chhammakchhallokahis

रफ़्तार

Total Pageviews

छम्मकछल्लो की दुनिया में आप भी आइए.

Pages

|

Sunday, December 22, 2019

प्यार का मज़हब क्या कहता है!

अपने शहर के लिए लिखना और अपने शहर में छपना हमेशा आह्लादकारी होता है। एक लंबे अरसे बाद नवभारत टाइम्स मुंबई में छपी हूं। #नवभारतटाइम्स और हरि मृदुल का बहुत-बहुत आभार।
आपकी सुविधा के लिए या लेख यहां प्रस्तुत है पढ़ें और आपकी राय की प्रतीक्षा रहेगी इसे मेरे कथेतर गद्य “अही ठैयाँ टिकुली हेराय गेलै” से लिया गया है।

"प्यार का मज़हब क्या कहता है!

अक्सर करवा चौथ, हरतालिका, वट सावित्री आदि के समय इस प्रश्न की बाढ़ आ जाती है कि क्या पुरुष भी अपनी पत्नियों के लिए व्रत करते हैं या कोई ऐसा व्रत है जो पुरुष अपनी पत्नी के लिए करें?  सभी कहते हैं- नहीं। मुझे भी जितना मालूम है, उसमें यही है उत्तर है- नहीं। इस प्रसंग में यशपाल की एक बड़ी प्रसिद्ध कहानी है- ‘करवा का व्रत।‘

कईयों को ये व्रत पुरुष की दासता लगते हैं, कइयों को दिखावा। हर साल फेसबुक पर यह आंधी आती है। यह आंधी होली या दीवाली पर कभी नहीं आती कि हम व्रत ही क्यों करें? त्यौहार ही क्यों मनाएँ?

मैं व्रत-त्यौहार की पक्षधर हूँ, मगर इसकी रूढ़ियों पर मेरा विश्वास नहीं। लेकिन, उत्सव मनाना, नाचना, गाना, हँसना मुझे संस्कृति से जुड़ाव, नई स्फूर्ति और सकारात्मकता देते हैं। जहां तक मेरा सवाल है, मैं हरतालिका अपनी सास के लिए करती हूँ। अत्यंत विषम हालात में हुई हमारी शादी को जिस सहजता से स्वीकार कर मुझे जितना मान-सम्मान या प्यार दिया, उसके एवज में उन्होने दो ही चीजें मांगी थी- 1) इतना ज्यादा (दिन के 20-22 कप) चाय मत पियो और 2) जबतक और जैसे भी पार लगे, तीज कर लेना।

लेकिन मन के भाव कभी-कभी कहां ले जाते हैं, पति-पत्नी कब कितने समर्पित हो जाते हैं, एक-दूसरे के लिए, पता नहीं चलता। चमत्कार होता है या नहीं, पता नहीं। लेकिन जिंदगी में कभी कभी कुछ ऐसा घट जाता है, जिसका कोई सार समझ में नहीं आता।

मेरी बुआ थीं चंद्रकला- नाम के अनुरूप ही खूबसूरत और राम-सीता की भक्त । फूफा जी भी परम भक्त । दोनों कंठीधारी। अपने घर में ही उन्होंने एक मंदिर बनवा लिया था। बुआ मुझे जितनी अच्छी लगती, फूफा जी मुझे उतने ही नापसंद थे, क्योंकि उनकी नजरों में हमारे शिक्षक माता पिता की कोई अहमियत नहीं थी।

मेरी बड़ी दीदी शादी के योग्य थी और वे जो रिश्ता लेकर आते, वह हम सबकी कल्पना से भी परे होता। मसलन, लड़का कपड़े की दुकान पर काम करता है, डेढ़ सौ रुपए पाता है। लड़का गुड़ की आढ़त में काम करता है, ढाई सौ रुपए पाता है । लड़के की पान की दुकान है और इसतरह उसका अपना धंधा है। हमलोग कटकर रह जाते। ना बोलनेवाली मां फिर कुछ नहीं बोल पाती थी। बाबूजी दामाद का लिहाज करके चुप रह जाते थे।

बुआ और फूफा अपनी उम्र के हिसाब से जीते रहे । भक्त दंपति के रूप में उनका बहुत नाम था। मंदिर में हमेशा भजन कीर्तन होता रहता। दोनो में बड़ा प्रेम था। दोनो एक दूसरे को 'रघुनाथ' के नाम से संबोधित करते।

उम्र के अपने पड़ाव पर बुआ बीमार पड़ीं। जब उन्हें लगा कि उनका अंतिम समय आ गया है तो इशारे से उन्होंने घर के सदस्यों को तुलसी चौरा के पास ले चलने को कहा। उन्हें आंगन में तुलसी चौरे के पास लिटाया गया । उनकी बहुओं ने उनके मुख में तुलसी-गंगाजल डाला और उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए।

छोटा पोता बाहर की ओर भागा और फूफा जी से बोला- "दादा दादा, दादी मर गेलै।"

