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Tuesday, June 10, 2014

पेशावर एक्सप्रेस

दंगे पर आधारित शमोएल अहमद की कहानी "सिंघारदान" आपने पढ़ी। आज हिन्दी और उर्दू के मशहूर लेखक कृष्णचंदर की एक बहुत ही महत्वपूर्ण कहानी आपके सामने है- "पेशावर एक्सप्रेस" । आज के माहौल से मिलाईए और सोचिए कि क्या हम अभी भी  पेशावर एक्सप्रेस में ही तो सवार नहीं हैं!

जब मैं पेशावर से चली तो मैंने इत्मिनान का सांस ली।मेरे डब्बों में ज़्यादातर हिंदू लोग बैठे हुए थे। ये लोग पेशावर से, मरदान से, कोहाट से, चारसदा से, ख़ैबर से, बंनों नौशहिरा से, मानसहरा से आए थे और पाकिस्तान में जान व माल को महफ़ूज़ न पा कर हिंदुस्तान का रुख कर रहे थे, स्टेशन पर ज़बरदस्त पहरा था और फ़ौज वाले बड़ी चौकसी से काम कर रहे थे। उन लोगों को जो, पाकिस्तान में पनाहगुज़ीन और हिंदुस्तान में शरणार्थी कहलाते थे उस वकत तक चैन का सांस ना आइ जब तक मैंने पंजाब की रोमानख़ेज़ सरज़मीं की तरफ़ कदम ना बढाए। ये लोग शकलो सूरत से बिलकुल पठान मालूम होते थे, गोरे चिट्टे, मज़बूत हाथ-पांव, सर पर कुलाह और लुंगी, और जिस्म पर कमीज़ और शलवार। ये लोग पश्तो में बात करते थे उनकी हिफ़ाज़त के लिये हर डब्बे में दो सिपाही बंदूकें ले कर खड़े थे। बलोची सिपाही अपने हाथ मैं जदीद राइफ़लें लिये हुए उन पठानों  और उनके बीवी बच्चों की तरफ़ मुस्करा मुस्करा कर देख रहे थे जो इक तारीख़ी ख़ौफ़ और शर के ज़ेर-ए-असर उस सरज़मीं से भागे जा रहे थे जहां वो हज़ारों साल से रहते चले आए थे। जिसके बरफ़ाब चश्मों से उन्होंने पानी पिया था। आज ये वतन यकलख्त बेगाना हो गया था और उसने अपने मेहरबान सीने के कवाड़ों उनपर बंद कर दिए थे और वो इक नए देश के तपते हुए मैदानों का तसव्वुर दिल में  लिए वहां से रुख़सत हो रहे थे। इस बात की खुशी ज़रूर थी कि इनकी जानें बच गई थीं। उनकी बहुत सी सम्पत्ति और उनकी बहु-बेटीओं, माओं और बीवीयों की आबरू महफ़ूज़ थी; लेकिन उनका दिल रो रहा था और आंखें सरहद के पथरीले सीने पर यूं गड़ी हुई थीं गोया इसे चीर कर अंदर घुस जाना चाहती हैं और उसके दया से  भरे ममता के फ़वारे से पूछना चाहती हैं, ‘बोल मां आज किस जुर्म की सज़ा में तूने अपने बेटों को घर से निकाल दिया है। अपनी बहूओं को इस ख़ूबसूरत आंगन से महरूम कर दिया है जहां वो कल तक सुहाग की रानियाँ बनी बैठी थीं। अपनी अलबेली कंवारियों को जो अंगूर की बेल की तरह तेरी छाती से लिपट रही थीं, झंझोड़ कर अलग कर दिया  है। किसलिए आज ये देश, विदेश हो गया है।
मैं चलती जा रही थी और डब्बों में बैठे हुए लोग अपने वतन की ओर उस के खड़े व बिछे चट्टानों, इसके मरगज़ारों, उसकी खिली वादीयों, खेतोंऔर बाग़ों की तरफ़ यूं देख रही थी, जैसे हर जाने पहचाने मंज़र को अपने सीने में छुपाकर ले जाना चाहती हो; जैसे निगाह हर जगह रुक जाए, और मुझे ऐसा मालूम हुआ कि इस ग़म के आलम के भार से मेरे  कदम भारी हुए जा रहे हैं और रेल की पटरी मुझे जवाब दिए जा रही है।
‘हसन अब्दाल’ तक लोग यूं ही उदासियों व नकबत की तस्वीर बने रहे।
