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Friday, March 6, 2009

जेल में राजेन्द्र बाबू की कैदी के रूप में सबसे बड़ी लाचारी

इस बार डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद पर कुछ लिखने से पहले लेख पर छपी टिप्पणियाँ आपके अवलोकन के लिए। इसे हमारे मित्र व् राजेन्द्र बाबू के अनन्य भक्त हर्ष प्रसाद ने लिखा है। छाम्माक्छाल्लो अब से हर लेख पर पुस्तक का नाम आदि विवरण देने का प्रयास करेगी। आप सभी पाठकों और शुभ चिंतकों से अनुरोध है की इस किताब को खरीद कर बालिकाओं को साक्षर बनाने में अपना योगदान दें। हर्ष जी की टिपण्णी यहाँ प्रस्तुत है. vaise harSh jii, kahiin kuchh bhii avaidh kaary nahiin ho rahaa hai raajendr baaboo ke baare mein jaanakaarii dene mein. kaii baar pustak kaa naam aadi diyaa jaa chukaa hai, kaii baar rah gayaa hai. )

(आदरणीया विभा जी, राजेन्द्र बाबू की जीवनी के इतने अंतरंग उल्लेख तो आपने निश्चित ही कहीं से उद्हृत किये होंगे। हम पाठकों को उन संदर्भ ग्रंथों की सूची चाहिए, अन्यथा ऐसी कहानियाँ भ्रामक भी हो सकती हैं और यदि कहीं से उद्हृत हैं तो सन्दर्भ पुस्तक के बारे में न बताना अवैध और अनधिकृत होता है।इस सन्दर्भ में हमारी चर्चा हो चुकी है.जिस किताब से ये कहानियाँ अपने ब्लॉग पर आप धड़ल्ले से उध्रित करती जा रहीं हैं, आप को अच्छी तरह मालूम है किइस किताब की प्रत्येक प्रति की बिक्री से प्राप्त अल्प धनराशि बिहार की अप्राधिक्रित, पददलित और शोषित बच्चियों के नाम जाती है. इस सन्दर्भ में हमारे और आपके बीच चर्चा हो चुकी है. ऐसी लेखिका जो 'बालचंदा' और 'अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो' जैसे नाटक लिख सकती है, उसका सब कुछ जानते हुए भी ऐसा संवेदनाविहीन होना खटकता है. हर्ष)

जेल में हर प्रकार की बड़ी या छोटी लाचारियाँ होती हैं। अगर वह न रहे तो जेल जेल ही न रहे। इन लाचारियों में भी सबसे बड़ी लाचारी तब होती है, जब बंदी अपने सगे-सम्बन्धियों, स्नेहियों, मित्रों को महाविपत्ति में पडा सुनता है और उनके साथ दुःख बांटना तो दूर, दिलासा के दो शब्द भी नहीं कह सकता। ऐसे में सबसे बड़ा संकट होता है किसी की बीमारी या मृत्यु।

राजेन्द्र बाबू अन्तिम बार ९ अगस्त, १९४२ से १५ जून, १९४५ तक पटना जेल में रहे। ज़ाहिर है, इतनी बड़ी अवधि में कई दुखद घटनाएँ घटीं। इन सभी से राजेन्द्र बाबू को बड़ा कष्ट होता। अपने घर में भी बड़ी दुखद मृत्यु उनकी बड़ी भतीजी की हुई। वे पटना आकर, जेल में राजेन्द्र बाबू से मिलकर अपने घर वापस गईं। वहीं कुछ दिनों बाद उनकी मृत्यु हुई। घर में सभी भही -बहनों में सबसे बड़ी होने के कारण वे सबकी बहुत प्यारी थीं। राजेन्द्र बाबू को उनकी मृत्यु से बहुत दुःख हुआ।

मित्रों में सबसे पहले गए गांधी जी के निजी सचिव महादेव देसाई। च्मपारण के आन्दोलन के समय उनसे राजेन्द्र बाबू की घनिष्ठ दोस्ती हो गई थी। महादेव भाई के निधन से उनका पूरा परिवार बहु दुखी हुआ। गांधी जी का तो मानो दाहिना हाथ ही टूट गया।

