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Sunday, January 23, 2011

बेटियां पछुआ हवा

अरविंद जी की कविता पर और भी कविताएं बेटियों को लेकर आई हैं. एक-एक करके उन्हें दे रही हूं. लल्लू जे ने यह कविता भेजी. उनका परिचय मैं खोज नहीं पाई. कम्प्यूटर के अपने अल्प ज्ञान के कारण. मेरा आभार उन्हें. आप सबके पास भी हैं तो भेजें, या लिंक दें.

बेटियां पछुआ हवा हैं. 
बेटियां जैसे दुआ हैं
फूल जैसी पांखुरीं हैं
कुह कुहाती बांसुरीं है
बेटियां फूलों का गहना है,
बैटियों ने दर्द पहना हैं
बेटियां खिल खिल हंसाती हैं
बेटियां बेहिस रुलातीं हैं
बेटिया हंसतीं हैं गातीं है.
बेटिया घर छोड़ जातीं हैं.
बेटियों का पर्स बाबुल कैसे भूले
हाथ का स्पर्श बाबुल कैसे भूले
आप तुम का फर्क बाबुल कैसे भूले
पंचमी का हर्ष बाबुल कैसे भूले
बेटियों से हीन घर में
मेरे बेटों से ब्याह कर
घर में आती बेटियां हैं
जिसको गोदी में झुलाया
जिसको आखों में बसाया
जिसको ना इक पल भुलाया
उसको अपने साथ लेकर
दूर मुझसे,
घर बसाती बेटियां हैं.
मैं तो ससुरा हूं, मुझे मालूम है क्या
बेटियों की पीर है क्या? पर पता है 
बेटियों के बाप जो सहते हैं पीड़ा
मैं भी उसको सह रहा हूं
बस यही मैं कह रहा हूं
बेटियां बेहिस रुलातीं हैं
बेटिया घर छोड़ जाती 


2 comments:

प्रज्ञा पांडेय said...

बेटियां पछुआ हवा हैं.
बेटियां जैसे दुआ हैं
फूल जैसी पांखुरीं हैं
कुह कुहाती बांसुरीं है
बेटियां फूलों का गहना है,
betiyan hi betiyan hotin toh yah duniya bahut khoobsoorat ho jaati .. sawaal kai hain aur jawaab hamen hi dene hain ..

Vibha Rani said...

प्रज्ञा जी, केवल बेटियां ही सृष्टि के लिए काफी नहीं हैं. बस बेटियों को उनके अस्तित्व व व्यक्तित्व के साथ देखे जाने की ज़रूरत है. आपकी सम्वेदनशीलता को नमन.