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Tuesday, February 24, 2009

कबीर और आज

कल 'क़बीर' पर शबनम वीरमानी की २ दौक्यूमेंतारी फिल्में देखने को मिलीं। इनमे से पहली फ़िल्म "हद-अनहद" इतनी अच्छी थी की उसकी तारीफ़ के लिए शब्द नहीं हैं। मुम्बई की एक संस्था 'विकल्प' हर माह के अन्तिम सोमवार को पृथ्वी थिएअर में दौक्यूमेंतारी फिल्में दिखाने का आयोजन करती है। २००४ से चल रही यह संस्था अपना जन्मदिन मना रही थी। बहरहाल, फ़िल्म के बारे में।
कबीर आज अपने समय से भी ज्यादा प्रासंगिक हो गए हैं। धर्म के नाम पर आज जिस तरह से नफ़रत की आंधी चलाई जा रही है, उससे मानव का मानव के प्रति ही विशवास खोने लगा है। लेकिन कबीर के शब्द, साखी और दोहों को गानेवाले के माध्यम से यह फ़िल्म कबीर के साथ-साथ ख़ुद को भी समझाने का संदेश देती है। फ़िल्म शुरू होती है अयोध्या से और मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश की यात्रा करती हुई पड़ोसी देश पाकिस्तान तक जा पहुँचती है। पाकिस्तान में कबीर- सुनकर कुछ अजीब सा लगता है। मुझे भी लगा था, जब सृष्टि स्कूल आफ आर्ट एंड डिजाइन में लगी कबीर पर शबनम की प्रदर्शनी बंगलोर में गए दिसम्बर, २००८ में देखी थी। एक तो फ़िर से लाहौर, वाघा बार्डर देखना, वहाँ की सजी-धजी बसें देखना और उसके बाद वहाँ के कव्वालों का कबीर के प्रति प्रेम और समर्पण देखना। आप भूल जायेंगे की यह पाकिस्तान है, वह पाकिस्तान, जो हमारे मन में नफ़रत का संचार करता नज़र आता है-अपनी आतंकवादी गतिविधियों के कारण, जब वहाँ के कवाल कहते हैं की कबीर का सौदा मैं नहीं कर सकता, मैं दावा करता हूँ की जितना कबीर को मैंने जाना है, उतना कोई नहीं जानता, तो मन सचमुच भर आता है उनकी निष्ठा को देखकर। वे चुनौती देते हैं की कबीर को जानने के लिए ज्ञान की नहीं, भाव की ज़रूरत है।
पूरी फ़िल्म में हास्य के अनेक पल हैं, जब कबीर पंथ के लोग कबीर के बारे मिएँ, उनके माता-पिटा के बारे में वेदों से सामग्री ले ले कर कहते हैं, उनके जन्म पर एक नई व्याख्या प्रस्तुत करते हैं। प्रसिद्द लोगों के बारे में कही गई बातें भी इस तरह से सच मान ली जाती हैं की अन्य कोई बात गले नहीं उतरती। अब जैसे उनके जन्म और माता-पिटा का ही प्रसंग है। कहा जता रहा है की कबीर एक विधवा ब्राह्मणी की कोख से पैदा हुए थे, जो समाज के भय से कबीर को गंगा किनारे छोड़ आती है। नीरू और नीमू नामक निस्संतान जुलाहा दम्पति को वह शिशु मिला और उनने इसकी देखभाल की।
कबीर निर्गुण और सगुण दोनों ही रूपं में जाने जाते हैं। हालांकि साहित्य का अध्ययन करते वक़्त हमें बताया गया थाकी कबीर निर्गुण धारा के कवि हैं। आज मुझे लगता है की जिस तरह से राम की चर्चा इंके साहत्य में है, गुरु हैं, यह सब बिना सगुण भाव धारे नही हो सकता। अपनी उपदेशक प्रवृत्ति, सभी को खरी-खरी सुनानेवाले कबीर अपनी सूफी रूप व् स्वभाव के कारण भी सबसे अलग हैं। कबीर की यह फ़िल्म देखते हुए आपको लगेगा की काश, आप भी कबीर के राम में रंग जाते। तब यह जो आज राम के नाम से जो राजनीति चल रही है, राम के नाम को जिस तरह से गंदा किया जा रहा है, वह नहीं होता। राम भाव है, भक्ति है, राम का नाम दिल से निकल कर हमारे रक्त में घुल कर हमें नई ताक़त देता है। दुःख है की आज राम को इस प्रकार से बना दिया गया है की ख़ुद राम को भी अपने आप पर शर्म आने लगे। कबीर की खासियत है की इसे पढ़े-लिखे तबके से लेकर अनपढ़, गंवार तक सभी एक रूप से भजते हैं। फर्क सिर्फ़ इतना है की पढ़े-लिखे लोग इसकी मीमांसा करते हैं, और अनपढ़ भाव की नदी में डूबते-उतराते रहते हैं।
यह फ़िल्म देखना अपने आप में एक अनुभव है। १०९ मिनट की फ़िल्म शुरू होकर कब ख़त्म हो जाती है, यह पाता ही नहीं चलता। हिन्दुस्तान से भी ज़्यादा असरकारक नज़ारा पाकिस्तान का है। सच ही कहा है की अलगाव केवल दोनों तरफ़ के सियासी लोगों का नतीजा है। कलाकार तो हर जगह के एक से ही रहते हैं।
लेकिन इसके साथ ही दूसरी फ़िल्म "कोई सुनता हैधीली लगी। यह कुमार गन्धर्व की संगीत यात्रा कबीर के साथ की थी। फ़िल्म जहाँ तक इनके साथ कबीर की बात कहती है, अच्छी लगती है। मगर बाद में यह धीरे-धीरे अपना असर खोने लगती है। कई बार लगता है की 'हद-अनहद' की शूट की गई बची सामग्री को इसमें खपा दिया गया है। फ़िल्म को केवल कुमार गन्धर्व तक ही siimit रहने दिया जाता, जो की इस फ़िल्म का उद्देश्य था तो यह ज़्यादा अच्छा होता। फ़िल्म छोटी और कसी हुई होती। फ़िर भी जब भी जिसे भी मौका मिले, 'हद-अनहद ज़रूर देखें।