बिहार में भी कई मित्र इस दरम्यान गुजर गए। विशेषकर वैद्यराज ब्रजबिहारी चतुर्वेदी जी का जाना। वे पीयूशामानी तो थे ही, आयुर्वेद के पुनरुद्धार के लिए बड़ा परिश्रम किया था। अन्यों में बिहार के कांग्रेसी नेता बाबू राम दयाल सिंह का नाम आता है। वैसे ही एक बुजुर्गवार मित्र थे डाक्टर सर गणेश दत्त सिंह। राजनीतिक मेल उनका कभी नहीं रहा, मगर सामाजिक व्यवहार में वे बहुत ही मधुर व् स्नेही थे। राजेन्द्र बाबू के साथ उनका प्रेम राजनीतिक विरोधों के बावजूद एक समान बना रहा।

जेल में रहते हुए ये सब लाचारियाँ राजेन्द्र बाबू ने खूब झेलीं।

साभार- पुन्य स्मरण, मृत्युंजय प्रसाद, विद्यावती फाउन्देशन, २७४, पाताली पुत्र कालोनी, पटना- 800013

Thursday, March 5, 2009

बाबा, फ़िर जेल कब जाओगे?

डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद जब पटना सदर जेल में थे, तब श्री गोडबोले के आदेश से कई डाक्टरों ने उनकी जांच की। इससे धीरे-धीरे उनकी सेहत में सुधार आने लगा। कुछ दिन बाद निकट के सम्बन्धियों से मुलाक़ात की सुविधा मिलाने लगी। एक माह में २ मुलाकातें और २ पात्र लिखने की छूट थी। राजेन्द्र बाबू ने पात्र लिखने के बदले मुलाक़ात का विकल्प लिउया। यानी अब माह में ४ मुलाकातें यानी हर हफ्ते मुलाक़ात। मुलाक़ात में पहले केवल ५ लोगों को जाने दिया जाता था। बाद में घरवालों के लिए इसमें थोड़ी छूट मिलाने लगी। बीमारी के कारण राजेन्द्र बाबू से मुलाकातें उनके लिए तय कमरे में होती थी, बाद में वही कमरा उन्हें दे भी दिया गया रहने के लिए। मुलाकातें भी इसी कमरे में होतीं। राजेन्द्र बाबू उस कमरे में १९४२ से १९४५ तक रहे। उनके साथ दूसरे बड़े लोग, जो वहाँ कैद करके लाये गए थे, वहीं उनके साथ रहे। उनकी देखभाल के लिए पहले बाबू मथुरा प्रसाद और बाद में श्री चक्रधर शरण वहीं रखे गए। हजारीबाग जेल से पारी-पारी कई अन्य मित्रों को भी सरकार वहाँ ले आई।
मुलाक़ात के लिए सारा परिवार, जो उस दिन पटना में होता, जाता। ५ की गिनती में बच्चे नहीं आते थे। १९४२ में राजेन्द्र बाबू का पोता अरुणोदय प्रकाश लगभग एक साल का था। वह भी जाता था। धीरे-धीरे वह चलने और दौड़ने लगा। जेल के फाटक पर पहुंचाते ही उसे खोलने के लिए शोर मचाने लगता। अपनी तोतली जुबां में पुलिस को दांत भी लगाता। फाटक खुलते ही वह सीधा राजेन्द्र बाबू के कमरे की दौड़ लगाता। वह उसे ही अपने बाबा का घर समझ बैठा था। जेल में बच्चों को २-३ बार मिठाईयां मिलीं। फ़िर क्या था, बच्चे वहाँ पहुंचाते ही खाने-पीअने की फरमाइशें शुरू कर देते। राजेन्द्र बाबू भी मुलाक़ात के दिन पहले से ही इसका प्रबंध करके रखते।
बच्चों को सप्ताह में एक बार बन-संवर कर जेल जाने की आदत पड़ चुकी थी। इसे वे सैर-सपाटे का एक हिस्सा मानने लगे थे। इसमें मिठाई का भी काफी लोभ थाजब १९४५ में राजेन्द्र बाबू छूटकर घर आए तो उनके पोते को बड़ी खुशी हुई। फ़िर जब उसके जेल जाने यानी सैर का दिन आया तो उसे न कोई बाबा के घर (जेल) ही ले गया और ना ही किसी ने उसे मिठाई ही दी। तब उसे बाबा का घर आना रुचा नहीं। तीसरे-चौथे दिन तो उसने पूछ ही liyaa-" बाबा, फेर जेल कब जैईब'?

