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Thursday, August 6, 2009

सब व्यवस्था ही करेगी, हम कुछ नहीं

छम्मक्छल्लो राम-राज्य की कल्पना में डूबी हुई है. वही नहीं, इस देश की सभी जनता. जनता समझती है कि हमने एक बार अपने प्रतिनिधि को चुन लिया, चुन कर उन्हें सरकार बनाने को भेज् दिया, बस जी, हमारी जिम्मेदारी हो गई ख़त्म. अब सारा का सारा काम जो है, वो सरकार को करना है, सरकार द्वारा बनाई गई व्यवस्था को करना है. और अगर व्यव्स्था को दुरुस्त करने में सरकार कानून बनाए, आपसे सहयोग मांगे तो लो जी कर लो बात.
अब देखिए न, इस देश में हम सभी पढे -लिखे हैं, मगर नागरिक सभ्यता के नाम पर हम किसी भी अनपढ- जाहिल से कम नही हैं. सडक पर थूकना हो या कचरा फेकना हो, हम बेहिचक उसे फेक देते हैं, चाहे हम मंहगी से मंहगी कार के मालिक क्यों ना हों. अब सफाई करने का काम तो मुंसीपाल्टी का है ना भैया. आखिर को हम उन्हें पगार किस बात की देते हैं. यह हमारे कर्तव्य में थोडे न आता है कि हम अपने स्थान को साफ कर के रखें. वैसे, कुत्ता भी अपने बैठने की जगह को अपनी पूंछ से साफ कर के तब बैठता है.
आजकल मुंबई में स्वच्छ मुंबई, हरित मुंबई का नारा बडे जोरो पर है. एनजीओ, प्रशासन सभी शहर को साफ रखने, कचरा जहां-तहां ना फेंकने के लिए अपील पर अपील, विग्यापन पर विग्यापन दे रहे हैं. मगर हम अपनी धुन के पक्के लोग. हमारा बडप्पन ही क्या जो हम उनकी अपील मान लें. अब जी, वे सब् बेचारे जुर्माने की व्यवथा पर उतर आये हैं.
दोपहिया वाहन् चलाते समय हेल्मेट लगाना या कार चलाते समय सीट बेल्ट बांधना हमारी सुरक्षा के लिए है. पर ना जी, हम इन सब चोंचलों में क्यों पडें. जब व्यवस्था सख्रती करेगी, तब देखी जायेगी. और जब फिर से जुर्माने की बात आई, तब लोग इसका पालन करने लगे. तुलसी बाबा ऐसे ही थोडे ना कह गये हैं कि "बिनु भय होहि न प्रीति". पर अभी भी होता यह है कि शहर की सीमा, जहां पुलिस का ख़तरा रहता है, हम सीट बेल्ट बान्धे राखते हैं, जैसे ही उस सीमा से दूर गये, सीट बेल्ट यूं उतार फेंकते हैं, जैसे किसी ने सांप गले में लटका दिया हो. बहुत पहले एक धर्म ने तो मोर्चा ही निकाल दिया कि हेल्मेट पहनना हमारे धर्म के खिलाफ है. कोई धर्म के इन नुमाइन्दों से पूछे कि भाई साहब, दुर्घटना क्या आपके धर्म के हिसाब से होगी? वह कहेगी कि नहीं जी, यह अमुक धर्मवाले हैं, जिनके यहां हेल्मेट पहनना धर्मानुकूल नही है, इसलिये यहां मत आओ. जाओ, कहीं और जा कर बसो.
सार्वजनिक स्थल पर बात करनी हो, तो हमारे भाई-बहन इतनी जोर-जोर से बातें करेंगे, जैसे सभी के सभी बहरे हों. बस-ट्रेन में चलना-बैठना हो, तो सीट का अधिक से अधिक हिस्सा अपने लिये कब्जा कर लेना हमारी फितरत में होता है.
और, हम लडकियों पर तो हमारे भाई लोग इतने मेहरबान होते हैं कि उन्हें अपनी जागीर ही समझने लगते हैं. वे आपसे प्रेम करने का दम्भ भरें और आप् ना करें तो तुरंत रिंकू पाटील हत्याकांड होते देर नहीं लगती है. कोई बस मेँ अपनी राह चली जा रही हो और कंडक्टर उसे छेडे तो मनीषा जैसी लडकी उसका मुकाबला ना करे. ट्रेन में कोई गर्दुल्ला किसी की पर्स छीने तो वह जयबाला अशर की तरह उसका मुकाबला ना करे. बस जी, ट्रेन में मतिमन्द लडकी की तरह सभी के सामने अपने को बलात्कृत होती रहे.
इन सबसे बचने के लिए और अपनी आत्म रक्षा के लिए लडकियों के जूडो-कराटे आदि की बात सीखने-सिखाने की ज़रूरत पर बल दिया जाता रहा है. यहां तक तो ठीक है, मगर एक डीजीपी ने कह दिया कि लडकियों को अपने साथ ब्लेड आदि जैसी चीज़ें रखनी चाहिये कि बस जी, हंगामा बरपा हो गया. तुरंत दूसरी पार्टी के लोग उसके विरोध में उठ खडे हुए और जा कर चूडियां भेंट कर आये. चूडियां भेंट करनेवालों में हमारी वीर महिलायें भी थीं, जिन्हें यह लगता है कि चूडियां पहनना जनाना काम है और जनाना काम जो भी हैं, वे इतने खराब होते हैं कि उन्हें गाली की संग्या ही दी जा सकती है. और वीरता के सारे काम सिर्फ आदमियों के हिस्से में हैं. हे भगवान्, आप झांसी की रानी, रज़िया सुल्तान आदि समेत मेवाड की सभी वीरांगनाओं की आत्मा को शांति पहुंचाना. आज की किरण बेदी, जयबाला अशर, मनीषा आदि को धीरज धरने के लिए कहना और यह भी कहना कि अपनी वीरता की छाप और उसके आख्यान के लिए वह अगले जनम में पुरुष् के रूप में जन्म लेने का इंतज़ार करे. और इस सबके पीछे आप यह अपेक्षा रखें कि आपकी व्यवस्था हर पल आपके पीछे घूमती रहे. आप कचरा फेंकें, वह उठाये, आप सर्वजनिक स्थल पर धूम्रपान करें, वह आपसे ऐसा न करने के लिए निवेदन करे, अप राह चलती लडकियों से बदतमीज़ी करें, वह आपसे ऐसा न करने के लिए आपसे इसरार करे, और भी बहुत कुछ. एक सभ्य, सुशील, संसकारित नागरिक होने के नाते हम कुछ ना करें, हमारी कोई ज़िम्मेदारी नहीं.
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