फूफा जी कुछ नहीं बोले। पोते का हाथ थामे धीरे-धीरे भीतर आंगन में आए। बुआ के पास बैठे। बुआ का हाथ पकड़कर बोले- "रघुनाथ! हमरा छोड़ के चल गेल'।" और इतना कहते हुए वे बुआ के ऊपर झुक गए । तत्क्षण उनका भी प्राणांत हो गया।

शहर भर में शोर मच गया। आसपास के गांव-कस्बों से लोग आने लगे। दोनो की अर्थी एक साथ उठी। दोनों की चिंताए अगल बगल सजीं। बुआ के शहरवालों को अब यह घटना याद है या नहीं, पता नहीं, लेकिन हमसब कई कई सालों तक बुआ फूफा के इस अटूट प्रेम से बंधे रहे। वैसे समाज में, जहां साठ पार के बूढ़ों के लिए भी दूसरी शादी की तरजीह समाज देता है, वहां इन दोनों के भीतर प्रेम का कौन सा गहरा समंदर छुपा हुआ था, जिसकी तरंग में दोनो दो जिस्म एक जान बने हुए थे, आजतक नहीं समझ पाई। हर बार की तरह मैंने माँ से इसके बाबत पूछा। माँ भाव भरे स्वर में इतना ही बोल पाईं - "गहरा प्रेम।"

मेरे कहने का आशय यह नहीं है कि जान न देनेवाले दंपति के बीच प्रेम नहीं होता। मेरे कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि धर्म में पति द्वारा किए जानेवाले व्रत उपवास के किस्से हो या न हों, अपने जीवन में भी कई किस्से प्रेम-धर्म के हिमालय पर जा ठहरते हैं।"

Friday, November 1, 2019

कहानी- पकिया भूत

पकिया भूत। यह कहानी जनज्वार में छपी थी। आप सबकी नजर। इस कहनीं पर सुप्रसिद्ध कवि व पत्रकार विमल कुमार की टिप्पणी बहुत खास है, जो यहां है-

"बहुमुखी प्रतिभा की धनी विभा रानी केवल कहानियां ही नही लिखती वह अच्छी कविताएँ भी लिखती है तथा नाट्य लेखन में भी सक्रिय है।इसके अलावा वह एक रंगकर्मी भी है।हिन्दी और मैथिली में समान रूप से सृजनरत है और गत दो दशकों में राष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने अपनी पहचान भी बनाई हैं।पिछले दिनों भोपाल में उनके कहानी पाठ ने मेरा ध्यान खींचा ।आज उनकी एक कहानी पकिया भूत यहाँ पेश की जा रही है जो एक भूत की सामान्य कथा न होकर यौन शोषण की कहानी है।यह एक me too अनुभव है जिसे बहुत ही कलात्मक तरीके से संकेतों में उन्होंने प्रस्तुत किया है।भूत की कथा कहते हुए वह समाज की भयावह सच्चाई की कहानी कहती हैं जहां हर जगह भेजिये बैठे है और वे आसपास ही हैं।इस कहानी में स्त्री का विरोध उतना मुखकर भले न हो पर उसका प्रतीकात्मक प्रतिवाद को करती है शिक्षिका के घर से सुबह निकल कर ।आइए पढ़ते है विभा की कहानी ।"

जनज्वार का लिंक भी यहां है-
विभा रानी की कहानी ‘पकिया भूत’ - http://janjwar.com/post/famous-theatre-artist-vibha-rani-kahani-pakiya-bhoot-for-janjwar

और अब रही यह कहानी। आपकी राय बहुत महत्वपूर्ण है-


पकिया भूत

  • विभा रानी 

उसने कभी भूत को नहीं देखा था लेकिन भूतों के बारे में सुना जरूर था। उसने कई भुतहा कहानियां पढ़ी भी थी और भुतहा हिन्दी फिल्में भी देखी थी। इन फिल्मों से उसका जेनरल नॉलेज काफी बढ़ा था। उसे पता चला था कि लड़कियां अगर भूत होती हैं तो वह सफेद कपड़े में रहती हैं और भूत होकर भी काफी कमनीय और खूबसूरत होती हैं, जबकि आदमी अगर भूत होते हैं तो वे काले लिबास में रहते हैं और भयानक, काले और खूंखार होते हैं। भूतों के इन तथ्यों के साथ-साथ उसके आस पड़ोस में भी भूत प्रेत चढ़ने और उसे झाड़ने - उतारने के ढेर सारे किस्से थे, जिनमें से कुछ उसने खुद भी देखे थे।

उसके घर के बगल में एक नई बहुरिया आई थी। कहते हैं कि उसका आदमी उसे बहुत प्यार करता था। लेकिन, वह अपने बाप के साथ ट्रक पर महीने में 28 दिन रहता था और एक-दो दिन के लिए बाप के साथ ही घर लौटता था। घर एक ही कमरे का था, जिसमें उसका बाप एक दिन खुद सोता और दूसरे दिन कमरा बेटे को दे देता। तब बाप मोहल्ले में किसी के दालान की चौकी पर सो जाता और उसकी मां कमरे के सामने के ओसारे पर। लेकिन तब वह रात भर जागती बडबडाती रहती । भगवान जाने, इस बडबडाने की वजह से या किसी और वजह से, कमरे में अलबत्त शांति पसरी पड़ी रहती।

