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Tuesday, June 19, 2012

कहो डॉक्‍टर, ऐसा क्‍यों?

'पाखी' के जून, 2012 के अंक में प्रकाशित कहानी। एड्स के ऊपर लिखी 'हैलो डॉ पारेख" के बाद एक और कहानी- अपनी राय दें। ध्यान दें कि यह सही तथ्यों पर आधारित कहानी है। रत्ना मेरी सहयोगी थी। आज वह इस दुनिया में नहीं है। जाने कितनी रत्ना इस तरह के अवांछित एड्स का शिकार होती होंगी। यह कथा उन सभी भुक्तभोगियों को समर्पित है, तथा चिकित्सा के पेशे में लगे लोगों को भी कि वे लोगों को जीवन दें, न कि उनका जीवन अभिशप्त करें।
कहो डॉक्‍टर, ऐसा क्‍यों?

डॉक्‍टर, मैं एक औरत हूं, एक आम औरत! सामान्‍य सी सूरत, साधारण सी कद-काठी, खींच खाचकर बीए पास। ऐसी कोई खासियत नहीं मुझमें, जिसपर मैं इतराऊं, झूमूं, बल खाऊं, या आप ही जिस पर ध्‍यान देने की कोई खास जरूरत समझें।
मां ने नाम रख दिया रत्‍ना। शायद उसे लगा हो मैं रत्‍न जैसी निकलूंगी। मगर मैं रत्‍न तो क्‍या, एक पत्‍थर जैसी भी नहीं।
हां डॉक्‍टर, नैसर्गिक रूप से ऐसा कुछ भी मुझे नहीं मिला, जिसपर दुनिया नाज करती है और जिसपर मैं भी करती। न दमकता रंग, न महकता रूप, न उन्‍नत कद-काठी, न काले, घने, लंबे बाल, न कजरारी आंखें, ना संतरे जैसे होठ, न सुराहीदार गर्दन, न मदमाती चाल- कुछ भी तो नहीं। दिमाग भी इतना जहीन नहीं दिया कि उसके ही बल पर एमबीए, सीए कर लेती कि डॉक्‍टर, इंजीनियर, आईएएस या आईपीएस बन जाती।
तो इससे मेरा इंसानी रूप कुछ बदल तो नहीं जाता न डॉक्‍टर? मैं इंसान से शैतान या जानवर या किसी निरीह जन्‍तु में तो नहीं बदल गई ना डॉक्‍टर? फिर क्‍यों ऐसा मेरे साथ आपने किया डॉक्‍टर, क्‍यों?
कहते हैं कि विधाता किसी का भी घड़ा एकदम से खाली नहीं छोड़ता. सो दो चार शीशे, पत्‍थर उन्‍होंने मेरी तकदीर की गागरी में भी डाल दिए। झूठ नहीं बोलूंगी डॉक्‍टर... एक चीज मिली मुझे प्रकृति से- मेरा स्‍वभाव- नर्म, संवेदनशील, दूसरों के दुख में दुखी होना, अपने को कष्‍ट में डालकर भी उनके कष्‍ट दूर करने की हर संभव कोशिश करना। इसी के बलबूते मैं अपने को एक इंसान समझती रही। इसे भगवान की कृपा ही समझूंगी कि औसत बुद्धि की होते हुए भी एक अच्‍छी सरकारी कंपनी में नौकरी मिल गई और साधारण शकल-सूरत की होने के बावजूद एक अच्‍छे से घर के अच्‍छे से लड़के से मेरा ब्‍याह भी हो गया। आप तो जानते ही हैं डॉक्‍टर कि चाहे लड़की कैसी भी हो, ब्‍याह होने के बाद ससुरालवालों की उससे सारी उम्‍मीदें बंधती ही हैं। वैसे ही नौकरी कैसी भी हो, उससे बंधी जिम्‍मेदारियां पूरी करने की मांग नियोक्‍ता की रहती ही है। और मैं इसमें कुछ गलत भी नहीं देखती डॉक्‍टर। अगर कोई कुछ देता है तो लेने का पूरा हक है उसे।
मगर आपने तो डॉक्‍टर देने के बदले ले लिया पैसा, शांति, चैन, सेहत, जीवन- सबकुछ।
      मेरी शादी और नौकरी तकरीबन साथ-साथ लगी, हुई। सीधी-सादी अरेंज्‍ड मैरिज। कोई हनीमून नहीं, कोई लम्‍बे-चौड़े ख्‍वाब और वायदे नहीं। बस मायके- ससुराल की आवश्‍यक रस्‍में पूरी करते करते एक महीने की छुट्टी बीत गई और मैं अब मायके के बदले ससुराल से नौकरी करने आने लगी। बड़ी जगहों का एक यह भी सुख होता है कि शादी के बाद अमूमन आपका शहर नहीं बदलता, इलाका बदल जाता है।