Thursday, February 19, 2009

साथी बंदियों के प्रति राजेन्द्र बाबू का व्यवहार

सन १९४३ की बात है। जेल में आनेवाले नए कैदियों से पुराने कैदियों को बाहर के समाचार मिल जाया करते थे। बाद में राजेन्द्र बाबू को एक-दो अखबार भी मिलाने लगे थे। नाना प्रतिबंधों के कारण अखबार में सबकुछ छपता नहीं था। जो छपता भी था, उसमें बहुत कुछ साफ़ -साफ़ नहीं लिखा होता था। नए कैदियों से वे जानकारी मिलाती थी, जो कहीं छपनेवाली नहीं होती थी। यह जानकारी ख़ास-ख़ास लोगों के बारे में होतीं।
एक दिन राजेन्द्र बाबू ने मुलाक़ात के समय अपने पुत्र मृत्युंजय प्रसाद से कहा की अमुक अमुक के परिवार बहुत ही आर्थिक संकट में हैं। उन्हें मासिक रूप से नियमित सहायता मिलनी चाहिए। बेटे के सामने विकत समस्या। एक तो राजेन्द्र बाबू की बात ताली कैसे जाय और दूसरे अपना परिवार बड़ा होने के कारण अपना ही वेतन कम पङता था। वे कुछ जवाब नहीं दे पाए। अगले महीने राजेन्द्र बाबू ने फ़िर से इस बात की चर्चा की। वे बोले-" तुम मेरे नाम पर ऋण ले कर इन लोगों की सहायता करो। मैं यदि जिंदा जेल से निकला तो यह करजा चुकाउंगा। मर गया तो यह भार तुम पर छोड़ जाउंगा।" मृत्युंजय प्रसाद ने कुछ प्रयत्न किया, मगर सफलता नहीं मिली। तब एक माह बाद फ़िर राजेन्द्र बाबू ने कहा की "मुझसे यह बर्दाशत नहीं होता की मेरा परिवार तो सुखी रहे, मगर जेल में साद रहे मेरे सहकर्नी के परिवार भूखों मारें। बहुत सम्भव है की एक दिन तुम्हें सुनाने को मिले की इसी के प्रायश्चित में मैंने आमरण अनशन करना आरम्भ कर दिया है। मृत्युंजय प्रसाद की घबराहट की सीमा न रही। राजेन्द्र बाबू के पुराने मित्र बनारसी प्रसाद झुनझुनवाला राजेन्द्र बाबू का समाचार लेने घर आए। मृत्युंजय प्रसाद ne unhen सब कुछ बताया। उनहोंने ३०० रुपयों की व्यवस्था कर दी। उधर सरदार पटेल के पुत्र, जो ओरिएण्टल इंश्योरेंस में उच्च पड़ पर थे, वे भी बंबई से कुछ राशि भेज दिया करते थे। दो-एक बार सुदूर उत्कल से दो-तीन उच्च पदस्थ अफसर, जो बिहार से थे, वे भी कुछ राशि भेजते रहे। इअप्रकार, जब तक राजेन्द्र बाबू जेल से छूटकर न आ गए, तबतक दो-तीन परिवारों को ७५ रूपए मासिक तथा कई अन्यों को १०-१५ रुपये मासिक की सहायता मिलाती रही।

Wednesday, February 18, 2009

जेल में वकालत -- राजेन्द्र बाबू की.

