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Saturday, September 26, 2009

तुलसीदास जी, अच्छा हुआ, आप मोहल्‍ला युग में नहीं हैं!

पढ़े यह लेख इस पर भी। लिंक है- http://mohallalive.com/2009/09/26/vibha-rani-writeup-on-carbon-copy-literature/
हे गुसाईं बाबा, अच्छा हुआ जो आप इस युग में नहीं हैं। यह युग बहुत उन्नत है, नयी नयी तकनीक है, नये नये लोग हैं। एक समय था, जब लिखने की परंपरा नहीं थी, इसलिए गुरु अपने शिष्यों को सबकुछ कंठस्थ करा देते थे। फिर भोज पत्र आया। लिखने की नयी नयी तकनीक विकसित हुई और अब तो कागज कलम की ज़रूरत भी नहीं है। बस एक अदद पीसी हो, टाइप करने आता हो, मन में भाव का अभाव भी हो तो कोई बात नहीं। इतनी सारी बातें हैं कि भाव अपने आप पैदा हो जाएंगे। नहीं हुए तो मन, तन, दिल, दिमाग सबका सेजेरियन करवा देंगे भाई साब! यह महिलाओं की ही प्रसव पीर नहीं है, इसमें बड़े बड़े दिग्गज सद्पुरुष हैं जो ताल ठोक कर लेखन के अखाड़े मे उतरते हैं और धरती की सारी औरतों की ऐसी तैसी करते हुए अपने मर्दाने लेखन पर क़ुर्बान कुर्बान जाते हैं। औरतें तो हैं ही गालियां खाने के लिए। कायरता की प्रतीक, औरत की चूडियां, कमज़ोरी की निशानी, औरतों के आंसू। उन मर्दाना लेखक और उससे भी बढ़के उस वेबसाइट के माननीय मॉडरेटर महोदय कि उसे जस का तस छाप देते हैं। शायद यहां भी टीआरपी का सवाल है।
यही हाल लेखकों का है। एक तो हिंदी जगत में सभी महान लेखक हैं। वे ब्रह्मा और वेदव्यास से भी बड़े हैं। वे जो लिख देते हैं, वह परम और चरम सत्य हो जाता है। इतना परम और चरम कि उनकी केवल स्तुति ही की जा सकती है, उसके खिलाफ कुछ बोला या लिखा तो यक़ीन मानिए कि आपके सात जनम के पुरखों तक का तर्पण हो जाएगा।
अब मोहल्ला लाइव ने एक नया बिगुल छेड़ दिया है। वह अचानक लेखकों के लेखन के असली और नकलीपन की शिनाख्त में लग गया है। शब्दों और समय के धनी पिल पड़े हैं अपनी अपनी ज़ोर आजमाइश में। पहले अरविंद चतुर्वेद और प्रदीप सौरभ की कविताओं को ले कर हुआ, अब फिर से गीत चतुर्वेदी और किसी और की कविता को ले कर हो रहा है। कहा जा रहा है कि यह नकल है। अरे, ज़िंदगी नकल करते बीत जाती है, अब किसी ने किसी की कविता के भाव चुरा लिये कि नकल कर ली तो ऐसा कौन-सा कहर बरपा हंगामा हो गया जनाब! यह नहीं सोचते कि नकल नहीं करते तो अब तक बंदर ही बने घूम रहे होते।
छम्मक्छल्लो ने ये कविताएं पढीं। कविता में उसका हाथ वैसे भी ज़रा तंग है, फिर भी उसे नहीं लगा कि यह नकल है। हम सभी क्रिएटिव हैं और यह बहुत संभावनापूर्ण हो सकता है कि कई लोगों के मन में एक स्थिति को ले कर विचार पैदा हों और लिखने में एक समानता आ जाए। अभी-अभी हिंदी दिवस गुजरा है। सभी की नज़र में यह एक अनुष्ठान भर था। सभी ने अपने अपने तरीके से इसकी खील बखिया उधेरी। एक बात सभी कहते रहे कि हिंदी को बाज़ार के साथ जोड़ दो, अंग्रेजी की तरह यह सबकी भाषा अपने आप बन जाएगी। अब इसमें नकल को ले कर कोई अखाड़ेबाजी करने लगे तो कोई क्या कर सकता है? अख़बारों में भी एक घटना पर सभी लिखते हैं। कभी-कभी तो दो अखबारों के शीर्षक भी इतने एक से होते हैं कि लगने लगता है कि किसी एक ने ही लिखा है। जी नहीं, छम्मकछल्लो प्रेस विज्ञप्ति की बात नहीं कर रही कि एक ही प्रेस विज्ञप्ति सभी जगह गयी और सभी ने उसे जस का तस छाप दिया। अगर इस समान से शीर्षक को ले कर दो अखबार आपस में पिल पड़ें तो?