कुछ दिनों बाद पता चला कि उस बहुरिया पर भूत आया है और बार-बार आता रहता है। झाड़-फूंक के लिए ओझा- गुनी को बुलाया गया। नीम के पत्तों की झाड़ू बनाकर उससे बहुरिया को झाड़ा गया और उस पर मुट्ठी- मुट्ठी करके कई मुट्ठी मिर्च झोंकी गई । खुले बाल और इधर उधर अटकते भटकते कपड़ों के साथ झूमती बहुरिया को मिर्ची लगती या नहीं मालूम नहीं, लेकिन हैरानी की बात होती कि वह मिर्च किसी को भी नहीं लगती। ओझा विजय भाव से सभी को देखता और कहता, “देखो कैसी जबरिया भूतनी है। मिर्च की झाँस को भी खा कर पचा जाती है। किसी को सूंघने तक नहीं देती।”   

संसार का कोई भी विषय हो, उसकी तमाम जानकारी का स्रोत उसकी मां हुआ करती थी और उससे भी अगर मन नहीं भरता तो वह दादी के पास चली जाया करती । भूतों के बारे में उसने मां से पूछा कि क्या सचमुच में भूत होते हैं? पढ़ी-लिखी मां ने कहा कि भूत मन का वहम है। असल में, अपने ही मन में भूत होते हैं । दादी ने कहा कि किसी की आत्मा जब मोक्ष नहीं पाती है तो वह प्रेत और भूत में बदल जाती है । दादी ने यह भी कहा कि भूत भी अच्छे और बुरे होते हैं । प्रमाण में दादी ने बताया कि उनके अपने ही ऊपर उनके खेत में काम करनेवाले जीतन भगत का भूत आता रहता था । जीतन भगत जब भी खेत में कुछ गड़बड़ी होते देखता तो वह उनपर आ जाता और बताता कि फलाने- फलाने लोग फलाने-फलाने गड़बड़ करनेवाले हैं। घर के लोग सजग हो जाते, साथ ही उनके खेत में काम करनेवाले भी। बल्कि, कईयों ने वहां काम करना इसलिए बंद कर दिया कि भूत ने उन्हें चोर और बेईमान ठहरा दिया। 

वह शहर में थी और अपनी पढ़ाई कर रही थी। उसे भूतों की कहानियां दिलचस्प और रोमांचक लगतीं, लेकिन इसके बावजूद उसका मन नहीं मानता कि कोई भूत प्रेत होता भी है। एकबार बचपन में उसे लगा था कि कोई एक भूत उसके पास आया है और अपने लम्बे साए से उसे सर से पाँव तक ढंककर चला गया है । वह बेहद डर गयी, मगर उसने भूत के इस साए के बारे में जानने के लिए माँ या दादी से नहीं पूछा । फिर उसे लगने लगा कि उसके आसपास ढेर सारे भूत हैं। अब वह सपनों में भी भूतों को देखती और डर के मारे पसीने-पसीने हो जाती। 

उसे वे सब भूत हकीकत में नजर आते । वह देखती कि उनमें से एक भूत उसके आंगन में आता है और बेहयाई से उसको मुसकुराकर देखते हुए उससे भर लोटा, भर ग्लास पानी मांगकर पीता है । उसको जबतक वह देखती, समझती, तबतक देखती कि एक दूसरा भूत आता है, उससे चाय की फरमाइश करता है । जबतक वह उसके लिए चाय लेकर जाती है, तबतक वह देखती कि कोई तीसरा भूत उसके बाबूजी के पास बैठता है और चाय और पान के साथ-साथ चूरा का भुजा और प्याज के पकोड़े का नाश्ता छककर करता है और बाउजी से बोलता है, "अब ई बड़ी हो गई है। बियाह कहिया कीजिएगा?" ऐसा बोलते हुए वह बोल तो बाउजी से रहा होता, लेकिन कनडेरिए आँख से वह उसी की ओर देख रहा होता। फ़ाइल में उलझे बाउजी सरल भाव से कह देते कि "अभी तो वह पढ़ाई कर रही है।

उसका मन करता कि वह मां से पूछे कि भूत क्या जमीन पर असली आदमी के रूप में रहते हैं ? लेकिन वह डर जाती। उसे लगता, उसकी इस बात पर कहीं मां नाराज ना हो जाए, बाबूजी उसे थप्पड़ न मार बैठे और पास पड़ोस के लोग कहीं उसे चिढ़ाने ना लगे। दादी अब रही नहीं थीं, जिनकी कमी वह शिद्दत से महसूस करती. 

