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Thursday, January 9, 2014

अपनी बल-बुद्धि का इस्‍तेमाल करो ओ लड़कियो!

मोहल्लालाइव मे छपा एक लेख. अच्छी प्रतिल्रियाएं मिल रही हैं. आपकी भी राय जानना चाहूंगी. लिंक है-
http://mohallalive.com/2014/01/04/vibha-rani-womens-issue/

और लेख ये रहा:
ओलड़कियो! इससे पहले कि तुमसे मैं कुछ कहूं, मेरे आस-पास घटी कुछ सच्ची घटनाएं सुन लो।
1) मेरे एक पत्रकार दोस्त की पत्नी ने शादी के तुरंत बाद ही पति से लड़-झगड़ कर उसे उस घर से निकाल दिया, जो उसके पति ने लिया था। पति के समझाने-बुझाने पर उस पर दहेज का इल्जाम लगाकर पुलिस में जाने की धमकी देने लगी। थका-हारा पति जब अपनी जान की हिफाजत के लिए पुलिस में रिपोर्ट कराने पहुंचा, तब पुलिसवाले ने ही कहा कि “साब, आप किसके चक्कर में फंस गये? यह तो बाजारू औरत है। इसकी तो तस्वीर हमारे थाने में है। आप जाइए। यह पुलिस में नहीं आएगी।” फिर भी, वह थाने पहुंची और आजतक वह केस में फंसा हुआ है।
2) मेरी एक दोस्त का भाई किसी लड़की के साथ लिव-इन-रिलेशन में था। तीन साल तक वे साथ-साथ रहे। इस बीच किसी बात पर लड़की की बहस उससे हुई। बात ने विवाद का रूप लिया और लड़की ने उस पर तीन साल से लगातार बलात्कार का आरोप लगाकर उसे जेल भिजवा दिया। जाने कैसे-कैसे वह छूटकर बाहर निकला।
3) मेरी इसी दोस्त के एक पहचानवाले ने अपने बेटे की शादी लाखों रुपये के मेहर की रकम के साथ खूब धूमधाम से की। दुल्हन इस ख्वाब के साथ डोली से उतरी कि यह तो बड़े बिजनेसमैन का घर है, जहां उसके चारों ओर नौकर-चाकरों की फौज रहेगी और अपनी शानो-शौकत से वह दुबई में रह रही अपनी बहन पर रोब गालिब करेगी कि उसका रुतबा उससे किसी दर्जा कम नहीं। लेकिन जब देखा कि घर में नौकर-चाकर और तमाम सुख-सुविधाओं के बावजूद उसकी सास ही खाना बनाती है, तो वह सब छोड़-छाड़ कर मायके लौट गयी, यह कहते हुए कि मेरी सास ने मुझसे आटा सानने को कहा। मैं क्या रोटी पकाने के लिए उस घर गयी थी? ससुराल से पीछा छुड़ाने के लिए उसने उन पर दहेज का आरोप लगा दिया। अंतत: ढेर सारे पैसे और मेहर की रकम लौटाकर ससुरालवालों ने अपना रास्ता अलग किया यह कहते हुए कि हम छोटी जगह में रहते हैं। पुलिस तो तुरंत हमें जेल ले जाएगी और हमारी इज्‍जत और धंधा-पानी सब चौपट हो जाएगा।
4) मेरा एक दोस्त अपनी बेबाक लेखनी और विचारधारा के कारण अपने विरोधियों और मीडिया के नापाक इरादों का शिकार हो असमय ही काल के गाल में चला गया। एक लड़की ने उस पर रेप का आरोप लगा दिया। अब न लड़की सामने आ रही है, न मीडिया न वे लोग, जो उसकी विचारधारा से वाबस्ता न रखते थे और उसे अपनी राह का कांटा समझते थे।
