दिनेश ठाकुर से मेरी मुलाक़ात
मुंबई में ही हुई। मैंने नाटक लिखना शुरू किया था। पारिवारिक कारणों से मैं तब
एक्टिव थिएटर से दूर थी। मेरा पहला नाटक था- ‘दूसरा
आदमी दूसरी औरत।‘ उसे सबसे पहले ‘एक्सपेरिमेंटल
थिएटर फ़ाउंडेशन, मुंबई’
ने किया। बाद में राजेन्द्र गुप्ता और सीमा विश्वास ने। अब इसे रास कला मंच,
हिसार कर रहा है। नाट्य लेखक के लिए एक बड़ी उपलब्धि होती है- उसके लिखे नाटकों का
मंचन। मंचन ही लेखक और नाटक दोनों की सार्थकता है। ‘एक्सपेरिमेंटल
थिएटर फ़ाउंडेशन’ द्वारा ‘दूसरा
आदमी दूसरी औरत‘ के मंचन के बाद नाटक लिखने का उत्साह और बढ़ा
और फटाफट कुछेक नाटक और लिख डाले। उसी में एक नाटक था- ‘मदद
करो संतोषी माता।‘ बेरोजगारी को आधार बना कर हास्य-व्यंग्य में
लिखा गया था यह नाटक। ‘एक्सपेरिमेंटल थिएटर फ़ाउंडेशन’
ने ही इसका रंग- पाठ रखा। मुख्य अतिथि के रूप में बुलाए गए –दिनेश ठाकुर। Tensions in life leap our peace. Chhammakchhallo gives a comic relief through its satire, stories, poems and other relevance. Leave your pain somewhere aside and be happy with me, via chhammakchhallokahis.
Thursday, September 20, 2012
दिनेश ठाकुर- नकारात्मकता की सकारात्मक भूमिका।
दिनेश ठाकुर से मेरी मुलाक़ात
मुंबई में ही हुई। मैंने नाटक लिखना शुरू किया था। पारिवारिक कारणों से मैं तब
एक्टिव थिएटर से दूर थी। मेरा पहला नाटक था- ‘दूसरा
आदमी दूसरी औरत।‘ उसे सबसे पहले ‘एक्सपेरिमेंटल
थिएटर फ़ाउंडेशन, मुंबई’
ने किया। बाद में राजेन्द्र गुप्ता और सीमा विश्वास ने। अब इसे रास कला मंच,
हिसार कर रहा है। नाट्य लेखक के लिए एक बड़ी उपलब्धि होती है- उसके लिखे नाटकों का
मंचन। मंचन ही लेखक और नाटक दोनों की सार्थकता है। ‘एक्सपेरिमेंटल
थिएटर फ़ाउंडेशन’ द्वारा ‘दूसरा
आदमी दूसरी औरत‘ के मंचन के बाद नाटक लिखने का उत्साह और बढ़ा
और फटाफट कुछेक नाटक और लिख डाले। उसी में एक नाटक था- ‘मदद
करो संतोषी माता।‘ बेरोजगारी को आधार बना कर हास्य-व्यंग्य में
लिखा गया था यह नाटक। ‘एक्सपेरिमेंटल थिएटर फ़ाउंडेशन’
ने ही इसका रंग- पाठ रखा। मुख्य अतिथि के रूप में बुलाए गए –दिनेश ठाकुर। Wednesday, May 30, 2012
केवल मंच तक ही सीमित नहीं है रंगमंच – विभा रानी
रंगमंच तथा विभिन्न कला माध्यमों को समर्पित सांस्कृतिक दल "दस्तक" का ब्लॉग है- 'मंडली'। पुंज प्रकाश इसे अपने प्रकाश से प्रकाशित कराते हैं। इस बार पढिए इसमें मेरा साक्षात्कार।
Tuesday, May 29, 2012
केवल मंच तक ही सीमित नहीं है रंगमंच – विभा रानी
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| विभा रानी |
Wednesday, June 1, 2011
बादल सरकार के साथ राजनीतिक नाटकों का पटाक्षेप
मोहल्ला लाइव पर प्रस्तुत सदानंद मेनन का आलेख. पढें और अपनी राय दें. - प्रस्तुति : विभा रानी
लिंक यह रहा. http://mohallalive.com/2011/06/01/a-curtain-call-for-political-theatre/
