Tensions in life leap our peace. Chhammakchhallo gives a comic relief through its satire, stories, poems and other relevance. Leave your pain somewhere aside and be happy with me, via chhammakchhallokahis.
Tuesday, May 18, 2010
एयर होस्टेस कितना बतियाती हैं?
छम्मकछल्लो की भी यह ज़ुर्रत नहीं है कि वह किसी भी बात से इंकार करे. तब तो और भी नहीं, जब मामला किसी लडकी, उसके रूप-रंग, उसकी प्रतिभा (?), उसकी काबिलियत से जुडा हो. विमान सेवा भी एक सेवा है. इसे सुंदर बनाए रखने के लिए सुंदर-सुंदर विमान परिचारिकाएं होती हैं. सुंदर तो कुछ भी हो, किसी भी जगह या क्षेत्र में हो, मन को भाती है. ऐसे में हर क्षेत्र में काम करनेवाली महिलाओं का सुंदर होना लाजिमी हो जाना चाहिये, चाहे वह नर्स हो, डॉक्टर हो, वैज्ञानिक हो, इंजीनियर हो. सुंदर तो घर की बहुओं का होना भी लाजिमी है. आखिर अगली संतति सुंदर होनी चाहिये कि नहीं?
छम्मकछल्लो के मूढ मगज़ में नहीं आता कि एयर होस्टेस के लिए तथाकथित सुंदर होना लाजिमी क्यों है? क्या एयरलाइंस उसकी सुंदरता के बल पर चलते हैं? क्या कम सुंदर लडकियों द्वारा दी जानेवाली सेवाएं कुरूप या कम असरकारी होती हैं? एयर होस्टेस का काम आखिर अपने अतिथियों (किंगफिशर एयरलाइन को धन्यवाद कि उसके द्वारा ‘अतिथि’ के प्रयोग के कारण अब सभी एयलाइनों के पैसेंजर, यानी यात्री लोग अतिथि रूप में बदल गए.) को उडान के दौरान आवश्यक सेवाएं देना होता है. और यह सेवा कोई दुर्वासा भाव से न तो करवाता है और ना कोई रम्भा या मेनका भाव से करती है. मगर लोग अपनी मानसिकता ही बदल दे तो कोई क्या करे? पता नहीं राजा राम के समय के पुष्पक विमान की क्या स्थिति थी? सुंदरता के इसी दुराग्रह के कारण छम्मकछल्लो भी एयर होस्टेस बनते- बनते रह गई. उसकी इस इच्छा पर सभी ने छूटते ही कहा था कि “शक्ल देखी है अपनी?”
शकल के साथ साथ अकल भी देख लेने की बात कही गई. और अकल तो अपने देश में उसी के पास होती है, जिसके पास अंग्रेजी की ताक़त होती है. अंग्रेज गए तो शासन की ताक़त ले गए. मगर भाषा की ताक़त यहीं छोड गए. वे जानते थे कि किसी को मन से गुलाम बना कर रखना है तो उसकी ज़बान में घुस जाओ. देश छोड दिया, राजनीतिक ताक़त छोड दी, मगर हमारे मन में बसे रहे- प्रीतम आन बसो मेरे मन में. इतने कि देश के आज़ाद होने के बाद भी हम यह नहीं मानते कि हमारे देश की अपनी एक भाषा है, या हो सकती है. लोग अपने ही देश की भाषाओं पर आपसी लडाई करते हैं, अंग्रेजी के खिलाफ नहीं बोलते. बोलें भी कैसे? आखिर वह अतिथिकी भाषा है और अपने देश में “अतिथिदेवो भव:” होता है. देश गुलाम था तो लोग आज़ादी की बात हिंदी में करते थे. देश अब आज़ाद है तो लोग अपनी बात अंग्रेजी में कहते हैं. देश जब आज़ाद हुआ, तब महात्मा गांधी ने पहला संदेश यह दिया कि बता दो दुनिया को कि गांधी अंग्रेजी भूल गया. कुछ साल पहले देश के एक भूतपूर्व गृह मंत्री ने कह दिया कि अंग्रेजी इस देश से जानेवाली नहीं. लोगों को अंग्रेजी सीखनी चाहिये. जान लें कि भारत सरकार की राजभाषा नीति गृह मंत्रालय के अधीन ही आती है.
