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Wednesday, May 30, 2012

केवल मंच तक ही सीमित नहीं है रंगमंच – विभा रानी

रंगमंच तथा विभिन्न कला माध्यमों को समर्पित सांस्कृतिक दल "दस्तक" का ब्लॉग है- 'मंडली'। पुंज प्रकाश इसे अपने प्रकाश से प्रकाशित कराते हैं। इस बार पढिए इसमें मेरा साक्षात्कार।

Tuesday, May 29, 2012

केवल मंच तक ही सीमित नहीं है रंगमंच – विभा रानी


रंगकर्मी विभा रानी से पुंज प्रकाश की संचार तकनीक के माध्यम से की गई बातचीत |

विभा रानी 
बहुत सोचने पर भी कुछ समझ में नहीं आ रहा कि कहाँ से शुरू किया जाये | शायद इसका कारण ये है कि आपके बारे में मेरी जानकारी एकदम नहीं के बराबर है |यह रंगमंच की विडम्बना से ज़्यादा मेरी सीमा माना जाय | अगर संभव हो तो आप पहले अपने बारे में बताइए | हो सकता है वहीँ से बात निकलती चली जाये |
बताइयेकहाँ से शुरू करूँ?1987 से रंगमंच मे काम करना शुरू किया दिल्ली में आर एस विकल के निर्देशन में उनके थिएटर फेस्टिवल में। दुलारीबाई , सावधान पुरुरवापोस्टरकसाईबाड़ा आदि नाटकों में अभिनय किया। उन्हीं की टेली फिल्म “चिट्ठी” में काम किया। फिर एक्टिव  रंगमंच से पारिवारिक कारणों से किनारे रही। वर्ष 2007 में पुनः एक्टिव थिएटर में आई। इस बीच नाटक लिखे। “दूसरा आदमी दूसारी औरत” को 2002 के भारंगम में खेला गयाराजेन्द्र गुप्ता एवं सीमा बिशवास के द्वारा। अब यह नाटक रास कला मंचहिसार द्वारा खेला जा रहा है। 2010 में यह नाटक किताबघर प्रकाशन से छपकर आया। एक नाटक 'पीर पराई' 2004 से विवेचनाजबलपुर द्वारा खेला जा रहा है। दो नाटक 'आओ तनिक प्रेम करेंऔर 'अगले जनम मोहे बिटिया न कीजोंको 2005 का “मोहन राकेश सम्मान” मिल चुका है और ये दोनों भी किताबघर प्रकाशन से छपकर आया है।  'अगले जनम मोहे बिटिया न कीजोंको मार्च में पटना में सनत कुमार के ग्रुप ने मंचित किया। 'आओ तनिक प्रेम करेंको सतीश आनंद ने 2005 में अभिनीत व निर्देशित किया। 2007 में फिर से आर एस विकल के निर्देशन में “मी। जिन्ना” से अभिनय की शुरुआत की। इसमें फातिमा जिन्ना की भूमिका करती हूँ। 2007 में फिनलैंड में अंग्रेज़ी नाटक 'Life is not a Dream' से एकपात्रीय नाटकों के मंचन की शुरुआत की। एकपात्रीय नाटक बहुत चुनौतीपूर्ण हैं और इसके मंचन की बहुत तकलीफें और समस्याएँ हैं। सबसे बड़ी समस्या तो यही है की इसे अभी तक थिएटर की मुख्यधारा में शामिल नहीं किया गया है। बाल साहित्य की तरह यह विधा भी थिएटर जगत में उपेक्षित है। मैंने इसे एक चुनौती की तरह लिया और इसे आंदोलन बनाकर आगे बढ़ी। इसका नतीजा आया और अब लोग न केवक एकपात्रीय नाटक कर रहे हैंबल्कि इसके फेस्टिवल भी हो रहे हैं। अबतक मैं 6 एकपात्रीय नाटक कर चुकी हूँ और इसके प्रदर्शन देश की प्रमुख जगहों के साथ-साथ विदेशों में भी हुए हैं और बहुत सराहे गए हैं। 'रंग जीवन' के दर्शन के साथ मैं समाज के वंचित और मुख्यधारा के लोगों के साथ हस्तक्षेप करती हूँ। जेल के बंदियों के साथ थिएटर वर्क शॉप करती हूँ लगातार। थिएटर को केवल मंच तक सीमित न रखकर इसे जीवन के हर क्षेत्र में लाते हुए थिएटर के माध्यम से कॉर्पोरेट ट्रेनिंग आयोजित करती हूँ। “थिएटर -एक आजीविका” पर विश्वास कायम रखते हुए अपने साथ जुड़े सभी रंगकर्मियों को उनका उचित मानधन देने की परंपरा भी हमने शुरू की है। ....ये सब चंद बातें हैंसंक्षेप में। ब्लॉग हैउस पर भी मुझे देख सकते हैं। साहित्य के लिए कथा अवार्ड,घनश्यादास सर्राफ सम्मानडॉ माहेश्वरी सिंह महेश सम्मानव्यंग्य के लिए 'व्यंग्यकार रचना सम्मानब्लॉग के लिए लाड़ली मीडिया अवार्ड और समग्र के लिए राजीव सारस्वत सम्मान और साहित्यसेवी सम्मान।

