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Thursday, April 23, 2020

उषा गांगुली- कोलकाता हिन्दी रंगमंच का आधार

दौड़ती भागती भोपाल पहुंची थी संतोष चौबे जी आयोजित विश्व रंग के आयोजन में। शाम में नाटक "चांडालिका" का मंचन था। नाटकवाले तो बस ग्रीन रूम में सबसे पहले मिलते हैं। मैं भी लपकी। शो में अभी देर थी।
"अरे विभा!" कहते हुए लपककर वे उठीं और गले से लगाया। पूरे ग्रुप से परिचय करवाया- "जानो तुमि, खूब बड़ो आर्टिस्ट। सोलो कोरे....." शो की तैयारी के बीच बीच सभी कलाकार, खासकर महिला कलाकार आती गईं, फोटो खिंचवाती गईं मेरे साथ।
उषा दी बोलीं- "मुम्बई आनेवाली हूँ। तुम्हें फोन करूँगी।"
"आने से पहले, ताकि मैं आपके लिए वहां रह सकूँ।"
वे हंसीं। प्यार से थपकी दी और बोली- "निश्चय।"
अद्भुत नाटक था #चांडालिका। दीदी खुद करती थीं। इस बार अस्वस्थता के कारण खुद नहीं किया। लेकिन, जिस कलाकार ने काम किया था (नाम याद नहीं आ रहा) , उनकी पहली प्रस्तुति थी। बांग्ला में कहते हैं न- "की दारुण।"
उषा दी का नाटक सबसे पहले मैंने कोलकाता में देखा था- मन्नू भंडारी का #महाभोज। उसके बाद उनसे मिलना न हो सका। कोलकाता का मेरा पूरा प्रवास अनिश्चय, नई नौकरी का दवाब, नए शहर का दवाब, जहां रहती थी, ससुराली घर का एक अप्रत्यक्ष दवाब, शहर के मिजाज को समझने का दवाब, अपनी आर्थिक स्थिति का दवाब, तीन माह की बच्ची को गाँव में छोड़कर यहाँ आकर रहने का मानसिक और मनोवैज्ञानिक दवाब, अपना खुद का संकोच- एक छोटे कस्बे से महानगर में आई लड़की का- इन सब ऊहापोह में रही और वहाँ न तो बादल सरकार दादा से मिल पाई न उषा गांगुली दी से। आज सोचती हूँ कि अकेले ही तो रहती थी कोलकाता में। चली गई होती। उनका ग्रुप जॉइन कर लिया होता तो आज कुछ और समृद्ध हुई होती।
उसके बाद उन्हें गौतम घोष की फिल्म पार में देखा तो ऐसा लगा, जैसे अपने घर की दीदी हैं। आप सबने भी देखा ही होगा।
मुंबई में उनके दो-तीन बार नाटक देखने का मौका मिला- रूदाली, शोभा यात्रा। बीच-बीच में उनसे एकाध बार बात हुई थी। whatasapp के किसी ग्रुप पर भी वे मेरे बारे में जानकारी दे रही थीं। किसी -किसे ने बताया कि सोलो नाटक की चर्चा होने पर उन्होने मेरा नाम लिया था।
महिलाओं को हर क्षेत्र में आगे आने के लिए कई-कई स्तरों पर संघर्ष करना पड़ता है। रंगमंच में महिला निर्देशक अभी भी बहुत कम हैं। ऐसे में अपने बलबूते निर्देशन, अभिनय और ग्रुप को चलाने का माद्दा रखनेवाली जांबांज रंगकर्मी रहीं उषा दी। कोलकाता के हिन्दी रंगमंच का आधार जैसे ढह गया उनके जाने से। उनके ग्रुप में बंगाली कलाकारों की बहुतायत है। मंच पर वे सब ऐसी साफ-शफ़्फ़ाक हिन्दी बोलते कि लगता ही नहीं कि उनकी भाषा हिन्दी नहीं है। इसतरह से थिएटर के माध्यम से जाने कितनों को वे हिन्दी का प्रशिक्षण दे गईं, वैसे समय में, जब कोलकातावासी हिन्दी नहीं बोलते थे। मेरे बांग्ला इस फुर्ती से सीख लेने के पीछे यह भी एक वजह रही होगी।
आपका मुम्बई आना रह ही गया। फिर फिर मिलना भी रह ही गया। आप सब हम जैसे रंग संघर्षियों के लिए प्राण आधार हैं। ऐसे अचानक थोड़े न जाते हैं दी!

Thursday, September 20, 2012

दिनेश ठाकुर- नकारात्मकता की सकारात्मक भूमिका।


दिनेश ठाकुर अब हमारे बीच नहीं हैं। हिन्दी थिएटर जगत उनका ऋणी रहेगा। मुंबई के चंद प्रसिद्ध थिएटर ग्रुप्स में से एक उनका भी अंकग्रुप था। ज़ाहिर है, थिएटर की ओर लपकनेवाली सभी नई पौध इन नामों के पीछे भागती है। थिएटर का यह अपना ग्लैमर है।
दिनेश ठाकुर से मेरी मुलाक़ात मुंबई में ही हुई। मैंने नाटक लिखना शुरू किया था। पारिवारिक कारणों से मैं तब एक्टिव थिएटर से दूर थी। मेरा पहला नाटक था- दूसरा आदमी दूसरी औरत। उसे सबसे पहले एक्सपेरिमेंटल थिएटर फ़ाउंडेशन, मुंबई ने किया। बाद में राजेन्द्र गुप्ता और सीमा विश्वास ने। अब इसे रास कला मंच, हिसार कर रहा है। नाट्य लेखक के लिए एक बड़ी उपलब्धि होती है- उसके लिखे नाटकों का मंचन। मंचन ही लेखक और नाटक दोनों की सार्थकता है। एक्सपेरिमेंटल थिएटर फ़ाउंडेशन द्वारा दूसरा आदमी दूसरी औरत के मंचन के बाद नाटक लिखने का उत्साह और बढ़ा और फटाफट कुछेक नाटक और लिख डाले। उसी में एक नाटक था- मदद करो संतोषी माता। बेरोजगारी को आधार बना कर हास्य-व्यंग्य में लिखा गया था यह नाटक। एक्सपेरिमेंटल थिएटर फ़ाउंडेशन ने ही इसका रंग- पाठ रखा। मुख्य अतिथि के रूप में बुलाए गए –दिनेश ठाकुर।
दिनेश जी ने बड़े धीरज के साथ रंग पाठ को सुना। और भी कई नामचीन लोग थे- सत्यदेव त्रिपाठी, हरी मृदुल, गोपाल शर्मा, रमेश राजहंस, फिरोज अशरफ, डॉ चंद्र प्रकाश द्विवेदी, बबिता रावत। रंग-पाठ कभी अंक में ही काम कर चुकी राजेश्वरी पंडित और आज के हिन्दी-भोजपुरी फिल्मों और टीवी के अभिनेता प्रणय नारायण ने किया था।
रंग-पाठ के बाद सभी ने अपने अपने तरीके से नाटक पर चर्चा की। सबसे बाद में दिनेश जी ने बोलना शुरू किया और अंत में कहा कि यह नाटक बहुत कमजोर है। मुझे लगा कि अरे, यह क्या ये बोल रहे हैं, क्योंकि अपनी तो आदत होती है तारीफ सुनने की। खासकर तब, जब कार्यक्रम आपके लेखन या आप पर आयोजित हो। मुझे लगा कि यह आदमी तो बड़ा नेगेटिव है।
आम तौर पर लेखक को अपनी रचना पर चर्चा के समय कुछ बोलते नहीं देखा-सुना था, लेकिन उस दिन मैं अपने ही नाटक पर उनसे इसे कैसे प्रभावी तरीके से लिखा जाए, पूछ बैठी। बाद में इसकी काफी आलोचना हुई। लेकिन मुझे लगता है कि यदि किसी की रचना पर कोई समीक्षा हो रही है तो रचनाकार को यह पूछने का मौका दिया जाना चाहिए ताकि उसकी रचना में और निखार आ सके। मैंने यह भी पूछा कि यदि इस पर और काम करके इसे आपके पास लाऊं, तो क्या आप इसे करेंगे? वे पहले मुसकाए, फिर बोले- “हम नाटक के इतने सारे पक्षों पर काम करते हैं कि  स्क्रिप्ट पर काम करना संभव नहीं। मैंने फिर पूछा, ‘फिर लोग हिन्दी में नाटक कैसे लिखेंगे, यदि उसे कोई मंचित ही ना करे? कविता-कहानी तो कही ना कहीं छप ही जाती है। उपन्यास अंश या कभी कभी तो पूरा उपन्यास भी छप जाता है, मगर नाटक की बात आने पर सभी जगह की कमी की बात कहकर परे कर देते हैं।
साहित्य जगत के लोग नाटक से आमतौर पर कोई बाबस्ता नही रखते। उन्हें लगता है कि नाटक दृश्य विधा है, इसलिए हमारा इसमें क्या काम? नाटक के लोग साहित्य से सरोकार रखते हैं, क्योंकि उन्हें उन साहित्यों को पढ़ कर ही अपने लिए नाटक चुनने होते हैं। मुझे उस दिन दिनेश जी की बातें बड़ी नागवार लगी थी। कई दिनों तक मूड खराब रहा था। लेकिन, धीरे-धीरे उनके कहे पर सोचना शुरू किया, तब लगा कि वे ठीक कह रहे हैं।  
दिनेश जी ने बड़ी सादगी से कहा, ‘नाटक ऐसे नहीं लिखा जाता है। नाटक लिखने के लिए नाटक के रिहर्सल में जाना ज़रूरी है। अपनी सदाशयता में उन्होने मुझे खुला आमंत्रण दिया कि मैं उनके रिहर्सलों में कभी भी जा सकती हूँ। अपनी व्यस्तताओं के कारण ही उस समय एक्टिव थिएटर से दूर रही थी, इन्ही कारणों से उनके रिहर्सलों में भी कभी नहीं जा सकी, मगर उनके कई नाटक मैंने देखे। उन्होने खुद ही कई बार फोन करके मुझे बुलाया। कई बार मैं फोन करके उनके नाटक देखने गई- हमेशा, हम दोनों, कमली, जिन लाहौर नई वेख्या ... आदि। एक दो नाटकों की नवभारत टाइम्स में समीक्षा भी लिखी।
जीवन में नकारात्मक ऊर्जा भी सकारात्मकता लेकर आती है। उस दिन यदि दिनेश जी ने बात उतनी साफ-साफ नही रखी होती तो आज मैं नाटक और अभिनय- दोनों के क्षेत्र में शायद इस रूप में नहीं रहती, जितनी आज हूँ।  
हालांकि दिनेश जी ने फिल्में भी कीं, करते रहे। लेकिन, नाटक उनका प्रमुख कार्य क्षेत्र रहा। दिनेश जी ने मुख्यत: नाटक को ओढा, बिछाया, सहेजा। हर अक्तूबर में वे अपने ग्रुप अंक का थिएटर फेस्टिवल कराते थे। उनकी नज़रों में विजय तेंदुलकर भारतीय नाट्य जगत के सबसे बड़े लेखक थे। उनके कई नाटक अंक ने किए थे। अपनी श्रद्धा विजय तेंदुलकर पर प्रकट करने के लिए उन्होने एक साल अपना थिएटर फेस्टिवल विजय तेंदुलकर लिखित नाटकों पर ही किया। किसी के जाने से जो शून्य भरता है, वह बना ही रहता है। कोई किसी का विकल्प नही होता। सभी अपने अपने रूप में काम करते हैं, अपनी पहचान बनाते हैं। इस रूप में दिनेश ठाकुर ने अपने रूप में काम कर के अपनी पहचान बनाई है, जो थिएटर जगत में हमेशा याद की जाती रहेगी।    

