यह हमारे समाज ने क्या कर दिया? ख़ुद ताकतवर बनने के लोभ में ख़ुद को ही ज़ंज़ीरों से जकड लिया? देखिये न, एक समय था, शायद प्रॅगैतिहासिक. ऐसा ही कुछ बोलते हैं ना? कहते हैं कि तब सत्ता स्त्रियों के हाथ में थी. स्त्रियां ही घर और बाहर दोनों का संचालन करती थीं. इस व्यवस्था को मातृसत्तात्मक समाज कहते थे. कहा जाता है कि तब लोग समूह में रहते थे, एक जगह से दूसरी जगह दर-ब-दर होते रहते थे, और तब जो उनका काफिला चलता था, उसका नेतृत्व महिलाएं ही करती थीं.
अब जी, समय बदला. कृषि युग आया. लोग खेती करने लगे. परिवार का विकास हुआ. लोग घर बना कर रहने लगे. विवाह संस्था भी बन गई. इससे अब बीबी-बच्चे भी हो गये. बीबी-बच्चे होने से उनके भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी भी आ गई और यह ज़िम्मेदारी आदमी की होने लगी. बच्चे पैदा करने, उनकी देख-भाल करने, घर- गृहस्थी सम्भालने आदि की ज़िम्मेदारियों के साथ स्त्रियां घर में बिठाई जाने लगीं. खेती व अन्य काम के कारण पुरुष घर के बाहर जाने लगे. धीरे-धीरे यह व्यवस्था मज़बूत होती चली गई. आदमी घर से बाहर जाने लगे, तो उन्हें दीन-दुनिया के बारे में मालूमात होने लगे. औरतें घर के अन्दर रहने लगीं तो वे अपने को तनिक और नाज़ुक, खूबसूरत और कोमल समझने लगीं. उनकी कोमलता और नाजुक दिल का फायदा पुरुष उठाने लगे.
धीरे-धीरे यह व्यवस्था बन गई कि पुरुष घर के नियामक हो गये और स्त्रियां उनकी ताबेदार. इस व्यवस्था का एक और मज़बूत आधार था, घर का आर्थिक पक्ष का पुरुषों के पास चले जाना. अब जिसके हाथ में पैसा, वह सत्ता का नियामक, वह ज़्यादा ताकतवर, वह सबका मालिक. कहावत भी है कि "जिसकी लाठी, उसकी भैंस."
हाय रे, यह मालिकाना हक़, लोगों से जो ना करवाए. अब यह मालिकाना हक़ रखते-रखते लोगों की यह हालत हो गई है कि अब अगर वे अपना यह हक़ चाह कर भी नहीं छोड सकते. देखिये ना, घर मर्दों का, इच्छाएं मर्दों की. सत्ता मर्दों की. तो औरतें हो गईं इनकी कनीज़, ज़रखरीद गुलाम. भले समय ने अब करवट ली है, लडकियां पढने -लिखने लगी हैं, मगर यह थोडे हो सकता है कि शादी-ब्याह के समय यह केवल देख लिया जाये कि दोनों में से एक भी व्यक्ति अगर कमाता है तो ठीक है. नहीं जी, यह तो पुरुष अस्तित्व पर भयंकर कुठाराघात है. अगर लडकियां काम नहीं करती हैं तो लडके या उसके घरवाले इसे स्वीकरते हैं और यह एक सामान्य घटना होती है. बल्कि अभी भी हमारे समाज में लडकों के घरवाले तो घरवाले, लडके भी यह कहते हैं कि उन्हें कमानेवाली लडकियां नहीं चाहिये. क्यों? तो इसके बहुत से कारण हैं. मसलन, वे नहीं चाहते कि शाम में जब वे थके -हारे घर लौटें तो बीबी घर पर ना हों या हों तो निचुडे नींबू की तरह हों या जो उन्हें एक प्याला चाय देने के बदले उन्हीं से चाय की उम्मीद करे, कि घर और बच्चे यतीम हो जायेंगे कि घर संभालनेवाला (वाली) कोई तो चहिये. घर ठीक से सजा-धजा भी रहना चहिये, रोज अलग-अलग तरह का खाना-पीना भी मिलते रहना चाहिये, सास-ससुर की सेवा करनेवाली भी घर में कोई होनी चाहिये. और भी बहुत कुछ.
लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि समाज में कामकाजी लडकियां हैं ही नहीं. हैं ना, खूब हैं, मगर इनकी कमाई? ना बाबा ना, बीबी की कमाई खाने के लिये उससे नौकरी थोडे ना करा रहे हैं. वह तो उसका अपना टाइम पास है और चलो, एक से भले दो कमानेवाले हों तो थोडा अच्छा हो जाता है. घर की गाडी ज़रा ठीक-ठाक चलने लगती है. छम्मक्छल्लो के एक अधिकारी हैं. उनकी पत्नी भी कामकाजी हैं. मगर हमेशा कहते रहते हैं कि "वाइफ के पैसे खर्च करने के लिये नहीं होते हैं." लब्बोलुआब यह कि लानत है उस पर जो बीबी की कमाई खाता है. मियां की कमाई बीबी खा सकती है, यह गौरव की बात है, मगर बीबी की कमाई खाना? तोबा जी तोबा!
ऐसे में बिचारे आजकल के लडकों की जान बडी सांसत में रहती है. रीसेशन का ज़माना है. ढंग का कहीं काम नही है. काम हैं तो पैसे नहीं हैं. मगर घरवाले हैं कि ऐसे में भी चौतरफा दवाब डाले रहते हैं कि जी शादी कर लो. दादी का क्य ठिकाना? नाना का क्या भरोसा? ख़ुद समय का क्या भरोसा? कब कौन कहां रहे, किधर निकल जाये? लडका बिचारा इस ऊहापोह में कि जब कमाई ही ढंग की नहीं तो शादी कैसे कर ले? अभी तो खुद कहीं भी जैसे-तैसे दोस्तों के साथ शेयर कर के रह लेते हैं. शादी हुई तो अलग से घर लेना पडेगा. गृहस्थी के सारे इंतज़ाम करने होंगे. पूरे घर का ख़र्चा चलाना होगा. यह सब महज इसलिये कि मालिकाना हक़ तो लड्के का ही है. पहले तो उसे ही कमाना होगा और इतना कमाना होगा कि वह अपना, अपनी बीबी और बाद में अपने बच्चों का पेट पाल सके. भई, ये सब तो उनके पालतू हैं ना.
तो, लडकियों, सुखी हो जाओ. तुम्हें ऐसे-वैसे झंझट नहीं पालने हैं. तुम्हें तो बस, मां-बाप की छांह में सुख से रहना है, पढना-लिखना है. कैरियर बनाने का मन हो तो बनाओ, वरना हाथ-पर हाथ धर कर बैठ जाओ. मां-बाप से कह दो कि अब उसे नहीं पढना. पढ-लिख कर कौन सी उसे प्रतिभा ताई पाटिल बन जाना है कि इंदिरा गांधी कि किरण बेदी कि सुनीता विलियम्स. उसे तो घर बसाना है. मां-बाप के लिये भी तनिक आश्वस्ति सी स्थिति रहती है कि चलो, बेटी है, नहीं पढेगी तो ना सही, कोई अच्छा सा लडका खोज कर उसका ब्याह कर दो. बस जी, मुसीबतें तो लडकों की है और संग-संग उनके मां-बाप की.
बिचारे लडके. यह उनके बडे-बुज़ुर्गों ने क्या कर दिया? थोडा तो बदलो ऐ हमारे सुखनवर. मान लो जी कि लडका नहीं कमाता तो क्या हुआ? लडकी तो कमाती है. घर में कोई एक तो कमाता है. तो उसके साथ हाथ पीले कर दो. मगर जी, कौन सुनेगा इस नक्कारखाने में तूती की आवाज़? बिचारे लडको, जाओ और अपने पुरखों द्वारा तय की गई नियति को झेलो. इस बीच समझा सको, मां-बाप को तो समझा लो. लडकी के मां-बाप को भी और लडकी को भी. तुम्हारे समाज ने तुम्हारे लिये सब ऊंचा-ऊंचा कर के रखा हुआ है. तुम लडकी से कम पढे-लिखे नहीं हो सकते, तुम लडकी से कम क़द में नहीं हो सकते, तुम लडकी के मुकाबले कम नहीं कमा सकते. यहां तक कि तुम अगर ज़्यादा सुन्दर हो तो तुम अपने से कम सुन्दर लडकी से शादी भी नहीं कर सकते. क्यों? क्योंकि तब तुम्हारा ईगो तुम्हें हर्ट करेगा. ज़्यादा हर्ट करेगा तो हार्ट तक पहुंच जायेगा और ज़्यादा हार्ट तक पहंचेगा तो सबकी लाइफ मीज़रेबल कर देगा. (अंत के अंग्रेजी के कुछ शब्दों के लिये माफ करना)
Tensions in life leap our peace. Chhammakchhallo gives a comic relief through its satire, stories, poems and other relevance. Leave your pain somewhere aside and be happy with me, via chhammakchhallokahis.