आप रंगमंच की मुख्यधारा की बात करतीं हैं | भारतीय सन्दर्भ में खासकर हिंदी प्रदेश में जहाँ रंगमंच की स्थिति आज भी अनिश्चितता वाली ही बनी हुई है और जो कुछ थोडा बहुत रंगमंच हो भी रहा है उसमें शौकिया रंगकर्मियों की भूमिका और उर्जा ज़्यादा मुखर है | इस स्थिति में रंगमंच की मुख्यधारा आप किसे मानतीं हैं या इससे आपका क्या तात्पर्य है और क्यों ? और क्या सार्थक रंगमंच के लिए किसी धारा से जुडना ज़रुरी है ?
रंगमंच की स्थिति अनिश्चितता वाली नहीं है। यह एक ठोस विधा है और लोग इसमें काम कर रहे हैं। आज थोडा बहुत रंगमंच नहींबल्कि अधिक रंगमंच हो रहा है। समय आ गया है कि अब शौकिया रंगमंच जैसे शब्द को विदा करना चाहिए। रंगमंच में समर्पण और निष्ठा या commitment की बात की जानी चाहिए। प्रतिबद्ध रंगकर्मियों की भूमिका रंगमंच की प्राणवाहिनी है |रंगमंच की मुख्यधारा रंगमंच ही है । इसका कोई विकल्प नहीं है। फिल्मटीवी आदि इनकी उपधाराएँ हो सकती हैं। सार्थक रंगमंच के लिए केवल एक ही धारा से जुडना ज़रुरी है और वह है रंगमंच के लिए अपनी प्रतिबद्धता की धारा।

थिएटर को केवल मंच तक सीमित न रखकर इसे जीवन के हर क्षेत्र में लाते हुए थिएटर के माध्यम से कॉर्पोरेट ट्रेनिंग आयोजित करती हूँ। इसे ज़रा और स्पष्ट करें |
यह केवल मिथ बना दिया गया है कि थिएटर का मतलब केवल नाचगानाडायलागबाज़ी और स्टेज पर जाकर नाटक कर लेना है। थिएटर एक कर्म है। यह व्यक्ति में सांस की तरह ही ज़रूरी है। थिएटर व्यक्ति के विकास में एक अहम भूमिका निभाता है। असल में हर व्यक्ति के भीतर थिएटर के तत्व मौजूद रहते हैंजिन्हें अपने आम जीवन में जाने- अंजाने उजागर करता चलता है। हर व्यक्ति अपने जीवन मे सफल होना चाहता है। थिएटर उसके लिए यह अवसर प्रदान करता है। थिएटर से जुड़कर वह अपने लक्ष्य तक पहुँच सकता है। मेरा आशय यह कतई नहीं है कि इसके लिए वह मंच पर के नाटक से जुड़े। वह थिएटर के एलीमेंट के सहारे अपने कार्यक्षेत्र में उत्कृष्टता हासिल करे। इन्हीं तत्वों को ध्यान में रखकर मैंने कॉर्पोरेट जगत के लिए विकासात्मक प्रशिक्षण थिएटर के माध्यम से तैयार किए हैं। यह रुचिकर है। व्यक्ति को अपनी बातें बताने और उसके हिसाब से अपने आपको तैयार करने का अवसर देता है। कॉर्पोरेट के साथ-साथ हम विकासात्मक प्रशिक्षण बच्चोंयुवाओं और समाज के सर्विस सेक्टर्सजैसेपुलिसडॉक्टर्सनरसेज़टीचर्सकामकाजी महिलाओं के लिए आदि के लिए भी करते हैं।

क्या आप रंगमंच के माद्यम से चरित्र ( व्यक्तित्व ) निर्माण / विकास का प्रशिक्षण देने की बात कर रहीं हैं ?
नहीं। रंगमंच के तत्वों के साथ व्यक्ति के विकास की बात है। हम किसी का चरित्र नहीं गढ़ते। हम व्यक्ति के भीतर व्यक्ति का विकास करने की कोशिश करते है। a person within the person की बात करते हैं। यह एक अनुभवजनित प्रशिक्षण (an experiential learning) है।
आपने कहा रंगमंच व्यक्ति कों सफल होने का अवसर प्रदान करता है ? ये सफलता -असफलता का पैमाना क्या है ?
सफलता -असफलता यह है कि व्यक्ति जिस क्षेत्र में है या जिस क्षेत्र में जाना चाहता हैउस क्षेत्र में यदि वह रंगमंच के तत्वों के साथ काम करता है तो सफल होता है। उदाहरण के लिए यदि कोई मार्केटिंग में काम करना चाहता है तो उसे मार्केटिंग के लिए कैसे लोगों से अप्रोच करनी चाहिए या कोई व्यक्ति किसी ऐसे पद पर हैजहां उसे दिन रात किसी न किसी पब्लिक स्पीच के लिए जाना पड़ता है। हमारे कार्यक्रम इन जगहों पर उसकी मदद करते हैं। उसका अपना मनदिल और दिमाग खुलता है और वह अपनी रणनीति बनाने के लिए आगे बढ़ता है। अपने काम की रणनीति ही व्यक्ति की सफलता -असफलता का पैमाना है। थिएटर एक टूल है जीवन को अपने तरीके से देखने और समझने और तदनुसार आगे बढ़ाने का। 