हसन अब्दाल के स्टेशन पर बहुत से सिख  आए हुए थे। पंजा साहिब से लंबी लंबी किरपाणें लिए चेहरों पर हवाईयां उड़ी हुई, बाल बच्चे सहमे सहमे से, ऐसा मालूम होता था कि अपनी ही तलवार के घाव से ये लोग ख़ुद मर जाएंगे। डब्बों में बैठकर उन लोगों ने इत्मिनान की सांस ली और फिर दूसरे सरहद के हिंदू और सिख  पठानों से गुफ़तगू शुरू हो गई। किसी का घर-बार जल् गया था, कोई सिर्फ़ एक कमीज़ और शलवार में भागा था किसी के पांव में जूती नहीं थी और कोई इतना होशियार था कि अपने घर की टूटी चारपाई तक उठा लाया था। जिन लोगों का वाकई बहुत नुकसान हुआ था वो लोग गुमसुम बैठे हुए थे ख़ामोश चुपचाप। और जिसके पास कभी कुछ ना हुआ था वो अपनी लाखों की जायदाद खोने का ग़म कर रहा था और दूसरों को अपनी फ़र्ज़ी इमारत के किस्से सुना सुना कर उबा रहा था और मुसलमानों को गालीयां दे रहा था। बलोची सिपाही दरवाजों पर राइफ़लें थामें खड़े थे और कभी कभी इक दूसरे की तरफ़ कनखियों से देख कर मुस्करा उठते।
तकशला के स्टेशन पर मुझे बहुत देर तक खड़ा रहना पड़ा, न जाने किसका इंतज़ार था, शायद आसपास के गांव से हिंदू पनाहगज़ीं आ रहे थे, जब गार्ड ने स्टेशन मास्टर से बार बार पूछा तो उसने कहा ये गाड़ी आगे नहीं जा सकेगी। एक घंटा और गुज़र गया। अब लोगों ने अपना  खाने का सामान खोळा और खाने लगे सहमे सहमे बच्चे कहकहे लगाने लगे। मासूम कंवारीयां दरीचों से बाहर झांकने लगीं और बड़े-बूढे हुक्के गुड़गड़ाने लगे। थोड़ी देर के बाद दूर से शोर सुनायी दिया और ढोलों के पिटने की आवाजें सुनायी देने लगीं । हिंदू पनाहगज़ीनों का जत्था आ रहा था शायद। लोगों ने सिर निकाल कर इधर इधर देखा। जत्था दूर से आ रहा था और नारे लगा रहा था। वकत गुज़रता गया जत्था करीब आता गया, ढोलों की आवाज़ तेज़ होती गई। जत्थे के करीब आते ही गोलियों की आवाज़ कानों  में आई और लोगों ने अपने सिर खिड़कियों से पिछे हटा लिए।ये हिंदूओं का जत्था था जो आसपास के गांव से आ रहा था, गांव के मुसलमान लोग इसे अपनी हिफ़ाज़त में ला रहे थे। चुनांचे हर एक मुसलमान ने एक काफ़िर की लाश अपने कंधे पर उठा रखी थी। दो सो लाशें थीं। मजमा ने ये लाशें निहायत इत्मिनान से स्टेशन पहुंच कर बलोची दस्ते के सुपुर्द की और कहा कि वो उन लाशों को बड़ी हिफ़ाज़त से हिंदुस्तान की सरहद पर ले जाए, हालांकि बलोची सिपाहियों ने निहायत बेफिक्री से इस बात का ज़िंम्मा लिया और हर डब्बे में पंद्रह-बीस लाशें रख दी गई। इसके बाद मजमा ने हवा में  फ़ायर किया और गाड़ी चलाने के लिए स्टेशन मास्टर को हुक्म दिया। मैं चलने लगी थी कि फिर मुझे रोक दिया गया और मजमा के सरग़ने ने हिंदू पनाहगज़ीनों से कहा कि दो सौ आदमियों के चले जाने से उनके गांव वीरान हो जाएंगे और उनकी व्यापार तबाह हो जाएगी इसलिए वो गाड़ी में से दो सौ आदमी उतार कर अपने गांव ले जाएंगे। चाहे कुछ भी हो। वो अपने मुल्क को यूं बरबाद होता हुआ नहीं देख सकते। इस पर बलोची सिपाहीयों ने इन के ज्ञान और उन की अंत:करण की दाद दी और उनकी