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Tuesday, April 28, 2009

अपने होने का गौरव -बोध

चुनाव नज़दीक है, बल्कि देश के कई भागों में चुनाव शुरू भी हो चुके हैं। छाम्माक्छाल्लो के शहर मुम्बई में यह ३० अप्रैल को है। छाम्माकछाल्लो इस विचार में डूबी हुई है की किसे वोट दे? यह मात्र उसी की नहीं, बल्कि हर आम मतदाता की स्थिति है। हर मतदाता आज अपने आपसे पूछ रहा है की क्या हम भारतीय हैं? क्या हम भारतीयता का अर्थ समझते हैं? ऐसे कौन से तत्व हैं जो हमें अपने भीतर भारतीय होने का गौरव बोध कराये और हम भारतीय मूल्यों, परम्पराओं, प्रतीकों, संस्कृति आदि के असली और नकली रूप में भेद करा सकें।
देश सदियों से गुलाम रहा है। देखा जाए तो हम अभी भी मानसिक रूप से गुलाम हैं। ऐसा नहीं रहता तो आज अपने देश में हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं की ऎसी हालत नहीं रहती। लोगों के दिमाग में यह बात बिठा नहीं दी जाती की अन्ग्रेज़ी जाने बिना कोई भी भारतीय तरक्की नहीं कर सकता। अपने ही परिधान हमें भार स्वरूप नहीं लगते। नेकटाई आन-बाण-शान का प्रतीक नहीं मानी जाती। छुरी-कांटे से ही खाना असली नफासत नहीं मानी जाती। भारतीय अतीत का केवल गुणगान नहीं किया जता, बल्कि उसे मनसा, वाचा, कर्मणा व्यवहार में लाया जता। भारतीयता महज एक फैंसी शब्द बनाकर नहीं रह गया होता। भारतीय संस्कृति के नाम पर हम झूठे रीति-रिवाजों और साद-गल चुकी मान्यताओं को नहीं धोते रहते। स्त्री को देवी माने जाने वाले देश में बेटी बचाओ जैसे नारे नहीं खोजने पड़ते। स्वयंवर की प्रथा वाले देश में मोरल पुलिसिंग के नाम पर लड़कियों के साथ वहशियाना सलूक नहीं किए जाते। रूखी-सूखी खाई के धंधा पानी पीव वाले देश में दहेज़ के नाम पर मासूमों की बलि नहीं ली जाती। हर स्त्री को लड़की को माँ-बहन-बेटी समझनेवाले देश में अबोध बच्चियां, दिन-रात यौन-पिपासा की पूर्ति का माध्यम नहीं बनातीं। भाई-भाई का प्रेम कहीं पिछवाडे पडा अन्तिम साँसे नहीं ले रहा होता। जिस देश को आजाद कराने मैं हमारे लाखों लोग शहीद हुए, उनके घर-परिवार तबाह हुए, ऎसी मशक्कत और मुशिक्लात से हासिल आजादी को अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए डाव पर नही लगाए होते। अपनी तिजोरी भरने में नहीं लगे होते। कृषि प्रधान देश में खेती की इतनी बुरी हालत नहीं हुई होती की किसान आत्म ह्त्या करें। किसान, मजदूर व् सर्वहाराओं के प्रति हमारे मन में इतनी उपेक्षा के भाव न भरे होते। नौकरी या सफ़ेद पोश कर्म हमारे बेहतर जीवन स्टार के प्रतिमान न मान लिए जाते। अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए प्राकृतिक संसाधनों का पर्यावरण के बिगड़ जाने की हद तक दोहन नहीं करते। वसुधैव कुटुम्बकम वाले हमारे देश में धर्म, भाषा, जाती के आधार पर खून-खराबे नहीं होते। देश की बुनियादी ज़रूरत -सुरक्षा के नाम पर हम दिन- रात दंगे और आतंक की भट्टी में नहीं झोंक दिए जाते। अपने ही राष्ट्र-गान और गौरव के प्रतीक उपमान साम्राज्यवाद की आंच में नहीं झुलस रहे होते।
हमें तय करना है की क्या ये सब जो ऊपर कहे गए हैं, हमारे भी व्यवहार में मौजूद हैं? और अगर ये सब मौजूद हैं तो क्या इन सबके बाद भी हमें ख़ुद को एक सच्चा भारतीय कहलाने में गौरव का अनुभव होता है? यदि हाँ तो हम स्वयं यह तय करें की हम कैसे भारतीय हैं? और यदि नहीं तो इन सबसे निजात पाने के क्या उपाय हैं? कैसे मन से गुलामी की जंजीर तोडी जाए, नफ़रत को मिटाया जाए, स्व-सम्मान को आगे बढाया जाए? मानव-माना का एक दूसरे पर विशवास कायम किया जाए? देश के निर्माण की फ़िर से यह बेला है। अपने देश का अच्छा कल हमें ही बनाना है। यह सब कैसे होगा, छाम्माक्छाल्लो इस विचार में डूबी हुई है। आप सब भी सोचें और बताएं।

