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छम्मकछल्लो की दुनिया में आप भी आइए.

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Thursday, January 27, 2011

धर्म ही ना हुआ तो जियेंगे कैसे साल के 365 दिन ?


मांगिए मांगिए, साल के 365 दिन को राष्ट्रीय पर्व घोषित करने की मांग कीजिए. मांगने में क्या जाता है? मांगने का मतलब यह थोडे ना है कि मिल ही गया. हमारे पास मुद्दे हैं नहीं. मुद्दे तो वैसे देश में बहुत हैं, भूख, गरीबी, गुंडागर्दी से लेकर बेरोजगारी, भाषा, संस्कृति, नीति, ईमानदारी और पता नहीं क्या क्या? मगर ये सब स्थाई मुद्दे हैं, इतने कि मुद्दे बदल कर मुर्दे हो गए हैं. मुर्दे से एक दिन का प्रचार मिल सकता है, स्थाई नहीं. संत भाव से काम करनेवाले पर प्रेस और मीडिया कभी कभार मेहरबानी करते हुए उस पर दो चार लाइन लिख देता है. मगर देखिए, अगर कोई किसी को मार दे, छेड दे, हत्या कर दे, नंगा कर दे, रेप कर दे तो कितने कितने दिन तक वह खबरों के केंद्र में रहता है. महसूस कर रहे हैं न?
एक नेता जी ने कहा कि उनके यहां का एक स्थानीय पर्व अब राष्ट्रीय पर्व का रूप लेता जा रहा है, क्योंकि स्थानीय लोग देश भर में रहते हैं. पहले पर्व अपने मन, भाव, घर की शुद्धि और बाल बच्चों के कल्याण के भाव से किया जाता था. अब वह माइलेज के लिए किया जाता है. नेताओं को पता होता है कि उनकी बात लोग सुने ना सुने, प्रेस और मीडिया ज़रूर सुनता है, इसलिए वे सुनाते हैं. प्रेस और मीडिया सुनता है,.
छम्मकछल्लो आनंद में आ गई. पर्व त्योहार प्रधान देश में ये सब मांगें बिलकुल जायज हैं. धर्म ही ना हुआ तो जियेंगे कैसे? धर्म अफीम है और इसकी पिनक में रहना ज़रूरी है. राज, व्यवस्था, जनता चाहे भाड में जाए.
छम्मकछल्लो को दुख है कि साल में 365 दिन ही क्यों हैं? 730 दिन क्यों नहीं? 365 दिन तो कम पड गए हैं दिवस मनाते मनाते. दिन की तंगी के कारण एक दिन में कई-कई पर्व, त्योहार, समारोह मनाने पडते हैं. दिन की महत्ता एक दूसरे के ऊपर चढ बैठती है. ताकतवर की बात ऊपर आ जाती है. कितने लोगों को याद रहता है कि 2 अक्तूबर को शास्त्री जी भी पैदा हुए थे? . छम्मकछल्लो को दिन की कमी पर दया आती है. वह सभी को सलाह देना चाहती है कि मांगना ही है तो 365 से कम से कम दूना 730 दिनों का साल मांगिए, ताकि अपने सभी राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय, घरेलू, मोहल्ले और घर विशेष के भी सभी पर्व त्योहारों को राष्ट्रीय पर्व मान लिया जाए. जितने पर्व, उतने अवकाश. काश कि साल के सभी 365 दिन अवकाश रहते. कितना मज़ा आता, घर बैठे ही तनख्वाह मिलती रहती. दफ्तर आने जाने की किच किच से छुट्टी. इसलिए हर दिन एक त्योहार घोषित कीजिए सार्वजनिक अवकाश की मांग भी कीजिए. अवकाश मिले ना मिले, नाम तो मिलेगा न!

Monday, January 24, 2011

50 पैसे के नीचे का सपना खाक खाक़!