आपने जेल के बंदियों के साथ थिएटर वर्कशॉप किया है और कर रहीं हैं | वहाँ के कुछ अनुभव शेयर करें |कैसे काम करतीं हैं ? किन - किन चुनौतियों का समाना करना पड़ता है | वहाँ कैदी होतें हैं उनके साथ काम करना और एक रंगकर्मी के साथ काम करने में आप क्या फर्क महसूस करतीं हैं ?
मैं 2003 से जेल के बंदियों के साथ काम कर रही हूँ। पहले तो मैं बता दूँ कि वे हम-आप जैसे ही इंसान हैं। चांस की बात है कि वे वहाँ हैं। जेल अधिकारियों के अनुसार, 70-80 % कैदी इनोसेंट और एक्सीडेंटल अपराधी होते हैं। उन्हें ही अच्छा माहौल देने के लिए जेल अधिकारी तरह-तरह के कार्यक्रम करते-कराते हैं। यह उनके परिजन वेलफ़ेयर एक्टिविटी के तहत आता है। हमारा काम करने का तरीका जेल अधिकारियों को बहुत पसंद आया और जेल बंदियों को भी। उन्होंने यह कहा कि हम उन्हें इसलिए अच्छे लगते हैं कि हम उनके बारे में नही पूछते। यानीआप हमारे घाव नही कुरेदतीं। दूसरेआप यह नही कहती कि तुमने कोई पाप किया हैअब भगवान से क्षमा मांगो। आप हमें उपदेश नही पिलातीआप हमें हमारे जीवन में ले जाती है और हमें अपने साथ होने का मौका देती हैं। आप हमारे भीतर की कमजोरियों को दूर करने के प्रयास करती हैं। आप हमारे भीतर की प्रतिभा को बाहर निकालती हैं और सबसे बड़ी बात कि आप हमें इस माहौल में हंसने-मुस्कुराने और अपने को तरोताजा करने का अवसर देती हैं।
चुनौतियाँ बहुत हैं। पहली तो यह कि जेल देखने के लिए जाने को उत्सुक बहुत मिलते हैंवहाँ जाकर काम करने के लिए नहीं। बहुत से हित-मित्रों ने यह कहा कि वे हमारे साथ इसलिए जाना चाहते हैं कि उन्होने कभी जेल नही देखी है।
यह समाज सेवा है। हमें हर बार अपनी ओर से खर्च करना पड़ता है। जेल अथॉरिटी की पहली शर्त यह होती है कि उनके पास फंड नहीं है। आप अपने साधन से जो करना चाहोकरो।
लोग वहाँ जाना तो चाहते हैंपर जाने के लिए मानधन भी चाहते हैं। हम देते भी हैं। पर सभी ऐसे नही होते। सुबोध पोतदारआर एस विकल,मंजुल भारद्वाज जैसों ने बहुत बढ़िया काम किया वहाँपर नि:शुल्क।
दूसरी चुनौती है- हर बार कार्यक्रम के लिए वहाँ की प्रशासनिक प्रक्रिया से गुजरना। अफसरशाही का तो नहीक्लर्कशाही का सामना कई बार करना पड़ा।
जिद्दी हूँठान लिया तो ठान लिया। अकेली चली जाती हूँजब कोई नही साथ देताक्योंकि मुझे उनके साथ कार्यक्रम करना हैउनके साथ समय बिताना है।

उनके साथ काम करने का कोई खास संस्मरण हो तो ज़रूर बताएँ | कोई खास घटना या कोई शानदार अभिनेता या वहाँ किसी ने आपसे कुछ शेयर किया हो या कुछ और जो आप बताना चाहें ....