Friday, April 17, 2009

पुलिस और जनता का साथ

पुलिस के लोग अब ख़ुद ही अपनी छवि को लेकर चिंतित हैं और उसे संवारने की हर सम्भव कोशिश में लगे हुए हैं। इसका ताज़ा उदाहरण है, मुम्बई के अतिरिक्त पुलिस कमिश्नर श्री सुरेश खोबदे का मोहला अभियान। श्री खोबदे ने पिछले शनिवार को मुबई उत्तर के साहित्यकारों से मिलाने का कार्यक्रम ररखा था। छाम्माकछाल्लो को भी इसमें आने का निमंत्रण मिला। छाम्माक्छाल्लो को इस बात का एहसास था की वहां मराठी साहित्यकार की प्रधानता होगी। उसने आमंत्रण करनेवाले से पूछा भी की इसमें कौन कौन से लोग बुलाए गए हैं। छाम्माक्छाल्लो को बताया गया की हिन्दी, मराठी, उर्दू के साहित्यकार बुलाए गए हैं और विषय आतंकवाद से कैसे निपटें पर है।

अपनी उत्सुकता में छाम्माक्छाल्लो वहा पहुँची। मराठी के साहित्यकारों के अलावे हिन्दी के वहा मात्र एक और व्यक्ति थे। खैर। बातचीत में श्री खोबदे ने अपनी बात रखी। १९८४ में वे भिवंडी में तैनात थे। भिवाडी महाराष्ट्र का दंगा प्रधान इलाका। है। वहा दंगे अनारदाने की तरह फूटते रहते हैं। श्री खोबदे ने वहाँ के निवासियों और पुलिस की मदद से मोहला कमिटी बनाई, जिसका उअद्देशय था की और वे कुछ कर सकें या नहीं, कम से कम वे अपने मोहल्ले को बचाने की कोशिश करेंगे, अगर दंगे होते हैं, तब। और वे इसमें सफल भी हुए। उनकी सफलता इसी बात से आंकी जा सकती है, की जब १९९२ में बाबरी मस्जिद गिराने के बाद पूरी मुम्बई दनेगे की आग में झुलस रही थी, भिवंडी में कोई दंगा नहीं हुआ।

अब यही तत्व वे मुबई के उत्तरी इलाके में आजमाना चाहते हैंअपने ११७ स्लाइड्स के पार प्वायंट प्रेजेंटेशन में उनहोंने यह बताने की कोशिश की की दंगे और आतंकवाद अब किस तरह से मुबई को खा रहे हैं और मोहला कमिटी के माध्यम से इस पर काबू किया जा सकता हैं। ओपन फॉरम में कई साहित्यकारों ने भी इस पर प्रश्न् उठाया की दंगा और आतंकवाद निहायत ही दो अलग-अलग बातें हैं। सभी के जेहन में २६ नवम्बर, २००८ के आतान्क्वादी हमले की याद ताज़ा ही थी।

श्री खोबदे ने अपने प्रेजेंटेशन में यह भी सामने रखने की कोशिश की की हमारा इतिहास, जिसमें घटनाए हो चुकी हैं, गया हैं, उसे बदला नहीं जा सकता। कोर्स की किताबें भी वे नहींं बदल सकते। वे लोगों की सोच को भी नहीं बदल सकते। बस मानसिकता जरूर बदल सकते हैं।