अब आओ, तुम्हारी बात करें। तुम पढ़ रही हो तो पढ़ो। बढ़ रही हो तो बढ़ो। पढ़ाई का हर संभावित क्षेत्र तलाश रही हो तो तलाशो। कैरियर के हर मार्ग को आजमाना चाहती हो तो आजमाओ। यह तुम्‍हारा या तुम्‍हारा ‘ही’ नहीं, तुम्‍हारा ‘भी’ संसार है। इस ‘भी’ पर तनिक ध्‍यान देना ओ लड़कियो। संसार तुम्‍हारा होता तो कोई बात नहीं थी, तुम्‍हारा ही होता, तब तो बल्‍ले-बल्‍ले होता। तुम्‍हारा ‘भी’ है, मतलब तुम बंद दरवाजा ठकठकाकर कह रही हो – “खोलो कि यह विश्‍व तुम्‍हारा भी है।” तुम्‍हारा ‘भी’ जोर-जोर से दस्‍तक दे रहा है – सभी के दिलों के दरवाजे पर। बहुत खलबली मचा रहा है सबके दिमाग पर। बहुत आगे आना चाह रहा है – मतलब सबसे आगे। तुम्‍हारी लड़ाई इसी ‘भी’ के लिए है। इसलिए इस ‘भी’ के साथ आगे बढ़ते हुए अपने वजूद के लिए हर रास्‍ता, कोना, दरो-दीवार, सड़कें, गलियां, आंगन, चौबारा घरती, आकाश तलाशो ओ लड़कियो!
दौड़ने के रास्‍ते बहुत हैं – छोटे भी, संकरे भी, बड़े भी। यह तुम्‍हें तय करना है कि तुम छोटे रास्‍ते पर चलकर झटपट सब हासिल करना या संकरे रास्‍ते पर चलकर वहां के एक-एक कंकड़-पत्‍थर बीनते हुए अपने साथ-साथ दूसरों का भी मार्ग प्रशस्‍त करना या बड़े रास्‍ते पर फर्राटेदार चलना पसंद करोगी? ध्‍यान रहे कि अपने आगे बढ़ने के रास्‍ते पर चलनेवाली तुम कानूनन बालिग हो गयी रहोगी ओ लड़कियो।
तय करते समय खुद ही तय करो कि अपने फायदे या जल्‍दी-जल्‍दी आगे बढ़ने के लिए अपनाये गये छोटे-छोटे रास्‍ते (शॉर्ट कट्स) तुम्‍हें कल किसी बड़ी मुसीबत में न डाल दें। उस समय तुम यह मत कहना कि तुम्‍हारा शोषण हुआ या तुम छली गयी। तीन साल तक तुम किस भ्रम में रही? क्या किसी का बलात्कार लगातार तीन साल तक होता रह सकता है? वह भी तब, जब कि तुम लिव-इन-रिलेशन में रहनेवाली एक आजाद औरत हो?
किसी तरह की साजिश के लिए इस्तेमाल की जाओ तो अपना हश्र भी सोच लेना कि क्या तुम उनके इस्तेमाल के बाद खुद दूध में पड़ी मक्खी की तरह तो नहीं निकाल फेंक दी जाओगी ओ लड़कियो!
अगर तुम जानबूझकर शोषित हो रही हो तो ध्‍यान देना कि इसके पीछे कहीं तुम्‍हारे अपने गणित तो नहीं? चाहे वे मर्जी के हों या मजबूरी के। कार्यस्‍थल पर या काम या कैरियर के बहाने तुम्‍हारा शारीरिक या मानसिक शोषण इसके तहत बड़ी आसानी से आ सकता है। अगर कोई तुम्‍हें लड़की होने के नाते फेवर कर रहा है तो यह खतरे की घंटी है। इसे अगर समझ रही हो तो उस पर अपनी काबिलियत का झूठा कोट मत पहनाओ ओ लड़कियो! हम सबको अपनी लियाकत का पता अच्छी तरह से रहता है।
