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Tuesday, November 24, 2009

उफ्फ! बाबा मत कहो ना!

http://rachanakar.blogspot.com/2009/11/blog-post_24.html

बढ़ती उम्र बढ़ता नासूर है. यह बालपन से बढ़ कर जवानी की ओर जाती उम्र की उछाल नहीं है कि लोग रूमानी होवें, सपने देखें, आहें भरें, गिले शिकवे करें. यह तो जवानी की खेप तय कर चुकने के बाद बुढ़ापे की ओर भागती उम्र का पका घाव है, मवाद भरा हुआ. फोड़ा पका नहीं है, फूटा नहीं है. फोड़ते डर लगता है. फोड़ा कि बहा मवाद कि हो गई छुट्टी.

यह मत समझिए कि बढ़ती उम्र से केवल महिलाएं ही परेशान होती हैं. आज की तो बात ही छोड़ दीजिए, रीतिकाल में केसवदास जी भी कह गये;

केसव केसन अस करी, जस अरिहु न कराय ।

चन्‍द्र वदनि, मृग लोचनी, बाबा कहि-कहि जाय

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बताइये भला, कौन ऐसा अक्ल का मारा होगा जो किसी सुंदरी से अपने लिए बाबा कहलवाना चाहेगा. महिलाएं भी नहीं चाहतीं कि कोई उन्हें आंटी कहे. सुना कि सोनम ने ऐश्वर्या को आंटी कह दिया तो वे ख़फा हो गईं. सोनम ने तर्क दिया कि उन्होंने मेरे पापा के साथ काम किया है तो आंटी ही हुई ना? छम्मक्छल्लो जब दिल्ली में थी, तब एक महिला सब्ज़ीवाले छोकरे से इसी बात पर उलझ गईं कि उसने उसे आंटी क्यों कहा? वे चिल्ला चिल्ला कर कहने लगीं कि मैं तेरे को आंटी दिखती हूं? सब्ज़ीवाला छोकरा हुशियार था. तपाक से बोला, “भाभीजी, गल्ती हो गई” वो भाभी जी जब सब्ज़ी ले कर चली गई, तब छोकरा कहने लगा, “लगती तो दादी की उम्र की है और आंटी में भी आफत” इसीलिए “हम पांच” सीरियल ने यह मर्म वाक्य दे दिया, “आंटी मत कहो ना” यह जुमला इतना मशहूर हुआ कि आज तक यह ताज़ा फूल की तरह टटका और खुशबूदार है.

इस बढ़ती उम्र के नुकसान के क्या कहने! सबसे बड़ा नुकसान तो यही होता है कि आपके रूमानीपन के फूले चक्के की हवा सूं.... करके निकाल दी जाती है. अब लोगों को कैसे समझाएं कि उम्र तो दिल से होती है, देह से नहीं. किसी ने कहा भी है कि दिल को देखो, चेहरा न देखो. लेकिन लोग हैं कि चेहरे और उस पर पड़ती जा रही उम्र की सलवटों को ही देखते और बढ़ती उम्र से संबंधित तमाम नसीहतें देते रहते हैं. यह तो कोई बात नहीं हुई कि आप 60 के हो गये तो रोमांस सपने से भी ऊंची चीज़ हो गई. पति पत्नी भी आपस में कहने लगते हैं कि अब इस उम्र में यह सब शोभा देगा क्या? क्यों भाई, जब आपने शादी की थी तो क्या सात कसमों के साथ साथ यह क़सम भी खाई थी कि एक उम्र तक ही रोमांस करेंगे, उसके बाद नहीं?

उम्र बढ़ी और आपके इधर उधर के रसास्वादन का भी मौका गया. जवानी में, उम्र के जोश में लोग सिर्फ अपनी बहन बेटी के अलावे सभी की बहन बेटी के साथ अपना रसिकपन स्थापित करते थे, तब लोग बस मार पीट कर छोड़ देते थे. बढ़ती उम्र में लोग यह भी जोड़ देते हैं कि देखो बुड्ढे को? उम्र निकल गई, मगर आदत नहीं गई. तो भाई साहब, आदत क्या जाने के लिए बनाई जाती है, और वह भी ऐसी आदतें, जिसकी कल्पना से ही मन में सात सात सितार झंकृत होने लगे और सात कपड़ों के तह से भी देह के दुर्लभ दर्शन की कल्पना साकार होने लगे?

बढ़ती उम्र में आज के चलन के मुताबिक कपड़े पहनिये तो मुसीबत. अपने ही बच्चे कहने लगेंगे, मां, पापा, ज़रा उम्र तो देखिए”.. तो लो जी, वो भी गया. अब नए फैशन के रंग, डिज़ाइन, कपड़े, गहने क्यों ना हों, आप तो मन मार कर बस, अपने पुराने ज़माने की शर्ट, पैंट, चप्पल, साड़ी पर संतोष करते रहिये. महिलाएं शलवार कमीज़ भी पहन लेती हैं, मगर उनकी काट और डिज़ाइन देखिए तो लगेगा कि उम्र दस साल और पहले ही उन तक पहुंच गई है. आज के काट के कपड़े हों तो लोग कहने लगते हैं, बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम या चढ़ी जवानी बुड्ढे नूं. कोई यह नहीं कहता जवान घोड़ा सफेद लगाम. कोई जवान बूढ़ा दिखने लगे तो तमाम अफसोसनाक मर्सिया पढ़े जाने लगते हैं. बूढ़ा जवान बनने की कोशिश करे तो सौ सौ लानतें मलामतें!

पहले बड़ी उम्र का यह तो फायदा होता था कि लोग बुड्ढों से उनके अनुभव का लाभ उठाते थे. अब तो तरह तरह की देसी विदेशी पढ़ाई ने यह तय कर दिया है कि नई उम्रवाले जो सोच, जो आइडिया देते हैं, वह इन बुड्ढों में कहां ? ये सब तो अब सूखे बीज हो गये हैं, पक्के घड़े हो गये हैं, ठोस और जड़ दिमाग के हो गए हैं. तो अब इनसे इनके अनुभव भी गए. सो दफ्तरों में भी इनकी छांट छंटाई हो जाती है. घर में ऐसे ही कोई नहीं पूछता. अब दफ्तर के निकाले और घर के मारे कहां जाएं ?