अब वह डरने लगी। डर से सिकुड़ने लगी। इतना कि उम्र के साथ-साथ उसकी देह तो लंबी  होने लगी, लेकिन उसपर उम्र चढ़ने के लक्षण कहीं से भी नजर नहीं आते। वह सूखे डंडे या लंबे बांस की तरह दिखती, जिसपर लगता, कपड़े का एक खोल चढ़ा दिया गया है। 

उसने दादी के मुंह से सुना था कि भूतों को भगाने के लिए हर शनिवार को काले कपड़े पहनकर सरसों के तेल और काले तिल से शनि की पूजा करनी चाहिए । इससे शनि महाराज भी प्रसन्न रहते हैं और भूत प्रेत का साया भी दूर रहता है । उसके घर में काले और सफेद कपड़े पहनने की सख्त मनाही थी। सफेद में केवल बाबूजी और भैया सफेद गंजी पहनते थे और मां सफेद ब्रा। पेटीकोट भी एक आध उनके पास सफेद थे और रंगीन पेटीकोट पर ख़ुद हाथ से बुनी क्रोशिए से बनी हुई सफेद लेस। इसके अलावा उस घर में कोई भी सफेद चीज नहीं पहनी जाती। हां बाबूजी की धोती अलबत्ता सफेद होती। काले कपड़े तो शनि के आगमन की तरह अशुभ और गुनहगार सरीखे थे।

उसने बड़ी जिद करके एक काले रंग की सलवार कमीज सिलवाई, जिसे वह सबसे छुपकर अहले सुबह शनिवार के दिन पहनती और शनि महाराज के नाम पर बगल में खड़े पीपल के पेड़ के पास काला तिल और सरसों का तेल चढ़ाकर झट से आ जाती और अपने सामान्य कपड़े पहन लेती। लेकिन इन सबके बाद भी भूतों से उसका पीछा नहीं छूटा। वह जहां जाती, भूत उसके पीछे लगे रहते। वह अपनी सहेलियों से पूछती कि भूत क्या सचमुच में आम आदमी, लड़कों की तरह दिखते हैं ? सहेलियां उसकी बेवकूफी पर हंसते हंसते लोटपोट हो जाती। वे सब कहती कि भूत जिंदा नहीं, केवल मरा हुआ होता है । मरे हुए लोग ही भूत बन जाते हैं। वह उन मरे हुए लोगों के भूतों को देखने की इच्छा प्रकट करती। सहेलियां फिर से हंस हंस कर लोटपोट हो जाती । उसकी समझ में नहीं आता कि इसमें ऐसे लोटपोट होकर हंसने की क्या बात है। 

एक दिन एक सहेली ने उससे अपने रहस्य का खुलासा किया कि उसने कल भूत देखा। सहेली ने बताया कि वह हॉस्टल में रहती है और हॉस्टल में एक रात जब वह फारिग होने के लिए बाहर निकली तो उसने देखा कि सामने एक कोई सफेद सी आकृति खड़ी है। डर के मारे पहले तो उसके पैर वहीं के वहीं जम गए। फिर उसने हिम्मत करके आवाज़ लगाई- "कौन है?" उसके बोलने पर  वह आकृति गायब हो गई । सहेली डर के मारे बगैर फारिग हुए ही अपने कमरे में लौट आई और चादर के नीचे खुद को छुपा लिया। वह लगातार सोने की कोशिश करने लगी । नींद आई कि नहीं आई, उसे भी नहीं पता चला। 

उसके मन में अब भूत को देखने की इच्छा बलवती होने लगी। ऐसा भूत, जो परछाई सा आता- जाता और हिलता -डोलता है, लेकिन बोलने या टोकने पर गायब हो जाता है। उसकी सहेली दूसरी बार फिर हॉस्टल से आई और उसने फिर से बताया कि उसने इस बार भी भूत को देखा । उसके हॉस्टल के कॉमन बाथरूम उसके कमरे से काफी दूर हैं, इसलिए वह वहां न जाकर छत पर चली जाती है फारिग होने के लिए। इसबार भी जब वह छत पर जाने के लिए सीढ़ियां चढ़ने लगी और सीढ़ियां चढ़कर छत पर पहुंची तो उसे छत की मुंडेर पर सफेद कपड़े में बैठी हुई एक पुरुष आकृति दिखी। उसकी पीठ सहेली की तरफ थी और पैर छत की मुंडेर की दूसरी तरफ लटके हुए थे। सहेली टॉर्च लेकर गई थी। सचमुच में कोई आकृति है या उसके मन का वहम, इसकी पुष्टि के लिए उसने टॉर्च की रोशनी उस आकृति पर फेंकी । सहेली ने बताया कि टॉर्च की रोशनी जिस तरफ जाती, आकृति उसके दूसरी ओर खिसक जाती और इस तरीके से उसके टॉर्च के उल्टा दाएं-बाएं होने लगती। सहेली फिर डर गई और बगैर फारिग हुए अपने कमरे में आकर चादर में घुसकर पैर समेटकर सो गई। 