छाम्माक्छाल्लो ने अपने सवाल में यह कहा की इतिहास को नहीं बदला जा सकता, यह सच हैं, मगर कोर्स मों जो भ्रामक बातें रखी गई हैं और जिनके कारण बच्चे बचपन से ही भारत के दो मुख्य सम्प्रदायों के प्रति नफ़रत उअगालाने लगते हैं, उसे पुलिस या साहित्यकार या समाज के अन्य रसूखवाले गन मान्यों के हस्तक्षेप से बदला जा सकता हैं। दूसरी बात उसने कही की दंगा और दहशतवाद अब दो छीजे हो गई हैं। तीसरी बात की अभी दहस्घत्वाद को एक अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप दे दिया गया गई। हमारे अपने देश के भीअत्र दहशत के कई तत्व सामने हैं। लेकिन हैरानी हैं की इस दहशतवाद को दहशतवाद नहीं माना जाता हैं। एक सम्प्रदाय के ख़िलाफ़ काफी कुछ बोला तो जाता हैं, मगर किसी एक राजनीतिक पार्टी-विशेष के प्रति हम बोलने से डरते हैं। एक कोई पार्टी किसी भी बात के लिए एक नोटिस लगा देती हैं और सारा शहर उसे मानने के लिए बाध्य हो जता हैं, वरना अंजाम कौन भुगते? जैसेराज्यों से आए बच्चों के साथ दुर्व्यवहार किया जाता हैं। क़ानून व्यवस्था को लोग अपने हाथों में ले कर निरपराधों को सताते हैं। ऐसे में पुलिस की भुमिका महत्वपूर्ण होती हैं। आश्चर्य की छाम्माक्छाल्लो के इन सवालों को चुप्पी से ताल दिया गया ।

श्रीका यह प्रयास बेहद सही हैं की वे साहित्यकारों व् समाज के अन्य बुद्धिजीवियों और गणमान्यों के साथ पुलिस के दोस्ताना व्यवहार की बात करते हईं, ताकि पुलिस के लोग इन व्यक्तियों के प्रभाव से अपने -अआप्काओ और भी बेहतर बना सकें और अपनी छवि सुधार सकें। सही भी हैं- सांगत काअसर व्यक्ति पर बहुत पङता हैं। कहा भी गया हैं, सांगत से गुन आत हैं, सांगत से गुन जात। सारे समय बदमाशों और असामाजिक तत्वों से डील करनेवाले पुलिसकर्मी सचमुच चाह कर भी नहीं बने रह पाते होंगे जिसका खामियाजा शरीफ लोगों को भुगतना पड़ जाता हैं। समाज के सज्जनों की सांगत उनमें निश्चित रूप से गुणात्मक परिवर्तन लाएगी। श्री खोबदे की यह स्वीकारोक्ति भी अपने आप में परिवर्तन की चाह रखने वाले एक पुलिस कर्मी की चाह हैं, और उनकी इस चाह का सम्मान किया जाना चाहिए। आख़िर अच्छे लोग तो हर जगह होते हैं। इसी पुलिस को छाम्माक्छाल्लो ने कई मौकों पर लोगों की मदद करते हुए भी देखा हैं। ये कुछ और ज़्यादा जनता के दोस्त बन जाएँ, उनके सरोकारी बनें, यह बहुत ही स्वागत योग्य कदम हैं।