अगर तुम्‍हें लगता है कि बेवजह तुम्‍हारा शोषण हो रहा है तो अपनी भी व्‍याख्‍या करो और अपने आसपास को भी देखो। क्‍या इस शोषण की तुम्‍हीं एक शिकार हो या अन्‍य भी! अपने सिक्‍स्‍थ सेंस के द्वारा इसे जानना कोई मुश्किल काम नहीं होता।
अपने शोषण के खिलाफ खुद लड़ना सीखो और इसके लिए सोच-समझकर रास्‍ता चुनो। अखबार, मीडिया, सोशल साइट्स यहां-वहां पर सभी तुम्‍हारे खुदाई खिदमतगार मिलेंगे, लेकिन तुम्‍हारे साथ-साथ चलने के लिए शायद ही कोई आए। चाहो तो आजमा भी लेना ओ लड़कियो!
हम तुम्‍हारे खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने, घूमने-फिरने की किसी भी आजादी के खिलाफ नहीं। लेकिन कब, कहां और कैसे खाना-पीना, पहनना-ओढ़ना, घूमना-फिरना है, इसे तुम्‍हें ही तय करना होगा, जैसे किसी शोक सभा में हंसते हुए या शादी-ब्‍याह में रोते हुए नहीं जाया जाता।
अपने दिल-दिमाग-देह को कभी किसी के इतना हवाले मत कर दो कि तुम्‍हारा अपना कुछ बचा ही न रह जाए। विश्‍वास करो, अंधविश्‍वास नहीं। भक्ति करो, अंधभक्ति नहीं। प्रेम करो, अंधा प्रेम नहीं। और सबसे महत्‍वपूर्ण कि अपने स्त्रीपन को साजिश का जामा मत पहनाओ – चाहे वह दहेज हो या रेप। ध्‍यान देना! चार जंगली, वहशी मर्द तुम्‍हें जलाएंगे तो चालीस पुरुष तुम्‍हारे साथ खड़े भी होंगे। लेकिन, अपने सत्‍य-असत्‍य की जांच तुम्‍हें खुद करनी होगी। यह तो तुम जानती हो कि अच्छे काम में युग बीत जाते हैं, पर बुरे को बनते, बिगड़ते, फैलते देर नहीं लगती। एक झूठ को बचाने को लिए सौ झूठ बोलने होते हैं और इन झूठों से अपनी सच्‍चाई की परतें उधड़ने लगती है।
मुझे बरसों पहले पढ़ी सुदर्शन की कहानी ‘हार की जीत’ याद आती है, जिसमें डाकू खड़ग सिंह द्वारा अपंग बन कर बाबा भारती का घोड़ा छीन लिये जाने के बाद बाबा भारती डाकू खड़ग सिंह से कहते हैं कि ‘इस घटना की चर्चा किसी से मत करना, वरना लोगों का गरीबों पर से विश्‍वास उठ जाएगा।’
तुम भी अपने जुल्‍म के खिलाफ लड़ो, खूब लड़ो। लेकिन साथ-साथ अपने झूठ-सच की कुंजी अपने पास रखो, उससे किसी और का ताला न खोलो, न अपने ताले को खोलने की इजाजत दो, वरना कल को सचमुच में गरीब, मायूस, मजबूर, हालात की सतायी लड़कियों पर से लोगों का विश्‍वास उठ जाएगा और इसका सारा दोष भी तुम्‍हारे ही मत्‍थे आएगा। वैसे ही, जैसे बड़ी चालाकी से यह आरोपित कर दिया गया है कि ‘औरतें ही औरतों की दुश्‍मन हैं’ या ‘चूड़ि‍यां कायरता की निशानी है।’ इसलिए, अपना इस्‍तेमाल होने देने से पहले अपनी बल-बुद्धि का इस्‍तेमाल करो ओ लड़कियो!

