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Wednesday, June 17, 2009

छाम्माक्छाल्लो की एक कहानी 'पीर पराई' कहानी-कलश (हिन्द-युग्म) पर प्रकाशित है। याक कहानी 'परिकथा' में प्रकाशित हुई थी। इसी कहानी का नाट्य रूपान्तर इसी नाम से है। जबलपुर की नाट्य संस्था 'विवेचना' इसका मंचन कई सालों से राष्ट्रीय स्टार पर करती आ रही है। कहानी पढ़ें और अपने विचारों से अवगत कराएँ। यह कहानी इस लिंक पर उपलब्ध है- http://kahani.hindyugm.com/2009/06/peer-parayee-vibha-raani.html

छापक पेड़ छिहुलिया त' पतवन धन बन होरामा तेही तर ठाढि़ हरिनिया त' मन अति अनमन हो' हिरणी का कलेजा कसक उठा - तो आज हमारे बालक की अंतिम विदाई है। आज के बाद हमारा बालक हमारा नहीं रह जाएगा। उसका मन चीत्कार कर उठा -"बचवा रे s s s s।" उसकी चीत्कार पूरे जंगल में सन्नाटा पसार गई- भांय-भायं जैसा अजीब सन्नाटा। चीखें भी मौन को इसतरह बढ़ाती हैं, यह उलटबांसी उसकी समझ में नहीं आई। अपनी चीख से वह खुद ही तनिक सहम सी गई। इधर उसके चीत्कार से जंगल के हरे-भरे पेड़ मौलकर (मुर्झाकर) अपनी पत्तियों की नोकें नीची कर बैठे- "सुन री बहिनी, हम इतना ही कर सकते हैं। तेरे सोग के भागीदार बने हैं, मगर इससे जि़यादे की औकात नहीं।" कल-कल बहती नदियों ने अपनी किलोलें रोक दीं और बर्फ़ जैसी हो गई- ठंढी, बेजान, निस्पन्द। मन्द समीर यूँ स्थिर हो गया, जैसे हिरणी उनके आगे बढ़ने के रास्ते में साक्षात आ गिरी हो, जिसे लांघकर जाना उसके बस में नहीं।
पड़ोसवाले हिरण अपने घर से बार-बार झांके, उझके- ये क्या हो रहा है, बहिनी के साथ? आजतक तो कभी उसे इसतरह से विकल नहीं देखा। वह तनिक और पास गया, तनिक और पास, तनिक और पास। ये लो, अब तो वह उसके इतने नजदीक पहुंच गया कि उसके तन और मन के पार भी पहुंच कर देख सकता है। हिरणी थी बड़ी बेचैन। कभी पैर उठाकर उचक-उचककर कहीं देखती तो कभी थस्स् से बैठ जाती, जैसे निराशा के गहरे सागर में समा गई हो, जहां से ऊपर आने के कोई आसार नहीं, कोई लक्षण नहीं। आँसू थे कि खड़ी हो या बैठी, लगातार भादो के पावस की तरह झहर रहे थे - झर- झर। घटा घुमड़े बादल की तरह- झिमिर-झिमिर, टिपिर-टिपिर। काली- काली घटा जैसा ही सोक थोक के थोक उसके हिरदे मे डेरा जमाए चला जा रहा था।हिरण सोच में पड़ गया। आजतक उसने हिरणी को कभी भी यूँ इसतरह से विकल नहीं देखा था, जैसे कोई उसका नाक-मुंह बंद कर उसे सांस लेने से ही रोक रहा हो- ऊं..ऊं..गों..गों..। उसकी बेचैनी उसके शरीर के एक-एक अंग से तेज गर्मी के कारण छूटते पसीने की धार की तरह फूट रही थी। गले से ऐसी घरघराहट निकल रही थी, जौसे अखंड काल से वह प्यासी हो और उसके कंठ में पानी की एक बूंद तक डालनेवाला कोई न हो। उसकी पथराई सी आँखों में दर्द का ऐसा गुबार था कि उसे देख पत्थर भी पसीज जाए और सुमेरू पर्वत भी भहराकर खंड-खंड होकर दरक जाए।"काहे बहिनी! काहे इतनी बेकल हो, जैसे कोई तुम्हारा हिरदय तुम्हारी देह से नोंचकर लिए जा रहा हो या आँखों में कील ठोंककर उसकी ज्योति हरे जा रहा हो। कहो बहिनी! अपने दिल का संताप हमसे भी कहो। यूं उसे अपने दिल में बन्द करके मत रखो। कहने सुनने से जी हल्का हो जाता है।" हिरणी कुछ न बोली। बोले भी क्या? बोलना- बतियाना तो सुख की बेला में सोभता है। इस कुघड़ी में जब अपनी ही सांस की आवाज़ मेघ के गरजन जैसी लगने लगे, वैसे में कंठ से कैसे कोई बकार फ़ूटे। बस, लंबी सांस खींचकर वह रह गई। मगर उसकी उस लंबी सांस में जैसे वेदना की गाढ़ी, मोटी लेई चिपक गई थी। बोली- भासा के रूप में बस, आँसू उसकी आंखों से टप-टप धरती पर गिरते रहे और धरती मैया उसे ममतामई मां की तरह अपने आँचल में समेटती रही- "बिटिया री, तू भी नारी, हम भी नारी। तू भी मैया, मैं भी महतारी। मैं ना समझूं तेरे हिरदे की पीर को तो और कौन समझेगा? चल, बहा ले जितना भी बहाना चाहती है अपने दुख का संताप। पर देख ले, मैं खुद ऐसी अभागन कि पूरे संसार की मैया होने के बाद भी नहीं हर सकती तेरा संताप। नहीं कर सकती तेरे दुख को दूर।भैया हिरण एकदम से हिरणी के पास खड़ा था। हिरणी को सारा नज़ारा साक्षात दिखाई देने लगा। पूरी की पूरी अयोध्या हर्ष और उल्लास में डूबी हुई है। घर-घर ढोल, नगाड़े, बधावे बज रहे हैं। घर-घर खील, लड्डू, बताशे बँट रहे हैं। सभी नर-नारी तन पर नए-नए कपड़े, जेवर डाले इधर से उधर नाचते-गाते घूम रहे हैं।कि आज रानी कौसल्या बनी महतारीदसरथ देखे मुंहवा बलकवा केमनवा मुदित खरे हंसी के फ़ुलकारीबालवृन्द मस्ती और आनंद में झूम रहे हैं। पूरा नगर तोरण और बंदनवारों से इसतरह से ढंक गया है कि आकाश भी नहीं दिखाई पड़ रहा। सूरज की तेज रोशनी भी इन बंदनवारों की चादर तले से होकर नगर में पहुंचती है। लोग इधर-उधर घूमते हूए बधावा गा रहे हैं।"चैत मासे राम के जनमवा हो रामा, चैत रे मासेकेही लुटावे, अन-धन सोनवाँ,केही लुटावे कंगनवाँ हो रामा, चैत रे मासे।दशरथ लुटावे अन-धन सोनवाँ,कौशल्या लुटावे कँगनवाँ हो रामा, चैत रे मासे।"इतना सोना-चाँदी, कामधेनु जैसी गाएँ, सोना उगलनेवाले खेत, जमीन सब कुछ कौशल्या दान कर रही हैं। आखिरकार रामलला जो आएँ हैं। और बात सिर्फ रामलला की ही कहाँ? दशरथ जी तो एक साथ चार-चार पुत्र पाने के आनंद सागर में हिलोरें ले रहे हैं। इस आनंद अमृत पान में वे भूल भी गए हैं श्रवणकुमार के वृद्ध और नेत्रहीन पिता का श्राप -"जिस पुत्र वियोग से आज मैं मर रहा हूं, वही पुत्र वियोग एक दिन तुम्हारे भी प्राण ले लेंगे।"