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Friday, March 21, 2008

होली तो हो, पर ऎसी नहीं.

अभी मेरे घर के सामने होलिका- दहन की तैयारी चल रही है। मुंबई में शाम में ही होलिका दहन होता है, स्त्री -पुरूष, बच्चे सभी अग्नि कुंड की पूजा करते है, अबीर, और प्रसाद अर्पित करते हैं और कामना करते हैं कि बस ऐसे ही जीवन रंगमय बना रहे।
याद आती है अपने यहाँ की एक होली, सन् १९६७ की। मेरी बहन की शादी के बाद पहली होली थी॥ हम सभी तो बेहद छोटे थे, मगर जीजा जी शब्द की गुदगुदी से वाकिफ थे। जीजाजी आए हुए थे। हम सबकी उन्हें रंग में भिगोने, डुबोने की अपनी योजनाथी।
शाम में होलिका- दहन, जिसे सम्मत जलाना कहते हैं के लिए मोहल्ले के लडके लकडियाँ मांगने आए। दादी ने दो तीन गोड़हे (गोबर से बने लंबे आकार के उपले) दिए। लड़कों ने और माँगा। दादी ने दो-तीन और दिए। लडके 'और दो' पर अडे हुए थे, क्योंकि तब हमारे यहाँ गाय थी, और दादी उसके गोबर से उपले बनाती थीं। फ़िर से एक- दो देने के बावजूद वे नहीं माने। दादी ने अब और देने से मना कर दिया।
हमारी तरफ़ आधी रात में सम्मत जलाई जाती है। लड़कियों- स्त्रियों के लिए सम्मत जलना देखना वर्जित है। कारण? बहुत सी बातों की तरह इसका भी पता नहीं। कलकी होली की तैयारी करके और जीजाजी को कैसे तंग किया जाए, इन सबकी योजना बनाकर हम सो गए।
हमारे यहाँ काम करने चनिया दाई आती थी, मुंह अंधेरे ही। माँ ने दरवाजा खोल दिया और सो गई। पल भर भी न बीता होगा कि चनिया दाई की बडबड सुनाई दी-" आयें ये चाची, पिछुती (पिछवाडे का) दरवाजा आज बंद करना भूल गई थीं क्या?" माँ हदबदाकर उठीं - "भाई को बोला था, शायद भूल गया हो।" पर तबतक तो सुबह का उजाला भी होने लगा था और माजरा सारा साफ-साफ दिखाई देने लगा था। सम्मत जलानेवाले ने दादी के गोड़हे न देने का बदला चुकाया। पिछवाडे का दरवाजा, दोनों शौचालय के दरवाजे, गाय के घर को गिराने से बचाने के लिए टेक लगाई गई सीढ़ी, और भी जलावन के सामान, लकडी के टुकडे -सब सम्मत की भेंट चढ़ा आए थे।
होली की उमंग को तो पाला मार ही गया, सबसे अधिक शर्मिंदगी उठानी पडी माँ-बाबुजी को जीजाजी के सामने। वे क्या कहेंगे कि कैसे सब चोर हैं? उससे भी ज़्यादा, अब सुबह की दैनिक क्रिया से कैसे निवृत्त हुआ जाए? ओह! आज भी माँ-बाउजी का वो चेहरा नहीं भूलता। हम लोग तो बच्चे थे, जीजाजी भी एकदम नए दामाद थे, सो होली तो हुई, मगर जो ज़ख्म लगा, वह आज तक नहीं भरा।

Wednesday, March 19, 2008

अल्ला तेरे एक को इतना बड़ा मकान?

आज भोपाल में हूँ। जब कभी यहं आती हूँ, अच्छा लगता है। अच्छे लोग, कला- संकृति की आब अब भी बची हुई दिखती है। कहीं भी आइये, कहीं ना कहीं, कुछ न कुछ आपकू दिख ही जायेगा। अभी यहाँ आदि रंग मेला लगा हुआ है। आदिवासियों की भूली- बिसरी प्रजातियों उनकी कला को सामने लानेका एउद्देस्ति से लगाया गया है यह मेला। वास्तव में कैसा है, यह तो देखने पर ही पाता चलेगा।
यह शहर धड़कना जानता है। मैं यहाँ की नहीं हूँ, फ़िर भी यहाँ आना अच्छा लगता है। हरी भटनागर, राजेश जोशी, कमला प्रसाद जी हैं। बारे अपनापे से मिलते हैं। सत्येन कुमार भी थे। बड़ी ही सौहार्द्र पूर्ण मुलाक़ात रही थी उनसे।
ये तो बुद्धिजीवी लोग हैं। यहाँ के लोग भी अपनी बातों में अदब का पुट भरने में पीछे नहीं रहते। बात काफी पुरानी है, शायद १५-१६ साल पुरानी। हमें भोपाल से इंदौर के लिए जाना था। हम पुराने भोपाल पहुंचे, जहाँ बड़ी मस्जिद या जमा मस्जिद के पास से टैक्सी मिलती थी, इंदौर जाने के लिए। हमने टैक्सी ली। मेरे सहयोगी ने मेराजानकारी में इजाफा करते हुए कहा कि यह यहाँ कि बड़ी मशहूर मस्जिद है। मुझे यह मस्जिद देख कर निदा फाज़ली का एक शेर याद आ गया। मैंने कहा-
"बच्चा बोला देख कर, मस्जिद आलीशान
अल्ला तेरे एक को इतना बड़ा मकान? "

