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Sunday, September 27, 2009

कन्या जिमाइये, छुट्टी पाइए!

मोहल्ला लाइव पर पढ़ें यह लेख। http://mohallalive.com/2009/09/27/vibha-rani-satirical-article-on-male-female-debate/

छम्मक्छल्लो की तरह आप भी इस कहावत से होंगे कि बारह बरस पर घूरे के भी दिन फिरते हैं। मगर हमारा धर्म उदार है। वह इतनी लंबी तपस्या नहीं कराता। वह स्त्रियों के बारे में भी बडा उदार है। वह कहता है कि जहां नारियों की पूजा होती है, वहां ईश्वर का वास होता है। वह तेज़, तप, शक्ति, बल, चरित्र, ममता, प्रेम सतीत्व – सभी के लिए स्त्री की पूजा करता है। इसके लिए वह किसी लड़की के स्त्री बनने तक की प्रतीक्षा नहीं करता। जन्म के बाद से ही उसकी आराधना करना शुरू कर देता है।
अभी नवरात्रि की धूम है। इसके पहले गणपति का उत्सव था। उसमें गणपति के साथ-साथ गौरी की पूजा हुई। उसके एक दिन पहले हरतालिका होती है। उसमें शंकर के साथ साथ पार्वती की पूजा हुई। इसके पहले जन्माष्टमी पर कृष्ण के साथ राधा की और श्रावण में शंकर के साथ पार्वती की हुई। सीता और राधा के लिए तो अलग से राधाष्टमी और जानकी नवमी है ही। नवरात्रि के बाद दीवाली आएगी। उसमें लक्ष्मी और काली की पूजा होगी। सभी में नारी या कह लें कि देवी के विविध रूपों की पूजा होती है। बड़ी श्रद्धा व भक्ति से इन तमाम देवियों की आराधना की जाती है। नवरात्रि में सप्तमी से ले कर नवमी तक घर-घर कुंआरी कन्याएं जिमायी जाती हैं। सभी उन्हें जिमाते हैं, दान-दक्षिणा देते हैं। और तो और, उनके पैर भी छूते हैं।
बस जी बस, इसके आगे नहीं। अपन ने की आराधना और पायी छुट्टी। इससे अधिक अपने बस की बात नहीं है। देवी को पूज लिया या कन्या जिमा लिया, तो इसका यह मतलब मत निकालिए कि हम कन्याओं या बेटियों के प्रति ज़िम्मेवारियों से भर गये। न जी न, यह बैठे-बिठाये रोग पालने वाली बातें हमसे न करो। जी, यह तो पूजा-पाठ की बातें हैं। सो पूजा पाठ कर लिया, धर्म निभा लिया। इसके लिए अपने घर में बेटी तो नहीं पैदा की जा सकती न। अखिर अपने घर की बेटी को तो हम कन्या जिमाने के लिए बिठाते नहीं। उसके लिए तो दूसरे के घर की बेटियों को ही लेते हैं। बेटा ब्याहने के लिए भी दूसरे के घर की बेटी को लाते हैं। बेटी पैदा करने या उसे पालने-पोसने, उसकी रखवाली करने, उसे सुरक्षित रखने के इतने सारे ताम-झाम हमसे नहीं होते जी। इसलिए हम तो अपने घर में बेटियां पैदा ही नहीं होने देते। सरकार कहती रहे कि लिंग जांच अपराध है, समाजसेवी ढिंढोरा पीटते रहें कि कन्या भ्रूण हत्या न करें। आंकड़े बताते रहें कि देश में 1000 लड़के पर केवल 833 लड़कियां रह गयी हैं। अपन को इन सबसे क्या?
कहावत है न कि जहां चाह, वहां राह। सो न तो डॉक्टरों की कमी है न क्लिनिकों की। कमी है तो सिर्फ अपनी इच्छा शक्ति की। मेरी सलाह मानिए, अपनी इच्छा शक्ति जगाइए और कन्या गर्भ से मुक्ति पाइए। देवी-पूजा और कन्या भोजन की चिंता ना करें, देवी तो तय ही है, न तो वो बदलनेवाली हैं, न तो उनकी संख्या में कोई कमी या इज़ाफा होनेवाला है। रह गयी कन्याएं, तो देश में सिरफिरों की कमी तो है नहीं। कोई न कोई कन्या पैदा करेगा ही। आप उसी को जिमा कर पुण्य कमा लीजिएगा। आखिरकार, सभी तो मंदिर नहीं बनाते न। मंदिर तो कोई-कोई ही बनाता है, पूजा तो मगर सभी करते हैं कि नहीं। सो मेरी सलाह पर गौर फरमाइए। अभी भी समय है, अभी भी कुछ बिगड़ा नहीं है। अपनी ज़‍िंदगी संभाल लीजिए और इन सब पचड़े में मत पड़‍िए। बस सीधे-सीधे कन्या जिमाइए, छुट्टी पाइए!

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