chhammakchhallokahis

रफ़्तार

Total Pageviews

छम्मकछल्लो की दुनिया में आप भी आइए.

Pages

|

Friday, May 27, 2011

प्रेम का बेंचमार्क- ताजमहल का बेंच!


भाई लोग नाहक रोते रहते हैं कि धरती से प्रेम खतम हो गया है. असल में लोग प्रेम में भी शुद्धता खोजते हैं, और प्रेम के विरोधी हो जाते हैं. वे भूल जाते हैं कि बिना नमक मिलाए सब्जी भी खुद को नहीं बनाती, बिना चांदी-ताम्बा मिलाए सोना भी गहने नहीं बनाता और बिना खाद खाए धरती भी फसल नहीं उगाती. मतलब, मेल-मिलावट जरूरी है.
प्रेम का यह मेल-मिलाव अलग-अलग रूप में सामने आता है. हिंदुस्तान की सरजमीं पर ही प्रेम के महाभारतीय किस्सों के साथ लोक, दंत और ऐतिहासिक कथाएं प्रेम के नए नित रूप चीख चीख कर बताती रही हैं- चाहे सोहणी महिवाल हो या ताजमहल या छम्मकछल्लो. इतिहास कहता है कि 1631 में मुगल बादशाह शाहजहां ने अपनी तीसरी पत्नी मुमताज महल की याद में ताजमहल बनवाने की सोची, जो उनके 14वें बच्चे को जनम देते समय सिधार गई थीं. भले मानुस, 14 बच्चे पैदा करके कोई औरत जिंदा रह सकती है? यह कोई कौरवों का जन्म था क्या कि घडे से निकल लिए?
शाहजहां के मन में प्रेम से ज्यादा गिल्ट उभरा होगा. उसे छुपाने के लिए ताजमहल बनवाया होगा- एक लम्बी प्रक्रिया के तहत. 1632-1648 तक. उस समय इसमें 32 करोड रुपए लगे. आज कोई दो करोड का घर ले तो इन्कम टैक्सवाले पहुंच जाते हैं. राजाओं की बात अलग है. उस मुहब्बत के राजा 1 जी के 32 करोड की बात करें तो आज के राजा 2 जी के 200 करोड कुछ भी नही है. वह भी तो प्रेमियों को दूरभाष की सुविधाजनक सुविधा दे रहे थे. चचा साहिर लुधियानवी बेवज़ह कह गए कि “इक शहंशाह ने बनवा के हंसी ताजमहल, हम गरीबों की मुहब्बत का उडाया है मज़ाक.” जवाब में किसी ने दे मारा “इक शहंशाह ने बनवा के हंसी ताजमहल, सारी दुनिया को मुहब्बत की निशानी दी है.” जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी. छम्मकछल्लो की भी एक कहानी है मैथिली में. पत्नी की याद में एक सेठ शीशमहल बनवाता है. उसमें काम करनेवाले युवा मजूर की घरवाली मर जाती है तो वह उस महल की एक ईंट उठाकर उसकी याद में रख लेता है. लकीर के फकीर कहते हैं, हनीमून के लिए आगरा मत जाना. जरूर ये बेटीवाले कहते होंगे, अपनी बेटी को मुमताज महल बनने से बचाने के लिए- तीसरी बीबी और 14 बच्चे! हे भगवान!!  
बडे लोगों की बडी बातें. शाहजहां बादशाह थे सो मुहब्बत में पागल हो कर ताजमहल बनवा गए. हम प्रेम कर सकते हैं और प्रेम में पागल हो सकते हैं, मगर नतीजे में ताजमहल नहीं बना सकते. प्रेम में पागल होना हमारा मौलिक अधिकार है पर मौलिक अधिकार की रक्षा का भार किसी और पर है. इसलिए शाहजहां ने अपने प्रेम के पागलपन की निशानी में ताजमहल बनवा दिया तो किसी और ने हम पागल प्रेमियों के लिए पागलखाना. आओ, प्रेम करो, पागल बनो और यहां चले आओ. लोग फालतू कहते हैं कि आका हमारा ध्यान नहीं रखते. नहीं रखते तो पागल प्रेमी कहां जाते? वह भी आगरा में?? शाहजहां ने दिल्ली में लाल किला बनवाया तो आका ने शाहदरा में पागलखाना. औरंगजेब ने औरंगाबाद में अपनी बेगम की याद में मकबरा बनवाया तो उस मकबरे के प्रेम में कैद होनेवालों के लिए जेल बना दी गई. यानी, पता है कि ये बडे बडे बादशाह जो कुछ भी करेंगे, उसमें पागलपन का कुछ ना कुछ अंश रहेगा ही. उनके उस अंश को भी ढोने की जिम्मेदारी बेचारे आकाओं की ही तो है.
ताजमहल की एक और खासियत है उसकी बेंच. आज न तो शाहजहां बचे हैं और न उनकी प्रोपराइटी. सो छम्मकछल्लो किससे पूछे कि ताजमहल के सामने बेंच किसने बनाई? क्या खुद शाहजहां ने? या अपने आका ने? सोचा कि सभी मूर्ख तो पागल होने से रहे. कुछ महामूर्ख प्रेम करने के बाद भी पागल होने से बच जाएंगे. प्रेम के इतने बडे प्रतीक ताजमहल के सामने वे अपने प्रेम का इजहार कैसे करें? सो उन्होंने बना दी बेंच कि अब बेंच पर बैठो, सोओ, फोटो खिंचाओ और खुद में शाहजहां का बोध भरो? लोग नाहक कहते हैं कि दुनिया प्रेम के खिलाफ है. यहां कितना अच्छा इंतज़ाम है. बेंच पर बैठने का भी और पागलखाने में रहने का भी. प्रेम में पागल! आओ! आओ!! प्रेम में पागल!!! झूम झूम जाओ!!!