छम्मकछल्लो बहुत सुकून से है कि गोस्वामी तुलसीदास इस समय में नहीं हुए वरना क्या पता ऋषि वाल्मीकि उन पर अपनी रामायण की नकल का आरोप लगा देते। नरेंद्र कोहली और तुलसीदास के समय में बड़ा फर्क़ है, वरना गोंसाईं जी उन पर आरोप लगा देते। भगवान सिंह भी बच गये और अभी अभी ‘विश्वामित्र’ उपन्यास लिखनेवाले ब्रजकिशोर वर्मनभी। प्रतिभा राय और वेद व्यास में भी समय का बड़ा अंतर है, नहीं तो वेद व्यास भी कहते कि प्रतिभा राय ने द्रौपदी पर उपन्यास लिखते समय उनकी नकल मार ली है। जब लोग बौद्धिक हैं तो किसने कौन सा साहित्य कब पढ़ा और कब किसकी बात मन पर खुब गयी, किस साहित्य से कौन प्रभावित हो कर क्या लिख जाएगा, इस पर आज तक किसी का कोई एख्तियार रहा है क्या? जैसे कहा जाता है कि पुस्तक की चोरी, चोरी नहीं होती, वैसे ही विचार की चोरी, चोरी नहीं होती। विचार एक दूसरे से मेल खाते हैं। आप और हम उनसे प्रभावित होते हैं। विचार अच्छे लगते हैं तो हम उनका अनुसरण करते हैं, जैसे बुद्ध, महावीर, गांधी, सुभाष आदि के विचार हमारे प्रेरणास्रोत हैं। मगर कोई इनके विचारों को ताक पर रख कर इनकी वेश भूषा अपना ले तो उसे नकल ही कहा जाएगा। आरोप लगाते वक़्त इतना तो सोचें कि आरोप का आधार क्या है? कुछ शब्द किसी से मिल गये तो क्या शब्द किसी की बपौती है? लिखनेवाले ने उनका पेटेंट करा लिया है? और अगर ऐसा ही है तो फिर ऐसा क्या हम और आप लिख रहे हैं जो वेद पुराण या रामायण महाभारत में नहीं लिखा गया है कि जिसे आज के शेक्सपियर, लू शुन, प्रेमचंद, गोर्की या लिओ तॉल्सतॉय नहीं लिख गये हैं?
बहरहाल, छम्मकछल्लो को बड़ा मज़ा आ रहा है। वह लेखक तो नहीं है, फिर भी वह गर्व के साथ कह रही है कि उसने आजतक जो कुछ भी लिखा है, सब नकल कर के लिखा है। उसने तो अपनी आंख खुलने के बाद ही सब कुछ की नकल की है। नकल करके उसने चलना, बोलना, बात करना, लिखना पढ़ना सीखा है। स्कूल कॉलेज के सभी टीचर उसकी नकल के घेरे में इस तरह आ जाते कि कभी वह किसी यू सी झा की तरह अंग्रेज़ी पढ़ाने की नकल करती तो कभी डॉ रामधारी सिंह दिवाकर की तरह कथा साहित्य पढ़ाने की। और तो और, फिल्म देख कर घर आने पर वह सबसे पहले अपनी बहन के सामने उस फिल्म के अभिनेता अभिनेत्री के अभिनय की नकल करती, हेलेन के डांस की नकल उतारती। पहले वह इसे प्रेरणा समझती थी, मगर अभी अभी उसके ज्ञान चक्षु खुले हैं कि नहीं, यह सब प्रेरणा में नहीं, नकल के घेरे में आते हैं। छम्मकछल्लो को लगता है, इससे अच्छे तो हिंदी फिल्म इंडस्ट्री है। भाई लोग पूरी की पूरी फिल्म नकल कर के बना डालते हैं, सेट दर सेट, संवाद दर संवाद, संगीत दर संगीत, मगर लोग उसे “इंस्पायर्ड बाइ” बोलते हैं। “इंस्पायर्ड बाइ” भी बोल दिया तो बड़ी बात हो गयी। अभी हॉलीवुड में बॉलीवुड की बहार है। उसे भी लोग “इंस्पायर्ड बाइ” कहते हैं। ना कहें तो क्या घमासान मचाएं? मचा कर फायदा? मगर शायद मोहल्ला लाइव को है, लोगों को है। आखिर, धींगा मुश्ती देखने का मज़ा ही कुछ और है ना! किसी के दिल के तेल में अपने घर का भी दिया जला लो भाई!
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