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Monday, June 16, 2014

पिता को याद करते हुए!

बाउजी का मेरी जिंदगी से उतना ही नाता है कि उनके अंश से मेरा जन्म हुआ। थोड़ा उससे आगे बढ़ें तो बचपन की चंद खट्टी-मीठी यादें। हमारे घर के बाहरी हिस्से में एक बहुत बड़ा कमरा था। हम सभी उसी में सोते। माँ समेत हम चारो भाई- बहन उस कमरे में बिछी चार चौकियों पर। दो बहनों की शादी हो गई थी। इसलिए वे अपनी ससुराल में थीं। बीच-बीच में आतीं-जातीं। बाउजी उससे सटे बरामदे में सोते। माँ अहले सुबह उठ जातीं। उन्हें घर-आँगन रोज दिन धोने की सनक थी। धोने-धाने के बाद वे आँगन के ओसारे पर रखी चौकी पर थोड़ी देर के लिए बैठतीं। हमलोग बारी-बारी से उठते। मैं घर में सबसे छोटी थी। मैं जान-बूझकर सोई रहती। बाउजी आते। मुझे हल्की सी गुदगुदी लगाते। मैं मुसकुराते हुए थोड़ा कुनमुनाती। बाउजी चौकी पर बैठ जाते। मैं उनकी पीठ पर चढ़ जाती। बाहर के कमरे से निकलकर आँगन जाने की गली को पार कराते वे ओसारे पर आते, जहां माँ चौकी पर बैठी रहतीं।

बाउजी की पीठ से उतरकर मैं माँ की गोद में चली जाती। माँ का ब्लाउज खोलती और दो चभक्के दूध के लगाकर उतरती। यह मेरी रोज की दिनचर्या थी। सर्दी के मौसम में जबतक हम मुंह-हाथ धोते, पूरब के ओसारे पर धूप उतर आती। माँ रसोई में लग जाती। दादी कडुआ तेल लेकर हमलोगों की मालिश करती। शुरू में उनके ठंढे हाथ हममें सिहरन भरते। लेकिन धीरे धीरे मालिश से उनके हाथों में गर्मी आती जाती और हमें भी उनके हाथों की गरमी मिलने लगती।

सर्दी में हर सुबह एक माखन-मिश्री बेचनेवाला आता। पूरी सर्दी उसका यही व्यवसाय था। केले के पत्ते को बेहद छोटे-छोटे टुकड़े में काटकर गीले कपड़े से ढककर रखता। मिश्री की छोटी-छोटी गोलियां और एक कटोरी में शक्कर। चार और आठ आने की गोलियां। लेते समय वह उन गोलियों की तश्तरी जैसा बनाता, उसपर शक्कर डालकर देता। बाउजी दो या तीन माखन-मिश्री खरीदते। एक वे खुद खाते, दो में हम चारो भाई-बहन। माँ और दादी का भी हिस्सा होगा, यह न हमें या बाउजी को कभी ख्याल आया या आने ही नही दिया गया।

बाउजी का हिस्सा हर चीज में निस्संदेह घर में सबसे ज्यादा था। उनकी रोटी में सबसे ज्यादा घी लगता। रोटी के बर्तन में उनकी रोटी अलग से मोड़कर रखी रहती। यह हमलोगों के लिए संकेत था कि ये बाउजी की रोटी है, इन्हें हाथ नहीं लगाना है। हमारी रोटियों में घी बहुत कम लगता। घी अगर कम हो जाता तो हमारी रोटियों में नही लगाया जाता। साफ साफ कह दिया जाता कि घी बस केवल उतना ही है कि बाउजी की रोटियों में लग सके। या लगता तो रोटी पर एक बूंद घी छुलाकर उसपर पानी फैला दिया जाता। दीदी कहती- “देखो, कितनी चप-चप रोटी है। हम भी उसे घी से चप-चप हुई रोटी समझकर बड़े स्वाद से खाते।

बाउजी का दुलार केवल पीठिया पर ले जाकर माँ की गोद में पहुंचाने तक ही सीमित था, जो उम्र के साथ अपने आप छूट गया। बाउजी ने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि हम चारों भाई- बहन क्या खा-पहन रहे हैं, क्या पढ़-लिख रहे हैं, घर का खाना-खर्चा कैसे चल रहा है, दोनों बहनों की शादी के समय लिए गए कर्जे की भुगताई कैसे हो रही है? उनकी दोपहर किशोरी हलवाई के यहाँ के समोसे और गुलाबजामुन के लिए तय थी। दिन के खाने में मोहल्ले के मास्टर जी की माँ के द्वारा जमाया गया दही अनिवार्य था। शाम में जद्दू मूढ़ीवाली की मूढ़ी भी फिक्स थी। मूढ़ी अलबत्ता ज्यादा ली जाती और बांस के डगरे में सभी भाई-बहनों के हिस्से लग जाते। कभी-कभी बाउजी के शाम के नाश्ते के लिए खजूर-निमकी बनती जो बनाकर उनकी कोठारी में रख दी जाती। उस कोठरी से बाउजी होमियोपैथ की प्रैक्टिस करते थे। उसमें हमेशा ताला लगा रहता। उसकी चाबी उनके ही पास रहती। हमलोगों के लिए वह कोठारी एक जादू नगरी से कम नहीं थी। कभी-कभी बाउजी कुछ किताब या सामान लाने के लिए हमलोगों को चाबी देते। हमलोग उस कोठरी को खोलकर किसी रहस्य-लोक को पा लेने की अनुभूति से उसे देखते। बाउजी के होमियोपैथ प्रैक्टिस की दवाइया, शुगर ऑफ मिल्क, मीठी-मीठी गोलियां और उनकी मोटी-मोटी किताबें।