बच्चा हो तो उसकी बढ़ती उम्र का हर कोई आनंद लेता है. जवानी के बाद की ढ़लवांनुमा उम्र की बढ़त पर हर कोई अफसोस ही करता है. तमाम नसीहतें दी जाने लगती हैं कि बाबा रे, ज़रा सम्भल के, पैर इधर उधर हुए कि कुछ कड़े चीज़ खा ली कि ज़रा ज़्यादा देर तक टीवी देख लिया कि किताब पढ़ ली कि कुछ और ही कर लिया, खुद भी पड़ोगे और घर के लोगों की भी जान सांसत में डालोगे.

बढ़ी उम्र को टीवी वाले भी धता बता गए. आजकल के सीरियल देखिए, कौन सास है कौन बहू, कौन मां है कौन बेटी, कौन बेटा है और कौन पति, पता ही नहीं चलता. मगर राजनीति में यह सब चलता है. यह राजनीति घर, दफ्तर, बाजार, सिनेमा सभी जगह चलती है. यहां लोग बूढे नहीं होते. यहां लोग शान से कहते हैं, “ये नए, आज के लोग क्या कर लेंगे? इनको कोई अनुभव है क्या?” सुना कि एक बीच की उम्र के नेता ने सोनम की तरह ही अपने से कहीं बडी उमर के नेता को बूढ़ा कह दिया. वे नेता अब सचमुच में उम्र ही नहीं, दिल और क्रियाशीलता के लिहाज़ से भी बूढे हो गए हैं. बेटे को कमान सौंप दी है. बढ़ती उम्र की गिरती सेहत ऐसी कि वोट तक देने नहीं जा सके. उनके लोग उन्हें बाबा कहते हैं. मगर इन्होंने उन्हें बाबा कह दिया और आफत मारपीट तक आ गई, “हमारे साहेब को बुड्ढा बोला रे?” सभी को नसीहत का पाठ पढ़ानेवाले उन बाबा ने अपने लोगों से यह नहीं कहा कि “जाने दो रे बाबा, बाबा को बाबा ही तो बोला जाएगा ना.”

इसलिए खबरदार, बामुलाहिजा, होशियार, कभी किसी की बढ़ती उम्र पर मत जाइए. उन्हें हमेशा जवान कहिए, आपका भी भला होगा और उनका भी. अपनी बीती जवानी के जोश में भरकर अपनी झुकी कमर को खींचकर खुद ही सीधी करेंगे. अब इसमें कमर में मोच आती है या घुटने टूटते फूटते हैं तो हमें दोष मत दीजिए. आखिर मर्ज़ी है उनकी, क्योंकि तन मन है उनका.

Monday, November 23, 2009

गुजरात- यानी जहां गुजरे अच्छे से रात!

http://mohallalive.com/2009/11/23/vibha-rani-reportaz-on-ahmedabad-toor/

छम्मकछल्लो के एक मित्र हैं डॉ. माणिक मृगेश. गुजरात प्रेमी हैं. वे अक्सर कहते हैं, गुजरात- यानी जहां गुजरे अच्छे से रात! और यह जो शख्स है,उसका नाम प्रवीण है। वह प्राइवेट टैक्सी का ड्राइवर है। नरोदा पटिया में रहता है। समय बिताना था। हमारी गाड़ी अपने गंतव्य को भागी जा रही थी। अहमदाबाद का नया बसा इलाका – सेटेलाइट सिटी। विकास की दौड़ में भागता शहर। चौड़ी सड़कें, चौतरफा मॉल से पटा इलाक़ा। एक फाइव स्टार होटल खुल चुका है। चार और खोलने की तैयारी है। सड़क बनने का काम हो रहा है। अभी इसके ऊपर फ्लाइओवर बननेवाला है। तब यहां का ट्रैफिक और भी कम हो जाएगा। इसरो का एक कार्यालय भी उधर दिखा। तब लगा कि एक ज़माने में यह कितना वीरान इलाका रहा होगा। आज यह अहमदाबाद का सबसे महंगा इलाक़ा है।

अहमदाबाद आना-जाना रहता है। पिछले दस-बारह सालों में इसे बढ़ते, विकसित होते देखा है। लेकिन इधर के कुछ सालों में तो विकास का जैसे कोई रेला आया है। यह भौतिक विकास है और आज इस भौतिकतावाद को हमने विकास का, आधुनिकता का अहम हिस्सा मानते हुए समझ लिया है कि यही विकास है। इसमें बहस की कोई गुंजाइश नहीं है। आप कैसे किसी को कह सकते हैं कि उसके पास अपना एक घर न हो, घर हो तो उसमें बिजली पानी न हो, आसपास अच्छी दुकानें न हों, साफ और चौड़ी सड़कें न हों, घर में टीवी से लेकर सोफा सेट, मोबाइल, आयी पॉड तक सभी आधुनिक उपकरण न हो। यही सब तो विकास है, और क्या चाहिए?

पंद्रह दिन पहले कच्छ इलाके में गयी थी। 2002 के भूकंप के बाद वहां के हालात को देख कर लगा ही नहीं कि यहां इतनी बड़ी आपदा आयी थी। भुजोरी गांव का कला ग्राम तो अपने आप में एक अदभुत स्थल है। कुछ नहीं तो बस जाइए, शांति से एक दो घंटे बैठकर आ जाइए। विकास के क्रम में छूटती हैं परंपराएं, परंपरागत सामान, पहनावा, खान-पान, रीति-रिवाज़। पूरे कच्छ और कच्छी कढ़ाई के लिए मशहूर भुजोरी गांव में आधुनिक फैशन के कपड़े तो मिले, मगर ठेठ पारंपरिक पहनावा, ठेठ गहने लाख खोजने पर भी नहीं मिले। गुजराती खाना नहीं मिला किसी भी अच्छे होटल में। वही मेनू वाला पंजाबी, चाइनीज़ और दक्षिण भारतीय खाना। यह पूरे देश में है। स्थानीय खाने के लिए आप तरस जाइएगा। विकास की इस गति में पारंपरिक वस्तुओं की बलि चढ़ती रही है।