टैक्सी ड्राइवर चचाजान शायद रफीक भाई थे या अशरफ भाई, (नाम याद नहीं आ रहा। बुजुर्ग। उन्होंने कहा, "मैडम, उन शायर जनाब को यह कहना चाहिए इस लाइन को तरमीम कर के-
"अल्ला तेरे एक को इतने सारे मकान?"
बात में दम था। मैंने उन्हें कहा, मैं आपकी यह तरमीम निदा साब तक ज़रूर पहुंचा दूंगी।"
और मुम्बई पहुँच कर मैंने निदा साब को फोन किया, सारा वाक़या सुनाया।
आज भी इतने सारे मन्दिर मस्जिद देखकर टैक्सी ड्राइवर चचाजान की बात याद आती है। भोपाल पहुँच कर तो याद आती ही आती है। यह भी कि हम एक दस बाई दस के कमरे के लिए तरसते हैं, और एक इस अनाम, अन्नं देह धरी के लिए इतने सारे इन्तजामात? खुदा खैर करे, ईश्वर, यदि आप कहीं हैं तो अपने साथ साथ सबका भला करे। मजाक में भी 'भाला' नहीं।

Tuesday, March 18, 2008

मुट्ठी भर खुला आसमान

शनिवार था। अचानक फ़िल्म देखने का मूड बना, बराए सुझाव अजय- रोमानियन फ़िल्म- 'फोर मंथ्स , थ्री वीक, टु डेज।' १९८७ का पीरियड। तब गर्भपात अवैध था। इसके लिए क्या-क्या दिक्कतें आती हैं। उफ़! देखने योग्य फ़िल्म। हालांकि इसे फिल्मकार ने दोस्ती की अद्भुत मिसाल का रूप दिया है। यह भी है। ज़रूर देखें।
टिकट लेने जब विंडो खोज रही थी, तब अपने आगे अपनी ही उम्र की एक महिला को भागते देखा। पाता चला, वह भी इसी फ़िल्म के लिए आई है, अखबारों में रिव्यू पढ़कर। अकेली। वह भी, मैं भी। ऐसे में दुकेले हो जाना हम दोनों को अच्छा लगा। उसने एक और मरित्थी फ़िल्म की कहानी बताई। कहानी सुनकर लगा कि यह तो नाटक का विषय लगता है। आकर पढा तो सचमुच नाटक पर आधारित फ़िल्म। अश्विनी भावेकर अच्छी और संवेदनशील कलाकार है। हिन्दी में उसका उपयोग सही तरीके से नही हो सका।
मुझे उस महिला कि एक बात अच्छी लगी- "अब हमें संग साथ की कामना छोड़ देनी चाहिए। अकेले निकालो, एन्जॉय करो। '
सचमुच, महिलाएं अभी तक संग साथ की ही कामना में रह जाती हैं और अपने हिस्से के आसमान का छोटा सा टुकडा जो होता है, उसे भी खो बैठती हैं। शुक्रिया स्मृति, इस बात की स्मृति के लिए!

Sunday, March 16, 2008

इस जिजीविषा को सलाम!

