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Wednesday, November 17, 2010

सलाह का मुफतिया बाज़ार!

हम आपको सलाह देने आए हैं- मुफ्त के, मानिए. मानने के बडे फायदे हैं. सबसे बडा तो यही कि तब आप भी ऐसे मुफतिया सलाह देने के हक़दार बन जाएंगे. आज के जमाने में जब लोग मुफत में बदन की मैल भी नहीं देते, ऐसे में सलाह! वह भी अपने दिमाग से निकाल कर! एकदम ओरिजिनल!!. अच्छा है कि सलाह पर अमेरिका का पेटेंट नहीं हुआ है. हर अव्वल चीज अपने यहां की अमेरिका ले जाता है. अब एक नौकरी थी, जिसके लालच में हम अपने बच्चों को पैदा होने से पहले ही अंग्रेजी पढाने लगे थे, उसे भी ओबामा आ कर चट कर गए. अपने गोरे लोगों के लिए काम खोजने यहां आए थे. हे भगवान! ये दुर्दिन! भला बताइये? इतने सुकुमार ये गोरे लोग? हम कालों के आगे टिक सकते हैं क्या? और हमारा? जिस अंग्रेजा उअर अंग्रेजी के हम गुन गाते न थकते हैं, अब उसे पढ कर भी हमारे नौनिहाल उनके यहां भागे भागे नहीं जा सकेंगे. कहीं ओबामा को स्वदेश और स्वदेशी की धुन तो नहीं लग गई? वैसे भी ये गांधीके बडे प्रशंसक हैं.
पर बात मुफ्त सलाह की है. दीजिए. सर दर्द है तो सर तोडने की सलाह दीजिए, गले में दर्द है तो गला दबाने की सलाह दीजिए. बुखार है तो सुई लगवाने की सलाह से लेकर हर उसकी सलाह दीजिए, जिसकी सलाहियत आपके पास हो या ना हो. आखिर सलाह देना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और इसके लिए आप हमें रोक नहीं सकते. नई नई तकनीक है. ठीक है कि अपन कूढ मगज बुड्ढे लोग हैं तो इसका यह मतलब थोडे ना है कि सलाह देने से बाज आ जाएं? आखिर को आज के नए बच्चों से उम्र में बडे हैं. उम्र से बडे हैं तो अनुभव में भी बडे हैं. इसलिए सलाह देना हमारा मौरूसी हक़ बनता है.
अब आप छम्मकछल्लो से सलाह मांग रहे हैं? देने के बदले लेना चाहते हैं? तो भैया, अपनी चिंदी जैसी बुद्धि में यही सलाह आती है कि बिन मांगे मोती मिले, मांगे मिले ना भीख की तरह बिन मांगे सलाह देना मत शुरु कीजिए.
मगर सलाह पर हम चलने ही लगे तो हम, हम क्या हुए? ये देखिए उन साहब को. उनके पेट में मरोडें उठ रही हैं. और इधर अपन के भी कि जल्दी से उनको सलाह का एक तगडा काढा पिला आएं. फिर वे उलटें, पलटें, अस्पताल भागें, उनकी बला से. अपन ने तो सलाह की तोप दाग दी किसी भारी विजेता की तरह और जीते हुए योद्धा की तरह मुस्कुरा भी रहे हैं. आप भी तनिक मुस्कुरा दीजिए. हमारे पास इसके लिए भी सलाह है. खूब-खूब है-
                                        सलाह नाम की लूट है, लूट सके सो लूट
                                        अंत काल पछताएगा, जब प्राण जाएंगे छूट!
छम्मकछल्लो अपने प्राण गंवाना नहीं चाहती. वह संत है. सलाह लेना भी नहीं चाहती, बस दानी भाव से देना चाहती है. चाहिए तो बोलिए.
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