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Thursday, March 6, 2008

महाशिवरात्रि, शिव, पार्वती और अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस

आज महा शिवरात्रि है और मीडिया फ़िर से इसे भुनाने पर लगा है। पर्व त्यौहार निहायत निजी किस्म की निजी अभिव्यक्ति है। मगर अब ऐसा कुछ नही रहा। मिथकीय रूप मे यह शिव पार्वती के विवाह की रात है। लेकिन पूछा जाए आज की किसी कन्या से कि क्या वे शिव की तरह किसी फक्कर, औघर, साधू तबीयत का पति चाहेगी? बचपन में छाम्माक्छाल्लो भी इस व्रत को करती थी। व्रत की महिमा या क्या कि उसे तो बिल्कुल ऐसा ही पति मिला है। यह शिकायत नहीं, वस्तु स्थिति है।
बचपन में छाम्माक्छाल्लो शिव -पार्वती से संबंधित गीत भी गाती थी। तब तो केवल गाती थी। आज उसकी लाइनों को देखने पर लगता है कि किस तरह हम अपनी ही बातें इन देवी देवताओं में भी आरोपित करते चलते हैं। इस गीत मेंकहा गया है कि शिव- पार्वती गंगा स्नान को जा रहे हें। बारिश शुरू हो जाती है। शिव भींग जाते हैं, मगर पार्वती पर बूँद भी नही परती। वे इसका कारण पूछते हैं। अब देखिए पार्वती का जवाब- चूंकि उसने सास की बातें कभी नही टाली, जिठानी द्वारा लीपे घर को रौंदा नहीं, भूखे ब्रह्मण को जिमाया, इतवार का व्रत किया, इन सब पुन्य के कारण वह भीगने से बच गई। सवाल है कि पार्वती की सास,जिठानी कौन हैं? आज तक कभी कहीं इसका उल्लेख नहीं मिला। स्त्रियों के लिए गए जानेवाले गीतों में इस तरह की बातें और पति, बच्चे, परिवार की कुशलता के लिए देवता पितर को गोहराने की बात बार-बार आती है। उसकी अपनी इच्छा-अनिच्छा कुछ रह नहीं जाती। पार्वती इसी मानसिकता को बताने के लिए उपयोग की जाती हैं। आजतक दुर्गा या काली जो कि शक्ति की अवतार मानी जाती हैं, के अलावे कभी किसी देवी की एक इकाई के रूप में कल्पना नहीं की गई, यहां तक कि सीता की भी नहीं। लक्ष्मी व सरस्वती इसलिए गिन ली गई कि लक्ष्मी धन देती हैं और सरस्वती विद्या। लक्ष्मी के इस गुन के कारण सभी उनके अस्तित्व को मानने पर विवश हैं। सरस्वती का कोई वैवाहिक आधार नहीं है। पार्वती की पूजा ही अच्छा पति पाने के लिए की जाती है। हरतालिका में पति प्राप्ति के लिए उनकी तपस्या का विषाद वर्णन सुनकर लगता है कि लारकियों के लिए पति प्राप्ति से आगे कुछ भी नही।
आज महा शिवरात्री है और संयोग है कि दो दिन बाद अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष है। आज के दिन महा शिवरात्री की धूम जगानेवाला मीडिया फ़िर से इस इन भी अपनी अपनी डफली लेकर अपना- अपना राग छेदेंगे। एक और तिथि व महिलाओं के गुन गान किए जाएंगे और दूसरी और इस तरह के पर्व त्योहारों के जारी यह बताने की कोशिश की जाती रहेगी कि महिलाओं का निस्तार बगेर इन कर्म कांडों को किए बिना नहीं हो सकता। एक और आज की तमाम सफल महिलाओं के नाम गिनाए जायेंगे, पर जो रियल लाइफ हीरोइनें हें, उन्हें फ़िर से गुमनामी में ही छोड़ दिया जाएगा। एकाध जगह नाम धराने की कोशिश ज़रूर होगी। सास - जिठानी,उनकी सेवा- साधना सभी अपनी जगह पर ठीक हैं। मगर धर्म के बहाने नारी के अस्तित्व को उसके व्यक्ति के स्वरूप से हटा कर केवल भूमिकाओं में ही कैद कर देना और वर्त्तमान की वास्तविकता पर जोर न देना और उसके कर्म काण्ड को ही महिमा मंडित करना किसी भी रूप मेंसही नहीं कहा जा सकता। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस को अब इन मिथकों से ऊपर लाया जाना आज की ज़रूरत है।
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