      नौकरी भी कोई बड़ी धांसू नहीं। सिम्‍पल बीए पास को क्‍या कोई कलक्‍टरी दे देगा? शुरूआत हुई अप्रेंटिस और उसके बाद टाइपिस्‍ट। बहुत तरक्‍की के चांस हैं इस कंपनी में। मैं भी तरक्‍की करते-करते सेक्‍शन ऑफिसर हो गई डॉक्‍टर! काम में थोड़ी भोंदू थी, क्‍योंकि दिमाग औसत था, इसलिए उसके आगे की तरक्‍की नहीं ली। निखालिस अफसर बनने की ताब मुझमें नहीं थी डॉक्‍टर। अफसर की जिम्‍मेदारी लेकर नहीं चल सकती थी मैं। हालांकि आज अपने से भी भोंदुओं को अफसर बने देखती हूं तो लगता है, अफसर बन ही जाती। इतने बड़े समन्दर में सीप, रेत सभी कुछ तो रहते हैं, सभी का गुजारा हो जाता है। मेरा भी हो जाता।
डॉक्‍टर, आज हड़बड़ाओ मत। मरीज देखने का बहाना मत करो। मैं भी मरीज ही हूं और तुम्‍हारी ही मरीज हूं। बस, चंद सवाल मन में हैं, उनको पूछने के लिए अपनी जिंदगी की चंद सतरें बयान करना जरूरी लगा मुझे, ताकि मेरे सवालों के जवाब देते समय तुम्‍हें उलझन ना हो।
      तो डॉक्‍टर, ससुराल में सास-ससुर, ननद, देवर सभी थे। शादी के समय सभी आपस में फुसफुसाते –‘अरे, ऐसी साधारण शक्‍ल-सूरत में ससुराल में क्‍या गत होगी? लड़का और उसके घरवाले तो बड़े खूबसूरत हैं. जाने क्‍या सोचकर ऐसी लड़की पसंद की। कहीं दाई-मजूरिन तो बनाकर नहीं रख देंगे? बात मां तक भी पहुंची।
मां की बात तो आपको मालूम है ना डॉक्‍टर। मां के लिए उसका अपंग, पागल बच्‍चा भी कलेजे का टुकड़ा होता है। मैं तो दिल, दिमाग, देह से तंदुरूस्‍त थी। बस सुंदर और जहीन नहीं थी। फिर भी इंसान तो थी ही न, हाड़ मांसवाली, धड़कते कलेजेवाली, कोमल, संवेदनशील मनवाली, फिर आप मुझे क्‍यों नहीं समझ सके डॉक्‍टर?
डॉक्‍टर! बेतरतीब तरीके से बोलूं तो भी समझ लेना, क्रम बिठा लेना। मुझे कपड़े पहनने की भी तमीज नहीं थी, ना ही बनने संवरने की। शलवार के पांयचे टखने के ऊपर चढ़ गए कि जम्‍फर टखने से चार अंगुली ऊपर ही है, मुझे इसकी कोई फिकर ही नहीं रहती। मेरी सहेलियां हंसती –‘रत्‍ना! अरे जरा ठीक से रहा कर। ढंग से तैयार हो। करीने से कपड़े पहन। मैं कहती -ठीक से ही तो हूं... तैयार भी तो ठीक से हुई हूं। गंदी-गंदी दिख रही क्‍या मैं? नहाई भी हूं। वे सब समझाती -फैशन मत कर। मगर सलीके से तो कपड़े पहन यार! ये लदधर-पद्धर साधु बाबा जैसा झोला-झक्‍कड़ पहन लेती है। न फिटिंग, न कुछ। महंगे कपड़े नहीं, स्‍मार्टली पहन।
वही स्‍मार्ट बनने मुझे नहीं आया डॉक्‍टर। बनती तो जो बातें आपसे आज क रही हूं, वह दस साल पहले कहती। कहती क्‍या, चढ़ जाती आपके ऊपर! कैसे किया आपने आखिर? क्‍या एक साधारण सूरत शकल, भोंदू किस्‍म के इंसान की जान की कोई कीमत नहीं? कीमत मेरी जान की थी डॉक्‍टर। मेरी मां के लिए, मेरे पति के लिए, मेरे बच्चों के लिए, मेरी ससुराल के लिए। इनके प्रेम ने मुझे भी अपनी जान की कीमत समझा दी थी।