स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई करते हुए आगे की पढ़ाई के लिए इसबार उसे हॉस्टल जाना पड़ा । हालांकि घरवाले तैयार नहीं थे. काफी जद्दोजहद के बाद उसे दूसरे शहर में पढ़ने के लिए भेज दिया गया. वहां के हॉस्टल में भी उसे जगह मिल गई. हर हॉस्टल के आम नियम की तरह एक लोकल गार्जियन होना चाहिए. उसके लिए भी एक लोकल गार्जियन तलाश दिया गया. वह लोकल गार्जियन उसके अपने शहर में पढ़ानेवाली टीचर थी- खूबसूरत, उदार और मिलनसार. टीचर के काम करने से अब उनका घर डबल इनकम ग्रुपवाला हो गया था. वे अब किराए के मकान से निकलकर अपने नए बनाए मकान में आ गई थी. शहर पुराना था, इसलिए पुराने शहर में बननेवाले मकानों के ढर्रे का ही यह मकान भी था, जिसमें अटैच्ड बाथरूम जैसी कोई अवधारणा नहीं थी. वह अपनी लोकल गार्डियन के यहां दिन में कभी-कभी चली जाती, जहां उसे परवल का भरवा और कटहल की खूब तेल-मसालेवाली सब्जी खाने को मिलती. हॉस्टल के खाने से ऊबा हुआ मन ऐसे समृद्ध खाने से तृप्त हो जाता और वहां जल्दी-जल्दी जाने को करता. शिक्षिका बहुत उदार थी और उसे बहुत प्यार करती थी. शायद इसका कारण यह भी रहा हो कि उनकी नौकरी लगवाने में उसकी अपनी शिक्षिका मां की थोड़ी बहुत भूमिका थी.

एक दिन शिक्षिका ने उससे कहा कि आद्रा नक्षत्र चढ़ा हुआ है. वह शाम में वह दाल भरी पूरी, खीर और आलू परवल का दम बनाएगी और साथ में मालदा आम. इसलिए वह शाम में ही आ जाए. उसने कहा कि हॉस्टल लड़कियों के लिए शाम 7:00 बजे के बाद बंद हो जाता है. शिक्षिका ने कहा, कोई बात नहीं. वह रात में उसके घर ठहर जाए और दूसरे दिन सुबह खा पीकर दोपहर या शाम तक हॉस्टल लौट जाए. शिक्षिका की सुंदर शक्ल और बढ़िया खाना उसे अच्छा लगता था और इस लालच में वह उस दिन शनिवार की शाम आद्रा नक्षत्र मनाने और दाल पूरी, आलू परवल का दम, खीर और मालदा आम का भोग लगाने चली गई. शिक्षिका के साथ उसने उस दिन खूब हंसी मजाक किया. उसके दो छोटे बच्चे भी थे, जो उसे दीदी कहते थे. उनके साथ उसने लूडो खेला, गप्पें मारीं. रात हुई और शिक्षिका ने उसे उसका कमरा दिखा दिया. उसके बाद वह बच्चों को लेकर अपने कमरे में सोने चली गई.

नई जगह होने के कारण या पेट से ज्यादा खीर-पूरी खा लेने के कारण उसे काफी देर तक नींद नहीं आई. उसे  आद्रा नक्षत्र में माँ के हाथों की बनाई गई दाल भरी पूरी, खीर, सब्जी आदि के स्वाद याद आने लगे. अपने घर  की तंगी उसे पता थी. वह देखती कि उसके यहां दाल भरी पूरी में दाल कम मात्रा में भरी जाती और तवे पर नाम मात्र के तेल में सेंकी जाती. खीर में भी आधा पानी आधा दूध रहता. आलू -परवल के दम में तेल काफी कम तो रहता ही, आलू की मात्रा ज्यादा रहती.  इसलिए शिक्षिका के घर के तेल में तैरते रहनेवाली सब्जी और तेल में छानी गई पूरियों और पूरे दूध में बनाई गई खीर से उसका मन तृप्त हो गया था. धीरे-धीरे उसकी आंखें मुंदने लगी और वह आद्रा नक्षत्र की दाल भरी पूरी के स्वाद में खो गई. 

आद्रा नक्षत्र से निकलकर वह धीरे-धीरे किसी सपने में डूबती गई. उस सपने में उसे दूध की नदी दिखी, तेल का तालाब दिखा, पूरियों का पहाड़ दिखा और आम का मचान दिखा. वह उन सबके बीच तैरती, कूदती मन को हिलरानेवाला कोई गीत गाती जा रही थी. वह आम के बगीचे में बने मचान पर चढ़करआज मैं ऊपर, आसमाँ नीचे' जैसा कोई गीत गाने लगी. वहां से उसनेनदियों की ताल पर झूम रही ज़िंदगी, मांझी रे…’ गाते हुए दूध की नदी में छलांग लगाई फिर वह पूरी के पहाड़ से पूरियां निकालकर खाने लगी. तेल के तालाब से चंद बूंदे तेल लेकर सिर में मालिश करने लगी. उसने कहीं पढ़ा था कि रात में सोते समय ढीले कपडे पहनने चाहिए. उस दिन के बाद से सोते समय वह केवल नाइटी पहनती. सर की मालिश करते हुए कुछ बूंदे उसने और निकाली और नाइटी तनिक ऊपर उठाकर अपने दोनों पैरों में लगाकर पैरों की मालिश करने लगी कि अचानक वह सकते में आ गई. 