गुजरात में सांप्रदायिक दंगे होते रहे हैं। पहले जब भी कभी जाना होता था, सुनते आते थे कि इस इलाक़े में दंगा हुआ, उस इलाके में दंगा हुआ। गोधरा कांड तो गुजरात के लिए एक काला अध्‍याय है। गोधरा के बाद भी गुजरात का विकास हो रहा है और लोग देख रहे हैं, महसूस कर रहे हैं। गोधरा के बाद भी यहां वही सरकार है। आगे भी शायद वही रहे। आखिर क्यों? इतने दर्दनाक, हौलनाक कांड के बाद भी? ऐक्टिविस्ट, एनजीओ, फिल्म मेकर्स कुछ दूसरी तस्वीरें बताते हैं, यहां की एक आम जनता कुछ दूसरी। एक कहता है, “सड़क इतनी अच्छी बन गयी है कि अहमदाबाद से सूरत की दूरी चार घंटे में तय हो जाती है। आईआईएम तो है ही। शिक्षा का स्तर भी पहले से बेहतर हुआ है।”

मैंने प्रवीण से गुजरात के हालात, रहन-सहन, देश-दशा पर बात करनी शुरू की। उसने खुशी-खुशी बताना भी शुरू किया। उसकी बातचीत में कोई राजनीतिक गंध नहीं थी। न ही हालात को छुपाने की कोई मंशा। यह उसकी कहानी है, उसकी ज़बानी। मेरी भी मंशा किसी को उछालने या उसे बेहतर साबित करने की नहीं है।

“यहां हालात एकदम सही है। चारो ओर डेवलपमेंट खूब हो रहा है। प्रॉपर्टी का रेट बढ़ गया है। सड़क देखिए, कितनी अच्छी हो गयी है। बिजनेस बढ़ने से होटल भी बढ़े हैं। ये देखिए सेंट लॉरेन होटल। अभी अभी खुला है। शहर का सबसे बड़ा फाइव स्टार होटल है। इंडिया और श्रीलंका के सारे क्रिकेटर्स यहीं ठहरे हैं।”

“ओह! जभी कल यहां शाम में खूब भीड थी?”

“हां, रही होगी। उनलोगों को देखने के लिए। शाम में आते हैं न। मैं तो तीन दिन से उनलोगों को देख रहा हूं।” प्रवीण की आवाज़ में उन सबको देख पाने का गर्व भरा हुआ था।

“तुम्हें कौन क्रिकेटर पसंद है?”

“मुझे तो मैं ही पसन्द हूं, जब मैं खेलता हूं… अब तो नहीं खेल पाता हूं। अब मैं काम करने लगा हूं न! एक संडे मिलता है, उसमें बहुत से काम रहते हैं। जैसे इसी संडे को काम था। बेटी का ड्रेस लेना था, मार्केट जाना था। उसके बाद साहब ने (जिनकी गाड़ी प्रवीण चलाता है) फैमिली के साथ खाने पर बुला लिया। समय कहां मिलता है? ये साहब बहुत अच्छे हैं।”

“और यहां की सरकार?”

“वह भी। हमारा जो पूरा इलाका है न, वह इसी पार्टी का है। हम तो जब भी वोट देंगे, इसी को देंगे।”

“इतना सब होने के बाद भी?”

“देखिए मैडम, वो एक कांड था, हो गया। उसमें भी यहां के लोगों ने कुछ नहीं किया। जो बाहर से आते हैं, दंगे कराते हैं और चले जाते हैं। हां, वो हुआ। उस बार। जो हुआ, वह अच्छा नहीं हुआ, हम जानते हैं। मगर यह हम सबने नहीं कराया है। हमलोग तो अभी भी एक साथ रहते हैं, हमलोगों का काम एक दूसरे के बगैर चल ही नहीं सकता।”

“आपलोग तो अब अलग-अलग बस्ती बना कर रहने लगे हैं, ऐसा हमने सुना है।”

“हां, रहते हैं, मगर अलग हो कर भी एक ही हैं। वो बस्ती के इस पार हैं तो हम उस पार। आमने-सामने। हम सभी एक दूसरे के यहां जाते हैं। एक दूसरे के यहां खाते-पीते हैं। उनके यहां जब शादी होती है, वे हमलोगों को बुलाते हैं और हमलोगों के लिए अलग से वेज खाना पकवाते हैं।”

“क्या तुमलोग भी ऐसा करते हो कि जब तुम्हारे यहां शादी होती है तो तुमलोग उन सबके लिए अलग से नॉनवेज खाना बनवाओ?”

“नहीं, हमलोग ऐसा नहीं करते हैं। अगर वे लोग कोई मांगते हैं तो हमलोग अलग से शादी के बाद उनके लिए एक पार्टी रखते हैं और उसमें उन सबको नॉनवेज खिलाते हैं। मगर जेनरली कोई मांगता नहीं है। उन लोगों को मालूम रहता है न कि हमलोग नहीं खाते हैं, तो वे लोग कुछ कहते भी नहीं हैं। बस चुपचाप खा लेते हैं।”

“आपके घरों की महिलाएं उनके यहां का खा-पी लेती हैं? आम तौर पर आदमी तो उतना भेदभाव नहीं रखते हैं, जितना कि औरतें?”

“नहीं। नॉनवेज नहीं खाती हैं। हां, हां, बाकी का खाती हैं, चाय-नाश्ता करती हैं। नहीं, कोई भेद नहीं करतीं। उनकी औरतें भी हमारे यहां आती हैं, तो खा पीकर जाती हैं। दरअसल, मैंने आपको बोला न कि यहां आपस में हमलोगों का कोई झगड़ा है ही नहीं।”

“अपलोगों के धंधे अलग अलग हैं?”

“हैं, मगर सभी के काम एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। अब मैं आपको अपने यहां के धंधे के बारे में बताता हूं। हमलोगों के यहां सिलाई का धंधा होता है और उनलोगों के यहां कढ़ाई का। माने बोले तो लेडीज लोगों का ड्रेस। साड़ी सब रहता है न। तो कढ़ाई का काम वो लोग करते हैं, और सिलाई का काम हमलोग। अब इसमें कैसे एक दूसरे से अलग हो सकते हैं हमलोग, बताइए आप ही? वैसे ही है। चावल हम उगाते हैं, तो पापड़ वो लोग बनाते हैं। अभी तो ये लोग भी इस गोर्मिंट को मानने लगे हैं। आप ही देखिए न, पहले तो हर दस पंद्रह दिन में कहीं न कहीं दंगा, मारपीट होता ही रहता था। अब आप एक गोधरा को छोड़ दो। लेकिन उसके बाद बोलो तो कहीं भी गुजरात में उसके बाद दंगा हुआ है? सो अब तो ये लोग भी बोलता है कि बाबा ऐसी ही गोर्मिंट चाहिए। सुकून से तो रहने को मिलता है न।”

“शायद गोधरा के बाद सभी डर गये होंगे?”