      मेरा पति सुन्‍दर था, स्‍मार्ट था, किसी प्राइवेट कंपनी में अच्छी पोस्‍ट पर था। मेरे लद्धड़पन पर वह हंसता, जैसे किसी बच्‍चे की मासूम हरकत देख हम मुस्‍कुरा पड़ते हैं। लेकिन, वह मुझे बहुत प्‍यार करता। वह मुझे घुमाने ले जाता, सिनेमा दिखाता, खाना खिलाता, मेरे लिए कपड़े-गहने खरीदता। कभी भी उसके दिमाग में मेरी शक्‍ल सूरत या लद्धड़पन के प्रति ऐसे ख्‍याल नहीं आए कि वह मुझसे परेशान होकर किसी दूसरी की ओर मुड़ जाता। नहीं डॉक्‍टर नहीं, वह मेरे अलावा कहीं किसी के पास नहीं गया। यह मैं दावे के साथ कह सकती हूं। पति कितना भी छुपाए, पर एक पत्‍नी को अपने पति की यह आदत पता चल ही जाती है। मेरा पति दूसरी औरतों के पास जानेवालों में से कतई-कतई नहीं था।
उसने मुझे एक सुंदर सी बेटी दी। अपने जैसी ही। मैं चाहती भी थी कि कल उसकी संतान मेरी कोख में आए, मेरे खून-मांस-मज्‍जा से निर्मित हो, मगर वह अपने बाप की तरह सुन्‍दर, स्‍मार्ट और जहीन निकले।
      एकदम गोल सॉफ्ट टॉ की तरह निकली वह। हालांकि देह-दशा से मैं तंदुरूस्‍त थी, साधारण सर्दी-जुकाम के अलावा कभी किसी बड़ी बीमारी से मेरा साबका नहीं पड़ा, मगर बेटी के समय मैं जबर्दस्‍त बीमार पड़ गई। बीपी, खून की कमी, और डिलीवरी के बाद जॉंडिस। जान जाते-जाते बची। मेरा पति, मेरे सास-ससुर, देवर-ननद, सभी ने दिन-रात एक कर दिया मुझे बचाने के लिए. सास ने तो कई मन्‍नतें मान दीं। दो साल और हजारों रुपए लग गए उन मन्‍नतों को पूरा करते-करते। लेकिन खुशी और संतोष भी था कि एक बहू को इतना प्‍यार करनेवाली सास मिली है। और हां, मेरी कंपनी ने भी मेरा काफी ख्‍याल रखा। उसकी मेडिकल स्‍कीम से ही तो मैं आजतक जीवित बची रह सकी। मैं ही क्‍यों, मेरे जैसे असाध्‍य रोगवाले दूसरे कर्मचारी भी। मगर नहीं, मेरे और उन सबके रोग में फर्क है। मेरा रोग तो शुद्ध रूप से आपका दिया हुआ है डॉक्‍टर। अजीब लगता है न! डॉक्‍टर रोग हर लेता है, यहां आपने रोग भर दिया।
बच्‍ची घर का खिलौना बन गई। नौ महीने की लंबी छुट्टी काटने के बाद मैं दफ्तर जाने लगी। देह पहले भर गई थी। प्रसवकाल में खिलाया-पिलाया देह से फूट रहा था –‘बेबी फैट बेबी होने के बाद मां पर चढ़ा फैट मोटापा। मन हंसता, गुदगुदी होती, बेटी को दूध पिलाते वक्‍त मातृत्‍व सुख के अद्भुत सुख में डूब जाती। कई बार लगता है कि कुछ ऐसी व्‍यवस्‍था प्रकृति ने की होती कि कम से कम एक बार आप पुरुष भी मातृत्‍व के इस सुख का आनंद उठा पाते। एकदम गूंगे का गुड़ है डॉक्‍टर। बिन खाए नहीं बूझ सकते।
मेरा पति दूसरा बच्‍चा नहीं चाहता था। सास-ससुर भी संतुष्‍ट थे। सास ने समझाया, कितनी बिगड़ गई थी हालत। इस बार भी बिगड़ी तो? कहीं कुछ हो गया तो दो-दो बच्‍चे बिन मां के हो जाएंगे. भगवान ने जो दिया है, उससे संतोष कर। उसमें खुश रह। बेटे-बेटी में क्‍या फर्क है। तू तो खुद ही... मैं ही अड़ गई। औरतों में बेटे की एक अजब सी सनक होती है ना डॉक्‍टर। फिर वैसे ही आजकल के समय में परिवार का दायरा सिकुड़ता जा रहा है। कम से कम ये दोनों बहन-भाई तो अपने रहेंगे। साथ-साथ रहेंगे, हमारे बाद एक-दूसरे को समझेंगे।
मेरा पति खूब हंसा -अरे वाह! मां बनते ही तुम तो एकदम सयानी हो गई हो। मैं शर्मा गई।
औरतें कहतीं -बेटी है? अच्‍छा कोई बात नहीं। पहली बार का सब ठीक है। अगली बार भगवान बेटा दे देवें।
