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Thursday, May 29, 2008

महाभारत किसलिए हुआ था?

छाम्माक्छाल्लो आज एक सेमिनार में थी। सेमिनार गीता ज्ञान के ऊपर aadhharit thaa। ka2rporeT जगत में giita को अज शिद्दत से समझाने की कोशिश की जा रही है। स्वामी जी गीता के माध्यम से Conflict Management and Dicision Making पर बात कर रहे थे। प्रसंगवश उनहोंने यह कहा कि महाभारत की लड़ाई द्रौपदी कू सार्वजनिक रूप से अपमानित कराने के कारण हुई थी। छाम्माक्छाल्लो की समझ में यह बात नहीं आई। महाभारत का युद्ध धर्म, अधिकार की वापसी और न्याय का युद्ध है। दिनकर ने बहुत खूब कहा है-
"अधिकार खो कर बैठा रहना यह महा दुशाकर्म है
न्याय्याढ़ अपने बंधू को भी दंड देना धर्म है
इस तत्व पर ही पांडवों का कौरवों से रण हुआ
जो भव्य भारतवर्ष के कल्पान्त का कारण हुआ।"
छाम्माक्छाल्लो ने स्वामी जी से पूछा कि द्रौपदी तो बाद में अपमानित हुई सार्वजनिक, लेकिन जब वह अपने ही घर में ५ पुरुषों के बीच बाँट दी गई, टैब क्यों नहीं हुआ महाभारत? क्या जो अपराध या ग़लत काम घर, परिवार, समाज की सहमति से हो, वह ठीक और जो ना हो, वह ग़लत हो जाता है? स्वामी जी के पास इसका कोई उत्तर नहीं था। छाम्माक्छाल्लो को लगता है कि यदि उसी समय द्रौपदी ने इसका विरोध कीया होता तो आज महिलाओं और बच्चियों पर जो अपने ही नजदीकियों द्वारा अत्याचार किए जा रहे हैं, वे शायद न होते।
प्रसंगवश स्वामी जी ने यह भी कहा कि गावं में आज भी स्त्रियाँ भाव से अधिक बंधी हैं, इसलिए वहांआन कलह आदि कम होते हैं, जबकि शहर में स्मार्ट स्त्रियों मी भाव को तिलांजलि दे दी है, इसलिए वे किसी के भी प्रती भावुक नहीं हैं, न घर, न पति, ना बच्चे। भाव और ह्रदय के नाम पर कबतक स्त्रियों को बरगलाया जाता रहेगा, यह पाता नहीं। छ्हम्माकछाल्लो ने कहा किस्मार्टनेस बुद्धिमानी से आती है और भाव को थोडा कम करके भुद्धि को वहाँ जगह देना आज की मांग है, ताकि स्त्रियाँ केवल छुई-मुई सी नाज़ुक सी गुडिया भर ही ना बनी रह जाए- ता उम्र, जन्म जन्मांतर। आख़िर कबतक भावना के नाम पर उन्हें दरकिनार किया जाता रहेगा? और आज जब स्त्रियाँ दिल और दिमाग दोनों से अमज्बूत हो रही हैं तो इसका असर समाज पर आ रहा है॥ आज के युवा, खासकर लड़कों की सोच में बदलाव आया है। यह सकारात्न्म्मक बदलाव अगली पीढी को और मजबूती देगा। निशचय ही इसका सेहरा आज की पढी-लिखी स्त्रियों पर जाता है, और हाँ, उनके माता-पिटा कू भी यह श्री है कि उन्होंने अपनी बेटियों को पढाया। बौद्धिक रूप से मज़बूत हो कर आज स्त्रियाँ अपने आपको हर कठिन हालत से लड़ने के लिए तैयार रखती हैं।
स्वामी जी के पास इसका भी कोई जवाब न था। न, भ्रमित ना हों कि वे कोई सड़क छाप महात्मा या साधू थे। अईईती के इंजीनियर थे। १० साल तक कार्पोरेट जगत में काम कराने के बाद अब अपना प्रतिष्ठान चलाते हैं और जगह-जगह प्रबंधन से संबंधित विषय पर अभिभाषण देते हैं।
छाम्माक्छाल्लो को लगा कि समाज में तक ये वर्ग भेद लगा रहेगा, एक सफल कार्पोरेट की संकल्पना नहीं की जा सकती, क्योंकि कार्पोरेट ही सबसे पहले महिलाओं को यह कहा कर खारिज कराने का प्रयास करता रहता है कि महिलायें ज़्यादा भावुक होने के कारण सही निर्णय नहीं ले पातीं, जबकि आज वे दिल और दिमाग के अद्भुत संयोजन के बल पर हर काम को बखूबी अंजाम दे रही हैं। सोच में यह बदलाव ज़रूरी है- चाहे वह द्रुँपदी हो या आज की नारी।
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