निस्संतान दशरथ तो प्रसन्न हो उठे। इस श्राप में भी उन्हें वरदान दिखाई दिया। पुत्र वियोग तो तब न, जब पुत्र प्राप्त होगा। इसका अर्थ - "पुत्र सुख है मेरे भाग्य में। मुझे पुत्र की प्राप्ति होगी। हे पूज्यवर! आपका श्राप भी मेरे सर-आँखों पर!"राजा दसरथ हैं मगनवां कि राम जी का हुआ है जनमवांराम का जनमवां, लखन का जनमवांभरत सत्रुघन भी संगवां कि राम जी का हुआ है जनमवांपरंतु, हिरणी ने तो कोई अपराध नहीं किया था। फिर उसे क्यों यह पुत्र वियोग? वह तो रोई थी, गिड़गिड़ाई थी कौशल्या रानी के पास जाकर -"रानी हे रानी! अब तो तुम भी पूतवाली हुई। तुम्हारी गोद हरी-भरी हुई। तुम्हारी छाती में भी दूध उतरा है। पूत का सुख क्या है, अब तो तुम भी जान रही हो। भगवान ने तुम्हारे साथ-साथ दोनों छोटी रानियों की कोख भी भर दी है। देखो तो, सारा नगर इस आनंद में डूबा हुआ है, एक मुझ अभागन को छोड़कर।""क्यों तुम्हें क्या हुआ हिरणी? क्या कोई व्याधा तुम्हारी जान के पीछे पड़ा है? कहो तो अपने उद्यान में रख दूं। वहाँ की नरम-नरम घास खाना, ठंढे, मीठे तालाब और सोते का पानी पीना। कहो तो, मँड़ई भी बनवा दूँगी। बस, उदास न हो। देखो, मेरे रामलला आए हुए हैं। आज इतने बड़े भोज का आयोजन हुआ है। दूर-दूर देशों के बड़े-बड़े चक्रवर्ती राजा-महाराजा पधारे हैं। तू काहे को सोग करती है हिरणी।""फिर से महारानी, अरज करती हूँ, अब तुम बेटेवाली हुई। अब तुम भी माँ बनी। एक माँ दूसरी माँ की पीड़ा को समझ सकती हैं। सारी अयोध्या में रामलला के आने की खुशी है। ऐसे में मैं पापिन किस मुंह से कहूं कि राम लला का आगमन ही मेरे सोग का कारण है?""पहेलियाँ न बुझा हिरणी!" कौशल्या का स्वर कठोर हो गया। आँचल तले सोए रामलला को और अच्छी तरह से आँचल में समेटकर लगभग छुपा ही लिया उसे हिरणी की नजरों से।राई जवांइन अम्मा न्यौंछेदेखियो हो कोई नज़री ना लागेअब तो दिढौना लगाना और राई-जँवाईन से औंछना ही होगा। क्या जाने, नजर-गुजर लग गई हो इस डायन हिरणी की। कैसी बेसम्हार जीभवाली है कि कहती है, मेरा रामलला इसके सोग का कारण हैं। जी तो करता है, हिरणी तेरी यह खाल-खींचकर भूसा भरवा दूं। पर, नहीं, ऐसे शुभ और सुहाने मौके पर राजा दशरथ जी भी राज्य के कैदियों को छोड़ चुके हैं, प्राणडंद का सजा पाए कैदियों को जीवनदान दे चुके हैं। इसी मनभावन समय की सौंह, मैं तेरी जान नहीं लूंगी। लेना भी नहीं चाहती। पर हां, जानना जरूर चाहती हूं कि क्यों तूने ऐसा कहा कि मेरे रामलला तेरे सोग का कारण हैं।""रानी हे रानी! तू भी माता, मैं भी माता। राम जी का आगमन और मेरे बालक का आगमन - साथ-साथ, संग-संग। पर अपना -अपना नसीब कि तुम्हारे रामलला सोने के पालने में झूल रहे हैं और मेरा बालक तुम्हारी रसोई में पक रहा है। आज उसका माँस तुम्हारे मेहमानों को खिलाया जाएगा। रानी हे रानी, लोग कहते हैं, हिरण का माँस बड़ा मीठा होता है और उसमें भी बच्चा हिरण का तो और भी। उसी बच्चे हिरण की ताक में मेरा लाल धर लिया गया रानी! जो रामलला न आते तो आज मेरा बालक भी न बधाता। इसी से मैं बोली कि तुम्हारे रामलला का आगमन ही मेरे सोग का कारण है।"कौशल्या हंसी - भर देह हंसी। बालक राम का चेहरा आँचल के नीचे से निकालकर हिरणी के सामने कर दिया -"देख तो री हिरणी, कैसे अपरूप लग रहे हैं मेरे रामलला! इस साँवरी सूरत पर तो मैं सारा तिरलोक भी निछावर कर दूँ। रे हिरणी, तुझे नहीं मालूम क्या कि यह जो रामलला हैं, वो अयोध्या के राजा हैं- चक्रवर्ती महाराज। राजा और राज के सुख के लिए परजा को थोड़ा कष्ट, थोड़ा बलिदान तो करना ही पड़ता है न! और सुन री हिरणी, ये जो रामलला हैं न मेरे, वे सिरिफ हमारे पूत और अयोध्या के भावी राजा ही नहीं हैं। वे भगवान विष्णु के अवतार भी हैं-भए प्रकट कृपाला, दीन दयाला, कौसल्या हितकारीहर्षित महतारी मुनि मनहारी, अद्भुत रूप निहारीलोचन अभिरामा, तन घनस्यामा, निज आयुध भुज चारी।भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभा सिंधु खरारी।हिरणी रे! मैं तो साँचे कहूँ, डर गई थी, प्रसव के बाद नन्हे से, रूई जैसे नरम, चिक्कन बालक की जगह चक्र-सुदर्शन रूपधारी भगवान विष्णु! मैं तो बोल ही पड़ी थी रे -"माता पुनि बोली सो मति डोली तजहू तात यह रूपाकीजै सिसु लीला, अति प्रिय सीला यह सुख परम अनूपा।"तो ऐसे हैं मेरे श्रीरामलला! भक्तों के आराध्य, दुखियों के ताऱनहार! वे साक्षात भगवान हैं, विष्णु के अवतार! ऐसा-वैसा, साधारण बालक जुनि समझो। ई तो भगवान हुए री और भगवान के भोग लग गया तेरा बालक तो तुझे तो प्रसन्न होना चाहिए कि तेरे और तेरे बालक के जनम-जन्मान्तर सफल हो गए।"वैष्णव जन को तेने कहिए पीर पराई जाने रे।पर दुखे उपकार करे कोई, मन अभिमान न माने रे।"हिरणी की आँखों से आँसू गिरते ही रहे, जबान बन्द हो गई। सचमुच! गरीब, दीन-हीन, लाचार परजा तो राजा, राज-काज और प्रभु काज के लिए ही होती है। ई तो सनातन सच है। आज रामलला आए तो मेरे संग-संग कितनी हिरणियों की गोदें सूनी हो गईं। रामलला न जनमते, कोई और जनमता। न बधाता मेरा बालक तो कोई और बध हो जाता। सुविधाभोगी समाज की सुविधा के हवन में किसी न किसी को तो हविष्य बनना ही पड़ता है। पर मैं क्या करूं? मैं तो आखिर को माँ हूं न! कैसे बिसार दूं अपने कलेजे के टुकड़े को? जो शिकारी पकड़कर ले जाता तो हाय मारकर रह जाती कि दैव बाम निकला। एक आस भी रहती कि बचवा शायद कहीं जीवित रह जाए। किसी सेठ साहूकार के बगीचे की शोभा बढ़ा रहा होगा, किसी कूद-फांदवाले के यहां तमाशा दिखा रहा होगा। कैद में ही सही, जीता तो रहेगा। माँ की आँखों के आगे उसका लाल बना रहे, इससे बढ़कर मां को और कौन सा सुख चाहिए।