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छम्मकछल्लो की दुनिया में आप भी आइए.

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Tuesday, May 5, 2020

बॉबी का कर्ज़- ॐ शांति, ॐ....

बॉबी वाला सबका चिंटू.....!
एक नोस्टालजिया था बॉबी फिल्म देखना। फिल्मों को लेकर यह दीवानगी आज दूसरे रूपों में हो सकती है, क्योंकि आज फिल्में देखने के बहुत से संसाधन हैं, साथ ही, मनोरंजन के भी ढेर सारे तकनीकी उपाय, जिनमें सोशल मीडिया प्रमुख है। लेकिन, तब हमारे पास केवल फिल्में ही रहती थीं, किताबों के अलावा।
ऋषि कपूर को हमने श्रीमान 420 और मेरा नाम जोकर में बाल कलाकार के रूप के बाद एक टीन मासूम रूप में देखा था बॉबी में। उसके बाद बहुत तो नहीं, लेकिन कुछ फिल्में देखीं, जिनमें कभी-कभी, और एक चादर मैली सी प्रमुख रही और धमाकेदार रही कर्ज़! लगभग दस मिनट का अगाना- मेरे उम्र के नौजवानों....! ओह! मेरे धड़कन अभी भी यह तेज आर देता है। ....आओके अनुभव! साझा कीजिये न! लेकिन, उसके पहले इसे जरूर देख लें #बोलेविभा49 में

Saturday, April 18, 2020

पैरोडी का पोपट


पैरोडी का पोपट

फिल्में हमें तरह-तरह से प्रभावित करती हैं। इसके गीत जहां हमें अलग-अलग तरीके से प्रेरित, प्रोत्साहित और उत्साहित करते हैं, वहीं अलग-अलग समय, काल, पात्र व परिस्थिति के मुताबिक अपने अर्थ भी बदलते रहते हैं।

फिल्मी गीतों पर पैरोडी बहुत पहले से बनाते आ रहे हैं। 'मि. इंडिया' जैसी फिल्मों में भी खूब लंबी पैरोडी आपने देखी होगी। ये पैरोडी भी उतने ही क्रिएटिव होते हैं। आजकल कुछ मंचीय कवि तो इन्हीं पैरोडी के बल पर आंच का सितारा बने रहते हैं।

आज के इस कोरोना और COVID19 के समय में बोले विभा के तहत हमने भी इन पैरोडी पर चर्चा की है। दो पैरोडी लिखे और गाए हैं. लॉक बंदी और उसके आगे की दुनिया से बावस्ता होने के लिए भी जीवन में कुछ हल्के-फुल्के पल चाहिए। फिलहाल बोले विभा का मराठी में कहें तो ''एकच लक्ष्य' है- आपका मनोरंजन करना, आपको अवसाद, दुख, निराशा के माहौल से निकालकर कुछ पल मुस्कुराने के लिए देना।

आपकी  टिप्पणियाँ मेरे मनोबल को बढ़ाने में सहायक होंगी। यूट्यूब पर भी आप हमें सुझाव भी दे सकते हैं कि फिलहाल के इस स्वरूप में और क्या कंटेन्ट डाले जा सकते हैं।

इसलिए आप सब इसे देखेंगे तो मुझे लगेगा की मेरे मेहनत सार्थक हो रही है। 


https://www.youtube.com/watch?v=obKKpU8JEFY&feature=youtu.be 

Sunday, July 10, 2016

एते पे सुलतान है....!


चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण
एते पे सुलतान है, मत चूको चौहान।
पृथ्वीराज चौहान के लिए यह कहा गया था। आज फ़िल्म सुलतान के लिए कहा जा सकता है। यह चार बांस चौबीस गज और आठ अंगुल का एक निशाना था, एक लक्ष्य। जीवन में हम कुछ भी नहीं, अगर लक्ष्य ना हो तो।और यह लक्ष्य निज का निज से होता है, तभी हम अपनी ही  खींची लकीर को तोड़ते ,भेदते आगे बढ़ाते जाते हैं। लेकिन लक्ष्य जब एकांगी हो तो वह चार बांस चौबीस गज से हटकर आठ अंगुल तक होकर रह जाता है।
छम्मकछालो को सुल्तान लक्ष्य के इसी आठ अंगुल के भीतर तीन घंटे की बनाई फ़िल्म लगी। बचपन में हर ईद पर म्हारै शहर में एक मुस्लिम पृष्ठभूमि की फ़िल्म लगाई जाती थी। एक हफ्ते पहले से रिक्शे और टंगे पर लाउडस्पीकर से उस फ़िल्म के लिए प्रचार होता था-"ईद के मुबारक़ मौके पर माँ बहनो के लिए खास। देखना न भूलिए महान सामाजिक, पारिवारिक फ़िल्म मेरे मेहबूब या ऐसी ही कोई फ़िल्म।"
तब मुस्लिम पृष्ठभूमि पर बनी फ़िल्में भी एक प्रेम कहानी भर होती थी। सुल्तान भी प्रेम की चाशनी में भिगोकर बनाई गयी है। लगे कि हम प्रेम के प्रति कितने संवेदनशील हैं। लेकिन प्रेम की यह चाशनी एक तार की क्यों होकर रह जाती है, यह समझ से परे हो जाता है। एक आम फ़िल्म की तरह सुलतान आरफा से टकराता है और दिल दे बैठता है। दिल की खातिर पहलवानी सीख लेता है। छोरियां दिल्ली से पढ़ी हों या स्टेट लेवल चैम्पियन हों, प्रेम मुहब्बत के नाम पर वही लैलाई रूप। और क्या करे वह कि अपनी खातिर हीरो को पहलवानी सीखते देख भीग गई। कैरियर जी गया तेल लेने। माँ भी बन गयी! ओ जी। कहाँ गया सुलतान का दिल, जिसे पाने के लिए वह पहलवान बना, उसी के माँ बनने पर उसके कैरियर के बाबत तनिक भी न सोचा? अब जी वो, बच्चा गिरवाती तो हमारी संस्कृति को खतरा हो जाता। लो जी।छोरियों का क्या! वे तो होती ही हैं इसी सबके लिए। ....और जी, बाद में भी उसने तो मोम की तरह पिघल ही जाना है। ना पिघलती तो फिर से भारतीय संस्कृति को जी, खतरा पैदा हो जाता।
फिलिम देखते हुए जी मन्ने लगा कि कहानी पलट दी गयी होती तो? ...तो जी। ईद न होती। भाई न होता। फ़िल्म की शुरआत में ही हिरवा और भगवा झंडा न होता। मन्ने तो पैले तिरंगा लगा। सो सुफैद झंडा भी खोजती रही। लेकिन मेरी मत। सुफैद कपड़ों में बैठे लोग बाद में समझ में आया। दिल्ली में भी शायद अब नवभारत टाइम्स के ऊपर अंग्रेजी में NBT छपने लगा हो।
ये भी समझ में न आया कि सुलतान के चैंपियन बनने के बाद आरफा तुरंत रेसलिंग में आ भी गयी। तुरंत जी, प्रेगनेंट भी हो गई, तुरंत जी चार साल की बच्ची भी रेसलर की नई पीढ़ी बनकर सामने आ गई। छम्मकछल्लो को लगा कि छोरियां कहीं भी पैदा हों, वे बीबी और माँ से आगे बच जावे तो कुछ सोचे।
वैसे फ़िल्म स्पोर्ट्स के बारे में कहती है तो स्पोर्ट्स तो जी, दिल को खिंचता ही है। बनानेवाले ने फिलिम में चुस्ती राखी है। सल्लू भाई तो बस भाई है ही। पर इस फिलिम में पैली बार या भोत दिन बाद उनकी मेहनत दिखी है।
आरफा का तो समझ में ही नहीं आया कि वह रेसलर काय को बनी। शायद स्टोरी को सपोर्ट देने के लिए। उतनी ही, जितनी बड़े हीरो की फिल्मों में हीरोइन होती है। थोड़ा नाच गा लो। सो गा लिया- "बेबी को बेस पसंद है।" थोड़ा रोमांस कर लिया। थोड़ी फेमिली भैलू भी समझा दी। ...छम्मकछल्लो तो NH10 की छोरी को खोज रही थी।
हिंदी फिलम में ऐसा क्यों नहीं होता कि हीरो ना बचे। या वह हार जाए। 100 में से 99 को लगेगा कि वह हमारे बीच का एक आदमी है। लेकिन ना। अपण तो जी, कम्पटीशनवाले लोग हैं।हार कैसे सकते हैं? सामान्य नहीं। असाधारण बनना है हमें, चाहे वह इंग्लिश विंग्लिश हो या तारे ज़मीं पर या सुलतान। उम्र या जेंडर का कोई कनेक्शन नहीं। पर जी, ये सब सोचोगे तो फिलिम नहीं देख पाओगे। सो आज इतवार को बमुश्किल 50 दर्शकों के बीच हमने फिलिम देखी। आप भी देख आओ। तीन घंटे भारी नहीं पड़ते "सैराट" की तरह।