हाल में एक खबर आई कि देश में एक लडकी, कहा गया कि वह अनुसूचित जाति से थी, ने अपने कैरियर के रूप में एयर होस्टेस के पेशे को अपनाना चाहा. उसने इसका प्रशिक्षण देनेवाली अकादमी में नाम भी लिखा लिया. प्रशिक्षण पूरा भी हो गया. मगर नौकरी की बात आने पर कहा गया कि ना जी, उसका ‘फिजिकल अपीयरेंस’ एयर होस्टेस के लायक नहीं था और दूसरे यह कि उसकी अंग्रेजी अच्छी नहीं थी. खुशी की बात तो यह है कि ऐसा एयरलाइन के साथ साथ देश की व्यवस्था भी कह गई. अंग्रेजी में भसपन नहीं है ना. हो भी तो हमें पता नहीं. वरना सीधे सीधे कहो ना कि छोकरी बदसूरत है.
छम्मकछल्लो जानती है कि हम अपनी पुरानी परम्परा से बहुत प्यार करते हैं. सौंदर्य प्रेम और अंग्रेजी प्रेम उसी परम्परा में आता है. अब वह क्या करे कि उस लडकी पर ख्याल सवाल बन जाता है कि अगर रूप और अंग्रेजी इस नौकरी के लिए इतना ही महत्वपूर्ण है तो उस अकादमी ने उसे अपने यहां प्रशिक्षण देने के लिए भर्ती ही क्यों किया? उसे क्यों नहीं बताया कि बच्ची, तू मन से अच्छी हो सकती है, दिमाग से तेज भी हो सकती है, मगर तेरा रूप रंग इस पेशे के माकूल नहीं है. अकादमी ने अपने प्रशिक्षण के दौरान उसे इतनी अंग्रेजी की ट्रेनिंग क्यों नहीं दी कि वह सामान्य बातचीत अंग्रेजी में कर सकती? क्या यह कहा जा सकता है कि तब अकादमी का शुद्ध उद्देश्य पैसा कमाना होगा? आखिर क्यों रूप और भाषा से मिसफिट एक लडकी को उसमें भर्ती किया गया?
अब जब नौकरी देने की बात आई तब उसके रूप और भाषा का हवाला देते हुए उसे नौकरी नहीं दी गई? क्या एयर होस्टेसों को विमान में भाषण देना होता है? विमान प्रचालन और तकनीकी जानकारी के लिए उसे जो बोलना होता है, वह लिखा होता है, जिसे वह पढ कर सुनाती है. बाकी समय बमुश्किल वह अपने अतिथियों से 4-5 लाइनें बोलती हैं? तो क्या नौकरी देनेवाली एयर लाइन उसे इतने का भी आत्मविश्वास नहीं दे सकता था? लोग कहते हैं कि “संगत से गुन आत है, संगत से गुन जात.” अंग्रेजी की चाशनी में पगी दूसरी एयर होस्टेसों के साथ रह कर वह इतनी अंग्रेजी तो सीख ही लेती. मगर नहीं. इतनी मेहनत कौन करे? इतना परेशान होकर अकादमी या एयर लाइन चलाने के लिए हम थोडे ना बैठे हैं और ना ही समाज सेवा करने के लिए.
अब एक अधिनियम यह पास हो ही जाना चाहिये कि इस देश में जिसे अपनी प्रतिष्ठा से रहना हो, उसे अंग्रेजी हर हाल में आनी चाहिये. लडकियो! तुम्हारे लिए इसके साथ साथ तुम्हारा सुंदर होना भी अनिवार्य है. अगर तुम सुंदर नहीं हो तो तुम्हारा जीना बेकार है. मन से अच्छी हो तो हो, मन दिखता थोडे ना है. हम तन देखते हैं, उसे देखने, छूने, भोगने की लालसा रखते हैं. इसलिए या तो सुंदर बनकर जनमो, या फिर जनमो ही मत. जनम भी गई तो मर जाने के लिए तुम आज़ाद हो. अपनी आज़ादी का प्रयोग करो इस देश की बदसूरत लडकियो!