Wednesday, May 25, 2011

कटि को कंचन काटि बिधि, कुचन मध्य धरि दीन.


लोग पूछते हैं, आपकी नजर में सुंदरता क्या है? छम्मकछल्लो को सवाल पूछनेवालों की नादानी पर हंसी आती है. इनलोगों को आज तक यह पता नहीं, जबकि छम्मकछल्लो छुटपन में ही जान गई थी, सुंदरता का महत्व. उसकी बहन सुंदर थी. वे दोनों जहां भी निकलती, छम्मकछल्लो को सुनने को मिलता- इसका ब्याह कैसे होगा? ब्याह की यह परिभाषा आज तक नहीं बदली है.

लोग कहते हैं कि मन की सुंदरता देखो और देखते वक़्त नज़रें तन पर टिक जाती हैं. अरे भाई, मन तो तन के भीतर की चीज है, उसके गुन उसके भी भीतर की चीज. एक तो मन देखने में समय, फिर उससे भी ज्यादा वक्त उस मन के भीतर के सौंदर्य को खोजने में. वक्त, समझदारी सब लगती है. किसके पास इतना है?

तन की सुंदरता संवारने, दिखाने के कितने सारे उपाय हैं- बडी-बडी मल्टी नैशनल कम्पनियों के नाना सौंदर्य प्रसाधन से लेकर स्पा, सलोन, जिम, पार्लर, सौंदर्य सलाहकार, सौंदर्य चिकित्सक तक. कोई 7 दिन में गोरा बनाता है, कोई 15 दिन में चेहरे से झाई-धब्बे दूर करता है, कोई 3 हफ्ते में झुर्रियां भगाता है. मन की सुंदरता के लिए? खुद ही पढो, खुद ही देखो, खुद से खुद को तैयार करो, फिर भी टोटा कि भई, हमारा मन नहीं मान रहा कि कह दें कि तुम्हारा मन सुंदर है.

तन के साथ ऐसा कुछ नहीं है. इसका पैमाना बना हुआ है- 36-24-36. नाक कितनी सुतवां हो कि जांघ पर कितना मांस हो कि गाल की कितनी हड्डियां उभरी हों, यह सब तय है. इस सांचे में ढालने के लिए तरह तरह की फैक्ट्रियां मौजूद है. मन की सुंदरता का क्या कोई ऐसा पैमाना, कोई कारखाना बनाया गया है? नीति की कितनी बडी आंख, चरित्र का कितना गहरा डिम्पल, ईमानदारी की कितनी ऊंची नाक! सत्य का कितना बडा वक्ष!

सुंदरता की बात कोई आज की थोडे न है. भारतीय शास्त्र नायिका वर्णन से भरा पडा है. कदली वृक्ष सी जंघाएं, गुरुतर नितम्ब, कुम्भ या हिम जैसे वक्ष, हिरणी जैसी आंखें, शुक जैसी नाक, बिम्बा फल जैसे होठ, सुराहीदार गर्दन, कुंदन जैसा दमकता रंग, नागिन जैसे बल खाते केश, मद भरे नैन, कोयल जैसे बोल, धनुष जैसी भौंहें, चंद्रमा जैसा भाल, सिंह जैसी कमर....! पहेली ही बन गई उस पर- “कनक छडी सी कामिनी, काहे को कटि छीन?” जवाब भी मिला- “कटि को कंचन काटि बिधि, कुचन मध्य धरि दीन.”

छम्मकछल्लो के कूढ मगज में फिर से सवाल कौंधता है- मन की सुंदरता किसे दिखाएंगे आप? उसे ही न, जो आपके नजदीकी हों. उनको तो आप अपनी तमाम खूबियों और खामियों के साथ स्वीकार्य हैं. सुंदरता सार्वभौम है. जिसे आप नहीं जानते, उसकी भी सुंदरता को आप सराहते हैं, जो आपको नहीं जानता, वह भी अपना सौंदर्य इठला कर जतला जाता है. कठिन पहेली हो गई? छम्मकछल्लो आसान कर देती है. उर्वशी, मेनका, सीता, लक्ष्मी, पार्वती, इंदिरा, मर्लिन मुनरो, मोनालिसा, नर्गिस, मधुबाला, हेमामालिनी, ऐश्वर्या राय, प्रियंका चोपडा, सुष्मिता सेन, केनेडी, नेहरू, राजीव, वाजपई, अडवाणी, आमिर, शाहरुख, सलमान, हृतिक आदि आदि- आप इन सबको जानते हैं? ...इतना कि आप उनके साथ उठ-बैठ सकें, रह-खेल सकें? अब ये ही नाम फिर से लीजिए- क्या ये सब आपको जानते हैं? हे हे हे, खा गए न गच्चा! अब बताइए, आप इनके मन के सौंदर्य से प्रभावित हुए हैं या ....? अपनी बातचीत में आप इनके मन का उल्लेख करते हैं या...? गुण को सुंदरता के साथ घालमेल मत कीजियेगा.

तो भैया, छम्मकछल्लो की बात मानिए. भूल जाइए कि मन की सुंदरता अधिक महत्वपूर्ण है कि सुंदरता वस्तु या व्यक्ति में नहीं, देखनेवाले की आंख में होती है. यह सब छम्मकछल्लो जैसी कुरूपों को बहलाने के लिए है, वरना सौंदर्य प्रतियोगिताओं की तरह कुरूप प्रतियोगिता भी होती. शरीर और सौंदर्य बनाने, संवारने की तरह कुरूपता को भी बनाने संवारने के सारे ताम-झाम होते. एक बात बताइएगा ईमानदारी से, कि जिस तरह आप किसी की शारीरिक सुंदरता की तारीफ उसके मुंह पर ही कर देते हैं, उसी तरह क्या किसी कुरूप से उसकी कुरूपता का बयान कर पाते हैं? इसका मतलब ही है कि जो सामने बोला जाए, वह सुंदर, जो ना बोला जाए, वह कुरूप. छम्मकछल्लो होश संभालने के बाद से ही इसका सामना करती आ रही है. बहुत संवार लिया मन को, बुद्धि को, फिर भी अभी तक सुनने को मिल ही जाता है कि छम्मकछल्लो जी, तनिक सुंदर होतीं तो वाह! क्या बात थी? छुटपन में गांव की दादी-चाची सामने बोल देती थी, आज के लोग पीठ पीछे या अप्रत्यक्ष रूप से.

