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Friday, November 20, 2009

मन की लटाई पर निन्दा का माझा और वो लेखन का गुड्डी बकाट्टा!

http://janatantra.com/2009/11/20/vibha-rani-on-plight-of-a-writer/

आह! मन बहुत दुखी है. कम्बख्त बार बार सोचता है कि लेखक ही बनना था तो हिन्दी और मैथिली के क्यों बने? अपने जन्म पर भी अफसोस होता है कि जन्म ही लेना था तो एक आम आदमी बनकर क्यों जन्मे? आप चाहें तो कह लें कि आम औरत. मुहावरे में भी थोड़ा बदलाव आ जायेगा और ज़ायके में भी. सुभाव ही देना था तो ऐसा सुभाव क्यों दे दिया कि किसी से कुछ कहने के लिए हज़ार बार सोचना पड़ जाए. पर क्या कीजियेगा? सबकुछ गर अपने ही हाथ में होता तो यह जग जितने जन, उतनी तरह का न हो गया होता? आखिर हर कोई इसे अपने अपने चश्मे से ही देखता न!

मैं पता नहीं किस गफलत में लेखक बन गई. नहीं, गफलत नहीं, तबका यह सबसे सस्ता और सुलभ तरीका था. घरवालों ने एयरहोस्टेस नहीं बनने दिया, गायिका नहीं बनने दिया, नृत्यांगना नहीं बनने दिया. मन के किसी कोने में सृजनात्मकता का कोई कीड़ा काटने लगा था. तब टैगोर को पढ़ लिया था, शरद और बंकिम को चाट लिया था, प्रेमचन्द को घोल कर पी लिया था, और भी जाने कितनों को चने चबेने की तरह फांक लिया था, राजेन्द्र यादव, मन्नू भंडारी को दूध मट्ठे की तरह तो ज्ञानरंजन, संजीव को चाय की तरह तो अज्ञेय से लेकर उदय प्रकाश को फैशनेबल कॉफी की तरह उदरस्थ, नहीं नहीं, हृदयस्थ कर लिया था. तो लगा भैया कि अपन भी लिख सकते हैं. नया कागज नहीं मिलेगा तो क्या हुआ? पुरानी कॉपी के पुराने पन्ने पर ही लिख लेंगे. सो लिखने लगे. जब लिखने लगे, तब कहीं कहीं छपने भी लगे. जब छपने लगे तो खुद को वेदव्यास समझने लगे. अब क्या! सारी दुनिया मेरी मुट्ठी में. क्या बूझते है? कुछ ऐसा वैसा कीजियेगा तो लिखिए देंगे. हमारे पास सरस्वती की ताक़त है भाई!, मज़ाक है! लेखक कोई ऐसी वैसी हस्ती है? और हम तो लेखिका थे. भला हो अंग्रेजी का कि वे अपने शब्द कोश और उसके प्रयोग में तरह तरह के सुधार और प्रयोग करते रहते हैं, जिससे अब कम से कम पुकारने में लेखक लेखिका, ऐक्टर-ऐक्ट्रेस जैसा भेद खत्म हो गया है, वरना अपने यहां तो भाई लोग लेखिका भी लिखने लगे और उसके ऊपर से उसके पहले महिला भी जोड़ने लगे. तो माने कि हम हो गये महिला लेखिका. एक करेला अपने तीता, दूजा चढा नीम पर.

अब लेखिका हो गये तो लोग कहने लगे कि लेखिका लोग तो ऑफिस की सेक्रेटरी की तरह होती हैं. जैसे सेक्रेटरी पर उसके बॉस हमेशा फिदायीन रहते हैं, वैसे ही महिला लेखिकाओं पर भी सम्पादक लोग बलि बलि जाते हैं. एक ने कह भी दिया कि आप तो हंस में भी छपती हैं और हंस में तो कोई ऐसे वैसे नहीं छपता. उन्हें हमारे सभी मैथिली पत्र पत्रिकाओं में भी छपने पर उज़्र था कि मेरी रचना तो कोई छापता नहीं, आपकी कैसे छप जाती है? अब आजकल उनकी बोली बन्द है, क्योंकि मैथिली में उनकी रचनाएं भी छप रही हैं और मैथिली के बहुत स्वनाम धन्य प्रकाशक के यहां से उनकी किताब भी आ चुकी है. यह दूसरी बात है कि मैथिली के लेखक- प्रकाशक की अभी वह हैसियत नहीं बनी है कि लेखक प्रकाशक के बलबूते पर छप जाए या प्रकाशक अपने बूते पर उसकी किताब छाप दे. हरिमोहन झा ने अपने उपन्यास ‘कन्यादान’ में एक पात्र के माध्यम से मैथिली के स्थिति के बारे में कहा था कि “एक रुपया सालाना जो पत्रिका पर खर्च करूंगा, उससे साल भर नमक नहीं खाऊंगा?” 50 साल से ऊपर हो गए, अभी भी वही हालात हैं.