डॉलर प्राइस की तरह हरेक माल साढे छह आना. दुकानदार का गाना-रिझाना- “हरेक माल साढे छह आना, बच्चा के खिलौना साढे छह आना, घरनी की कडाही साढे छह आना, झूम झूम के ले जाना, बहिया हमरे, भूल न जाना, ओ भौजी मोरी याद दिलाना.” एक रुपया में दस सेर दूध. एक रुपैया में बीस सेर बैगन. पांच पैसा में भर पेट मूढी कचरी, दस पैसा में चांद जैसा नारियल का टुकडा. चार आना में भर पेट पूरी जिलेबी. दस रुपैया में बढिया सूती साडी. सोना डेढ सौ रुपए में 1तोला, सौ रुपए में ब्याह में चढाने  लायक बनारसी साडी. आपको क्या लगता है? कोनो मजाक? नहीं भाई, छम्मकछल्लो ई सब अपने बचपन की बात बता रही है. बहुत बूढी भी नहीं हुई है.
तीसरी क्लास में स्कॉलरशिप मिला था उसको. 6 रुपिया महीना के हिसाब से 72 रुपिया. छात्र का दस्तखत ज़रूरी था. छम्मकछल्लो को बुलाया गया. छम्मकछल्लो ने अपनी प्रिंसिपल मां से पूछा, “हमको पैसा मिल रहा है ना?” मां हंस पडी. छम्मकछल्लो लाड लडाती बोली-“हमको भी इसमें से चाहिये. आखिर ई हमारा पैसा है.”
मां को भी हंसी सूझी- “बोलो, कितने चाहिये?”
छम्मकछल्लो मुश्किल में पड गई. हिसाब लगाया, 3 पैसे में भर फ्रॉक मूढी और एक कचरी (दाल वडा). 5 पैसे में उससे भी अधिक मूढी और दो कचरी. 10 पैसे में मूढी कचरी के साथ दो झिल्ली भी. 25 पैसे में तो इन सबके साथ कच भी या दाल भर की दो पूरियां और आलू दम. उसके साथ एक जिलेबी भी. वह सब मन ना हो तो 25 पैसे में चार रसगुल्ले. या एक समोसा और एक रसगुल्ला या एक खीर कदम. या 10 पैसे में नारियल का एक बडा सा टुकडा और एक ठोंगा मूंगफली. इतनी सारी चीज़ें तो 25 पैसे में ही आ जाती हैं. तो वह मां से कित्ते पैसे मांगे. उसकी कल्पना का विस्तार इतना हो गया कि वह अकसक हो गई. अगर इतना सब केवल 25 पैसे यानी चार आने में मिल जाता है तो आठ आने में? छम्मकछल्लो की सांस ऊपर की ऊपर और नीचे की नीचे रह गई. उसने बडे सहमते और घुटकते हुए मां से कहा, ”आठ आना”. मां फिर हंस पडी.
छम्मकछल्लो उस अठन्नी को बहुत दिन तक सहेज कर रखे रही. उसकी समझ में ही नहीं आ रहा था कि वह इत्ते सारे पैसे का करे क्या?
हाल में छम्मकछल्लो ने अखबार में पढा कि 50 पैसे के नीचे के सिक्कों की वैधता अब रद्द कर दी जाएगी. छम्मकछल्लो को गहरा धक्का लगा. इन पैसों की वैधता रद्द होने से नहीं, अपने जिए हुए पलों की ज़िंदगी खतम हो जाने से. आगे आनेवाली पीढी क्या समझ पाएगी एक पैसे, दो पैसे, तीन, पांच और दस पैसों का मोल? चार आने में पूरा मेला घूम आने का उत्साह! क्या करें! मंहगाई तो जान मार ही रही है, व्यवस्था भी हम आम आदमी के आम सपनों और यादों को जीवित नहीं रहने दे रही. "मोरे सैयां तो खूब ही कमात है, मंहगाई डायन खाए जात है."  

