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छम्मकछल्लो की दुनिया में आप भी आइए.

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Sunday, November 8, 2009

अंतर्राष्ट्रीय महिला नाट्य लेखक यानी WPI (WOmen Playwright International) कॉंफ्रेंस में नाट्य पाठ

http://www.artnewsweekly.com/substory.aspx?MSectionId=1&left=1&SectionId=15&storyID=105

http://hindi-khabar।hindyugm.com/2009/11/vibha-raji-natak-path-wpi.html

छम्मकछल्लो के बेहद चर्चित नाटक "दूसरा आदमी दूसरी औरत" का नाट्य पाठ 6 नवम्बर, 2009 को दोपहर 12 बजे मुंबई में स्त्री मुक्ति संघटना एवं एकेडेमी ऑफ थिएटर आर्ट, मुंबई विश्वविद्यालय के सौजन्य से 1-7 नवम्बर, 2009 तक आयोजित WPI (WOmen Playwright International) यानी अंतर्राष्ट्रीय महिला नाट्य लेखक कॉंफ्रेंस में हुआ. प्रेम और सम्बन्ध के एक नए रूप पर आधारित इस नाटक का पाठ विभा रानी एवं अजय रोहिल्ला ने किया. विवाहेतर सम्बन्ध न तो आज के समय की देन है, न शरीर की ज़रूरत और मन की फिसलन का परिणाम. यह मन की अतृप्ति की एक अभिव्यक्ति है. प्रश्न यह नहीं है कि यह सम्बन्ध हुआ कैसे और क्यों हुआ? सवाल यह है कि इस सम्बन्ध का परिणाम क्या हो जो घर, परिवार को भी बनाए रखे और सम्बन्ध को भी. इसी की पडताल और विवेचना करता है यह नाटक.
विभा रानी हिन्दी और मैथिली की लेखक, नाट्य लेखक, नाट्य समीक्षक, रंगमंच अभिनेत्री व सामाजिक कर्मी हैं. अबतक उन्होंने 10 से अधिक नाटक लिखे हैं, जिनमें से दो नाटको "आओ तनिक प्रेम करें" तथा "अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो" को "मोहन राकेश सम्मान" से सम्मानित किया जा चुका है. विभा रानी लिखित व अभिनीत दो एक पात्रीय नाटक "लाइफ इज नॉट ए ड्रीम" का मंचन फिनलैंड, मुबई तथा राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव, रायपुर में तथा "बालचन्दा" का मंचन काला घोडा फेस्टिवल, मुंबई में किया जा चुका है. उनके अन्य एक पात्रीय नाटक "ऐ प्रिये, तेरे लिए" का मंचन मुंबई में हो चुका है. विभा रानी अभिनीत ताज़ातरीन नाटकों में से है डॉ. नरेन्द्र मोहन लिखित नाटक "मि. जिन्ना", जिसमें वे जिन्ना की बहन फातिमा की भूमिका में हैं. "दूसरा आदमी दूसरी औरत" का मंचन 2002 में भारतीय रंग महोत्सव, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में राजेन्द्र गुप्ता व सीमा बिश्वास द्वारा तथा मुंबई में इसका रंगपाठ राजेन्द्र गुप्ता व नीना गुप्ता द्वारा किया जा चुका है. विभा रानी ने अबतक 12 से अधिक किताबें लिखी हैं तथा "कथा" अवार्ड सहित कई पुरस्कार पा चुकी हैं.
अजय रोहिल्ला थिएटर के एक जाने माने अभिनेता, निर्देशक हैं. "दुलारीबाई", "सावधान पुरुरवा", "विदूषक", "चिट्ठी", खालिद की खाला", "मौली" जैसे नाटकों में अभिनय किया है. सभी प्रमुख संस्थानों, जैसे साहित्य कला परिषद, उर्दू अकादमी, संगीत नाटक अकादमी, शाकुंतलम थिएटर आदि द्वारा आयोजित थिएटर फेस्टिवलों में एक निर्देशक के रूप में भाग ले चुके हैं. वे दिल्ली विश्वविद्यालय, गोवा कला अकादमी के विजिटिंग फैकल्टी रह चुके हैं. देश भर में ये थिएटर वर्कशॉप लेते हैं. अजय द्वारा अभिनीत कुछ महत्वपूर्ण फिल्में हैं- "बैंडिट क्वीन", "डॉ. अम्बेदकर", "गंगाजल", "मंगल पाडेय", "वारियर" आदि. अबतक 11 लघु फिल्में बन चुके अजय की एक फिल्म पिछले साल 2008 के सिंगापुर फिल्म फेस्टिवल में नामित हुई थी.
इस नाट्य पाठ में बडी संख्या में लोगों ने भाग लिया. आज के जीवन के एक बेहद निजी यथार्थ की बेहद प्रवाहमई और काव्यमई भाषा में प्रस्तुति को श्रोताओं ने बहुत सराहा.