Monday, September 17, 2012

अवश्य देखें- ‘मौनक कुरम’




चेन्नै आने के बाद, तमिल नाटकों के बारे में जितना सुना, जाना, और देखा भी, उससे तमिल नाटक देखने की इच्छा को पाला मार गया। लेकिन हाल ही में ए. मंगई निर्देशित नाटक मौनक कुरम’ (मौन की भविष्यवाणी) देखने के बाद तमिल नाटकों के प्रति मेरी धारणा एकदम बदल गई।  
ए. मंगई तमिल नाटक का एक बहु प्रतिष्ठित नाम है। लगभग 20 नाटक उन्होने निर्देशित किए हैं। मैंने उनका कन्नड में एक एकपात्रीय नाटक संचारी 2010 के डबल्यूपीआई यानि विमेन प्लेराइट इंटरनेशनल सम्मेलन के दौरान मुंबई में देखा था। संगीत के रागों की आत्मकथा बड़े ही प्रयोगात्मक, प्रतीकात्मक और अभिनव तरीके से चित्रित की गई थी। रागों की आत्मकथा, यह विषय ही इतना चौंकनेवाला था कि उसे देखने का लोभ मैं रोक नहीं पाई थी। मंगई के प्रति मेरी धारणा को और बल मिला मौनक कुरम से।
मौनक कुरम 19में 'मौनक कुरम' ग्रुप द्वारा प्रो. रामानुजम के निर्देशन में 1994 में पहली बार मंचित हुआ था। उसके तकरीबन 18 साल बाद, मंगई ने इसे चेन्नै के सुप्रसिद्ध स्टेला मारिस कॉलेज की लड़कियों के माध्यम से प्रस्तुत किया। इस नाटक के स्क्रिप्ट की यह विशेषता है कि इसे नाट्य कार्यशाला के दौरान तैयार किया गया। जात्रा और कथकली से मिलते-जुलते तमिल फोक- कोटुकी विशुद्ध शैली- नाच, गान और अभिनय के द्वारा इसे तैयार किया गया है। कहानी एक जिप्सी स्त्री कुरति के माध्यम से आगे बढ़ती है, जो प्रकृति के साथ पलती-बढ़ती-चलती है।
नाटक यह कहता है कि यह नाटक संसार में स्त्री –पुरुष की स्थिति-अवस्थिति पर आधारित नहीं है, बल्कि यह पहाड़ पर रहनेवाली कुरति की कहानी है। कुरवन कुरति की खोज में है। वह उसे शहर, सिनेमा, स्टेशन, राशन की दुकान पर खोजता है। वापस जंगल की ओर लौटते हुए वह कुरति के बारे में घास, बंदर, चट्टान, कोयल आदि से पूछता है। दोनों मिलते हैं और एक-दूसरे के प्रेम में पड़ जाते हैं। कुरवन उससे उसके धारण किए हुए गहनों के बारे में पूछता है। कुरति स्त्रियों के आगत जीवन को देखती है, जहां वह पौराणिक महिलाओं की त्रासद स्थितियां पाती हैं। एक ओर चंद्रमती है, जिसे उसका पति बेच देता है तो दूसरी ओर द्रौपदी है, जो नाना तरह के अधर्मों की शिकार होती है तो तीसरी ओर सीता है, जिसे अपनी पवित्रता सिद्ध करने के लिए अग्नि- परीक्षा देनी पड़ती है। ये मात्र इन तीन स्त्रियों का ही जीवन नहीं है, बल्कि ये अनंत स्त्रियों के जीवन का निर्धारक है। जंगल की ओर लौटते हुए कुरवन और कुरति पाते हैं कि सौभाग्य से स्त्रियों को निम्नतर समझनेवाली परंपरा या परिस्थियाँ उनके यहाँ नहीं हैं।
यह तो मैंने सिनोप्सिस के आधार पर लिख दिया। देखने के आधार पर अब लिख रही हूँ। उसमें सबसे पहले तो मैं यह बता दूँ कि पूरे नाटक में चंद्रमती, द्रौपदी और सीता के अलावा चौथा शब्द भी नहीं समझ पाई। लेकिन, नाटक कि बुनावट इतनी कसी हुई, भाषा इतनी सधी हुई, निर्देशन इतना मंजा हुआ, अभिनय इतना सधा हुआ कि बस मुंह से वाह वाह ही निकलता रहा। थिएटर की कोई पृष्ठभूमि न रखनेवाली कॉलेज की लड़कियां इस नाटक को कर रही थीं। लेकिन, उनके अभिनय ने यह एहसास नहीं होने दिया कि वे नाटक के क्षेत्र की नई-नवेलियाँ हैं। पुरुष किरदार निभाती ये लड़कियां अपने मेक- अप सहित वेषभूषा और देह व भाव भंगिमा से पुरुष लग रही थीं। मंच सज्जा बेहद मौलिक और प्रयोगात्मक था। डंडे द्वार, दीवार के साथ-साथ झूला भी बन जा रहे थे। एक रस्सी के सहारे द्रौपदी के चीरहरण को अत्यंत प्रभाव के साथ दिखाया गया, वहीं, कमर से झूलते ताले के सहारे चंद्रमती की कैद को और सीता की अग्नि परीक्षा को प्रकाश और झालरों के सहारे। मंच पर के सभी प्रोप्स संतुलित और सटीक और सही समय पर विविध अनुभूति कराने में माहिर। विविध पात्रों को जीती सभी युवती कलाकार पूरी आश्वस्त और विश्वस्त दिखीं, जिनका असर मंचन में दिखा। यह पहला शो था और पहले शो की कोई घबडाहट कलाकारों में नहीं था। इसका श्रेय मंगई के साथ साथ सभी कलाकारों को जाता है। चूंकि नाटक की प्रस्तुति में फोक का सहारा लिया गया था, इसलिए संगीत इसका बेहद प्रधान पक्ष था। मगर वाद्य यंत्रों की भरमार नहीं थी। महज एक कलाकर डफली और ढ़ोल के सहारे पूरे नाटक को समुचित संगीत देता रहा। संगीत का ताम - झाम भी था और संगीत की सादगी भी। कलाकारों की वेश-भूषा पर भी बहुत कलात्मक तरीके से काम किया गया था।
इस नाटक को देखते हुए भाषा न समझ पाने का एक ओर अफसोस हो रहा था, वही दूसरी ओर संतोष भी। भाषा से अपने को पहले ही अलग कर लेने के कारण पूरा ध्यान नाटक के अन्य पक्ष पर था। शाब्दिक भाषा न होते हुए भी रंगमंच की अपनी एक भाषा होती है और यही भाषा नाटक को दर्शकों से जोड़ती है। इसके पहले भी सुवीरन निर्देशित मलयालम नाटक आयुष्यती पुस्स्यनतेदेखते हुए यही अनुभूत किया था और इस बार मौनक कुरमदेखते हुए भी। इस नाटक को देखते हुए एक बात और ध्यान में आ रही थी कि इस नाटक को देखने का आनंद और भी बढ़ जाता, अगर इसे किसी सही प्रोसिनयम थिएटर में किया जाता, जहां लाइट की सारी व्यवस्थाएं होती है। चेन्नै में प्रकाश-व्यवस्था नाट्यकारों के लिए बड़ी समझौतापरक स्थिति है। लेकिन, मेरी समझ से प्रकाश व अन्य तत्व नाटक में सजावट का काम करते हैं- शरीर पर आभूषण की तरह। नाटक का स्क्रिप्ट, निर्देशन और अभिनय सही हो तो प्रकाश व अन्य तत्व गौण पड़ जाते हैं। इस नाटक को देखते हुए मुझे वामन केंद्रे याद आते रहे। और एक बात- यह नाटक और इस तरह के दूसरे अहिंदीभाषी नाटक हिन्दी थिएटरवालों को अवश्य देखना चाहिए।
   