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Saturday, August 8, 2009
Thursday, August 6, 2009
सब व्यवस्था ही करेगी, हम कुछ नहीं
छम्मक्छल्लो राम-राज्य की कल्पना में डूबी हुई है. वही नहीं, इस देश की सभी जनता. जनता समझती है कि हमने एक बार अपने प्रतिनिधि को चुन लिया, चुन कर उन्हें सरकार बनाने को भेज् दिया, बस जी, हमारी जिम्मेदारी हो गई ख़त्म. अब सारा का सारा काम जो है, वो सरकार को करना है, सरकार द्वारा बनाई गई व्यवस्था को करना है. और अगर व्यव्स्था को दुरुस्त करने में सरकार कानून बनाए, आपसे सहयोग मांगे तो लो जी कर लो बात.
अब देखिए न, इस देश में हम सभी पढे -लिखे हैं, मगर नागरिक सभ्यता के नाम पर हम किसी भी अनपढ- जाहिल से कम नही हैं. सडक पर थूकना हो या कचरा फेकना हो, हम बेहिचक उसे फेक देते हैं, चाहे हम मंहगी से मंहगी कार के मालिक क्यों ना हों. अब सफाई करने का काम तो मुंसीपाल्टी का है ना भैया. आखिर को हम उन्हें पगार किस बात की देते हैं. यह हमारे कर्तव्य में थोडे न आता है कि हम अपने स्थान को साफ कर के रखें. वैसे, कुत्ता भी अपने बैठने की जगह को अपनी पूंछ से साफ कर के तब बैठता है.
आजकल मुंबई में स्वच्छ मुंबई, हरित मुंबई का नारा बडे जोरो पर है. एनजीओ, प्रशासन सभी शहर को साफ रखने, कचरा जहां-तहां ना फेंकने के लिए अपील पर अपील, विग्यापन पर विग्यापन दे रहे हैं. मगर हम अपनी धुन के पक्के लोग. हमारा बडप्पन ही क्या जो हम उनकी अपील मान लें. अब जी, वे सब् बेचारे जुर्माने की व्यवथा पर उतर आये हैं.
दोपहिया वाहन् चलाते समय हेल्मेट लगाना या कार चलाते समय सीट बेल्ट बांधना हमारी सुरक्षा के लिए है. पर ना जी, हम इन सब चोंचलों में क्यों पडें. जब व्यवस्था सख्रती करेगी, तब देखी जायेगी. और जब फिर से जुर्माने की बात आई, तब लोग इसका पालन करने लगे. तुलसी बाबा ऐसे ही थोडे ना कह गये हैं कि "बिनु भय होहि न प्रीति". पर अभी भी होता यह है कि शहर की सीमा, जहां पुलिस का ख़तरा रहता है, हम सीट बेल्ट बान्धे राखते हैं, जैसे ही उस सीमा से दूर गये, सीट बेल्ट यूं उतार फेंकते हैं, जैसे किसी ने सांप गले में लटका दिया हो. बहुत पहले एक धर्म ने तो मोर्चा ही निकाल दिया कि हेल्मेट पहनना हमारे धर्म के खिलाफ है. कोई धर्म के इन नुमाइन्दों से पूछे कि भाई साहब, दुर्घटना क्या आपके धर्म के हिसाब से होगी? वह कहेगी कि नहीं जी, यह अमुक धर्मवाले हैं, जिनके यहां हेल्मेट पहनना धर्मानुकूल नही है, इसलिये यहां मत आओ. जाओ, कहीं और जा कर बसो.
सार्वजनिक स्थल पर बात करनी हो, तो हमारे भाई-बहन इतनी जोर-जोर से बातें करेंगे, जैसे सभी के सभी बहरे हों. बस-ट्रेन में चलना-बैठना हो, तो सीट का अधिक से अधिक हिस्सा अपने लिये कब्जा कर लेना हमारी फितरत में होता है.