Friday, May 20, 2011

पति जायज, प्रेमी नाजायज.


छम्मकछल्लो को अपने देश में एक ही चीज के लिए अलग अलग मान्यता के कारण बडी उलझन होती है. विवाह के बाद सेक्स जायज, विवाह से पहले नाजायज. विवाह के बाद पैदा बच्चा जायज, विवाह के पहले नाजायज. कम उम्र की लडकी का ब्याह अधेड बूढे से हो तो जायज, अधेड उम्र की औरत का ब्याह नाजायज. अधेड उम्र का पति हो तो जायज, अधेड उम्र का प्रेमी हो तो नाजायज. नहीं, नहीं... यहां तो पति बाल भी हो तो जायज, मगर प्रेमी हर हाल और उम्र में नाजायज. बडे लोग रिश्वत लें, काला धन बनाएं, उसे छुपाएं तो जायज, छोटे लोग घूस लें, घर में कुछ पैसे आ जाने की नीयत से कुछ पैसे बना लें तो नाजायज. बाल और आंखे काले तो जायज और शुभ काम में काले रंग का कुछ चढा दें तो नाजायज. काली आंखों में काला काजल लगाएं तो जायज, नजर न लगने के लिए काला टीका लगाएं तो जायज और माथे पर काली बिंदी लगा लें तो नाजायज. आंखों के कोए सफेद तो जायज, मगर किसी को शुभ मौके पर सफेद वस्त्र उपहार में दें तो नाजायज. अपनी बत्तीसी सफेद, बदन की हड्डी सफेद तो जायज, मगर किसी शुभ मौके पर कोई उजले कपडे पहनना चाहे तो नाजायज. हरे रंग की धरती तो जायज, हरे रंग का झंडा नाजायज. वीरता का प्रतीक भगवा रंग कभी था जायज मगर एक पार्टी का रंग हो जाने के कारण अब यह रंग ही दूसरे के लिए नाजायज. मर्जी से ब्याह न कर पाने के लिए बच्चों का खून कर देना जायज, मगर बच्चों की आंखों में प्रेम की लाली का छाना नाजायज. मर्द दस जगह मुंह मार कर आए तो जायज, औरत सोचे भी तो नाजायज. राधा कृष्ण प्रेम करें तो जायज, आज के लोग करें तो नाजायज. कृष्ण-द्रौपदी का सखा भाव जायज, आज के स्त्री –पुरुष की दोस्ती नाजायज. इंद्र और विष्णु द्वारा क्रमश: अहिल्या और वृन्दा का छल से भोग जायज और उन्हें दोषी ठहराना नाजायज.
बडी लम्बी चौडी लिस्ट है भैया इस जायज और नाजायज की. जायज और नाजायज मन का फितूर है और फितूर में यह बात दूर और दूर चली जाती है कि प्रकृति ने सबकुछ अपने हिसाब से जायज बना कर ही भेजा है. रंगों का खेल हो या नदी या ताल, रूप या चाल या भारतीय मिथक का धमाल. आपके कोटे में भी जायज और नाजायज की सूची होगी. जोडते जाइए इस कडी से और भी कडी. देखें तो, होती है सूची- बडी- कितनी बडी?   

Monday, May 16, 2011

तस्वीर की देवी की लाज बचाओ, घर की देवी की- चिथडे कर आओ!!