वतन दोस्ती को सराहा। चुनांचे इस पर बलोची सिपाहियों ने हर डब्बे से कुछ आदमी निकाल कर मजमा के हवाले किए। पूरे दो सौ आदमी निकाले गए। एक कम ना इक ज़्यादा। “लाईन लगाओ काफ़िरों,” सरग़ने ने कहा। सरग़ना अपने इलाके का सब से बड़ा जागीरदार था। और अपने लहू की रवानी में  पाक ज़िहाद की गूंज सुन रहा था। काफ़िर पत्थर के बुत बने खड़े थे। मजमा के लोगों ने इन्हें उठा उठा कर लाईन में  खड़ा किया। दो सौ आदमी, दो सौ ज़िंदा लाशें, । आंखें, फ़ज़ा में  तीरों की बारिश सी महसूस करती हुई। पहल बलोची सिपाहीयों ने की। पंद्रह  आदमी फ़ायर से गिर गए। ये तकशला का स्टेशन था। बीस और आदमी गिर गए। यहां एशिया की सब से बड़ी यूनीवर्सिटी थी और लाखों विद्यार्थी इसकी तहज़ीब पर फक्र करते थे। पचास और मारे गए। तकशला के अजायब घर में इतने ख़ूबसूरत बुत थे। इतने हुस्न, संगतराशी के खूबसूरत नमूने,  तहज़ीब के झिलमिलाते हुए चिराग़। पचास और मारे गए। पस-ए-मंज़र सामने ही में सर कप का महल था और खेलों का उम्दा थियेटर और मीलों तक फैले हुए एक उज़ाड़ शहर का खंडहर, तकशला की इतिहास का  पुर शिकवा मज़हर। तीस और मारे गए। यहां कनिष्क ने हुकूमत की थी और लोगों को अमन और हुस्न व दौलत से मालामाल किया था। पच्चीस और मारे गए। यहां बुद्ध का नग़मा गूंजा । यहां भिक्षुओं ने अमन व शांति का पैगाम दिया था। अब आखिरी गिरोह की बारी आ गई थी। यहां पहली बार हिंदुस्तान की सरहद पर इस्लाम का परचम लहराया था। मुसावात और अख़वत और इंसानियत का परचम। सब मर गए। अल्लाह हू अकबर। फ़र्श ख़ून से लाल था। जब मैं प्लेटफ़ार्म से गुज़री तो मेरे  पांव रेल की पटरी से फिसले जाते थे जैसे मैं अभी गिर जाऊंगी और गिर कर बाकी  मुसाफिरों को भी ख़तम कर डालूंगी। हर डब्बे मे मौत आ गई थी और लाशें बीच में रख दी गई थीं। बलोची सिपाही मुसकरा रहे थे कहीं कोई बच्चा रोने लगा किसी बूढ़ी मां ने सिसकी ली। किसी के लुटे हुए सुहाग ने आह की। और मैं चीखती-चिल्लाती रावलपिंडी के फॉर्म पर आ खड़ी हुई। यहां से कोई पनाहगुज़ीन गाड़ी में सवार ना हुआ। इक डब्बे में चंद मुसलमान नौजवान पंद्रह-बीस बुरकापोश औरतों को ले कर सवार हुए। हर नौजवान राइफ़ल से लैश था। इक डब्बे में बहुत सा सामान जंग लादा गया। मशीन गंनें, और कारतूस, पिस्तौल और राइफ़लें। झेलम और गुजर ख़ां के बीच के इलाके में मुझे संगल खींच कर खड़ा कर दिया गया। मैं रुक गई। लैश नौजवान गाड़ी से उतरने लगे। बुरकापोश औरतों ने शोर मचाना शुरू किआ। हम हिंदू हैं। हम सिख हैं। हमें ज़बरदसती ले जा रहे हैं। उन्होंने बुरके फाड़ डाले और चिल्लाना शुरू किआ। नौजवान मुसलमान हंसते हुए उन्हे  घसीट कर गाड़ी से निकाल लाए। हां ये हिंदू औरतें हैं, हम इन्हें रावलपिंडी से उनके आरामदाह  घरों, इनके ख़ुशहाल घरानों, इन के इज्ज़तदार मां बाप से छीनकर लाए हैं। अब ये हमारी हैं। हम उन के साथ जो चाहे सलूक करेंगे। अगर किसी में हिम्मत है तो इन्हें हम से छीन कर ले जाए। सरहद के दो नौजवान हिंदू पठान छलांग मार कर गाड़ी से उतर गए, बलोची