“नहीं, ऐसा नहीं है। वे अभी भी हमारे साथ रहते हैं और हम उनके साथ। मेरे कई मुस्लिम दोस्त हैं, वे सभी गरबा में आते हैं, हमारे साथ डांस करते हैं। हम भी उनके ताजिये में जाते हैं। ईद में जाते हैं। मैंने बोला न कि ये सब काम जो है न, वो बाहरवालों के हैं। यहां के लोगों की आपस में कोई दुशमनी नहीं है।”

“जो रिफ्यूजी कैंप लगे थे, अभी सब है ही?”

“नहीं, सब हट गये। एकाध कोई होगा तो पता नहीं।”

“तो तुम्हें लगता है, यहां सब ठीक है?”

“हां मैडम, सभी ठीक है। आप ही बताओ न, आप तो खुद ही अपनी आंख से सब देख रही हैं। यहां लोगों को क्या चाहिए? दो रोटी और सुकून की ज़‍िंदगी। वह मिल रही है।”


Friday, November 20, 2009

मन की लटाई पर निन्दा का माझा और वो लेखन का गुड्डी बकाट्टा!

http://janatantra.com/2009/11/20/vibha-rani-on-plight-of-a-writer/

आह! मन बहुत दुखी है. कम्बख्त बार बार सोचता है कि लेखक ही बनना था तो हिन्दी और मैथिली के क्यों बने? अपने जन्म पर भी अफसोस होता है कि जन्म ही लेना था तो एक आम आदमी बनकर क्यों जन्मे? आप चाहें तो कह लें कि आम औरत. मुहावरे में भी थोड़ा बदलाव आ जायेगा और ज़ायके में भी. सुभाव ही देना था तो ऐसा सुभाव क्यों दे दिया कि किसी से कुछ कहने के लिए हज़ार बार सोचना पड़ जाए. पर क्या कीजियेगा? सबकुछ गर अपने ही हाथ में होता तो यह जग जितने जन, उतनी तरह का न हो गया होता? आखिर हर कोई इसे अपने अपने चश्मे से ही देखता न!

मैं पता नहीं किस गफलत में लेखक बन गई. नहीं, गफलत नहीं, तबका यह सबसे सस्ता और सुलभ तरीका था. घरवालों ने एयरहोस्टेस नहीं बनने दिया, गायिका नहीं बनने दिया, नृत्यांगना नहीं बनने दिया. मन के किसी कोने में सृजनात्मकता का कोई कीड़ा काटने लगा था. तब टैगोर को पढ़ लिया था, शरद और बंकिम को चाट लिया था, प्रेमचन्द को घोल कर पी लिया था, और भी जाने कितनों को चने चबेने की तरह फांक लिया था, राजेन्द्र यादव, मन्नू भंडारी को दूध मट्ठे की तरह तो ज्ञानरंजन, संजीव को चाय की तरह तो अज्ञेय से लेकर उदय प्रकाश को फैशनेबल कॉफी की तरह उदरस्थ, नहीं नहीं, हृदयस्थ कर लिया था. तो लगा भैया कि अपन भी लिख सकते हैं. नया कागज नहीं मिलेगा तो क्या हुआ? पुरानी कॉपी के पुराने पन्ने पर ही लिख लेंगे. सो लिखने लगे. जब लिखने लगे, तब कहीं कहीं छपने भी लगे. जब छपने लगे तो खुद को वेदव्यास समझने लगे. अब क्या! सारी दुनिया मेरी मुट्ठी में. क्या बूझते है? कुछ ऐसा वैसा कीजियेगा तो लिखिए देंगे. हमारे पास सरस्वती की ताक़त है भाई!, मज़ाक है! लेखक कोई ऐसी वैसी हस्ती है? और हम तो लेखिका थे. भला हो अंग्रेजी का कि वे अपने शब्द कोश और उसके प्रयोग में तरह तरह के सुधार और प्रयोग करते रहते हैं, जिससे अब कम से कम पुकारने में लेखक लेखिका, ऐक्टर-ऐक्ट्रेस जैसा भेद खत्म हो गया है, वरना अपने यहां तो भाई लोग लेखिका भी लिखने लगे और उसके ऊपर से उसके पहले महिला भी जोड़ने लगे. तो माने कि हम हो गये महिला लेखिका. एक करेला अपने तीता, दूजा चढा नीम पर.

अब लेखिका हो गये तो लोग कहने लगे कि लेखिका लोग तो ऑफिस की सेक्रेटरी की तरह होती हैं. जैसे सेक्रेटरी पर उसके बॉस हमेशा फिदायीन रहते हैं, वैसे ही महिला लेखिकाओं पर भी सम्पादक लोग बलि बलि जाते हैं. एक ने कह भी दिया कि आप तो हंस में भी छपती हैं और हंस में तो कोई ऐसे वैसे नहीं छपता. उन्हें हमारे सभी मैथिली पत्र पत्रिकाओं में भी छपने पर उज़्र था कि मेरी रचना तो कोई छापता नहीं, आपकी कैसे छप जाती है? अब आजकल उनकी बोली बन्द है, क्योंकि मैथिली में उनकी रचनाएं भी छप रही हैं और मैथिली के बहुत स्वनाम धन्य प्रकाशक के यहां से उनकी किताब भी आ चुकी है. यह दूसरी बात है कि मैथिली के लेखक- प्रकाशक की अभी वह हैसियत नहीं बनी है कि लेखक प्रकाशक के बलबूते पर छप जाए या प्रकाशक अपने बूते पर उसकी किताब छाप दे. हरिमोहन झा ने अपने उपन्यास ‘कन्यादान’ में एक पात्र के माध्यम से मैथिली के स्थिति के बारे में कहा था कि “एक रुपया सालाना जो पत्रिका पर खर्च करूंगा, उससे साल भर नमक नहीं खाऊंगा?” 50 साल से ऊपर हो गए, अभी भी वही हालात हैं.