Sunday, January 23, 2011

बेटियां पछुआ हवा

अरविंद जी की कविता पर और भी कविताएं बेटियों को लेकर आई हैं. एक-एक करके उन्हें दे रही हूं. लल्लू जे ने यह कविता भेजी. उनका परिचय मैं खोज नहीं पाई. कम्प्यूटर के अपने अल्प ज्ञान के कारण. मेरा आभार उन्हें. आप सबके पास भी हैं तो भेजें, या लिंक दें.

बेटियां पछुआ हवा हैं. 
बेटियां जैसे दुआ हैं
फूल जैसी पांखुरीं हैं
कुह कुहाती बांसुरीं है
बेटियां फूलों का गहना है,
बैटियों ने दर्द पहना हैं
बेटियां खिल खिल हंसाती हैं
बेटियां बेहिस रुलातीं हैं
बेटिया हंसतीं हैं गातीं है.
बेटिया घर छोड़ जातीं हैं.
बेटियों का पर्स बाबुल कैसे भूले
हाथ का स्पर्श बाबुल कैसे भूले
आप तुम का फर्क बाबुल कैसे भूले
पंचमी का हर्ष बाबुल कैसे भूले
बेटियों से हीन घर में
मेरे बेटों से ब्याह कर
घर में आती बेटियां हैं
जिसको गोदी में झुलाया
जिसको आखों में बसाया
जिसको ना इक पल भुलाया
उसको अपने साथ लेकर
दूर मुझसे,
घर बसाती बेटियां हैं.
मैं तो ससुरा हूं, मुझे मालूम है क्या
बेटियों की पीर है क्या? पर पता है 
बेटियों के बाप जो सहते हैं पीड़ा
मैं भी उसको सह रहा हूं
बस यही मैं कह रहा हूं
बेटियां बेहिस रुलातीं हैं
बेटिया घर छोड़ जाती 


Saturday, January 22, 2011

फकत बेनामी सी होती है बेटियाँ


आज "औरत होने की सज़ा पर अरविंद जैन की ये लाइनें देखीं, इसमें लक्ष्मी जी ने भी अपनी लाइन जोड दी हैं. अरविंद जी जाने माने एडवोकेट हैं और बहुत सही कानूनी सलाह देते हैं. बहुत कम लोग हैं इस तरह के प्रोफेशन में, जो हिंदी में भी उतनी ही सम्वेदनशीलता से सामने आते हैं. उनकी अनुमति से उनकी ये लाइनें दे रही हूं. ये लाइनें यहीं पर नहीं रुकेंगी. आप सब भी अपनी लाइनें यहां दे सकते हैं. 

कभी धरती कभी आसमान सी होती है बेटियाँ
कभी नामी, कभी सुनामी सी होती हैं बेटियाँ
देती है जन्म धरती आसमाँ के नाम को,
फिर भी फकत बेनामी सी होती है बेटियाँ
(
साभार लक्ष्मी जी)
कोख से कब्र तक, खामोश ओ तन्हा सफ़र
कभी फ़र्ज़ सी कभी क़र्ज़ सी होती हैं बेटियाँ
समय की रेत पर, ता-उम्र नंगे पाँव चलती
कभी धूप सी कभी छाँव सी होती हैं बेटियाँ
जब कभी माँ-बाप रोते हैं अकेले में
कभी सीता, कभी गीता सी होती हैं बेटियाँ
अपने हक ओ इन्साफ की लड़ाई में
कभी अम्बा, कभी चंबा सी होती हैं बेटियाँ
अरविंद जैन. 

Friday, January 21, 2011

मूरख! अंतर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय सम्मान ऐसे थोडे ना मिलता है!

