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Wednesday, May 25, 2011

कटि को कंचन काटि बिधि, कुचन मध्य धरि दीन.


लोग पूछते हैं, आपकी नजर में सुंदरता क्या है? छम्मकछल्लो को सवाल पूछनेवालों की नादानी पर हंसी आती है. इनलोगों को आज तक यह पता नहीं, जबकि छम्मकछल्लो छुटपन में ही जान गई थी, सुंदरता का महत्व. उसकी बहन सुंदर थी. वे दोनों जहां भी निकलती, छम्मकछल्लो को सुनने को मिलता- इसका ब्याह कैसे होगा? ब्याह की यह परिभाषा आज तक नहीं बदली है.

लोग कहते हैं कि मन की सुंदरता देखो और देखते वक़्त नज़रें तन पर टिक जाती हैं. अरे भाई, मन तो तन के भीतर की चीज है, उसके गुन उसके भी भीतर की चीज. एक तो मन देखने में समय, फिर उससे भी ज्यादा वक्त उस मन के भीतर के सौंदर्य को खोजने में. वक्त, समझदारी सब लगती है. किसके पास इतना है?

तन की सुंदरता संवारने, दिखाने के कितने सारे उपाय हैं- बडी-बडी मल्टी नैशनल कम्पनियों के नाना सौंदर्य प्रसाधन से लेकर स्पा, सलोन, जिम, पार्लर, सौंदर्य सलाहकार, सौंदर्य चिकित्सक तक. कोई 7 दिन में गोरा बनाता है, कोई 15 दिन में चेहरे से झाई-धब्बे दूर करता है, कोई 3 हफ्ते में झुर्रियां भगाता है. मन की सुंदरता के लिए? खुद ही पढो, खुद ही देखो, खुद से खुद को तैयार करो, फिर भी टोटा कि भई, हमारा मन नहीं मान रहा कि कह दें कि तुम्हारा मन सुंदर है.

तन के साथ ऐसा कुछ नहीं है. इसका पैमाना बना हुआ है- 36-24-36. नाक कितनी सुतवां हो कि जांघ पर कितना मांस हो कि गाल की कितनी हड्डियां उभरी हों, यह सब तय है. इस सांचे में ढालने के लिए तरह तरह की फैक्ट्रियां मौजूद है. मन की सुंदरता का क्या कोई ऐसा पैमाना, कोई कारखाना बनाया गया है? नीति की कितनी बडी आंख, चरित्र का कितना गहरा डिम्पल, ईमानदारी की कितनी ऊंची नाक! सत्य का कितना बडा वक्ष!

सुंदरता की बात कोई आज की थोडे न है. भारतीय शास्त्र नायिका वर्णन से भरा पडा है. कदली वृक्ष सी जंघाएं, गुरुतर नितम्ब, कुम्भ या हिम जैसे वक्ष, हिरणी जैसी आंखें, शुक जैसी नाक, बिम्बा फल जैसे होठ, सुराहीदार गर्दन, कुंदन जैसा दमकता रंग, नागिन जैसे बल खाते केश, मद भरे नैन, कोयल जैसे बोल, धनुष जैसी भौंहें, चंद्रमा जैसा भाल, सिंह जैसी कमर....! पहेली ही बन गई उस पर- “कनक छडी सी कामिनी, काहे को कटि छीन?” जवाब भी मिला- “कटि को कंचन काटि बिधि, कुचन मध्य धरि दीन.”

छम्मकछल्लो के कूढ मगज में फिर से सवाल कौंधता है- मन की सुंदरता किसे दिखाएंगे आप? उसे ही न, जो आपके नजदीकी हों. उनको तो आप अपनी तमाम खूबियों और खामियों के साथ स्वीकार्य हैं. सुंदरता सार्वभौम है. जिसे आप नहीं जानते, उसकी भी सुंदरता को आप सराहते हैं, जो आपको नहीं जानता, वह भी अपना सौंदर्य इठला कर जतला जाता है. कठिन पहेली हो गई? छम्मकछल्लो आसान कर देती है. उर्वशी, मेनका, सीता, लक्ष्मी, पार्वती, इंदिरा, मर्लिन मुनरो, मोनालिसा, नर्गिस, मधुबाला, हेमामालिनी, ऐश्वर्या राय, प्रियंका चोपडा, सुष्मिता सेन, केनेडी, नेहरू, राजीव, वाजपई, अडवाणी, आमिर, शाहरुख, सलमान, हृतिक आदि आदि- आप इन सबको जानते हैं? ...इतना कि आप उनके साथ उठ-बैठ सकें, रह-खेल सकें? अब ये ही नाम फिर से लीजिए- क्या ये सब आपको जानते हैं? हे हे हे, खा गए न गच्चा! अब बताइए, आप इनके मन के सौंदर्य से प्रभावित हुए हैं या ....? अपनी बातचीत में आप इनके मन का उल्लेख करते हैं या...? गुण को सुंदरता के साथ घालमेल मत कीजियेगा.

तो भैया, छम्मकछल्लो की बात मानिए. भूल जाइए कि मन की सुंदरता अधिक महत्वपूर्ण है कि सुंदरता वस्तु या व्यक्ति में नहीं, देखनेवाले की आंख में होती है. यह सब छम्मकछल्लो जैसी कुरूपों को बहलाने के लिए है, वरना सौंदर्य प्रतियोगिताओं की तरह कुरूप प्रतियोगिता भी होती. शरीर और सौंदर्य बनाने, संवारने की तरह कुरूपता को भी बनाने संवारने के सारे ताम-झाम होते. एक बात बताइएगा ईमानदारी से, कि जिस तरह आप किसी की शारीरिक सुंदरता की तारीफ उसके मुंह पर ही कर देते हैं, उसी तरह क्या किसी कुरूप से उसकी कुरूपता का बयान कर पाते हैं? इसका मतलब ही है कि जो सामने बोला जाए, वह सुंदर, जो ना बोला जाए, वह कुरूप. छम्मकछल्लो होश संभालने के बाद से ही इसका सामना करती आ रही है. बहुत संवार लिया मन को, बुद्धि को, फिर भी अभी तक सुनने को मिल ही जाता है कि छम्मकछल्लो जी, तनिक सुंदर होतीं तो वाह! क्या बात थी? छुटपन में गांव की दादी-चाची सामने बोल देती थी, आज के लोग पीठ पीछे या अप्रत्यक्ष रूप से.
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