एक समय था, जब साठ की उम्र तक पहुँचने पर इंसान बूढ़ा मान लिया जाता था। शुक्र है लोगों की सोच का, अब इसमें तब्दीली आई है, आ रही है। अब हमारे सामने aपाने ही आस-पास के ७०-८० साल व इससे ज़्यादा की उम्र के लोग हैं, जो न केवल दिल से जवान हैं, बल्कि अपने को इस कदर सक्रीय बनाए रहते हैं, जैसे उम्र का कोई मसला है ही नहीं। वर्ल्ड आइकन के रूप में देवानंद, एम् ऍफ़ हुसैन, आबिद सुरती, ऐ के हंगल, सितारा देवी, पं बिरजू महाराज, पं रवि शंकर आदि हैं, तो अपने आस-पास देखिए, आपको बहुत सारे मिल जाएंग।
बाउजी, यानी छाम्माक्छाल्लोके ससुर हैं, सुखदेव नारायण। उनका भी ब्लाग है- sukhdeosahitya.blogspot.कॉम। ८७ साल के हो गए हैं, मगर लिखने की ललक से लबरेज़ है, और इस एक प्रेरणा से वे इतने स्वत: स्फूर्त बने रहते हैं कि देख कर जी को बहुत सुकून महसूस होता है। अभी अभी उनकी एक और किताब का पटना में विमोचन हुआ। इससे मिले प्रतिसाद से खूब उत्साहित हैं। अम्मा भी लगभग ८० की हैं, मगर अभी भी घर के सारे काम कर लेती हैं, अपने समकालीनों से अलग इनकी सक्रियता, सोच जीवन को एक नया आयाम देती है।
एक और मोहतरमा हैं- शबनम जी। ७५-८० के आस-पास की। ठेठ रूढिवादी बंगाली परिवार की थीं। शादी के बाद अपने प्रयासों से उर्दू- हिन्दी सीखी, शायरी सीखी। अपने युवा संघर्षमय समय में ये शायरी उनके मानसिक, आर्थिक संबल बने। इसले अलावी स्कूल टीचर रहीं। भारतीय शास्त्रीय संगीत सीखा है। अब सेवा निवृत्ति के बाद भी काम करने की ललक नहीं गई है। छाम्माक्छाल्लो से कहने लगीं कि हालांकि बच्चे सभी अपनी अपनी जगह सेटल हैं, और बहुत अच्छे से सेटल हैं, इतनकी आप भी चौंक जाएं। मगर उनका आग्रह है की अब्च्चूं के बारे में बताकर उन पर अतिरिक्त बोझ न डाला जे की बच्ची जब ऐसे हैं तो इन्हें काम करने की क्या ज़रूरत है? अति प्रसिद्ध बच्चे हों या माँ-बाप, माँ-बाप या बच्चे नहीं चाहते की उन्हें उनके रिश्तेदारों के नाम के कारण जाना जाए। इससे उनका अपना व्यक्तित्व चला जाता है। नसीरूद्दीन शाह के बेटे ने अपना एक प्रोग्राम देते हुए अपना कोई भी परिचय देने दिलाने से मना कर दिया था। अच्छा लगा था उसका यह आत्म विश्वास की टैब वह केवल नसीर और रत्ना के बेटे के रूप में ही देखा जान लगता। उसकी कला उनके व्यक्तित्व के आगे ढँक जाती। शबनम जी भी उन पर बोझ नहीं बनाना चाहतीं और काम करते रहना चाहती हैं। छाम्माक्छाल्लो आज जब लोगों को 60साल के बाद सेवा निवृत्त होते देखती हैं तो हैरत में पड़ जाती है, क्योंकि वह व्यक्ति किसी भी कोने से 60का नहीं दीखता या दिखतीं।
अपने प्रति इनके विश्वास, खान-पान पर ध्यान, कुछ करते रहने, सक्रीय बने रहने की ललक, और उम्र और उसकी सीमा को धता बताती ये शख्सियतें - वल्लाह! कौन ना कुर्बान जाए इन सब पर।

Saturday, March 15, 2008

अजब तेरीलीला हे प्रभु!