Wednesday, May 30, 2012

केवल मंच तक ही सीमित नहीं है रंगमंच – विभा रानी

रंगमंच तथा विभिन्न कला माध्यमों को समर्पित सांस्कृतिक दल "दस्तक" का ब्लॉग है- 'मंडली'। पुंज प्रकाश इसे अपने प्रकाश से प्रकाशित कराते हैं। इस बार पढिए इसमें मेरा साक्षात्कार।

Tuesday, May 29, 2012

केवल मंच तक ही सीमित नहीं है रंगमंच – विभा रानी


रंगकर्मी विभा रानी से पुंज प्रकाश की संचार तकनीक के माध्यम से की गई बातचीत |

विभा रानी 
बहुत सोचने पर भी कुछ समझ में नहीं आ रहा कि कहाँ से शुरू किया जाये | शायद इसका कारण ये है कि आपके बारे में मेरी जानकारी एकदम नहीं के बराबर है |यह रंगमंच की विडम्बना से ज़्यादा मेरी सीमा माना जाय | अगर संभव हो तो आप पहले अपने बारे में बताइए | हो सकता है वहीँ से बात निकलती चली जाये |
बताइयेकहाँ से शुरू करूँ?1987 से रंगमंच मे काम करना शुरू किया दिल्ली में आर एस विकल के निर्देशन में उनके थिएटर फेस्टिवल में। दुलारीबाई , सावधान पुरुरवापोस्टरकसाईबाड़ा आदि नाटकों में अभिनय किया। उन्हीं की टेली फिल्म “चिट्ठी” में काम किया। फिर एक्टिव  रंगमंच से पारिवारिक कारणों से किनारे रही। वर्ष 2007 में पुनः एक्टिव थिएटर में आई। इस बीच नाटक लिखे। “दूसरा आदमी दूसारी औरत” को 2002 के भारंगम में खेला गयाराजेन्द्र गुप्ता एवं सीमा बिशवास के द्वारा। अब यह नाटक रास कला मंचहिसार द्वारा खेला जा रहा है। 2010 में यह नाटक किताबघर प्रकाशन से छपकर आया। एक नाटक 'पीर पराई' 2004 से विवेचनाजबलपुर द्वारा खेला जा रहा है। दो नाटक 'आओ तनिक प्रेम करेंऔर 'अगले जनम मोहे बिटिया न कीजोंको 2005 का “मोहन राकेश सम्मान” मिल चुका है और ये दोनों भी किताबघर प्रकाशन से छपकर आया है।  'अगले जनम मोहे बिटिया न कीजोंको मार्च में पटना में सनत कुमार के ग्रुप ने मंचित किया। 'आओ तनिक प्रेम करेंको सतीश आनंद ने 2005 में अभिनीत व निर्देशित किया। 2007 में फिर से आर एस विकल के निर्देशन में “मी। जिन्ना” से अभिनय की शुरुआत की। इसमें फातिमा जिन्ना की भूमिका करती हूँ। 2007 में फिनलैंड में अंग्रेज़ी नाटक 'Life is not a Dream' से एकपात्रीय नाटकों के मंचन की शुरुआत की। एकपात्रीय नाटक बहुत चुनौतीपूर्ण हैं और इसके मंचन की बहुत तकलीफें और समस्याएँ हैं। सबसे बड़ी समस्या तो यही है की इसे अभी तक थिएटर की मुख्यधारा में शामिल नहीं किया गया है। बाल साहित्य की तरह यह विधा भी थिएटर जगत में उपेक्षित है। मैंने इसे एक चुनौती की तरह लिया और इसे आंदोलन बनाकर आगे बढ़ी। इसका नतीजा आया और अब लोग न केवक एकपात्रीय नाटक कर रहे हैंबल्कि इसके फेस्टिवल भी हो रहे हैं। अबतक मैं 6 एकपात्रीय नाटक कर चुकी हूँ और इसके प्रदर्शन देश की प्रमुख जगहों के साथ-साथ विदेशों में भी हुए हैं और बहुत सराहे गए हैं। 'रंग जीवन' के दर्शन के साथ मैं समाज के वंचित और मुख्यधारा के लोगों के साथ हस्तक्षेप करती हूँ। जेल के बंदियों के साथ थिएटर वर्क शॉप करती हूँ लगातार। थिएटर को केवल मंच तक सीमित न रखकर इसे जीवन के हर क्षेत्र में लाते हुए थिएटर के माध्यम से कॉर्पोरेट ट्रेनिंग आयोजित करती हूँ। “थिएटर -एक आजीविका” पर विश्वास कायम रखते हुए अपने साथ जुड़े सभी रंगकर्मियों को उनका उचित मानधन देने की परंपरा भी हमने शुरू की है। ....ये सब चंद बातें हैंसंक्षेप में। ब्लॉग हैउस पर भी मुझे देख सकते हैं। साहित्य के लिए कथा अवार्ड,घनश्यादास सर्राफ सम्मानडॉ माहेश्वरी सिंह महेश सम्मानव्यंग्य के लिए 'व्यंग्यकार रचना सम्मानब्लॉग के लिए लाड़ली मीडिया अवार्ड और समग्र के लिए राजीव सारस्वत सम्मान और साहित्यसेवी सम्मान।

आप रंगमंच की मुख्यधारा की बात करतीं हैं | भारतीय सन्दर्भ में खासकर हिंदी प्रदेश में जहाँ रंगमंच की स्थिति आज भी अनिश्चितता वाली ही बनी हुई है और जो कुछ थोडा बहुत रंगमंच हो भी रहा है उसमें शौकिया रंगकर्मियों की भूमिका और उर्जा ज़्यादा मुखर है | इस स्थिति में रंगमंच की मुख्यधारा आप किसे मानतीं हैं या इससे आपका क्या तात्पर्य है और क्यों ? और क्या सार्थक रंगमंच के लिए किसी धारा से जुडना ज़रुरी है ?
रंगमंच की स्थिति अनिश्चितता वाली नहीं है। यह एक ठोस विधा है और लोग इसमें काम कर रहे हैं। आज थोडा बहुत रंगमंच नहींबल्कि अधिक रंगमंच हो रहा है। समय आ गया है कि अब शौकिया रंगमंच जैसे शब्द को विदा करना चाहिए। रंगमंच में समर्पण और निष्ठा या commitment की बात की जानी चाहिए। प्रतिबद्ध रंगकर्मियों की भूमिका रंगमंच की प्राणवाहिनी है |रंगमंच की मुख्यधारा रंगमंच ही है । इसका कोई विकल्प नहीं है। फिल्मटीवी आदि इनकी उपधाराएँ हो सकती हैं। सार्थक रंगमंच के लिए केवल एक ही धारा से जुडना ज़रुरी है और वह है रंगमंच के लिए अपनी प्रतिबद्धता की धारा।