सिपाहियों ने निहायत इत्मिनान से फ़ायर कर के इन्हें  ख़त्म कर दिया। पंद्रह-बीस नौजवान और निकले, इन्हें मुसलमानों के गिरोह ने मिनटों में ख़त्म कर दिआ । दरअसल गोश्त की दीवार, लोहे की गोली का मुकाबला नहीं कर सकती। नौजवान हिंदू औरतों  को घसीट कर जंगळ में ले गए और मैं मूंह छुपा कर वहां से भागी। काळा, ख़ौफ़नाक सियाह धूंआं मेरे मूंह से निकल रहा था। जैसे कायनात पर ख़बासत की सियाही छा गई थी और सांस मेरे सीने में यूं उलझने लगी जैसे ये लोहे की छाती अभी फूट जाएगी और अंदर भड़कते हुए लाळ लाळ शोले इस जंगळ को ख़ाक कर डालेंगे जो इस वकत मेरे आगे पीछे फैला हुआ था और जिस ने उन  पंद्रह औरतों  को देखए देखते निगल लिया था।
‘लाला मूसा’ के करीब लाशों से इतनी  सड़ांध निकलने लगी कि बलोची सिपाही इन्हें बाहर फेंकने पर मजबूर हो गए। वो हाथ के इशारे से एक आदमी को बुलाते और उससे कहते, उस की लाश को उठा कर यहां लाओ, दरवाज़े पर । और जब वो आदमी एक लाश उठा कर दरवाज़े पर लाता तो वो उसे गाड़ी से बाहर धक्का दे देते। थोड़ी देर में सब लाशें एक एक हमराही के साथ बाहर फैंक दी गई और डब्बों में आदमी कम हो जाने से टांगें फैलाने की जगह भी हो गई। फिर लाला मूसा गुज़र गया। और वज़ीराबाद आ गया। वज़ीराबाद का मशहूर जंकशन, वज़ीराबाद का मशहूर शहर, जहां हिंदुस्तान भर के लिए छुरीआं और चाकू तैयार होते हैं। वज़ीराबाद जहां हिंदू और मुसलमान सदियों से बैसाखी का मेला बड़ी धूमधाम से मनाते हैं और उस की ख़ुशीयों मैं इकट्ठे हिस्सा लेते हैं। वज़ीराबाद का स्टेशन लाशों से पटा हुआ था। शायद ये लोग बैसाखी का मेला देखने आए थे। लाशों का मेला शहर मैं धूंआं उठ रहा था और स्टेशन के करीब अंगरेज़ी बैंड की आवाज सुनाई दे रही थी और हुजूम की पुर शोर ताळीयों और कहकहों की आवाज़ें भी सुनाई दे रही थीं। चंद मिनटों में हजूम स्टेशन पर आ गया। आगे आगे देहाती नाचते गाते आ रहे  थे और उन के पीछे नंगी औरतों का हजूम, मादर ज़ाद नंगी औरतें , बुड़्ही, नौजवान, बच्चीयां, दादीयां और पोतीयां, माएं और बहनें और बेटीयां, कंवारीयां और हामला औरतें। औरतें हिंदू और सिख  थीं और मर्द मुसलमान थे और दोनों ने मिल कर अजीब बैसाखी मनाई थी, औरतों   के बाल खुले हुए थे। उनके जिस्मों पर ज़ख़मों के निशान थे और वो इस तरह सीधी तन कर चल रही थीं जैसे हज़ारों कपड़ों में उन के जिस्म छुपे हों, जैसे उनकी रूहों पर निश्चाप मौत के साए छा गए हों। उन की निगाहों का शर्म दर्द को भी शरमाता था और होंट दांतों के अंदर यूं भींचे  हुए थे गोया किसी लावे का मूंह बंद किये हुए हैं। शायद अभी ये लावा फूट पड़ेगा और अपनी चिगारी से दुनिया को जला डालेगा। मजमा से आवाज़ें आई। पाकिस्तान ज़िंदाबाद  इस्लाम ज़िंदाबाद। क़ायदे आज़म मुहम्मद अली जिन्नाह ज़िंदाबाद । नाचते थिरकते हुए कदम परे हट गए और अब ये अजीबो ग़रीब हजूम डब्बों के ऐन सामने था। डब्बों मैं बैठी हुई औरतों  ने घूंघट चढा लिए और डब्बे की खिड़कियां एक एक कर बंद होने लगी। बलोची सिपाहीयों ने कहा-
खिड़कियां मत बंद करो, हवा रुकती है।