थोड़ा तो विज्ञान पढ़ा ही था। मन होता कह दें, बेटा भगवान नहीं, पति देगा। वह भी अपनी इच्‍छा से नहीं, एक्‍स वाई के मिलने के संयोग से।मेरा पति इस पर भी खूब हंसता। कई बार तो लाड़ में आकर मेरे दोनों गाल खींच लेता। मैं इस्‍स करती, मगर सुखद भी बहुत लगता।
काश कि मैं अपने पति की बात मान लेती डॉक्‍टर! काश कि मैं दूसरे बच्‍चे के लिए जिद नहीं ठान बैठती। औरतों की जिद ना! कभी-कभी सनक से भी आगे बढ़ जाती है. मेरी भी बढ़ गई। मैं भी तो औरत ही हूं ना डॉक्‍टर। बेवकूफ औरत भी कह सकते हैं आप।
इस बार भी तबीयत बिगड़ी, पहले के मुकाबले अधिक। छठे महीने की प्रेगनेंसी से ही मैं छुट्टी पर आ गई। बिस्‍तर पकड़ लिया मैंने। खाना हजम नहीं होता, उल्‍टी, चक्‍कर, कमजोरी, ब्‍लडप्रेशर, पता नहीं क्‍या-क्‍या!
पहली बच्‍ची सिजीरियन थी। मैंने सुना था कि पहला बच्‍चा सिजिरियन हो फिर भी दूसरा बच्‍चा कभी-कभी नॉर्मल हो जाता है। मैं चाहती थी कि दूसरी डिलीवरी नॉर्मल हो। मगर बिगड़ी तबीयत ने मेरी उम्‍मीद पर माटी लीप दिया। अब तो बस सबका एक ही कहना था –‘सबकुछ ठीक-ठाक तरीके से पार लग जाए। जच्‍चा-बच्‍चा दोनों ठीक रहे, बस!
फिर से मैं ऑपरेशन थिएटर गई। फिर से बेटी ही हुई। मेरे अलावा मेरे पति या सास-ससुर को इसका भी कोई मलाल ना हुआ। बड़ी प्‍यारी सी थी वह, गोरी, गोल चेहरा, रूई से भी नर्म गाल, रोटी की ऊपरी परत से भी अधिक नर्म उसकी देह और सेब से भी ज्‍यादा गुलाबी तलवे।
मैं अपनी बिगड़ती तबीयत के कार ज्‍यादा देर तक खुशियां नहीं मना सकी। कमजोरी बहुत थी, खून बहुत ज्‍यादा निकल गया था। सो खून चढ़ाना पड़ा। और यह आयातित खून ही मेरी जान का दुश्‍मन बन गया। कैसे कर दिया डॉक्‍टर आपने यह? क्‍यों नहीं की जांच खून चढ़ाने से पहले? क्‍यों बना दिया मुझे बलि का बकरा?
लगातार चार महीने मैं बिस्‍तर पर पड़ी रही। बच्‍ची को दूध भी नहीं पिला सकी। फिर से जांच-पड़ताल हुई और इसबार की रिपोर्ट ने हम सबका खून जमा दिया डॉक्‍टर। मैंने कहा ना डॉक्‍टर, मेरा पति किसी दूसरी औरत के पास जानेवालों में से हर्गिज हर्गिज नहीं था। इसलिए मैं यह मान ही नहीं सकती थी कि यह बीमारी मुझे उसकी तरफ से लगी है। और मैं? मेरे जैसी भोंदू मिट्टी के माधो के लिए तो किसी दूसरे पुरुष का ख्‍वाब या ख्‍याल भी संभव था। और मैं करती भी क्‍यो? इतने प्‍यारे पति और इतनी अच्‍छी ससुराल के बाद बेवकूफ ही होगी वह औरत, जो किसी दूसरे मर्द की चाह करे।
फिर भी, मेरी रिपोर्ट आने के बाद उसकी भी तो जांच हुई ना डॉक्‍टर! उसकी रिपोर्ट बिलकुल ठीक थी। तो फिर मुझमें एचआईवी के वायरस कहां से आए डॉक्‍टर? मुझ जैसी लड़की, जिसे अपने पहनने-ओढ़ने की भी तमीज नहीं, जिस पर घर-समाज की मान- मर्यादा का इतना बड़ा बोझ, वह कैसे किसी दूसरे पुरुष की कल्‍पना कर सकती थी? और ऑपरेशन के पहले भी तो खून की जांच हुई थी। उस समय तो सारी रिपोर्ट ठीक थी।
अब आपके दिए इस राज- रोग से लड़ रही हूं डॉक्‍टर। अच्‍छी कंपनी है, अच्‍छी मेडिकल स्‍कीम है। अपने पैसे खर्च नहीं होते। मगर तकलीफ तो मेरी अपनी है ना! कितने दिन छुट्टी लेती? फिर से आठ-दस महीने की छुट्टी ली। मेरे बॉस को मुझसे हमदर्दी नहीं हुई। कैसे होगी? इतने दिन तक छुट्टी लेने से उसको होनेवाले काम के नुकसान ने उसे मेरे प्रति एकदम ठंढा बना दिया था।