Thursday, May 5, 2011

ऐसी कैसी जवानी?


      बडा मर्दमार शीर्षक है ना? छम्मकछल्लो को यह शीर्षक इतना पसंद आया कि जस का तस उठा लिया ‘चेहरे की किताब’ (फेसबुक) के एक फेसबुक ग्रुप पर आई इस खबर पर. खबर जस की तस नीचे दी जा रही है- “आज रात शंकर नगर के एक रेस्तरां के पार्किंग में दो युवतियां और एक युवक काली कांच लगी कार के अन्दर संदिग्ध हालत में पकडे गए. युवतियां नशे में धुत्त थीं. ऐसे नज़ारे यहाँ रोज़ देखने को मिल ही जा रहे हैं. कहाँ जा रहा है हमारा कल्चर. इस मामले ने झूठ बोलकर घर और हॉस्टल से बाहर जानेवाली युवतियों पर सवालिया निशान लगा दिया है. युवतियों पर नज़र न रखी गयी तो मामला और भी गहरा जायेगा. माना कि मामला जवानी का है. शादी के अलावा और भी तो कई रास्ते हैं. बीच सड़क पर दिखने वाली जवानी आज जब चैनलों पर और कल अखबार की सुर्खियाँ बनेंगी, तब क्या होगा? ऐसी कैसी जवानी?”
       ये साहब एक साथ कई मुद्दों पर चिंतित हैं. सबसे पहले तो लडकियों और उनकी जवानी पर. इसलिए सबसे पहले कहते हैं कि “इस मामले ने झूठ बोलकर घर और हॉस्टल से बाहर जाने वाली युवतियों पर सवालिया निशान लगा दिया है.” यानी, हॉस्टल से बाहर जानेवाली युवतियां! साहब इतने मुतमईन हैं कि उन्हें लग गया कि ये लडकियां हॉस्टल से भागी हुई ही हो सकती हैं, घर से निकल कर कोई ऐसा काम नहीं कर सकता. दूसरी बात करते हैं, ‘युवतियों पर नज़र न रखी गयी तो मामला और भी गहरा जायेगा.’ यानी, युवतियां ही बदचलन होती हैं, उन पर शिकंजे कस कर रखो. उनकी ही इज्जत से घर की इज़्ज़त है. लडके तो हमेशा इज़्ज़तदार रहते हैं. वे या तो कुछ करते नहीं या करते हैं तो उनके करने से घर की इज़्ज़त पर कोई आंच नहीं आती. तीसरी बात, ‘माना कि मामला जवानी का है. शादी के अलावा और भी तो कई रास्ते हैं.’ मतलब, जवानी जोर मार रही हो और शादी ना हुई हो तो और रास्ते अपना लीजिए. कुछ भी कीजिए, सबकुछ कीजिए, बस रास्ते पर मत कीजिए. नीति, संस्कार की बातें भूल जाइए. जवानी के मजे लीजिए, मगर छुप कर. पहले के रसिक बुजुर्ग घर के लडकों को ताकीद करते थे कि मुंह मारने में कौन सी बुराई है? मर्द की मर्दानगी इसी में तो है. मगर ब्याह तो वहीं होगा तेरा, जहां हम कहेंगे. सही है. ऐसी कैसी जवानी कि आप बीच सडक पर अपनी जवानी के जलवे दिखाते रहें. बीच सडक पर जवानी के जलवे तो कुत्ते दिखाते रहते हैं. इसलिए, छुप कर कीजिए, न कोई देखेगा, न कोई बोलेगा, आप भी खुश और बेदाग और घर, परिवार, समाज भी.
          लेखक महोदय को उस खबर में दो युवतियां दिख गईं और उन पर नज़र रखने की मर्दवादी हवस उछाल मार ले गई. उन्हें उन दोनों युवतियों के साथ वह युवक नहीं दिखा. उस पर नज़र रखने की बात तो सोची भी न गई होगी. लडकों से न धर्म बिगडता है, न ईमान, न समाज, न संस्कृति. सबके मूल में ये निर्लज्ज छोकरियां होती हैं, जो उन्हें अपने बंधन में फांस लेती हैं. धर्म और  संस्कृति को रसातल में तो औरतें ही ले जाती हैं ना?  युवक लोग तो एकदम पाक,  साफ,  बेदाग,  सच्चरित्र, मासूम, दूध पीते बच्चे होते हैं. इन पर कैसे नज़र जा सकती है भला? इन युवकों का कोई कसूर नहीं होता.”
      प्रतिक्रिया होनी ही थी. औरतों के मामले में तो सभी खुदाई दरबार बन जाते हैं. सो एक सज्जन ने लिख मारा- “जो कुछ होता है, उसका खामियाजा लडकियों को भुगतना पडता है. बदनाम वो होती हैं, कुंवारी मां वो बनती हैं, रेप का शिकार वो होती हैं, सुर्खियों में फोटो उनकी आती है, इसलिए उन्हें सावधान करना ज़रूरी है. लडके तो फिर भी बच निकलते हैं.“
      तो मामला फिर से जग जाहिर होने का है. लडके चूंकि बच निकलते हैं, इसलिए उन्हें बचने के मौके दिए जाते रहने चाहिए. नसीहत का जाल लडकियों पर बिछाना चाहिये कि चूंकि उनके साथ ये सब बातें होती हैं, इसलिए उन्हें बच कर, संभल कर रहना चाहिए. छम्मकछल्लो के पूछने पर कि “लडकियों के जितने नुक्सान गिनाए गए हैं, उनके मूल में जाएं. क्या लडकियां खुद अपना रेप कर लेती हैं, खुद से कुंवारी मां बन जाती हैं, खुद से खुद को बदनाम कर लेती हैं? खुद से फोटो खींचकर अखबारों मे देकर उसकी सुर्खियां बन जाती हैं?” वे इसे अपने ऊपर व्यक्तिगत आक्षेप मान लेते हैं.
      छम्मकछल्लो कहां किसी पर आक्षेप लगाती है? वह तो मानती है कि समाज में अच्छे लोगों की कमी नहीं है. मगर इनसे इतर भोगवादी मर्दाने नज़रिये के कारण ये अच्छे पुरुष भी गेहूं के साथ घुन बनकर पिस जाते हैं. छम्मकछल्लो इन अच्छे पुरुषों को बचाना चाहती है, ताकि समाज और इसके ढांचे पर हम सबका विश्वास बना रह सके. हे समाज के अच्छे पुरुष, अपने इन साथियों की सोच में अच्छाई का खाद-पानी डालिए ना. हमारी खातिर नहीं, अपनी खातिर. ###

Tuesday, May 18, 2010

एयर होस्टेस कितना बतियाती हैं?

