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Wednesday, April 21, 2010

मि जिन्‍ना : मंच पर एक राजनीतिक त्रासदी

http://mohallalive.com/2010/04/21/a-criticism-on-mr-zinna/

इतिहास से उठाकर जिन्ना को देखिए – एक बाप के रूप में, एक पति के रूप में, एक भाई के रूप में और इन सबसे ऊपर एक व्यक्ति के रूप में। व्यक्ति की अपनी अभिलाषा जब लोकहित को लांघ जती है, तब जिन्ना जैसे व्यक्तित्व का उदय होता है और तब देश को, उपनिवेश को, विश्व को विभाजन, दंगे, हत्या, लूटपाट जैसी मानव निर्मित त्रासदी से गुजरना पड़ता है। हिंदुस्तान-पाकिस्तान आज जिन्ना जैसे लोगों की जिद का नतीजा है और आज पूरा विश्व इसकी त्रासदी को झेलने को मजबूर है।

एक ही व्यक्ति पर पूरे हालात का ठीकरा फोड़नेवाली मानसिकता में इस पर भी गौर किये जाने की जरूरत है कि क्यों एक व्यक्ति अपनी उदारता और तरक्कीपसंद बातें छोड़ कर इतना कट्टर हो जाता है कि उसके आगे कोई राह ही नहीं बच पाती है। सामने बन रही तस्वीर के पीछे हालात और लोगों के कौन कौन से रंग भरे जा रहे हैं, इन पर अब नये सिरे से विचार किये जाने की जरूरत है।

शायद इन्हीं सबको ध्यान में रखकर डॉ नरेंद्र मोहन ने “मि जिन्ना” नाटक लिखा। इसमें जिन्ना की जिद के साथ साथ उसके व्यक्तित्व के अलग और अनछुए पहलुओं को देखने की कोशिश की गयी है। बताया गया है कि कांग्रेस के हठ ने किस तरह से गांधी को भी अलग-थलग कर दिया। नागपुर अधिवेशन में मिले अपमान की आग में जलते हुए जिन्ना जिद्दी बने तो उस जिद की ज्वाला में तत्कालीन दूसरे नेताओं ने आग में घी का काम किया और वे सब भी अपनी अपनी महत्वाकांक्षा की आग में जलते हुए देश को ही सांप्रदायिकता और अब कभी न खत्म होनेवाली नफरत की आग में झोंक दिया।

“मि जिन्ना” का मंचन दिल्ली के अस्मिता थिएटर द्वारा किया जानेवाला था, मगर ऐन वक्‍त पर इस पर बैन लग गया। नाटक चर्चित हो गया। बैन के ये अपने फायदे हैं। अभिव्यक्ति के खतरों पर फिर से बहसें शुरू हुईं और उसके बाद सब कुछ शांत पड़ गया। मगर 2007 में हिंदी थिएटर के सुप्रसिद्ध निर्देशक आरएस विकल ने इस नाटक में सम्भावित तमाम खतरों को जानते हुए भी इसके मंचन की सोची और “विराट कलोद्भव” के बैनर से इसे मुंबई में मंचित किया। तीन-चार प्रायोगिक मंचन के बाद फरवरी, 2008 में मुंबई के कालाघोड़ा फेस्टिवल में इस नाटक की शानदार प्रस्तुति हुई। इसके बाद एकाध और प्रस्तुति के बाद अभी विगत 4 अप्रैल, 2010 को इंदौर के सामाजिक मंच “सूत्रधार” के सौजन्य से यहां के माई मंगेशकर हॉल में ‘मि जिन्ना’ के दो शो हुए।

हम आपको बता दें कि मि जिन्ना न तो राजनैतिक नाटक है, न ऐतिहासिक। यह उस व्यक्ति के मनोविज्ञान को गहराई से समझने का प्रयास है, जिसने अपने वक्‍त में इस भारतीय महाद्वीप को हिला कर रख दिया था। जिन्ना न तो नायक थे और न ही खलनायक, बल्कि वे ऐसी शख्‍सीयत थे, जो अपने ही विचारों के शिकार बनते चले गये।

अपने प्रायोगिक मंचन के लिए प्रसिद्ध आरएस विकल ने तरह तरह के बिंब के जरिये इस नाटक को अदभुत रूप देने का सफल प्रयास किया। बिना किसी विशेष मंचीय तामझाम, वेश-भूषा और संगीत के यह नाटक अपने बिंबों के माध्यम से अपनी बात कहने में सफल रहा। 110 मिनट के नाटक में उन सभी पहलुओं को सामने लाने की कोशिश की गयी, जिसके कारण विभाजन और फिर दंगे हुए। नाटक का जोर सेट अप और गेट अप पर बिल्कुल ही नहीं था, यह कहना गलत होगा। दरअसल एक नये प्रयोग के कारण नाटक को ऐसा फॉर्म दिया गया था, जिसमें कलाकार का काम, उसके संवाद, उसकी पोशाक, उसके हाव-भाव एक डिजाइन के रूप में सामने आएं और अपनी बात असरदायक तरीके से कह जाएं।