छम्मकछल्लो खुश है. उसे एक कहावत याद आ गई-‘बदनाम हुए तो क्या नाम न होगा?” छम्मकछल्लो का भी नाम है, यह जानकर वह और भी खुश है. इतना नाम कि उसे सम्मानित करने का प्रस्ताव आ गया. साहित्यकारों को सम्मानित करने की बात पर उसे बाबा नागार्जुन का कथन याद आता है- ‘जब मुंह में दांत और पेट में आंत थे, तब किसी ने नहीं किया सम्मानित. अब मुंह में न दांत है और पेट में न आंत, तो सभी सम्मानित कर रहे हैं.
छम्मकछल्लो भी उसी उम्र के इंतज़ार में थी कि बीच में ही उसे सम्मानित करने का प्रस्ताव आ गया. मन हुआ, कहे, “अभी तो उसके मुंह में दांत भी है और पेट में आंत भी. तो सम्मानित कैसे कर रहे हैं?” मगर लगा कि जब टीवी और फिल्म में मां और सास अपने बेटे बेटी और बहू की बडी बहन जैसी उम्र की होने लगी है, तो शायद यह अभिनव परिवर्तन साहित्य के क्षेत्र में भी हो गया होगा. भरी जवानी में (साहित्य में 50 की उम्र जवान ही है) कोई तुझे सम्मानित करा रहा है तो करा ले ना मूरख.”
सज्जन ने फोन किया- “मैथिली के इस अंतर्राष्ट्रीय मंच पर हम आपको सम्मानित करने जा रहे हैं. सहमति दीजिए.”
सहमति सोने का सिक्का तो है नहीं. दे दी.
“नाम लिखवा दीजिए, स्पेलिंग मिस्टेक ना हो.” चलो जी, लिखवा दिया.
“ठीक है, आप इस जगह पर आ जाइयेगा.”
छम्मकछल्लो ने निर्लज्जता से पूछा-, “समारोह स्थल पर वह खुद से पहुंच जाएगी, मगर चेन्नै से मुम्बई तक वह कैसे जाएगी?” सज्जन ने भी उतनी ही निर्लज्जता से कहा कि यह हमारी व्यवस्था में नहीं है.
यह अंतर्राष्ट्रीय मंच है. अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपने द्वारा सम्मानित करनेवालों के लिए उनके पास कोई व्यवस्था नहीं है. सज्जन ने साफ किया, “हमेंलगा कि आप मुंबई में हैं.”
छम्मकछल्लो खुश है उनकी साफगोई पर. कई तो कह देते हैं, “आ जाइये, हम देख लेंगे.” बाद में सहमति का वह ‘देख लेना’ असहमति और असम्मान का झोलंगा बन जाता है. छम्मकछल्लो के साथ कोलकाता में कुछ साल पहले ऐसा हुआ, जब उसके नाटक “पीर पराई” के मंचन के समय उसे सादर(?) बुलाया गया, हवाई जहाज से. आजतक किराए का भुगतान हो रहा है.
सम्मान का यह नज़ारा हर जगह है. एक राजभाषा सम्मान समारोह में आयोजक ने लगभग सभी को सम्मानित कर दिया. शॉल कम पड गए. उन्होंने सम्मानित किए व्यक्तियों के बदन के शॉल ले ले कर दूसरो को सम्मानित कर डाला. फोटो में सब आ गए. सम्मान करनेवाला भी खुश, सम्मान पानेवाला भी खुश. राजभाषा सम्मान के दूसरे आयोजक कहते (अघोषित) हैं, “प्रथम द्वितीय, तृतीय पुरस्कार आपके बैनर/विज्ञापन राशि के आधार पर दिया जाता है. जितना बडा विज्ञापन, उतना बडा इनाम.
हिंदी के एक कवि अपने ही नाम से अखिल भारतीय स्तर (?) का पुरस्कार देते हैं. पुरस्कार राशि अभी भी सौ के आंकडे में है, सम्मान पाने की शर्त है, “आपको मुंबई अपने खर्चे से आना-जाना, रहना, खाना है. न आने की स्थिति में पुरस्कार डाक से भेज दिया जाएगा.”
एक तथाकथित अंतर्राष्ट्रीय फोरम है, सभी से Who is who? की जानकारी लेते हैं. बडे भव्य तरीके से छापने की गौरव गाथा बयान करते है और साथ में एक अच्छी खासी राशि अमेरिकी डॉलर में मांगते हैं. लोग देते भी हैं, अकह्बारों में फख्र के साथ छपाते हैं कि उनका नाम इस संस्था के लिए चयनित हुआ है.
हमारे भीतर भी शर्म नहीं है और हमारी निर्लज्जता का फायदा ये उठाते हैं. हम ऐसी जगहों पर भी अपनी प्रविष्टियां भेजते हैं, सम्मानित होने की ललक में दौडे चले आते हैं. उनके नौ की लकडी में अपने नब्बे खर्चते हैं. आयोजकों के मज़े हैं- “हर्र लगे ना फिटकिरी, रंग चोखा आए.”
छम्मकछल्लो अहमक है, मूर्ख है. उसने आयोजक के चोखे रंग में रंगने से इंकार कर दिया. पर उसे पता है, आयोजक किसी और मुल्ले को पकडेंगे, वे जाएंगे, सम्मानित होंगे, सम्मान की अपनी फोटो अपने ही कैमरे या मोबाइल से खिंचवाएंगे, उसे अपने ड्राइंगरूम में लगाएंगे, उसका जगह जगह बखान करेंगे. आखिर को सम्मानित हुए हैं भाई! अंतर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय सम्मान ऐसे थोडे ना मिलता है!