Wednesday, March 4, 2009

जेल में राजेन्द्र बाबू का पुस्तक-लेखन

पटना जेल में जब डा राज्नेंद्र प्रसाद की सेहत काफी सुधर गई, तब उनहोंने किताब लिखने का काम अपने हाथ में ले लिया। पहली पुस्तक अन्ग्रेज़ी में लिखी गई थी, पाकिस्तान की मांग को लेकर। अपनी आत्मकथा में वे लिखते हैं-" कुछ ऎसी पुस्तकें, जो पाकिस्तान के समर्थन में लिखी गई थीं, मंगाई। उनको पढ़ने के बाद विचार हुआ की जिस आधार पर यह मांग पेश की जाती है, वह कहाँ तक ठीक है? यह भी देखना है की मुस्लिम लीग पाकिस्तान किसे कहती है? उसकी मांग यदि कोई मान ले तो उसे क्या देना होगा और मुस्लिम लीग को क्या मिलेगा? क्या पाकिस्तान अपने पांवों पर खडा हो सकेगा? अंत में सोचा की इस पर लिकहें की कुछ गुंजाइश है।"
इसा प्रकार सालों के घोर श्रम के बाद पुस्तक तैयार हुई। इसके लिए अन्य पुस्तकालयों सहित पटना के 'श्री सच्च्चिदानंद लाइब्रेरी से बहुत मदद मिली। सरकार ने भी वे किताबें जेल में जाने दीं। पुस्तक लिखी जा रही है, यह समाचार जेल से छूटकर आनेवालों से बाहर के लोगों को मिल गया और प्रकाशित भी हो गया।
राजेन्द्र बाबू आगे लिखते हैं की " कमिश्नर आए और पुस्तक कहाँ तक पूरी हुई है, इस बाबत पूछा। वे बोले की करीब-करीब पूरी हो चुकी है। उनहोंने देखना चाहा। राजेन्द्र बाबू ने हस्त लिखित बहियाँ उन्हें थमा दीं। एक तो महीन अक्षर लिखने के आदी राजेन्द्र बाबू, दूसरी और जेल में कागज़ की कमी के कारण और भी महीन अक्षरों का प्रयोग। कोई नई बात सामने आने पर उसे यहाँ-वहाँ चस्पां कर देना। इसलिए किसी दूसरे के लिए पुस्तक पढ़ना काफी मुश्किल था। कमिश्नर ने पूछा की क्या किताब छपाने का इरादा है? वे झट से बोले की अगर सरकार इज्ज़ज़त देगी तो छपाई जाएगी। वे बोले की बगेर देखे सरकार इसकी इज्ज़ज़त नहीं देगी। हस्तलिखित जो हालत है, उसमें तो इसे देखना भी मुश्किल है। तैअप प्रति ही सरकार देख सकेगी। राजेन्द्र बाबू ने कहा की टैप कराने का साधन मेरे पास नहीं है, मगर सरकार सुविधा दे तो टैप हो सकता है।"
टैप कराने के लिए ३ तरीके राजेन्द्र बाबू ने सरकार को सुझाए-१), उनके सहायक श्री चक्रधर शरण को टैप कराने का मौका दें, जो उनके अक्षरों से बखूबी परिचित हैं। वे उस समय तक रिहा हो चुके थे, इसलिए वे जेल के अन्दर आ नही सकते थे। न सरकार राजेन्द्र बाबू को रिहा करेगी, न पुस्तक बाहर जा सकेगी। इसलिए उनको जेलर के दफ्तर में बैठ कर टैप करना होगा। टैप और हस्तलिखित प्रति जेलर के दफ्तर में ही छोड़ना होगा। २) सरकार इसके लिए किसी कर्मचारी को नियुक्त कर दे और इसके लिए जो खर्चा होगा, वे दे देंगे। '३) यदि कोई टैप करनेवाला कैदी हो तो उसे बांकीपुर जेल में बुला लिया जाए। राजेन्द्र बाबू को याद आया की जमाशेदा पुर युनियन लेबर के मंत्री श्री माइकेल जान टैप करना जानते हैं। इससे उन्हें टाईप कराने में काफी सुविधा हो जाएगी। सरकार के लिए यह बात अच्छी रहेगी की उससे पहले बाहर का कोई भी आदमी इसे देख नहीं पायेगा।