मैंने 'निर्मल आनंद सेतुनाम से वहाँ सीरीज चलाया प्रशिक्षण का। फिर मैंने पहली बार 307, 302  374 के सजायाफ्ता मुजरिमों के साथ 10 दिन का वर्कशॉप किया। 10वें दिन वे सब 45 मिनट के शो के साथ प्रस्तुत हुए। उस पूरे समय के उनके और मेरे अनुभव अद्भुत हैं। कार्यक्रम की समाप्ती के बाद उस ग्रुप के सबसे खतरनाक कैदी ने मुझसे यह कहा कि 'अबतक मैं आपको मैडम कहता थाआज से आपको सिस्टर कहूँगा। एक ने कहा कि ‘अबतक तो हम लॉकअप के बाद नाटक के बारे में ही सोचते थेअब यह सब बंद हो जाएगा और बेवजह की बातें दिमाग में आएंगीं।‘ राणे नामका कैदी था। उसकी एक्टिंग से सभी अभिभूत हो गए। अजित नामका एक लड़का था। सभी लीड रोल लेने से उसने मना कर दिया और साइड के नामालूम से रोल लेता रहा। उन्हीं भूमिकाओं में उसके एक्शन की डिटेलिंग देखते ही बनती थी।
सबसे बड़ी दिक्कत वहाँ के कड़े प्रतिबंध की है। आप उनसे खुल कर बात नही कर सकते। आप अपनी रिपोर्ट प्रकाशित नही कर सकते। आप उनकी फोटो नही ले सकते। आप प्रेसमीडियालेखक आदि को नही ले जा सकते। मेरा हर बार जेल अधिकारियों से यही कहना रहता है कि आपकी नकारात्मक बातें तो लोग खोज खाजकर छापते ही हैं। अब आप अपनी अच्छी बातेंअच्छे प्रयासों को सामने आने दीजिये ताकि जेल के प्रति लोगों की नकारात्मकता दूर हो। वे चाहते भी हैंमगर ऊपरवाले उन्हें इसकी आज़ादी नही देते।
इसी 10 दिवसीय वर्कशॉप से संबन्धित घटना है। इतनी बड़ी वर्कशॉपवह भी जेल के बंदियों की| मैं झिझक रही थी। मैंने कई लोगों से बातें कीं। सभी ने कहा कि यह बड़ा इंटरेस्टिंग हैवे जरूर इसे जॉइन करना चाहेंगे। बाद में सभी मुकर लिए कुछ ना कुछ कहते हुए। सभी के भीतर यही था कि ठाणे तक का लंबा सफर- दिन भर निकाल जाएगा और मिलेगा कुछ भी नहीं। एक ने अंतत: हामी भी भारी। बड़ी बड़ी योजनाएँ भी बताईं। हमने उनपर भी सोचना शुरू कर दिया। पर ऐन एक दिन पहले शूटिंग हैकहकर वे निकल लिए। अबअब या तो मैं वर्कशॉप कैसिल कर दूँ या अकेले लूँ। रिजल्ट ओरिएटेड हूँसो अकेले जुट गई। टैगोर की पंक्ति मेरी हिम्मत बहुत बँधाती है- ‘जोड़ी तोर डाक शुने केओ ना आशेटोबे एकला चलो रे।‘ सो अकेले चल पड़ी। बाद में कुछ नॉन थिएट्रिकल लोग- जुड़े। अंग्रेज़ी के एक अखबार ने बहुत अच्छी कवरेज दी। 
डेजी नाम की एक कैदी थी इंगलैंड की। बहुत छोटीपर बहुत ज़हीन। हमें देखते ही भागी भागी आती थी। अँग्रेजी उसकी अच्छी थी तो बाकी विदेशी कैदियों की भी बातें मुझे बताती थी। उसने एक बार कहा था कि आप गर्मी के मौसम में हर दिन आइयेगर्मी में कोर्ट बंद रहते हैं। कोई कार्रवाई नही होती हैउसका अवसाद। फिर कोर्ट बंद रहने से उसकी चहल-पहल खत्म और ऊपर से गर्मी। सब आपस में ही बेवजह लड़ती हैं। आपके आने से इन सबको इन सबसे तनिक राहत मिलेगी।
वह खुद बहुत अच्छा कामपेंटिंग करती थी। उसने हमारे वर्कशॉप में एक पेंटिंग बनाई और उसे अपने पिता को भेजने के लिए रख लिया। पर पिता तक पेंटिंग पहुँचने से पहले ही उनका देहांत हो गया। रमेश ओवले नामका कैदी बहुत बढ़िया पेंटर था। हमने उसे पुरस्कृत भी किया था। एक और कैदी था मोरे- वार्ली पेंटिंग का। हमने एक बार अपनी वार्ली पेंटिंग वर्कशॉप उसी से करवाई। उसके उत्साह की कोई सीमा नही थी। वह बोला कि मैं डीआईजी मैडम से कहूँगा कि मैं अपनी यह कला अपने सभी बंदी भाइयों को सिखाना चाहता हूँ।