हजार मन का बोझा मन पर उठाए हिरणी लौट आई। डग थे कि उठते न थे, लोर (आंसू) थे कि थमते न थे। भैया हिरण सब सुनकर अवाक था - "री बहिनी, साँच कही री बहिनी! हम गरीब, लाचार जात - कुछ नहीं कर सकते। पराधीन सपनेहु सुख नाहीं री बहिनी। उठ, धीर धर बहिनी, क्या करेगी! नसीब का लिखा कहीं कोई मिटा सका है भला!"पर हिरणी तो छटपट किए जा रही थी। चाह कर भी उससे धीरज धरा न जा रहा था। भैया हिरण तो अपनी समर्थ भर उसे समझा बुझा कर लौट गया था। मगर वह सारी रात उस खेमे के बाहर खड़ी रही, जहाँ उसके बालक को काटा गया था। कांय.. की एक महीन, बारीक आवाज हिरणी के कलेजे को तेज आरी से चीरती चली गई थी। आ..ह रे, मोरा बचवा रे..। मोरा बचवा चला गया रे .. रानी रे .. हम कइसे धीरज धरें रे .. वह बिलख-बिलखकर रोने लगी। पूरा जंगल जैसे उसके सोग में भागीदार हो रहा था। उसे फ़िर होश ना रहा कि कब पूरनमासी का चांद अपनी शीतल छांह समेटकर चला हया था और कब भास्कर दीनानाथ अपनी भोर की रोशनी के साथ जगत को उजियागर करने आ पहुंवे थे।भोर के सूरज की तनिक तीखी चमक हिरणी पर पडी तो वह तनिक चेती। एक पल लगा उसे यह समझने बूझने में कि वह कहां है, किधर है। और इसका भान होते ही वह फिर भागी उसी खेमे की ओर। देखा, बचवा की खाल उतार कर माँस को पकने भेज दिया गया था। अब बाहर रस्सी पर वही खाल सूख रही थी। सूख रही खाल जब हिलती तो हिरणी को लगता कि उसका बालक उससे छुपा-छुपी का खेल खेल रहा है और उसे अपनी तुतली जबान में आवाज दे रहा है - मइया, आओ री! आओ ना री मइया! हे मइया, इधर, माई गे, उधर! हिरणी बेचैन, बेकल इधर-उधर ताकती। चारों दिशाओं में उसे अपने पूत की किलोल ही सुनाई दे रही थी। आवत हैं रे पूत। तोहरा लगे आवत हैं। हां, इधर..। ना उधर..। ना ना किधर? किधर है रे तू मोरा कलेजे का टुकड़ा रे..।और हिरणी एकबार फिर से रानी कौसल्या की अरदास में थी। रानी रामलला को दूध पिला रही थी। हिरणी को देखते ही किलक उठी -"आओ रे हिरणी! भोज-भात जीमीं कि नहीं? अपने सभी भाई- भैयारी को लेकर आई थी कि नहीं? अच्छे से तो जीमे ना सभी? कौन कौन से पकवान खाए तुमने?""रानी हो रानी! राजा महराजा के लिए बने खीर पकवान मे हमरा क्या हिस्सा, क्या बखरा। वे खा लें तो समझो, हम जनता का पेट अइसे ही भर जाता है। हम तो हे रानी, फ़िर से एक अरदास लेकर आए हैं। इसके पहले भी हमने अरदास करी, पर तुमने हमरे अरदास पर कान न दिया और बचवा हमारा हमसे दूर चला गया। हमने कलेजे पर पत्थर धर लिया कि चलो, आखिर रामलला हैं तो सभी के लला। भगवान जुग जुग जीवित रखें उन्हें। चांद सूरज से भी जियादा पुन्न -परताप फ़ैले उनका। ..अब बहिनी! फिर से एक अरज ले के आई हूं। इसबार मत ठुकराना रानी! तुम्हें मेरी सौंह (सौगंध)!""बिना सुने जबान कइसे दे दूँ हिरणी? पानी में मछली और बिना पतवार की नाव का कोई भरोसा होता है क्या? जो बिना सुने जबान दे दिया और तुम्हारा कौल पूरा न कर पाई तो हत्या तो मेरे ही माथे चढ़ेगी न!""वो तो चढ़ चुकी रानी, उसी दिन, जिस दिन तूने मेरा बालक बध करवाया।" मगर हिरणी इसे बोली नहीं। मन में ही पचाकर रह गई। अभी तो भीख माँगने आई है। जो पहले ही नाराज कर दिया तो भीख की उम्मीद कैसे की जा सकेगी? वह बोली -"जो तुम्हारी आज्ञा रानी!" वह सर को जमीन तक टिका बैठी-"मचियहिं बइठल कोसिला रानी, हरिनी अरज करे होरानी, मंसवा ते सिंझई रसोइया, खलरिया हमें देतिउ हो।""बचवा का मांस तो रसोई में पक गया रानी! अभी मैं उसकी खाल सूखती देख आई हूँ। तुम मुझे वही खाल दिला दो रानी। मैं उसमें भुस भरवाकर अपना बालक गढ़ लूँगी। बालक का वह रूप मेरी आँखों के आगे रहेगा तो मुझे भी लगेगा कि मेरा बचवा वैसे ही मेरे साथ है, जौसे तुम्हारे संग तुम्हारे रामलला हैं।""ये क्या माँग बौठी रे हिरणी!" कौशल्या फिर से बिगड़ उठी -"क्या एक पूत के लिए पूत-पूत रट लगाए बैठी है? अरे, तेरे जैसों के पूतों की औकात ही क्या? ढोर-डंगर की तरह तो जनमते हैं। कौन सा उसे चक्रवर्ती राजा होना है! एक पूत गया तो जाने दे। दूसरा बिया लेना (पैदा कर लेना) और रही बात खाल की तो वह तो नहीं मिलनेवाली। क्यों तो वो भी सुन ले।"पेड़वा पर टाँगबे खलरिया, मड़ई में हम समुझब हो,हरिनी खलरी के खंजड़ी मढ़ाइब त' राम मोरा खेलिहें नू हो।"उस खाल से मेरे रामलला के लिए खंजड़ी बनेगी। नरम-मुलायम खाल की खंजड़ी। दूसरे जानवर तो होते हैं कठोर। उनके कठोर खाल से खंजड़ी बनेगी तो मेरे रामलला के नाजुक हाथ और तलहथी छिल न जाएंगे! इसीलिए.. इसीलिए मैंने कहा था हिरणी, कि कौल देने से पहले तेरी बात तो सुन लूं। मेरी कितनी फजीहत होती रे हिरणी! भगवान शंकर ने मेरी रक्षा की। जो तुझे कौल दे दिए होती तो आज तो मैं कहीं की ना रहती। सूर्यवंश की रानी का कॉल ऐसे ही चला जाता. शिव, शिव, शिव, शिव! किस भांति आपने बचा लिए मेरे प्राण? जो दे दी होती कौल तो कौन करता मेरे मर्यादा, मेरे धर्म की रक्षा? कितनी फजीहत होती कि चक्रवर्ती राजा दशरथ की रानी कौशल्या ने अपनी बात तोड़ दी। स्वर्ग में baiThe मेरे सूर्यवंशी पूर्वज राजा दिलीप, राजा अज के सर यह देखकर शर्म से झुक जाते कि उनकी पुत्रवधू ने नहीं रखी अपने कौल की मर्यादा और डुबा दिया उस कुल को गहरे रसातल में, जो वंश प्रसिद्ध है- रघुकुल रीत सदा चलि आई,प्राण जाए बरू बचन न जाई.