छम्मकछल्लो देश की तरक्की से बहुत खुश है. उस दिन उसने अखबार में पढा कि भारत की तरक्की देखकर ओबामा के पसीने छूटे. छम्मकछल्लो के भी पसीने छूट जाते हैं, अपने देश की तरक्की देख कर. अमेरिका कह्ता है कि भारत दूसरी विश्व शक्ति बनने जा रहा है. अमेरिका जो कहता है, सही कहता है. उससे इंकार करने की ज़ुर्रत हममें नहीं है.

छम्मकछल्लो की भी यह ज़ुर्रत नहीं है कि वह किसी भी बात से इंकार करे. तब तो और भी नहीं, जब मामला किसी लडकी, उसके रूप-रंग, उसकी प्रतिभा (?), उसकी काबिलियत से जुडा हो. विमान सेवा भी एक सेवा है. इसे सुंदर बनाए रखने के लिए सुंदर-सुंदर विमान परिचारिकाएं होती हैं. सुंदर तो कुछ भी हो, किसी भी जगह या क्षेत्र में हो, मन को भाती है. ऐसे में हर क्षेत्र में काम करनेवाली महिलाओं का सुंदर होना लाजिमी हो जाना चाहिये, चाहे वह नर्स हो, डॉक्टर हो, वैज्ञानिक हो, इंजीनियर हो. सुंदर तो घर की बहुओं का होना भी लाजिमी है. आखिर अगली संतति सुंदर होनी चाहिये कि नहीं?

छम्मकछल्लो के मूढ मगज़ में नहीं आता कि एयर होस्टेस के लिए तथाकथित सुंदर होना लाजिमी क्यों है? क्या एयरलाइंस उसकी सुंदरता के बल पर चलते हैं? क्या कम सुंदर लडकियों द्वारा दी जानेवाली सेवाएं कुरूप या कम असरकारी होती हैं? एयर होस्टेस का काम आखिर अपने अतिथियों (किंगफिशर एयरलाइन को धन्यवाद कि उसके द्वारा ‘अतिथि’ के प्रयोग के कारण अब सभी एयलाइनों के पैसेंजर, यानी यात्री लोग अतिथि रूप में बदल गए.) को उडान के दौरान आवश्यक सेवाएं देना होता है. और यह सेवा कोई दुर्वासा भाव से न तो करवाता है और ना कोई रम्भा या मेनका भाव से करती है. मगर लोग अपनी मानसिकता ही बदल दे तो कोई क्या करे? पता नहीं राजा राम के समय के पुष्पक विमान की क्या स्थिति थी? सुंदरता के इसी दुराग्रह के कारण छम्मकछल्लो भी एयर होस्टेस बनते- बनते रह गई. उसकी इस इच्छा पर सभी ने छूटते ही कहा था कि “शक्ल देखी है अपनी?”

शकल के साथ साथ अकल भी देख लेने की बात कही गई. और अकल तो अपने देश में उसी के पास होती है, जिसके पास अंग्रेजी की ताक़त होती है. अंग्रेज गए तो शासन की ताक़त ले गए. मगर भाषा की ताक़त यहीं छोड गए. वे जानते थे कि किसी को मन से गुलाम बना कर रखना है तो उसकी ज़बान में घुस जाओ. देश छोड दिया, राजनीतिक ताक़त छोड दी, मगर हमारे मन में बसे रहे- प्रीतम आन बसो मेरे मन में. इतने कि देश के आज़ाद होने के बाद भी हम यह नहीं मानते कि हमारे देश की अपनी एक भाषा है, या हो सकती है. लोग अपने ही देश की भाषाओं पर आपसी लडाई करते हैं, अंग्रेजी के खिलाफ नहीं बोलते. बोलें भी कैसे? आखिर वह अतिथिकी भाषा है और अपने देश में “अतिथिदेवो भव:” होता है. देश गुलाम था तो लोग आज़ादी की बात हिंदी में करते थे. देश अब आज़ाद है तो लोग अपनी बात अंग्रेजी में कहते हैं. देश जब आज़ाद हुआ, तब महात्मा गांधी ने पहला संदेश यह दिया कि बता दो दुनिया को कि गांधी अंग्रेजी भूल गया. कुछ साल पहले देश के एक भूतपूर्व गृह मंत्री ने कह दिया कि अंग्रेजी इस देश से जानेवाली नहीं. लोगों को अंग्रेजी सीखनी चाहिये. जान लें कि भारत सरकार की राजभाषा नीति गृह मंत्रालय के अधीन ही आती है.