Thursday, January 20, 2011

धुर बुडबक! आंदोलन का माने ई सब थोडे न होता है.

जोत ले भैया जोत ले, जोर लगा के जोत ले, हल चला के जोत ले, बीज लगा के देख ले, माटी कोड के देख ले, पानी पटा के देख ले, निकौनी करा के देख ले. हमरी जमीन, सो खेती हमरी. तुमको क्या लगता है? तुम्हरे घर का खाते हैं? अपने बाप के जनमे हैं. अपने बाप का खाते हैं. आंदोलन में जाते हैं, नारा नारा चिल्लाते हैं. अलग भाषा है, हमरी. अलग इलाका है हमरा. अलग जात है हमरी. अलग बात है हमरी. अलग भात है हमरा. अलग खाट है हमरी.
शिक्षा नहीं है तो? बाल गोपाल पढने दूसरे राज्य जाते हैं तो? वहीं बस जाते हैं तो? लौटना नहीं चाहते तो? लोग उनका मज़ाक उडाते हैं तो? उनको धमकाते हैं तो? उनको अपने राज्य से खदेडते हैं तो? उद्योग धंधा नहीं है तो? जो था उसको भी खा भकोस गए तो? बिजनेस व्यापार नहीं है तो? माटी में सब मिल गया तो? चूडा दही खा खा के हम सेराए रहते हैं तो? कभी किसी आंदोलन में भाग नहीं लिए तो? “भुखले रहब त’ सुतले रहब, सुति के उठब त’ ढेकरैत चलब’ के सच्चे-पक्के चेले चप्पाटी हैं हम.
पर अब हम उठ गए हैं. आंदोलन पहले भी किए, आगे भी करेंगे. मैथिली को संविधान की आठवीं अनुसूची में ले आए. उससे मैथिली का कौन सा भला हुआ? यह पूछनेवाले आप कौन? एह! आंदोलन किए हम और उसके आंच पर तवा चढाने आए हैं आप, तो ई तो हम कभी नहीं होने देंगे. नहीं होता है मैथिली का विकास तो उसमें हम आंदोलनकारी क्या करेंगे? आपलोग लेखक है, विचारक हैं, नाटककार हैं, गायक हैं, आपे के भीतर दम नहीं है तो हम क्या करें? अरे हमरे भीतर दम था तो भाषा को संविधान में ले आए. उसके बाद? ले बिलैया के. उसका विकास पहिले भी नहीं करने दिए. आगे भी नहीं करने देंगे. न एको ठो पत्र पत्रिका निकाले, ना एको ठो किताब निकाले, न कोनो आयोजन कराए ना कोनो विद्वान बुलाए. काहे के लिए करें ई सब? इससे हमको कोनो फायदा?
अब हम फिर आंदोलन कर रहे हैं. अलग मिथिला राज्य की मांग कर रहे हैं. राज्य बनेगा, तभी न उद्योग होगा, खेती होगी, शिक्षा होगी. बडी बडी योजना बनेगी, उन सब पर बडे बडे पद होंगे, उन पदों पर हम और हमारे लोग होंगे. इतना बडका देश है, समभलबे नहीं कर रहा है. परिवार जब बडा हो जाता है तब सुविधा के लिए उसको बांटकर अलग करते हैं कि नहीं? बंटा हुआ लोग तब पुराना परिवार का भला देखता है कि अपना? आए हैं बात करने. भागिए यहां से. ऐसे ऐसे लोग अपने अपने इलाके के दुश्मन हैं. खिहाड कर भगाइये इन लोगों को. जय मैथिली, जय मिथिला. देश? देश गया तेल लेने.