हे मेरे पूर्वज, मेरे पितामह, मेरे श्वसुर, बच गई आपकी बहू आपके कुल को कलंकित करने से । बचा ली मैंने वंश मर्यादा की परंपरा। देवें आशीष कि यूँ ही सदा रहे तत्व और धर्म का ज्ञान और कर सकूँ न्याय-अन्याय में भेद! तू जा अब, जा अब तू कि नहीं चाहती देखना अब मैं तेरा मुँह। याद रख कि परछाई भी न पड़ने पाए तेरी इस महल में, वरना सच कहती हूं कि उस दिन नहीं बच पाएगी तू मेरे क्रोध की अगन से। चल जा जल्दी, भाग . . . . . . "फिर से नैनों में नीर का हहराता समुंदर और हृदय में दुख के काले गंभीर, भरे बादल जमाए हिरणी लौट आई। बेटे के बिना पूरा जंगल उसे काट खाने को दौड़ रहा था। सच! हम कमजोर, निर्बल, बेबस का कोई सुनवौया नहीं। न राजा, न रानी न देवता न पितर।खंजड़ी बन गई। रामलला नन्हीं-नन्हीं हथेलियों की थाप से उसपर चोट करते। खंजड़ी की आवाज होती तो वे खुश होकर तालियाँ पीटते। ठेहुनिया दे-दे कर चलते रामलला को देख कौशल्या रानी निहाल हो-हो उठतीं-ठुमुक चलत रामचन्द्र, बाजत पैजनियांठुमुकि ठुमुकि उठत धाय, गिरत भूमि लटपटायतात, मात गोद धाय, दसरथ की रनियां।हवा के झोंकों के साथ-साथ खंजड़ी की अवाज दूर जंगल तक जाती। उस आवाज को सुनकर हिरणी का आकुल-व्याकुल मन क्रन्दन कर उठता।"जब-जब बाजे ले खंजडि़या सबद अकनई होरामा, ठाढि़ ठेकुलिया के नीचा, मनहि मन झेखेले हो।""मोरा बचवा रे.. " न चाहते हुए भी हिरणी पुकार उठती; पर तुरंत ही मुंह दबा लेती। उसे डर लगता कि कहीं उसकी आवाज से रामलला के खेल में कोई बाधा न आ जाए और रानी उसका विलाप सुनकर फिर से क्रोधित न हो जाए। अभी कम से कम खंजड़ी की आवाज़ तो वह सुन पा रही है और इसी बहाने वह अपने पूत से मिल भी पा रही है। जो उसकी आवाज़ से रानी खिसिया जाए और उसे कैद मे डाल दे तो वह अपने बचवे के इस रूप से भी बार दी जाएगी।समय बीतता गया, रामलला जवान हो गए। सीता कुँवरी वधू बनकर छम-छम पाजेब बजातीं पालकी से उतरीं। सीता को साथ-साथ उर्मिला, माडवी, श्रुँकीरती भी बहुरिया बन कर आई लक्ष्मण, भारत व् शत्रुघ्न के लिए. राम जी के राज्याभिषेक की तैयारी होने लगी। सारी अयोध्या फिर से उसी दिनवाले आनंद और उत्सव में डूब गई, जिस दिन रामलला का जन्म हुआ था। हिरणी के अब कई पूत हो चुके थे मगर उस पूत की कसक अभी भी उसके कलेजे को टीसती रहती।राज्याभिषेक की पूरी तैयारी हो गई कि देवी सरस्वती बाम हो गर्इं। वह मंथरा के माथे चढ़ बैठी और मंथरा ने कैकेयी के मन को फेर दिया कि बस! सारी की सारी अयोध्या श्मशान भूमि में बदल गई। राम का बनवास। केवल राम ही नहीं, संग में सिया सुकुमारी और सूर्य जैसे ओज वाला भाई लक्ष्मण भी. राम, सीता और लखन के बिना पूरी अयोध्या वैसे ही भांय-भांय करने लगी, जौसे पूत के बिना हिरणी को सारा जंगल ही भांय-भांय करता नजर आ रहा था।राजा दशरथ शोग भवन में पड़े हुए जल से निकली मीन की तरह छटपटा रहे थे। उन्हें श्रवण कुमार के माँ-बाप की याद हो आई -"हाँ! आज शाप फलीभूत हुआ। पुत्र सुख के बाद अब पुत्र वियोग का दुख! करमगति टारै नहि टरै! सच!"हिरणी रानी के महल के जंगले तक पहुंची, अंदर झांककर देखा - रानी अखरा (नंगी) जमीन पर लेटी हुई हैं। अरे? इत्ती बड़ी रानी और न पलंग, न गद्दा न पंखा न चँवर? सब है, पर रामजी नहीं और राम के बगैर कौशल्या रानी को कैसे ये सब भाए?हिरणी अंदर चली गई और बोली -"रानी हे रानी! अब तो समझ गई न वियोग की पीड़ा। ऐसे ही मैं भी रोई थी। ऐसे ही कितनी माएं रोई होंगी। केलेजे की टूक बड़ी बेआबाज होती है रानी? समझी होती तो मेरी शुभ कामनाएं तुम्हारे साथ होतीं । मगर अब तो मुझे तुमपर तरस आ रहा है रानी! सत्ता और ताकत के मोह में कमजोर और निर्बल को मत भूलो रानी, उन्हें देखो, सुनो, उनका ध्यान रखो। आखिरकार वे तुम्हारी रियाया हैं रानी और अपनी परजा का ख्याल जो राजा नहीं रखेगा, उसका कभी भी भला नहीं होगा रानी, कभी भी नहीं।"रानी कौशल्या उठकर बैठ गई। बिटर-बिटर हिरणी को ताकती रही। फिर फफककर रो उठी। हिरणी की आँखों से भी आंसू की धार फूट पड़ी। आखिर को माँ थी, सो एक माँ होकर दूसरी माँ की पीर को कैसे न समझती? और इन दोनों की माई यानी धरती माई चुपचाप इन दोनों की पीर को अपने कलेजे में समेटने लगी। चुपचाप! बेआवाज! शायद वह भी इन दोनों की पीर को जान रही थी, समझ रही थी।
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पीर पराई - विभा रानी
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6 पाठकों का कहना है :
Science Bloggers Association का कहना है कि -
अरे वाह, इसी नाम की मेरी भी एक कहानी है। उसे हिन्‍दी सभी सीतापुर की कहानी प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्‍कार मिला था। मेरी जिंदगी का पहला पुरस्‍कार।कहानी अच्‍छी है, बधाई।-Zakir Ali ‘Rajnish’ { Secretary-TSALIIM & SBAI }
June 15, 2009 2:15 PM
रंजना का कहना है कि -
ह्रदय ऐसा द्रवित हुआ की आँखें बह चलीं....प्रशंशा को शब्द कहाँ से लाऊं समझ नहीं पा रही......अद्वितीय कथा....अद्वितीय सीख...लाजवाब !!!! बहुत बहुत sundar !!!कितना बड़ा सच कहा आपने......सुविधाभोगी समाज की सुविधा के हवन में किसी न किसी को तो हविष्य बनना ही पड़ता है।
June 15, 2009 2:27 PM
Manju Gupta का कहना है कि -
Sashakt,pravhahmayi khani ne "Ramayan" ki katha ko punah jivit kar diya.utsukta bara bar bani rahi.Badhayi. Manju Gupta.