दफ्तर में तो सभी को पता चल ही गया। सभी हमें कोसने लगे डॉक्‍टर, आज तक कोस रहे हैं। मैं किसे कोसूं? तुम्‍हें या अपने नसीब को?
शायद नसीब को ही कोसूंगी. इस बीच मेरे पति की कंपनी बंद हो गई। बाजार का रुख बदल गया था। सभी को जवान खून चा‍हिए था, जो आठ घंटे की ड्यूटी और पगार में सत्रह-अठारह घंटे तक काम कर सके। अजीब भयानक दौर था वह। जबर्दस्‍त छंटनी चल रही थी। छंटनी बोलने पर तो कानूनी बाधाएं आती, इसलिए उसे वीआर यानी वोलंटरी रिटायरमेंट का नाम दे दिया गया था। चालीस-पैंतालीस साल और उससे ऊपरवाले पर जबरन वीआर लेने के लिए दवाब बनाया जाने लगा था। सोचिए डॉक्‍टर, यह वह उम्र होती है, जिसमें लोगों के अपने कैरियर के साथ-साथ बच्‍चों की जिम्‍मेदा‍री उफान पर होती है। चाहे जिसकी जितनी आमदनी हो, चार हजार कि चालीस हजार, उसके जीने का एक तरीका बन जाता है। और पैसे की वह माहवारी आवक अगर बंद हो जाए तो? कैसे घर चले? बाल-बच्‍चों की पढ़ाई, दूसरी जिम्‍मेदारियां! वीआर के समय मिलने वाले दो-चार लाख के हर्जाने से जिंदगी चलनेवाली है? आज के समय में दो-चार लाख की कोई कीमत है डॉक्‍टर? अगर मैं काम नहीं कर रही होती इस सरकारी कंपनी में तो पति को मिले ये तीन-चार लाख तो मेरी कुछ महीने की बीमारी में ही खत्‍म हो जाते। कैसे जीते हम सब? कैसे होता मेरा इलाज, उस रोग का, जिसके लिए मैं या मेरा पति कतई जिम्‍मेदार नहीं थे।
कीमत तो शायद आपकी नजर में हमारी भी नहीं है। जभी तो आप सब इतने लापरवाह हो गए कि देखा ही नहीं कि यह संक्रमित खून है, वह भी एचआईवी पॉजिटिव? रक्तदान करनेवाले को क्‍या पता था कि उसका यह दान दूसरे की जान ले लेगा? शायद उसे भी पता ना हो, क्‍योंकि कहते हैं कि एचआईवी के वायरस का पता वायरस के घुसने के तीन-चार साल बाद चलता है. पता लगने तक तो उसने जाने कितना खून दिया होगा और जाने कितने मरीजों को यह खून चढ़ा होगा और जाने कितने मरीज मेरे जैसी मरी हुई जिंदगी जीने को मज़बूर हो रहे होंगे?
मेरी जिंदगी तो फिर भी ठीक थी। पति और घरवालों ने दुत्‍कारा नहीं, कंपनी ने नौकरी से निकाला नहीं। सास-ससुर समेत किसी ने किसी को भी मेरी बीमारी के बारे में नहीं बताया। टी बी, कैंसर के प्रति तो लोगों की सहानुभूति होती है, मगर छूत की बीमारी न होते भी एडस के प्रति लोगों और समाज का रवैया आप से छुपा नहीं है डॉक्‍टर। पति ने दुबारा काम पाने की बेतरह कोशिश की, मगर नाकाम रहा। मैंने ही समझाया यह शायद भगवान की ही मर्जी है। वह चाहता है कि ऐसी हालत में तुम घर पर रहो, बच्‍चों, मां-बाप और मुझे देखो। हम तो फिर भी ठीक हैं। दोनों में से एक तो कमा रहे हैं। उनकी सोचो, जो केवल एक ही कमाते थे और उनकी भी नौकरी खतम कर दी गई।
मुझे पता है डॉक्‍टर कि मेरे बाद कंपनी से मुझे इतने पैसे मिलेंगे कि मेरी दोनों बेटियों की पढ़ाई उसमें हो जाएगी। मैं उन्‍हें समझा रही हूं कि वे अपना कैरियर बनाएं। अपने पैरों पर खड़े होना बहुत जरूरी है। शादी-ब्‍याह तो हो ही जाएगा। अपनी पसंद का लड़का चुन। मेरी बेटियां, कहा न कि अपने बाप जैसी ही जहीन और सुंदर हैं। वे यह सब कर लेगी। मेरे पति को मेरी पेंशन भी मिलेगी।
