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Saturday, October 6, 2012

विचारों के चरित्र पर वीर्य का शीलहरण!

      शास्त्रों में दान की बड़ी महिमा है- स्वर्णदान, जीवनदान, गुप्तदान, कन्यादान से लेकर देह और अस्थिदान तक। अस्थिदान से ऋषि दधीचि महान बन गए और शूरवीर कर्ण दानवीर कहलाने लगे। शास्त्रों की दान- महिमा को मेडिकल साइंस ने भी तरह –तरह से  गाया- नेत्रदान, रक्तदान, गुर्दादान, देहदान। भाई लोगों की नज़र में ये सभी दान महाधर्म और महाकर्म हैं, मानवीयता के क्षेत्र में एक महान कार्य! लेकिन एक दान पर आते ही भाई लोग नैतिकता के भंवर में डोलने लगे। दान-धर्म पर फिल्में भी बनती रही हैं। लेकिन ये फिल्ल्मवाले भी ना! हरदम विषय के भुक्खड़! हर समय सबजेक्ट का टोटा। दान-धर्म पर दर्द का रिश्ता से लेकर आनंद और जय संतोषी माता तक। टीवी तो बताकर ही रहेगा कि भारत का धर्म कितना महान है।
      तो लीजिये, इससे क्या हो गया? पागल फिल्ल्मवाले! उसी पागलपन में बना डाली- विकी डोनर। हिंदुस्तान में धर्म, सिनेमा, देह, रज और वीर्य जैसे विषयों पर सभी भाइयों की सरस्वती चरम जाग्रत हो जाती है। ऊपर लिखे सभी दान- महादान! मगर वीर्यदान- अनैतिक, महापाप। भूल जाइए अपने शास्त्रों की तथाकथित नियोग पद्धति। उससे उत्पन्न अपने महान मिथकीय चरित्र- महामुनि वेदव्यास से लेकर धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर तक। पसीने से वीर्य तक की वीर यात्रा और उस वीर्य से मीन तक के गर्भ धारण की बात। धर्म में केवल भाव होता है, तर्क नहीं। छम्मकछल्लो भी कहाँ तर्क कर रही है। वह तो यही कह रही है कि जो धर्म इतने साल पहले इन सबका प्रयोग कर इन्हें तार्किक, उन्नत और आधुनिक बना गया, उसी को लेकर भाई लोग इतने संकुचित क्यों?
      विकी डोनर के वीर्यदान से सभी की नैतिकता छनछनाने लगी। मरदवादी अहं ठाठ मारने लगा। ज़ोर दे-देकर लिखा जाने लगा- सोचिए, आपकी आँखों के सामने आपकी बीबी किसी गैर मर्द का वीर्य अपने पेट में लेकर घूमती रहेगी और आप उसे लेकर डॉक्टरों के चक्कर लगा रहे होंगे। उसकी इच्छा-अनिच्छा का ख्याल रख रहे होंगे। माने, आप एक ऐसे बच्चे के महज केयरटेकर हैं, जो दूसरे का है। वह बच्चा जनम लेकर जीवन भर आपकी छाती पर मूंग दलता रहेगा। आप उसे अपना बच्चा कहने पर मजबूर होते रहेंगे। बोलिए, कैसे बर्दाश्त करेंगे आप?”
      सचमुच जी, कैसे बर्दाश्त करेंगे हम? बच्चा तो केवल मर्द का ही होता है। औरत की तो कोई भूमिका होती ही नही। वह तो महज केयरटेकर है, अपने मर्द के वीर्य की। वह उसे नौ महीने तक पेट में पाले, फिर उसे जनम देकर जीवन भर उसकी देखरेख करती रहे। बदले में कभी कुछ बुरा हो तो सुनती भी रहे- कैसी माँ हो?” बस जी, इसके आगे कुछ नहीं। बीबी के बदन में दूसरे का रक्त या गुर्दा या नेत्र हो, कोई बात नही। मगर उसकी कोख में किसी दूसरे का वीर्य- पापं शान्तम!  
      भाई साहब ने लगे हाथो समाधान भी दे दिया- “मर्द अगर बंजर है और औरत उर्वर तो औरत बंजर मर्द को तलाक देकर उर्वर मर्द से ब्याह रचा ले।“
      छम्मकछल्लो वारी-वारी गई इतनी महान सोच पर। आखिर औरत को इतनी आज़ादी दे दी कि वह भी मर्द की तरह तुरंत ऐलान कर दे कि देख लो जी, तुम तो ठहरे बंजर। सो ये लो, मैं तो चली उर्वर की तलाश में। भाड़ में जाए शास्त्र-वास्त्र का कहना कि पति-पत्नी का संबंध जन्म-जन्मांतर का होता है। वे एक-दूसरे के सुख-दुख के अनंत साझीदार हैं। ना जी। भाई साहब की बात से तो छम्मकछल्लो की ज़ात कमोडिटी में तब्दील हो गई- जबतक फायदे का सौदा है, साथ रहो, भोगो। बच्चे जन या जनवा सकते हो तो जनो या जनवाओ, वरना भैया! नही, ओ बहना! अपना रास्ता नापो।“
      कूढ़मगज छम्मकछल्लो की समझ में ही नही आता कि क्या पत्नी अपने पति को इस बिना पर छोड़ दे कि उससे उसके बच्चा नहीं हो रहा? वह उसके प्रेम को बच्चे की तराजू पर तोलकर उसे वजन में कम पाकर छोड़ दे? उसकी बायालोजिकल अक्षमता का सिला पति-पत्नी के रिश्ते को खतम करके दे? फिर तो ऐसे हर माँ-बाप को भी खतम कर दिया जाना चाहिए, जो दूसरे के बच्चों को गोद लेते हैं। ऐसी हर माँ को निकाल दिया जाना चाहिए, जो अपने पति या यूं कह लें कि अपनी सौत की संतान को अपना मानकर उसपर अपना प्रेम लुटाती है। भाई साहब! ऐसी औरतों को भी नसीहत दें कि तुम्हारी आँखों के सामने तुम्हारी कोख के जाए का हक़ तुम्हारी सौत की औलाद हड़प रही है। लेकिन, वे नहीं कहेंगे। यह औरत-मर्द और उनकी मरदवादी सोच का फर्क है, जिसमें औरत महज एक सामान है। घर देखने के लिए भी और गर्भ धारण के लिए भी। औरत महज एक देह है, जिसपर केवल उसके अपने मर्द का ही हक़ है। वह माँ बनना चाहती है, तो पहले अपने पति को छोड़े, चाहे वह पति उससे कितना भी प्रेम क्यों ना करता हो? आखिर, कोई तो ऐसी वजह बताएं, जिससे यह तर्क छम्मकछल्लो के गले उतर सके कि ऊपर लिखे सभी दान नैतिक और धार्मिक हैं और वीर्यदान अनैतिक, अधर्म? माँ -बाप बनने की चाहत पर ऐसी नपुंसक सोच?