तो भैया, घरवालों को लगा कि लेखन सबसे सुरक्षित सृजनात्मकता है. इसमें कहीं ना आना है ना जाना. ना किसी से मिलना, ना जुलना. हिलने डुलने की तो बात ही ना कीजिये. समय की भी कोई बन्दिश नहीं. (माने सबसे बड़ी बन्दिश). वह् यह कि पहले तो घर का काम कीजिये, फिर सिलाई कढ़ाई जैसे महान स्त्री धर्म वाला काम निपटाइये, फिर खाना भी पकाइये, घर भी देखिये, आने जानेवालों की आव भगत भी कीजिये और इन सबसे अगर समय बच जाए और और लिखास की आग फिर भी कलेजे में भड़कती रह जाये तो लिख लीजिये एकाध पन्ना! रात के दो बजे या भोर के चार बजे. और सबसे बड़ी बात कि घर में ही हैं ना तो सबसे बड़ी बात इज़्ज़त पर कोई आंच नहीं. आआहाह! कितना अच्छा है यह लेखन धर्म!

तो इस तरह से जी कि मज़बूरी का नाम महात्मा गांधी. पता नहीं यह मुहावरा किस रूप में निकला और किसने निकाला? मगर ऐसे हालात में लोग कह देते हैं सो अपन ने भी कह दिया. अब लेखक बन गये तो इसका यह तो मतलब नहीं कि सभी कोई आपको जान ही जाये? और जान जाये तो जान जाये, आपके मरने के बाद भी आपको याद रखे, आपकी याद में किताबें छपवाए, समारोह करवाए, बड़ी-बड़ी श्रद्धांजलियां दिलवाए? ना जी ना, हम हिन्दीवालों को इतनी फुर्सत नहीं. और जो तनिक फुर्सत मिल भी गई भूले भटके तो उसमें लोग बाल की खाल ना निकालेंगे? किसी के नाम और काम की ऐसी की तैसी ना कर देंगे? इस देश का सबसे बड़ा रस है- निन्दा रस. उसमें ना डूब जायेंगे? हर्र लगे ना फिटकरी, रंग चोखा आये. देखिए, देखिए, निन्दा रस के नाम से ही हमारे इस लेख को पढ़नेवालों की आंखें चमक आई हैं. उनके मन में भी इस रस के लिए उपयुक्त पात्र की तस्वीरें उभरने लगी है. मन उनके लिए सभी तरह के सम्बोधन के लिए अकुलाने लगा है. जीभ लसफसा रही है. कलेजा भर आया है. हाथ कसमसा रहे हैं. तो आइये, साहित्य वाहित्य को मारें गोली. उसमें होनेवाले नाम धाम का पढें स्यापा. चलिये चढ़ाते हैं मन की लटाई में निन्दा का माझा और करते हैं गुड्डी बकाट्टा! क्यों ताऊ! ओ भैया! अरे दिदिया रे, आ रहा है ना मज़ा

Wednesday, November 11, 2009

रब का बन्दा -एक लघु कथा

पढिये लघुकथा.कॉम पर अपनी एक लघु कथा. लिंक है- http://www.laghukatha.com/304-1.htm

वह शहर के सबसे बड़ चौराहे पर था। आने-जाने वालों की संख्या बहुत थी। उसे अच्छे पैसे मिल जाते थे। वह खुश था।
आज भी वह अपनी नियत जगह पर था। दफ्तर के बाबुओं का आना-जाना शुरू हो गया था। उसने भी अपनी आवाज बुलंद की - 'देनेवाला सीताराम! भाई दस पैसा! बहन जी, दस पैसा! बाबूजी, भगवान के नाम पर दस पैसा!'
वह सहम गया। बाबूजी लाल ऑंखों से घूर रहे थे। फिर उन ऑंखों में एक चमक उभरी जो हाथ के रास्ते उसकी पीठ पर उतर गई -'साला काफिर! बोल, अल्लाह के नाम पर दे!' बाबूजी के हाथ में एक रूपए का नोट था और वह बोहनी खराब करना नहीं चाहता था।
उसने आवाज लगाई -'दे दे, अल्लाह के नाम पर दे दे! खुदा तेरे बच्चों पर सलामत की नजर रखेगा।' रूपया उसके कटोरे में था। बाबूजी के होठों पर वक्र मुस्कान।
अल्लाह के नाम पर कटोरा भर गया। वह उस कटोरे को बड़ी थैली में उलीचने जा ही रहा था कि पीछे से एक लात पड़ी -'क्यों रे! एक ही रात में तेरी सुन्नत हो गई जो हरामी अल्लाह-अल्लाह की बरसात कर रहा है। जान की खैर चाहता है तो दुबारा इन विधर्मियों की जुबान मुँह पर नहीं आनी चाहिए।'
'बिजनेस का टेम है। काहे को धंधा खराब करने का!' उसने सोचा - एक पल, दो पल ... समय सरक रहा था।
कटोरे का पैसा थैले की दूरी तय कर चुका था। उसने खाली कटोरा सामने रखा और जोर की आवाज लगाई -'दे ऊपरवाले के नाम पर! वह सबका भला करेगा! तेरा भी और तेरा भी।' उसे अल्लाह और भगवान के बन्दे याद आए।
उसके कटोरे में दोनों के ही बन्दों के पैसे थे ।
वह मुस्कुरा उठा ।

Tuesday, November 10, 2009

"निर्मल आनन्द सेतु" अवितोको की कार्यशाला का दूसरा चरण- जेल बन्दियों के लिए


"निर्मल आनन्द सेतु" कार्यक्रम के तहत अवितोको की थिएटर कार्यशाला 7 नवम्बर, 2009 को थाणे सेंट्रल जेल के बन्दियों के लिए आयोजित की गई. इस कार्यक्रम का उद्देश्य बन्दियों के साथ लगातार काम करके उनके जीवन में सकारात्मक विचारधारा लाना है. इसमें मुख्य रूप से उन्हीं बन्दियों को लिया गया, जो पिछले माह आयोजित इस "निर्मल आनन्द सेतु" कार्यक्रम में सम्मिलित हुए थे.