Monday, November 2, 2009

सकुबाई से सफाई घर की भी, दिल की भी

http://mohallalive.com/2009/11/01/review-of-drama-sakubai/

नाटक में आप जितने भी प्रयोग कर लें, पीरियड ड्रामा ले आएं, ड्रामे के माध्यम से आप राग रंग, नट भाव, उपमा, उपमान की बातें बताएं, सच तो यह है कि आम आदमी नाटक के उन्हीं हिस्सों से जुड़ पाता है, जिसके साथ वह अपना जीवन देख पाता है। पौराणिक आख्यानों में भी वह वहीं तक पहुंचता है, जहां उसे आज का अपना समाज, परिवेश दिखाई देता है। ऐसे में सामजिक या यों कहें कि घरेलू पृष्ठभूमि पर खेले गये नाटक से दर्शक तुरंत अपना नाता जोड़ लेते हैं। एकजुट थिएटर ग्रुप प्रस्तुत नादिरा ज़हीर बब्बर लिखित व निर्देशित नाटक “सकुबाई” नाटक एक ऐसी ही रचना है, जिसमें घर-घर काम करनेवाली बाई सकुबाई के माध्यम से समाज में एक साथ ही जी रहे नाना वर्गों के नाना जीवन को देखे जाने की कोशिश है। साथ ही साथ खुद उसके अपने जीवन की भी। एक आम मध्य या उच्च वर्ग और तथाकथित निम्न वर्ग में कोई फर्क़ नहीं रह जाता, जब मामला प्रेम, सेक्स, घरेलू हिंसा, बलात्कार, आपसी जलन आदि पर आता है, बल्कि कई बार तो ये तथाकथित निम्न वर्ग के लोग इन संभ्रांत लोगों पर भारी पड़ जाते हैं। क्या फर्क़ रह जाता है सकुबाई या उसकी मालकिन में कि दोनों के ही पति के विवाहेतर संबंध हैं। विरोध करने पर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर मालकिन भी पति के हाथों बुरी तरह पिटती है, मगर बच्चों की खातिर घर नहीं छोड़ पाती। मगर, फर्क़ है। सकुबाई के पति के संबंध जग जाहिर हैं। मालकिन के पति के संबंध सामाजिकता की खोल में छुपा। नौकरानी हो कर भी सकुबाई इतनी ईमानदार है कि मालकिन अपना पूरा घर उसके ऊपर छोड़ देती है, जबकि उसी मालकिन की करोड़पति सहेली मालकिन के पर्स से उसके हीरे की अंगूठी चुरा लेती है। मुंबई में आपको ऐसी ईमानदार बाइयों की फौज़ मिलेगी। बल्कि यूं कहें कि जिस तरह हर सफल पुरुष के पीछे किसी स्त्री का हाथ होता है, उसी तरह हर सफल औरत के पीछे उसकी बाई का हाथ होता है।
एकपात्रीय नाटक को कुशलतापूर्वक डेढ़ घंटे तक खींच ले जाना किसी समर्थ कलाकार की ही खासियत है और यह विशेषता निस्संदेह सकुबाई की भूमिका में सरिता जोशी की है। सरिता जोशी गुजराती थिएटर और फिल्म की मशहूर और बड़ी कुशल, इसलिए सफल अभिनेत्री हैं। वे लगभग 45 सालों से भी अधिक समय से अभिनय के क्षेत्र में हैं। एकपात्रीय अभिनय में सब कुछ उसी पात्र को दर्शाना होता है और सरिता जोशी ने मालिक से लेकर अपने पति और बूढ़ी मां की भी भूमिका बड़ी कुशलता से निभायी है। तदनुसार आवाज़, शारीरिक भंगिमा, चेहरे पर भाव। हालांकि उम्र अपनी छाप उन पर छोड़ने लगी है। बीच-बीच में वे हांफ जाती रहीं, संवाद भी लगा कि कुछ भूलती सी रहीं। मगर यह उनकी नाट्यकुशलता ही थी कि इसे उन्होंने ज़ाहिर नहीं होने दिया।
यह नाटक 1999 में पृथ्वी फेस्टिवल में ओपन हुआ था। तब से इस नाटक के कई शो हो चुके हैं। नादिरा बब्बर के यह भी पुराने नाटकों मे से एक है, जिसमें उनकी पुरानी मेहनत व प्रतिबद्धता स्पष्ट दिखाई देती है। सेट प्रभार, स्टेज और प्रोडक्शन सभी में हनीफ पटनी ने अपनी कुशलता दिखायी है। फिर भी, नाटक के दस साल हो जाने के कारण सेट अब पुराने हो चुके हैं, जो स्टेज पर भी दिखते हैं। प्रकाश व्यवस्था नाटक के अनुरूप थी और संगीत संचालन एक्टर को अभिनय के साथ-साथ डांस करने व अन्य हाव-भाव के लिए पर्याप्त स्पेस देता है। “दयाशंकर की डायरी” की तरह ही यह नाटक आपको अपने से जोड़ कर रखता है, बल्कि कुछ अधिक ही, क्योंकि आखिरकार यह एक महिला की लिखी, महिला की ज़ुबानी, महिला की गाथा है, और महिला की कहानी में प्रताड़णा के भाव तनिक अधिक तो रहते ही हैं, जिसमें व्यक्ति और परिवेश दोनों की ही भूमिका रहती है। इसलिए यह नाटक हो सकता है आपको “दयाशंकर की डायरी” से अधिक अपील करे, जैसा कि इसने यहां के दर्शकों को किया था।

मुंबई में 8वां महिला नाट्यलेखक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन आरम्भ