Wednesday, January 19, 2011

बहुत दिन बाद

बहुत दिन बाद लिखी हाथ से पाती.
बहुत दिन बाद छुई कलम की नोक,
बहुत दिन बाद आदरणीय का सम्बोधन,
बहुत दिन बाद 'आपकी' का लिखना,
बहुत दिन बाद 'पत्रोत्तर देंगे' की मांग,
बहुत दिन बाद लिफाफे पर पता.
बहुत दिन बाद गोंद का उपयोग
बहुत दिन बाद एक सुख का अहसास
बहुत दिन बाद एक खुली खुली सी सांस
यह नहीं है कोई कविता,
सच में हुआ ऐसा, बहुत दिन बाद.

Saturday, January 15, 2011

ग्राहक गाय है.

छम्मकछल्लो खुश है.किसी ने तो उसकी बात पर तवज़्ज़ो लिया. काम के सिलसिले में लगातार वह किंगफिशर से यात्रा करती रही है.आज वह बेलगाम से मुंबई आई. परसो वह मुंबई से बेलगाम गई थी. बेलगाम केलिए मुंबई से रोजाना उडान किंगफिशर ने शुरु की है.समय की बचत होती है, इसमें दो राय नहीं. किंगफिशर के विजय माल्या कहते हैं कि आप उन्हें मेल करें, अपनी बात कहें. छम्मकछल्लो ने आजमाया. विजय माल्या ने नहीं,उनकी प्रतिनिधि ने जवाब भेजा.
आप सोच रहे होंगे कि छम्मकछल्लो को ऐसा क्या सूझ गया कि वह विजय माल्या से भिड गई?कुछ नहीं.हम गरीब,भुक्खड लोग.खाने के अलावा कुछ  और सोच सकते हैं क्या? किंगफिशर दावा करता रहा है कि वह अपनी किंगफिशर रेड की सभी उडान में खाना देता है. अब जब देता है तो दानवीर हो गया.लेकिन  दानवीर कर्ण के तेवर से कोई थोडे न दान देता है.वह तो ठसके के साथ भीख की तरह  देता है.जो देते हैं सो खाओ,वरना जाओ. छम्मकछल्लो खाती रही, खाती रही,पर कबतक कोई बेस्वाद, गीला, ठंढा सैंडविच दान या भीख समझ कर खाता रहे?सुझाव लिखने पर किसी ने जवाब नहीं दिया.विजय माल्या को दिया तो प्रतिनिधि ने जवाब दिया कि भाई,वे लोग तो अपने महान ग्राहक को खुश रखने के हर सम्भव उपाय करते हैं.उस सम्भव उपाय में है सैंडविच.खाना है तो खाइये वरना?
छम्मकछल्लो के कई दोस्त भी इस सैंडविच से परेशान थे. उन सबको भी ध्यान में राखकर छम्मकछल्लो ने परसो भी अनुरोध किया कि ऐसा सैंडविच ना दें.दिन भारत के थके हारे, कुछ गर्म और ताज़ा खाना दें.
छम्मकछल्लो की बात सुनी गई.और आज से खाना देना बन्द कर दिया गया. पूछने पर जवाब मिला, कई गेस्ट को हमारा खाना पसन्द नहीं आता. वे सैंडविच को लेकर शिकय्यत करते हैं.इससे मैनेजमेंट ने अब देना ही बन्द कर दिया. वह भी बिना पूर्व सूचना के.
कहानी की शिक्षा: किसी से कुछ मांगिए मत, अधिकार भी नहीं.जो देवे,भीख समझ कर ले लीजिए. खाना भी. हम भुक्खड हिन्दुस्तानी. खाने के अलावा कुछ सोचते ही नहीं.हवाई जहाज में भी खाना? अब क्या करें विजय भाई?हवाई जहाज में स्टेशन नहीं होता न और न मूंगफली,पूरी जिलेबी बेचनेवाला आता है कि 5 रुपय्या का खरीद लें और फांकते हुए चले जाएं.आप जो बेचते हैं, ऊ 5 का 50 होता है और स्वाद में?उसी के मारे तो आपसे बोल पडे थे.हम भूल गए थे कि बीयर आ बिकनी के कॉम्बीनेशन में सैंडविचे चलता है, रोटी भात नहीं.परसो फिर जाना है.हम भात दाल बांध कर ले जाएंगे, विजय भाई, कहे देते हैं.हां!

