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Saturday, August 22, 2009

हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे

तो अब बारी है प्रभाष जोशी की. लोग कह रहे हैं कि वे ब्राहमण्वाद पर पिल गये हैं. क्यों भई, आपलोगों को नहीं पता कि इस हिन्दुस्तान से ज़ातिवाद नहीं जानेवाला. और इसके पहरुए वे ही होते हैं जो ऊपर से धर्म- निरपेक्षता के बडे-बडे दावे करते हैं मगर बेटी की शादी की बात आने पर कट्टर हिन्दू बन जाते हैं.
छ्ammakछ्allo ko समझ नहीं आता कि ऐसे लोगों पर बहस चला कर हम क्यों अपना और दूसरों का समय ज़ाया करते हैं?
सुना है कि इश्क़ में लोगों की चर्चाएं बडी होती हैं. यह भी कहा जाता है कि इश्क़िया माहौल बडा सूफियाना होता है और इश्क़ की लौ जब ख़ुदा से लग जाए तब इश्क़ आध्यात्मिक हो जाता है.
हमारे समाज में सेलेब्रेटी के नाम से जो एक कौम उभरी है, वे इसी इश्क़ की गिरफ्त में हैं. समाज का यह सेलेब्रेटी पहले फिल्म उद्योग से निकल कर आता था. मगर अब समाज का दायरा बढा है तो हर क्षेत्र का भी दायरा बढा है. लोग अब प्रसिद्धि को सेलेब्रेशन की संग्या देते हैं और प्रसिद्ध को सेलेब्रेटी कहते हैं.
तो अब समाज सेलेब्रेटी का है, जो जितना ज़्यादा मशहूर, वह उतना ही बडा सेलेब्रेटी. लेखक, पत्रकार सभी सेलेब्रेटी हैं. सेलेब्रेटी की सबसे बडी ख़ासियत यह होती है कि वह हमेशा ख़बरों में बने रहना चाहता है और ख़बरों में बने रहने के लिए वह कोई भी चाल चलता रहता है. हम जैसे पागल और सनकी लोग उन्हें अपनी ख़बरों में लेने को आतुर बने रहते हैं. शायद अपने सेलेब्रेटी न बन पाने की खाज इसी बहाने खुजला लेना चाहते हैं.
प्रभाष जोशी आज सती प्रथा के पक्ष में बोल रहे हैं तो कोई गलत बोल रहे हैं क्या? लोग तो मूड और मिजाज की तरह पल-पल अपने वक्तव्य बदलते रहते हैं. मगर आपको दाद देनी चाहिये कि उम्र, अनुभव, प्रसिद्धि के इस पडाव पर भी वे अपनी बात भूले नही हैं और न ही अपने वक्तव्य बदले ही हैं. आप सबको याद होगा ही कि रूप कुंअर के सती होने पर इन्हीं प्रभाष जोशी ने इसका समर्थन किया था. तब ये शायद जनसत्ता के सम्पादक थे. बडी मात्रा में लोगों ने उनकी इस बात का विरोध किया था. एक्सप्रेस कार्यालय के सामने उनके ख़िलाफ नारे लगाए थे, नुक्कड नाटक खेले थे. अब इतने बरसों बाद भी अगर वे सती प्रथा के समर्थन में बोलते हैं तो आपको तो खुश होना चाहिये कि वे अपनी बात भूले नहीं हैं. उम्र के इस मोड पर भी, जब लोग इस उम्रवाले को बुड्ढा, कूढ मगज और जाने क्या-क्या कहने लगते हैं. क्या आपको नहीं लगता कि प्रभाष जोशी अब उम्र के इसी मुकाम पर पहुंच गये हैं जहां तिष्यरक्षिता के बूढे सम्राट अशोक की नाईं उनके प्रति सहानुभूति ही जताई जा सकती है.
सरकार भी साठ साल की उम्र के बाद लोगों को सेवा से निवृत्त कर देती है. मगर हम हैं कि प्रभाष जोशी जैसे लोगों की उम्र पर रहम ही नहीं करना चाहते हैं. क्या हिन्दी साहित्य और पत्रकारिता में नये लोग आज के आइकन बनने की कूवत नहीं रखते या हमारे भीतर ही इतनी भी अक्ल नहीं है कि ऐसे लोगों की बातों को एक बूढे का प्रलाप मान कर उसे या तो उपेक्षित कर दें या उसे भूल जायें. याद रखें कि ये सब सेलेब्रेटी हैं और इन्हें अपने को ख़बर में बनाए रखना आता है और इसके लिए ये हर चाल चलेंगे ही चलेंगे. हम क्यों ऐसे शिकारियों के जाल में फंसते हैं यह रटते हुए कि "शिकारी आयेगा, जाल बिछयेगा, दाना डालेगा, लोभ से उसमें फंसना नहीं."
प्रभाष जोशी जी सीता को सती बना गये. अपने देश की हर महान नारी सती ही होती है, भले ही वह पति द्वारा लगाई गई आग में जले या ना जले. सती तो कुंती भी रही जिसने पति की आग्या से अन्य पुरुषों के साथ संसर्ग करके अपने पति को अपने बच्चों का पिता बनाया. सती तो द्रौपदी भी हुई, जिसे एक को चाहने के एवज में पांच-पांच पतियों की पत्नी बनना पडा. आज का समय होता तो शायद कह दिया जाता कि "अरे वाह! एक पर चार फ्री?" सती तो भारती मिश्र भी हुई, जिसने पराजित होते अपने पति मँडन मिश्र के बदले शंकराचार्य से शास्त्रार्थ कर के पति को जिता दिया था और सती तो भंवरी देवी भी है, जो समाज के कल्याण की खातिर जाने कितनों की वासना के दंश झेल आई. मगर हमारा समाज सती इसे नहीं मानता. वह सती उसे मानता है, जो अपने मृत पति की चिता में रूप कुंअर की तरह जीवित जल जाती या जला दी जाती है. तो प्रभाष जोशी जी से पहले पूछें कि जब से वे वयस्क हुए हैं, तब से उनके घर में कोई तो विधवा हुई होगी? तो सती प्रथा के समर्थक के रूप में क्या उसे उन्होंने समाज की मान्यता के अनुसार सती बनाया, क्योंकि कहा भी गया है- "चैरिटी बिगिंस एट होम." ऊपरवाला प्रभाष जोशी जी को लम्बी उम्र दें, मगर फिर भी एक बार यह सोचने में आ जाता है कि उनके न रहने पर (धृष्टता के लिए माफी) वे यह वसीयत करके जायेंगे कि उनकी पत्नी उनके साथ सती हो जायें? या क्या वे यह गारंटी दे सकते हैं कि उनकी धर्म पत्नी उनकी इस वसीयत को पूरा-पूरा सम्मान देते हुए सती हो ही जायेंगी या उनके घरवाले उन्हें ऐसा कर ही लेने देंगे? प्रभाष जोशी जी की मति भ्रष्ट हो जाने से क्या उनके पूरे परिवार का माथा फिर जाएगा? नहीं ना. तो फिर उनकी भ्रष्ट मति पर आप क्यों माथा पीट रहे हैं?