http://mohallalive.com/2009/10/31/women-playwright-international-in-mumbai/

http://hindi-khabar.hindyugm.com/2009/10/8th-mumbai-women-playwright.html

http://janatantra।com/2009/10/31/women-playwright-international-wpi-in-mumbai/

मुंबई में 8वां महिला नाट्यलेखक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन यानी Women Playwright International (WPI) 1 से 7 नवंबर, 2009 तक मुंबई विश्वविद्यालय के अकेडमी ऑफ थिएटर आर्ट तथा स्त्री मुक्ति संघटना, मुंबई के सौजन्य से आयोजित किया जा रहा है। WPI के गठन का उद्देश्य थिएटर के क्षेत्र में काम कर रही महिलाओं को बिना किसी भेदभाव के अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ाना है। इस बार के सम्मेलन की थीम है, उदारता व सहिष्णुता (Liberty and Tolerance)। इसकी सब थीम में हैं, अपनी पहचान, संस्कृति और उसकी विभिन्नता, अहिंसा के रास्ते जीवन जीना, पितृसत्तात्मकता की चुनौतियां, सामाजिक-राजनीतिक विश्व में थिएटर की भूमिका, थिएटर में हास्य आदि हैं। इस सम्मेलन का उद्देश्य यह भी है कि एक प्लेटफॉर्म पर महिला थिएटरकर्मियों के परस्पर मिलने, सोशल नेटवर्किंग और कलात्मक आदान-प्रदान का मंच दिलाना, महिला नाट्य लेखकों के काम को स्टेज करने के और भी अवसर प्रदान करना, महिला नाट्यलेखकों के लेखन व उनके क्राफ्ट को प्रेरित करना, सृजित करना, उन्हें शिक्षित और विकसित करना, महिला नाट्यलेखकों को लिंगगत आलोचनाओं से अलग रखना, महिला नाट्यलेखन की समीक्षा और उसके अध्ययन को बढ़ावा देना, अपने विचारों की अभिव्यक्ति के लिए उन्हें सेंसरशिप व राजनीतिक दवाब से बचाना है।
1988 से अब तक ये सम्मेलन न्यूयॉर्क, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, आयरलैंड, ग्रीस, फिलीपिंस, व इंडोनेशिया में हो चुके हैं। इस साल यह मुंबई में आयोजित है। स्त्री मुक्ति संघटना एक गैर राजनीतिक, स्वयंसेवी संस्था है, जिसकी स्थापना 1975 में ज्योति म्हापसेकर ने महिलाओं के सामाजिक, मानसिक, आत्मिक उत्थान, जागरुकता बढाने और महिलाओं से सम्बंधित मामलों के साथ साथ बराबरी, शांति और विकास के उद्देश्य से की। इसका अपना एक थिएटर ग्रुप भी है। इनकी वेबसाइट है streemuktisanghatana.org
अकेडमी ऑफ थिएटर आर्ट की स्थापना मुंबई विश्वविद्यालय के तहत 2003 में थिएटर प्रशिक्षण के उद्देश्य से शुरू हुई। अकादमी का थिएटर आर्ट्स में दो साल का फुल टाइम मास्टर डिग्री कोर्स है। इनकी वेबसाइट है mu.ac.in। यह सम्मेलन मुंबई विश्वविद्यालय के कलीना स्थित कैंपस में आयोजित है। यदि आप इसमें भाग लेना चाहते हैं तो आप संपर्क कर सकते हैं, wpi09mum@gmail.com पर। कार्यक्रम का विवरण देखा जा सकता है wpi09.in पर।

Sunday, October 25, 2009

“दयाशंकर” की डायरी देखी है? नहीं तो अब देखिए

http://janatantra।com/2009/10/25/review-of-dayashankar-ki-diary/

http://www.artnewsweekly.com/substory.aspx?MSectionId=1&left=1&SectionId=31&storyID=102#