बाउजी की हिन्दी और अँग्रेजी दोनों की लिखाई बेहद खूबसूरत थी। हमलोगों की अँग्रेजी की पढ़ाई कक्षा छह से शुरू होती। हम सम्मोहित से बाउजी को अँग्रेजी लिखता देखते। उसके बाद बाउजी की नकल करते कागज पर कुछ भी घसीटते जाते और कहीं अनुस्वार और कहीं एक लकीर खींच देते। बाद में पता चला कि कर्सिव राइटिंग करते बाउजी के वे नुक्ते या डैश मूलत: आई और टी अक्षर होते थे। बाउजी को होमियोपैथ का बड़ा शौक था और उस पर उनकी पकड़ भी काफी थी। मगर जाने क्या बात थी कि लोग उनके पास न आकर शहर के दूसरे डॉक्टर के पास जाते। हमलोगों की भी कृतघ्नता की हद रही कि कभी उनकी प्रैक्टिस पर  भरोसा नहीं किया। बाउजी को इसका मलाल तो था, मगर कभी जाहिर नहीं किया। माँ उनसे चिढ़ी रहतीं। हमें समझ तो आती थी, लेकिन पूछने का साहस नहीं था। आज भी महिलाओं कि अपने पतियों से चिढ़ को देखकर माँ की याद आती है।  

बाउजी साइंस टीचर थे। फिजिक्स पढाते थे। उनकी इच्छा थी कि उनके बच्चे साइंस लेकर पढ़ें। मेरे दोनों भाइयों ने साइंस लिया। सभी चाहते थे कि बड़ा भाई डॉक्टर बने और छोटा इंजीनियर। मुझसे बड़ी बहन ने आर्ट्स लिया। मैंने सातवीं के बोर्ड के बाद बाउजी के स्कूल में ही साइंस में दाखिला लिया। लेकिन लाख रटने के बाद भी मैथेमेटिक्स और फिजिक्स दिमाग में नहीं घुसा। मज़बूरन, दसवीं कक्षा में हमने साइंस बदलकर आर्ट्स ले लिया। तब यह व्यवस्था थी कि आठवी –नौवी के बाद दसवीं में एक बार विद्यार्थी अपनी फ़ैकल्टी बदल सकते थे। बोर्ड की परीक्षा ग्यारहवी में होती थी जिसे मैट्रिकुलेशन कहा जाता था।  

बाउजी को भी माँ की तरह ही कभी पॉलिटिक्स करनी नहीं आई, जबकि राजनीति का अच्छा ज्ञान दोनों को था। नतीजन, उनके स्कूल ने उन्हें पदोन्नति नहीं दी। बाउजी मुकदमा लड़ते रहे। वे हमसे अपील लिखवाते। कभी-कभी हम चिढ़ जाते। लंबी लड़ाई लड़ी बाउजी ने। हाई कोर्ट से जीत भी गए। कोर्ट ने उन्हें पदोन्नति सहित उनके सारे ड्यूज देने का आदेश स्कूल को दिया। मगर स्कूल ने कोर्ट की पूरी अवमानना करते हुए न उन्हें पदोन्नति दी, न उनके ड्यूज।


सेवा निवृत्ति के समय स्कूल ने उन्हें विदाई तक नहीं दी। बस, 75/- रुपए का पेंशन ज़रूर दिया, जो बाउजी के लिए ही नाकाफी था। लेकिन, बाउजी कभी झुके नहीं। बाउजी की यही आदत और स्वभाव शायद छम्मकछल्लो को मिला। उसे माँ –बाउजी की तरह न तो पॉलिटिक्स करनी आई, न किसी के सामने झुकना आया। माँ –बाउजी अपने स्तर पर बरसों झेलते रहे, आज छम्मकछल्लो। लेकिन, यह एक ऐसा तत्व दोनों ने दिया, जिससे जीवन को एक तारतम्यता मिली, अपनी जिम्मेदारियों का अहसास मिला और मिला, एक स्वाभिमानी जीवन जीने की शक्ति और प्रकाश। बाउजी को याद करते हुए बस यही कहा जा सकता है। ###
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