इसा तरह से माकेल जान पटना आए। संयोग की बात की किताब की टाइपिंग का काम १४ जून, १९४५ को पूरा हुआ और १५ जून १९४५ को राजेन्द्र बाबू जेल से रिहा हुए।
इस किताब के आनाकदों की जांच का काम दूसरे राजनीतिक कार्यकर्ता और विग्न्यानावेत्ता श्री मनीन्द्र कुमार घोष ने किया। बाहर आने पर किताब के बचे खुची अंश को पूरा किया गया। पुस्तक का पहला संसकरण जनवरी, १९४६ को "इंडिया दिवैदेद" के नाम से छापा और एक माह के भीतर ही इसकी सारी प्रतियाँ बिक गईं। बाद में 'खंडित भारत' के नाम इस इसका हिन्दी संसकरण भी आया। पाकिस्तान कीआयातियों में से ऐसा कोई भी नहीं निकला, जो किताब पर बहस करता या उसमें कोई भूल निकालता। बस वे अपने अनुयायियों को इस किताब को पढ़ने से मना करते। वे कहते की यह तो 'ज़हर कातिल' है। जो पढेगा, उसकी अक्ल मारी जायेगी। मगर इस घातक जहर का कोई बुद्धि सांगत जवाब उनके पास नहीं होता। इसके उलट पाकिस्तान के जनादाता मो। अली जिन्ना ने हिन्दू-मुसलमान दो राष्टों की बात छोड़कर कुछ वैसी ही बातें पाकिस्तान की संविधान सभा में ११ अगस्त, १९४७ को कही थी, जैसी की वे २०-२५ साल पहले पाकिस्तान का सपना देखने के लिए कहा करते थे। उनहोंने कहा था- " बहुसंख्यक और अल्प संख्यक समुदायों, हिन्दुओं, और मुसलमानों का अन्तर दूर हो जायेगा, क्योंकि आख़िर मुसलमानों में भी पठान, पंजाबी, शिया, सुन्नी, जैसे भेद तो हैं ही, जैसे की हिन्दुओं में ब्राहमण, वैशनव, खत्री, बंगाली, मद्रासी के भेद हैं। हिन्दुस्तान की आजादी हासिल कराने में ये ही भेद सबसे बड़े रोड थे और ये न होते तो हम बहुत पहले ही आज़ाद हो गए होते। दुनिया की कोई भी ताक़त किसी राष्ट्र को, ख़ास कर ४० करोड़ आबादीवाले राष्ट्र को बहुत समय तक गुलाम बना कर नही रख सकती। तुम्हारा कोई धर्म हो, तुम किसी जात-पांत के हो, इसका राज-काज से कोई नाता नहीं। हमें अपने सामें यही आदर्श रखना चाहिए और तब हम देखेंगे की अपने-अपने धर्म में आस्था रखते हुए हिन्दू हिन्दू रहेंगे और मुसलमान मुसलमा। और सभी देश के एक समान नागरिक होंगे, नागरिक की जगह पर न कोई हिन्दू होगा और न कोई मुसलमान।" अफसोस की जिन्ना साहब के भाषण के संग्रह में से भाषण का यह अंश हटा दिया गया गई।