कभी विचार तो कभी एक्शन के द्वारा एक अनुभवजन्य सीख इस कार्यक्रम की खासियत है. पिछली कार्यशाला में व्याख्यान पर बल दिया गया था, इस बार इसे ऐक्शन यानी गतिविधियों पर आधारित बनाया गया. कार्यक्रम की शुरुआत ही विध्वंस के अभ्यास से हुई. सहभागियों को ढेर सारे कागज फाडने को कहा गया. तुरंत ही एक मोड आया जब एक सहभागी ने और अधिक कागज फाडने से यह कहते हुए मना कर दिया कि इससे कागज का नुकसान तो है ही, इसमें जो बातें लिखी हुई हैं, उन्हें हम पढ सकते हैं, ज्ञान बटोर सकते हैं, जबकि कागज को फाड देने से हमें कुछ भी हासिल नहीं होगा. दूसरे सहभागी ने तुरंत कहा कि इस प्रक्रिया से उसके मन के क्रोध व उत्तेजना को शांत होने में मदद मिली है और वह अपने आपको बहुत शांत और आरामदायक महसूस कर रहा है. सहभागियों से जब उन फटे कागजों को जोडने को कहा गया, तब अचानक से उनके हिइ दिमाग में यह बात आई कि हम नाश तो कर सकते हैं, मगर संज्न या विकास नहीं. यह उनके लिए क्या, सबके लिए असम्भव है. मगर इन्हीं कागज के टुकडों से जब निर्माण की बात बताई गई, तब किसी ने पेड, किसी ने मोर, किसी ने दिल तो किसी ने मछली तो किसी ने दवा की बोतल बनाई. बनाने के क्रम में यह साफ साफ बता दिया गया था कि इनसे अच्छी या बुरी कोई भी चीज़ बनाई जा सकती है, मगर सहभागियों की अपनी सकारात्मकता ने उनसे किसी भी असामाजिक तत्व या वस्तुएं नहीं बनवाईं. कागज फाडने से इंकार करनेवाले सहभागी ने बडे ही कलात्मक तरीके से अपना नाम इन टुकडों से लिखा. इन्हीं टुकडों से फूलों और बर्फ की सेज बनाई गई और सहभागी अपने रूमानीपन के शिखर पर पहुंच गए. नाना कल्पनाओं, गीतों और अनुभूतियों से उन्होंने इन टुकडों को एक ऐसे कोमल भाव में बदल दिया उअर उसमें गहरे तक डूब भी गए. एक सहभागी ने ही इस पूरे अभ्यास का नाम दिया "विनाश से विकास".

दूसरे चरण में स्फूर्ति, गति पर अभ्यास कराया गया. और इसके बाद उन्हें एक बडी चुनौती दी गई, जिसमें उन्हें बगैर अपने पैर का इस्तेमाल किए अपनी निर्धारित सीमा तक जाना था. काफी सोच विचार के बाद सहभागियों ने ही इसका समाधान निकाला और मानव श्रृंखला बना कर और उस पर सहभागी को चला कर इस चुनौती का सामना किया और सफल रहे. यह उन्होंने ही बताया कि यह अभ्यास एकता की मिसाल है और संगठित हो कर काम करने का बल प्रदान करता है. आपसी सहज विश्वास के साथ साथ तनिक भय भी इस अभ्यास के मूल में था. चाणक्य ने कहा है कि अन्ध विश्वास कभी भी किसी पर नही करें और इस नीति को सहभागियों ने इस अभ्यास के द्वारा समझा.

अवितोको की कार्यशालाओं की खासियत होती है कि वह सहभागियों को अपनी बातें कहने का पूरा अवसर देती है. चन्द पलों के बाद ही सहभागी इस आरामदायक स्थिति में आ जाते हैं कि वे अपनी बातें बडे ही आराम से कहने और करने लगते हैं. अवितोको के कर्यक्रमों में कोई भी भाषण या उपदेशात्मक तरीका नहीं अपनाया जाता, बल्कि शारीरिक और मानसिक अभ्यास और अनुभव जनित सीख के द्वारा उन्हें सोच के सकारात्मक स्तर तक ले जाया जाता है. इसका नतीज़ा रहा कि अपने मुकदमे से लौटे अपने अपने बैरकों में जा रहे कई बन्दी इस कार्यक्रम को होता देख बैरक में न जा कर इसमें भाग लेने के लिए आ गए और अंत तक पूरे उत्साह से इसमें बने रहे.

कार्यक्रम का संचालन विभा रानी ने किया जिसमें अकादमी ऑफ थिएटर आर्ट, मुंबई विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र अमोल काम्बले ने साथ दिया. अवितोको की यह कार्यशाला एक महीने के नियमित अंतराल पर किए जाने की योजना है. अपना योगदान देने के इच्छुक सम्पर्क कर सकते हैं- avitoko@rediffmail.com या gonujha.jha@gmail.com पर. अवितोको का वेब साइट है- www.avitoko.org

Sunday, November 8, 2009

अंतर्राष्ट्रीय महिला नाट्य लेखक यानी WPI (WOmen Playwright International) कॉंफ्रेंस में नाट्य पाठ

http://www.artnewsweekly.com/substory.aspx?MSectionId=1&left=1&SectionId=15&storyID=105