     वाह, वाह, वाह!!! समझ में आ गया भारतीयों की ताक़त का. इस धरती पर हैं कोई फैशन डिजाइनर लीसा ब्ल्यू. बना दी उन्होंने स्विम सूट, लगा दी उसके साथ देवी लक्ष्मी की तस्वीर. बस जी, फिर क्या है! पता चला कि पूरे विश्व में जो 135 करोड भारतीय हैं, उन सभी का खून गया खौल गया. छम्मकछल्लो का खून अभी भी ठंढा पडा है. पता नहीं, अब उसे 135 भारतीयों मे गिना जाएगा कि नहीं. फेसबुक आंदोलन का बहुत बडा केंद्र है, इसी से पता चला. अब जंतर-मंतर जाने की जरूरत नहीं. यहीं से अभियान चलाइये, जीत जाइये. फिर विजय के लम्बे चौडे कशीदे काढिए, खुद से ही खुद की पीठ ठोकिए. जैसे कि एक भाई ने किया.
      धर्म से आजकल सभी को बहुत डर लगता है. पहले धर्म मन का डर मिटाता था, अब बढाता है. बडे बडी से बडी हस्ती धर्म से डर कर तथाकथित भगवान की मौत पर आंसू बहाती हैं तो यह अदना सी लीसा क्या चीज है? उसने माफी भी मांग ली, तस्वीर भी हटा ली. फेसबुकिया भाई का सीना गर्व से विश्व के नक्शे जितना चौडा हो गया. उनकी रण दुंदुभी बज उठी- दिखा दो गोरों को कि हम भारतवासी ऐसे हैं कि अगर कोई हमसे मांगेगा तो बेटे दे देंगे, मगर कोई गद्दारी करेगा तो हम उसका बाप भी छीन लेंगे.” बेटे ही देने की बात क्यों भाई! बेटी देने की क्यों नहीं?? छम्मकछल्लो के इस सवाल का संकट समझें भाई!! बेटी घर की इज्जत है. कैसे दी जा सकती है? बेटे तो इज्जत ले आते हैं न दूसरों की!   
      छम्मकछल्लो को एक नारा याद आया- शायद कुछ इस तरह है- खीर मांगोगे, खीर देंगे, कश्मीर मांगोगे, चीर देंगे.” फेसबुकिया भाई ने किसी की टिप्पणी भी अपने समर्थन में लगा डाली- हमारे देश मे इन देवियों को माता कहते हैं, बेटियाँ कहते हैं, बहुए कहते हैं, बहने कहते हैं. आप बताइए भला हम हमारी माँ बहनों के अपमान पर कैसे चुप रह जाएँ. पत्थर की मूरत और कागज पर छपी तस्वीर को हम छोड़ दे, लेकिन भला अपने परिवार की इन शक्तियों का अपमान कैसे होने दे जो हमारी ताकत है, हमारा सम्मान है, हमारा स्वाभिमान है, हमारी जान है, हमारी जननी है, हमारी पालन करनी है,
      छम्मकछल्लो का दिल बाग-बाग हो गया. कोई तो मिला जो घर की मां, बहनों, बेटियों के स्वाभिमान की बात कर रहा है. सो, वह भी लपक कर इस ललकार में शामिल हो गई. वह भी ललकार कर कह रही है- तस्वीर की और धर्म की देवी, जिसे ना कभी देखा, ना सुना, उस पर विजय का गुनगान करनेवाले ऐ सभी भारतीयो! खडे हो जाओ एकजुट हो कर भ्रष्टाचार के खिलाफ. है इतनी हिम्मत तो काट आओ उनके गले, जो जाति और धर्म के नाम पर अपने ही भारत की महिलाओं का नंगा जुलूस निकालते हैं. दफन कर दो उनको, जो अपने ही भारत की मासूम बच्चियों को अपनी हवस का शिकार बनाते हैं. जिंदा गाड आओ उन मां-बाप को, जो अपने ही बालिग बच्चों को अपनी पसंद से शादी करने के लिए उनकी जान ले लेते हैं. आंखें फोड दो उनकी, जो तुम्हारी बहू बेटियों पर कुदीठ लगाते हैं. काट डालो जीभ उनकी, जो तुम्हारी बहू बेटियों को देख कर लार चुलाने लगते हैं. खपच डालो उनका वह अंग, जो तुम्हारी बहू बेटियों को देखते ही खुजली से भर जाता है.  तस्वीर की देवियों को माता, बहनें, बेटियां कहते हैं तो तस्वीर से इतर इस देश की जीवित देवियों को भी माताएं, बहनें, बेटियां कहते होंगे. तो, अपने ही प्यारे भारत की जीवित देवियों की जान और लाज बचाओ, हे महा वीरो! देश की देवियों के साथ सारे अत्याचार अपने ही महान भारतवासी कर रहे हैं, कोई लीसा ब्ल्यू नहीं. तस्वीर की देवी की लाज बचाकर भारतीयता का दम्भ भरनेवाले, भारतीयता को सही भारतीयता से जोडो और अपनी नपुंसक विजय की दुंदुभी पीटने से बाज आओ. 

Sunday, May 15, 2011

अहा! छह महा देवियों से परिपूरन यह महा भारत!


      छम्मकछल्लो छमछमा रही है. देश की आधा दर्जन महा महिलाओं से सुशोभित, अभिमंडित, अचम्भित यह देश. वंदना करो इसकी. अर्चना करो इसकी. देश ने नहीं देखा कि वे महिला हैं, खाली औरत. देश ने देखा उसका जीवट. उसकी लगन, कुछ कर पाने का उसका जोश, आदिकाल से चले आ रहे शासक को बदल देने की जनता की चाह! भ्रष्टाचार से खीझे, दुखी, गुस्साए लोग! इन सबने जनता की चाहत को वाणी दी. जनता ने उनकी वाणी को अपने हाथों से लगाए मुहर का सहारा दिया. क्लीन स्वीप आउट! वाह रे इस देश की जनता.कौन कहता है कि लीडरों से देश का विश्वास उठ गया है!
      अब बारी इन लीडरों की है के वे जनता की उम्मीदों पर खरे उतरें. इतिहास का शायद यह पहला मौका है, जब देश की प्रथम महिला से लेकर देश की सबसे बडी राष्ट्रीय पार्टी की अध्यक्ष सहित देश के चार राज्यों की कमान इन महा महिलाओं के हाथों में होगी. देश को बहुत आशा है. इन आशाओं की जडों में अपनी कार्य कुशलता का खाद-पानी डालो हे महा देवियो! वरनाइसी जनता को आपकी जड में मट्ठा डलते देर न लगेगी.
      छम्मकछल्लो को भी इन महा महिलाओं से बहुतेरी उम्मीदें हैं. उनके सुशासन में शायद अब लोग यह कहना भूल जाएं कि औरतों की अक्कल सिर में नहीं, घुटने में होती हैं. शायद लोग यह कहना भूल जाएं कि बच्चा मां की शकल ले ले, कोई बात नहीं, अकल वह मेरी ले. शायद लोग यह कहना भूल जाएं कि औरतें ही औरतों की दुश्मन होती हैं. शायद लोग यह कहना भूल जाएं कि चूल्हा-चौका औरतों को ही फूंकना चाहिए. शायद लोग यह कहना भूल जाएं कि औरतों की कमाई खाने से बेहतर है के मर जाएं. शायद लोग यह कहना भूल जाएं कि औरतें केवल माल है. शायद लोग यह कहना भूल जाएं कि औरतों को घर के अंदर ही रहना चाहिए.
      छम्मकछल्लो चाहती है कि देश में फिर से खुशहाली आए. छम्मकछल्लो सर्वे के ग्राफ पर यकीन करती है कि पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियां कम बेईमान होती हैं. वे कम घूसखोर होती हैं. दीन-दुनिया में अपनी भद मचने की फिक्र उन्हें अधिक रहती है. महिलाएं कोमल दिल की होती हैं. वे दिल से फैसले लेती हैं. महिलाओं के ये गुण हमारी इन आधा दर्ज़न महा महिलाओं में आए और राज्य और देश को इन गुणों का उपहार दे. जनता का विश्वास तो यही कहता है. बाकी तो दिन बताएगा कि कितनी औरतें अभी भी दहेज, रेप, घरेलू हिंसा, आपसी प्रतिस्पर्धा, खाप, ऑनर किलिंग और पता नहीं, किस किसकी शिकार हुईं?  