२२ सालों की छोडी हुई राजेन्द्र बाबू की वकालत जेल में फ़िर से चमक उठी। हुआ यूँ की उन दिनों छोटे-मोटी झगडों को भी राजनीतिक रंग दे दिया जाता था और कम या कच्चे सबूतों पर भी लम्बी-लम्बी सजाएं सूना दी जाती थीं। कोई- कोई तो आजीवन कैद की सज़ा तक सूना देते थे। बाहुत बार तो गरीब कैदी के पास साधन ही नहीं होते थे की वह आगे की अदालत में अपील कर सके। या फ़िर अपील हो भी गई तो अच्छे वकील कर ही लें। अब जो मुकदमे चल रहे होते, खासकर राजनीतिक कैदियों के, उनमें राजेन्द्र बाबू को बहुत प्रकार की अर्जियां लिखना, सफाई के प्रमाणों का विश्लेषण करना, अपील की दरख्वास्तें लिखना आदि शामिल थे। बाद में तो कई जेलर भी ऐसे मामले सामने लाकर उनकी सलाह सफाई- पक्ष के वकीलों के पास भिजवा देते। दुखी कैदियों तथा उनके घरवालों की सेवा करके राजेन्द्र बाबू को बड़ा संतोष मिलता।
एक मनोरंजक केस था। एक ६० साल के बूढे पर आरोप था की वह दो-ढाई मन भारी बोरी पीठ पर लादकर, बरसात में खेत की मंदों पर भाग खडा हुआ था। एक मील तक पीछा कराने के बाद ही पुलिस उसे पकड़ सकी थी। वह बूढा बमुश्किल लानागादाकर चल पाटा था। उसके हाथों की उंगलियाँ मुड़ती नहीं थीं, मुट्ठियाँ बंधती नहीं थीं, फ़िर भी इस आरोप पर उसे लम्बी सज़ा हो गई थी। राजेन्द्र बाबू के बताये उपाय से अपील कराने पर हाई कोर्ट ने मान लिया की कैदी के लिए असंभव था की वह बोरी पीठ पर उठा सके और पीठ पर लादकर भागना तो एकदम असंभव था।
लगभा ३ वर्षों के जेल-जीवन में दया की अपीलें लिखने, खून के मामलों की असली बातें अभियुक्तों के मुख से सुनाने तथा उनके कागजात से यह जानने के बहुत से अवसर मिले की किस प्रकार अदालत में सच को झूठ और झूठ को सच साबित किया जाता है। संभवत: यही कारण रहा होगा की राष्ट्रपति बनने के बाद दया की अपीलों, फँसी को आजीवन कारावास में बदलने के फैसलों पर वे बहुत गौर देते थे तथा उन सबकी बड़ी बारीकी से निरीक्षण कराने के बाद ही वे कोई निर्णय लेते थे। दो-एक केस में उनहोंने अभियुक्त के बचाव पक्ष में उन्हीं कागजों में से वे बातें खोज निकाली थीं, जिन्हें सफाई के वकील तथा जज सभी नज़र- अंदाज़ कर गए थे और इस प्रकार से उन दण्डित अभियुक्तों के प्राण बचे थे।
जेल की अपीलों से जिनके प्राण बचे थे, उनमें से एक थे फतुहा के सिराजुद्दीन दर्जी। इन पर दो गोरों के क़त्ल का जुर्म लगाया गया था। अदालत की और से उसे फांसी की सज़ा सुनाई गई थी।