2 comments:

Anonymous said...

vibha jee apka vaicharik manthan,aur is mauju per aapke bebak rai aj pure samaj ke liye vicharneey jwalant prashna hain...kab tak hum mariyadwo kee duhayee dekar is jung lagee dakiyanusee sonch ko panah dete rahenge,jub ang dan se jan bachana dharm ka aur puny ka kam ho sakta .kisee bhee narii jo kinhee mazburi ke chalte maritav sukh nahi prapt kar paa rahi yadi wah virydan se maa ka sukh prapt ker le to yeh nischit taur pr samaj ke liye ek sukhad sthiti hogee....aapka abhar aapne is vishay per ek bahas chhedii.

tajmallahan.blogspot.com said...

vibha jee apka vaicharik manthan,aur is mauju per aapke bebak rai aj pure samaj ke liye vicharneey jwalant prashna hain...kab tak hum mariyadwo kee duhayee dekar is jung lagee dakiyanusee sonch ko panah dete rahenge,jub ang dan se jan bachana dharm ka aur puny ka kam ho sakta .kisee bhee narii jo kinhee mazburi ke chalte maritav sukh nahi prapt kar paa rahi yadi wah virydan se maa ka sukh prapt ker le to yeh nischit taur pr samaj ke liye ek sukhad sthiti hogee....aapka abhar aapne is vishay per ek bahas chhedii.