खिड़कीयां बंद होती गई । बलोची सिपाहीयों ने बंदूकें तान लीं। ठाएं,ठाएं फिर भी खिड़कीयां  बंद होती गई और फिर डब्बे मैं एक खिड़की भी न खुली रही। हां. कुछ पनाहगज़ीन ज़रूर मर गए। नंगी औरतें पनाह गज़ीनों के साथ बिठा दी गई। और मैं इस्लाम ज़िंदाबाद और क़ायदे आज़म मुहम्मद अली जिन्नाह ज़िंदाबाद के नारों के बीच रुख़सत हुई। गाड़ी में बैठा हुआ एक बच्चा लुड़्हकता लुड़्हकता इक बुढी दादी के पास चला गया और उस से पूछने लगा: मां तुम नहा के आई हो? दादी ने अपने आंसू को रोकते होए कहा-
हां नंन्हे, आज मुझे मेरे वतन के बेटों ने भाईयों ने नहलाया है।
तुम्हारे कपड़े कहां है अंमां?
उनपर मेरे  सुहाग के ख़ून के छींटे थे बेटा। वो लोग इन्हें धोने के लिए ले गये हैं।
दो नंगी लड़कीयों ने गाड़ी से छलांग लगा दी और मैं चीखती चिल्लाती आगे भागी। और लाहौर पहुंच कर दम लिया। मुझे एक नंबर प्लेटफ़ार्म पर खडा किया गया।
नंबर 2 प्लेटफ़ार्म पर दूसरी गाड़ी खड़ी थी। ये अमृतसर से आई थी और इसमें मुसलमान पनाहगज़ीं बंद थे। थोड़ी देर के बाद मुस्लिम ख़िदमतगार मेरे  डब्बों की तलाशी लेने लगे। और ज़ेवर और नकदी और दूसरा कीमती सामान विस्थापितों से ले लिया गया। इसके बाद चार सौ आदमी डब्बों से निकाल कर स्टेशन पर खड़े किए थे। ये मजहब के बकरे थे क्युंकि अभी अभी नंबर 2 प्लेटफ़ार्म पर जो मुस्लिम विस्थापितों की गाड़ी आकर रुकी थी उसमें  चार सौ मुसलमान मुसाफिर कम थे और पचास मुस्लिम औरतें अग़वा कर ली गई थीं इसलिए यहां पर भी पचास औरतें चुन चुन कर निकाल ली गई और चार सौ हिंदुस्तानी मुसाफिरों को कत्ल किया गया ताकि हिंदुस्तान और पाकिस्तान में आबादी का पलड़ा बरकरार रहे। और फिर मैं आगे चली। अब मुझे अपने जिस्म के ज़र्रे ज़र्रे से घिन आने लगी। इस कदर घृणित महसूस कर रही थी जैसे मुझे शैतान ने सीधा जहन्नम से धक्का दे र पंजाब में भेज दिया हो। अटारी पहुंच कर फ़ज़ा बदल सी गई। मुग़लपुरा ही से बलोची सिपाही बदले गए थे और उन की जगह डोगरों और सिख  सिपाहीयों ने ले ली थी। लेकिन अटारी पहुंच कर तो मुसलमानों की इतनी लाशें हिंदू  ने देखीं कि उन के दिल खुशी से बाग़ बाग़ हो गए। आज़ाद हिंदुस्तान की सरहद आ गई थी वरना इतना हसीन मंज़र किस तरह देखने को मिलता और जब मैं अमृतसर स्टेशन पर पहुंची तो सिखों के नारों ने ज़मीन आसमान को गूंजा दिया । यहां भी मुसलमानों की लाशों के ढेर के ढेर थे और हिंदू जाट और सिख और डोगरे हर डब्बे में झांक कर पूछते थे, कोई शिकार है, मतलब ये कि कोई मुसलमान है। एक डब्बे में चार हिंदू व ब्राहमण सवार ह्ए। सिर घटा हुआ, लंबी चोटी, राम नाम की धोती बांधे, हरिद्वार का सफ़र कर रहे थे। यहां हर डब्बे मैं आठ दस सिख और जाट भी बैठ गए, ये लोग राइफ़लों और बल्लमों से लैस थे और  पंजाब में शिकार की तलाश मे जा रहे थे। उनमें  से एक के दिल में कुछ शक सा हुआ। उसने एक ब्राहमण से पूछा- ‘ब्राहमण देवता किधर जा रहे हो?’  ‘हरिद्वार।‘ ब्राम्हण ने जवाब दिया। ‘हरिदवार जा रहे हो कि पाकिस्तान जा रहे हो?’ 