Monday, May 9, 2011

हमारी देह के रखवाले ये आहत, पराजित, भयभीत लोग!


तो? वियाग्रा की व्यग्रता हम औरतों में नहीं है, ऐसा छम्मकछल्लो क्यों माने भला? हम औरतें क्या इंसान नहीं हैं? शायद नहीं. इसीलिए तो कितने लोग थे?’ पूछने पर जवाब मिलता है- 40 और 3 औरतें. मतलब, औरतें लोग या मनुष्य नहीं हैं. मादा जानवर और पक्षी भी सेक्स से परिचालित होती हैं. हम औरतें इस ओर देख क्या, सोच भी नहीं सकतीं. सोचा, समझा भी तो चरित्रहीन, कुलटा, कलंकिनी के ठप्पे पर ठप्पे. कर लिया, तब तो पता नहीं कौन कौन से विशेषण!!!
हे धीरमना! क्या आपने कभी दो पशु या पक्षी युगल को प्रेमरत नही देखा है और उसमें मादा की भागीदारी नहीं देखी है? तो यह भी देखा होगा महामना कि जबर्दस्ती करने पर ये मादाएं भी अपने साथी को झिडक देती हैं. हम औरतें तो इनसे भी गई बीती हैं. झिडकने, मना करने पर सत्तर उपदेश हाजिर. लब्बोलुबाब कि उनकी संतुष्टि तुम्हारी खुशी है. उनको खुश रखो, वरना तुमसे नाखुश वो कहीं और चला गया तो देवी जी, तुम क्या कर लोगी? हां री मैया, सचमुच! और हमारी खुशी-नाखुशी? ये लो. ये भी कोई सवाल है?
छम्मकछल्लो किसको समझाए कि वह सेक्स को अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त, सबसे सुंदर, सबसे कोमल तंतु मानती है. सेक्स खराब हो ही नहीं सकता, क्योंकि इसी से सृष्टि है. क्या भाई लोग सारी सृष्टि को ही खराब कह देंगे? मगर हम औरतें भी ना! हर चीज़ की तरह सेक्स को भी मन से जोड लेती हैं. छम्मकछल्लो का तो पाताल की अतल गहराई तक विश्वास है कि औरतों को अपने सेक्स की अभिव्यक्ति का मौका मिलता ही नहीं. बहुत पहले उसने एक समाचार पढा था कि एक पति ने अपनी पत्नी को इस आधार पर तलाक दे दिया, क्योंकि पत्नी एकांत के कोमल पलों में अपनी अभिव्यक्ति में तनिक आगे बढ जाती थीं. पति को लगा कि उसने यह सब जरूर कहीं और से सीखा होगा. यह पतियों पर लागू नहीं होता. वे कुछ भी एक्सपेरिमेंट करें, सब चलता है. वे शायद जनम से सीख कर आते हैं.         
छम्मकछल्लो जानती है कि दैहिक संरचना भले ही स्त्री पुरुष की अलग अलग है, परंतु, मन और तन दोनों के पास हैं. जिनके पास मन अधिक होता है, वे वियाग्रा की व्यग्रता से बच जाते हैं. जिनके पास तन की बेचैनी है, उनके लिए तो दस वियाग्रा भी कम है. छम्मकछल्लो को यही समझ में नहीं आता कि भाई लोगों को हम स्त्रियों के पैरोकार बनने का इतना शौक क्यों चर्राया रहता है? अरे भाई, माना कि बहुत सी स्त्रियों की सेक्सुअल क्षमता अधिक है या उसे अधिक अभिव्यक्त करना चाहती हैं तो उन्हें खुद से उपाय करने दीजिए ना! उसे जाने दीजिए, डॉक्टर के पास, साइकॉलॉजिस्ट के पास. इस्तेमाल करने दीजिए पुरुष के लिए बाजार में उपलब्ध सिगरेट और शराब और वियाग्रा भी. करे आकलन बाज़ार कि कितनी महिलाएं वियाग्रा की व्यग्रता से व्यथित होकर दुकान आती हैं. वियाग्रा की ऐसी भी व्यग्रता नहीं है भाई कि महिलाएं उसके लिए अंधी बन जाएं. सेक्स हमारी भी जैविक समस्या है, पर इतनी भी जैविक नहीं कि मन को छोड सेक्स का भोंपू बजाते रहें.
बाज़ार महिला मुक्ति के नाम पर कुछ भी निकाल दे. उसे तो पैसे कमाने हैं. बहुत पहले एक कंपनी ने महिलाओं के लिए सिगरेट निकाली थी. फेल हो गई. छम्मकछल्लो माथा कूट रही है कि पता नहीं, कौन कौन से महिला संगठन थे जो महिला वियाग्रा बनानेवाले के विरोध में खडे हो गए. क्या कहा जाए इनके भी दिमाग को. एक मुद्दा मिलता है और झंडा उठाकर चल देती हैं. अरे,जीतना ही था तो कमर के नीचे मारकर जीततीं ना! कम्पनी को वियाग्रा बनाने देतीं. सिगरेट की तरह यह भी फेल हो जाती. नुक्सान उठाने देते. माल बिकता नहीं. घाटे के बाद होश ठिकाने आते. पूंजी भी जाती, माल पडा पडा सडता रहता. क्या पता, अपने घर के शादी-ब्याह, छठी-मुंडन में वे सभी को इसी का उपहार दे देते. कम से कम अपने ही घर में इसका कुछ तो सदुपयोग हो जाता.
छम्मकछल्लो दुख से जार-जार है कि नाहक लोगों ने इसे बाजार में आने नहीं दिया. अरे, पश्चिम के रास्ते यह पूरब के भारत में भी आता. तब कितना मज़ा आता. वियाग्रा खरीदने के लिए नहीं, हम स्त्रियों के तथाकथित नैतिक ठेकेदारों की व्यग्रता देखने के लिए. हमारे संस्कारहीन हो जाने के भय से भयभीत, हमारी शुचिता के खो जाने से डरे हमारी देह के रखवाले ये आहत, पराजित, भयभीत लोग!
छम्मकछल्लो ने जब से साध्वी बनने की घोषणा की है, उसकी नज़र काल के पार चली जाती है. इस काल के पार वह देख रही है कि महिलाएं वियाग्रा का सेवन कर रही हैं. वियाग्रा के सेवन से उनकी व्यग्रता बढ रही है. अपनी व्यग्रता वे अपने साथी पर उतारने को आतुर-व्याकुल हैं. बिचारे साथी जान बचाए भागे भागे फिर रहे हैं. उफ्फ नारी संगठनो! यह क्या किया तुम लोगों ने? इतने दिनों से पुरुषों के खिलाफ झंडा ले कर खडी हो और फिर भी उनसे जीत नहीं पाई हो. इस एक वियाग्रा के मार्फत जीत जाती. एक जीती हुई बाजी हार गई तुम सब और तुम्हारे बायस से हम औरतें भी. ओह! सदमाग्रस्त छम्मकछल्लो कहां जाए?##