थिएटर को केवल मंच तक सीमित न रखकर इसे जीवन के हर क्षेत्र में लाते हुए थिएटर के माध्यम से कॉर्पोरेट ट्रेनिंग आयोजित करती हूँ। इसे ज़रा और स्पष्ट करें |
यह केवल मिथ बना दिया गया है कि थिएटर का मतलब केवल नाचगानाडायलागबाज़ी और स्टेज पर जाकर नाटक कर लेना है। थिएटर एक कर्म है। यह व्यक्ति में सांस की तरह ही ज़रूरी है। थिएटर व्यक्ति के विकास में एक अहम भूमिका निभाता है। असल में हर व्यक्ति के भीतर थिएटर के तत्व मौजूद रहते हैंजिन्हें अपने आम जीवन में जाने- अंजाने उजागर करता चलता है। हर व्यक्ति अपने जीवन मे सफल होना चाहता है। थिएटर उसके लिए यह अवसर प्रदान करता है। थिएटर से जुड़कर वह अपने लक्ष्य तक पहुँच सकता है। मेरा आशय यह कतई नहीं है कि इसके लिए वह मंच पर के नाटक से जुड़े। वह थिएटर के एलीमेंट के सहारे अपने कार्यक्षेत्र में उत्कृष्टता हासिल करे। इन्हीं तत्वों को ध्यान में रखकर मैंने कॉर्पोरेट जगत के लिए विकासात्मक प्रशिक्षण थिएटर के माध्यम से तैयार किए हैं। यह रुचिकर है। व्यक्ति को अपनी बातें बताने और उसके हिसाब से अपने आपको तैयार करने का अवसर देता है। कॉर्पोरेट के साथ-साथ हम विकासात्मक प्रशिक्षण बच्चोंयुवाओं और समाज के सर्विस सेक्टर्सजैसेपुलिसडॉक्टर्सनरसेज़टीचर्सकामकाजी महिलाओं के लिए आदि के लिए भी करते हैं।

क्या आप रंगमंच के माद्यम से चरित्र ( व्यक्तित्व ) निर्माण / विकास का प्रशिक्षण देने की बात कर रहीं हैं ?
नहीं। रंगमंच के तत्वों के साथ व्यक्ति के विकास की बात है। हम किसी का चरित्र नहीं गढ़ते। हम व्यक्ति के भीतर व्यक्ति का विकास करने की कोशिश करते है। a person within the person की बात करते हैं। यह एक अनुभवजनित प्रशिक्षण (an experiential learning) है।
आपने कहा रंगमंच व्यक्ति कों सफल होने का अवसर प्रदान करता है ? ये सफलता -असफलता का पैमाना क्या है ?
सफलता -असफलता यह है कि व्यक्ति जिस क्षेत्र में है या जिस क्षेत्र में जाना चाहता हैउस क्षेत्र में यदि वह रंगमंच के तत्वों के साथ काम करता है तो सफल होता है। उदाहरण के लिए यदि कोई मार्केटिंग में काम करना चाहता है तो उसे मार्केटिंग के लिए कैसे लोगों से अप्रोच करनी चाहिए या कोई व्यक्ति किसी ऐसे पद पर हैजहां उसे दिन रात किसी न किसी पब्लिक स्पीच के लिए जाना पड़ता है। हमारे कार्यक्रम इन जगहों पर उसकी मदद करते हैं। उसका अपना मनदिल और दिमाग खुलता है और वह अपनी रणनीति बनाने के लिए आगे बढ़ता है। अपने काम की रणनीति ही व्यक्ति की सफलता -असफलता का पैमाना है। थिएटर एक टूल है जीवन को अपने तरीके से देखने और समझने और तदनुसार आगे बढ़ाने का। 

आपने जेल के बंदियों के साथ थिएटर वर्कशॉप किया है और कर रहीं हैं | वहाँ के कुछ अनुभव शेयर करें |कैसे काम करतीं हैं ? किन - किन चुनौतियों का समाना करना पड़ता है | वहाँ कैदी होतें हैं उनके साथ काम करना और एक रंगकर्मी के साथ काम करने में आप क्या फर्क महसूस करतीं हैं ?
मैं 2003 से जेल के बंदियों के साथ काम कर रही हूँ। पहले तो मैं बता दूँ कि वे हम-आप जैसे ही इंसान हैं। चांस की बात है कि वे वहाँ हैं। जेल अधिकारियों के अनुसार, 70-80 % कैदी इनोसेंट और एक्सीडेंटल अपराधी होते हैं। उन्हें ही अच्छा माहौल देने के लिए जेल अधिकारी तरह-तरह के कार्यक्रम करते-कराते हैं। यह उनके परिजन वेलफ़ेयर एक्टिविटी के तहत आता है। हमारा काम करने का तरीका जेल अधिकारियों को बहुत पसंद आया और जेल बंदियों को भी। उन्होंने यह कहा कि हम उन्हें इसलिए अच्छे लगते हैं कि हम उनके बारे में नही पूछते। यानीआप हमारे घाव नही कुरेदतीं। दूसरेआप यह नही कहती कि तुमने कोई पाप किया हैअब भगवान से क्षमा मांगो। आप हमें उपदेश नही पिलातीआप हमें हमारे जीवन में ले जाती है और हमें अपने साथ होने का मौका देती हैं। आप हमारे भीतर की कमजोरियों को दूर करने के प्रयास करती हैं। आप हमारे भीतर की प्रतिभा को बाहर निकालती हैं और सबसे बड़ी बात कि आप हमें इस माहौल में हंसने-मुस्कुराने और अपने को तरोताजा करने का अवसर देती हैं।
चुनौतियाँ बहुत हैं। पहली तो यह कि जेल देखने के लिए जाने को उत्सुक बहुत मिलते हैंवहाँ जाकर काम करने के लिए नहीं। बहुत से हित-मित्रों ने यह कहा कि वे हमारे साथ इसलिए जाना चाहते हैं कि उन्होने कभी जेल नही देखी है।
यह समाज सेवा है। हमें हर बार अपनी ओर से खर्च करना पड़ता है। जेल अथॉरिटी की पहली शर्त यह होती है कि उनके पास फंड नहीं है। आप अपने साधन से जो करना चाहोकरो।
लोग वहाँ जाना तो चाहते हैंपर जाने के लिए मानधन भी चाहते हैं। हम देते भी हैं। पर सभी ऐसे नही होते। सुबोध पोतदारआर एस विकल,मंजुल भारद्वाज जैसों ने बहुत बढ़िया काम किया वहाँपर नि:शुल्क।
दूसरी चुनौती है- हर बार कार्यक्रम के लिए वहाँ की प्रशासनिक प्रक्रिया से गुजरना। अफसरशाही का तो नहीक्लर्कशाही का सामना कई बार करना पड़ा।
जिद्दी हूँठान लिया तो ठान लिया। अकेली चली जाती हूँजब कोई नही साथ देताक्योंकि मुझे उनके साथ कार्यक्रम करना हैउनके साथ समय बिताना है।