June 15, 2009 8:03 PM
addictionofcinema का कहना है कि -
Kahani ki sbse achhi bat ye hai ki iske sabhi drishya bade jivant ban pade hain. Sundar uddeshya,sundar kahani......badhai
June 15, 2009 10:07 PM
Shamikh Faraz का कहना है कि -
"फिर से नैनों में नीर का हहराता समुंदर और हृदय में दुख के काले गंभीर, भरे बादल जमाए हिरणी लौट आई। बेटे के बिना पूरा जंगल उसे काट खाने को दौड़ रहा था। सच! हम कमजोर, निर्बल, बेबस का कोई सुनवौया नहीं। न राजा, न रानी न देवता न पितर।"कहानी के डैलोग्स बहुत सुन्दर लिखे गए हैं.
June 17, 2009 11:20 AM
vineeta का कहना है कि -
bahut hi bhavuk kahani hai. aankhon main ansu aa gye.
June 17, 2009 3:55 PM

Monday, June 8, 2009

कृपया अभिषेक की मदद करें.

अभिषेक की मदद करें. अभिषेक बमुश्किल ३० साल का युवा है और अकस्मात ब्लड कैंसर जैसी भयावह बीमारी से ग्रस्त हो गया है. किसी कि भी जान बहुत कीमती है, खास तौर पर अगर युवा हो तो. अभिषेक काम इलाज चल रहा है. उसकी बीमारी में एक करोड़ रुपये से अधिक खर्च होने की बात बताई गई है. एक मद्धम वर्गीय परिवार का लड़का और इतना मंहगा इलाज, आप सभी सोच सकते हैं. इसलिए छाम्माक्छाल्लो इस मंच से आप सबसे प्रार्थना करती है कि अपनी शक्ति भर जितना भी हो सके, एक जान बचने को लिए आगे आयें और अभिषेक की मदद करें. उसका वेब साईट है- http://www.helpabhishek.com/helpabhishek/home.htmlक्या पता. आपकी मदद से एक जान बच जाये.

Sunday, June 7, 2009

हर समय एक रत्नाकर

पढिये छाम्माक्छाल्लो की एक कहानी -"हर समय एक रत्नाकर"। इसे साक्षात्कार पत्रिका में प्रकाशित किया गया था और अब नेट पत्रिका "रचनाकार" में छपी है। अपनी राय दें।
http://rachanakar.blogspot.com/2009/06/blog-post_06.html
वे गुमसुम से बैठे थे। बोलने की कोशिश में कंठ अवरूद्ध हो जा रहा था। क्या बोलें? कैसे बोलें? दूसरों के लिए तो इस बात का कोई महत्व ही नहीं, मगर इनके लिए? हृदय की समस्त गहराईयों से निकले भावों के उद्वेग में चारों ओर बेचैन चक्करें काटता मन।
मधुमक्खियों द्वारा दिया गया मधु तो बहुत स्वादिष्ट लगता है, मगर उसके डंक? कैसे विधाता ने सभी जीवों के भीतर अपनी जान बचाने के लिए उसी की देह में कोई न कोई उपाय रख छोड़ा है। यह दूसरी बात है कि उसका फल दूसरों को भी भुगतना पड़ता है। कभी-कभी तो किसी निरपराध को भी। लेकिन मधुमक्खियों को यह कैसे पता चले कि कौन अपराधी है और कौन निरपराध। उसके सामने तो सबसे बड़ा प्रश्न था - आपद्धर्म का, जिसके लिए विश्वामित्र ने कुत्ते का मांस खाया था, जिसके लिए महाभारत का महायुद्ध हुआ।
मुंबई में कबूतर असंख्य हैं... वीटी, दादर, गोरेगाँव स्टेशन, लोखंडवाला आदि में तो घोषित कबूतरख़ाना हैं। अघोषित हैं घर-घर में, खिड़कियों के कोनों में, गमलों में, फूलों के पौधों में - कहीं भी, किसी भी जगह, जहाँ एक दरार भर भी जगह मिल जाए। बिल्कुल यहाँ रहने वाले आदमियों की तरह ही - जहाँ भी बित्ते भर की छाँव मिल जाए...!
उनके यहाँ भी कबूतर ने अपना अड्डा बना लिया था। रसोईघर की खिड़की पर रखे गमले में दो अंडे भी दे दिए थे। कितनी मारामारी है मुंबई में जगह की। लोगों को अपने फूल-पत्ते का शौक भी खिड़कियों पर गमले रखकर करना पड़ता है... इतनी जगह ही नहीं... न कॉरीडोर, न पैसेज, न बालकनी... बस ले-देकर चारों ओर दीवारें और बीच में एक खिड़की, एक दरवाजा। बस जी, हो गया घर तैयार। अब इसमें आपको जितने पैसे लगाने हों, लगाइए.. दीवाल फोड़-फोड़कर लगाइए.. फर्श कोड-कोड कर लगाइए, जैसा पेंट चाहिए, कराइए, सनमाइका लगवाइए विनियर पर सेटल कीजिए, पाइनवुड पर काम कीजिए, आपका मन, आपकी सामर्थ्य!