Tuesday, February 17, 2009

राजेन्द्र बाबू और उनका जेल जीवन

राजेन्द्र बाबू की जेल यात्रा से सम्बंधित बहुत से संस्मरण हैं, जिन्हें एक-एक करके यहाँ प्रस्तुत किया जाएगा।

सन १९४२ में राजेन्द्र बाबू जेल गए। अहस्त का महीना था। वे सदाकत आश्रम पटना में थे और बहुत बीमार थे। इसी कारण वे बंबई में आयोजित होनेवाले भारतीय कांग्रेस की महासमिति की बैठक में भी न जा सके थे। वहा पर मौजूद लगभग सभी नेता ८ या ९ अगस्त को पकड़ लिए गए थे। गांधी जी भी पूना के आगा खान पैलेस में भेज दिए गए थे। ९ अगस्त को पटना के कलक्टर तथा पुलिस सुपरितेंदेंत सदाकत आश्रम में राजेन्द्र बाबू को गिरफ्तार कराने पहुंचे। उन्हें बीमार देख वे वापस अस्पताल गए और एम्बुलेंस तथा सरकारी बड़े डाक्टर सिविल सर्जन को लेकर पहुंचे। तब डाक्टर की देख रेख में एम्बुलेंस में सुला कर उन्हें पटना जेल ले जाया गया। जेल तक उनके साथ मथुरा प्रसाद भी गए। वहा पर यह पाता चलने पर की उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया है, इसलिए उन्हें जेल से लौटना पडेगा, उन्हें बहुत बुरा लगा। किंतु कोई उपाय नही था। फ़िर भी उनहोंने कलक्टर पर इतना जोर डाला की उन्हें कहना पडा की आप पहले आश्रम लौट जाएँ, हम आपको वहाँ जाकर गिरफ्तार कर लेंगे। और यही हुआ भी। राजेन्द्र बाबू के पास जेल में पहुचने के बाद मथुरा बाबू को शान्ति मिली। ये वही मथुरा बाबू थे, जिन्हें लोग मजाक में मौखिक प्रचार मंत्री कहते थे, क्योंकि वे काम बहुत तेजी से नहीं कर पाते थे।