‘मियां अल्ला अल्ला करो।; दूसरे ब्राहमण के मूंह से निकला। जाट हँसा- ‘तो आओ अल्ला अल्ला करें। ओ नत्था सिहां, शिकार मिल गया भई, आओ रहीदा अल्हा बैली करए। इतना कह कर जाट ने बलम निकाली। ब्राहमण के सीने में मारा। दूसरा ब्राहमण भागने लगे। जाटों ने इन्हें पकड़ लिया। ऎसे नहीं ब्राहमण देवता, ज़रा डाकटरी मुआयना कराते जाओ। हर दवार जाणे से पहिले डाकटरी मुआयना बहुत ज़रूरी होता है। डाकटरी मुआइने से मुराद ये थी कि वो लोग ख़तना देखते थे और जिसके ख़तना हुआ होता उसे वहीं मार डालते। चारों मुसलमान जो ब्राहमण का रूप बदल कर अपनी जान बचाने के लिए भाग रहे  थे। वहीं मार डाले गए और मैं आगे चली। रास्ते मैं इक जगह जंगळ में मुझे खड़ा कर दिया गया और विस्थापित और सिपाही और जाट और सिख  सब निकल कर जंगळ की तरफ़ भागने लगे। मैंने सोचा  शायद मुसलमानों की बहुत बड़ी फ़ौज उन पर हमला करने के लिए आ रही है। इतने में क्या देखती हूं कि जंगळ में बहुत सारे मुसलमान अपने बीवी बच्चों को लिए छिपे बैठे हैं। सत श्री अकाल और हिंदू धरम की जै के नारों की गूंज से जंगळ कांप उठा, और वो लोग कब्ज़े में ले लिए गए। आधे घंटे मैं सब सफ़ाइया हो गई। बुढे, जवान, औरतें और बच्चे सब मार डाले गए। एक जाट के नेज़े पर इक नंन्हे बचे की लाश थी और वो उस से हवा मैं घुमा घुमा कर कह रहा था। आई बैसाखी। आई बैसाखी. जट्टा लाए है़।
जलंधर से इधर पठानों का इक गांव था। यहां पर गाड़ी रोक कर लोग गांव में घुस गए। सिपाही और विस्थापितों और जाट पठानों ने मुकाबला किया। लेकिन आख़िर में मारे गए, बच्चे और मर्द हलाक हो गए तो औरतों  की बारी आई और वहीं इसी खुले मैदान मैं जहां गेहूं के खलिहान लगाए जाते थे और सरसों के फूल मुसकराते थे और ग़ुफ़त-मआब बीबीयां अपने खाविंदो की निगाह ए शौक की ताब ना लाकर कमज़ोर शाखों की तरह झुकी झुकी जाती थीं। इसी  मैदान मैं जहां पंजाब के दल ने हीर-रांझे और सोहणी-महींवाल की लाफ़ानी उलफ़त के तराने गाए थे। इन्हें शीशम, सरस और पीपल के दरख्तों तले वकती चकले आबाद हुए। पचास औरतें और पांच सौ ख़ावंद, पचास भेड़ें और पांच सौ कसाई, पचास सोहणीयां और पांच महींवाल, शायद अब चनाब में कभी लहर ना आएगी। शायद अब कोई वारिस शाह की हीर ना गाएगा। शायद अब मिरज़ा साहिबां की दास्तान उलफ़त व अफ़त उन मैदानों में कभी ना गूंजेगी। लाखों बार लानत हो इन रहनमाओं पर और उन की सात पुश्तों पर, जिन्होंने इस ख़ूबसूरत पंजाब, इस अलबेले प्यारे, सुनहरे पंजाब के टुकड़े टुकड़े कर दिए थे और उसकी पाकीज़ा रूह को घिना दीया था और उस के मज़बूत जिस्म में नफ़रत की पीप भर दी थी, आज पंजाब मर गया था, उस के नग़मे गुंगे हो गए थे, उस के गीत मुर्दा, उसकी ज़बान मुर्दा, उस का बेबाक निडर भोळा भाला दिल मुर्दा, और ना महसूस करते हुए और आंख और कान ना रखते हुए भी