पशु-पक्षियों के लिए इन सबकी कोई जरूरत नहीं। उन्हें तो बस सुराख भर जगह चाहिए। इंसान भी तो इसी सुराख भर जगह में रहते हैं मुंबई में - सपरिवार - उसी सुराख भर जगह में अपने पालतुओं को भी रखते हैं। वैसे पालतू कुत्तों के लिए तो उनके सोफासेट कि पलंग कि गोद कि गाल - सबकुछ एक समान.. उन लोगों को पूरी आजादी है सोफे पर बैठने के लिए कि उनके गाल चाटने के लिए।
कबूतरी ने गमले में अंडे दे दिए थे। गमले में तुलसी लगी हुई थी.. पति को हिदायत दी गई थी - तुलसी में नियमित पानी देने के लिए.. वे तुलसी में तो नहीं, तुलसी के पौधे में पानी दे देते.. पत्नी की आस्था व श्रद्धा के ठीक विपरीत उनकी अपनी आस्था व श्रद्धा थी, जिसमें ऐसी किसी भी भावना के लिए कोई स्थान नहीं था, जिसमें से तथाकथित धर्म या धर्म से संबंधित किसी कर्म-कांड की कोई गन्ध आ रही होती।
अब कबूतरी के अंडे दे देने के बाद उन्होंने तुलसी में पानी देना बन्द कर दिया। मायके गई हुई पत्नी फोन पर बार-बार याद दिलाती रहती। इस बार की ताकीद पर इतना भर ही कहा - “यार! तुम्हारा तुलसी का पौधा फिर कभी, कहीं से भी आ जाएगा, लग जाएगा, मगर यहाँ एक जीव को अस्तित्व में लाने की प्रक्रिया चल रही है। तुम खुद भी एक औरत हो, तुम्हें तो स्वयं समझ लेना चाहिए..।“
पत्नी ने व्यर्थ की बहस से बचने के लिए प्रसंग को मोड दिया.. उसे पता था कि पत्नी रूपी जीव के अलावे उन्हें सभी जीवों पर बड़ी दया, बड़ा स्नेह, बड़ा अपनत्व उमड़ता है। और इसका पता उन्हें भी अच्छी तरह से था। पत्नी का मन एक बार किया कि कहें कि “यह पौधा.. यह भी तो सजीव ही है, काठ की कुर्सी कि बेंत की छड़ी की तरह निर्जीव नहीं.. एक को बचाने के लिए दूसरे की हत्या..।“ मगर वह चुप ही रही - तर्क को कुतर्क में बदलने की अनिच्छा से बचती हुई।
चाय बनाते समय, पानी लेते समय अब वे जरूरत से अधिक समय तक रसोई में खड़े रह जाते। कबूतरी देह फुलाए अंडे पर बैठी रहती। उसकी पलकें ऊपर से दिखाई नहीं पड़ती, मगर उसकी पलकों के मिटमिटाने से उसकी मसूर दाल जैसी गोल-गोल आँखें मछली की आँख जैसी दिखाई पड़ती.. गोल-गोल। वैसे तो आँखों में कोई हरकत सी नहीं लगती, मगर पलकों के मिटमिटाने के समय उसकी पलकों का पता चलता। तब लगता कि वह जगी हुई है, सचेष्ट, सप्राण, चाक-चौबस्त।
एक दिन अंडे में से चूजा निकल आया.. गुलाबी-गुलाबी.. अत्यन्त कोमल, निरीह, देह पर रोएं नहीं.. उन्हें एकदम से अपने बेटे के जन्म का पहला दिन याद आ गया - ऐसा ही नर्म, कोमल, गुलाबी थ वह भी। पूरी रात बेटे को अपने सीने से लगाए रहे - उसकी नर्म देह को अपने में महसूस करते, उसके कोमल जीव को अपने सीने की ऊष्मा पहुँचाते।
उनके मन में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई - सृष्टि की इस महिमा पर, नए प्राण के इस संसार में आने के स्वागत में.. वे दो-तीन छोटी-छोटी कटोरियाँ ले आए.. खिड़की पर गमले में उन कटोरियों में दाल-चावल और पानी रखने लगे।.. कबूतरी पर उनकी नजर इतनी स्नेहासिक्त होती, जैसे किसी नव-प्रसूता पर लोगों की होती है.. जैसे अपनी पत्नी पर हुई थी, जब उसने इनके बेटे को जन्म दिया था.. इसी तरह तो उन्होंने देख- भाल की थी सद्यःप्रसूता पत्नी की, नवजात बेटे की।.. अन्य पुरुषों को तो नवजात शिशु को छूने में ही डर लगता है। मगर उन्होंने तो शिशु के लेबर रूम से अपने रूम में आते ही सबसे पहले उसे अपनी गोद में जकड़ लिया। झपटकर नर्स की गोद से अपनी गोद में लेकर लगे उसे चूमने - उसकी आँखें, उसकी पलकें, उसके गाल। नर्स को बोलना पड़ा -“तुरंत का जन्मा है.. इन्फेक्शन लग सकता है..। “ ओह, कितना सुख होता है सृष्टि के निर्माण में, निर्माण को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया में, उसका साझीदार बनने में।
तुलसी सूख गई। मगर दोनों चूज़े अब धीरे-धीरे बढ़ने लगे। नर कबूतर भी बीच-बीच में आता, कबूतरी के साथ बैठता.. दोनों की नजरें मिलतीं, जैसे आपस में वे दोनों कुछ बतिया रहे हों। कबूतरी जरा हटकर बैठ जाती। अंडे से निकलते दोनों बच्चे और अच्छी तरह से दिखाई पड़ने लगते। पिता को जैसे खुशी होती.. वह पंख फड़फड़ा कर फिर उड़ जाता.. फिर आता और कबूतरी की चोंच में कुछ डाल जाता.. संभवतः कुछ दाने.. कबूतरी फिर अपनी जगह पर आ जाती.. फिर पंख पसार कर उसमें अपने बच्चे को ढंक लेती.. उन्हें पत्नी याद आ जाती। वह भी बेटे को अपने अंक में भरकर बाँहों के घेरे में लेकर सोती थी.. स्वयं उन्हें कितनी अधिक संतुष्टि मिली थी, जब वे बेटे के जनम की पहली रात्रि में उसे अपनी गोद में लेकर सोए थे। कितनी दीप्ति लिखी रहती थी पत्नी के चेहरे पर.. कितना संतोष है इस माता कबूतरी के चेहरे पर। कितनी समानता है स्त्री और कबूतरी में! कबूतरी ही क्यों किसी भी मादा में.. धरती पर के किसी भी जीव की किसी भी माता में। अन्य लोक का तो उन्हें पता नहीं, मगर वे आश्वस्त थे कि यदि किसी दूसरे लोक पर भी जीव हुए तो वहाँ भी यही मातृत्व भाव मिलेगा। प्रेम और मातृत्व - दोनों की साझेदारी में समान अभिव्यक्ति, समान व्यवहार, समान सुख - कितनी एक सी होती हैं सभी मादाएं! पुरुष भी चाहें तो अपने भीतर इस मादा-भाव का अनुभव कर सकते हैं, जैसे आज वे कर रहे हैं।
लेकिन वे तो घोषित पुरुष हैं.. प्रकृति से ही पुरुष योनी में जन्मे हुए.. तथाकथित सुदृढ़, मजबूत, बलिष्ठ। उन्हें क्यों ऐसा स्त्रीवत अनुभव होने लगा.. उस दिन सड़क पर देखा - एक कुतिया अपने पिल्लों को दूध पिला रही थी.. वे ठिठक गए.. मुग्ध भाव से उसे देखते रहे..। उस दिन किसी से मिलने जा रहे थे। वहाँ की इमारत की सीढ़ियाँ चढ़ते वक्त सीढ़ी के एक कोने पर नजर गई। एक बिल्ली ने चार बच्चे दिए हुए थे। चारों बच्चे उसके दूध में मुंह घुसाए पड़े थे और बिल्ली एकदम आराम से ढीले बदन से लेटी हुई थी। मगर हर आहट पर उतनी ही चौकन्नी, उतनी ही चौकस - अपने बच्चों की रक्षा के लिए हरदम तैयार! वे वहां भी दो मिनट रुककर उसे देखने लगे.. थोड़ी देर बाद लगा, जैसे उनके अपने हृदय से कोई स्रोतस्विनी फूट पडी हो.. वे तनिक नर्वस भी हो गए.. अपनी ओर भी देखा.. तनिक भयभीत, जरा आशंकित.. फिर वे मुस्कुरा पड़े।
“जन्म से पहले हर कोई स्त्री ही होता है। धरती पर आने के बाद ही हमारा विभेदीकरण नर या मादा में होता है..“
“मतलब? आपका कहना यह है कि सभी भ्रूण मादा ही होते हैं और प्रसव-काल में वह मादा भ्रूण मादा से नर शिशु में बदल जाता है। यह कोई विज्ञान है या उलटबाँसी?“
“नहीं, नहीं, चमत्कार!“ उसके चेहरे पर शैतानी झलकने लगी।
“तो ऐसे-ऐसे चमत्कार को तो दूर से ही नमस्कार भई!“
“अरे नहीं भई, कोई चमत्कार-वमत्कार नहीं है.. भ्रूण का लिंग भी नहीं बदलता है.. बस नजरिए की बात है। देखिए, हम सभी नौ महीने तक एक स्त्री की देह का एक अभिन्न अंग बनकर रहते ह.. जब तक हम एक स्त्री की देह का हिस्सा हैं, तब तक तो स्त्री ही हुए कि नहीं? यह सृष्टि है और यही सृष्टि का नियम।“
वही सृष्टि इतनी क्रूर क्यों हो जाती है! इतनी हिंसा, इतना आक्रोश क्यों भरा रहता है सभी के भीतर? मनुष्य तो मनुष्य, पशु-पक्षियों में भी..!
