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Tuesday, November 24, 2009

उफ्फ! बाबा मत कहो ना!

http://rachanakar.blogspot.com/2009/11/blog-post_24.html

बढ़ती उम्र बढ़ता नासूर है. यह बालपन से बढ़ कर जवानी की ओर जाती उम्र की उछाल नहीं है कि लोग रूमानी होवें, सपने देखें, आहें भरें, गिले शिकवे करें. यह तो जवानी की खेप तय कर चुकने के बाद बुढ़ापे की ओर भागती उम्र का पका घाव है, मवाद भरा हुआ. फोड़ा पका नहीं है, फूटा नहीं है. फोड़ते डर लगता है. फोड़ा कि बहा मवाद कि हो गई छुट्टी.

यह मत समझिए कि बढ़ती उम्र से केवल महिलाएं ही परेशान होती हैं. आज की तो बात ही छोड़ दीजिए, रीतिकाल में केसवदास जी भी कह गये;

केसव केसन अस करी, जस अरिहु न कराय ।

चन्‍द्र वदनि, मृग लोचनी, बाबा कहि-कहि जाय

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बताइये भला, कौन ऐसा अक्ल का मारा होगा जो किसी सुंदरी से अपने लिए बाबा कहलवाना चाहेगा. महिलाएं भी नहीं चाहतीं कि कोई उन्हें आंटी कहे. सुना कि सोनम ने ऐश्वर्या को आंटी कह दिया तो वे ख़फा हो गईं. सोनम ने तर्क दिया कि उन्होंने मेरे पापा के साथ काम किया है तो आंटी ही हुई ना? छम्मक्छल्लो जब दिल्ली में थी, तब एक महिला सब्ज़ीवाले छोकरे से इसी बात पर उलझ गईं कि उसने उसे आंटी क्यों कहा? वे चिल्ला चिल्ला कर कहने लगीं कि मैं तेरे को आंटी दिखती हूं? सब्ज़ीवाला छोकरा हुशियार था. तपाक से बोला, “भाभीजी, गल्ती हो गई” वो भाभी जी जब सब्ज़ी ले कर चली गई, तब छोकरा कहने लगा, “लगती तो दादी की उम्र की है और आंटी में भी आफत” इसीलिए “हम पांच” सीरियल ने यह मर्म वाक्य दे दिया, “आंटी मत कहो ना” यह जुमला इतना मशहूर हुआ कि आज तक यह ताज़ा फूल की तरह टटका और खुशबूदार है.

इस बढ़ती उम्र के नुकसान के क्या कहने! सबसे बड़ा नुकसान तो यही होता है कि आपके रूमानीपन के फूले चक्के की हवा सूं.... करके निकाल दी जाती है. अब लोगों को कैसे समझाएं कि उम्र तो दिल से होती है, देह से नहीं. किसी ने कहा भी है कि दिल को देखो, चेहरा न देखो. लेकिन लोग हैं कि चेहरे और उस पर पड़ती जा रही उम्र की सलवटों को ही देखते और बढ़ती उम्र से संबंधित तमाम नसीहतें देते रहते हैं. यह तो कोई बात नहीं हुई कि आप 60 के हो गये तो रोमांस सपने से भी ऊंची चीज़ हो गई. पति पत्नी भी आपस में कहने लगते हैं कि अब इस उम्र में यह सब शोभा देगा क्या? क्यों भाई, जब आपने शादी की थी तो क्या सात कसमों के साथ साथ यह क़सम भी खाई थी कि एक उम्र तक ही रोमांस करेंगे, उसके बाद नहीं?

उम्र बढ़ी और आपके इधर उधर के रसास्वादन का भी मौका गया. जवानी में, उम्र के जोश में लोग सिर्फ अपनी बहन बेटी के अलावे सभी की बहन बेटी के साथ अपना रसिकपन स्थापित करते थे, तब लोग बस मार पीट कर छोड़ देते थे. बढ़ती उम्र में लोग यह भी जोड़ देते हैं कि देखो बुड्ढे को? उम्र निकल गई, मगर आदत नहीं गई. तो भाई साहब, आदत क्या जाने के लिए बनाई जाती है, और वह भी ऐसी आदतें, जिसकी कल्पना से ही मन में सात सात सितार झंकृत होने लगे और सात कपड़ों के तह से भी देह के दुर्लभ दर्शन की कल्पना साकार होने लगे?