Wednesday, April 8, 2009

१००%इन्वाल्वमेंट -टूटी नाक, टूटी तलवार

छाम्माक्छाल्लो एक थिएटर वर्कशाप में भाग ले रही थी। इसका संचालन जाने-माने रंगकर्मी श्री आर एस विकल कर रहे थे। मन की ३ अवस्थाये- चेतन, अवचेतन, अचेतन के बीच मन यात्रा करता है और इनले परस्पर संयोजन से अभिनेता और पात्र अपना -अपना काम करते हैं। अभिनेता की अपनी ऊर्जा होती है, जिसे पात्र के अनुसार ढालना अभिनेता का कार्य होता है। अभिनेता व् पात्र की ऊर्जा का परस्पर संयोग अभिनय में निखार लाता है। - ये सब कुछ मूल बातें हूँ रही थीं। वर्कशाप अपनी गति से आगे की और जा रहा था। विकल जी ने अचानक पूछा की अभिनय करते समय एक्टर को पूरी तरह से इन्वाल्व हो जाना चाहिए या कुछ कम इन्वाल्व होना चाहिए। वे यह प्रश्न पहले भी पूछ चुके थे। नए आए सहभागी ने छूटते ही कहा की पूरी तरह से डूब जाना चाहिए। विकल जी ने इस पर चर्चा को आगे बढाते हुए कहा की यह सही नही है। पूरे इन्वाल्वमेंट से बहुत सी गलतियाँ होने की संभावनाए रहती हैं। पिछले ग्रुप में उनहोंने इसका उदाहरण दिया था, जब थिएटर एक्सरसाइज करते समय एक ग्रुप वहा रखे प्रापर्टी से टकरा गया था। इस ग्रुप के भी नए सदस्य को उनहोंने बोला कर बताया । पूरी कार्यशाला में अभ्यास के लिए उनहोंने छाम्माक्छाल्लो के लिखे मोनोलाग "बलाचंदा" को आधार बनाया। उस दिन सभी ने उसके एक अंश को पढा। फ़िर सभी ने उसे अभिनय करते हुए पढा।
दूसरे दिन थिएटर गेम्स के लिए हम दूसरी जगह गए जो बहुत बड़ी थी। वह एक पार्क था। वहाँ पर कल की बातों पर चर्चा हुई और इसके बाद अभ्यास शुरू हो गए। पहला गेम था वजन उठाने का। लकडी के एक बड़े कुंड को पूरे समूह द्वारा उठाना था। साथ में बलाचंदा नाटक के पढ़े हुए अंश को ही इस वजन को उठाते हुए और चलते हुए बोलना था। यहाँ हम आपको बता दें की वजन, लकडी का कुंदा सभी कालपनिक था। हम सब इसे कर रहे थे। तीन-चार बार के टेक-रीटेक के बाद यह कुछ सुधारे हुए रूप में सामने आया।
अब दूसरा गेम था - फुटबाल खेलना। सभी को कहा गया की किक मारे बगेर ही फुटबाल को उनके पास लाना है। जो सबसे पहले उसे ले कर आयेगा, वह विजेता होगा। पहली बार में छाम्माकछाल्लो जीत गई। पर इसमें कुछ सहभागी देर हो गए। इसलिए गेम फ़िर शुरू हुआ। और जो सबसे नया सहभागी था, उसने १०० % इन्वाल्वमेंट के साथ खेलना शुरू किया। और जी बस, दौड़ते-भागते उसने अपना हाथ इस तरह से फेका की उसकी पूरी वजनदार मुट्ठी पूरे वेग से छाम्माक्छाल्लो की नाक पर पडी। नाक के दो तुकडे हो गए। दाहिनी तरफ़ से नाक तिरछी हो गई, बाई तरफ़ की हड्डी अलग हो गई। अभी वह इलाज करा रही है और फिलहाल टूटी नाक के साथ घूम रही है।
इसके अगले दिन जाने माने एक्टर राजेश विवेक आए थे। अपने अनुभव में वे सूना रहे थे १००% इन्वाल्वमेंट से क्या-क्या खतरे होते हैं। वे और मनोहर सिंह एक दृश्य में तलवारबाजी कर रहे थे। जीतना मनोहर सिंग को था। परन्तु राजेश विवेक ने पूरे इन्वाल्वमेंट के साथ सीन किया और इतने जोर से तलवार मारी की मनोहर सिंह की तलवार ही टूट गई। वह तो इन सबकी अपनी बुद्धि का कमाल की तुंरत वे बोले- "मैं निहाथ्ठे पर वार नहीं करता। इन्हें दूसरी तलवार दी जाए।" एक अभिनेता भागकर अन्दर से दूसरी तलवार ले कर आया और तब नाटक आगे चला।
यह १००% का इन्वाल्वमेंट केवल नाटक या अभिनय करते समय ही नहीं, हर जगहइससे सावधान रहने की ज़रूरत है। उस दिन मनोहर सिंह की तलवार टूटी। आज छाम्माक्छाल्लो की नाक टूट गई है। तलवार तो नाटक में टूटी। नाक वास्तव में टूट गई। कब तक यह ठीक होगी, होगी भी की नहींं, पाता नहीं। पर, यह सबक जीवन भर का हैआप इससे सहमत हैं या नहीं, हमें ज़रूर बताये।