छाम्माक्छाल्लो को कभी कभी बड़ी बे सिर पैर की तुलना सूझती है। अब इसमें जब वह ख़ुद कुछ नहीं कर सकती तो कोई और कैसे करे? अब देखिए, आज के युग में कम्प्यूटर का महातम देखिए। एक समय था कि लोग डर से इसे छूते नहीं थे, दफ्तरों में अधिकारीगन इसे एक दूसरे टेबल पर रखते थे। कम्प्यूटर के आने के पहले हर हलके में इसका जो विरोध हुआ, वो आज भी उस समय के लोगों के मन में होगा। कुछ दिन पहले छाम्माक्छाल्लो को उसके ही दफ्तर के एक सेवा निवृत्त सज्जन मिल गए। पहले यूनियन में थे, इसलिए काफी दबंग भी थे। लेखक भी हैं, अभी समाज की काफी सेवा कर रहे हैं। अपने समुदाय की गरीब लड़कियों को पढा रहे है। उनकी कोशिशों से बहुत सी लड़कियां १०- १२ कक्षा तक पढ़ सकीं। वे जब यूनियन में थे, तब कम्प्यूटर के ख़िलाफ़ खूब जेहाद छेड़ा था। उस दिन मिले तो किसी की राह तक रहे थे। बोले- कम्प्यूटर वाले की राह तक रहा हूँ। यूनियन में था, तब इसी के ख़िलाफ़ मैनेजमेंट से खूब लड़ा था, अब इसी के लिए खड़ा हूँ।
छाम्माक्छाल्लो ने भी बड़ी कोशिशों से थोडी बहुत कम्प्यूटर की नब्ज़ थाम ली है। अब हाथ से लिखी कोई चीज़ किसी को भेजने में लगता है, पता नही, वह पढ़ पाएगा कि नहीं। लिखाई भी तो अब माशा अल्लाह इतनी अच्छी हो गई है कि क्या मुर्गे या हिरन की टाँगे उनका मुकाबला करेंगी।
खैर, तो छाम्माक्छाल्लो बात कर रही थी, कम्प्यूटर की। अब तो एक बच्चा भी इसके बगैर जी नहीं सकता। लेकिन, हम सब के लिए अब एक मुसीबत यह भी की 'एक अनार और सौ बीमार।' कम्प्यूटर एक और उस पर काक या गिद्ध दृष्टि जमाए बैठे सभी लोग। क्या राजनीति में कुर्सी के लिए लड़ाई होती होगी, जितनी घर पर अब सभी सदस्यों के बीच कम्प्यूटर के लिए होती है। कोई कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं। 'क' का मामला है। एकता कपूर से भी पूछना होगा।
छाम्माक्छाल्लो को भी कभी कम्प्यूटर नसीब नहीं हो पाटाअब आ ही,सारे समय वह इसी इंतज़ार मेंरह गई कि 'अब तो माधव, मोहे उबार।'' आभा का फोन आया तो वह भी कम्प्यूटर न मिलाने का रोना ले बैठीं। मैं तो भारी बैठी ही थी। पति-निंदा का कोई भी अवसर स्त्रियान् भला कैसे छोड़ सकती हैं, और वह भी जब सामने कोई स्त्री हो- 'खग जाने खग हीकी भाषा।' उस पर तारीफ़ यह कि सुना भी दिया कि आ तुम्हारी बड़ी शिकायत कर रही थी।
छाम्माक्छाल्लो को अपना छात्र जीवन याद आता है। जिस हॉस्टल में वह थी, वहां केवल दो ही टॉयलेट थे जो वर्किंग स्थिति में थे। अहले भोर से ही वहाँ के आस-पास का जो नज़ारा बनता था, आ के कम्प्यूटर के आगे का नज़ारा देखकर वही सब कुछ याद आ जाता है। वहाँ तो खैर केवल भोर में ही वह नजारा रहता था, यहाँ तो हर समय एक ही दृश्य विधान। अब ऎसी तुलना पर आपको कुछ कहना हो तो बेशक कहिये, मगर छाम्माक्छाल्लो 'घर-घर देखा, एकही लेखा' के इस रूप से निकल नहीं पाई, और यह समानता उसे दिखाई दे गई। अब आप सब के यहाँ भी कम्प्यूटर को लेकर ऎसी ही मार-काट मचीहो, तो इस तुलना से अपनी भी तुलना कर लीजिए। स्थितियां सुबह की निवृत्ति के बाद साफ किए गए हाथ-पैर की तरह ही साफ और मन भी बेहद हल्का लगने लगेगा।

Wednesday, March 12, 2008

याद करें १२ मार्च १९९३!