जब भी कोई नाटक किया जाता है तो उसे एक टीम के रूप में ही तैयार किया जाता है. मगर कई बार हो यह जाता है कि एक नाटक शुद्ध रूप से निर्देशक का नाटक हो जाता है तो कई बार वह एक्टर का हो कर रह जाता है. एकजुट थिएटर ग्रुप, मुंबई द्वारा प्रस्तुत नाटक “दयाशंकर की डायरी” देखते समय यही लगा कि यह नाटक निर्देशक और टीम से निकल कर एक्टर के प्लेट्फॉर्म पर आ कर खड़ा हो गया है. “दयाशंकर की डायरी” नाम से लगता है कि डायरी के पन्नों में दर्ज किस्सों की परतें खुलेंगी, मगर यह डायरी से अलग दयाशंकर की आत्मकथा कहने लगती है.
इस एक पात्रीय नाटक के कलाकार हैं जाने माने कलाकार आशीष विद्यार्थी. सपना देख रहे एक आम आदमी की त्रासदी उसे पागलपन से लेकर मौत के मुंह तक धकेल देती है और यह स्थिति समाज से यह सवाल पूछती है कि क्या आम आदमी को आज सपने देखने की भी इज़ाज़त नहीं है? इस त्रासदी पर आप मायूस हो सकते हैं, मगर आज की हक़ीक़त यही है. जी हां, आज आम आदमी सपने से भी महरूम कर दिया गया है. उसे कोई हक़ नहीं कि वह सपने देखे. और अगर वह देखने की जुर्रत करता है तो दयाशंकर की तरह ही अपने हश्र के लिए तैयार रहे. इस आम आदमी की तरह ही एक दूसरे आम आदमी के पास इतनी फुर्सत नहीं है कि वह दयाशंकर जैसे आम आदमी के हालात को, उसके मनोभाव को, उसके सपने को समझे और तदनुसार उसके साथ व्यवहार करे. आज आम आदमी में भी एक वर्ग ऐसे आम आदमी की है जो इन सबके मज़े लेता है और पान की पीक की तरह उस पर थूक कर चला जाता है.
नादिरा ज़हीर बब्बर ने इसकी स्क्रिप्ट भी लिखी है और इसका निर्देशन भी किया है. “दयाशंकर की डायरी” नाटक 1998 में नेहरु सेंटर थिएटर फेस्टिवल में ओपन किया गया था और अबतक देश व विदेशों में इसके लगभग 150 से 200 तक शो हो चुके हैं. इस नाटक को तैयार करने में नादिरा जी की मेहनत भी झलकती है और आशीष विद्यार्थी की भी. एकपात्रीय नाटक गहरे धैर्य, समझ, सम्वेदनशीलता, कलाकार की अभिनय क्षमता के साथ साथ शो को अपेक्षित समय तक ले जाने की कुशलता की भी मांग करता है. आशीष ने इस सभी का परिचय इसमें देने की कोशिश की है और उसमें सफल भी हुए हैं.
आशीष राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पास आउट हैं. अभिनय पर उनकी मास्टरी है. दिल्ली में उन्होंने पीयूष मिश्रा और एन के शर्मा के ‘एक्ट1” के साथ कई नाटक किए. मुंबई में भी अपने संघर्ष के दिनों में वे पृथ्वी फेस्टिवल में और वैसे भी काफी प्लेटफॉर्म पर शो किए. फिर आम एनएसडीयन की तरह वे भी फिल्मों का रुख कर गए. ‘द्रोहकाल” और “इस रात की सुबह नहीं” से उन्हें अधिक पहचान मिली. उन्हें नेशनल अवार्ड भी मिला है. 2009 की उनकी फिल्में हैं, ‘रेड अलर्ट’, रंगरसिया’ और ‘लाहौर’. वे अबतक 64 -65 फिल्में कर चुके हैं, जिनमें नकारात्मक भूमिकाएं उन्हें अधिक मिली है. पता नहीं, मुंबई की हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का क्या गणित है कि उत्तर भारत से आनेवाले अधिकतर कलाकारों को निगेटिव भूमिकाएं ही मिलती हैं, चाहे वे आशुतोष राणा हों या गोविंद नामदेव या मुकेश तिवारी या अखिलेंद्र मिश्र या वीरेंद्र सक्सेना. आशीष समेत ये सभी बेहतरीन कलाकार हैं, मगर इंडस्ट्री को शायद ऐसे ज़हीन कलाकारों की या तो ज़रूरत नहीं या उसको इन सबका उपयोग करने की कला ही नहीं आती. फिर भी, सभी फिल्मों का रुख करते हैं. क्यों? इस पर फिर कभी.
पूरे नाटक में आशीष एक कुशल अभिनेता की तरह दिखे, लेकिन साथ ही, कहीं कहीं वे चूके भी. खासकर लड़की या महिला का अभिनय करते वक़्त. लडकियां सभी समय एकदम नाजुक, कोमलांगी नहीं रहतीं. पर यह हमारी साइकी है. सम्वाद अदायगी बहुत अच्छी थी, मगर भदेस बोली के चक्कर में वे पूर्वी उत्तर प्रदेश के बदले कभी कभी हरियाणा के लग जा रहे थे. प्रकाश व्यवस्था कहीं कहीं तो बेहद सटीक थी. नादिरा जी के नाटकों में प्रकाश पर काफी ध्यान दिया जाता है, एक साथ वे कई कई लाइट्स के प्रयोग करती हैं. संगीत थोडा लाउड था, जो नाटक की गम्भीरता के बदले उसे कहीं कहीं तमाशाई फील दे रहा था.
मुंबई के थिएटर का एक पक्ष यह भी हो गया है कि स्क्रिप्ट में लाफ्टर्स डाले जाने लगे हैं. इससे दर्शकों को फौरी तौर पर सुकून तो मिल जाता है, मगर उसी पल वे विषय की गम्भीरता से भी हट जाते हैं और फिर विषय की गम्भीरता तक पहुंचने में उन्हें जितना वक़्त लगता है, उतने में नाटक बहुत आगे निकल जाता है और नाटक किताब तो है नहीं कि जहां से छूट गया, वहां से आप दुबारा पकड लें. और थिएटर भी केवल मनोरंजन नहीं है कि उसे बस उसी के खांचे में देखा जाता रहे.
नादिरा जी के पूर्ववर्ती नाटकों की वह गम्भीरता और मेहनत इस नाटक में दिखती है, जिस गम्भीरता और मेहनत ने उन्हें मुंबई के थिएटर परिदृश्य में एक अलग मुकाम दिलाया है. दयाशंकर जैसे व्यक्ति की एक त्रासदी यह भी है कि वह दयाशंकर है. उसकी यह त्रासदी बाद में भी बनी रहेगी. मान लीजिए कि दयाशंकर को उसके एमएलएसाहब की बेटी स्वीटी मिल भी जाती तो क्या वह उसके साथ विवाह करके सुखी और सहज रह लेता? क्या वह एक नए फ्रस्ट्रेशन का शिकार नहीं होता कि उसकी बीबी उसके हिसाब से नहीं रहती कि वह अपने बाप के पद और पैसे के मद में है कि उसे उसकी और उसके पोजीशन की परवाह ही नही है, जैसा कि आम जीवन में होता है या ‘राजा हिंदुस्तानी’ तक की फिल्मों में यह अहम दिखता रह्ता है? दयाशंकर जैसे लोग अपनी ही त्रासदियों के जाल में घिरे रहने को अभिशप्त होते हैं. यह नाटक का दूसरा पक्ष है. इसे अलग कर दें तो “दयाशंकर की डायरी” हो सकता है कि आपमें से कइयों को अपने जीवन के करीब लगे, बेहद क़रीब.

Saturday, October 24, 2009

देख भाई देख, ताल ठोंक के देख!