चारो और बेहद सख्ती थी। घरवालों को जेल में मिलाने देने की इजाज़त नही थी। अफावाएहं रोज नए-नये रूप लेकर आती। उन दिनों बिहार सरकार के मुख्य सचिव यशवत राव गोडबोले थे। सरकारी नौकरी में होने के बावजूद दिल से देशभक्त थे। उन्हें पात्र लिखा गया राजेन्द्र बाबू की सेहत को लेकर और यह भी की उन्हें बीमारी की हालत में जेल ले जाया गया है । जेल में इलाज़ तो हो रहा है, मगर बीमारी पुरानी है, पाकर में न आने के कारण और भी गहरी होती चालली जा रही है। इसलिए उनके पुराने डाक्टर टी एन बनर्जी तथा दा। रघुनाथ शरण से उन्हें जाए। यह बात जेल के डाक्टर घोष को बेहद बुरी लगी। उन्होंने राजेन्द्र बाबू से कहा की "बीमारी के नाम पर आपको मृत्युंजय प्रसाद (राजेन्द्र बाबू के बेटे) मेडिकल बोर्ड बुलावा रहे हैं। सदा से मृदुभाषी राजेन्द्र बाबू गरज कर बोले- "डा। घोष, अब जबकि हमारे मित्र, सहकर्मी व् संगी-साथी, देशवासी गोलियों के शिकार हो रहे हैं, और मेरे भौनके कंधे-से-कंधा मिलाकर गोलियाँ झेलना नहीं लिखा है और बिस्तर पर एडियाँ रगड़कर ही मरना बड़ा है, तो इस जेल से उपायुक्त जगह मेरे लिए और कोई दूसरी नहीं हो सकती। और यहाँ भी आपके हाथों में रहकर। आप खातिर जमा रखिये। बीमारी के नाम पर सरकार मुझे छोड़ना भी चाहेगी, तो जहाँ तक मेरा वश चलेगा, मैं बाहर नहीं जाऊंगा और यहीं मारूंगा। " यह सुनकर डा। घोष चुपचाप बाहर आ गए और दूसरे डाक्टरों के साथ ही आए।

Tuesday, February 10, 2009

सरकारी मेहमान- राजेन्द्र बाबू

सन १९४२ से पहले कभी किसी समय हजारीबाग के कांग्रेसियों ने राजेन्द्र बाबू से शिकायत की की वे बिहार के सभी जिलों का दौरा करते हैं, और हमारे जिले को बहुत कम समय देते हैं। वे सब यह चाहते थे की वे यहाँ आयें और दो-तीन दिन ठहरें, ताकि वे सब अपना सुख-दुःख उनसे बतिया सकें। पहले तो राजेन्द्र बाबू ने उन सबको खूब समझाया की सब अपने आप में इतने सक्षम हैं की उनकी ज़रूरत ही किसी को नहीं है। मगर लोग माने नहीं। एक -दो लोगों ने फ़िर भी अपनी शिकायेतें दर्ज कीं। तब राजेन्द्र बाबू ने हंसते हुए कहा की आप सब मानें या न मानें, मगर सच तो यह है की एक साथ जमकर बैठने के जितने भी अवसर आए हैं, उन सबमें सबसे अधिक तो मैं हजारीबाग में ही रहा हूँ। कुछ समझ गए, कुछ नहीं समझे। उन्हें राजेन्द्र बाबू का ऐसा कोई प्रोग्राम याद नही आता था, जिसमें वे अधिक समय तक यहाँ रहे हों। उन सबने इसे स्पष्ट कराने का अनुरोध किया। राजेन्द्र बाबू ने हंसते हुए कहा की बचओपन के बाद तो कभी ऐसा मौका नहीं लगा की किसी एक जगह जमकर रहूँ, मगर सरकारी मेहमान बनाकर सबसे अधिक तो मैं यहीं रहा हूँ, राजेन्द्र बाबू का आशय था की वे हजारीबाग जेल में सबसे ज़्यादा रहे। सुनकर हँसी का फव्वारा फ़ुट पडा। बाद में सन १९४२ से १९४५ तक लगभग पौने तीन साल तक राजेन्द्र बाबू को पटना जेल के एक ही कमरे में रहना पडा था।

Monday, February 9, 2009

आओ तनिक बढायें अन्धकार के बीज को

यह अंधेरे में समाने का पलायन नहीं, एक स्थित है, जिसके बार अक्स चीजों, हालत को देखा जा सकता है। छाम्माक्छाल्लो कभी-कभी जब उजाले से घबरा जाती है तो उसे यह अँधेरा बहुत याद आता है।