बढ़ती उम्र में आज के चलन के मुताबिक कपड़े पहनिये तो मुसीबत. अपने ही बच्चे कहने लगेंगे, मां, पापा, ज़रा उम्र तो देखिए”.. तो लो जी, वो भी गया. अब नए फैशन के रंग, डिज़ाइन, कपड़े, गहने क्यों ना हों, आप तो मन मार कर बस, अपने पुराने ज़माने की शर्ट, पैंट, चप्पल, साड़ी पर संतोष करते रहिये. महिलाएं शलवार कमीज़ भी पहन लेती हैं, मगर उनकी काट और डिज़ाइन देखिए तो लगेगा कि उम्र दस साल और पहले ही उन तक पहुंच गई है. आज के काट के कपड़े हों तो लोग कहने लगते हैं, बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम या चढ़ी जवानी बुड्ढे नूं. कोई यह नहीं कहता जवान घोड़ा सफेद लगाम. कोई जवान बूढ़ा दिखने लगे तो तमाम अफसोसनाक मर्सिया पढ़े जाने लगते हैं. बूढ़ा जवान बनने की कोशिश करे तो सौ सौ लानतें मलामतें!

पहले बड़ी उम्र का यह तो फायदा होता था कि लोग बुड्ढों से उनके अनुभव का लाभ उठाते थे. अब तो तरह तरह की देसी विदेशी पढ़ाई ने यह तय कर दिया है कि नई उम्रवाले जो सोच, जो आइडिया देते हैं, वह इन बुड्ढों में कहां ? ये सब तो अब सूखे बीज हो गये हैं, पक्के घड़े हो गये हैं, ठोस और जड़ दिमाग के हो गए हैं. तो अब इनसे इनके अनुभव भी गए. सो दफ्तरों में भी इनकी छांट छंटाई हो जाती है. घर में ऐसे ही कोई नहीं पूछता. अब दफ्तर के निकाले और घर के मारे कहां जाएं ?

बच्चा हो तो उसकी बढ़ती उम्र का हर कोई आनंद लेता है. जवानी के बाद की ढ़लवांनुमा उम्र की बढ़त पर हर कोई अफसोस ही करता है. तमाम नसीहतें दी जाने लगती हैं कि बाबा रे, ज़रा सम्भल के, पैर इधर उधर हुए कि कुछ कड़े चीज़ खा ली कि ज़रा ज़्यादा देर तक टीवी देख लिया कि किताब पढ़ ली कि कुछ और ही कर लिया, खुद भी पड़ोगे और घर के लोगों की भी जान सांसत में डालोगे.

बढ़ी उम्र को टीवी वाले भी धता बता गए. आजकल के सीरियल देखिए, कौन सास है कौन बहू, कौन मां है कौन बेटी, कौन बेटा है और कौन पति, पता ही नहीं चलता. मगर राजनीति में यह सब चलता है. यह राजनीति घर, दफ्तर, बाजार, सिनेमा सभी जगह चलती है. यहां लोग बूढे नहीं होते. यहां लोग शान से कहते हैं, “ये नए, आज के लोग क्या कर लेंगे? इनको कोई अनुभव है क्या?” सुना कि एक बीच की उम्र के नेता ने सोनम की तरह ही अपने से कहीं बडी उमर के नेता को बूढ़ा कह दिया. वे नेता अब सचमुच में उम्र ही नहीं, दिल और क्रियाशीलता के लिहाज़ से भी बूढे हो गए हैं. बेटे को कमान सौंप दी है. बढ़ती उम्र की गिरती सेहत ऐसी कि वोट तक देने नहीं जा सके. उनके लोग उन्हें बाबा कहते हैं. मगर इन्होंने उन्हें बाबा कह दिया और आफत मारपीट तक आ गई, “हमारे साहेब को बुड्ढा बोला रे?” सभी को नसीहत का पाठ पढ़ानेवाले उन बाबा ने अपने लोगों से यह नहीं कहा कि “जाने दो रे बाबा, बाबा को बाबा ही तो बोला जाएगा ना.”

इसलिए खबरदार, बामुलाहिजा, होशियार, कभी किसी की बढ़ती उम्र पर मत जाइए. उन्हें हमेशा जवान कहिए, आपका भी भला होगा और उनका भी. अपनी बीती जवानी के जोश में भरकर अपनी झुकी कमर को खींचकर खुद ही सीधी करेंगे. अब इसमें कमर में मोच आती है या घुटने टूटते फूटते हैं तो हमें दोष मत दीजिए. आखिर मर्ज़ी है उनकी, क्योंकि तन मन है उनका.

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