मनुष्यों की बात तो नहीं कही जा सकती, मगर पशु-पक्षी तो आपद्धर्म में ही ऐसा वैसा कुछ करते हैं.. जैसे भूख लगने पर ही शेर शिकार करता है, पूँछ के दबने पर ही साँप पलटकर काटता है, जैसे छत्ते पर हमला होने के कारण ही इन मधुमक्खियों ने...। सभी अपनी जान बचाने की कोशिश में..।
मगर ये कबूतर? ये तो उन्हें कोई नुकसान पहुँचाने नहीं गए थे न?
“अब ये कबूतर। उन्हें कैसे मालूम कि...? आपने यह तो सुना ही होगा कि करे कोई, भरे कोई.. पूरी दुनिया में यही चल रहा है। देखिए न, पता नहीं किसके दिमाग में कौन सा फितूर समाया कि किसी ने उसका छत्ता काटा कि यूँ ही किसी बच्चे ने शैतानी से पत्थर या ढेले फेंके कि.. सारी मधुमक्खियाँ उड़कर सभी घरों की खिड़कियों पर भन-भन करने लगी।“
उनका गला भर्रा आया -“उस समय ये दोनों नर-मादा अपने चूजों के मुंह में कुछ दाने दे रहे थे कि.. मधुमक्खियों के हमले से वे दोनों तो उड सकते थे, सो उड गए वे। मगर ये दोनों नन्हे-नन्हे बच्चे.. कितने निर्बल, कितने असहाय, कितने पराश्रित! अभी तो उनके पंख निकल ही रहे थे, नन्हें-नन्हें पंख..“
बेकल, बेआसरा बनीं बदहवास उड़ती मधुमक्खियाँ अपने ठौर-ठिकाने के लिए चकरघिन्नी काट रही थी.. एक जगह से उजाड़े जाने के बाद अब दूसरी जगह के लिए विस्थापित.. मनुष्य भी तो जैसे सुन्न और हृदयहीन हो जाते हैं, ऐसी स्थिति में.. मधुमक्खियों के आक्रमण से विषण्ण और अचानक आए इस आपात संकट से बचने के प्रयास में दोनों बच्चों की बेचैनी! जान-प्राण बचाने की अकुलाहट - दोनों ओर से असहाय स्थिति - दोनों ही ओर से..। दोनों ही ओर से अपना-अपना आपद्धर्म और इसमें बलि चढ़ गए ये दोनों शिशु - पाखी..। बेचैन होते, मधुमक्खियों से खुद को बचाने की छटपटाहट दोनों चूज़ों में.. जान बचाने की इस कोशिश में एक चूज़े ने अपने उगते पंख फड़फड़ाए। उड़ने की कोशिश में लगा एक चूजा खूब जोर से फड़फड़ाया। पूरे पंख के अभाव में वह खुद को संभाल सकने में एकदम असमर्थ हो गया। नतीजा, सीधे खिड़की से नीचे.. चार मंजिल से गिरने के बाद तो इंसानों के लिए भी बचने की संभावना क्षीणप्राय रहती है, इस छोटे से बच्चे के लिए तो.. इस हड़बड़ी, धड़फड़ी में दूसरे चूज़े ने भी घबरा कर इधर-उधर भागने की कोशिश की होगी कि अपनी जान बचाकर भागती मधुमक्खियों ने उसे अपने सामने की बाधा माना होगा और मार दिए डंक पर डंक.. बिचारे चूज़े को तो खुद को संभालने का मौका भी नहीं मिला। वह उसी गमले में घुटकर ..“ कहते-कहते उनका गला अवरूद्ध हो गया। आँखें पनिया गईं। इस स्थिति का सामना करने से बचने के लिए वे बाथरूम में घुस गए।
लगभग दो घंटे के बाद मधुमक्खियों का तथाकथित उपद्रव थमा। वे सब किसी नए ठिकाने की तलाश में निकल गए.. शाम का अंधेरा भी पसर गया। पसरती सांझ के अंधेरे में घर इतना शांत लग रहा था, जैसे सचमुच ही किसी की मौत..।
“आप बैठें। मैं आफ लिए चाय बना लाता हूँ.. कड़क चाहिए कि माइल्ड .. चीनी चाहिए या? किचन में निर्जन चुप्पी पसरी हुई थी। न तो उनकी आवाज, न गैस-लाइटर की चिट-चिट, न बर्तनों की खट-पट..“ ओह! उसने भी तो हद ही कर दी है। आदमी लोग रसोई-पानी में काम में इतने अभ्यस्त होते हैं क्या? चाय पानी कोई जरूरी है क्या?
“क्या हुआ? रहने दीजिए। चाय-वाय पीने का मन नहीं है.. आइए, बैठिए, गप-शप करें।“
“सचमुच चाय नहीं..?“
“सचमुच।“
उन्हें जैसे आश्वस्ति का अनुभव हुआ..।
“पता है आपको कि मैं क्यों स्वर-विहीन, क्रिया-विहीन हो गया था? आफ साथ ऊपर आ रहा था कि खिड़की से नीचे गिरे एक बच्चे को देख लिया था.. आपका मन खराब ना हो जाए, यह सोच आपको दिखाया नहीं..। और अभी गमले में देखा कि.. यह दूसरा भी.. ओह, कैसे ये दोनों जान बचाने के लिए छटपटाए होंगे.. मेरे साथ इनकी दोस्ती हो रही थी.. मेरे उधर जाने पर प्रतिसाद भी देने लगे थे.. आँखों से, पंखों से.. उसकी माँ की नजरों में भी कोई भय नहीं रहता.. एक-एक पल, एक-एक दिन के उसके विकास का साक्षी हूँ मैं.. उड़कर चले गए रहते तो तसल्ली हुई रहती कि अपने-अपने ठौर पर गए - अपनी नई जिंदगी शुरू करने के लिए, नव विहान, नव-निर्माण के लिए, मगर.. खिलने से पहले ही..।
“छोड़िए यह सब.. ये सब तो दुनिया के दस्तूर हैं.. देखिए, हजारों-लाखों लोग भूकम्प, बाढ़, बम विस्फोट आदि में अचानक चले जाते हैं.. यह तो एक कबूतर..।“
“ऐसा मत कहिए। मैं सह नहीं सकूँगा। सच पूछिए तो मुझे अच्छी नहीं लगी आपकी यह बात। अरे, कबूतर हुआ तो क्या उनके अपने भीतर कोई स्पंदन नहीं है? जीवन नहीं है? उन लोगों के जीवन की कोई कीमत नहीं है? हम लोग भी अपने भाव खत्म कर लें, क्योंकि वह एक छोटा सा पक्षी है, नगण्य - जिसका जीना-मरना हमलोगों की चिन्ता का बायस नहीं?“
“ओके देन! हम लोग अपनी बातें रहने देते हैं। आइए, इन्हीं की बातें करें।“
“नहीं, नहीं काम कर लीजिए पहले।“ दिल पर दिमाग ने कब्जा जमाने की कोशिश तो की, मगर मन की चैतन्यता पर जगह-जगह अन्यमनस्कता हावी होती रही.. और फिर फोन, फिर फोन। फोन पर ही रोना.. फोन पर ही प्रलाप.. फोन पर ही एकालाप..