-साभार, पुन्य स्मरण, मृत्युंजय प्रसाद

Monday, March 2, 2009

मिर्जा गालिब

छाम्माक्छाल्लो के एक मित्र हर्ष प्रसाद ने मिर्जा ग़ालिब पर यह जानकारी भेजी है। छाम्माक्छाल्लो इसे आपके साथ शेयर कर रही है। अपने विचार ज़रूर देवें। उन्हें भी यह सीडी बात ब्लॉग से मिला है। हर्ष और सीधी बात -दोनों के लिंक यहाँ पर हैं।
Extracted from;
www.sidhibat.blogspot.com
आज से दो सौ ग्यारह साल पहले आगरा की धरती पर जन्म लिया था उस शख्स ने। उस जैसा आज तक कोई दूसरा नहीं हुआ और आगे शायद ही हो। वह बचपन से ही कोई आमशख्स नहीं था। उसे तो जैसे खुदा ने बड़ी तबीयत से गढ़ा, इस जहां के लिए। उसके हृदय में दुनिया के तमाम कवि हृदयों की गहराइयों को समेटकर एक साथ डाल दिया। उसके मस्तिष्क में जीवनदर्शन की अंतिम ज्योति भी प्रज्जवलित कर दी। पर शायद खुदा उस शख्स को गढ़ने के दौरान कवि हृदय की असीम गहराई और मानव जीवन दर्शन के अनंत ज्ञानलोक में खो गये, तभी तो वे उस नायाब शख्स की तकदीर पर विशेष ध्यान नहीं दे सके। उस शख्स के जीवनकाल की भौतिक समृद्धि और पारिवारिक सुख से नजरें चूक गईं। फिर भी, जो दिया दिल खोलकर दिया, जैसा आज तक किसी को नहीं मिला। तभी, उस शख्स के अक्स को मिटा, छिपा पाने में वक्त की परतें सौकड़ों साल बाद भी नाकाम हैं। उस शख्स की जुबां से निकले शेर के एक-एक शब्द की गहराइयों में उतरना एक नए अनुभव से गुजरने जैसा है। जाहिर है हम बात कर रहे हैं, उसी अज़ीम शख्स की, जिसका पूरा नाम मिर्ज़ा असदउल्लाह खां और जिसे सारा ज़माना मिर्ज़ा ग़ालिब के नाम से जानता है।
चौड़ा-चकला हाड़, लंबा कद, सुडौल इकहरा जिस्म, भरे-भरे हाथ-पैर, सुर्ख चेहरा, खड़े नाक-नक्‍श, चौड़ी पेशानी, घनी लंबी पलकें, बड़ी-बड़ी बादामी आंखें और सुर्ख गोरे रंग वाले मिर्ज़ा ग़ालिब का व्यक्तित्व बेहद आकर्षक था। ऐबक तुर्क वंश के इस शख्स का मिजाज ईरानी, धार्मिक विश्‍वास अरबी, शिक्षा-दीक्षा फारसी, भाषा उर्दू और संस्कार हिन्दुस्तानी था। दस-ग्यारह साल की उम्र में मकतब (पाठशाला) में पढ़ाई के दौरान ही ग़ालिब की जुबां से एक से बढ़कर एक शेर निकलने लगे थे। शेर सुनकर लोग अक्सर उसकी अवस्था और शेर के ऊंचे दर्जे से भौचक्के रह जाते थे। इस शख्स ने पच्चीस पार करने से पूर्व ही उच्चकोटि के क़सीदे और ग़ज़लें कह डाली थीं। तीस-बत्तीस के होते-होते ग़ालिब ने अपनी शेरो-शायरी की जादूगरी से कलकत्ते से दिल्ली तक हलचल-सी मचा दी थी। उस ज़माने में दिल्ली में खासा शायराना माहौल हुआ करता था। दिल्ली के बादशाह बहादुरशाह जफ़र खुद शायर थे। आए दिन शेरो-शायरी की महफिलें जमती थीं। इन महफिलों में ग़ालिब ने अपने कलाम पढ़कर न जाने कितने ही मुशायरे लूट लिये। इस शख्स के शेर तो खासमखास होते ही थे, अंदाज-ए-बयां भी अलहदा था। जिस पर सुनने वाले लुट-लुट जाते थे। उस्तादों के उस्ताद ग़ालिब कभी किसी उस्ताद शायर के शार्गिद नहीं बने, उन्हें तो जैसे कवित्वमय इस सुंदर दुनिया की रचना करने वाले सबसे बड़े उस्ताद ने ऊपर से ही सब कुछ सिखाकर धरती पर भेजा था। इतना कि वे शायरी जगत के समकालीन बड़े-बड़े उस्तादों के शेरों की नुक्ताचीनी भी कर दिया करते थे।