पिछले दिनों मोहल्ला लाइव पर रवीश कुमार ने दो तसवीरें भेजी थीं जिनमें माँ बहन की गाली देते हुए लोगों से उस स्थान पर लघुशंका न कराने के लिए कहा गया था। छम्मक्छल्लो के लिए भी यह एक अनोखी बात थी। उस तस्वीर और उस पर आधारित लेख पर यह प्रतिलेख। मोहल्ला लाइव पर भी यह है। लिंक है- http://mohallalive.com/2009/10/24/vibha-rani-react-on-ravish-mobile-photo/ पढ़ें और अपनी राय दें।

हा हा हा हा! छम्मक्छल्लो की हंसी रुक नहीं रही. वह दाद पर दाद दे रही है. वाह रवीश जी वाह और वाह अविनाश जी वाह! और वाह वाह इस लघुशंका निषेध के लेखक जी के लिए भी. मान लीजिए इन्हें भी लेखक. इतने अभिनव विचार तो किसी बडे व महान लेखक के पास भी नहीं होंगे कि वह इतने मर्दाना अंदाज़ में देह की प्राकृतिक ज़रूरत से फारिग होने पर किसी को लानत मलामत भेजे. जिन साहबानों ने लिखा होगा, वे वाकई ओरिजिनल राइटिंग और थॉट के लिए पुरस्कार के पात्र हैं. यह भी बेखटके और बेखौफ कहा जा सकता है कि इतनी उच्च और विरल लेखनी किसी साहबान की ही होगी, किसी साहिबा की नहीं.
देखिए, आप सब नाहक माथापच्ची कर रहे हैं. छम्मक्छल्लो ने पहले भी लिखा था कि गाली देना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और उसमें मां बहन का इस्तेमाल हमारा आपद धर्म. इससे आप हमें बेदखल नहीं कर सकते. दूसरे हमारे भीति भाव को तो तुलसीदास जी भी अपने समय में अनुभव कर गए थे, इसीलिए लिख भी गये कि ‘बिन भय होंहि न प्रीति’ तो, जबतक आप किसी बात का भय नहीं दिखाएंगे, लोग आपकी बात नहीं मानेंगे. गांधी जी के सत्य, अहिंसा और प्रेम के मार्ग पर चलते हुए किसी से अनुरोध वाली भाषा में कहेंगे कि भाई साहब, यहां पर अपनी शंका का समाधान मत करें तो वह पलट कर आपसे ही कह बैठेगा कि “क्यों? यह ज़मीन क्या तेरे बाप की है?” फिर आप क्या कर लेंगे?
यह हमारा देश है और हमें हर तरह की अभिव्यक्ति की आज़ादी मिली हुई है, सो हम अपनी आज़ादी का प्रदर्शन कर रहे हैं. छम्मकछल्लो जब छोटी थी तो देखती थी कि शहर के कुछ लडके और मर्द ऐसे होते थे, जिन्हें किसी लडकी या औरत को देखते ही अपनी मर्दानगी को आज़ादी देने की ऐसी सख्त ज़रूरत आन पडती थी कि देह को वस्त्र से आज़ाद किए बगैर उनकी आत्मा को चैन नही आता था. ऐसी आज़ादी का प्रदर्शन महिलाओं और स्त्रियों के सामने ही किया जाता है और वे सब अपनी इस आज़ादी का भरपूर इस्तेमाल बेखटके और निस्संकोच करते थे. अब जब आप ऐसी वैसी ज़बान में लिखेंगे तो हो सकता है, लोग डर जाएं या तनिक शर्मा ही जाएं. वो कहते हैं ना कि नंगे से तो ख़ुदा भी डरता है.