विभा जी अबतक आप एकपात्रीय नाटक कर चुकी हूँ और आप इसे एक मूवमेंट की तरह भी लेतीं हैं आप इन नाटकों के बारे में कुछ बताएँ |साथ ही ये भी बताएँ की आपने एकल नाटक का ही करने का चयन क्यों किया तथा एकल अभिनय के लिए विषय का चयन करते वक्त किन - किन बातों का ध्यान रखतीं हैं कैसे उसकी रचना प्रकिया से गुज़रतीं है ज़ाहिर है हर एकल नाटक का अपना अलग अनुभव हुआ होगा |
मैंने एकपात्रीय नाटक करने का निर्णय इसलिए लिया क्योंकि एक तो हिन्दी थिएटर जगत में इसे लेकर बड़ी उत्सुकता नही थी। हर ग्रुपहर कलाकार एक एकपात्रीय नाटक भी कर लेता है। मैंने इस ज़रूरत को महसूस किया और एकपात्रीय नाटक को मुख्य धारा से जोड़ने के लिए एकपात्रीय नाटक पर खुद को केन्द्रित किया और इसे एक आंदोलन की तरह लिया। दूसरेएकपात्रीय नाटक अधिक चुनौतीपूर्ण हैऔर अधिक चुनौतीपूर्ण काम करना शायद आदत बन चुकी है। इसी चुनौती के तहत जेल में काम करना शुरू किया था। इसी चुनौती के तहत 2007 से एकपात्रीय नाटक कर रही हूँ। ये नाटक हैं- ‘लाइफ इज नॉट आ ड्रीम’, ‘बालचन्दा’, ‘मैं कृष्णा कृष्ण की’, ‘एक नई मेनका’, बिम्ब-प्रतिबिंब’,‘भिखारिन।‘ और भी नाटक हैंजो अभी लिखे हुए हैं- नागार्जुन की कविताओं पर आधारित ‘चंदू मैंने सपना देखा’, लोक कथाओं पर आधारित,‘रोने की साध’, ‘सामा-चकेबा। पिछले साल 3 और इस साल अबतक 1 नाटक तैयार कर चुकी हूँ।
मेरे सभी नाटक एक ना एक मुद्दे से जुड़े हुए हैं। कह सकते हैं कि महिला प्रधान नाटक है। लेकिनइसमें केवल महिलाओं की ही बातें नही कही गई हैं। पुरुष के श्वेत-श्याम पक्ष दोनों को उजागर किया गया है। समाज और यूथ पर मेरा दृढ़ विश्वास है। उनके प्रति का विश्वास झलकता है मेरे नाटकों में।
एकल अभिनय के लिए विषय का चयन करते वक्त ध्यान रखना होता है कि विषयतकनीककथ्यशैलीसंगीतगीत आदि में से किसी की भी पुनरावृत्ति ना हो। सबसे पहले स्क्रिप्ट पर बहुत काम करती हूँ। इतनी बार कि उतने में तो हर बार एक उपन्यास लिख लिया जाए। शायद एक कारण यह है कि मैं स्वयं लेखक हूइसलिए लेखन के महत्व को समझती हूँ।
हर एकल नाटक का अपना अपना अनुभव है। इसकी रचना प्रकिया एक साथ ही आनंददाई और कष्टदाई दोनों है। आनंद कि आप थिएटर कर रहे हैं। कष्ट कि इसके लेखन से लेकर इसके हर पक्ष को मुझे देखना होता है। तब लगता है कि कोई इसमें मेरा सहायक होता। मेरे रिहर्सल को देखनेवाला मेरे डायरेक्टर के अलावा और कोई नही होता। तो लोगों के फीडबैक नही मिल पाते। यह भी एक चुनौती है। एक तरीके से ठीक भी लगता हैक्योंकि आप सभी को एक साथ संतुष्ट नही कर सकते। नाटक की प्रक्रिया एक सम्पूर्ण प्रक्रिया है। इसके सभी पक्ष को देखना होता है। ‘मैं कृष्णा कृष्ण की’ द्रौपदी और कृष्ण के सखा भाव को लेकर लिखा नाटक है। मैं इसे आज के समय- काल,परिस्थिति से जोड़ना चाहती थी। तभी मेरे इस नाटक का महत्व होतावरना कौन द्रौपदी के बारे में नही जानतामैंने महाभारत पढ़ी और फिर लिखा। द्रौपदी के किरदार में एक ग्रेस लाने के लिए उसके एक एक हाव-भाव पर ध्यान दिया। ‘एक नई मेनका’ में मेनका के मूल नर्तकी के स्वरूप को ध्यान में रखने के लिए भरतनाट्यम और करनाटकी संगीत सीखा। चेन्नई में ये दोनों विधाएँ सुगमता से उपलब्ध हैं। इसमें भी विश्वामित्र पर बहुत काम किया। मिथक भले कहे कि विश्वामित्र मेनका को देखकर ताप भ्रष्ट हो गए। लेकिन मैं यह नहीं मानती कि यह काम इतनी सुगमता से हो गया होगा। आखिर ब्रह्मा के समानान्तर एक नई सृष्टि रचनेवाला इतना कमजोर तो कतई नहीं हो सकता कि वह अपने सामने एक स्त्री को देख कर फिसल जाए। उनके और मेनका दोनों के द्वंद्व को भरपूर तरीके से उजागर करने की कोशिश की। ‘भिखारिन’ करते समय एक साथ बांग्ला और शुद्ध हिन्दी टोन बनाए रखने और एक ही समय में एक पुरुष और एक स्त्री चरित्र को निभाने के लिए भाषा और देह व आवाज पर बहुत काम किया। ‘बिम्ब-प्रतिबिंब’ डेढ़ घंटे का नाटक है। 3 मुख्य पात्र हैं और लगभग 13-14 अन्य सह पात्र। तीनों मुख्य पत्रों के अलग अलग हाव-भाव,बॉडी लैंगवेज़बोलने के तौर तरीके के साथ साथ अन्य सह पात्रों के किरदारों को उनकी अपनी खुसूसियत के साथ प्रस्तुत करना। सबसे पहले डेढ़ घंटे तक दर्शकों को बांधे रखना। और सभी नाटको की पूरी स्क्रिप्ट को याद करके रखना। बहुत डराता है नाटक। हर बार के शो से पहले डरी रहती हूँ- पहले शो की तरह ही। यही डरचुनौतीसृजनशीलता बहुत आनंद देता है नाटक और जीने की ऊर्जा भी।
विभा रानी से मोबाईल नंबर 09444914237 या gonujha.jha@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है | 