Wednesday, January 12, 2011

सपने में शास्त्री जी.

छम्मकछल्लो बहुत दिन से लिख नहीं पा रही है. क्यों के बहुत से बहाने हैं. इस बहाने को तोडने के लिए कल रात उसके सपने में शास्त्री जी आ गए. लीजिए, आप भी पूछ रहे हैं, कौन शास्त्री जी? कभी आपने पूछा, कौन गांधी जी, कौन नेता जी, कौन लोकनायक जी? बडके लोगन की बारात में छोटके लोगन छुप जाते हैं. छोटके लोगन आजकल ऊ नहीं हैं, जो कर्म से छोटे होते हैं. छोटके लोगन ऊ हैं, जो आज की ज़ुबान में अपनी मार्केटिंग करना नहीं जानते. या फिर छोटके लोग ऊ हैं, जो इस लोकशाही में राजतंत्र लेकर नहीं आए, या छोटका लोगन ऊ है, जो कभी घूस नहीं खाया, बेईमानी नहीं किया. इसी सबके कारण अपने शास्त्री जी छोटे रह गए, इतने कि किसी को यादो नहीं रहता है कि कब ऊ जन्मे आ कब सिधार गए? ले बलैया के, अभीयो नहीं बूझे? अरे, अपने भारत के सबसे सीधे, सच्चे प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी. एक तो उनके जन्म दिन पर गांधी बाबा कब्ज़ा बोल गए. बडे के आगे छोटे को कौन याद रखता है? खैर, जनम की तारीख पर किसी का अधिकार नहीं, मगर दो बडे नेता हों तो दोनों को उतना ही सम्मान देना हमारे अधिकार में तो है. मगर हमको याद दिलाना पडता है कि 2 अक्तूबर को हमारे शास्त्री जी का भी जनम दिन है.
अब हमको यह भी याद दिलाना पडता है कि आज उनकी पुण्यतिथि है. सच पूछिए तो छम्मकछल्लो को भी याद नहीं था. याद दिलाने के लिए शास्त्री जी को रात उसके सपने में आना पडा. छम्मकछल्लो से पूछे- “का जी, हम तुम सबको याद हैं?”
छम्मकछल्लो को लगा कि धरती फट जाए और वह उसमें सीता मैया की तरह समा जाए. भला कहिए तो, अभी न तो इतनी उमिर बीती है और न स्मृति पर ऐसा आक्रमण हुआ है और न ही वह किसी बडे लोग की गर्दुमशुमारी में जा पहुंची है.
छम्मकछल्लो ने हाथ जोडे- “शास्त्री जी, शर्मिंदा मत कीजिए. आपसे सम्बंधित हमें बहुत सी बातें याद हैं.”
“जैसे?” शास्त्री जी जैसे छम्मकछल्लो की परीक्षा लेने लग गए.
छम्मकछल्लो के सामने बचपन रील की तरह खुलने लगा- “शात्री जी, हमको याद है, आप जब प्रधान मंत्री बने थे, तब हमारा स्कूल और उस स्कूल में पढानेवाली मेरी मां सहित हमारे छोटे से शहर के लोग बडे ही खुश हुए थे. सबको आपकी सादगी इतनी भाई थी कि पूछिए मत. भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय आपने जितना कडा रुख लिया था, हमको उसकी