डरने को तो लोग भगवान से भी डरते हैं और नहीं भी डरते. अब बेचारे भगवान को भी ऐसे सार्वजनिक जगह पर अपनी अपनी छवियों की प्रदर्शनी करनी होती है ताकि लोग उन जगहों पर थूके नहीं, अपनी लघु या दीर्घ शंकाओं का समाधान ना करें. असली सर्व धर्म सम भाव यहीं पर दिखता है. असली सर्व धर्म सम डर भी. एक धर्म के भगवान को लगाओगे तो दूसरे धर्मवाले उसपर अपनी शारीरिक क्षमता की मिसाल छोड देंगे. सो वहां राम भी हैं, वाहे गुरु भी, सांईबाबा भी हैं, यीशू मसीह भी, काबा भी है और रजनीश भी.
नियम कानून की बात ना करें. उसे तोडने में हमसे सिद्धहस्त और कौन हो सकता है? नियम हमारे यहां बनाए ही इसीलिए जाते हैं कि उसे तत्क्षण कैसे तोड दिया जाए? अब गाली देना सभ्य समाज की निशानी नहीं मानी जाती है. तो हमें आप बताइये कि हम सभ्य हैं क्या? अगर हम सभ्य ही हुए रहते तो गाली को भूल ना चुके होते? सभ्य ही होते तो राह चलती लडकी, महिला को उठा कर उसके साथ रेप करने से बाज़ ना आते? सभ्य ही होते तो दिन दहाडे किसी का खून होते देख उसके रक्षार्थ उठते नहीं? सभ्य ही होते तो किसी भी औरत को दिन दहाडे नग्न करके घुमाने की घटना पर चुल्लू भर पानी में डूब ना जाते? सभ्य ही होते तो धर्म, जाति, वर्ण आदि के नाम पर चल रहे खूंरेजी खेल से बाज़ ना आते? काहे को सभ्य भई? और किसलिए हों? हमारे देश के संविधान में कहीं यह लिखा हुआ है कि हमें सभ्य होना ही है?
और छम्मकछल्लो को तो और भी खुशी हो रही है. कम से कम इस प्रसंग में देश की आधी आबादी को तो मुक्ति मिल गई. भई, यह आधी आबादी मज़ाल है जो बीच सडक पर दिन दहाडे अपनी नैसर्गिक ज़रूरत पूरी करने के लिए बैठ जाएं? उनकी ही तरह उनकी अनिवार्य प्राकृतिक ज़रूरतें भी देह के किसी कोने में सिमटती, घुटती कई कई बीमारियों तक को जन्म दे देती हैं. वे तो एक गुपचुप सा कोना तलाशती हैं, फुसफुसाकर अपनी ज़रूरत का बयां करती हैं. निपट आने पर कुछ क्षण नज़रें नहीं उठातीं.
छम्मकछल्लो 20 साल पहले दिल्ली में थी. तब की नौकरी में उसे तमाम सरकारी दफ्तरों, उपक्रमों व बैंकों में सम्पर्क कार्य करना होता था. वह नई थी, इसलिए उसकी एक दोस्त उसे अपने साथ जगह जगह ले जा रही थी. तब नेहरु प्लेस भी नया ही था. उन दोनों को घूमते घूमते सुबह से दोपहर हो गई. कहीं किसी जगह प्रसाधन का कोई बोर्ड नहीं दिखा. उन दोनों का बुरा हाल, ज़रूरत से निपटने के लिए भी और शर्म से भी कि कैसे किसी आदमी से पूछें (कोई औरत नज़र नहीं आ रही थी). अंत में उसकी दोस्त ने एक आदमी से अंग्रेजी में पूछा (अंग्रेजी में भदेसपन थोडा कम आता है ना). उस सज्जन ने कहा कि उनके दफ्तर में अलग से महिलाओं के लिए कोई प्रसाधन नहीं है. अंत में वे दोनों उसी प्रसाधन के इस्तेमाल के लिए मज़बूर हुईं और जब बाहर निकलीं तब सर ऐसे झुके हुए थे कि उन सज्जन का चेहरा देखे बगैर ही उन्हें धन्यवाद करके भाग लीं. रवीश जी ने जो तस्वीरें भेजीं हैं, उसमें क्रिया भी पुल्लिंग है. इसलिए कम से कम छम्मकछल्लो को तो सुकून मिला कि यह उन जैसों के लिए नहीं है. हां, अब गाली में यह आधी आबादी है तो इसके लिए क्या