Saturday, May 7, 2011

"घरवाली का कहा मानेंगे? चार आना का जहर खरीदकर मर न जाएंगे?"


लोग कुछ भी कहें, मगर ई सच है कि अपने देश में लोग स्त्री की बहुते इज़्ज़त करते हैं. काहे कि घरवाली की महिमा बहुते बडी है. लोग कहते फिरते हैं कि भाई, हम तो ‘उनकी मर्जी’ के बगैर कुछ भी नहीं करते. गृहमंत्री तो वही हैं.
वही गृह मंत्री जब अर्थमंत्री बनने लगती हैं, सलाह देने लगती हैं, तब स्त्री की इज्जत करनेवाले का सत्त, टेक आ अभिमान जागता है. आ ठीको है भाई! औरत लोग के दिमाग में ई काहे नहीं घुसता है कि जब औरत हो कर जन्मी हो तो औरते के तरह काहे नहीं रहती हो? इससे ई तो साबित होइये न जाता है कि औरत लोग को दिमाग नहीं होता. और जो जादे ही पुन्न परताप किए रहती तो ऊपरेवाला तुमको मरद बना के धरती पर भेजता कि नहीं? सो पहिले से ही काहे नहीं समझ लेती हो  कि ऊपरोबाला दू नजर रखे रहता है अपने ही सृष्टि पर.
औरत लोग ठहरी झोंटैला पंच. सो उसको एक दूसरे का झोंटा खींचने से फुरसते नहीं मिलता है. आ बात ई है कि हम लोग भी तो ईहे चाहते हैं कि उनका ई झगडा-झोटा चलता रहे. इससे हमको अपना ‘लाइफ’ गुजारने में आसानी हो जाता है और ई भी कहने का आराम मिलता है कि औरते लोग औरत का दुश्मन होती है. सबसे मजा तो तब आता है, जब ई मूरख औरत लोग भी पतिया जाती है आ राम नाम की तरह ऊ सब भी ईहे उचारने लगती है.
छम्मकछल्लो को सब कुछ बहुते अद्भुत लगता है. ऊ समाज के सभी बडका लोग को परनाम करती है. ई बडका लोग के पास बडका- बडका सत्त है, शील है, ईमान है, धरम है, आन है, बान है, शान है. उनका ऊ सब शान, जो और कहीं नहीं निकल सकता है, ऊ सब निकलता है अपना अपना घरवाली पर. घरवाली चाहे जितनी भी समझदार हो, ऊ यही कहेंगे कि अरे औरत लोग का अक्किल तो ठेहुन में होता है. ऊ बडका बडका लोग के घर में चाहे जितनी प्रतिभावान बेटी, बहू, बीबी हो, ऊ सबको एक्के लाते लतियाते हैं. कोई अपना प्रतिभा का उपयोग करना चाहेगी और कुछो सलाह –मशिविरा देगी तो सबसे पहले कह देंगे कि तुमसे कौनो कुछो पूछा है कि बेंग जैसा टर्रा रही हो. या जब जेतना पूछें, ओतने बोले. बेसी बोलने का जरूरत नहीं है. और कोई काम करने की बात सोचेगी तब तो पूरी देहे मे आग लग जाता है- “अब तुम काम करोगी? पढ लिख गई, यही बहुते हुआ.” आ मामिला अगर घरवाली का है तब तो पूछबे मत करिए. ऊ सीधे सीधे कह देंगे- “घरवाली का कहा मानेंगे? या कि घरवाली का कमाई खाने से नीमन है कि चार आना का जहर खरीदकर मर जाएं. अब छम्मकछल्लो कैसे कहे कि चार आना में आजकल कुछो नहीं मिलता है और लोग जहर खरीदने से नहीं, खाने से मरते हैं.