पूरी के पहाड़, तेल का तालाब, दूध की नदी और आम का अचार- सब गायब हो गए. उसके सामने कोई एक भूत खड़ा था, जो उसके पैरों की मालिश कर रहे उसके दोनों हाथों को हटाकर दोनों पैरों के बीच के हिस्से को अपनी मुट्ठी में भींचे जा रहा था. वह हड़बड़ाकर जगी. कमरे में अंधेरा था. लेकिन इस हड़बड़ाहट में उसने मसहरी में घुसे हुए और अपनी नाइटी के बीच में फंसे हुए हाथ को देख लिया था. उसके जगते ही वह हाथ तेजी से मसहरी के बाहर निकला और गायब हो गया. वह थरथरा उठी. उसकी नींद खुल गई. वह डर से कांपने लगी. अपनी धड़कन पर थोड़ा सा काबू पाकर उसने तकिए के पास रखे टॉर्च को टटोला. शहर छोटा था और लाइट गुल हुआ करती थी, इसलिए सभी अपने सिरहाने एक टॉर्च लेकर सोते थे. हिम्मत करके वह उठी और उस टॉर्च से उसने मसहरी के भीतर देखा. कहीं कुछ नहीं था- मच्छर और खटमल तक नहीं. वह मसहरी से बाहर आई. कमरे में टॉर्च जलाकर देखा. सारा दिन घर में दौड़ लगानेवाले चूहे भी अपने बिल में कहीं सोए पड़े थे. उसने थोड़ी और हिम्मत की और बाथरूम में भी टॉर्च जलाकर देखा. वहां उसे एकाध छिअप्किली और तेलाचात्ती नजर आए. चारो और भांय-भांय सन्नाटा शोर मचा रहा था. टीचर का कमरा बंद था और अन्दर से कोई भी आवाज नहीं आ रही थी. 

उसे समझ में नहीं आया कि यह सपना था या हकीकत. लेकिन उसे इस बात का एहसास हो गया कि यह हकीकत ही होगा, क्योंकि उसके जांघों के बीच बहुत तेज दर्द और नोचने की तकलीफ भरी हुई थी. उसे बाथरूम जाने की जरूरत थी, लेकिन हिम्मत नहीं कर सकी और वापस मसहरी में घुस गई. दादी ने उसे सिखाया था कि संकट पड़े तो हनुमान चालीसा पढ़ना. वह मन-ही-मन हनुमान चालीसा पढ़ने लगी. इस बीच कब सुबह हो गयी, इसका पता उसे कौवे की कांव-कांव से चला. 

वह उठी और हॉस्टल जाने के लिए तैयार होने लगी. शिक्षिका के कमरे का दरवाजा खुला. वह अपने नए गाउन का बटन बंद करती हुई बाहर निकली और अलसाए स्वर में बोली-आज तो इतवार है ना! इतनी जल्दी क्या है जाने की! अभी तो नाश्ता-पानी और दिन का खाना भी बाकी है. रहो. पुरी-जिलेबी मंगवाती हूँ नाश्ते के लिए. पुलाव बनाउंगी दिन में. शाम में प्याज के पकौड़े बनाउंगी. खा-पीकर फिर जाना. ये बड़ी रात लौटे. इनको खिलाते-पिलाते देर हो गई. अभी ये सोए हुए हैं. तुम्हारा इनसे परिचय नहीं हुआ है. जान पहचान करवा दूंगी तो जब कभी मैं नहीं भी रहूंगी तो तुम यहां आकर रह सकती हो, अंकल से बोल- बतिया सकती हो ।

उसकी आंखों का भ्रम टूट गया था. वह समझ गई थी कि रात उसने सपना तो देखा था, लेकिन साथ में कुछ कुछ हक़ीकत भी देखा था. सुबह के नाश्ते, दिन के खाने और शाम के चाय-पकौड़े की योजना पर उसका ध्यान गया. एक झटके में उसने उनके यहाँ के तर मालवाले नाश्ते, खाने का लोभ त्यागा. शिक्षिका से उसने कुछ भी नहीं कहा. सिर्फ एक शब्द बोली-भूतऔर  अपना बैग उठाकर निकल गई।

उसने तय किया कि अब वह अपनी सहेली को बताएगी कि उसने भी भूत देख लिया है-पकिया भूत! ###



Tuesday, April 9, 2019

वह कंजूस मारवाड़ी बच्चा!



विभा जी! अक्षय जैन का आपके प्रोग्राम में आने का मतलब समझती हैं? कम से कम डेढ़ हजार का खर्चा! वो बंदा टैक्सी से आया-गया होगा। फिर आपके प्रोग्राम की फीस भी चुकाई होगी। कैसे वह इतना खर्च करके आया होगा? ज़रूर कोई बात है।"

2017 में जब मैंने ओशिवरा के एक नए खुले होटल में महाराष्ट्र दिवस के अवसर पर 'नमक' कार्यक्रम किया था, जिसमें महाराष्ट्र और मिथिला का संगम था- मैथिली गीत और महाराष्ट्रीयन भोजन। तब अक्षय जैन भाई आए थे। पूरे प्रोग्राम में अपनी सदाबहार हंसी और उत्फुल्लता से हमें और सभी उपस्थितों को सम्मोहित कराते रहे थे।

नमक के आयोजन के लिए ही जब किसी और सज्जन से बात हो रही थी तो उनके ये उद्गार मुझे मिले। सज्जन ने कहा, "ज़रूर कोई बात है। मतलब, एक मारवाड़ी बच्चा, एक एक छदाम के लिए इतना कैलकुलेटिव होता है, वह इतने पैसे खर्च कर गया?" 