http://hindi-khabar।hindyugm.com/2009/11/vibha-raji-natak-path-wpi.html

छम्मकछल्लो के बेहद चर्चित नाटक "दूसरा आदमी दूसरी औरत" का नाट्य पाठ 6 नवम्बर, 2009 को दोपहर 12 बजे मुंबई में स्त्री मुक्ति संघटना एवं एकेडेमी ऑफ थिएटर आर्ट, मुंबई विश्वविद्यालय के सौजन्य से 1-7 नवम्बर, 2009 तक आयोजित WPI (WOmen Playwright International) यानी अंतर्राष्ट्रीय महिला नाट्य लेखक कॉंफ्रेंस में हुआ. प्रेम और सम्बन्ध के एक नए रूप पर आधारित इस नाटक का पाठ विभा रानी एवं अजय रोहिल्ला ने किया. विवाहेतर सम्बन्ध न तो आज के समय की देन है, न शरीर की ज़रूरत और मन की फिसलन का परिणाम. यह मन की अतृप्ति की एक अभिव्यक्ति है. प्रश्न यह नहीं है कि यह सम्बन्ध हुआ कैसे और क्यों हुआ? सवाल यह है कि इस सम्बन्ध का परिणाम क्या हो जो घर, परिवार को भी बनाए रखे और सम्बन्ध को भी. इसी की पडताल और विवेचना करता है यह नाटक.
विभा रानी हिन्दी और मैथिली की लेखक, नाट्य लेखक, नाट्य समीक्षक, रंगमंच अभिनेत्री व सामाजिक कर्मी हैं. अबतक उन्होंने 10 से अधिक नाटक लिखे हैं, जिनमें से दो नाटको "आओ तनिक प्रेम करें" तथा "अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो" को "मोहन राकेश सम्मान" से सम्मानित किया जा चुका है. विभा रानी लिखित व अभिनीत दो एक पात्रीय नाटक "लाइफ इज नॉट ए ड्रीम" का मंचन फिनलैंड, मुबई तथा राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव, रायपुर में तथा "बालचन्दा" का मंचन काला घोडा फेस्टिवल, मुंबई में किया जा चुका है. उनके अन्य एक पात्रीय नाटक "ऐ प्रिये, तेरे लिए" का मंचन मुंबई में हो चुका है. विभा रानी अभिनीत ताज़ातरीन नाटकों में से है डॉ. नरेन्द्र मोहन लिखित नाटक "मि. जिन्ना", जिसमें वे जिन्ना की बहन फातिमा की भूमिका में हैं. "दूसरा आदमी दूसरी औरत" का मंचन 2002 में भारतीय रंग महोत्सव, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में राजेन्द्र गुप्ता व सीमा बिश्वास द्वारा तथा मुंबई में इसका रंगपाठ राजेन्द्र गुप्ता व नीना गुप्ता द्वारा किया जा चुका है. विभा रानी ने अबतक 12 से अधिक किताबें लिखी हैं तथा "कथा" अवार्ड सहित कई पुरस्कार पा चुकी हैं.
अजय रोहिल्ला थिएटर के एक जाने माने अभिनेता, निर्देशक हैं. "दुलारीबाई", "सावधान पुरुरवा", "विदूषक", "चिट्ठी", खालिद की खाला", "मौली" जैसे नाटकों में अभिनय किया है. सभी प्रमुख संस्थानों, जैसे साहित्य कला परिषद, उर्दू अकादमी, संगीत नाटक अकादमी, शाकुंतलम थिएटर आदि द्वारा आयोजित थिएटर फेस्टिवलों में एक निर्देशक के रूप में भाग ले चुके हैं. वे दिल्ली विश्वविद्यालय, गोवा कला अकादमी के विजिटिंग फैकल्टी रह चुके हैं. देश भर में ये थिएटर वर्कशॉप लेते हैं. अजय द्वारा अभिनीत कुछ महत्वपूर्ण फिल्में हैं- "बैंडिट क्वीन", "डॉ. अम्बेदकर", "गंगाजल", "मंगल पाडेय", "वारियर" आदि. अबतक 11 लघु फिल्में बन चुके अजय की एक फिल्म पिछले साल 2008 के सिंगापुर फिल्म फेस्टिवल में नामित हुई थी.
इस नाट्य पाठ में बडी संख्या में लोगों ने भाग लिया. आज के जीवन के एक बेहद निजी यथार्थ की बेहद प्रवाहमई और काव्यमई भाषा में प्रस्तुति को श्रोताओं ने बहुत सराहा.

Monday, November 2, 2009

सकुबाई से सफाई घर की भी, दिल की भी

http://mohallalive.com/2009/11/01/review-of-drama-sakubai/

नाटक में आप जितने भी प्रयोग कर लें, पीरियड ड्रामा ले आएं, ड्रामे के माध्यम से आप राग रंग, नट भाव, उपमा, उपमान की बातें बताएं, सच तो यह है कि आम आदमी नाटक के उन्हीं हिस्सों से जुड़ पाता है, जिसके साथ वह अपना जीवन देख पाता है। पौराणिक आख्यानों में भी वह वहीं तक पहुंचता है, जहां उसे आज का अपना समाज, परिवेश दिखाई देता है। ऐसे में सामजिक या यों कहें कि घरेलू पृष्ठभूमि पर खेले गये नाटक से दर्शक तुरंत अपना नाता जोड़ लेते हैं। एकजुट थिएटर ग्रुप प्रस्तुत नादिरा ज़हीर बब्बर लिखित व निर्देशित नाटक “सकुबाई” नाटक एक ऐसी ही रचना है, जिसमें घर-घर काम करनेवाली बाई सकुबाई के माध्यम से समाज में एक साथ ही जी रहे नाना वर्गों के नाना जीवन को देखे जाने की कोशिश है। साथ ही साथ खुद उसके अपने जीवन की भी। एक आम मध्य या उच्च वर्ग और तथाकथित निम्न वर्ग में कोई फर्क़ नहीं रह जाता, जब मामला प्रेम, सेक्स, घरेलू हिंसा, बलात्कार, आपसी जलन आदि पर आता है, बल्कि कई बार तो ये तथाकथित निम्न वर्ग के लोग इन संभ्रांत लोगों पर भारी पड़ जाते हैं। क्या फर्क़ रह जाता है सकुबाई या उसकी मालकिन में कि दोनों के ही पति के विवाहेतर संबंध हैं। विरोध करने पर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर मालकिन भी पति के हाथों बुरी तरह पिटती है, मगर बच्चों की खातिर घर नहीं छोड़ पाती। मगर, फर्क़ है। सकुबाई के पति के संबंध जग जाहिर हैं। मालकिन के पति के संबंध सामाजिकता की खोल में छुपा। नौकरानी हो कर भी सकुबाई इतनी ईमानदार है कि मालकिन अपना पूरा घर उसके ऊपर छोड़ देती है, जबकि उसी मालकिन की करोड़पति सहेली मालकिन के पर्स से उसके हीरे की अंगूठी चुरा लेती है। मुंबई में आपको ऐसी ईमानदार बाइयों की फौज़ मिलेगी। बल्कि यूं कहें कि जिस तरह हर सफल पुरुष के पीछे किसी स्त्री का हाथ होता है, उसी तरह हर सफल औरत के पीछे उसकी बाई का हाथ होता है।
एकपात्रीय नाटक को कुशलतापूर्वक डेढ़ घंटे तक खींच ले जाना किसी समर्थ कलाकार की ही खासियत है और यह विशेषता निस्संदेह सकुबाई की भूमिका में सरिता जोशी की है। सरिता जोशी गुजराती थिएटर और फिल्म की मशहूर और बड़ी कुशल, इसलिए सफल अभिनेत्री हैं। वे लगभग 45 सालों से भी अधिक समय से अभिनय के क्षेत्र में हैं। एकपात्रीय अभिनय में सब कुछ उसी पात्र को दर्शाना होता है और सरिता जोशी ने मालिक से लेकर अपने पति और बूढ़ी मां की भी भूमिका बड़ी कुशलता से निभायी है। तदनुसार आवाज़, शारीरिक भंगिमा, चेहरे पर भाव। हालांकि उम्र अपनी छाप उन पर छोड़ने लगी है। बीच-बीच में वे हांफ जाती रहीं, संवाद भी लगा कि कुछ भूलती सी रहीं। मगर यह उनकी नाट्यकुशलता ही थी कि इसे उन्होंने ज़ाहिर नहीं होने दिया।
यह नाटक 1999 में पृथ्वी फेस्टिवल में ओपन हुआ था। तब से इस नाटक के कई शो हो चुके हैं। नादिरा बब्बर के यह भी पुराने नाटकों मे से एक है, जिसमें उनकी पुरानी मेहनत व प्रतिबद्धता स्पष्ट दिखाई देती है। सेट प्रभार, स्टेज और प्रोडक्शन सभी में हनीफ पटनी ने अपनी कुशलता दिखायी है। फिर भी, नाटक के दस साल हो जाने के कारण सेट अब पुराने हो चुके हैं, जो स्टेज पर भी दिखते हैं। प्रकाश व्यवस्था नाटक के अनुरूप थी और संगीत संचालन एक्टर को अभिनय के साथ-साथ डांस करने व अन्य हाव-भाव के लिए पर्याप्त स्पेस देता है। “दयाशंकर की डायरी” की तरह ही यह नाटक आपको अपने से जोड़ कर रखता है, बल्कि कुछ अधिक ही, क्योंकि आखिरकार यह एक महिला की लिखी, महिला की ज़ुबानी, महिला की गाथा है, और महिला की कहानी में प्रताड़णा के भाव तनिक अधिक तो रहते ही हैं, जिसमें व्यक्ति और परिवेश दोनों की ही भूमिका रहती है। इसलिए यह नाटक हो सकता है आपको “दयाशंकर की डायरी” से अधिक अपील करे, जैसा कि इसने यहां के दर्शकों को किया था।