और, हम लडकियों पर तो हमारे भाई लोग इतने मेहरबान होते हैं कि उन्हें अपनी जागीर ही समझने लगते हैं. वे आपसे प्रेम करने का दम्भ भरें और आप् ना करें तो तुरंत रिंकू पाटील हत्याकांड होते देर नहीं लगती है. कोई बस मेँ अपनी राह चली जा रही हो और कंडक्टर उसे छेडे तो मनीषा जैसी लडकी उसका मुकाबला ना करे. ट्रेन में कोई गर्दुल्ला किसी की पर्स छीने तो वह जयबाला अशर की तरह उसका मुकाबला ना करे. बस जी, ट्रेन में मतिमन्द लडकी की तरह सभी के सामने अपने को बलात्कृत होती रहे.
इन सबसे बचने के लिए और अपनी आत्म रक्षा के लिए लडकियों के जूडो-कराटे आदि की बात सीखने-सिखाने की ज़रूरत पर बल दिया जाता रहा है. यहां तक तो ठीक है, मगर एक डीजीपी ने कह दिया कि लडकियों को अपने साथ ब्लेड आदि जैसी चीज़ें रखनी चाहिये कि बस जी, हंगामा बरपा हो गया. तुरंत दूसरी पार्टी के लोग उसके विरोध में उठ खडे हुए और जा कर चूडियां भेंट कर आये. चूडियां भेंट करनेवालों में हमारी वीर महिलायें भी थीं, जिन्हें यह लगता है कि चूडियां पहनना जनाना काम है और जनाना काम जो भी हैं, वे इतने खराब होते हैं कि उन्हें गाली की संग्या ही दी जा सकती है. और वीरता के सारे काम सिर्फ आदमियों के हिस्से में हैं. हे भगवान्, आप झांसी की रानी, रज़िया सुल्तान आदि समेत मेवाड की सभी वीरांगनाओं की आत्मा को शांति पहुंचाना. आज की किरण बेदी, जयबाला अशर, मनीषा आदि को धीरज धरने के लिए कहना और यह भी कहना कि अपनी वीरता की छाप और उसके आख्यान के लिए वह अगले जनम में पुरुष् के रूप में जन्म लेने का इंतज़ार करे. और इस सबके पीछे आप यह अपेक्षा रखें कि आपकी व्यवस्था हर पल आपके पीछे घूमती रहे. आप कचरा फेंकें, वह उठाये, आप सर्वजनिक स्थल पर धूम्रपान करें, वह आपसे ऐसा न करने के लिए निवेदन करे, अप राह चलती लडकियों से बदतमीज़ी करें, वह आपसे ऐसा न करने के लिए आपसे इसरार करे, और भी बहुत कुछ. एक सभ्य, सुशील, संसकारित नागरिक होने के नाते हम कुछ ना करें, हमारी कोई ज़िम्मेदारी नहीं.
अब देखिए न, इस देश में हम सभी पढे -लिखे हैं, मगर नागरिक सभ्यता के नाम पर हम किसी भी अनपढ- जाहिल से कम नही हैं. सडक पर थूकना हो या कचरा फेकना हो, हम बेहिचक उसे फेक देते हैं, चाहे हम मंहगी से मंहगी कार के मालिक क्यों ना हों. अब सफाई करने का काम तो मुंसीपाल्टी का है ना भैया. आखिर को हम उन्हें पगार किस बात की देते हैं. यह हमारे कर्तव्य में थोडे न आता है कि हम अपने स्थान को साफ कर के रखें. वैसे, कुत्ता भी अपने बैठने की जगह को अपनी पूंछ से साफ कर के तब बैठता है.
आजकल मुंबई में स्वच्छ मुंबई, हरित मुंबई का नारा बडे जोरो पर है. एनजीओ, प्रशासन सभी शहर को साफ रखने, कचरा जहां-तहां ना फेंकने के लिए अपील पर अपील, विग्यापन पर विग्यापन दे रहे हैं. मगर हम अपनी धुन के पक्के लोग. हमारा बडप्पन ही क्या जो हम उनकी अपील मान लें. अब जी, वे सब् बेचारे जुर्माने की व्यवथा पर उतर आये हैं.