Monday, December 14, 2009
I will try my level best-का मतलब? कभी नहीं जी कभी नहीं!
छम्मकछल्लो को अंग्रेजी आती नहीं. मगर अंग्रेजी अच्छी बहुत लगती है. अब अंग्रेजी न आने और पसन्द आने के बीच अप कोई तालमेल ना खोजें. हाथ तो चांद भी नहीं आता और हीरे का हार भी. तो इसका यह मतलब तो नहीं कि आप चांद या हार को पसन्द करना बन्द कर दें? आप यक़ीन कीजिए, अंग्रेजी भाषा सचमुच कभी कभी बडी अच्छी लगती है. ऐसे ऐसे शब्द और भाव इसमें हैं कि इनकी कोई काट आपके पास नहीं मिलेगी. जभी तो अंग्रेज हम पर इतने साल राज कर गए और अभी भी अपनी भाषा के बल पर हम पर अमिट राज कर रहे हैं और करते रहेंगे. यह छम्मकछल्लो की भविषवाणी है, जोकभी झूठी साबित नहीं होगी. आप शर्त लगा कर देख लीजिए.
अंग्रेजी बडी शिष्ट और क़ायदेदार ज़बान है. अब देखिए, बडी से बडी गलती करने पर भी आप महज एक शब्द बोल देते हैं "सॉरी" और लोग बाग कायल हो जाते हैं. वे उसके आगे कुछ बोल ही नहीं सकते. आपके सॉरी के बाद भी किसी ने अगर कुछ कहा तो उल्टा लोग उसी का बंटाधार करने लगेंगे कि "अरे भाई, क्यों पीछे पडे हो बिचारे के? बोला न उसने सॉरी. अब क्या चाहिए आपको?"
इसी तरह से एक शब्द है "थैंक यू" अब इसके लिए आप लाख धन्यवाद बोलिए, शुक्रिया कहिए, वह मज़ा नहीं जो थैंक यू में है. इसकी महिमा तो इतनी न्यारी है कि धन्यवाद, शुक्रिया बोलने के बाद भी जबतक लोग थैंक यू नहीं बोलते हैं, तबतक बोलने या शिष्टाचार की प्रक्रिया पूरी नहीं मानी जाती है. आप किसी से भी कभी भी कहें कि आप आ रहे हैं, लोग तपाक से कहेंगे, यू आ' मोस्ट वेलकम". कुछ अच्छा बोल दिया तो फटाक से कहेंगे, "सो नाइस ऑफ यू" छम्मकछल्लो इसकी हिन्दी खोजती रह गई, समझ में ही नहीं आया. अंग्रेजी तो अंग्रेजी, जो थोडी बहुत हिन्दी आती थी, उस पर भी आफत!
छम्मक्छल्लो जब दिल्ली में थी, तब डीटीसी की बस से सफर करती थी. उसकी एक बस के ड्राइवर को थैंक यू शब्द इतना अच्छा लगता था कि वह हमेशा चाहता था कि लोग उसे थैंक यू बोलें. एक लडकी उसे बोलती भी थी. एक दिन वह बोलना भूल गई. उसके बाद तो उसने ऐसी ड्राइविंग की गुस्से में कि लगा कि बस आज बस बस नहीं, विमान बन जाएगी. दूसरे दिन जब वह लडकी चढी, तब पहले तो उसने उससे कोई बात ही नहीं की. लडकी भी अपनी बेख्याली में फिर से उतरने लगी. इस बार उससे रहा नहीं गया. उसने कहा "ओये जी, आज भी बेगर थैंक यू के ही जाओगे?" लडकी मुस्कुरा पडी. उसने थैंक यू बोला. और जी लो, बस फिर से विमान बन गई.