मुंबई में 8वां महिला नाट्यलेखक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन आरम्भ

http://mohallalive.com/2009/10/31/women-playwright-international-in-mumbai/

http://hindi-khabar.hindyugm.com/2009/10/8th-mumbai-women-playwright.html

http://janatantra।com/2009/10/31/women-playwright-international-wpi-in-mumbai/

मुंबई में 8वां महिला नाट्यलेखक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन यानी Women Playwright International (WPI) 1 से 7 नवंबर, 2009 तक मुंबई विश्वविद्यालय के अकेडमी ऑफ थिएटर आर्ट तथा स्त्री मुक्ति संघटना, मुंबई के सौजन्य से आयोजित किया जा रहा है। WPI के गठन का उद्देश्य थिएटर के क्षेत्र में काम कर रही महिलाओं को बिना किसी भेदभाव के अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ाना है। इस बार के सम्मेलन की थीम है, उदारता व सहिष्णुता (Liberty and Tolerance)। इसकी सब थीम में हैं, अपनी पहचान, संस्कृति और उसकी विभिन्नता, अहिंसा के रास्ते जीवन जीना, पितृसत्तात्मकता की चुनौतियां, सामाजिक-राजनीतिक विश्व में थिएटर की भूमिका, थिएटर में हास्य आदि हैं। इस सम्मेलन का उद्देश्य यह भी है कि एक प्लेटफॉर्म पर महिला थिएटरकर्मियों के परस्पर मिलने, सोशल नेटवर्किंग और कलात्मक आदान-प्रदान का मंच दिलाना, महिला नाट्य लेखकों के काम को स्टेज करने के और भी अवसर प्रदान करना, महिला नाट्यलेखकों के लेखन व उनके क्राफ्ट को प्रेरित करना, सृजित करना, उन्हें शिक्षित और विकसित करना, महिला नाट्यलेखकों को लिंगगत आलोचनाओं से अलग रखना, महिला नाट्यलेखन की समीक्षा और उसके अध्ययन को बढ़ावा देना, अपने विचारों की अभिव्यक्ति के लिए उन्हें सेंसरशिप व राजनीतिक दवाब से बचाना है।
1988 से अब तक ये सम्मेलन न्यूयॉर्क, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, आयरलैंड, ग्रीस, फिलीपिंस, व इंडोनेशिया में हो चुके हैं। इस साल यह मुंबई में आयोजित है। स्त्री मुक्ति संघटना एक गैर राजनीतिक, स्वयंसेवी संस्था है, जिसकी स्थापना 1975 में ज्योति म्हापसेकर ने महिलाओं के सामाजिक, मानसिक, आत्मिक उत्थान, जागरुकता बढाने और महिलाओं से सम्बंधित मामलों के साथ साथ बराबरी, शांति और विकास के उद्देश्य से की। इसका अपना एक थिएटर ग्रुप भी है। इनकी वेबसाइट है streemuktisanghatana.org
अकेडमी ऑफ थिएटर आर्ट की स्थापना मुंबई विश्वविद्यालय के तहत 2003 में थिएटर प्रशिक्षण के उद्देश्य से शुरू हुई। अकादमी का थिएटर आर्ट्स में दो साल का फुल टाइम मास्टर डिग्री कोर्स है। इनकी वेबसाइट है mu.ac.in। यह सम्मेलन मुंबई विश्वविद्यालय के कलीना स्थित कैंपस में आयोजित है। यदि आप इसमें भाग लेना चाहते हैं तो आप संपर्क कर सकते हैं, wpi09mum@gmail.com पर। कार्यक्रम का विवरण देखा जा सकता है wpi09.in पर।