मगर इन सबके बावजूद मैं, मेरी जान। मेरी जिंदगी तो उसे नहीं मिलेगी और ना ही मुझे। कहो डॉक्‍टर, ऐसा क्‍यो? आपका एक सॉरी मेरी जिंदगी, मेरे परिवार की खुशी से बढ़कर तो नहीं? पल-पल मौत की ओर बढ़ती मैं। सभी को पता है कि मौत एक दिन आनी है। मगर वह दिन  निश्चित नहीं रहता न डॉक्‍टर, इसलिए सभी बेफ्रिक्र जीते रहते हैं, काम करते रहते हैं। मैं तो रोज मौत की धमक अपने सीने पर महसूस करती रहती हूं। इतनी कि हड्डी-हड्डी तक में मौत जैसे बर्फ का बुरादा बनकर घुस आई है। घोर गर्मी में भी मैं स्‍वेटर पहले रहती हूं घर में भी, दफ्तर में भी। किसी पर्व-त्‍यौहार में साड़ी पहन लेती हूं। अभी भी वही लद्धड़-फद्दड़वाली ही स्‍टाइल है। मगर चमकते साड़ी-गहने में भी मौत की धमक मेरे चेहरे से जाती नहीं डॉक्‍टर। मौत तो मेरे पास आ रही है डॉक्‍टर। दस साल खेप लिए मैंने, कंपनी के पैसे, अपनी जिजीविषा और घरवालों की हिम्‍मत के बलबूते। मगर इन सबसे एचआईवी के जीवाणुओं का क्‍या लेना-देना? वे तो अपने हिसाब से काम करते हैं, कर रहे हैं। मैं उनकी आहट सुन रही हूं। एकदम साफ, एकदम स्‍पष्‍ट।
बड़ी दसवीं में है, छोटी छठी में। चाहती नहीं मरना। भरे-पूरे घर, पति और बच्‍चों को छोड़कर कौन मरना चाहेगा? उनकी नौकरी, उनकी शादी होने तक मैं रूकना चाहती हूं, मगर इच्‍छा से ही क्‍या होता है! घरवाले तो केस-मुकदमा करना चाहते थे, मगर रुक गए। वे मेरी तीमारदारी करें, दो-दो बच्‍चों को देखें कि कोर्ट-कचहरी के चक्‍कर लगाएं। यहां की न्‍याय प्रक्रिया बाजार से सौदा-सुलफ लाने जैसी तो है नहीं। क्‍या पता, मेरे केस की हियरिंग ही मेरे जाने के बाद आए? डॉक्‍टर, इसी सोच का फायदा आज हर कोई उठाता है। जागरूकता के बावजूद इतनी लंबी लड़ाई लड़ना संभव नहीं हो पाता डॉक्‍टर और आपलोग गैर जिम्‍मेदाराना हरकत करते हुए भी कानून की गिरफ्त से छूटे रहते हो। आपके तो पेशे में ही है मौत और जिंदगी की कशमकश देखते रहना। आपलोग तटस्‍थ रहते हैं। आपके लिए तो एक मरीज मरता है, हमारे लिए तो हमारे घर का आदमी जाता है डॉक्‍टर, जैसे मैं चली गई डॉक्‍टर, अपने घर, अपने पति, अपने बच्चों को छोड़कर। जरा म्हसूसने की कोशिश करो उनका और मेरा दर्द डॉक्‍टर!
जीवन की इस चलाचली की बेला में एक ही गुजारिश है डॉक्‍टर, अपने पेशे के प्रति इतने लापरवाह मत होओ। हम मरीज, हमें पता ही क्‍या मेडिकल, मेडिसिन या इलाज का। मगर आपको तो पता है। लोग तो आप में भगवान को देखते हैं तो भगवान बनो डॉक्‍टर, शैतान नहीं। क्‍या पता, कोई दूसरा जिद्दी निकले और घर-बार तक बेचकर केस-मुकदमा लड़े और आपको सजा दिलवाकर रहे। तब तो आप भी जान की भीख मांगोगे ना डॉक्‍टर? अपने घर, परिवार, बाल-बच्‍चों का हवाला दोगे ही ना डॉक्‍टर?
शरीर छूट रहा है, मन भी छूट रहा है, इसी धरती पर, इसी धरती की इस दुनिया के पास। यह दुनिया तो प्रकृति की बनाई हुई है, जिसपर सभी को जीने का समान हक है। उसे तुम मत छीनो डॉक्‍टर! प्‍लीज!!
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Monday, June 11, 2012