मैंने पंजाब की मौत देखी और ख़ौफ़ से और हैरत से मेरे कदम इस पटरी पर रुक गए। पठान मरदों और औरतों   की लाशें उठाए जाट और सिख और डोगरे और सरहदी हिंदू वापस आए और मैं आगे चली। आगे इक नहर आती थी ज़रा ज़रा वकफ़े के बाद मैं रुकती जाती, ज्यूं ही कोई डब्बा नहर के पुळ पर से गुज़रता, लाशों को ऐन नीचे नहर के पानी में गिरा दिया जाता। इस तरह जब हर डब्बे के रुकने के बाद सब लाशें पानी मैं गिरा दी गई तो लोगों ने देसी शराब की बोतलें खोली  और मैं ख़ून और शराब और नफ़रत की भाप उगलती हुई आगे बढी। लुधियाना पहुंच कर लुटेरे गाड़ी से उतर गए और शहर में जा कर उनहोंने मुसलमानों के महलों का पता ढूंढ निकाला। और वहां हमला किया और लूट मार की और माल ग़नीमत अपने कंधों पर लादे हुए तीन चार घंटों के बाद स्टेशन पर वापस आए जब तक लूट मार ना हो चुकी। जब तक दस बीस  मुसलमानों का ख़ून ना हो चुकता। जब तक सब विस्थापित अपनी नफ़रत का बदला न निकाल लेते, मेरा आगे बड़ना दुशवार क्या नामुमकिन था, मेरी रूह मैं इतने घाव थे और मेरे  जिस्म का ज़र्रा ज़र्रा गंदे नापाक ख़ूनीयों के कहकहों से इस तरह रच गया था कि मुझे ग़ुसल की ज़रूरत महसूस हुई। लेकिन मुझे मालूम था कि इस सफ़र में  कोई मुझे नहाने नहीं देगा। अंबाला सटेशन पर रात के वकत मेरे  एक फ़स्ट कलास के डब्बे मे एक मुसलमान डिपटी कमिशनर और उस के बीवी बच्चे सवार हुए। इस डिब्बे मैं इक सरदार साहिब और उनकी बीवी भी थे, फ़ौजियों के पहरे मैं मुसलमान डिपटी कमिशनर को सवार कर दिया गया और फ़ौजिओं को उनकी जान व माल की सख़त ताकीद कर दी गई। रात के दो बजे मैं अंबाले से चली और दस मीळ आगे जा कर रोक दी गई। फ़र्स्ट कलास का डब्बा अंदर से बंद था। इसलिए खिड़की के शीशे तोड़ कर लोग अंदर घुस गए और डिपटी कमिशनर और उसकी बीवी और उस के छोटे छोटे बच्चों को कतल किया गया, डिपटी कमिशनर की इक नौजवान लड़की थी और बड़ी ख़ूबसूरत, वो किसी कालज में पढती थी। दो इक नौजवानों ने सोचा इसे बचा लिया जाए। ये हुस्न, ये रानाई,ये ताज़गी ये जवानी किसी के काम आ सकती है। इतना सोच कर उनहोंने जलदी से लड़की और ज़ेवरात के बकस को संभाला और गाड़ी से उतर कर जंगळ में चले गए। लड़की के हाथ में इक किताब थी। यहां ये कानफ़रंस शुरू होई कि लड़की को छोड़ दिया जाए या मार दिया जाए। लड़की ने कहा। मुझे मारते क्यूं हो? मुझे हिंदू कर लो। मैं तुम्हारे मज़हब में दाख़ल हो जाती हूं। तुममे से कोई इक मुझ से ब्याह कर ले। मेरी जान लेने से क्या फ़ायदा! ठीक तो कहती है, इक बोळा। मेरे ख्याल में, दूसरे ने लड़की के पेट मैं छुरा घोंपते होए कहा। मेरे ख़याल मैं उसे ख़तम कर देना ही बेहतर है। चलो गाड़ी में वापस चलो। क्या कानफ़रेंस लगा रखी है तुम ने। लड़की जंगळ में घास के फ़र्श पर तड़प तड़प कर मर गई। उसकी किताब उसके ख़ून से तरबतर हो गई।