(बादल सरकार पर लिखे सदानंद मेनन के इस लेख का हिंदी भाव दो भागों में है। पूरे लेख को अंग्रेजी में 28 मई-3 जून के इकॉनॉमिक & पॉलिटिकल वीकली [epw.org.in] में पढा जा सकता है : मॉडरेटर)
बादल सरकार न तो मास्टर थे, न राजनीतिज्ञ। फिर भी उन्होंने अपने थर्ड थिएटर के माध्यम से ये दोनों रूप बखूबी निभाये। उनके दर्शक एक खास तरह के शहरी मध्यवर्गीय नागरिक या कामगार थे, लेकिन इसके साथ ही उन्होंने सुंदरबन और संथालियों के साथ अपने संवाद कायम किये। दर्शकों के बीच थिएटर को ‘बेचने’ की धारणा से अलग उन्होंने ‘फ्री थिएटर’ की अवधारणा पर काम किया। कर्जन पार्क ओपन थिएटर उनके इस विचार का पोषक और प्रचारक बना।
बादल दा के 50 से भी अधिक नाटकों के हजारों शो उनके ग्रुप ने तो किये ही, अनेकानेक नाटक अलग-अलग भाषाओं, जगहों के ग्रुप्स ने किये। 1970 से 1990 तक यह कारवां लगभग अबाध गति से चलता रहा। अधिकांश नाटक स्वतंत्र राष्ट्र में पनप रहे औपनिवेशक रूप पर कटाक्ष और प्रहार करते हुए थे। रुस्तम भरुचा ने अपनी किताब “रिहर्सल्स ऑफ रिवोल्यूशन” मे बादल सरकार के नाटकों पर लिखा है – “उनके नाटक उग्रवादी होने का बाना नहीं धरते। वे दर्शकों के चेतन में जाकर उन्हें बेचैन करते हैं। बादल दा लोगों की पीड़ाओं को तटस्थ हो कर देखनेवाले मध्यवर्ग की हृदयहीनता को फोकस करते हुए अपने नाटक ‘भोमा’ में कहते हैं – “एखॉन मानुषेर रॉक्तो ठांडा/ ठांडा/ ठांडा…” (आज के लोगों का खून ठंढा/ ठंढा/ ठंढा हो गया है।)
बादल दा की खोज किसी अमूर्त की ओर नहीं थी। वे कहते थे कि मैं एक ऐसे अस्त-व्यस्त समय में रह रहा हूं, जो विरोधाभासों का ढेर है। जगत के एब्सर्ड रूप में से भी वे अपने लिए थीम निकाल लेते थे। कई बार तो अपनी नोटबुक में से ही वे विषय निकाल लेते। कट एंड पेस्ट वाले रूप को वे अपनाते थे। छोटे और कसे शब्दों से वे अपने नाटक की बेलबूटागिरी करते थे। एक विचार से दूसरे विचार तक वे बेखटके आया-जाया करते। थिएटर के प्रमुख कारकों – लाइट, सेट कॉस्ट्यूम की तो उन्होंने ऐसी की तैसी कर दी। वे कभी-कभी तो ये भी कहते थे कि क्या सही में एक्टिंग सीखने की जरूरत है भी? थिएटर के स्वाभाविक रूप पर उनका खासा जोर था। अंग्रेजी के प्रभुत्व को उन्होंने उखाड़ फेंका। पैसे को वे थिएटर के लिए कतई जरूरी नहीं समझते थे। जीवन के अंतिम पल तक वे इसे कलाकारों व दर्शकों के साझा रूप की खोज करते रहे।
बावजूद इसके बादल दा ने अपने प्रशिक्षण से कभी किनारा नहीं किया। स्पेस, डायमेंशन, एंट्री-एक्जिट के बारे में सतत जागरूक बने रहे। अपने नाटकों – ‘सगीना महतो’ (1971) और “स्पार्टाकस’ (1972) में वे स्पेस का गैर पारंपरिक रूप प्रयोग करते दिखे। वे इस बात के सख्त खिलाफ थे कि दर्शक तो अंधेरे में बैठे रहें और कलाकार उजाले में प्रस्तुति देते रहें। उनके हिसाब से ऐसी प्रोसीनियम व्यवस्था में दर्शक कलाकारों से एकदम कट जाते हैं। बादल दा ने कई नाटक बांग्ला की लोक विधा ‘तारजा’ में किये, जिसमें दो कवि अपने अपने विचारों के साथ बहस करते हैं। प्रस्ताब, गोंडी, बासी खबर, पगला घोड़ा, सॉल्यूशन एक्स, हात्तमालेर ऊपरे, एकटी हत्यार नाट्यकथा, खटमट क्रिंग, चूर्ण पृथ्वी, सुखपथ्य भारतेर इतिहास, भांगा मानुष आदि में उन्होंने आंतरिक प्रतिरोध को नाटक की शकल में सामने लाने की कोशिश की।