मैं भी सहमत हूँ उनसे कि ज़रूर कोई बात है! इस बात के लिए मुझे 30 साल पहले जाना होगा, जब मैं मुम्बई आई थी। यहां की साहित्यिक गोष्ठियों, बैठकों में जाने लगी थी, कभी कभार। वहीं मिले थे अक्षय भाई। हंसता- खिलखिलाता चेहरा। व्यंग्य और कविताएं लिखते थे। समाज और साहित्य के विद्रूप को समझते थे, इसलिए, चेहरे पर हमेशा एक सरल मुस्कान छिटकी रहती थी।  हंसते हुए लोग मुझे सदा से पसन्द आते हैं, वे भी आ गए। हम कभी कभार मिल जाते थे। दुआ सलाम हो जाती थी। बैठकों, गोष्ठियों की मार-कुटई से त्रस्त हो वे बाहर जाते थे चाय पान की दुकान पर। हमलोग भी पहुंच जाते थे। नजरें मिलती थीं। वे जोर से हंसते थे। हम भी हंस पड़ते थे। उस हंसी में ऐसा कुछ होता था कि हम सब बिना कुछ कहे एक दूसरे की बात समझ जाते थे। तब लैंड लाइन का ज़माना था। 

उसके बाद अरसा बीत गया। मोबाइल आ गया। डायरी में नम्बर और नाम लिखने की आदत खत्म हो गई। मोबाइल में नम्बर सेव होने लगे। मोबाइल खराब होने के बाद नम्बर गायब होने लगे। बहुत सारे नंबरों में अक्षय भाई का भी नम्बर गायब हो गया। एक दिन लैंड लाइन से फोन आया- "अक्षय जैन बोल रहा हूँ।"

मैं खुशी से उछल पड़ी। "कहाँ थे इतने दिनों तक आप?"

"यहीं। मुलुंड में। दाल रोटी पत्रिका निकाल रहा हूँ। तुम्हे भेजना चाहता हूं। पता बताओ।"
फिर ढेर सारी बातें। मैने उनसे मोबाइल नंबर मांगा। वे हंस पड़े- "अरे विभा, मुझे मोबाइल चलाना नहीं आता। इसे चलाऊं या खुद को।" फिर उनकी वही सदाबहार हंसी। फोन पर हमारी बातचीत में हम आधे समय हंसते ही थे। दो मिनट की बात कब आधे घंटे में बदल जाती थी, पता ही नहीं चलता था।

"तुम दाल रोटी के लिए लिखोगी।"

"जी।" इतना ही बोल पाई थी। कभी कभी रचनाएं भेज भी देती थी। वे बड़े प्यार से छापते थे। 
इस बीच हमारा अवितोको शुरू हो गया। वे बड़े उत्सुक थे- "अवितोको के बारे में लिखकर भेजो। मैं छापूंगा। कोई सदाशय अगर इसको सपोर्ट करे तो तुम्हे काम करने में सहूलियत होगी। तुम तो जानती हो मुझे। मेरे संपर्क में ऐसे ढेर सारे लोग हैं।"

मैंने अवितोको के बारे में लिखकर भेज दिया। छप भी गया। बाद में बोले- "इन सालों, कमीनों को साहित्य और कला की कोई तमीज नहीं। एक पूजा में लाखों खर्च कर देंगे, मंदिर में लाखों का चंदा दे आएंगे, मगर साहित्य के नाम पर दमड़ी भी न निकालेंगे। पर तुम अवितोको का अकाउंट नंबर भेजो। मैं अपनी ओर से कुछ सहयोग करूंगा।" फिर उन्होंने एक चेक भेजा हजार रुपए का। अवितोको तो ऐसे ही जन सहयोग से चलता है। उनकी यह राशि मेरे लिए पूरे साहित्य समाज की ओर से मिला सहयोग था। 

अवितोको के साहित्यिक, गैर साहित्यिक प्रोग्राम हो रहे थे। हम तब जेलों में काम करने लगे थे। हमने कल्याण जेल के लिए एक कवि सम्मेलन प्लान किया- "अक्षय भाई, जेल चलेंगे?"

तबतक मैं जेल में कार्यक्रम करने के लिए मशहूर हो चुकी थी। कई लोग वहां जाने कई इच्छा प्रकट कर चुके थे। क्यों? क्योंकि उन्होंने जेल और वहां रह रहे कैदी नही देखे थे। ऐसे लोगों को मैने हिंदी फिल्मों के हवाले कर दिया था। 

अक्षय भाई ने कहा- "विभा, मुझे तुम्हारे काम इतने अच्छे लगते हैं कि तुम जेल क्या नरक में जाने को कहोगी तो वहां भी चला जाऊंगा।"

