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Saturday, March 15, 2008

अजब तेरीलीला हे प्रभु!

छाम्माक्छाल्लो को कभी कभी बड़ी बे सिर पैर की तुलना सूझती है। अब इसमें जब वह ख़ुद कुछ नहीं कर सकती तो कोई और कैसे करे? अब देखिए, आज के युग में कम्प्यूटर का महातम देखिए। एक समय था कि लोग डर से इसे छूते नहीं थे, दफ्तरों में अधिकारीगन इसे एक दूसरे टेबल पर रखते थे। कम्प्यूटर के आने के पहले हर हलके में इसका जो विरोध हुआ, वो आज भी उस समय के लोगों के मन में होगा। कुछ दिन पहले छाम्माक्छाल्लो को उसके ही दफ्तर के एक सेवा निवृत्त सज्जन मिल गए। पहले यूनियन में थे, इसलिए काफी दबंग भी थे। लेखक भी हैं, अभी समाज की काफी सेवा कर रहे हैं। अपने समुदाय की गरीब लड़कियों को पढा रहे है। उनकी कोशिशों से बहुत सी लड़कियां १०- १२ कक्षा तक पढ़ सकीं। वे जब यूनियन में थे, तब कम्प्यूटर के ख़िलाफ़ खूब जेहाद छेड़ा था। उस दिन मिले तो किसी की राह तक रहे थे। बोले- कम्प्यूटर वाले की राह तक रहा हूँ। यूनियन में था, तब इसी के ख़िलाफ़ मैनेजमेंट से खूब लड़ा था, अब इसी के लिए खड़ा हूँ।
छाम्माक्छाल्लो ने भी बड़ी कोशिशों से थोडी बहुत कम्प्यूटर की नब्ज़ थाम ली है। अब हाथ से लिखी कोई चीज़ किसी को भेजने में लगता है, पता नही, वह पढ़ पाएगा कि नहीं। लिखाई भी तो अब माशा अल्लाह इतनी अच्छी हो गई है कि क्या मुर्गे या हिरन की टाँगे उनका मुकाबला करेंगी।
खैर, तो छाम्माक्छाल्लो बात कर रही थी, कम्प्यूटर की। अब तो एक बच्चा भी इसके बगैर जी नहीं सकता। लेकिन, हम सब के लिए अब एक मुसीबत यह भी की 'एक अनार और सौ बीमार।' कम्प्यूटर एक और उस पर काक या गिद्ध दृष्टि जमाए बैठे सभी लोग। क्या राजनीति में कुर्सी के लिए लड़ाई होती होगी, जितनी घर पर अब सभी सदस्यों के बीच कम्प्यूटर के लिए होती है। कोई कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं। 'क' का मामला है। एकता कपूर से भी पूछना होगा।
छाम्माक्छाल्लो को भी कभी कम्प्यूटर नसीब नहीं हो पाटाअब आ ही,सारे समय वह इसी इंतज़ार मेंरह गई कि 'अब तो माधव, मोहे उबार।'' आभा का फोन आया तो वह भी कम्प्यूटर न मिलाने का रोना ले बैठीं। मैं तो भारी बैठी ही थी। पति-निंदा का कोई भी अवसर स्त्रियान् भला कैसे छोड़ सकती हैं, और वह भी जब सामने कोई स्त्री हो- 'खग जाने खग हीकी भाषा।' उस पर तारीफ़ यह कि सुना भी दिया कि आ तुम्हारी बड़ी शिकायत कर रही थी।
छाम्माक्छाल्लो को अपना छात्र जीवन याद आता है। जिस हॉस्टल में वह थी, वहां केवल दो ही टॉयलेट थे जो वर्किंग स्थिति में थे। अहले भोर से ही वहाँ के आस-पास का जो नज़ारा बनता था, आ के कम्प्यूटर के आगे का नज़ारा देखकर वही सब कुछ याद आ जाता है। वहाँ तो खैर केवल भोर में ही वह नजारा रहता था, यहाँ तो हर समय एक ही दृश्य विधान। अब ऎसी तुलना पर आपको कुछ कहना हो तो बेशक कहिये, मगर छाम्माक्छाल्लो 'घर-घर देखा, एकही लेखा' के इस रूप से निकल नहीं पाई, और यह समानता उसे दिखाई दे गई। अब आप सब के यहाँ भी कम्प्यूटर को लेकर ऎसी ही मार-काट मचीहो, तो इस तुलना से अपनी भी तुलना कर लीजिए। स्थितियां सुबह की निवृत्ति के बाद साफ किए गए हाथ-पैर की तरह ही साफ और मन भी बेहद हल्का लगने लगेगा।
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