तो भैया, घरवालों को लगा कि लेखन सबसे सुरक्षित सृजनात्मकता है. इसमें कहीं ना आना है ना जाना. ना किसी से मिलना, ना जुलना. हिलने डुलने की तो बात ही ना कीजिये. समय की भी कोई बन्दिश नहीं. (माने सबसे बड़ी बन्दिश). वह् यह कि पहले तो घर का काम कीजिये, फिर सिलाई कढ़ाई जैसे महान स्त्री धर्म वाला काम निपटाइये, फिर खाना भी पकाइये, घर भी देखिये, आने जानेवालों की आव भगत भी कीजिये और इन सबसे अगर समय बच जाए और और लिखास की आग फिर भी कलेजे में भड़कती रह जाये तो लिख लीजिये एकाध पन्ना! रात के दो बजे या भोर के चार बजे. और सबसे बड़ी बात कि घर में ही हैं ना तो सबसे बड़ी बात इज़्ज़त पर कोई आंच नहीं. आआहाह! कितना अच्छा है यह लेखन धर्म!

तो इस तरह से जी कि मज़बूरी का नाम महात्मा गांधी. पता नहीं यह मुहावरा किस रूप में निकला और किसने निकाला? मगर ऐसे हालात में लोग कह देते हैं सो अपन ने भी कह दिया. अब लेखक बन गये तो इसका यह तो मतलब नहीं कि सभी कोई आपको जान ही जाये? और जान जाये तो जान जाये, आपके मरने के बाद भी आपको याद रखे, आपकी याद में किताबें छपवाए, समारोह करवाए, बड़ी-बड़ी श्रद्धांजलियां दिलवाए? ना जी ना, हम हिन्दीवालों को इतनी फुर्सत नहीं. और जो तनिक फुर्सत मिल भी गई भूले भटके तो उसमें लोग बाल की खाल ना निकालेंगे? किसी के नाम और काम की ऐसी की तैसी ना कर देंगे? इस देश का सबसे बड़ा रस है- निन्दा रस. उसमें ना डूब जायेंगे? हर्र लगे ना फिटकरी, रंग चोखा आये. देखिए, देखिए, निन्दा रस के नाम से ही हमारे इस लेख को पढ़नेवालों की आंखें चमक आई हैं. उनके मन में भी इस रस के लिए उपयुक्त पात्र की तस्वीरें उभरने लगी है. मन उनके लिए सभी तरह के सम्बोधन के लिए अकुलाने लगा है. जीभ लसफसा रही है. कलेजा भर आया है. हाथ कसमसा रहे हैं. तो आइये, साहित्य वाहित्य को मारें गोली. उसमें होनेवाले नाम धाम का पढें स्यापा. चलिये चढ़ाते हैं मन की लटाई में निन्दा का माझा और करते हैं गुड्डी बकाट्टा! क्यों ताऊ! ओ भैया! अरे दिदिया रे, आ रहा है ना मज़ा

6 comments:

Sachi said...

आप की लेखनी का कायल कोई ऐसे ही थोड़े है, कई सारे कारण हैं | सारे विशेषणों और कई नामों का सहारा लेते हुए भी लिखने की हसरत को जिस तरह से आप जाहिर करती हैं, वह काबिले तारीफ़ है | मैं बहुत दिन से सोच रहा था कि कोई चुटीला व्यंग्य पढने को नहीं मिला|

वैसे मेरे पड़ोसी एक ज़माने में अखबार के बारे में कहते थे कि ढाई रुपए का नवभारत टाइम्स खरीदने के बजाय वह बैगन खरीदना ज्यादा पसंद करेंगे क्योंकि वही लूट पाट, मंत्री संतरी, से बेहतर बैगन का स्वाद है | शायद कुछ हद्द तक यह सही भी है |

Neha said...

aapke lekh par koi bhi tipani karne men to apne haanth kaanp rahe hain....itne unche darze ke lekh par tippani karna mere liye to tedhi kheer hai........bas itna hi kahna chahungi ki padhkar acchha laga..

kumar anil said...

aap ki lekhni me dam hai.....ham srahna krte hai...

kumar anil said...

i am anil gupta and doing job HT meerut

kumar anil said...

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Anonymous said...

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