'रंगमंच को देश में प्रश्रय व स्वीकृति की जरुरत'

सैयद शहरोज कमर, भास्कर, रांची की कलम से।
रांची. मशहूर नाटककार व हिंदी व मैथिली की लेखक विभा रानी कहती हैं कि रंगमंच हर जगह हो रहा है। लेकिन उसे उचित प्रोत्साहन नहीं मिल पा रहा है। अपने एक मोनो प्ले के सिलसिले में उनका रांची आना हुआ। 'दैनिक भास्कर' के लिए उनसे सैयद शहरोज कमर ने बातचीत की। पेश है उसका संपादित अंश :

रंगमंच की शुरुआत

स्कूली दिनों से ही। तब पांचवी या छठवीं में रही होगी। मां स्कूल हेडमास्टर थीं। सन 1969 मे महात्मा गांधी की सौवी जयंती मनाई जा रही थी। स्कूल में हो रहे नाटक में मैं हिस्सा लेना चाहती थी। मां ने मना कर दिया। आखिर मेरी जिद के आगे वह मान गईं। जब मैं एक सिपाही की भूमिका में मंच पर आई, तो अपना संवाद ही भूल गई। पीछे से मां ने पीछे से कहा तो हड़बड़ी में अपना डॉयलाग बोल पाई। तब एकांत और और भीड़ में बोलने का अंतर समझ में आया। दर्शकों का सामना इतना आसान नहीं, जितना अपन समझते थे। इस सीख के बल पर इंटर में दस लड़कियों के साथ कई कार्यक्रम किया। जब एमए में आई। दरभंगा रेडियो के लिए कई नाटक किया। कई कार्यक्रम किये। बड़े मंच पर सन 1986 में पहली बार राजाराम मोहन पुस्तकालय, कोलकाता में नाटक का मंचन किया। शिवमूर्ति की कहानी कसाईबाड़ा का यह नाट्य रूपांतर था। खूब पसंद किया लोगों ने इस नाटक को। उसके अगले ही वर्ष 1987 में मशहूर नाटककार एमएस विकल के दिल्ली नाट्योत्सव में हिस्सा लिया। दुलारीबाई , सावधान पुरुरवा, पोस्टर, कसाईबाड़ा आदि नाटकों में अभिनय किया। उन्हीं की टेली फिल्म चिट्ठी में काम किया। फिर एक्टिव रंगमंच से पारिवारिक कारणों से किनारे रही। वर्ष 2007 में पुन: एक्टिव थिएटर में आई। मुंबई में मिस्टर जिन्ना नाटक किया। इसमें फातिमा जिन्ना की भूमिका निभाई।