Monday, April 23, 2012

सुजाता की रोटियां


'लमही' के अप्रैल-जून, 2012 के कथा समग्र के तहत पढ़े कहानी- सुजाता की रोटियां। आपकी राय और विचारों की प्रतीक्षा रहेगी।
ऐ सुजाता! चल रोटी पका। तेरा नाम पता, तेरा काम पता, तेरा धाम पता। तेरी जात पता, तेरा मान पता,तेरे कुल खानदान का पता। तो क्‍या मुश्किल है रोटी पकाना!चल सुजाता, रोटी पका।
माना तेरा परिवार बड़ा,माना तेरा खानदान बड़ा, माना तेरी प्रतिष्‍ठा बड़ी। पर इसका यह तो मतलब नहीं कि तेरे घर में आटा हो ही भरपूर!लक्ष्‍मी की नहीं कोई गांरटी,सरस्‍वती कभी-कभी रोटी पकाती नहीं, फिर भी चल सुजाता, रोटी पका।
      मत कर याद कि सैकड़ों साल पहले किसी और सुजाता ने खीर पकाई थी, तपस्‍या में लीन किसी राजकुमार को खीर खिलाई थी,उस खीर के आस्‍वाद से राजकुमार को ज्ञान दृष्टि आई थी। मत पूछ सुजाता उस सुजाता से कि ऐ सुजाता, तू तो जंगलवासिनी, पता नहीं बड़ी जाति की कि आदिवासी भीलनी, किसी पैसेवाले की गर्वीली बेटी कि बस एक गरीबनी। बस सुजाता, तू तो बस एक बात बता कि तब जंगल के लोग खीर पकाना जानते थे क्या?
मगर सुजाता, तू तो आज की पौध है, शहर की नस्‍ल है, नामी खानदान की बेटी है। तुझे तो सब पकाना आता है, रोटी भात से लेकर खीर-बिरियानी तक। आलू दम से लेकर चिकन दो प्याजा और मटन कबाब तक.अब यह दीगर बात है कि आज पैसा नहीं है,तो क्या ज़बान पर लिपटा स्वाद कहीं चला जाता है वनवास को? अरे, बुरे काल का शनि तो राजा हरिश्‍चन्‍द्र पर भी आया था,तुम्‍हारे परिवार पर आया तो क्‍या अघटित हो गया?बुरा वक्‍त अपनी जगह, रोटी की मांग अपनी जगह. इसलिए चल सुजाता, रोटी पका।
तो गई सुजाता रोटी पकाने। स्‍कूल जाती मां ने की थी ताकीद, टिन झाड़ ले, सारा आटा बाहर निकाल ले, जितनी बन सके, रोटियां बना ले, बना-बुनूकर बाउजी समेत तीनों भाइयों को खिला ले, बच जाए तो तू भी एक निगल ले।
      ठुनकी थी सुजाता –‘ना मम्‍मी, मुझसे नहीं होगा यह सब। मुझे भी स्‍कूल जाना है, वार्षिक कार्यक्रम में भाग लेना है, गीत गाना है, नाटक करना है। उसकी आंखों में स्‍कूल का वार्षिक कार्यक्रम, डांस, गाना, नाटक सब नाच गया- छम छमा छम छम! नाटक के सम्वाद नदी में नाव की तरह तैरने लगे- “मैं अपनी झांसी किसी को नहीं दूंगी.” स्‍कूल का सुख कोई सुजाता से पूछे. कितनी बातों, रफ्तारों से निज़ात मिल जाती है सुजाता को- घर में क्‍या पकेगा, झाड़ू कौन लगाएगा, बर्तन कौन धोएगा, घर कौन सहेजेगा, बिस्तर कौन संवारेगा, आने-जाने वालों को चाय-नाश्‍ता कौन कराएगा- जितनी देर स्‍कूल में, उतनी देर इन सबसे छुट्टी!
सुजाता मचल पडी, ना मम्‍मी ना, मैं भी स्‍कूल जाऊंगी।
मम्मी ने घुडकी दी- “स्‍कूल की पढ़ाई नहीं चल रही। सिर्फ गाना-बजाना है। एक दिन नहीं जाएगी, गीत नहीं गाएगी, कमर नहीं मटकाएगी, झांसी की रानी को याद नहीं करेगी तो मर नहीं जाएगी। कोई दूसरी लड़की तुम्‍हारी डमी बन जाएगी। अभी तो पहले रोटी पका। पहले पिता-भाई को खिला, मुझे होगी देर। तकना मत मेरी राह।
फिर आप क्‍या खाएंगी मम्‍मी?
खा लूंगी स्‍कूल में कुछ भी। तू मेरी फिकर मत कर।
कैसे फिकर ना करे सुजाता। पता है उसे कि यह पहला मौका नहीं है। ऐसे वक्‍त में मां के मुंह से खा शब्‍द निकलता तो है, मगर क्रियान्वित पी शब्‍द भर होता है, जो केवल शुद्ध और विशुद्ध पानी के गले जा मिलता है।
चली सुजाता रोटी पकाने। दालान से बाउजी पूछ चुके थे। बड़ा भाई आकर घुड़क चुका था। मंझला आंखें दिखा चुका था.छोटा भाई कई बार ठुनक चुका था। मां कबके स्‍कूल जा चुकी थी। अभी तो सुजाता को पानी भी भरना है। गर्मी बिन चूल्‍हे के ही रोटी बनाने का दावा कर रही थी। देह का पानी निकला जा रहा था, जमीन से पानी निकल नहीं रहा था। नलों में पानी आ नहीं रहा था। जभी मकान मालिक ने तल मंजिला अपने लिए रखा था और ऊपरी मंजिला किराए पर चढ़ाया था। मोटर चलाकर, बोरिंग लगाकर धरती का थोड़ा-बहुत पानी तो निकल ही जाता था।
सहृदय मकान मालकिन कहती, ले सुजाता पानी भर ले। सुजाता के पास दो विकल्‍प थे पानी भर-भरकर बाल्‍टी लेकर खड़ी सीढि़यां चढ़े, पिता, तीन भाई और मां सहित खुद के नहाने-खाने-पीने के लिए, घर की साफ-सफाई के लिए, आने-जानेवालों को पानी पेश करने के लिए पानी भर कर रखे।
