perspectives portayals and analysis.

अच्छा लगा कि "बेटियों का ब्लॉग" के लिए भी छम्मकछल्लो के लेख का आधार मिला और अब इस ब्लॉग को इस अवार्ड के लिए चुना गया. कहना ना होगा कि इसे इस मंज़िल तक पहुंचाने में आप सबका बहुत बडा योगदान रहा है. मज़ेदार बात यह रही कि कई लोगों ने कहा कि हमें यह लगता रहा कि यह कोई ghost writing यानी छद्म लेखन है, क्योंकि विषय को जिस बोल्डनेस से उठाया गया है, वह किसी महिला के बस की बात नहीं. फिर से महिलाओं की कूव्वत पर सवाल! भाई, लोग बडे से बडे काम कर जाते हैं, हम उस पर लिख दें, तो .......! छम्मकछल्लो का तो सुभाव ही है बेदिली से दिल की तह तक जाना. दिल की तह तक की यह राह रपटीली है तो वह क्या करे!