धुंधली याद अभी भी है. अमेरिका से गेहूं आयात की बात हो रही थी. आपने कहा था कि अगर हम सभी एक शाम भोजन ना करें तो उस एक शाम के खाने की बचत से इतना गेहूं बचेगा कि देश को गेहूं निर्यात करने की ज़रूरत ही नहीं पडेगी. आपने सोमवार की शाम इसके लिए मुकर्रर किया था. तब सभी शाम में अमूमन रोटी ही खाते थे. मुझे याद है शास्त्री जी कि आपकी इस बात को हमारे शहर ने एक आंदोलन की तरह लिया था. मेरी मां ने स्कूल के सभी बच्चों से कहा था कि वे सोमवार की शाम खानाना खाए. मां ने भी नहीं खाया था और हम सबने भी नहीं. दूसरे दिन मां ने सभी बच्चों से पूछा था. एक बच्ची रो पडी. सुबकते हुए उसने बताया कि उसकी तबीयत ठीक नहीं थी, इसलिए उसकी मां ने उसे जबरन खाना खिला दिया था.
आपने जय जवान, जय किसान का नारा दिया था. हम मनोज कुमार की फिल्म “उपकार” देख रहे थे. उनके एक गीत में आपकी तस्वीर आते ही हमें रोमांच आ गया था. आज तक आता है. हमने अपने अंग्रेजी की किताब में आप पर एक लेख पढा था- नन्हे, द लिटिल ग्रेट मैन”. मां से इसका मतलब पूछा था. मां ने बताया था कि आपका शारीरिक कद बहुत छोटा था, इसलिए. लेकिन आपका मानसिक कद कितना बडा था शास्त्री जी!
शास्त्री जी हंसे, फिर तनिक स्नेह से छम्मकछल्लो के सिर पर हाथ फिराया. छम्मकछल्लो ने कहा, “शास्त्रीजी, हमारे घर काम करनेवाली दाई थी-चनिया. 11 जनवरी की हाड कंपाती सुबह थी. पांचेक बज रहे होंगे. हम सब रजाई में घुसे थे. वह बाहर से ही छाती पीतते हुए मां को पुकार रही थी- “दीदीजी यै दीदी जी, शास्त्री जी मरि गेलखिन्ह.” वह चौक के रास्ते से आ रही थी, जहां पर रेडियो और लोग थे. रेडियो पर समाचार था और सभी लोग खामोश.
मां एकदम से चौंक उठी थी, संग में हम सब. मां ने दरवाजा खोला और चनिया एकदम से मां से लिपटा कर ऐसे भोकासी पारकर रोने लगी, जैसे उसके घर का अपना कोई गुजर गया हो. हां शास्त्रीजी, आपको कोई भी पराया नहीं मानता था.
“तब आज क्या हो गया है कि लोग हमें भूल गए हैं? मैं इसी देश का हूं भाई. अपने देश से आज भी वैसे ही लगाव और प्यार है मुझे.”
“आज शास्त्री जी, देश लोकतांत्रिक राजतंत्र हो गया है. इसमें सभी अपनों को याद रखते हैं, अपने परिवार की बंशवेल बढा रहे हैं. हम सब अनाथ की तरह घूम रहे हैं. फिर से जनम लीजिए शास्त्री जी, फिर से आइये, देश को आपकी बहुत ज़रूरत है. और लीजिए, कि शास्त्री जी भी हमारे संग रोने लगे.