इसका एक प्रमुख निर्देशकीय कथ्य यह भी रहा कि हम कैसे एक व्यक्ति को अपना सब कुछ मानकर उसके हाथों में अपने जीवन की बागडोर थमा देते हैं और उसके हाथ की कठपुतली बनने को विवश हो जाते हैं। मूर्तिपूजा का यह रूप आज तो और भी भयंकर रूप में चल पड़ा है। नायक, महानायक का चोला पहिना देनेवाला समाज खुद ही यह नहीं समझ पाता है कि कैसे अब इस मकड़जाल से बाहर आया जाए। नाटक में छतरी का अनूठा प्रयोग किया गया। गांधी को सफेद और फातिमा को हरी और जमशेद को लाल छतरी देकर उसे नये प्रतीक में बांधने की कोशिश की गयी।

बावजूद इसके, इस नाटक की अपनी सीमाएं रहीं, जो इसकी लेखकीय सीमाओं के साथ जुड़ता है। इतिहास गांध, जिन्ना, नेहरु, पटेल और जिन्ना की बेटी दीना को भी जानता है, इसलिए उनके चरित्रों को समझने में उन्हें आसानी हुई। मगर नाटक के दो प्रमुख किरदार – जिन्ना की बहन फातिमा और जिन्ना के दोस्त जमशेद के साथ दर्शक संबंध स्थापित नहीं कर पाते हैं। बहुत कम लोगों को शायद मालूम हो कि फातिमा की अपनी ख्वाहिश एक इस्लामिक स्टेट बनाने की रही और इसके लिए उसने जिन्ना का इस्तेमाल किया। यहां तक कि उसके लिए उसने जमशेद का भी त्याग कर दिया। मगर नाटक में फातिमा को एक नाराज, गुस्सैल, तुनकमिजाज, ईर्ष्यालु, कुटनी महिला के इतने नकारात्मक किरदार में दिखाया गया है कि बालाजी के सीरियल्स याद आने लगते हैं। लगता ही नहीं कि वह महिला इतनी कंपोज्ड रही होगी कि उसने एक देश के भीतर एक दूसरा देश बनवा दिया। वह भी एक कौम विशेष की खातिर। चूंकि इतिहास में भी फातिमा पर बहुत अधिक नहीं मिलता, नाटक में उसके स्वरूप का कुछ खुलासा ही नहीं हो पाता। जमशेद, जिससे फातिमा प्रेम करती है, उसके प्रति भी वह सहज नहीं है और केवल उसके बल पर आगे बढ़ने के ख्‍वाब देखती है। उससे पेंटिंग के मार्फत की जानेवाली और की जा सकनेवाली कमाई की बात पूछती है। सवाल यह है कि अगर उसका चरित्र इतना नकारात्मक है, तो उसे इस नाटक में जगह देने की जरूरत ही क्यों है, जबकि यह भी खुलासा नहीं हो पाता है कि वह पाकिस्तान बनवाने के लिए कितनी मरी जा रही थी?

यही स्थिति जमशेद के साथ है। जिन्ना का वह जिगरी दोस्त, जिसके लिए जिन्ना पाकिस्तान बन जाने के बाद आर्ट, कल्चर सेंटर खुलवा देने की बात करता है, दर्शकों के साथ एक अभिनेता के रूप में तो पहचान लिया जाता है, मगर जमशेद के रूप में अपना संवाद स्थापित नहीं करवा पाता। नतीजन, दर्शक जमशेद या फातिमा के चरित्र को याद ही नहीं रख पाते। यह ऐतिहासिक रचनाओं की अपनी सीमाएं होती हैं, जिनमें दर्शक या पाठक परिचित चेहरे ही पहचान पाते हैं।

फिर भी यह नाटक दर्शकों में एक उत्सुकता पैदा करता है और उस समय के भारतीय नेताओं को कठघरे में ला खड़ा करता है। अब वह वक्‍त आ गया है, जब इतिहास के इन भयंकरतम भूलों को लोग फिर से देखें, समझें और अपने पूर्वग्रह से मुक्त हो कर नये सिरे से इस पर चर्चा करें और धर्म और मजहब, जात-पात से ऊपर उठकर प्रेम और सौहार्द्र की बोली भाषा समझे।

नाटक का जो डिजाइन था, उसमें इसके सभी पात्र एक सम भाव से, पूरे समन्वय के साथ इस नाटक के साथ जुटे रहे। अपने किरदार की वजह से जिन्ना के रूप में हर्ष प्रसाद, गांधी के रूप में सतीश ठाकुर और दीना के रूप में श्रुति वैद्य दर्शकों का ध्यान खींच सके। सबसे अधिक सराहना मिली बदरु का चरित्र निभा रहे सुबोध श्रीवास्तव को, जो एक आम आदमी के रूप में इस तरह की तमाम ज्यादतियों का शिकार होता है।
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