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Wednesday, March 12, 2008

याद करें १२ मार्च १९९३!

छाम्माकछाल्लो उदास है। कल ही लाहौर में हुए आत्मघाती दस्तों की खबरों से आज सभी अखबार भरे हुए हैं। आज का ही दिन मुंबई के लिए भी बहुत मनहूस था। भाईचारे और प्रेम की नींव पर खडी मुम्बई अचानक से खून खराबे के समंदर में बहने लगेगी, किसी ने ऐसा सोचा भी नहीं था। कहते थे कि मुंबई में पहले भी खून खराबे होते थे, मगर वे आपसी रंजिश और ख़ास तौर पर अंडर वर्ल्ड के गुटों के बीच होता था। आम आदमी उसमे परेशान नही होता था। मगर १९९२ की बाबरी मस्जिद के दंगे का दंश झेल रही मुंबई अचानक १२ मार्च,१९९३ को सीरियल बम ब्लास्ट से दहल उठी। एयर इंडिया, नरीमन प्वायंट, स्टाक एक्सचेंज, पासपोर्ट ऑफिस, जुहू का होटल उफ़! पल भर में हंसते खेलते चेहरे मांस के लोथरों में बदल गए।
छाम्माकछाल्लो सोच ही नही पा रही थी कि ऐसा क्यों? हम आदमी से जानवर में कैसे बदल गए? बम विस्फोट से सहमी मुंबई में वह अपने दफ्तर गई थी। जुमे की नमाज अता की जा रही थी। छाम्माकछाल्लो के दफ्तर से मस्जिद साफ दिख रही थी। नमाज़ पूरी हुई भी नहीं हुई थी कि अचानक गोलीबारी शुरू हो गई। पुलिस और आतंकी दोनों और से गोलियाँ चलने लगीं। इसके पहले छाम्माकछाल्लो ने फिल्मों के अलावा हकीक़त में कंभी गोली चलने की आवाज़ नही सुनी थी। बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने के बाद हुए दंगे के बाद वह दफ्तर गई थी। चारो और शहर जैसे सहमा हुआ था। कोई किसी से न तो बात कर रहा था, न यहाँ की फिजां में यहाँ की जिंदगी धड़क रही थी। छाम्माकछाल्लो ने रास्ते में एक दो जले हुए स्कूटर -ऑटो देखे। वह सहम गई। उस समय उसकी छोटी बिटिया मात्र तीन महीने की थी। दंगे से पीडित परिवार यहाँ -वहाँ भाग रहे थे। छाम्माकछाल्लो के भी एक बेहद अजीज को अपने पूरे परिवार के साथ भागना पडा था। अज तक वह परिवार फ़िर से सेटल नहीं हो पाया।
आज तक दंगे - विस्फोट में जानेवाली जानों का कोई हिसाब नहीं लग सका है। आज तक इन हादसों में बिछारे लोगों के परिवार जन अपने प्रिय को भूल नहीं पाए हैं। आज तक इन हादसों की काली परछाईं दिल और दिमाग से नहीं गई है। १९९३ में भी आज के दिन इसी अफरा तफरी का माहौल था। लोग घरों से निकालने,
अहीन्न आने-जाने में घबराने लगे थे।
छाम्माकछाल्लो की बिटिया अभी लाहौर में है। इन विस्फोटों की दरिंदगी से वह सकते में है। वह कहती है, लोगों में बर्दाश्त करने की ताक़त और संवेदनशून्यता बढ़ रही है और यह मानवता के लिए खतरनाक है।
पूरा विश्व आज आतंक की चपेट में है। छाम्माकछाल्लो यह सोचती है , यह कायनात, जो सबके जीने के लिए बनी है, वहाँ क्यों लोगों को जीने से महरूम किया जा रहा है। दंगा हो या फसाद, मरता आम आदमी है, आम बच्चीबच्चे यतीम होते हैं, आम औरतें विधवा होती हैं, आम आदमी का बेटा- बाप बिछारता है। कब हमारी खूनी ललक हमें इंसानियत का पाठ पधाएगी, या फ़िर इंसानियत, भाईचारा केवल किताबों या नीति शास्त्र की ही चीजें बनाकर रह जायेंगी। छाम्माकछाल्लो ने कई धर्मों की बातें पढ़ने व जानने की कोशिश की है। कई धर्मों के लोगों से उनके धर्म का मूल सार पूछा है। सभी प्रेम, दया, क्षमा, विनय आदि की ही बातें बताते हैं। फ़िर जब सभी धर्मों के मूल में ये ही भाव हैं , फ़िर क्यों हम इंसानियत के दुश्मन बन बैठे है? आज १२ मार्च है। १९९३ की घटना फ़िर कहीं ना घटे, क्या हम सभी मिल कर ऐसा आवाहन कर सकते हैं? तो आइये, भाव की इस भूमि पर अपने विचारों के फूल खिलायें। लाहौर हो या मुबई, अफगानिस्तान हो या हिन्दुस्तान, हर जगह का इंसान एक ही होता है, एक ही खून का रंग होता है, एक ही आंसू और एक ही मुस्कान होती है। यह स्थाई भाव बना रही तो यह हरी भारी धरती अपने ही लालों की करतूतों से शर्मसार होने से बच सकेगी।
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