थिएटर को ही अपना ओढना-बिछौना माननेवाले बादल दा ने देश –विदेश की प्रमुख थिएटर हस्तियों के साथ काम किया। इसमें मणिपुर के हस्नाम कन्हैयालाल से लेकर कर्नाटक के प्रसन्ना, बंगाल के प्रोबीर गुहा और पाकिस्तान की मदीहा गौहर तक शामिल हैं। वर्कशॉप के माध्यम से वे सहभागियों के भीतर के मनोविज्ञान को पकडते थे और उनके भीतर की झिझक को दूर करते थे। वे सहभागियों को खुद ही अपनी स्क्रिप्ट लिखने के लिए उकसाते थे। 10 मिनट के ये स्क्रिप्ट्स नाटक के विविध अभ्यासों में काम आते। 30 सालों में उन्होंने लगभग 300 छोटे-बड़े थिएटर वर्कशॉप लिये होंगे।
और जीवन के 86 बरस तक जिस प्रतिरोध के स्वर को नाटकों में वे मुखरित करते रहे, उसका पटाक्षेप अंतत: 13 मई 2011 को हुआ, जिस दिन तमिलनाडु और बंगाल दोनों ही राज्य एक नयी राजनीतिक करवट ले रहे थे। 35 साल तक राज करनेवाली मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का वर्चस्व बंगाल से खत्म हो गया था। एक नवीन ‘पोरिवर्तन’ की आंधी में राज्य उस दिन बह रहा था। क्या पता, बादल दा अपने जीते जी इस एब्सर्डिटी को न देख सके हों। कार्डधारी मेंबर होने के बावजूद, जब पार्टी में ही ‘बहुत’ मतलब ‘बहुत’ सारे समझौते के साथ रहना उन्हें कबूल नहीं हुआ था। पार्टी से वे भले हट गये, मगर मन से पूरी विचारधारा के साथ रहे।
आज के नाटकों से राजनीतिक परिदृश्य जिस तरह से साफ होता जा रहा है, लोग सेफ नाटक खेलने लगे हैं, जनता के दुख-दर्द को भूलकर फूहड़ कॉमेडी और कमर्शियल थिएटर में जाने लगे हैं, निस्संदेह बादल दा की ऐसे नाटकों में जरूरत नहीं थी। 13 मई को राज्य नये युग (?) के सूत्रपात का जश्न मना रहा था, बादल दा उसे देख न सके। शायद यह भी रहा हो कि वे उनके जितने भी नाटक रहे हैं, मुख्यत: उनका स्वर रहा है – उनलोगों के खिलाफ अपने गुस्से को जाहिर करना, जो गरीब को गरीब, मजबूर को मजबूर बनाये रखते हैं। ‘थर्ड थिएटर’ का फर्स्ट थिएटर में विलय का सपना देखना आज की स्थिति में शायद संभव नहीं – बादल दा इसे समझ रहे थे, देख रहे थे। और, यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि बादल दा की अंतिम सांस के साथ ही राजनीतिक थिएटर पर भी पर्दा पड़ गया है।
(सदानंद मेनन। लेखक, फोटोग्राफर और स्टेज लाइट डिजाइनर। फिलहाल एशियन कॉलेज ऑफ चेन्नै में असोसिएट फैकल्टी। उनसे sadanandmenon@yahoo.com पर संपर्क किया जा सकता है।)
Tuesday, April 26, 2011
श्री श्री 108 माता छम्मकछल्लेश्वरी की जय!!!