छाम्माकछाल्लो उदास है। कल ही लाहौर में हुए आत्मघाती दस्तों की खबरों से आज सभी अखबार भरे हुए हैं। आज का ही दिन मुंबई के लिए भी बहुत मनहूस था। भाईचारे और प्रेम की नींव पर खडी मुम्बई अचानक से खून खराबे के समंदर में बहने लगेगी, किसी ने ऐसा सोचा भी नहीं था। कहते थे कि मुंबई में पहले भी खून खराबे होते थे, मगर वे आपसी रंजिश और ख़ास तौर पर अंडर वर्ल्ड के गुटों के बीच होता था। आम आदमी उसमे परेशान नही होता था। मगर १९९२ की बाबरी मस्जिद के दंगे का दंश झेल रही मुंबई अचानक १२ मार्च,१९९३ को सीरियल बम ब्लास्ट से दहल उठी। एयर इंडिया, नरीमन प्वायंट, स्टाक एक्सचेंज, पासपोर्ट ऑफिस, जुहू का होटल उफ़! पल भर में हंसते खेलते चेहरे मांस के लोथरों में बदल गए।
छाम्माकछाल्लो सोच ही नही पा रही थी कि ऐसा क्यों? हम आदमी से जानवर में कैसे बदल गए? बम विस्फोट से सहमी मुंबई में वह अपने दफ्तर गई थी। जुमे की नमाज अता की जा रही थी। छाम्माकछाल्लो के दफ्तर से मस्जिद साफ दिख रही थी। नमाज़ पूरी हुई भी नहीं हुई थी कि अचानक गोलीबारी शुरू हो गई। पुलिस और आतंकी दोनों और से गोलियाँ चलने लगीं। इसके पहले छाम्माकछाल्लो ने फिल्मों के अलावा हकीक़त में कंभी गोली चलने की आवाज़ नही सुनी थी। बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने के बाद हुए दंगे के बाद वह दफ्तर गई थी। चारो और शहर जैसे सहमा हुआ था। कोई किसी से न तो बात कर रहा था, न यहाँ की फिजां में यहाँ की जिंदगी धड़क रही थी। छाम्माकछाल्लो ने रास्ते में एक दो जले हुए स्कूटर -ऑटो देखे। वह सहम गई। उस समय उसकी छोटी बिटिया मात्र तीन महीने की थी। दंगे से पीडित परिवार यहाँ -वहाँ भाग रहे थे। छाम्माकछाल्लो के भी एक बेहद अजीज को अपने पूरे परिवार के साथ भागना पडा था। अज तक वह परिवार फ़िर से सेटल नहीं हो पाया।
आज तक दंगे - विस्फोट में जानेवाली जानों का कोई हिसाब नहीं लग सका है। आज तक इन हादसों में बिछारे लोगों के परिवार जन अपने प्रिय को भूल नहीं पाए हैं। आज तक इन हादसों की काली परछाईं दिल और दिमाग से नहीं गई है। १९९३ में भी आज के दिन इसी अफरा तफरी का माहौल था। लोग घरों से निकालने,
अहीन्न आने-जाने में घबराने लगे थे।
छाम्माकछाल्लो की बिटिया अभी लाहौर में है। इन विस्फोटों की दरिंदगी से वह सकते में है। वह कहती है, लोगों में बर्दाश्त करने की ताक़त और संवेदनशून्यता बढ़ रही है और यह मानवता के लिए खतरनाक है।
पूरा विश्व आज आतंक की चपेट में है। छाम्माकछाल्लो यह सोचती है , यह कायनात, जो सबके जीने के लिए बनी है, वहाँ क्यों लोगों को जीने से महरूम किया जा रहा है। दंगा हो या फसाद, मरता आम आदमी है, आम बच्चीबच्चे यतीम होते हैं, आम औरतें विधवा होती हैं, आम आदमी का बेटा- बाप बिछारता है। कब हमारी खूनी ललक हमें इंसानियत का पाठ पधाएगी, या फ़िर इंसानियत, भाईचारा केवल किताबों या नीति शास्त्र की ही चीजें बनाकर रह जायेंगी। छाम्माकछाल्लो ने कई धर्मों की बातें पढ़ने व जानने की कोशिश की है। कई धर्मों के लोगों से उनके धर्म का मूल सार पूछा है। सभी प्रेम, दया, क्षमा, विनय आदि की ही बातें बताते हैं। फ़िर जब सभी धर्मों के मूल में ये ही भाव हैं , फ़िर क्यों हम इंसानियत के दुश्मन बन बैठे है? आज १२ मार्च है। १९९३ की घटना फ़िर कहीं ना घटे, क्या हम सभी मिल कर ऐसा आवाहन कर सकते हैं? तो आइये, भाव की इस भूमि पर अपने विचारों के फूल खिलायें। लाहौर हो या मुबई, अफगानिस्तान हो या हिन्दुस्तान, हर जगह का इंसान एक ही होता है, एक ही खून का रंग होता है, एक ही आंसू और एक ही मुस्कान होती है। यह स्थाई भाव बना रही तो यह हरी भारी धरती अपने ही लालों की करतूतों से शर्मसार होने से बच सकेगी।

Saturday, March 8, 2008

८ मार्च यानी क्या?