आओ तनिक बढायें अन्धकार के बीज को,
ताकि दिखे नहीं भाई-भाई के बीच की तनातनी,
ओझल हो जाएँ नज़रों से
चमकते भाले, बरछे, बल्लम
छुप जाएँ अन्धकार की कालिमा में
बच्चा वह दुधमुंहा,
जिसके किलकते पोपले मुंह में'पिस्तौल की नाली घुसा कर खेला जाता रहा,
जिससे खेल
रमता बच्चा और उसकी माँ उस खेल में, उसके पहले ही
दाग दिया गया ट्रिगर ,
आओ, आओ तनिक बढायें अन्धकार के बीज को,
ताकि छुप जाएँ सारे मनुष्य,
जिनके कारण शेष है अस्तित्व उस तथाकथित धर्म का,
जिसने बढ़ा दी है दूरी मनुष्य-मनुष्य के बीच की,
बना डाला है जिसने इंसान को इंसान के बदले राम बहादुर, अल्लारखा
सैमसन या जोगिन्दर बाश्शा
आओ तनिक बढायें अन्धकार के बीज को,
ताकि खो जाए माँ और दीदी की विगलित श्रद्धा,
ख़राब तबीयत के बावजूद जो रखती
भीषण उपवास, बरस दर बरस, मॉस दर मॉस
आओ तनिक बढायें अन्धकार के बीज को,
ताकि मेरे तन और मन का रेशा रेशा हो जाए
अन्धकार के लबादे में गम

न रह जाए चाहत किसी को देखने की
पाने की ,छूने की, किसी में मिल जाने की,

किसी में समा जाने की,

आओ, फैलाएं विश्व में अन्धकार का जाल॥

Tuesday, February 3, 2009

सरकारी नौकर- राजेन्द्र बाबू के लिए

अंग्रेजों के ज़माने में, कांग्रेस की सार्वजनिक सभाओं में खासा कर गांधी जी के दौरों पर, उनकी सभाओं में पुलिस के रिपोर्टर सादे लिबास में तैनात रहते थे, जो अपनी रिपोर्ट लिखकर सरकार को भेजते थे। बार-बार दो लोगो को ही रिपोर्ट लिखते देखकर लोग उनके बारे में समझ गए थे। फ़िर तो वे रिपोर्टर भी अपना काम छुपा कर नहीं करते थे। गांधी जी के र्तूफानी दौरों में सभी जगह पहुंचकर सारी रिपोर्ट लिखना उनके लिए सम्भव नहीं होता था। कठिन तो रहता ही था। कई बार तो राजेन्द्र बाबू उन्हें अपने लिए तय सवारी में जगह भी दे दिया करते थे। एक बार किसी के ध्यान दिलाने पर वे बोले की "मैं इन्हें भली-भाँती जानता हूँ। सरकार ने इन्हें हमारी सेवा के लिए भेजा है। इसलिए हम भी इनकी सुविधा का थोड़ा ख्याल कर लेते हैं। लेकिन ज़्यादातर तो ये ही हमारा काम कर देते हैं। आप भी इन्हें अपना कर्मचारी या कांग्रेस का नौकर मानिए। " सभी हंस पड़े। यह थी राजेन्द्र बाबू की भलमनसाहत।
यही बात अहमदाबाद में होती थी। वहां पुलिस के अफसर सत्याग्रह-आश्रम में आने-जानेवालों के बारे में रिपोर्ट दर्ज करते थे। उनमे से एक की ड्यूटी लगी थी अहमदाबाद रेलवे स्टेशन पर। जब कभी राजेन्द्र बाबू अहमदाबाद जाते, वह स्टेशन पर मिलता, स्वागत में आगे दौड़कर आता, बाहर जा कर सवारी ठीक कर देता, और आराम से उन्हें गाड़ी में बिठा देता। उसके जिम्मे सामान छोड़कर जाने में भी कोई दिक्कत न होती। एक बार उससे पूछने पर राजेन्द्र बाबू ने वही पुराना जवाब दिया की "सरकार ने उसे आपलोगों की सेवा कराने के लिए नियुक्त किया है। वह बेचारा कटकर रह गया। मगर बोलाताक्या? हंसते हुए बोला, "हाँ जी, हूँ जी, इन्हीं का सेवक हूँ।" दुश्मनों को भी मीठी छुरी से हलाल करना राजेन्द्र बाबू खूब जानते थे।