Thursday, October 22, 2009

रेप हथियार है! फौज़ तैयार करें!

http://janatantra।com/2009/10/22/vibha-rani-article-on-rape-and-women/
आज आप किसी को भी रेप के नाम पर डरा सकते हैं, धमका सकते हैं. रेप के मामले में कौन सच्चा है, कौन झूठा, यह तय करना मुश्किल है. न्याय, धर्म, प्रेम मानवता आदि की बातें इस संदर्भ में ना करें. घटना सामाजिक परिप्रेक्ष्य में घटे कि राजनीतिक. रेप के घिनौने पक्ष से कोई इंकार नहीं कर सकता. सवाल यह है कि इस घिनौने पक्ष का हमारे समाज में बने रहने का क्या कोई औचित्य है? तो जवाब है कि औचित्य है. हर उस कारक का इस समाज में औचित्य है, जिसका आपके अस्तित्व से, आपके मान से, आपके सम्मान से, आपकी निजता से वास्ता है.
बलात्कार का डर दिखाना या बलात्कार करना कोई आज की बात नहीं है. इसे आप अपने मिथकीय पात्रों में भी पा सकते हैं और अपने आज के राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक और ताक़तवर परिवेश में भी. ऋषि गौतम की पत्नी अहिल्या का देवर्षि इंद्र ने बलात्कार किया तो सती वृन्दा का स्वयं भगवान विष्णु ने. दुर्योधन भी पांचाली को नग्न करने में सफल हो जाता तो इसके बाद की परिणति शायद बलात्कार ही होती.
बलात्कार एक मानसिक स्थिति है, अपनी ताकत को, अपनी शक्ति को प्रदर्शित करने की स्थिति. सामनेवाले को अपने से कमतर देखने की जुगुप्सा भरी तालिबानी खुशी और संतोष. सभी को मालूम है कि यह गलत है, मगर नागासाकी, हिरोशिमा की तरह इस पर अणुबम का इस्तेमाल हो रहा है. नागाशाकी, हिरोशिमा तो दो जगहें हुईं और इनके परिणाम से दुनिया वाकिफ है और अभी तक कम से कम फिर से इस घटना की पुनरावृत्ति नहीं हुई है. हर नारी देह एक नागाशाकी, एक हिरोशिमा है, उस पर जबर्दस्ती करने का तालिबानी आतंक है, मगर इस नागाशाकी, हिरोशिमा पर बलात्कार के अणुबम गिराए और गिराए चले जा रहे हैं.
दुर्भाग्य से इसे मन से कम और शरीर से अधिक जोड दिया गया है, वह भी स्त्री देह से. बलात्कार शब्द आते ही सबसे पहले नारी की ही परिकल्पना सामने आती है. किसी पुरुष पर बलात्कार जैसी अवधारणा अभी विकसित नहीं हुई है. प्रार्थना कीजिए कि ऐसी स्थिति आए भी नहीं, क्योंकि खराब हर हालत में खराब है, उसका भोक्ता चाहे जो भी हो. आप स्वयं देखें कि किसी काम को अगर हमसे बलात करवाया जाता है तो हमारा मन कितना क्षुब्ध होता है. कई कई दिनों तक हम उस स्थिति के घेरे में रहते हैं. मगर चूंकि उसमे शरीर और यौनजनित प्रक्रिया नहीं है तो उसे काम, काम की अनिवार्यता, जीवन जीने की मज़बूरी, समझौता और पता नहीं क्या क्या नाम देकर उसे भूल जाने की सलाह दी जाने लगती है.
एक दुर्भाग्य यह भी है कि बलात्कार को व्यक्ति के स्व सम्मान पर आघात से अधिक उसे घर, परिवार, समाज, देश की प्रतिष्ठा के रूप में देखा जाता है. ऐसे में यह केवल एक अपराध या एक शारीरिक या यौनजनित प्रक्रिया भर नहीं रह जाती, बल्कि यह एक अमोघ हथियार हो जाता है. एक जाति, समाज, धर्म, देश का किसी दूसरी जाति, समाज, धर्म, देश के साथ बदला लेने का सबसे अमोघ हथियार. युद्ध की तो यह अघोषित नीति है और इसके लिए सैनिकों पर कोई कार्रवाई नहीं होती. प्रथम विश्व युद्ध से लेकर आज तक विश्व में जितने भी युद्ध हुए हैं, पराजित देश की स्त्रियों को बलात्कार की नारकीय पीडा से गुजरना पडा है. अब इस क्षेत्र में थोडी से सुगबुगाहट आई है. राजाओ, महाराजाओं के समय में भी औरतें लूट के माल के रूप में विजेता राजाओं के रनिवास में, सैनिकों के खेमों में और सामान्य नागरिकों के लिए वेश्यालयों में भेज दी जाती थीं. सनद रहे कि उनसे कोई सम्मानजनक व्यवहार नहीं किया जाता था. आज भी सवर्ण अवर्ण की लडाई में महिलाओं के साथ पाशविकता का यह नंगा खेल खेला जाता है. विरोधी पक्ष इसमें अपनी विजय समझते हैं. यह समझ में नहीं आता कि एक ओर जिस स्त्री को कमजोर, अबला की संज्ञा दी जाती है, उसी के तन पर जबरन कब्ज़ा करके विजय के किस भाव को व्यक्त किया जाता है. पर सोचने के बाद लगा कि विजय का भाव आता है, क्योंकि यह विजय नारी देह के मर्दन के भाव से नहीं है, यह विजय भाव अपने दुश्मन के विशिष्ट सम्मान के मर्दन से है. औरत को घर की मर्यादा मानना बंद कर दीजिए, उसका बलात्कार होना बंद नहीं तो कम अवश्य हो जाएगा.
मज़बूत से मज़बूत लडकी और स्त्री भी आज अणु बम विस्फोट से उतना नहीं डरती होंगी, जितना बलात्कार शब्द से. इसके पीछे वही लगातार चलने वाली मानसिक अशांति, पीडा, दुख और क्षोभ की त्रासदी है. एक सामाजिक अवहेलना, पुरुष ताक़त का जबरन स्थापन उसके अस्तित्व को खंगाल डालता है. एक अजाने डर और अविश्वास से वह जीवन भर जूझती रहती है और उस पर से समाज के लम्पटों के कुत्सित इशारे और हाव भाव कि अब तो एक मन लकडी झेल ही आई, दस मन और उठा लोगी तो तुम पर क्या फर्क़ पडेगा. तुम्हारा तो जो जो होना था, हो गया, जो जाना था, चला गया. रेप या बलात्कार हथियार है और हर कोई इस हथियार का प्रयोग अपने रक्षार्थ करना चाहता है. प्रतिपक्षी अगर लडकी है तो इस आधार पर उसे डराना धमाकाना और आसान हो जाता है. सत्ता का मद इस भाव पर मोटा रेशमी पर्दा डाल देता है. उस पर्दे के भीतर सनीली सरसराहट होती है. सनीली सरसराहट सांप की भी होती है. सत्ता के आस्तीन में सांप हमेशा छुपा बैठा होता है. अपनी सुविधा के हिसाब से कभी वह उस सांप की लपलपाती जीभ दिखा देती है, कभी उसकी फुंफकार सुना देती है और इतने से भी बात नहीं अगर बन पाती है तो वह आस्तीन के अपने दोस्त को आगे के काम को अंजाम देने के लिए छोड देती है. सत्ता की ज़बान या ताक़त में नर या मादा का भेद नहीं देखा जाता. बलात्कार करना या करवाना सदा से ताक़तवरों का प्रिय शगल रहा है और जो आपके तन, मन, सब पर भारी पडे, वह भी बिना हर्र फिटकरी के तो उस चोखे रंग के लिए कौन आगे आना पसंद नहीं करेगा?