दोपहिया वाहन् चलाते समय हेल्मेट लगाना या कार चलाते समय सीट बेल्ट बांधना हमारी सुरक्षा के लिए है. पर ना जी, हम इन सब चोंचलों में क्यों पडें. जब व्यवस्था सख्रती करेगी, तब देखी जायेगी. और जब फिर से जुर्माने की बात आई, तब लोग इसका पालन करने लगे. तुलसी बाबा ऐसे ही थोडे ना कह गये हैं कि "बिनु भय होहि न प्रीति". पर अभी भी होता यह है कि शहर की सीमा, जहां पुलिस का ख़तरा रहता है, हम सीट बेल्ट बान्धे राखते हैं, जैसे ही उस सीमा से दूर गये, सीट बेल्ट यूं उतार फेंकते हैं, जैसे किसी ने सांप गले में लटका दिया हो. बहुत पहले एक धर्म ने तो मोर्चा ही निकाल दिया कि हेल्मेट पहनना हमारे धर्म के खिलाफ है. कोई धर्म के इन नुमाइन्दों से पूछे कि भाई साहब, दुर्घटना क्या आपके धर्म के हिसाब से होगी? वह कहेगी कि नहीं जी, यह अमुक धर्मवाले हैं, जिनके यहां हेल्मेट पहनना धर्मानुकूल नही है, इसलिये यहां मत आओ. जाओ, कहीं और जा कर बसो.
सार्वजनिक स्थल पर बात करनी हो, तो हमारे भाई-बहन इतनी जोर-जोर से बातें करेंगे, जैसे सभी के सभी बहरे हों. बस-ट्रेन में चलना-बैठना हो, तो सीट का अधिक से अधिक हिस्सा अपने लिये कब्जा कर लेना हमारी फितरत में होता है.
और, हम लडकियों पर तो हमारे भाई लोग इतने मेहरबान होते हैं कि उन्हें अपनी जागीर ही समझने लगते हैं. वे आपसे प्रेम करने का दम्भ भरें और आप् ना करें तो तुरंत रिंकू पाटील हत्याकांड होते देर नहीं लगती है. कोई बस मेँ अपनी राह चली जा रही हो और कंडक्टर उसे छेडे तो मनीषा जैसी लडकी उसका मुकाबला ना करे. ट्रेन में कोई गर्दुल्ला किसी की पर्स छीने तो वह जयबाला अशर की तरह उसका मुकाबला ना करे. बस जी, ट्रेन में मतिमन्द लडकी की तरह सभी के सामने अपने को बलात्कृत होती रहे.
इन सबसे बचने के लिए और अपनी आत्म रक्षा के लिए लडकियों के जूडो-कराटे आदि की बात सीखने-सिखाने की ज़रूरत पर बल दिया जाता रहा है. यहां तक तो ठीक है, मगर एक डीजीपी ने कह दिया कि लडकियों को अपने साथ ब्लेड आदि जैसी चीज़ें रखनी चाहिये कि बस जी, हंगामा बरपा हो गया. तुरंत दूसरी पार्टी के लोग उसके विरोध में उठ खडे हुए और जा कर चूडियां भेंट कर आये. चूडियां भेंट करनेवालों में हमारी वीर महिलायें भी थीं, जिन्हें यह लगता है कि चूडियां पहनना जनाना काम है और जनाना काम जो भी हैं, वे इतने खराब होते हैं कि उन्हें गाली की संग्या ही दी जा सकती है. और वीरता के सारे काम सिर्फ आदमियों के हिस्से में हैं. हे भगवान्, आप झांसी की रानी, रज़िया सुल्तान आदि समेत मेवाड की सभी वीरांगनाओं की आत्मा को शांति पहुंचाना. आज की किरण बेदी, जयबाला अशर, मनीषा आदि को धीरज धरने के लिए कहना और यह भी कहना कि अपनी वीरता की छाप और उसके आख्यान के लिए वह अगले जनम में पुरुष् के रूप में जन्म लेने का इंतज़ार करे. और इस सबके पीछे आप यह अपेक्षा रखें कि आपकी व्यवस्था हर पल आपके पीछे घूमती रहे. आप कचरा फेंकें, वह उठाये, आप सर्वजनिक स्थल पर धूम्रपान करें, वह आपसे ऐसा न करने के लिए निवेदन करे, अप राह चलती लडकियों से बदतमीज़ी करें, वह आपसे ऐसा न करने के लिए आपसे इसरार करे, और भी बहुत कुछ. एक सभ्य, सुशील, संसकारित नागरिक होने के नाते हम कुछ ना करें, हमारी कोई ज़िम्मेदारी नहीं.
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