उनके साथ काम करने का कोई खास संस्मरण हो तो ज़रूर बताएँ | कोई खास घटना या कोई शानदार अभिनेता या वहाँ किसी ने आपसे कुछ शेयर किया हो या कुछ और जो आप बताना चाहें ....
मैंने 'निर्मल आनंद सेतुनाम से वहाँ सीरीज चलाया प्रशिक्षण का। फिर मैंने पहली बार 307, 302  374 के सजायाफ्ता मुजरिमों के साथ 10 दिन का वर्कशॉप किया। 10वें दिन वे सब 45 मिनट के शो के साथ प्रस्तुत हुए। उस पूरे समय के उनके और मेरे अनुभव अद्भुत हैं। कार्यक्रम की समाप्ती के बाद उस ग्रुप के सबसे खतरनाक कैदी ने मुझसे यह कहा कि 'अबतक मैं आपको मैडम कहता थाआज से आपको सिस्टर कहूँगा। एक ने कहा कि ‘अबतक तो हम लॉकअप के बाद नाटक के बारे में ही सोचते थेअब यह सब बंद हो जाएगा और बेवजह की बातें दिमाग में आएंगीं।‘ राणे नामका कैदी था। उसकी एक्टिंग से सभी अभिभूत हो गए। अजित नामका एक लड़का था। सभी लीड रोल लेने से उसने मना कर दिया और साइड के नामालूम से रोल लेता रहा। उन्हीं भूमिकाओं में उसके एक्शन की डिटेलिंग देखते ही बनती थी।
सबसे बड़ी दिक्कत वहाँ के कड़े प्रतिबंध की है। आप उनसे खुल कर बात नही कर सकते। आप अपनी रिपोर्ट प्रकाशित नही कर सकते। आप उनकी फोटो नही ले सकते। आप प्रेसमीडियालेखक आदि को नही ले जा सकते। मेरा हर बार जेल अधिकारियों से यही कहना रहता है कि आपकी नकारात्मक बातें तो लोग खोज खाजकर छापते ही हैं। अब आप अपनी अच्छी बातेंअच्छे प्रयासों को सामने आने दीजिये ताकि जेल के प्रति लोगों की नकारात्मकता दूर हो। वे चाहते भी हैंमगर ऊपरवाले उन्हें इसकी आज़ादी नही देते।
इसी 10 दिवसीय वर्कशॉप से संबन्धित घटना है। इतनी बड़ी वर्कशॉपवह भी जेल के बंदियों की| मैं झिझक रही थी। मैंने कई लोगों से बातें कीं। सभी ने कहा कि यह बड़ा इंटरेस्टिंग हैवे जरूर इसे जॉइन करना चाहेंगे। बाद में सभी मुकर लिए कुछ ना कुछ कहते हुए। सभी के भीतर यही था कि ठाणे तक का लंबा सफर- दिन भर निकाल जाएगा और मिलेगा कुछ भी नहीं। एक ने अंतत: हामी भी भारी। बड़ी बड़ी योजनाएँ भी बताईं। हमने उनपर भी सोचना शुरू कर दिया। पर ऐन एक दिन पहले शूटिंग हैकहकर वे निकल लिए। अबअब या तो मैं वर्कशॉप कैसिल कर दूँ या अकेले लूँ। रिजल्ट ओरिएटेड हूँसो अकेले जुट गई। टैगोर की पंक्ति मेरी हिम्मत बहुत बँधाती है- ‘जोड़ी तोर डाक शुने केओ ना आशेटोबे एकला चलो रे।‘ सो अकेले चल पड़ी। बाद में कुछ नॉन थिएट्रिकल लोग- जुड़े। अंग्रेज़ी के एक अखबार ने बहुत अच्छी कवरेज दी। 
डेजी नाम की एक कैदी थी इंगलैंड की। बहुत छोटीपर बहुत ज़हीन। हमें देखते ही भागी भागी आती थी। अँग्रेजी उसकी अच्छी थी तो बाकी विदेशी कैदियों की भी बातें मुझे बताती थी। उसने एक बार कहा था कि आप गर्मी के मौसम में हर दिन आइयेगर्मी में कोर्ट बंद रहते हैं। कोई कार्रवाई नही होती हैउसका अवसाद। फिर कोर्ट बंद रहने से उसकी चहल-पहल खत्म और ऊपर से गर्मी। सब आपस में ही बेवजह लड़ती हैं। आपके आने से इन सबको इन सबसे तनिक राहत मिलेगी।
वह खुद बहुत अच्छा कामपेंटिंग करती थी। उसने हमारे वर्कशॉप में एक पेंटिंग बनाई और उसे अपने पिता को भेजने के लिए रख लिया। पर पिता तक पेंटिंग पहुँचने से पहले ही उनका देहांत हो गया। रमेश ओवले नामका कैदी बहुत बढ़िया पेंटर था। हमने उसे पुरस्कृत भी किया था। एक और कैदी था मोरे- वार्ली पेंटिंग का। हमने एक बार अपनी वार्ली पेंटिंग वर्कशॉप उसी से करवाई। उसके उत्साह की कोई सीमा नही थी। वह बोला कि मैं डीआईजी मैडम से कहूँगा कि मैं अपनी यह कला अपने सभी बंदी भाइयों को सिखाना चाहता हूँ।

विभा जी अबतक आप एकपात्रीय नाटक कर चुकी हूँ और आप इसे एक मूवमेंट की तरह भी लेतीं हैं आप इन नाटकों के बारे में कुछ बताएँ |साथ ही ये भी बताएँ की आपने एकल नाटक का ही करने का चयन क्यों किया तथा एकल अभिनय के लिए विषय का चयन करते वक्त किन - किन बातों का ध्यान रखतीं हैं कैसे उसकी रचना प्रकिया से गुज़रतीं है ज़ाहिर है हर एकल नाटक का अपना अलग अनुभव हुआ होगा |
मैंने एकपात्रीय नाटक करने का निर्णय इसलिए लिया क्योंकि एक तो हिन्दी थिएटर जगत में इसे लेकर बड़ी उत्सुकता नही थी। हर ग्रुपहर कलाकार एक एकपात्रीय नाटक भी कर लेता है। मैंने इस ज़रूरत को महसूस किया और एकपात्रीय नाटक को मुख्य धारा से जोड़ने के लिए एकपात्रीय नाटक पर खुद को केन्द्रित किया और इसे एक आंदोलन की तरह लिया। दूसरेएकपात्रीय नाटक अधिक चुनौतीपूर्ण हैऔर अधिक चुनौतीपूर्ण काम करना शायद आदत बन चुकी है। इसी चुनौती के तहत जेल में काम करना शुरू किया था। इसी चुनौती के तहत 2007 से एकपात्रीय नाटक कर रही हूँ। ये नाटक हैं- ‘लाइफ इज नॉट आ ड्रीम’, ‘बालचन्दा’, ‘मैं कृष्णा कृष्ण की’, ‘एक नई मेनका’, बिम्ब-प्रतिबिंब’,‘भिखारिन।‘ और भी नाटक हैंजो अभी लिखे हुए हैं- नागार्जुन की कविताओं पर आधारित ‘चंदू मैंने सपना देखा’, लोक कथाओं पर आधारित,‘रोने की साध’, ‘सामा-चकेबा। पिछले साल 3 और इस साल अबतक 1 नाटक तैयार कर चुकी हूँ।
मेरे सभी नाटक एक ना एक मुद्दे से जुड़े हुए हैं। कह सकते हैं कि महिला प्रधान नाटक है। लेकिनइसमें केवल महिलाओं की ही बातें नही कही गई हैं। पुरुष के श्वेत-श्याम पक्ष दोनों को उजागर किया गया है। समाज और यूथ पर मेरा दृढ़ विश्वास है। उनके प्रति का विश्वास झलकता है मेरे नाटकों में।
एकल अभिनय के लिए विषय का चयन करते वक्त ध्यान रखना होता है कि विषयतकनीककथ्यशैलीसंगीतगीत आदि में से किसी की भी पुनरावृत्ति ना हो। सबसे पहले स्क्रिप्ट पर बहुत काम करती हूँ। इतनी बार कि उतने में तो हर बार एक उपन्यास लिख लिया जाए। शायद एक कारण यह है कि मैं स्वयं लेखक हूइसलिए लेखन के महत्व को समझती हूँ।
हर एकल नाटक का अपना अपना अनुभव है। इसकी रचना प्रकिया एक साथ ही आनंददाई और कष्टदाई दोनों है। आनंद कि आप थिएटर कर रहे हैं। कष्ट कि इसके लेखन से लेकर इसके हर पक्ष को मुझे देखना होता है। तब लगता है कि कोई इसमें मेरा सहायक होता। मेरे रिहर्सल को देखनेवाला मेरे डायरेक्टर के अलावा और कोई नही होता। तो लोगों के फीडबैक नही मिल पाते। यह भी एक चुनौती है। एक तरीके से ठीक भी लगता हैक्योंकि आप सभी को एक साथ संतुष्ट नही कर सकते। नाटक की प्रक्रिया एक सम्पूर्ण प्रक्रिया है। इसके सभी पक्ष को देखना होता है। ‘मैं कृष्णा कृष्ण की’ द्रौपदी और कृष्ण के सखा भाव को लेकर लिखा नाटक है। मैं इसे आज के समय- काल,परिस्थिति से जोड़ना चाहती थी। तभी मेरे इस नाटक का महत्व होतावरना कौन द्रौपदी के बारे में नही जानतामैंने महाभारत पढ़ी और फिर लिखा। द्रौपदी के किरदार में एक ग्रेस लाने के लिए उसके एक एक हाव-भाव पर ध्यान दिया। ‘एक नई मेनका’ में मेनका के मूल नर्तकी के स्वरूप को ध्यान में रखने के लिए भरतनाट्यम और करनाटकी संगीत सीखा। चेन्नई में ये दोनों विधाएँ सुगमता से उपलब्ध हैं। इसमें भी विश्वामित्र पर बहुत काम किया। मिथक भले कहे कि विश्वामित्र मेनका को देखकर ताप भ्रष्ट हो गए। लेकिन मैं यह नहीं मानती कि यह काम इतनी सुगमता से हो गया होगा। आखिर ब्रह्मा के समानान्तर एक नई सृष्टि रचनेवाला इतना कमजोर तो कतई नहीं हो सकता कि वह अपने सामने एक स्त्री को देख कर फिसल जाए। उनके और मेनका दोनों के द्वंद्व को भरपूर तरीके से उजागर करने की कोशिश की। ‘भिखारिन’ करते समय एक साथ बांग्ला और शुद्ध हिन्दी टोन बनाए रखने और एक ही समय में एक पुरुष और एक स्त्री चरित्र को निभाने के लिए भाषा और देह व आवाज पर बहुत काम किया। ‘बिम्ब-प्रतिबिंब’ डेढ़ घंटे का नाटक है। 3 मुख्य पात्र हैं और लगभग 13-14 अन्य सह पात्र। तीनों मुख्य पत्रों के अलग अलग हाव-भाव,बॉडी लैंगवेज़बोलने के तौर तरीके के साथ साथ अन्य सह पात्रों के किरदारों को उनकी अपनी खुसूसियत के साथ प्रस्तुत करना। सबसे पहले डेढ़ घंटे तक दर्शकों को बांधे रखना। और सभी नाटको की पूरी स्क्रिप्ट को याद करके रखना। बहुत डराता है नाटक। हर बार के शो से पहले डरी रहती हूँ- पहले शो की तरह ही। यही डरचुनौतीसृजनशीलता बहुत आनंद देता है नाटक और जीने की ऊर्जा भी।
विभा रानी से मोबाईल नंबर 09444914237 या gonujha.jha@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है | 