पर सांस चढ़ जाती। ओढ़नी इधर-उधर होने लगती। बाउजी खांसते-खखारते, भाई लोग आंखें दिखाते,मां कसकर फटकार बरसाती -देह और कपड़े का कोई ख्‍याल नहीं?सुजाता समझ नहीं पाती कि मां इतनी कठोर क्यों है उसके लिए? क्यों वह बाउजी और भाइयों के लिए इतनी नरम है? मां तो टीचर है,फिर भी इतना भेद भाव क्यों है उसके मन में? बेटे को कुछ और, बेटी को कुछ और? 
अरे रे रे रे रे! ये क्‍या सुजाता? देह और कपड़ों से आजाद होना चाहती है? अपनी नई उमर की नई उड़ान भरना चाहती है? दुपट्टा ढलता है तो ढले. मन भटकता है तो भटके, वह हवा की साज पर झरने की धुन में गुनगुनाने लगती है, “घडी घडी मोरा दिल धडके, हाय धडके, क्यों धडके, आज मिलन की बेला में, सर से चुनरिया क्यों सरके?” यहां सर से क्या, पूरी देह से ही ओढनी फिसलकर किधर चली जाया करती, सुजाता को पता ही नहीं चलता.
मां के थप्‍पड़ सुजाता की उम्र के आड़े कभी नहीं आए। थप्पड अपनी जगह, सुजाता के ख्वाब अपनी जगह. सोचती सुजाता -टीचर बनकर मम्‍मी कभी किसी बच्‍चे को न डांटती है न फटकारती है, वही मम्‍मी बनकर हर बात पर कितनी घुड़की, कितने थप्‍पड़? वह भी केवल मुझे. भाइयों को तो कभी कुछ कहती नहीं.
भाई शेर बन जाते. भाई सिनेमा देख आते. भाई बुक स्टॉलवाली तमाम किताबें पढ लेते. सुजाता को भी किताबों का बडा शौक. रूमानी उपन्यासों का बडा चस्का. भाइयों की लाई किताबों की फिराक़ में लगी रहती.भाई लोग तनिक भी इधर से उधर होते कि वह जल्दी जल्दी उन किताबों को घोंटने लगती. कभी चौथाई तो कभी आधी तो कभी पूरी. 
उम्र के साथ सुजाता की ओढ़नी फरफराने लगती, वह गुनगुनाने लगती -हवा में उड़ता जाए, मोरा लाल दुपट्टा मलमल का। उम्र ओढनी से भी आगे बढ़ चली थी सुजाता की, मगर अक्‍ल में अभी भी बालपन था, चाल में गज़ब का अल्‍हड़पन था, आवाज में तबले की शरारत थी, हंसी में सितार की थरथराहट थी। एक बार बज ही तो उठी, जोबना से चुनरिया खिसक गई रे, दुनिया की नज़रिया बहक गई रे। उसे जोबना के अर्थ का पता नहीं था. बस, सुबह वह गीत रेडियो पर सुना था, गीत की धुन ज़बान पर चढ गई थी. वही गीत एक लाइन बन कर सुजाता के कंठ से फूट पडा था. मंझले भाई ने सुन लिया, अंगार जला आया मां के मन में -मम्‍मी? देखिए सुजाता को, गन्‍दे-गन्‍दे फिल्‍मी गीत गाती है।
अब सभी गीत मैं बन की चिडि़या बन के बन-बन डोलूं रे या “ज्योति कलश छलके” तो नहीं होते ना। मम्‍मी ने पूछा भी नहीं कि कौन सा गन्‍दा गीत? सभ्‍य घर के लोग ये थोड़े पूछते हैं कि बच्‍चे ने कौन सी गाली दी? गाली दी- बच्‍चे की सजा के लिए यही काफी है। एक तो गन्‍दा, उस पर से फिल्‍मी गीत। एक करेला खुद तीता, दूजा चढ़ा नीम पर! सो धुनाई हुई, कसकर हुई।
      पानी कोठे पर चढ़ा-चढ़ाकर सुजाता हांफ जाती। भाई आकर कहते -अभी तक इतना ही पानी भरा है? मकान मालकिन ने दिया दूसरा विकल्‍प सुजाता, ऐसा कर! तू बाल्‍टी में रस्‍सी लगाकर नीचे उतार। मैं भर दिया करूंगी उसमें पानी. फिर खींच लेना ऊपर, जैसे कुएं से खींचते हैं. सुजाता की हथेलियां नारियल की रस्‍सी खींच-खींचकर लाल हो जाती। आधा बाल्‍टी पानी छलक- छलक जाता। डांट का प्‍याला सुजाता के लिए तैयार मिलता -विष का प्‍याला राणा जी ने भेजा, पीबत मीरा हांसी रे! पग घुंघरू बांध मीरा नाची रे!
अभी तो सुजाता के हाथ टिन खखोड़ रहे हैं। हिसाब से आटा, हिसाब से पानी। कहीं गीला हो गया तो? रोटी कैसे पकेगी? बाउजी, भाई कैसे खाएंगे? आटा गूंथना कभी अच्‍छा नहीं लगा सुजाता को, ना ही रोटी बनाना. कितना तो हाथ में लग जाता है आटा. फिर चारो ओर सूखा आटा बिखर जाता है रोटी बेलने में. फिर भी उसे कहा जाता है, चल सुजाता, रोटी पका!
क्या करे सुजाता! रोटियां बनानी ही थीं, वह भी उस नपे तुले आटे से. लिहाज़ा, जतन से उसने पेपर बिछाया। पेपर पर सारा आटा निकाला। दिमाग में आया, छन्‍नी से छान तो लें? चोकर नहीं, बस कीड़े-पिल्‍लू हों तो निकाल तो लें?