7 comments:

Amrit Kumar Sharma said...

vyang accha hae, man ko bhaya hae,
likhte rahiyega, smaaj ki seva karte rahiyega,
you are also requested to see my blog:-
www.kumarsain.blogspot.com

परमजीत सिहँ बाली said...

sahi likha hai....yah baat sahI hai ki khabaro me bane rahane ke lie kuchh bhi kara sakate hai yah log.

aarya said...

विभा जी
सादर वन्दे
माफ़ करें लेकिन दूसरों को समझाते-समझाते आप भी उसी राह पर चल दीं, यही होता है सेलिब्रिटी ,
रत्नेश त्रिपाठी

दर्पण साह said...

आपलोगों को नहीं पता कि इस हिन्दुस्तान से ज़ातिवाद नहीं जानेवाला.

hindustaan??
sir ji poore vishw ki halat yahi hai.

bus naam badal gaya hai...
(racism !! castism ....)

naam kewal bharat ka hi kyun kharab karna?

Riya Sharma said...

Read about this in Hindi newspaper ..like the blog ..

Congrates !!!
N keep writing !!

स्वप्न मञ्जूषा said...

विभा जी,
इसको कहते हैं 'भीगा कर मारना', अरे इ महाशय कौन जुग में जी रहे हैं भाई ?
बहुत बढ़िया लिखी हैं आप..
हम तो आज पहिली बार आये हैं और खुस होकर जा रहे हैं ...
बस ऐसे ही लठियाते रहिये और का....

Arun Sinha said...

sati ko mahimamandit karke kai log apni dukaan chala rahein hain madam . is liye dar hai ki kahin aapki aawaaz nakkarkhane mein tooti ki awaz na ban kar reh jaaey.isliye meri maniye to apani awaz ko aur sashakt kijiey.mandir ki devi ki pooja aur ghar ki devi ki pratarrna? purushsatta ke khilaf ladai apne ghar se shuroo kijiey. aaj hi se.