Saturday, January 30, 2010
थिएटर की भूमिका
Monday, November 2, 2009
सकुबाई से सफाई घर की भी, दिल की भी
http://mohallalive.com/2009/11/01/review-of-drama-sakubai/
नाटक में आप जितने भी प्रयोग कर लें, पीरियड ड्रामा ले आएं, ड्रामे के माध्यम से आप राग रंग, नट भाव, उपमा, उपमान की बातें बताएं, सच तो यह है कि आम आदमी नाटक के उन्हीं हिस्सों से जुड़ पाता है, जिसके साथ वह अपना जीवन देख पाता है। पौराणिक आख्यानों में भी वह वहीं तक पहुंचता है, जहां उसे आज का अपना समाज, परिवेश दिखाई देता है। ऐसे में सामजिक या यों कहें कि घरेलू पृष्ठभूमि पर खेले गये नाटक से दर्शक तुरंत अपना नाता जोड़ लेते हैं। एकजुट थिएटर ग्रुप प्रस्तुत नादिरा ज़हीर बब्बर लिखित व निर्देशित नाटक “सकुबाई” नाटक एक ऐसी ही रचना है, जिसमें घर-घर काम करनेवाली बाई सकुबाई के माध्यम से समाज में एक साथ ही जी रहे नाना वर्गों के नाना जीवन को देखे जाने की कोशिश है। साथ ही साथ खुद उसके अपने जीवन की भी। एक आम मध्य या उच्च वर्ग और तथाकथित निम्न वर्ग में कोई फर्क़ नहीं रह जाता, जब मामला प्रेम, सेक्स, घरेलू हिंसा, बलात्कार, आपसी जलन आदि पर आता है, बल्कि कई बार तो ये तथाकथित निम्न वर्ग के लोग इन संभ्रांत लोगों पर भारी पड़ जाते हैं। क्या फर्क़ रह जाता है सकुबाई या उसकी मालकिन में कि दोनों के ही पति के विवाहेतर संबंध हैं। विरोध करने पर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर मालकिन भी पति के हाथों बुरी तरह पिटती है, मगर बच्चों की खातिर घर नहीं छोड़ पाती। मगर, फर्क़ है। सकुबाई के पति के संबंध जग जाहिर हैं। मालकिन के पति के संबंध सामाजिकता की खोल में छुपा। नौकरानी हो कर भी सकुबाई इतनी ईमानदार है कि मालकिन अपना पूरा घर उसके ऊपर छोड़ देती है, जबकि उसी मालकिन की करोड़पति सहेली मालकिन के पर्स से उसके हीरे की अंगूठी चुरा लेती है। मुंबई में आपको ऐसी ईमानदार बाइयों की फौज़ मिलेगी। बल्कि यूं कहें कि जिस तरह हर सफल पुरुष के पीछे किसी स्त्री का हाथ होता है, उसी तरह हर सफल औरत के पीछे उसकी बाई का हाथ होता है।