“मा निषाद प्रतिष्ठा त्वमगमय शाश्वतीः समाः
यत्क्रौंच मिथुना देकमवधिः काम-मोहितम्!“
एक मिथुनरत क्रौंच की हत्या ने रत्नाकर को वाल्मीकि बना दिया और सीता के लिए, उसके लव-कुश के लिए उनके हृदय के सारे अलिन्द और निलय सुरक्षित हो गए..। हल चलाते वक्त सीत से निकली सीता के लिए राजा जनक, यज्ञ से निकली याज्ञसेनी द्रौपदी के लिए द्रुपद पिता बन गए। अनाथ शकुन्तला के लिए ऋषि कण्व माता-पिता दोनों बन गए। कहाँ है वे सभी नारीवादिनी, जो कहती हैं कि मातृत्व हमपर आरोपित की गई प्रक्रिया है! हँसिए। यह हँसी का विषय है..। प्रकृति को नहीं पता था कि कालान्तर में मातृत्व-भाव के लिए ऐसी बातें की जाएंगी.. लेकिन मातृत्व क्या केवल शारीरिक स्थिति है? या फिर उससे बढ़कर मानसिक? प्रकृति रचित एक पुरूष में यह मातृत्व भाव, ऐसी करूणा, इतनी कोमलता क्यों? कहाँ से आई? पुरूष होकर हृदय में संचारित यह मातृत्व-भाव.. मातृवत उन्होंने इन सभी शिशुओं को अपनी-अपनी गोद में लिया, हृदय में प्रेम की भागीरथी की अजस्त्र धार फूटी.. माता जनक, माता द्रुपद, माता कण्व, माता वे स्वयं..।
“मुझे चैन नहीं मिल रहा है। किचन की ओर मेरा जाना बन्द हो गया है.. चौकीदार को बुलवाकर गमलेवाले बच्चे को हटवा तो दिया, मगर अब देखिए कि अहले - भोर से ही उसके माँ-बाप दोनों चक्कर काट रहे हैं। बार-बार दोनों खिड़की पर आ रहे हैं, जा रहे हैं.. कभी गमले की ओर निहारते हैं.. तो कभी पूरी खिड़की को फटी-फटी आँखों से देखते हैं.. पिता को तो जैसे साँप सूँघ गया है - आतंकित, हताश, खोया-खोया और माँ? अपनी बेचैनी में कभी गमला में चोंच मारती है तो कभी गमले के आगे-पीछे, ऊपर-नीचे बच्चे को खोजती है.. कभी नर कबूतर की ओर ताकती है, जैसे कह रही हो- “ये क्या हो गया?“ कभी खिड़की के ग्रिल पर बैठकर पूरे किचन के आर-पार ताकती है कि बच्चे कहीं घर के भीतर तो नहीं छुप गए हैं..। उसकी आँखों में दुख, हताशा और पीड़ा के इतने गहरे भाव हैं कि मुझे ताकत नहीं मिल रही है उसका सामना करने की।“
“कबूतर कभी उसके पास आता है, कभी वह भी कबूतरी के साथ अपने बच्चे को खोजने लगता है.. उफ़! कैसे बयान करूँ इन दोनों की तकलीफ, खासकर माँ की।“
“आप न तो नारी हैं, न नारीवादी.. न कामी, न भोगी.. तब क्यों इतने दुखी हो रहे हैं? लोग तो कबूतरों को पकड़कर खा जाते हैं.. मृत्यु तो सनातन सत्य..।“
“मुझे ये सब मत पढ़ाइए.. बराए-मेहरबानी.. मैं देख रहा हूं उसका कातर, उदास मुंह। महसूस कर रहा हूं उन दोनों के कलेजे का क्रन्दन और आप मुझे गीता का पाठ पढा..।“ उनका गला फिर से भर्रा गया, फिर से एक दीर्घ मौन चारों ओर पसर गया.. लेकिन आँखों के आंसू और कलेजे का कोर कोर बोल रहा था..
“मा निषाद..“
हे रत्नाकर! एक क्रौंच-वध को देखकर तुम वाल्मीकि बन गए..। कहाँ-कहाँ, कितने-कितने वध किस-किस रूप में इस धरती पर हो रहे हैं..। इंसानों की तो बात ही छोड दो.. मनुष्य की अंधी लालच और मद के शिकार बनते हैं ये पशु-पक्षी, पेड़-पौधे..। आओ रत्नाकर, आओ! सभी के हृदय में समा जाओ। बड़ी जरूरत है तुम्हारी इस धरती पर..।
“दारू पी रहा हूं.. चार पैग सुटक गया हूँ, फिर भी आँखों के सामने से न तो बच्चे गायब हो पाए हैं और न ही कबूतरों का आना ही रुका है। .. मगर अभी तक अपनी सन्तान के लिए उन दोनों की तलाश खत्म नहीं हुई है। कहिए तो? क्या करूँ मैं? क्यों मेरा कलेजा ऐसा है?“
“स्त्रियों की तरह रोना पुरुषों को शोभा..“
“तो कह दीजिए पूरी पृथ्वी को, कि स्त्री होना कोई गाली नहीं है और यदि यह गाली है, तो यह संपूर्ण पृथ्वी ही गाली है, हमलोगों की माँएं गालियाँ हैं, हमलोगों की रचना भी गालियाँ हैं।“ कोमल अनुभूतियों के समन्दर में उभ-चुभ होता उनका मन प्रलाप कर रहा था..।“
“मा निषाद..“
क्रौंच का मिथुन आरंभ हो चुका है.. नए सृजन के लिए, नए व्यवहार के लिए.. नव किसलय, नव पल्लव फूट रहे हैं, नवीन काम-गंध से वातावरण मोहित हो रहा है.. नवीन.. सबकुछ नवीन.. आह! सृजन में कितना सुख है.. रत्नाकर का सृजन वाल्मीकि में.. डाकू से साधु में.. संहारकर्ता से सृजनकर्ता में.. आओ रत्नाकर, रचो रत्नाकर, रसो रत्नाकर, बसो रत्नाकर.. हर समय एक रत्नाकर।