Monday, February 2, 2009

राजेन्द्र बाबू का भाषा प्रेम

डोक्टर राजेन्द्र प्रसाद भाषा के बहुत प्रेमी थी और विविध भाषा-भाषी से उनकी ही भाषा में बात कराने का प्रयास करते थे। सीखने की ललक युवाओं से भी अधिक थी। इसी ललक ने उन्हें बुढापे में संस्कृत सिखाई, जिसका उपयोग श्रृंगेरी मैथ के जगदगुरु शंकराचार्य के साथ बात-चीत करके किया। दुभाषिये की ज़रूरत उन्हें नहीं पडी।
बात शाययद सन १९२५ की थी। सत्याग्रह की कितनी योग्यता इस देश में है, यह परखने के लिए कांग्रेस के नेताओं का एक दल सरे देश के दौरे पर निकला। राजेन्द्र बाबू को दक्षिण में उत्कल से लेकर बंगाल, असम होते हुए पश्चिमोत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश तक सभी जगह जाना था। वे उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश में साधारण हिन्दी, जिसे बाद में हिन्दुस्तानी कहा गया, का प्रयोग करते रहे। बंगाल में बांगला में भाषण दिया। असम में संस्कृत मिश्र हिन्दी रही, उडीसा में जटिल संस्कृत बहुल हिन्दी बोलते रहे जो धीरे धीरे उर्दू इलाके की और बढ़ते हुए पंजाब-सिंध से होकर पशिक्मोत्तर प्रदेश में फारसी, अरबी मिश्रित कठिन उर्दू हो गई। हर इलाके में ऎसी कोशिश की की लोग उनकी बातों को पूरी तरह समझ सकें।
जब वे राष्ट्रपति थे, तब इरान के शाह भारत -यात्रा पर आए। प्रोटोकोल के मुताबिक राजेन्द्र बाबू ने उनका स्वागत किया। दोनों प्रमुख एक ही गाडी से राष्ट्रपति भवन आए। रास्ते में राजेन्द्र बाबू ने बी ऐ तक पढी हुई फारसी का प्रयोग किया और दुभाषिये के सहारे के बिना ही उनसे भली-भाँती बातें करते आए। जाहिर है, शाह बड़े खुश हुए और प्रधान मंत्री से इस पर अपनी खुशी भी ज़ाहिर की।
मातृभाषा तो राजेन्द्र बाबू kii भोजपुरी थी, मगर हिन्दी पर पूरा अधिकार था। वे हिन्दी के व्यावहारिक ज्ञान के हिन्मायाती थे। अपने भाषणों में वे उसी कोटेशन को डालते, जिसका अर्थ उन्हें पाता होता। उनका मानना था की दूसरों की भाषा जानने से आप उस व्यक्ति के साथ बहुत अच्छे सम्बन्ध बना सकते हैं, उनके दिल में अपनी जगह बना लेते हैं। कहना न होगा की इन सब भाषाओं के साथ अन्ग्रेज़ी के भी वे बहुत अच्छे जानकार थे। संविधान के 'सेक्युलर स्टेट ' के हिन्दी अर्थ 'धर्म निरपेक्ष के वे ख़िलाफ़ थे। उअनकी नज़र में "इसका मतलब यह हुआ की भारत का संविधान किसी धर्म को मानता ही नहीं।' उनहोंने कहा की जिन लोगों ने उस अन्ग्रेज़ी शब्द सेक्युलर का प्रयोग किया, उनहोंने सब सब धर्मों के प्रति समान भाव रखने का विचार रझा था, न की समान विरोध अथवा उपेक्षा रखने का विचार।