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Thursday, September 20, 2012

दिनेश ठाकुर- नकारात्मकता की सकारात्मक भूमिका।


दिनेश ठाकुर अब हमारे बीच नहीं हैं। हिन्दी थिएटर जगत उनका ऋणी रहेगा। मुंबई के चंद प्रसिद्ध थिएटर ग्रुप्स में से एक उनका भी अंकग्रुप था। ज़ाहिर है, थिएटर की ओर लपकनेवाली सभी नई पौध इन नामों के पीछे भागती है। थिएटर का यह अपना ग्लैमर है।
दिनेश ठाकुर से मेरी मुलाक़ात मुंबई में ही हुई। मैंने नाटक लिखना शुरू किया था। पारिवारिक कारणों से मैं तब एक्टिव थिएटर से दूर थी। मेरा पहला नाटक था- दूसरा आदमी दूसरी औरत। उसे सबसे पहले एक्सपेरिमेंटल थिएटर फ़ाउंडेशन, मुंबई ने किया। बाद में राजेन्द्र गुप्ता और सीमा विश्वास ने। अब इसे रास कला मंच, हिसार कर रहा है। नाट्य लेखक के लिए एक बड़ी उपलब्धि होती है- उसके लिखे नाटकों का मंचन। मंचन ही लेखक और नाटक दोनों की सार्थकता है। एक्सपेरिमेंटल थिएटर फ़ाउंडेशन द्वारा दूसरा आदमी दूसरी औरत के मंचन के बाद नाटक लिखने का उत्साह और बढ़ा और फटाफट कुछेक नाटक और लिख डाले। उसी में एक नाटक था- मदद करो संतोषी माता। बेरोजगारी को आधार बना कर हास्य-व्यंग्य में लिखा गया था यह नाटक। एक्सपेरिमेंटल थिएटर फ़ाउंडेशन ने ही इसका रंग- पाठ रखा। मुख्य अतिथि के रूप में बुलाए गए –दिनेश ठाकुर।
दिनेश जी ने बड़े धीरज के साथ रंग पाठ को सुना। और भी कई नामचीन लोग थे- सत्यदेव त्रिपाठी, हरी मृदुल, गोपाल शर्मा, रमेश राजहंस, फिरोज अशरफ, डॉ चंद्र प्रकाश द्विवेदी, बबिता रावत। रंग-पाठ कभी अंक में ही काम कर चुकी राजेश्वरी पंडित और आज के हिन्दी-भोजपुरी फिल्मों और टीवी के अभिनेता प्रणय नारायण ने किया था।
रंग-पाठ के बाद सभी ने अपने अपने तरीके से नाटक पर चर्चा की। सबसे बाद में दिनेश जी ने बोलना शुरू किया और अंत में कहा कि यह नाटक बहुत कमजोर है। मुझे लगा कि अरे, यह क्या ये बोल रहे हैं, क्योंकि अपनी तो आदत होती है तारीफ सुनने की। खासकर तब, जब कार्यक्रम आपके लेखन या आप पर आयोजित हो। मुझे लगा कि यह आदमी तो बड़ा नेगेटिव है।
आम तौर पर लेखक को अपनी रचना पर चर्चा के समय कुछ बोलते नहीं देखा-सुना था, लेकिन उस दिन मैं अपने ही नाटक पर उनसे इसे कैसे प्रभावी तरीके से लिखा जाए, पूछ बैठी। बाद में इसकी काफी आलोचना हुई। लेकिन मुझे लगता है कि यदि किसी की रचना पर कोई समीक्षा हो रही है तो रचनाकार को यह पूछने का मौका दिया जाना चाहिए ताकि उसकी रचना में और निखार आ सके। मैंने यह भी पूछा कि यदि इस पर और काम करके इसे आपके पास लाऊं, तो क्या आप इसे करेंगे? वे पहले मुसकाए, फिर बोले- “हम नाटक के इतने सारे पक्षों पर काम करते हैं कि  स्क्रिप्ट पर काम करना संभव नहीं। मैंने फिर पूछा, ‘फिर लोग हिन्दी में नाटक कैसे लिखेंगे, यदि उसे कोई मंचित ही ना करे? कविता-कहानी तो कही ना कहीं छप ही जाती है। उपन्यास अंश या कभी कभी तो पूरा उपन्यास भी छप जाता है, मगर नाटक की बात आने पर सभी जगह की कमी की बात कहकर परे कर देते हैं।
साहित्य जगत के लोग नाटक से आमतौर पर कोई बाबस्ता नही रखते। उन्हें लगता है कि नाटक दृश्य विधा है, इसलिए हमारा इसमें क्या काम? नाटक के लोग साहित्य से सरोकार रखते हैं, क्योंकि उन्हें उन साहित्यों को पढ़ कर ही अपने लिए नाटक चुनने होते हैं। मुझे उस दिन दिनेश जी की बातें बड़ी नागवार लगी थी। कई दिनों तक मूड खराब रहा था। लेकिन, धीरे-धीरे उनके कहे पर सोचना शुरू किया, तब लगा कि वे ठीक कह रहे हैं।  
दिनेश जी ने बड़ी सादगी से कहा, ‘नाटक ऐसे नहीं लिखा जाता है। नाटक लिखने के लिए नाटक के रिहर्सल में जाना ज़रूरी है। अपनी सदाशयता में उन्होने मुझे खुला आमंत्रण दिया कि मैं उनके रिहर्सलों में कभी भी जा सकती हूँ। अपनी व्यस्तताओं के कारण ही उस समय एक्टिव थिएटर से दूर रही थी, इन्ही कारणों से उनके रिहर्सलों में भी कभी नहीं जा सकी, मगर उनके कई नाटक मैंने देखे। उन्होने खुद ही कई बार फोन करके मुझे बुलाया। कई बार मैं फोन करके उनके नाटक देखने गई- हमेशा, हम दोनों, कमली, जिन लाहौर नई वेख्या ... आदि। एक दो नाटकों की नवभारत टाइम्स में समीक्षा भी लिखी।
जीवन में नकारात्मक ऊर्जा भी सकारात्मकता लेकर आती है। उस दिन यदि दिनेश जी ने बात उतनी साफ-साफ नही रखी होती तो आज मैं नाटक और अभिनय- दोनों के क्षेत्र में शायद इस रूप में नहीं रहती, जितनी आज हूँ।  
हालांकि दिनेश जी ने फिल्में भी कीं, करते रहे। लेकिन, नाटक उनका प्रमुख कार्य क्षेत्र रहा। दिनेश जी ने मुख्यत: नाटक को ओढा, बिछाया, सहेजा। हर अक्तूबर में वे अपने ग्रुप अंक का थिएटर फेस्टिवल कराते थे। उनकी नज़रों में विजय तेंदुलकर भारतीय नाट्य जगत के सबसे बड़े लेखक थे। उनके कई नाटक अंक ने किए थे। अपनी श्रद्धा विजय तेंदुलकर पर प्रकट करने के लिए उन्होने एक साल अपना थिएटर फेस्टिवल विजय तेंदुलकर लिखित नाटकों पर ही किया। किसी के जाने से जो शून्य भरता है, वह बना ही रहता है। कोई किसी का विकल्प नही होता। सभी अपने अपने रूप में काम करते हैं, अपनी पहचान बनाते हैं। इस रूप में दिनेश ठाकुर ने अपने रूप में काम कर के अपनी पहचान बनाई है, जो थिएटर जगत में हमेशा याद की जाती रहेगी।    
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