Friday, May 6, 2011

चेहरे पर चमत्कारी चमक चमकाती चप्पल.


शीर्षक के अनुप्रास अलंकार पर मत जाइए. इस कथ्य पर यकीन कीजिए कि आवश्यकता आविष्कार की जननी है. छम्मकछल्लो ने बचपन में पढा था कि किसी देश की रानी को चलने पर अपने पैर गंदे हो जाना पसंद नहीं था. लाख उपाय सोचने पर फैसला हुआ कि जहां जहां रानी साहिबा चलेंगी, वहां वहां कालीन बिछा दिए जाएं. यह श्रम और समय साध्य तो था ही, यह भी पता नहीं होता था कि रानी जी कब, कहां, किधर और कितनी दूर तक चलना पसंद करेंगी? बडे लोगों की बडी बात? पूछे कौन? जान गंवानी है क्या? फिर एक ने सुखाया कि जब जब रानी चलें, उनके पैरों में रूमाल या कोई कपडा बांध दिया जाए. इससे उनके पैर गंदे नहीं होंगे. और लोग बताते हैं कि इस तरतीब से रानी जी बहुत प्रसन्न हुईं. और यहीं से जूते चप्पल की ईजाद हुई.
प्रसन्नता भी आविष्कार को जनम देती है. रानी जी की इसी प्रसन्नता ने जूते-चप्पलों की ईजाद की. अब तो जूते-चप्पलों की इतनी बडी बडी कम्पनियां और इतने डिजाइन और वेराइटी आ गए हैं कि आपकी एक महीने की पगार निकल जाए, एक जोडी जूते-चप्पल खरीदने में. जूते-चप्पल गहने की तरह सम्मान का प्रतीक हो गए हैं. लोग केवल कपडे-गहने नहीं, जूते-चप्पल भी देखते हैं. जितने मंहगे जूते-चप्पल, उतनी अधिक कद्र.
समय के साथ जूते-चप्पल लोगों की शान के साथ प्रसिद्धि का प्रतीक बन गए. जूते-चप्पल भले हमारे पैर और हमारे शान की रक्षा करते हैं, सच तो यह है कि इसे अभी भी शूद्र की तरह देखा जाता है. लोग बाग एक से एक जूते-चप्पल पहनते हैं, लेकिन वे घर में इसे पहन कर नहीं घुसते. उसके लिए घर के बाहर एक कपाट बना देते हैं. घर से लक-दक निकलते हैं, बाहर जूते-चप्पल पहनते हैं, बाहर से आते ही सबसे पहले घर के बाहर इसे उतारते हैं, फिर घर में घुसते हैं. सोचिए, हजारों का खर्च इस पर, जैसे और जितने कपडे, उससे मैचिंग उतने जूते-चप्पल खेल के समय अलग, बाजार के समय अलग, शादी-ब्याह में अलग, स्कूल-कॉलेज, अस्पताल में अलग, मगर सबका अंत? घर के बाहर रखे अलमीरा में.
भला हो अपने बडे लोगों का, जिनकी महिमा से जूते-चप्पल शान की वस्तु बन गए. बडे लोगों की महिमा ही बडी होती है. वे चाहें तो राख और धूल को भी सोना बना दें, ये जूते-चप्पल क्या चीज़ है? एक बार एक ने बुश पर जूता फेंक दिया. वे मुस्कुरा कर रह गए. फिर किसी ने अपने चिदम्बरम साहेब के ऊपर फेंक दिया. वे भी मुस्का के रह गए. अभी किसी ने अपने स्वनाम धन्य महान सुरेश कलमाडी जी पर फेंका. वे भी मुस्काए और बडे ठसक के साथ चलते रहे. इससे यह साबित होता है कि ये बडे लोग तुच्छ से तुच्छ वस्तु को भी शबरी के जूठे बेर की तरह महान बना सकते हैं और खुद भी इस तरह से महान बन जाते हैं.
होगा कोई समय, जब जूते-चप्पल अपने ऊपर फेंका जाना अपमान समझा जाता था. नासमझ लोग अभी भी यही समझते हैं और इसी समझ की समझदानी से काम चलाते हुए इतने मंहगे जूते-चप्पल लोगों पर त्याग देते हैं- वह भी केवल एक. इससे यह पता चलता है कि वे त्यागी तो हैं, पर ईर्ष्यालु भी हैं. अरे भाई, जब एक चप्पल दे दी तो दूसरी भी दे दो. उनके पास एक सेट तैयार हो जाएगा. क्या पता, एक कलेक्शन ही उनका बन जाए. ये बडे लोग हैं, जो जूते-चप्पल पाने को अपनी प्रसिद्धि का उपकरण मानते हैं और पैरों के साथ साथ बदन और सर पर भी बडे प्रेम और श्रद्धा से धारण करते हैं. जनता और व्यवस्था के प्रति अपना पूरा आदर, मान और निष्ठा जताते हैं. चप्पल चेहरे पर चमत्कारी असर करती है. वह लोगों के मुख म्लान नहीं करती, उनकी चमक को और भी बढा देती है.

Thursday, May 5, 2011

ऐसी कैसी जवानी?


