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छम्मकछल्लो की दुनिया में आप भी आइए.

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Monday, January 24, 2011

50 पैसे के नीचे का सपना खाक खाक़!

डॉलर प्राइस की तरह हरेक माल साढे छह आना. दुकानदार का गाना-रिझाना- “हरेक माल साढे छह आना, बच्चा के खिलौना साढे छह आना, घरनी की कडाही साढे छह आना, झूम झूम के ले जाना, बहिया हमरे, भूल न जाना, ओ भौजी मोरी याद दिलाना.” एक रुपया में दस सेर दूध. एक रुपैया में बीस सेर बैगन. पांच पैसा में भर पेट मूढी कचरी, दस पैसा में चांद जैसा नारियल का टुकडा. चार आना में भर पेट पूरी जिलेबी. दस रुपैया में बढिया सूती साडी. सोना डेढ सौ रुपए में 1तोला, सौ रुपए में ब्याह में चढाने  लायक बनारसी साडी. आपको क्या लगता है? कोनो मजाक? नहीं भाई, छम्मकछल्लो ई सब अपने बचपन की बात बता रही है. बहुत बूढी भी नहीं हुई है.
तीसरी क्लास में स्कॉलरशिप मिला था उसको. 6 रुपिया महीना के हिसाब से 72 रुपिया. छात्र का दस्तखत ज़रूरी था. छम्मकछल्लो को बुलाया गया. छम्मकछल्लो ने अपनी प्रिंसिपल मां से पूछा, “हमको पैसा मिल रहा है ना?” मां हंस पडी. छम्मकछल्लो लाड लडाती बोली-“हमको भी इसमें से चाहिये. आखिर ई हमारा पैसा है.”
मां को भी हंसी सूझी- “बोलो, कितने चाहिये?”
छम्मकछल्लो मुश्किल में पड गई. हिसाब लगाया, 3 पैसे में भर फ्रॉक मूढी और एक कचरी (दाल वडा). 5 पैसे में उससे भी अधिक मूढी और दो कचरी. 10 पैसे में मूढी कचरी के साथ दो झिल्ली भी. 25 पैसे में तो इन सबके साथ कच भी या दाल भर की दो पूरियां और आलू दम. उसके साथ एक जिलेबी भी. वह सब मन ना हो तो 25 पैसे में चार रसगुल्ले. या एक समोसा और एक रसगुल्ला या एक खीर कदम. या 10 पैसे में नारियल का एक बडा सा टुकडा और एक ठोंगा मूंगफली. इतनी सारी चीज़ें तो 25 पैसे में ही आ जाती हैं. तो वह मां से कित्ते पैसे मांगे. उसकी कल्पना का विस्तार इतना हो गया कि वह अकसक हो गई. अगर इतना सब केवल 25 पैसे यानी चार आने में मिल जाता है तो आठ आने में? छम्मकछल्लो की सांस ऊपर की ऊपर और नीचे की नीचे रह गई. उसने बडे सहमते और घुटकते हुए मां से कहा, ”आठ आना”. मां फिर हंस पडी.
छम्मकछल्लो उस अठन्नी को बहुत दिन तक सहेज कर रखे रही. उसकी समझ में ही नहीं आ रहा था कि वह इत्ते सारे पैसे का करे क्या?
हाल में छम्मकछल्लो ने अखबार में पढा कि 50 पैसे के नीचे के सिक्कों की वैधता अब रद्द कर दी जाएगी. छम्मकछल्लो को गहरा धक्का लगा. इन पैसों की वैधता रद्द होने से नहीं, अपने जिए हुए पलों की ज़िंदगी खतम हो जाने से. आगे आनेवाली पीढी क्या समझ पाएगी एक पैसे, दो पैसे, तीन, पांच और दस पैसों का मोल? चार आने में पूरा मेला घूम आने का उत्साह! क्या करें! मंहगाई तो जान मार ही रही है, व्यवस्था भी हम आम आदमी के आम सपनों और यादों को जीवित नहीं रहने दे रही. "मोरे सैयां तो खूब ही कमात है, मंहगाई डायन खाए जात है."  
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