मैंने उन्हें कवि सम्मेलन के संचालन की जिम्मेदारी दे दी। उस कवि सम्मेलन में शहर के लगभग सभी नामचीन कवियों ने शिरकत की थी। जेल के बंदियों ने भी अपनी कविताएं पढ़ीं। जेल अधीक्षक बेंद्रे जी इतने उत्साहित थे कि उन्होंने महिला बंदियों को भी कविताएं पढ़ने के लिए शामिल किया। बाद में हमने अलग से केवल महिलाओं के लिए महिला बैरक में एक और महिला कवि सम्मेलन किया।

अक्षय भाई का संचालन बेमिसाल रहा। बाद में वे बोले- "आज मैं खुद को बहुत भरा भरा महसूस कर रहा हूँ। शायद 20-25 साल बाद मैंने किसी कवि सम्मेलन में भाग लिया है और इसका संचालन किया है। उनकी नजरों में मेरे लिए स्नेह, मेरे काम के प्रति विश्वास और होठों पर वही मुस्कान।

2014 में अवितोको रूम थिएटर शुरू करने पर भी उनकी जिज्ञासा बढ़ी। वे एक दो प्रोग्राम में फिर से मुलुंड से ओशिवरा आए। यह मैं बार- बार इसलिए कह रही हूं कि मुलुंड से ओशिवरा की दूरी बहुत अधिक है। और इस उम्र में हम बस ट्रेन से यात्रा करने से बचते हैं। टैक्सी से आने का मतलब एक अच्छी खासी रकम खर्च करना। लोगों को फिर हैरानी होती थी- "एक मारवाड़ी कंजूस बच्चा! ऐसे कैसे खर्च करता है!"

अवितोको रूम थिएटर की परिकल्पना से वे बहुत प्रभावित हुए। बोले- "मुलुंड में करोगी? बहुत जगह मिल जाएगी।" मैंने कहा, “इसके लिए आपकी ही तरह मैं भी नरक तक जाने के लिए तैयार हूं।“

फिर उन्होने बहुत कोशिश की। फिर वही परिणाम। इस बीच उनकी दाल रोटी चलती रही। वे बोले- "यार!अब वही काम करेंगे, जो हम खुद कर सकते हैं।“ और एक बार फिर से एक सहयोग राशि आ गई। 

इस बीच हमने अवितोको रूम थिएटर के बैनर से तीन दिनों का महिला एकल नाट्य महोत्सव आयोजित किया, ओशिवरा, अंधेरी के शाकुंतलम स्टूडियो में। हमने उनकी कुछ कविताएं ली थीं, जिनमे प्रमुख थी- लड़की। मैंने मुलुंड से ओशिवरा की दूरी का ध्यान रखते हुए झिझकते हुए पूछा- "अक्षय भाई, आएंगे?"  वे चहकते हुए बोले- "तुम्हारा प्रोग्राम है। ज़रूर आऊंगा। मैंने तुम्हें उस दिन गाली गीत गाते हुए देखा। तुम्हारा अभिनय अभी तक नही देख पाया हूँ। मुलुंडवाले तो सब नाकारे हैं। कोई कुछ नहीं कर रहा। कोई आगे नहीं आ रहा। तुम यहाँ कर रही हो। तबियत ठीक नही रहती। इतनी दूर आने- जाने में कष्ट होता है। फिर भी आऊंगा।"

वादे के मुताबिक आए। टिकट भी लिया। प्रस्तुति देखकर बोले-"मुझे अब लगा कि मेरे इस कविता के इतने dimention हैं।"

इस बीच उन्होंने दाल रोटी से मुझे बहुत जोडा। गाली गीत के बारे में छापा, ताकि लोग इसके प्रोग्राम्स करवा सकें। मेरे लिखे गीत छापे। दाल रोटी के विशेषांक की दस प्रतियां मुझे भेजीं। एक प्रति मेरे यहाँ से गईं। मैने कहा कि अक्षय भाई, एक प्रति के पैसे मेरे पास हैं। वे हंसते हुए बोले- "इसे अवितोको के लिए रख लो।"

कल अवितोको ग्रुप पर उनके जाने का समाचार आया। सबसे पहले धीरेंद्र अस्थाना जी ने फोन किता। मैने देखा। उनके ही नंबर से मेसेज था। फिर भी दिल काँप गया। वे अस्वस्थ चल रहे थे। मगर...! इधर उधर से पता करने की कोशिश की। लग रहा था कि कोई कह दे, फेक न्यूज है। आज उनके बेटे छवि से बात हुई। उन्होंने खबर की पुष्टि की और मैं फूट पड़ी।

मुम्बई के लोग उन्हें यारबाश के रूप में जानते हैं। मैं उन्हें अपने बड़े भाई के रूप में देखती जानती, मानती थी। अपने घर से पैसे लगाकर दाल रोटी निकालना, मेरे प्रोग्राम्स में इतनी दूर से चलकर आना, अवितोको के प्रति गहरा विश्वास और हमारे कामों के लिए मन में गहरा सम्मान- यह किसी कंजूस मारवाड़ी बच्चे का काम नही हो सकता अक्षय भाई! न तन-मन से, न धन से। मुंबईकरों के लिए वे  हंसी का बहुत बड़ा खालीपन छोड़ गए हैं। जाइए, वहाँ भी सभी तर्स्ट होनेग। अपनी सदाबहार हंसी से सभी को मोहिए।