Saturday, January 30, 2010

थिएटर की भूमिका

आज दिनांक 30 जनवरी, 2010 के "हिदुस्तान" पटना में छपा आलेख.

Monday, November 2, 2009

सकुबाई से सफाई घर की भी, दिल की भी

http://mohallalive.com/2009/11/01/review-of-drama-sakubai/

नाटक में आप जितने भी प्रयोग कर लें, पीरियड ड्रामा ले आएं, ड्रामे के माध्यम से आप राग रंग, नट भाव, उपमा, उपमान की बातें बताएं, सच तो यह है कि आम आदमी नाटक के उन्हीं हिस्सों से जुड़ पाता है, जिसके साथ वह अपना जीवन देख पाता है। पौराणिक आख्यानों में भी वह वहीं तक पहुंचता है, जहां उसे आज का अपना समाज, परिवेश दिखाई देता है। ऐसे में सामजिक या यों कहें कि घरेलू पृष्ठभूमि पर खेले गये नाटक से दर्शक तुरंत अपना नाता जोड़ लेते हैं। एकजुट थिएटर ग्रुप प्रस्तुत नादिरा ज़हीर बब्बर लिखित व निर्देशित नाटक “सकुबाई” नाटक एक ऐसी ही रचना है, जिसमें घर-घर काम करनेवाली बाई सकुबाई के माध्यम से समाज में एक साथ ही जी रहे नाना वर्गों के नाना जीवन को देखे जाने की कोशिश है। साथ ही साथ खुद उसके अपने जीवन की भी। एक आम मध्य या उच्च वर्ग और तथाकथित निम्न वर्ग में कोई फर्क़ नहीं रह जाता, जब मामला प्रेम, सेक्स, घरेलू हिंसा, बलात्कार, आपसी जलन आदि पर आता है, बल्कि कई बार तो ये तथाकथित निम्न वर्ग के लोग इन संभ्रांत लोगों पर भारी पड़ जाते हैं। क्या फर्क़ रह जाता है सकुबाई या उसकी मालकिन में कि दोनों के ही पति के विवाहेतर संबंध हैं। विरोध करने पर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर मालकिन भी पति के हाथों बुरी तरह पिटती है, मगर बच्चों की खातिर घर नहीं छोड़ पाती। मगर, फर्क़ है। सकुबाई के पति के संबंध जग जाहिर हैं। मालकिन के पति के संबंध सामाजिकता की खोल में छुपा। नौकरानी हो कर भी सकुबाई इतनी ईमानदार है कि मालकिन अपना पूरा घर उसके ऊपर छोड़ देती है, जबकि उसी मालकिन की करोड़पति सहेली मालकिन के पर्स से उसके हीरे की अंगूठी चुरा लेती है। मुंबई में आपको ऐसी ईमानदार बाइयों की फौज़ मिलेगी। बल्कि यूं कहें कि जिस तरह हर सफल पुरुष के पीछे किसी स्त्री का हाथ होता है, उसी तरह हर सफल औरत के पीछे उसकी बाई का हाथ होता है।
एकपात्रीय नाटक को कुशलतापूर्वक डेढ़ घंटे तक खींच ले जाना किसी समर्थ कलाकार की ही खासियत है और यह विशेषता निस्संदेह सकुबाई की भूमिका में सरिता जोशी की है। सरिता जोशी गुजराती थिएटर और फिल्म की मशहूर और बड़ी कुशल, इसलिए सफल अभिनेत्री हैं। वे लगभग 45 सालों से भी अधिक समय से अभिनय के क्षेत्र में हैं। एकपात्रीय अभिनय में सब कुछ उसी पात्र को दर्शाना होता है और सरिता जोशी ने मालिक से लेकर अपने पति और बूढ़ी मां की भी भूमिका बड़ी कुशलता से निभायी है। तदनुसार आवाज़, शारीरिक भंगिमा, चेहरे पर भाव। हालांकि उम्र अपनी छाप उन पर छोड़ने लगी है। बीच-बीच में वे हांफ जाती रहीं, संवाद भी लगा कि कुछ भूलती सी रहीं। मगर यह उनकी नाट्यकुशलता ही थी कि इसे उन्होंने ज़ाहिर नहीं होने दिया।
यह नाटक 1999 में पृथ्वी फेस्टिवल में ओपन हुआ था। तब से इस नाटक के कई शो हो चुके हैं। नादिरा बब्बर के यह भी पुराने नाटकों मे से एक है, जिसमें उनकी पुरानी मेहनत व प्रतिबद्धता स्पष्ट दिखाई देती है। सेट प्रभार, स्टेज और प्रोडक्शन सभी में हनीफ पटनी ने अपनी कुशलता दिखायी है। फिर भी, नाटक के दस साल हो जाने के कारण सेट अब पुराने हो चुके हैं, जो स्टेज पर भी दिखते हैं। प्रकाश व्यवस्था नाटक के अनुरूप थी और संगीत संचालन एक्टर को अभिनय के साथ-साथ डांस करने व अन्य हाव-भाव के लिए पर्याप्त स्पेस देता है। “दयाशंकर की डायरी” की तरह ही यह नाटक आपको अपने से जोड़ कर रखता है, बल्कि कुछ अधिक ही, क्योंकि आखिरकार यह एक महिला की लिखी, महिला की ज़ुबानी, महिला की गाथा है, और महिला की कहानी में प्रताड़णा के भाव तनिक अधिक तो रहते ही हैं, जिसमें व्यक्ति और परिवेश दोनों की ही भूमिका रहती है। इसलिए यह नाटक हो सकता है आपको “दयाशंकर की डायरी” से अधिक अपील करे, जैसा कि इसने यहां के दर्शकों को किया था।

Sunday, October 25, 2009

“दयाशंकर” की डायरी देखी है? नहीं तो अब देखिए

http://janatantra।com/2009/10/25/review-of-dayashankar-ki-diary/

http://www.artnewsweekly.com/substory.aspx?MSectionId=1&left=1&SectionId=31&storyID=102#