यह सवाल छाम्माक्छाल्लो ने कईयों से पूछा, मसलन अपनी बाई से, अपनी अम्मा से, अपनी सहकर्मियों से, अपनी पडोसन से। सभी के अलग अलग जवाब। सभी को यह पता है कि हम औरतें बहुत मज़बूत होती हैं, मन से। मगर सभी यह मानती हैं कि दुनिया की रवायत के अनुसार रहना ही पङता है। घर छोड़कर कहाँ जा सकती हैं वे? यह भी नही कि जाने की ताक़त या हिम्मत नही है, घर के बाहर महफूज़ नही हैं। यह डर औरत को पंगु बनाने के लिए काफी है। छाम्माक्छाल्लो ने देखा है कि औरतें बिना बात के ही सज़ा पा जाती हैं, जैसे उनके लिए कह दिया जाता है कि औरतों से क्या बात करना? अरे उनकी अकल तो घुटने मे होती है, या क्या झोंटैअला पंच को लेकर आते हो ? वे बातें कम करेंगी औए घों घों ज्यादा। बात को बिना किसी तार -बेतार के पहुंचाना हो तो औरत को बता दो, औरत ही औरत की सबसे बड़ी दुश्मन है, आदि-आदि। यह किसी एक स्त्री के लिए नहीं, बल्कि पूरी की पूरी स्त्री जाति के लिए संबोधित है। आज के दिन इन पर सोच विचार आवश्यक है। एक और बात, सभी तथाकथित धर्मों में उनके धार्मिक स्थलों पर उनका प्रवेश वर्जित है। शबरी माली की बात तो जग ज़ाहिर है ही। छाम्माक्छाल्लो को कई जगहों पर ऎसी स्थिति का सामना करना पडा। मसलन, हनुमान जी के मन्दिर में औरतें प्रवेश नही करेंगी, किसी दरगाह में वे नही जा सकती। गई तो आफत। नही, नही,मैं शायद ग़लत बोल गई, मन्दिर मस्जिद में चली तो जायेंगी, मगर गर्भ गृह में नहीं। उस सीमा तक उन्हें जाने की इजाज़त नही, जहाँ तक अन्य सभी जाते हैं। क्यों इजाज़त नहीं है। पता नहीं, मगर लिखा हुआ है। बात की तह मे जाएँ तो कहा जाएगा कि औरतें तो नरक का द्वार है। बताइए भला , जिस द्वार से ये कहनेवाले अवतरित होते हैं, वाही द्वार उनके अवतरण के बाद नरक का द्वार बन जता है। छाम्माक्छाल्लो ने आज तक नहीं देखा किसी औरत को किसी मर्द पर छिताकशी करते, किसी नवयुवक को टीजिंग का शिकार होते। वह यह भी नहीं कहती कि ऐसा नही होता होगा। मगर अपवाद को सामान्य की श्रेणी में नही लाया जा सकता।
किसी ने ठीक ही कहा है कि अब महिला दिवस के बदले पुरूष दिवस की ज़रूरत है, जहाँ शांत दिमाग से यह सोचा जा सके कि स्त्री-पुरूष, जो समाज के दो ध्रुव हैं, किसी एक को भी काट देने से जीवन नही चल सकता, ऐसे में सेकेंड सेक्स की अवधारणा से कैसे बाहर निकला जाए, कैसे उन्हें सम्मान की जिंदगी बसर कराने की आजादी हो, कैसे वे केवल देह में ही बाँध कर न रख दी जाए, मान बहन, बेटी की भुमिका में ही क़ैद न कर दी जाएँ, कैसे उन्हें एक व्यक्ति के रूप मीमें देखा जाए। आज इस पर बहस की ज़रूरत है। हमारा अतीत हमें लुभावना लगता है, मगर अब हमें अपने वर्त्तमान को सुहाना करना है, ताकि हम अपनी अगली नस्ल को एक अच्छा अतीत दे सकें। महिला दिवस मानें या न मनाएं, महिला को मानें और उसे एक वयक्ति के रूप में, उसकी सारी खूबियों और खामियों के साथ मानें, यह आज के दिन का आवाहन है।
छाम्माक्छाल्लो ने अपने नए मोनोलाग 'लाइफ इज नोट अ ड्रीम' में व्यक्तित्व व अस्तित्व के इसी पहचान को कहने की कोशिश की है।

Thursday, March 6, 2008

महाशिवरात्रि, शिव, पार्वती और अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस

आज महा शिवरात्रि है और मीडिया फ़िर से इसे भुनाने पर लगा है। पर्व त्यौहार निहायत निजी किस्म की निजी अभिव्यक्ति है। मगर अब ऐसा कुछ नही रहा। मिथकीय रूप मे यह शिव पार्वती के विवाह की रात है। लेकिन पूछा जाए आज की किसी कन्या से कि क्या वे शिव की तरह किसी फक्कर, औघर, साधू तबीयत का पति चाहेगी? बचपन में छाम्माक्छाल्लो भी इस व्रत को करती थी। व्रत की महिमा या क्या कि उसे तो बिल्कुल ऐसा ही पति मिला है। यह शिकायत नहीं, वस्तु स्थिति है।
बचपन में छाम्माक्छाल्लो शिव -पार्वती से संबंधित गीत भी गाती थी। तब तो केवल गाती थी। आज उसकी लाइनों को देखने पर लगता है कि किस तरह हम अपनी ही बातें इन देवी देवताओं में भी आरोपित करते चलते हैं। इस गीत मेंकहा गया है कि शिव- पार्वती गंगा स्नान को जा रहे हें। बारिश शुरू हो जाती है। शिव भींग जाते हैं, मगर पार्वती पर बूँद भी नही परती। वे इसका कारण पूछते हैं। अब देखिए पार्वती का जवाब- चूंकि उसने सास की बातें कभी नही टाली, जिठानी द्वारा लीपे घर को रौंदा नहीं, भूखे ब्रह्मण को जिमाया, इतवार का व्रत किया, इन सब पुन्य के कारण वह भीगने से बच गई। सवाल है कि पार्वती की सास,जिठानी कौन हैं? आज तक कभी कहीं इसका उल्लेख नहीं मिला। स्त्रियों के लिए गए जानेवाले गीतों में इस तरह की बातें और पति, बच्चे, परिवार की कुशलता के लिए देवता पितर को गोहराने की बात बार-बार आती है। उसकी अपनी इच्छा-अनिच्छा कुछ रह नहीं जाती। पार्वती इसी मानसिकता को बताने के लिए उपयोग की जाती हैं। आजतक दुर्गा या काली जो कि शक्ति की अवतार मानी जाती हैं, के अलावे कभी किसी देवी की एक इकाई के रूप में कल्पना नहीं की गई, यहां तक कि सीता की भी नहीं। लक्ष्मी व सरस्वती इसलिए गिन ली गई कि लक्ष्मी धन देती हैं और सरस्वती विद्या। लक्ष्मी के इस गुन के कारण सभी उनके अस्तित्व को मानने पर विवश हैं। सरस्वती का कोई वैवाहिक आधार नहीं है। पार्वती की पूजा ही अच्छा पति पाने के लिए की जाती है। हरतालिका में पति प्राप्ति के लिए उनकी तपस्या का विषाद वर्णन सुनकर लगता है कि लारकियों के लिए पति प्राप्ति से आगे कुछ भी नही।
आज महा शिवरात्री है और संयोग है कि दो दिन बाद अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष है। आज के दिन महा शिवरात्री की धूम जगानेवाला मीडिया फ़िर से इस इन भी अपनी अपनी डफली लेकर अपना- अपना राग छेदेंगे। एक और तिथि व महिलाओं के गुन गान किए जाएंगे और दूसरी और इस तरह के पर्व त्योहारों के जारी यह बताने की कोशिश की जाती रहेगी कि महिलाओं का निस्तार बगेर इन कर्म कांडों को किए बिना नहीं हो सकता। एक और आज की तमाम सफल महिलाओं के नाम गिनाए जायेंगे, पर जो रियल लाइफ हीरोइनें हें, उन्हें फ़िर से गुमनामी में ही छोड़ दिया जाएगा। एकाध जगह नाम धराने की कोशिश ज़रूर होगी। सास - जिठानी,उनकी सेवा- साधना सभी अपनी जगह पर ठीक हैं। मगर धर्म के बहाने नारी के अस्तित्व को उसके व्यक्ति के स्वरूप से हटा कर केवल भूमिकाओं में ही कैद कर देना और वर्त्तमान की वास्तविकता पर जोर न देना और उसके कर्म काण्ड को ही महिमा मंडित करना किसी भी रूप मेंसही नहीं कहा जा सकता। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस को अब इन मिथकों से ऊपर लाया जाना आज की ज़रूरत है।