हाल में एक खबर आई कि देश में एक लडकी, कहा गया कि वह अनुसूचित जाति से थी, ने अपने कैरियर के रूप में एयर होस्टेस के पेशे को अपनाना चाहा. उसने इसका प्रशिक्षण देनेवाली अकादमी में नाम भी लिखा लिया. प्रशिक्षण पूरा भी हो गया. मगर नौकरी की बात आने पर कहा गया कि ना जी, उसका ‘फिजिकल अपीयरेंस’ एयर होस्टेस के लायक नहीं था और दूसरे यह कि उसकी अंग्रेजी अच्छी नहीं थी. खुशी की बात तो यह है कि ऐसा एयरलाइन के साथ साथ देश की व्यवस्था भी कह गई. अंग्रेजी में भसपन नहीं है ना. हो भी तो हमें पता नहीं. वरना सीधे सीधे कहो ना कि छोकरी बदसूरत है.

छम्मकछल्लो जानती है कि हम अपनी पुरानी परम्परा से बहुत प्यार करते हैं. सौंदर्य प्रेम और अंग्रेजी प्रेम उसी परम्परा में आता है. अब वह क्या करे कि उस लडकी पर ख्याल सवाल बन जाता है कि अगर रूप और अंग्रेजी इस नौकरी के लिए इतना ही महत्वपूर्ण है तो उस अकादमी ने उसे अपने यहां प्रशिक्षण देने के लिए भर्ती ही क्यों किया? उसे क्यों नहीं बताया कि बच्ची, तू मन से अच्छी हो सकती है, दिमाग से तेज भी हो सकती है, मगर तेरा रूप रंग इस पेशे के माकूल नहीं है. अकादमी ने अपने प्रशिक्षण के दौरान उसे इतनी अंग्रेजी की ट्रेनिंग क्यों नहीं दी कि वह सामान्य बातचीत अंग्रेजी में कर सकती? क्या यह कहा जा सकता है कि तब अकादमी का शुद्ध उद्देश्य पैसा कमाना होगा? आखिर क्यों रूप और भाषा से मिसफिट एक लडकी को उसमें भर्ती किया गया?

अब जब नौकरी देने की बात आई तब उसके रूप और भाषा का हवाला देते हुए उसे नौकरी नहीं दी गई? क्या एयर होस्टेसों को विमान में भाषण देना होता है? विमान प्रचालन और तकनीकी जानकारी के लिए उसे जो बोलना होता है, वह लिखा होता है, जिसे वह पढ कर सुनाती है. बाकी समय बमुश्किल वह अपने अतिथियों से 4-5 लाइनें बोलती हैं? तो क्या नौकरी देनेवाली एयर लाइन उसे इतने का भी आत्मविश्वास नहीं दे सकता था? लोग कहते हैं कि “संगत से गुन आत है, संगत से गुन जात.” अंग्रेजी की चाशनी में पगी दूसरी एयर होस्टेसों के साथ रह कर वह इतनी अंग्रेजी तो सीख ही लेती. मगर नहीं. इतनी मेहनत कौन करे? इतना परेशान होकर अकादमी या एयर लाइन चलाने के लिए हम थोडे ना बैठे हैं और ना ही समाज सेवा करने के लिए.

अब एक अधिनियम यह पास हो ही जाना चाहिये कि इस देश में जिसे अपनी प्रतिष्ठा से रहना हो, उसे अंग्रेजी हर हाल में आनी चाहिये. लडकियो! तुम्हारे लिए इसके साथ साथ तुम्हारा सुंदर होना भी अनिवार्य है. अगर तुम सुंदर नहीं हो तो तुम्हारा जीना बेकार है. मन से अच्छी हो तो हो, मन दिखता थोडे ना है. हम तन देखते हैं, उसे देखने, छूने, भोगने की लालसा रखते हैं. इसलिए या तो सुंदर बनकर जनमो, या फिर जनमो ही मत. जनम भी गई तो मर जाने के लिए तुम आज़ाद हो. अपनी आज़ादी का प्रयोग करो इस देश की बदसूरत लडकियो!