जब भी कोई नाटक किया जाता है तो उसे एक टीम के रूप में ही तैयार किया जाता है. मगर कई बार हो यह जाता है कि एक नाटक शुद्ध रूप से निर्देशक का नाटक हो जाता है तो कई बार वह एक्टर का हो कर रह जाता है. एकजुट थिएटर ग्रुप, मुंबई द्वारा प्रस्तुत नाटक “दयाशंकर की डायरी” देखते समय यही लगा कि यह नाटक निर्देशक और टीम से निकल कर एक्टर के प्लेट्फॉर्म पर आ कर खड़ा हो गया है. “दयाशंकर की डायरी” नाम से लगता है कि डायरी के पन्नों में दर्ज किस्सों की परतें खुलेंगी, मगर यह डायरी से अलग दयाशंकर की आत्मकथा कहने लगती है.
इस एक पात्रीय नाटक के कलाकार हैं जाने माने कलाकार आशीष विद्यार्थी. सपना देख रहे एक आम आदमी की त्रासदी उसे पागलपन से लेकर मौत के मुंह तक धकेल देती है और यह स्थिति समाज से यह सवाल पूछती है कि क्या आम आदमी को आज सपने देखने की भी इज़ाज़त नहीं है? इस त्रासदी पर आप मायूस हो सकते हैं, मगर आज की हक़ीक़त यही है. जी हां, आज आम आदमी सपने से भी महरूम कर दिया गया है. उसे कोई हक़ नहीं कि वह सपने देखे. और अगर वह देखने की जुर्रत करता है तो दयाशंकर की तरह ही अपने हश्र के लिए तैयार रहे. इस आम आदमी की तरह ही एक दूसरे आम आदमी के पास इतनी फुर्सत नहीं है कि वह दयाशंकर जैसे आम आदमी के हालात को, उसके मनोभाव को, उसके सपने को समझे और तदनुसार उसके साथ व्यवहार करे. आज आम आदमी में भी एक वर्ग ऐसे आम आदमी की है जो इन सबके मज़े लेता है और पान की पीक की तरह उस पर थूक कर चला जाता है.
नादिरा ज़हीर बब्बर ने इसकी स्क्रिप्ट भी लिखी है और इसका निर्देशन भी किया है. “दयाशंकर की डायरी” नाटक 1998 में नेहरु सेंटर थिएटर फेस्टिवल में ओपन किया गया था और अबतक देश व विदेशों में इसके लगभग 150 से 200 तक शो हो चुके हैं. इस नाटक को तैयार करने में नादिरा जी की मेहनत भी झलकती है और आशीष विद्यार्थी की भी. एकपात्रीय नाटक गहरे धैर्य, समझ, सम्वेदनशीलता, कलाकार की अभिनय क्षमता के साथ साथ शो को अपेक्षित समय तक ले जाने की कुशलता की भी मांग करता है. आशीष ने इस सभी का परिचय इसमें देने की कोशिश की है और उसमें सफल भी हुए हैं.
आशीष राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पास आउट हैं. अभिनय पर उनकी मास्टरी है. दिल्ली में उन्होंने पीयूष मिश्रा और एन के शर्मा के ‘एक्ट1” के साथ कई नाटक किए. मुंबई में भी अपने संघर्ष के दिनों में वे पृथ्वी फेस्टिवल में और वैसे भी काफी प्लेटफॉर्म पर शो किए. फिर आम एनएसडीयन की तरह वे भी फिल्मों का रुख कर गए. ‘द्रोहकाल” और “इस रात की सुबह नहीं” से उन्हें अधिक पहचान मिली. उन्हें नेशनल अवार्ड भी मिला है. 2009 की उनकी फिल्में हैं, ‘रेड अलर्ट’, रंगरसिया’ और ‘लाहौर’. वे अबतक 64 -65 फिल्में कर चुके हैं, जिनमें नकारात्मक भूमिकाएं उन्हें अधिक मिली है. पता नहीं, मुंबई की हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का क्या गणित है कि उत्तर भारत से आनेवाले अधिकतर कलाकारों को निगेटिव भूमिकाएं ही मिलती हैं, चाहे वे आशुतोष राणा हों या गोविंद नामदेव या मुकेश तिवारी या अखिलेंद्र मिश्र या वीरेंद्र सक्सेना. आशीष समेत ये सभी बेहतरीन कलाकार हैं, मगर इंडस्ट्री को शायद ऐसे ज़हीन कलाकारों की या तो ज़रूरत नहीं या उसको इन सबका उपयोग करने की कला ही नहीं आती. फिर भी, सभी फिल्मों का रुख करते हैं. क्यों? इस पर फिर कभी.
पूरे नाटक में आशीष एक कुशल अभिनेता की तरह दिखे, लेकिन साथ ही, कहीं कहीं वे चूके भी. खासकर लड़की या महिला का अभिनय करते वक़्त. लडकियां सभी समय एकदम नाजुक, कोमलांगी नहीं रहतीं. पर यह हमारी साइकी है. सम्वाद अदायगी बहुत अच्छी थी, मगर भदेस बोली के चक्कर में वे पूर्वी उत्तर प्रदेश के बदले कभी कभी हरियाणा के लग जा रहे थे. प्रकाश व्यवस्था कहीं कहीं तो बेहद सटीक थी. नादिरा जी के नाटकों में प्रकाश पर काफी ध्यान दिया जाता है, एक साथ वे कई कई लाइट्स के प्रयोग करती हैं. संगीत थोडा लाउड था, जो नाटक की गम्भीरता के बदले उसे कहीं कहीं तमाशाई फील दे रहा था.
मुंबई के थिएटर का एक पक्ष यह भी हो गया है कि स्क्रिप्ट में लाफ्टर्स डाले जाने लगे हैं. इससे दर्शकों को फौरी तौर पर सुकून तो मिल जाता है, मगर उसी पल वे विषय की गम्भीरता से भी हट जाते हैं और फिर विषय की गम्भीरता तक पहुंचने में उन्हें जितना वक़्त लगता है, उतने में नाटक बहुत आगे निकल जाता है और नाटक किताब तो है नहीं कि जहां से छूट गया, वहां से आप दुबारा पकड लें. और थिएटर भी केवल मनोरंजन नहीं है कि उसे बस उसी के खांचे में देखा जाता रहे.
नादिरा जी के पूर्ववर्ती नाटकों की वह गम्भीरता और मेहनत इस नाटक में दिखती है, जिस गम्भीरता और मेहनत ने उन्हें मुंबई के थिएटर परिदृश्य में एक अलग मुकाम दिलाया है. दयाशंकर जैसे व्यक्ति की एक त्रासदी यह भी है कि वह दयाशंकर है. उसकी यह त्रासदी बाद में भी बनी रहेगी. मान लीजिए कि दयाशंकर को उसके एमएलएसाहब की बेटी स्वीटी मिल भी जाती तो क्या वह उसके साथ विवाह करके सुखी और सहज रह लेता? क्या वह एक नए फ्रस्ट्रेशन का शिकार नहीं होता कि उसकी बीबी उसके हिसाब से नहीं रहती कि वह अपने बाप के पद और पैसे के मद में है कि उसे उसकी और उसके पोजीशन की परवाह ही नही है, जैसा कि आम जीवन में होता है या ‘राजा हिंदुस्तानी’ तक की फिल्मों में यह अहम दिखता रह्ता है? दयाशंकर जैसे लोग अपनी ही त्रासदियों के जाल में घिरे रहने को अभिशप्त होते हैं. यह नाटक का दूसरा पक्ष है. इसे अलग कर दें तो “दयाशंकर की डायरी” हो सकता है कि आपमें से कइयों को अपने जीवन के करीब लगे, बेहद क़रीब.

Saturday, October 10, 2009

राजा होना सुखी होने का मार्ग नहीं है, कदापि! - चाणक्य

http://www.hindimedia.in/index.php?option=com_content&task=view&id=8414&Itemid=202
http://reporterspage.com/miscellaneous/23-23
http://mohallalive.com/2009/10/10/nehru-centre-theatre-festival-6th-day/