जैसा कि हर उस शख्स का मिजाज कुछ खास होता है, जो आम से हटकर और आसाधारण प्रतिभा का धनी होता है, ग़ालिब का मिजाज भी बेशक अलहदा था। दृढ़ स्वाभिमानी, जो निश्‍चय कर लिया, वह ब्रहमलकीर, जो कह दिया, उससे डिगना नामुमकिन। लेकिन उनकी भौतिक तकदीर सजाने में जैसे खुदा से चूक हो गई हो, उनका जीवन इस धरती पर भौतिक सुख के लिए सदा तरसता रहा। बावजूद इसके कभी उन्‍होंने अपने मिजाज या कहें दृढ़ स्वाभिमान से समझौता नहीं किया। उस अजीम शख्स के जीवन में धन की तंगी तो रही ही, पारिवारिक सुख भी बहुत कम ही मिला। आगरा में 28 दिसंबर 1797 में उनके जन्म लेने के कुछेक साल बाद ही पिता और चाचाजी चल बसे। बचपन में ही वे अनाथ सरीखे हो गए। लालन-पालन ननिहाल (आगरा) में हुआ। जब उन्होंने होश संभाला आर्थिक तंगहाली को अपने साथ पाया और यह ताजिंदगी उनके साथ रही। लेकिन इससे उस शख्स ने कभी हार नहीं मानी। उनकी जीवनशैली कोई आम नहीं, रईसों की थी। कर्ज में डूबकर भी, अपने रईसी शौक से कभी उन्होंने तौबा नहीं की। करेला, इमली के फूल, चने की दाल, अंगूर, आम, कबाब, शराब, मधुरराग और सुंदर मुखड़े सदा उन्हें आकर्षित करते रहे। तभी तो ग़ालिब ने अपने एक शेर में कहा-
कर्ज की पीते थे मय और समझते थे कि हां
रंग लाएगी हमारी फाकामस्ती एक दिन
एक बार कर्ज के पहाड़ ने ग़ालिब को अपने घर में बंद रहने तक को मजबूर कर दिया, जब एक दीवानी मुकदमे में उनके खिलाफ पांच हजार रुपये की डिग्री हो गई। क्‍योंकि उस जमाने में कर्जदार व्यक्ति यदि प्रतिष्ठित होता, तो उसे घर के अंदर से गिरफ्तार नहीं किया जा सकता था। ऐसी दुर्दशा में भी मिर्जा साहब अपने शतरंज और चौसर खेलने के शौक को पूरा करते थे। दिल्ली के चांदनी चौक के कुछ लौहरी मित्र के बीच जुआं चला करता था, जो ग़ालिब के घर पर ही जुआं खेलने पहुंच जाते थे। बादशाह घराने के कई लोग, धनवान जौहरी से लेकर शराब विक्रेताओं तक और दिल्ली के पंडितों, विद्वानों से लेकर अंग्रेज अधिकारियों तक अनेक लोग उस शख्स की बेमिसाल शायरी के कद्रदान थे और जो इनके खास मित्र भी हुआ करते थे। बीस-पच्चीस साल की उम्र होने से पहले जवानी में ग़ालिब नृत्य, संगीत, शराब, सुंदरता व जुएं की रंगीन दुनिया से खासा मोहित रहे। मगर इसके बाद इन सब से बहुत हद तक उनका मोहभंग हो गया। यह वक्त जैसे मिर्जा ग़ालिब के जीवन का अहम मोड़ था। वह जीवन दर्शन की दिशा में चल पड़े। उनकी शायरी में सूफियों जैसे स्वतंत्र व धर्मनिरपेक्ष विचार व्यक्त होने लगे। इस दौर में उन्होंने एक शेर लिखा-
हम मुवाहिद हैं, हमारा केश है तर्के-रसुम
मिल्लतें जब मिट गई, अजज़ाए-ईमां हो गई।
मतलब यह कि, हम एकेश्‍वरवादी हैं। हमारा धर्म रूढ़ियों का त्याग है। सांप्रदायिकता का लुप्त हो जाना ही सत्य धर्म का प्रकट होना है।
ग़ालिब से पहले उर्दू शायरी में गुलो-बुलबुल, हुस्नो-इश्‍क आदि के रंग कुछ ज्यादा ही हुआ करते थे। यह ग़ालिब को पसंद न था। इसे वे ग़जल की तंग गली कहते थे, जिससे वे अपने शेरों के साथ गुजर नहीं सकते थे। इसलिए उन्होंने ऐसी शायरी करने वाले उस्तादों को अपने शेरों में खूब लताड़ा। इस कारण इन उस्तादों द्वारा उनका मजाक उड़ाया जाता था, जिसकी उन्होंने कभी परवाह नहीं की। दिलचस्‍प तो यह कि ग़ालिब के शेरों की आलोचना उनसे खिसियाये या घबराये उस्तादों ने जितनी नहीं की, उतनी उन्होंने स्वयं की। यह अजीब ही था कि ग़ालिब अपनी शायरी के कठोर आलोचक भी थे। तभी तो उन्होंने, जब दीवान-ए-ग़ालिब संकलन तैयार करना शुरु किया, तो बचपन से लेकर जिंदगी के अंतिम दौर तक लिखे असंख्य शेरों में से दो हज़ार शेरों को बड़ी बेदर्दी से निरस्त कर दिया। इस कारण ग़ालिब का यह महान संकलन छोटा तो है, लेकिन इसमें जो शेर हैं, वह उर्दू शायरी के सर्वश्रेष्ठ मूल्यों से सिंचित ही नहीं, जीवन दर्शन और आध्यात्मिक आनंद की असीम गहराइयों वाले हैं, जिसमें डूबना आज भी उतना आनंदप्रद है, जितना इसके रचयिता के जमाने में।

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