एकपात्रीय नाटक की ओर झुकाव

मुंबई में नाटकों के कई रंग हैं। ज्यादातर कमर्शियल नाटक होते हैं वहां। उसमें कंटेंट नहीं होता। कुछ फिल्मी नाम होते हैं। टिकट बिक जाती है। एकपात्रीय नाटक भी हो रहे हैं, लेकिन अच्छे नहीं। मेनस्ट्रीम में नहीं हैं। मैं इंटर में सबसे पहेल एकपात्रीय नाटक कर चुकी थी। उसकी कहानी एक ऐसी लड़की की थी, जो शादी में अपने घारवालों से दहेज की मांग करती है। मुंबई में मैंने इसे आंदोलन के यप में शुरू किया। लाइफ ए नॉट अ ड्रीम। यह मेरा पहला मोनो प्ले था। फिनलैंड में इसे करना था। अंग्रेजी में लिखा और वहीं 2007 में अंग्रेजी में मंचन किया। मुंबई में भी चार शो इसके अंग्रेजी में ही किए। हिंदी में इसे रायपुर के फेस्ट में 2008 में किया। उसके बाद सिलसिला चल पड़ा। मुंबई के काला घोड़ा कला मंच के लिए हर साल एक मोनो प्ले कर रही हूं। बालिका भ्रूण हत्या पर 2009 में बालचंदा, 2010 में बिंब-प्रतिबिंब, 2011 में मैं कृष्णा कृष्ण की और इस वर्ष रवींद्र नाथ टैगोर की कहानी पर आधारित भिखारिन का मंचन किया।

रंगमंच की मौजूदा स्थिति से कितना संतुष्ट

गांव, कस्बे और शहरों में भी लोग सक्रिय हैं। अपने अपने स्तर से रंगमंच कर रहे हैं। आप ऐसा नहीं कह सकते कि थिएटर दम तोड़ रहा है। यह स्थिति संतुष्ट करती है। हां! यह जरूर कह सकते हैं कि रंगमंच को वैसी स्वीकृति अभी नहीं मिली, जैसी और देशों में है। थिएटर को प्रश्रय नहीं दिया जाता है। उसे प्रोत्साहन नहीं मिल पा रहा है। कई सुविधाएं मिलेंगी भी, तो इसका लाभ महज बड़ लोग ही उठा पाते हैं।

कैदियों के बीच काम करने का अनुभव

कई ऐसे कैदी हैं। जिन पर आरोप साबित नहीं हुआ है। वे जेल में बंद इसलिए हैं कि कोई उनका केस लडऩे वाला नहीं होता। कई महिलाएं हैं अपने छोटे बच्चों के साथ। मेंने 2003 से उनके बीच काम करना शुरू किया। बेहद सकारात्मक असर मिला। उनके बीव साहित्य, कला और रंगमंच की बातें की। उन्हीं के साथ मिलकर नाटक किए। उनसे कहानी कविता लिखवाई। पेंटिग्स करवाई। मुंबई के कल्याण, थाणे, भायखला और पुणे के यरवदा आदि जेलों में वर्कशाप भी किया। बहुत अच्छा अनुभव मिला।

सामाजिक बदलाव में रंगमंच की भूमिका

रंगमंच ऐसा टूल है जो व्यक्ति को बदलता है। व्यक्ति समाजिक प्राणि ही है। वह बदलता है, तो समाज में उसका असर होता है। दूसरे लोग भी बदलने का प्रयास करते हैं। यह परिवर्ततन सकारात्मक है, तो स्वाभाविक है, उसका व्यापक असर पड़ता है।

पहला नाटक कब लिखा

सन 1996 97 का सन रहा होगा। दूसरा आदमी, दूसरी औरत लिखा। इसका मंचन मुंबई में किया।

संतोष कहां, साहित्य या रंगमंच ?

दोनों का सुख अलग है। लेकिन सच कहूं तो निश्चित ही रंगमंच में मुझे अधिक तसल्ली मिलती है। यहां आप हजारों लोगों से एक ही समय रूबरू होते हैं। अपनी बात पहुंचाते हैं। उसकी प्रतिक्रिया भी तुरंत ही मिल जाती है। इसका सामाजिक प्रभाव पड़ता है।

लेखन पहले मैथिली में या हिंदी में

कहानी हो या नाटक। दोनो भाषाओं में अलग अलग लिखती हूं। बुच्चीदाई पहले मैथिलि में ही लिखा। अंतिका में छपा था। बाद में इसका हिंदी रूपांतरण नवनीत में प्रकाशित हुआ।

नया नाटक

'आओ तनिक प्रेम करें' लिखा है। इसका मंचन अगस्त में हिसार में करने जा रह हूं। इसकी कहानी दो ऐसे पति पत्नी की है, जिनकी उम्र अब साठ पर पहुंची है। पति को अब याल आता है कि प्रेम का अनुभव उसे तो हुआ ही नहीं।

नई किताब

'कर्फ्यू में दंगा' नामक कथा संग्रह अभी रेमाधव से छपकर आया है।
Source: सैयद शहरोज कमर.