नेहरु सेंटर थिएटर फेस्टिवल की अगली प्रस्तुति थी मनोज जोशी कृत नाटक- चाणक्य. नीति और राजनीति के बात आने पर कौटिल्य चाणक्य का नाम ना आये, यह असम्भव है. राजनीति और छल प्रपंच राजनीत का अभिन्न हिस्सा है. यह राजनीति जब व्यक्ति से उठकर समाज की ओर जाती है तो यह हितकारी होती है. इसी हित की साधना में, आर्यावर्त को एक सूत्र में पिरोने का सपना देखा था चाणक्य ने. चाणक्य के चरित्र का तेज, तप, उसकी निष्ठा, उसकी ज़िद, उसकी लगन, उसका आत्माभिमान एक बारगी ऋषि विश्वामित्र की याद दिलाता है. ज़ाहिर है कि ऐसे चरित्र, जिसमें परस्पर विवाद हो, लोगों को लुभाता है और अपने अपने क्षेत्र में उस पर काम करने के लिए उकसाता है.
चाणक्य भी एक ऐसा ही चरित्र है, जिसपर मशहूर अभिनेता मनोज जोशी ने नाटक की विधा में काम किया है. इससे पहले हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक मुद्राराक्षस ने चाणक्य पर लिखा था. जयशँकर प्रसाद के चन्द्रगुप्त नाटक में चाणक्य के चरित्र को उकेरा गया है. डॉ. चन्द्र प्रकाश द्विवेदी अपना सुप्रसिद्ध टीवी सीरियल "चाणक्य" बना ही चुके हैं. इस बीच एक और नाटक आया "चाणक्य शास्त्र" जिसमें राजेन्द्र गुप्ता ने चाणक्य की भूमिका निभाई है.
जो बडा अभिनेता होता है, या जिसका प्रोडक्शन होता है, वह सामान्यत: केन्द्रीय चरित्र निभाता है. डॉ. चन्द्र प्रकाश द्विवेदी ने भी स्वयं चाणक्य की भूमिका निभाई थी. लिहाज़ा मनोज जोशी ने भी अपने इस नाटक में चाणक्य का केन्द्रीय चरित्र निभाया है. पीरियड ड्रामा करते समय काल, पात्र, वेशभूषा, भाषा आदि का बडा ध्यान रखना होता है. इस नाटक में भी इसे निभाने की पूरी कोशिश की गई है. पीरियड ड्रामा में एक और बन्धन होता है, पात्रों की बहुतायत. चाणक्य में भी है. लेकिन नाटक में एक पात्र से कई- कई चरित्र करवा लेने की भी सुविधा रहती है, जिसका लाभ इस नाटक में भी लिया गया है. संगीत कई जगह सीरियल "चाणक्य" की याद दिलाता रहा. यह भी एक तरीके से अच्छा था, क्योंकि डॉ. द्विवेदी पात्र, पीरियड और उसके डिटेल्स आदि में बडी गहराई तक जाते हैं. उनके हाथों निकली चीज़ों में प्रामाणिकता अधिक रहती है. इस लिहाज़ से इस नाटक के संगीत और वातावरण में एक प्रामाणिकता और भी जुड जाती है.
मुद्राराक्षस ने अपने नाटक में महामात्य राक्षस की महिमा का गुणगान किया है और यह बताया है कि महामात्य राक्षस के सहयोग के बिना मगध कितना अधूरा है. इस नाटक में भी महामात्य राक्षस को महिमामंडित किया गया है. चाणक्य का सच और हमारे आज के सच में अभी भी कोई अंतर नही आया है. जगह जगह पर चाणक्य के सम्वाद इस स्थिति को उजागर कर रहे थे. राजा होना सुखी होने क मार्ग नहीं है, कदापि." यही स्थिति आज भी है, जहां हर कोई सत्ता में आना इसलिए चाहता है ताकि वह उसका उपभोग कर सके.
इस नाटक में मनोज जोशी ने एक बहुत ही अच्छी बात की और वह यह कि उन्होंने भाषा के साथ कोई समझौता नहीं किया है. लोग समझ सकें, इसलिए आज की चलताऊ हिन्दी देने का प्रयास उन्होंने कतई नहीं किया है, जो इस पीरियड ड्रामा की बहुत बडी विशेषता है. भाषा की कठिनता के कारण डॉ. द्विवेदी की भी बडी आलोचना हुई थी, मगर बाद में लोग उनके वातायन को समझने लगे थे. यहां भी लोग समझ रहे थे और समझ कर तालियां बजा रहे थे. इसलिए यह तो अब लोग ना कहें कि हिन्दी बडी कठिन है.
परंतु, भाषा पर जितना काम करना चाहिए था, वह नहीं हुआ है. स्क्रिप्ट पर मराठी गुजराती वाक्य-विन्यास का इतना अधिक प्रभाव है कि वह हिन्दी के प्रवाह को तोडता है. औरस संतान को "अनौरस", सन्धि-विच्छेद को सन्धि-रोह", विस्मृत को विस्मरित, निर्बुद्धिपन या बुद्धिहीनता को निर्बुद्धिपन, विनती को विनंति, दुन्दुभी को तुतुम्भी आदि कहना रस भंग करता था. कुछ और बानगी- "कृष्ण के पास समय, सैन्य्, शक्ति अमर्याद (असीमित के अर्थ में) थे. "नाशवंत मानव के प्रति", "आपका वैधव्य का सम्मान कीजिए. आप अपना मस्तक ढंक लीजिए.". "राजदंड का स्वीकार कीजिए". "मैं मेरे प्रतिशोध का उपाय कर लूंगा.". "स्वार्थ ही राजाओं का चालकमान था." मनोज जोशी जी से विनम्र आग्रह कि वे हिन्दी के किसी अच्छे जानकार से स्क्रिप्ट को दिखवा लें. उनसे यह भी आग्रह कि हिन्दी बुलवाते समय पात्रों के उच्चारण पर ध्यान दें. रीती, नीती, पाटलीपुत्र, चाणक्या तो सामांन्य बाते हैं. उच्चारण की मराठी, गुजराती परुषता और हर अक्षर पर बल दे कर बोलना नाटक के आनन्द में व्यवधान उत्पन्न करता है. फिल्म और टीवीवाले तो इन सब पर ध्यान नहीं ही देते, किंतु नाटककार को तो इस पर ध्यान देना होगा, क्योंकि नाटक इस सबसे अलग विधा है और यह दर्शकों के साथ उसी समय अपना सम्बन्ध बना लेता है.
(पुन: नाटक देखने के लिए पूरा हॉल भरा हुआ था. यह सुखद था, मगर यह मलयाली नाटक के निर्देशक सुवीरन की इस बात की पुष्टि भी कर रहा था कि अब वहां भी लोग मोहनलाल जैसे अभिनेताओं को लेने की कोशिश कर रहे हैं. नाटक का ग्लैमर की चपेट में आ जाना शुद्ध थिएटर को नुक्सान तो कर ही रहा है, गुमनाम, मगर प्रतिभावान कलाकरों की जगह को भी घेरे जा रहा है. इसका एक उदाहरण तो यही था कि थिएटर की भाषा में किए गए मलयाली नाटक को देखने के लिए हॉल लगभग खाली था. इस नाटक को प्रायोजक भी मिले हुए थे. कितना सुखद हो कि ऐसे प्रायोजक छोटे छोटे ग्रुपों को भी मिले. उन्हें इसकी अधिक आवश्यकता है.)

Saturday, May 3, 2008

१ मई को सलाम!

१ मई छाम्माक्छाल्लो के लिए बहुत मायने रखता है। विश्व मज़दूर दिवस और महाराष्ट्र दिवस के अलावे भी यह उसके लिए अहम् है। १ मई,2001 को ही उसने अपनी संस्था 'अवितोको' की आधार शिला रखी. आज अवितोको ७ साल का हो गया। अवितोको का जन्म उसके ३रे बच्चे कि तरह ही है। न कोई शोर- शराबा, न कोई आडम्बर, बस मन ही मन एक संकल्प लिया उअर अवितोको का काम शुरू हो गया। इसके बाद लगातार -काम और काम- सामान्य जन से लेकर विशेष वर्ग के लोगों तक, बच्चों से लेकर वृद्धाश्रम मी रह रहे तक। मानसिक रूप से बाधित बच्चों से लेकर जेल में रह रहे बंदियों और उनके बच्चों तक। कला, थिएटर, साहित्य, संस्कृति के माध्यम से। जेल के बच्चे कहते हैं, वे डाक्टर बनेगे, हीरों बनेगी। जेल के बंदी कविताओं के माध्यम से अपने मन की बातें कहते रहे। उनकी कवितायें, हंस, ज्ञानोदय, कादम्बिनी, वागार्थ आदि में प्रकाशित हुई। उनके बनाए चित्र केवल चित्र नहीं, उंकी अभिव्यक्ति के माध्यम रहे हैं। उनके द्वारा खेले गए नाटक में उनके जीवन की dhadakan रही है। उनकी कला kritiyaan अपने जीवन का सुंदर dastaavez हैं। अवितोको का जीवन दर्शन ही है- रंग जीवन, yaanii aart and थिएटर फार all। और ऐसे में ये sabhii sahabhaagii अपने काम से अवितोको के लिए एक naii cunautii लेकर आते रहे हैं। इसी की एक kadii मी नया जुदा है अवितोको के naatakon का pradarshaan। 'अए priye तेरे लिए' usaka pahala नाटक thaa और अभी doosaraa नाटक चल रहा hay- 'Life is not a Dream'। २००७ में finlainD में isakii pahalii प्रस्तुति के बाद mumbai में इसके manchan हुए और अब २९ aprail को इसे rayapur में खेला गया। aalekh v प्रस्तुति छाम्माक्छाल्लो की है और nirdeshak हैं shrii ar एस vikal। raaypur में lagabhag ७०० लोगों के saamane इसे manchit किया गया और sabhii ने एक स्वर से इसे saraha। यह न केवल chhammakachhallo के लिए, varan थिएटr जगत ke lie utsaah kii baat rahii. yah galat saabit huaa ki log thietar नही देखते या dekhana नही चाहते। achchhi chiizen हर कोई chaahataa है।
अवितोको अब अपने इस नए साल में फ़िर से तैयार है- कला, थिएटर varkshaap, नाटक के प्रदर्शन और जेल के बंदियों के लिए अलग-अलग karyakramon के साथ। isamein, उनके साथ srijanatmak kaaryakram के साथ- साथ उन्हें अपने जीवन koo नए svaroop में देखने के बारे में vichaar kiyaa jaaega। उनकी pratibhaaon को saamane लाने के liee karyakram हैं।
अवितोको हर वर्ग से judate हुए अनेक prashikShan karyakramon के साथ भी है। inamein हैं- "Time Management', Self Exploration', Know yourself Better', 'Guilt Management', राजभाषा Management Through self Management' etc.
छाम्माक्छाल्लो को इस बात का संतोष है कि आप sabakaa साथ और sahayog उसके साथ है। डर असल यह usakii अपनी nahiin, एक samaveta prayaas की yaatra है, padaav- डर- padaav तय कराने के silasile हैं।