Wednesday, March 5, 2008

बेटू तोषी के लिए

आज छाम्माक्छाल्लो की बिटिया तोषी का जन्म दिन है। वह पिछले सितम्बर, २००७ से पाकिस्तान के लाहौर में है। लाहौर से याद आता है 'जिन लाहौर नई वेख्या समझो वो जम्याई नही'। तोषी ने लाहौर देख लिया। आज अगर सीमा की बात नही रहती तो हम सब भी यह शहर देख पाते और इसकी माटी की खूबी को महसूस कर पाते। तोषी आर्टिस्ट है। अपनी पढाई के सिलसिले मे वह वहां है। जिस तरह का प्रेम, आदर, सम्मान स्नेह उसे मिल रहा है, अपनी प्रतिभा के कारण, अपनी शालीनता के कारण और सबसे बड़ी बात, अपनी भारतीयता के कारण, वह सोचने पर मज़बूर कर देता है कि काश, ये सीमाएं नही रहतीं। उसके जन्म दिन पर अपनी चन्द लाइनें उसके लिए-
आओ तुम्हारे लिए बुन दूँ एक रात
तारों से जगमगाती। चाँद से नहाती
सपनों से भीगी भीगी
बहती हवाओं में इच्छाओं के झूमते-गाते झोंके
मेरी बेटू, ओस से भीगी
सुबह जब होगी
तुम आँखें खोलोगी अपने सपनों के साथ
तुम्हारी अलसाई आंखों के कोए से झाकेंगे गेंदे -गुलाब
सूरज टैब अपने दामन से निकाल छोड़ जायेगा सतरंगी किरणों की बारिश
गाती-मुस्काती आएँगी चिदियाँ
मचयेंगी शोर-
खोलो, ज़ल्दी खोलो,
खिड़कियाँ
हटाओ भारी- भारी परदे
हम आई हैं, घुंघरुओं सी बजती, नीम सी सरसराती
महसूस करती हूँ
अपने ह्रदय के भीतर
बहुत गहरे
यादों के झोंके मुझे
पहुंचा देते हैं
यादों की पोतालियों के पास
नवजात चूजों से गुलाबी तलवे
नन्हें हाथों से खुजाती अपना माथा
दूध पीना छोड़, किलकारी भर भर, बतियाती, मुंह से फेंकती दूध की फुहार
नन्ही कतकी से थाप देती, ढोल बजाती तुम
भर देह माती
आंखों में काजल की मोटी धार
मन में उठाती आशंका-
नज़र ना लग जाए
सबसे ज्यादा टू माँ की ही
घुघुआ मन्ना पर ही सो जाती गहरी नींद
बीच माथे पर
दो चुटिया- खग्लोश'
मेरी गुदगुदी से खिलखिलाती, रन झुन बजती तुम
यूँ ही किलकती रहो
तुम- आज, कल, सदा....!

Monday, March 3, 2008

इंटरनेशनल वूमेन दे पर D N A की पहल

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस ८ मार्च को विश्व भर में मनाया जाता है। इस अवसर पर D N A की पहल यहाँ आपकी जानकारी के लिए प्रस्तुत है। आपकी पहल हमारी हिम्मत और ताक़त को और ज्यादा बढायेगी।

http://www.dnaindia.com/report.asp?newsid=1153831

Vibha Rani: Why don’t you be a part of our theatre workshop? Do you have stage fright? Prisoner: Fright? I killed my husband and I have no regrets and you talk about being afraid of reciting lines।

Vibha Rani, no novice at handling situations like these, gives the inmate’s shoulder a gentle squeeze and moves on. In 2002, on the eve of International Women’s Day, when Rani walked into Byculla jail’s women’s cell for the first time, she was terrified. But six years and over 40 art and theatre workshops later, most barracks in city jails have become familiar to her. “I don’t look at it as social service anymore. I eagerly await weekends, so that I can arrange such workshops more often,” she says.
Rani works as a manager with Indian Oil, and admits that helping out jail inmates was not something she had planned on doing. But working for women has always been on her agenda. “I come from Madhubani, a small town in Bihar. Girls were never sent to school there,” says Rani. She remembers tagging along with her mother when she was eight, knocking on doors and trying to convince parents to send their girl child to school. “My mother was a teacher and was determined to increase the attendance of girls,” she says. When Rani moved to Mumbai a few years ago she thought she too would make a difference somewhere — just like her mother – and started her NGO, Avitoko.
“Most people who come to see us ask God for forgiveness on our behalf. But a lot of us in here do not even regret what we have done,” says Malti, a Kalyan jail inmate in a letter to Rani. “Avitoko was different,” she continues. “Well-known artists and poets spent time with us, but never asked us what our crime is. They just told us we have immense potential.”
Vijay Bendre, jail superintendent at Yerwada jail believes that Rani’s work at his jail has altered lives. “A term in jail is enough to break a person. With Avitoko, the inmates have a good time — they write their own plays and direct them too. It rebuilds their confidence and prepares them to face life,” he says.
r_radhika@dnaindia.net