इसी तरह से एक और शब्द है- "I will try my level best." हिन्दी में भी है- "मैं पूरी कोशिश करूंगा या करूंगी" मगर जो मज़ा आता है अंग्रेजी के इस वाक्य में, इतनी मासूमियत, इतनी गंभीरता, इतनी सिंसियेरिटी के साथ कि कोई समझ ही नहीं पाता है कि कहनेवाला आपको कितना उल्लू बना रहा है. छम्मक्छल्लो ने यह अक्सर देखा है कि जब भी कोई यह लाइन बोलता है, समझिए कि उसकी नीयत में खोट है. वह आने के मूड या मन में नहीं है. कभी आजमाकर देख लीजिए.
इसलिए आप मेहरबानी से उस शख्स की बात का कभी भी यकीन ना करें. उसके लिए अगर आप कोई इंतज़ामात करनेवाले हों तो वह कभी न करें, क्योंकि वह शर्तिया कभी भी आपकी तरफ का रुख नहीं करेगा. आनेवाला रहेगा तो वह एक्दम कहेगा तपाक से कि वह आएगा ही आएगा. खुदा ना खास्ता नहीं पहुंच पाएगा तो आपको इत्तला कर देगा. ख़बर नहीं कर पाया, उस समय तो बाद में बताएगा. माफी मांगेगा. आप कभी उसकी शिकायत भी न करें, क्योंकि जब भी आप दुबारे उससे मिलेंगे और उससे न आने की बात पूछेंगे, वह अगला पिछला कुछ नया बहाना बनाएगा, खोजेगा, उसे आप पर चस्पां करेगा और निकल जाएगा. तो क्यों आप उसकी और अपनी मिट्टी पलीद करते करवाते हैं. उसे झूठ पर झूठ बोलने पर मज़बूर करते हैं.
आपको अगर उसकी मिट्टी पलीद करनी ही है तो उससे सचमुच कुछ मत पूछिए. बन्दा समझदार होगा तो आपकी खामोशी उसे बहुत भारी पडेगी और वह आपको खुद ब खुद अपनी सफाई दे देगा. अब उसका सच या झूठ उसका अपना सच या झूठ होगा. छम्मक्छल्लो के एक नाट्य पाठ में यहां की एक बहुत नामचीन लेखक पूरा पूरा वादा करने के बाद भी नहीं आईं. छम्मक्छल्लो के नाट्य पाठ के बादवाले कार्यक्रम में वे दिखीं. पहले तो वे बडी बोल्ड सी बनी छम्मक्छल्लो के आसपास घूमती रहीं. उससे ही चाय मांगकर पी, पीकर अपना अपनापा दिखाती रहीं. कार्यक्रम के बाद कार्यक्रम की गुणवत्ता पर चर्चा करती रहीं. छम्मक्छल्लो भी उनके साथ पूरे अपनापे व आदर के साथ पेश आती रहीं. वे शायद यह अपेक्षा कर रही थीं कि छम्मक्छल्लो उनसे अपने कार्यक्रम में ना आने की शिकायत करे तो वे कुछ बोलें. उन्होंने तो यह भी नहीं कहा था कि I will try my level best बल्कि एक रात पहले कहा था कि मिलते हैं कल सुबह, तुम्हारे कार्यक्रम में. बाद में वे खुद ही कहने लगीं कि वे तो छम्मक्छल्लो का नाटक पढ सुन देख चुकी थीं. छम्मक्छल्लो ने बस विनम्रता से जवाब दिया कि यह नाटक न तो अभी तक कहीं छपा है, न पढा गया है और ना ही मुंबई में खेला गया है.
तो बस, कल्पना कीजिए और साथ में यह मानकर चलिए कि कोई कह रहा है कि "I will try my level best." तो बस उसे मान लीजिए, चाहें तो हल्के से मुस्कुरा भर दीजिए. बोलनेवाले को पूरा यकीन दिलाइये कि उसे आपकी कोशिश पर पूरा भरोसा है और उसे भूल जाइये, जैसे वह यह कहकर भूल जाता है.- इस रूप में कि उसकी यह कोशिश कभी भी सफल नहीं होगी, क्योंकि उसके लिए वह न तो नौ मन तेल का जुगाड करेगा और न अपने मन की राधा को नाचने के लिए अर्थात उसे आपके पास आने के लिए कहेगा. यह मन का वह दर्पण है, जिसमें वह झलकता है, जो नहीं है, और वह नहीं दिखता है, जो वह है.