किताब का उनवान था इशतराकीयत अमल और फ़लसफ़ा इज़ जान स्टरैटजी । वो ज़हीन लड़की होगी। उसके दिल में अपने मुल्क और  कौम की ख़िदमत के इरादे होंगे। उस की रूह में किसी से मुहब्बत करने, किसी को  चाहने, किसी के गले लग जाने, किसी बच्चे को दूध पिलाने का जज़बा होगा। वो लड़की थी, वो मां थी, वो बीवी थी, वो महबूबा थी। वो कायनात की तख़लीक का मुकद्दस राज़ थी और अब उसकी लाश जंगळ में पड़ी थी और गीदड़, गिद्ध और कौवे उस की लाश को नोच नोच कर खाएंगे। इशतराकीयत, फ़लसफ़ा और अमल वहिशी दरिंदे इन्हें  नोच नोच कर खा रहे थे और कोई नहीं बोलता और कोई आगे नहीं बढता और कोई अवाम में से इनकलाब का दरवाज़ा नहीं खोलता और मैं रात की तारीकी आग और शरारों को छुपाके आगे बढ रही हूं और मेरे डब्बों मैं लोग शराब पी रहे हैं और महात्मा गांधी के जयकारे बुला रहे हैं। इक अरसे के बाद मैं बंबई वापस आई हूं, यहां मुझे नहला धुला कर शैड में रख दिया गया है। मेरे  डब्बों में  अब शराब के भपारे नहीं हैं,  ख़ून के छींटे नहीं हैं, वहशी ख़ूनी कहकहे नहीं हैं मगर रात की तन्हाई में जैसे भूत जाग उठते हैं मुर्दा रूहें  बेदार हो जाती हैं और ज़ख्मियों की चीख़ें और औरतों  के बीन और बच्चों की पुकार, हर तरफ़ फिज़ा मैं गूंजने लगती है और मैं चाहती हूं कि अब मुझे कभी कोई इस सफ़र पर ना ले जाए। मैं इस शैड से बाहर नहीं निकलना चाहती हूं कि अब मुझे कभी कोई इस सफ़र पर ना ले  जाए। मैं इस शैड से बाहर नहीं निकलना चाहती, मैं उस खौफ़नाक सफ़र पर दुबारा नहीं जाना चाहती, अब मैं उस वकत जाऊंगी। जब मेरे  सफ़र पर दो तरफ़ा सुनहरे गेहूं के खलिआन लहर आएंगे और सरसों के फूल झूम झूम कर पंजाब के रसीले उलफ़त भरे गीत गाएंगे और किसान हिंदू और मुसलमान दोनों मिल कर के खेत काटेंगे। बीज बोएंगे। हरे हरे खेतों में ग़ुलाई करेंगे और उन के दिलों मैं मेहरो -वफ़ा और आंखों में शरम और रूहों  में औरत के लिए प्यार और मुहब्बत और इज्ज़त का जज़बा होगा। मैं लकड़ी की इक बे जान गाड़ी हूं; लेकिन फिर भी मैं चाहती हूं कि इस ख़ून और गोश्त और नफ़रत के बोझ से मुझे ना लादा जाए। मैं  अकालग्रस्त इलाकों में अनाज ढोऊंगी। मैं कोयला और तेल और लोहा ले कर कारखानों में जाऊंगी मैं किसानों  के लिए नए हल और नई खाद मुहईआ करूंगी। मैं अपने डब्बों में किसानों और मज़दूरों को ख़ुशहाल टोलीयां ले कर जाऊंगी, और बा असमत औरतों की मीठी निगाहें अपने मर्दों का दिल टटोल रही होंगी। और उन के आंचलों में  नंन्हे मुन्ने  ख़ूबसूरत बच्चों के चेहरे कंवल के फूलों की तरह नज़र आएंगे और वो इस मौत को नहीं बल्कि आने वाळी ज़िंदगी को झुक कर सलाम करेंगे। जब ना कोई हिंदू होगा ना मुसलमान बल्कि सब मज़दूर होंगे और इंसान होंगे। ###
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