रेप हथियार है! फौज़ तैयार करें!

http://janatantra।com/2009/10/22/vibha-rani-article-on-rape-and-women/
आज आप किसी को भी रेप के नाम पर डरा सकते हैं, धमका सकते हैं. रेप के मामले में कौन सच्चा है, कौन झूठा, यह तय करना मुश्किल है. न्याय, धर्म, प्रेम मानवता आदि की बातें इस संदर्भ में ना करें. घटना सामाजिक परिप्रेक्ष्य में घटे कि राजनीतिक. रेप के घिनौने पक्ष से कोई इंकार नहीं कर सकता. सवाल यह है कि इस घिनौने पक्ष का हमारे समाज में बने रहने का क्या कोई औचित्य है? तो जवाब है कि औचित्य है. हर उस कारक का इस समाज में औचित्य है, जिसका आपके अस्तित्व से, आपके मान से, आपके सम्मान से, आपकी निजता से वास्ता है.
बलात्कार का डर दिखाना या बलात्कार करना कोई आज की बात नहीं है. इसे आप अपने मिथकीय पात्रों में भी पा सकते हैं और अपने आज के राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक और ताक़तवर परिवेश में भी. ऋषि गौतम की पत्नी अहिल्या का देवर्षि इंद्र ने बलात्कार किया तो सती वृन्दा का स्वयं भगवान विष्णु ने. दुर्योधन भी पांचाली को नग्न करने में सफल हो जाता तो इसके बाद की परिणति शायद बलात्कार ही होती.
बलात्कार एक मानसिक स्थिति है, अपनी ताकत को, अपनी शक्ति को प्रदर्शित करने की स्थिति. सामनेवाले को अपने से कमतर देखने की जुगुप्सा भरी तालिबानी खुशी और संतोष. सभी को मालूम है कि यह गलत है, मगर नागासाकी, हिरोशिमा की तरह इस पर अणुबम का इस्तेमाल हो रहा है. नागाशाकी, हिरोशिमा तो दो जगहें हुईं और इनके परिणाम से दुनिया वाकिफ है और अभी तक कम से कम फिर से इस घटना की पुनरावृत्ति नहीं हुई है. हर नारी देह एक नागाशाकी, एक हिरोशिमा है, उस पर जबर्दस्ती करने का तालिबानी आतंक है, मगर इस नागाशाकी, हिरोशिमा पर बलात्कार के अणुबम गिराए और गिराए चले जा रहे हैं.
दुर्भाग्य से इसे मन से कम और शरीर से अधिक जोड दिया गया है, वह भी स्त्री देह से. बलात्कार शब्द आते ही सबसे पहले नारी की ही परिकल्पना सामने आती है. किसी पुरुष पर बलात्कार जैसी अवधारणा अभी विकसित नहीं हुई है. प्रार्थना कीजिए कि ऐसी स्थिति आए भी नहीं, क्योंकि खराब हर हालत में खराब है, उसका भोक्ता चाहे जो भी हो. आप स्वयं देखें कि किसी काम को अगर हमसे बलात करवाया जाता है तो हमारा मन कितना क्षुब्ध होता है. कई कई दिनों तक हम उस स्थिति के घेरे में रहते हैं. मगर चूंकि उसमे शरीर और यौनजनित प्रक्रिया नहीं है तो उसे काम, काम की अनिवार्यता, जीवन जीने की मज़बूरी, समझौता और पता नहीं क्या क्या नाम देकर उसे भूल जाने की सलाह दी जाने लगती है.
एक दुर्भाग्य यह भी है कि बलात्कार को व्यक्ति के स्व सम्मान पर आघात से अधिक उसे घर, परिवार, समाज, देश की प्रतिष्ठा के रूप में देखा जाता है. ऐसे में यह केवल एक अपराध या एक शारीरिक या यौनजनित प्रक्रिया भर नहीं रह जाती, बल्कि यह एक अमोघ हथियार हो जाता है. एक जाति, समाज, धर्म, देश का किसी दूसरी जाति, समाज, धर्म, देश के साथ बदला लेने का सबसे अमोघ हथियार. युद्ध की तो यह अघोषित नीति है और इसके लिए सैनिकों पर कोई कार्रवाई नहीं होती. प्रथम विश्व युद्ध से लेकर आज तक विश्व में जितने भी युद्ध हुए हैं, पराजित देश की स्त्रियों को बलात्कार की नारकीय पीडा से गुजरना पडा है. अब इस क्षेत्र में थोडी से सुगबुगाहट आई है. राजाओ, महाराजाओं के समय में भी औरतें लूट के माल के रूप में विजेता राजाओं के रनिवास में, सैनिकों के खेमों में और सामान्य नागरिकों के लिए वेश्यालयों में भेज दी जाती थीं. सनद रहे कि उनसे कोई सम्मानजनक व्यवहार नहीं किया जाता था. आज भी सवर्ण अवर्ण की लडाई में महिलाओं के साथ पाशविकता का यह नंगा खेल खेला जाता है. विरोधी पक्ष इसमें अपनी विजय समझते हैं. यह समझ में नहीं आता कि एक ओर जिस स्त्री को कमजोर, अबला की संज्ञा दी जाती है, उसी के तन पर जबरन कब्ज़ा करके विजय के किस भाव को व्यक्त किया जाता है. पर सोचने के बाद लगा कि विजय का भाव आता है, क्योंकि यह विजय नारी देह के मर्दन के भाव से नहीं है, यह विजय भाव अपने दुश्मन के विशिष्ट सम्मान के मर्दन से है. औरत को घर की मर्यादा मानना बंद कर दीजिए, उसका बलात्कार होना बंद नहीं तो कम अवश्य हो जाएगा.
मज़बूत से मज़बूत लडकी और स्त्री भी आज अणु बम विस्फोट से उतना नहीं डरती होंगी, जितना बलात्कार शब्द से. इसके पीछे वही लगातार चलने वाली मानसिक अशांति, पीडा, दुख और क्षोभ की त्रासदी है. एक सामाजिक अवहेलना, पुरुष ताक़त का जबरन स्थापन उसके अस्तित्व को खंगाल डालता है. एक अजाने डर और अविश्वास से वह जीवन भर जूझती रहती है और उस पर से समाज के लम्पटों के कुत्सित इशारे और हाव भाव कि अब तो एक मन लकडी झेल ही आई, दस मन और उठा लोगी तो तुम पर क्या फर्क़ पडेगा. तुम्हारा तो जो जो होना था, हो गया, जो जाना था, चला गया. रेप या बलात्कार हथियार है और हर कोई इस हथियार का प्रयोग अपने रक्षार्थ करना चाहता है. प्रतिपक्षी अगर लडकी है तो इस आधार पर उसे डराना धमाकाना और आसान हो जाता है. सत्ता का मद इस भाव पर मोटा रेशमी पर्दा डाल देता है. उस पर्दे के भीतर सनीली सरसराहट होती है. सनीली सरसराहट सांप की भी होती है. सत्ता के आस्तीन में सांप हमेशा छुपा बैठा होता है. अपनी सुविधा के हिसाब से कभी वह उस सांप की लपलपाती जीभ दिखा देती है, कभी उसकी फुंफकार सुना देती है और इतने से भी बात नहीं अगर बन पाती है तो वह आस्तीन के अपने दोस्त को आगे के काम को अंजाम देने के लिए छोड देती है. सत्ता की ज़बान या ताक़त में नर या मादा का भेद नहीं देखा जाता. बलात्कार करना या करवाना सदा से ताक़तवरों का प्रिय शगल रहा है और जो आपके तन, मन, सब पर भारी पडे, वह भी बिना हर्र फिटकरी के तो उस चोखे रंग के लिए कौन आगे आना पसंद नहीं करेगा?