      बडा मर्दमार शीर्षक है ना? छम्मकछल्लो को यह शीर्षक इतना पसंद आया कि जस का तस उठा लिया चेहरे की किताब (फेसबुक) के एक फेसबुक ग्रुप पर आई इस खबर पर. खबर जस की तस नीचे दी जा रही है- “आज रात शंकर नगर के एक रेस्तरां के पार्किंग में दो युवतियां और एक युवक काली कांच लगी कार के अन्दर संदिग्ध हालत में पकडे गए. युवतियां नशे में धुत्त थीं. ऐसे नज़ारे यहाँ रोज़ देखने को मिल ही जा रहे हैं. कहाँ जा रहा है हमारा कल्चर. इस मामले ने झूठ बोलकर घर और हॉस्टल से बाहर जानेवाली युवतियों पर सवालिया निशान लगा दिया है. युवतियों पर नज़र न रखी गयी तो मामला और भी गहरा जायेगा. माना कि मामला जवानी का है. शादी के अलावा और भी तो कई रास्ते हैं. बीच सड़क पर दिखने वाली जवानी आज जब चैनलों पर और कल अखबार की सुर्खियाँ बनेंगी, तब क्या होगा? ऐसी कैसी जवानी?”
       ये साहब एक साथ कई मुद्दों पर चिंतित हैं. सबसे पहले तो लडकियों और उनकी जवानी पर. इसलिए सबसे पहले कहते हैं कि इस मामले ने झूठ बोलकर घर और हॉस्टल से बाहर जाने वाली युवतियों पर सवालिया निशान लगा दिया है.यानी, हॉस्टल से बाहर जानेवाली युवतियां! साहब इतने मुतमईन हैं कि उन्हें लग गया कि ये लडकियां हॉस्टल से भागी हुई ही हो सकती हैं, घर से निकल कर कोई ऐसा काम नहीं कर सकता. दूसरी बात करते हैं, युवतियों पर नज़र न रखी गयी तो मामला और भी गहरा जायेगा. यानी, युवतियां ही बदचलन होती हैं, उन पर शिकंजे कस कर रखो. उनकी ही इज्जत से घर की इज़्ज़त है. लडके तो हमेशा इज़्ज़तदार रहते हैं. वे या तो कुछ करते नहीं या करते हैं तो उनके करने से घर की इज़्ज़त पर कोई आंच नहीं आती. तीसरी बात, माना कि मामला जवानी का है. शादी के अलावा और भी तो कई रास्ते हैं. मतलब, जवानी जोर मार रही हो और शादी ना हुई हो तो और रास्ते अपना लीजिए. कुछ भी कीजिए, सबकुछ कीजिए, बस रास्ते पर मत कीजिए. नीति, संस्कार की बातें भूल जाइए. जवानी के मजे लीजिए, मगर छुप कर. पहले के रसिक बुजुर्ग घर के लडकों को ताकीद करते थे कि मुंह मारने में कौन सी बुराई है? मर्द की मर्दानगी इसी में तो है. मगर ब्याह तो वहीं होगा तेरा, जहां हम कहेंगे. सही है. ऐसी कैसी जवानी कि आप बीच सडक पर अपनी जवानी के जलवे दिखाते रहें. बीच सडक पर जवानी के जलवे तो कुत्ते दिखाते रहते हैं. इसलिए, छुप कर कीजिए, न कोई देखेगा, न कोई बोलेगा, आप भी खुश और बेदाग और घर, परिवार, समाज भी.
          लेखक महोदय को उस खबर में दो युवतियां दिख गईं और उन पर नज़र रखने की मर्दवादी हवस उछाल मार ले गई. उन्हें उन दोनों युवतियों के साथ वह युवक नहीं दिखा. उस पर नज़र रखने की बात तो सोची भी न गई होगी. लडकों से न धर्म बिगडता है, न ईमान, न समाज, न संस्कृति. सबके मूल में ये निर्लज्ज छोकरियां होती हैं, जो उन्हें अपने बंधन में फांस लेती हैं. धर्म और  संस्कृति को रसातल में तो औरतें ही ले जाती हैं ना?  युवक लोग तो एकदम पाक,  साफ,  बेदा,  सच्चरित्र, मासूम, दूध पीते बच्चे होते हैं. इन पर कैसे नज़र जा सकती है भला? इन युवकों का कोई कसूर नहीं होता.
      प्रतिक्रिया होनी ही थी. औरतों के मामले में तो सभी खुदाई दरबार बन जाते हैं. सो एक सज्जन ने लिख मारा- “जो कुछ होता है, उसका खामियाजा लडकियो को भुगतना पडता है. बदनाम वो होती हैं, कुंवारी मां वो बनती हैं, रेप का शिकार वो होती हैं, सुर्खियों में फोटो उनकी आती है, इसलिए उन्हें सावधान करना ज़रूरी है. लडके तो फिर भी बच निकलते हैं.“
      तो मामला फिर से जग जाहिर होने का है. लडके चूंकि बच निकलते हैं, इसलिए उन्हें बचने के मौके दिए जाते रहने चाहिए. नसीहत का जाल कियों पर बिछाना चाहिये कि चूंकि उनके साथ ये सब बातें होती हैं, इसलिए उन्हें बच कर, संभल कर रहना चाहिए. छम्मकछल्लो के पूछने पर कि लडकियों के जितने नुक्सान गिनाए गए हैं, उनके मूल में जाएं. क्या लडकियां खुद अपना रेप कर लेती हैं, खुद से कुंवारी मा न जाती हैं, खुद से खुद को बदनाम कर लेती हैं? खुद से फोटो खींचकर अखबारों मे देकर उसकी सुर्खियां बन जाती हैं?” वे इसे अपने ऊपर व्यक्तिगत आक्षेप मान लेते हैं.
      छम्मकछल्लो कहां किसी पर आक्षेप लगाती है? वह तो मानती है कि समाज में अच्छे लोगों की कमी नहीं है. मगर इनसे इतर भोगवादी मर्दाने नज़रिये के कारण ये अच्छे पुरुष भी गेहूं के साथ घुन बनकर पिस जाते हैं. छम्मकछल्लो इन अच्छे पुरुषों को बचाना चाहती है, ताकि समाज और इसके ढांचे पर हम सबका विश्वास बना रह सके. हे समाज के अच्छे पुरुष, अपने इन साथियों की सोच में अच्छाई का खाद-पानी डालिए ना. हमारी खातिर नहीं, अपनी खातिर. ###