एकपात्रीय नाटक को कुशलतापूर्वक डेढ़ घंटे तक खींच ले जाना किसी समर्थ कलाकार की ही खासियत है और यह विशेषता निस्संदेह सकुबाई की भूमिका में सरिता जोशी की है। सरिता जोशी गुजराती थिएटर और फिल्म की मशहूर और बड़ी कुशल, इसलिए सफल अभिनेत्री हैं। वे लगभग 45 सालों से भी अधिक समय से अभिनय के क्षेत्र में हैं। एकपात्रीय अभिनय में सब कुछ उसी पात्र को दर्शाना होता है और सरिता जोशी ने मालिक से लेकर अपने पति और बूढ़ी मां की भी भूमिका बड़ी कुशलता से निभायी है। तदनुसार आवाज़, शारीरिक भंगिमा, चेहरे पर भाव। हालांकि उम्र अपनी छाप उन पर छोड़ने लगी है। बीच-बीच में वे हांफ जाती रहीं, संवाद भी लगा कि कुछ भूलती सी रहीं। मगर यह उनकी नाट्यकुशलता ही थी कि इसे उन्होंने ज़ाहिर नहीं होने दिया।
यह नाटक 1999 में पृथ्वी फेस्टिवल में ओपन हुआ था। तब से इस नाटक के कई शो हो चुके हैं। नादिरा बब्बर के यह भी पुराने नाटकों मे से एक है, जिसमें उनकी पुरानी मेहनत व प्रतिबद्धता स्पष्ट दिखाई देती है। सेट प्रभार, स्टेज और प्रोडक्शन सभी में हनीफ पटनी ने अपनी कुशलता दिखायी है। फिर भी, नाटक के दस साल हो जाने के कारण सेट अब पुराने हो चुके हैं, जो स्टेज पर भी दिखते हैं। प्रकाश व्यवस्था नाटक के अनुरूप थी और संगीत संचालन एक्टर को अभिनय के साथ-साथ डांस करने व अन्य हाव-भाव के लिए पर्याप्त स्पेस देता है। “दयाशंकर की डायरी” की तरह ही यह नाटक आपको अपने से जोड़ कर रखता है, बल्कि कुछ अधिक ही, क्योंकि आखिरकार यह एक महिला की लिखी, महिला की ज़ुबानी, महिला की गाथा है, और महिला की कहानी में प्रताड़णा के भाव तनिक अधिक तो रहते ही हैं, जिसमें व्यक्ति और परिवेश दोनों की ही भूमिका रहती है। इसलिए यह नाटक हो सकता है आपको “दयाशंकर की डायरी” से अधिक अपील करे, जैसा कि इसने यहां के दर्शकों को किया था।
Saturday, May 3, 2008
१ मई को सलाम!
अवितोको अब अपने इस नए साल में फ़िर से तैयार है- कला, थिएटर varkshaap, नाटक के प्रदर्शन और जेल के बंदियों के लिए अलग-अलग karyakramon के साथ। isamein, उनके साथ srijanatmak kaaryakram के साथ- साथ उन्हें अपने जीवन koo नए svaroop में देखने के बारे में vichaar kiyaa jaaega। उनकी pratibhaaon को saamane लाने के liee karyakram हैं।
अवितोको हर वर्ग से judate हुए अनेक prashikShan karyakramon के साथ भी है। inamein हैं- "Time Management', Self Exploration', Know yourself Better', 'Guilt Management', राजभाषा Management Through self Management' etc.
छाम्माक्छाल्लो को इस बात का संतोष है कि आप sabakaa साथ और sahayog उसके साथ है। डर असल यह usakii अपनी nahiin, एक samaveta prayaas की yaatra है, padaav- डर- padaav तय कराने के silasile हैं।