गई सुजाता छन्‍नी लाने। उम्र और गले ने फिर मारी अंगड़ाई। मुंह से फूट पड़ा फिर एक गीत -इचक दाना बिचक दाना दाने ऊपर दाना, इचक दाना... खो गई सुजाता इस पहेली के उत्तर अनार की कल्‍पना में। अनार के लाल-लाल दाने! तब दिन सोने के और रात चांदी की। बाउजी की बडी सी नाटक मंडली थी। साठ सत्तर लोगों की टोली. एक खूब बडे परिवार जैसा. जो सब खाते, बाउजी खाते। सुजाता सभी की गोद में चिडिए की तरह फुदकती रहती. बाउजी उसे अनार के लाल-लाल दाने खिलाते, उसका जूस पिलाते। उसके घर की बगिया में अनार, अमरूद, लीची, आम सभी पेड़. मगर तक़दीर वाम हो जाए तो कोई क्‍या करे। घर बिका, बगिया भी गई. संग-संग अनार, आंवले, करौंदे सब छूट गए।
            भले थे बाउजी, कभी किसी का बुरा न किया, मगर पिछले जनम के करमों का दोष कि क्‍या कि लक्ष्‍मी वेगवती आंधी की तरह उड़ चली। बाउजी ने सभी लोगों से हाथ जोड़ लिए –‘अब आप सब अपना-अपना रास्ता देख लें।
चलाई जब सुलताना डाकू ने अमीरों पर तलवार
छीनकर धन उनके, दिए उसे गरीबों पर वार!
वो लेकर धन अमीरों का न रखता था कभी पास
ऐसे डाकू से कहो तो कौन ना करे फरियाद
      कि अब दर पर आज हमारे साहेब जी पधारे हैं।
      कि बिटिया की चुनर पर नेह का वो नेग धारे हैं।
बाउजी भी तो सुलताना डाकू ही थे. अमीरों को खेल-तमाशा दिखाया, हंसाया, रूलाया और उनसे मिले पैसों को गरीबों पर लुटाया। पत्‍नी की साड़ी कितनी पुरानी पड़ गई कि बिट्टो सुजाता की चुन्‍नी कितनी फट गई, भाईयों के नाम स्‍कूल से कब-कब कट गए, उन्‍हे नहीं पता। वे तो टोली के संग टोलीवाले, बच्‍चों के संग बच्‍चा बन जाते। गृहस्थी तो मम्‍मी की ज़िम्मेदारी थी. तब भले घर की लडकियां या तो टीचर बनती थीं या डॉक्टर. मगर डॉक्टर के लिए तो बचपन से पढना होता है. टीचर के लिए तब इतनी कडाई नहीं थी. लिहाज़ा, मम्मी ने संगीत सीखा, सिलाई-कढाई सीखी, ड्राइंग सीखी, कविता सीखी, उडिया से हिंदी-उर्दू सीखी और भर्ती हो गई स्‍कूल में। जिस विषय की क्लास में भेज दो, मम्मी उसी में रम जाती. गृहस्थी की गाड़ी मम्‍मी से, नाटक की गाड़ी बाउजी से- चलने लगी, जैसे-तैसे.
            मम्‍मी की गृहस्थी में छह जन ही सही, मगर एक भी जन ऐसा नहीं, जिसे निकाला जा सके,जिसके निकालने से या जिसके निकल जाने से कुछ रोटियों का भार हल्का हो सके। नाटक के लोग मगर निकलते गए- धीरे-धीरे । बाउजी ने ही हाथ जोड़े। नाटक बंद, आमद बंद, मगर घर के पेटों की आमदरफ्त कैसे बंद हो? मांस-मछली के शौकीन बाउजी को बस एक टुकड़ा भर ही चाहिए होता, मगर घर में केवल उन्‍ही के लिए तो नहीं बन सकता न? रोज-रोज के लिए पैसे कहां से आए? फ्रिज भी नहीं कि एक दिन बनाकर चार दिन एक-एक टुकड़ा उनकी थाली में देते रहे। ये ना थी हमारी किस्‍मत कि विसाले-यार होता।
तन्‍द्रा टूटी सुजाता की। हड़बड़ाकर छन्‍नी उठाई और चौके में आई तो कलेजा धक्‍क! आटा कहां गया? आटे का पेपर कहां गया? पता चला कि भाई छोटू बाबू अपने कमरे की सफाई करके कूड़ा बाहर फेंकने जा रहे थे। संयोग से हाथ तनिक थरथराए और सारा कूड़ा आटे पर आन गिरा। भय से देखा इधर-उधर। दीदी नहीं आई नजर! सो झट से आटावाला पूरा पेपर ही उठाया और कर दिया उसे कूड़ेदान के हवाले। चल सुजाता, अब रोटी पका?
छोटू? सुजाता ऐसे चीखी, जैसे उसके गले से बीस तोले सोने का सीताहार किसी ने खींच लिया हो। भय और उत्तेजना से आवाज के साथ-साथ देह भी कांपी -कहां रखा आटा?
कूड़ेदान में!
कहां है कूड़ेदान?’
अब तो जी भाई छोटू बाबू के भी होश फाख्‍ता हो गए। अभी तो यहीं था रसोई के पास. कि तभी भाई छोटू बाबू की निगाह पड़ी उस पर -दीदी, वो देखो, किसी ने दरवाज़े के बाहर रख दिया है। जमादार के आने का वक्‍त हो गया है ना!
भाई, तू कूड़ेदान उठा ला!
कूड़ेदान क्‍यों दीदी, मैं आटेवाला अखबार ही उठा लाता हूं. कूड़ेदान लाए और इस बीच कूड़ा उठानेवाला चला गया तो सारा कूड़ा घर में पड़ा रह जाएगा। मम्‍मी चिल्‍लाएंगी।
सुजाता तय नहीं कर पाई कि वह भाई से क्या कहे?तबतक भाई छोटू बाबू दरवाजा खोलकर बाहर निकल गए। शुक्र था,जमादार आया नहीं था, कूड़ेदान में से आटा गया नहीं था। भाई ने आटा निकाला, वहीं फर्श पर डाला! कूड़ेदान एक पत्‍थर की छोटी सी चट्टान पर रखा जाता था। कूड़ेदान की जगह थी, कुत्ते-बिल्लियों का बसेरा था, कौओं, कबूतरों का डेरा था। भले सुजाता रोज वहां झाड़ू लगाती थी,बाउजी के नाटक बन्‍द होने और मां की टीचरवाली आमदनी में कामवाली के लिए गुंजाईश नहीं थी। पढ़-लिखकर और टीचर होकर भी मां के मन में बेटे-बेटी का फर्क बड़ा कूट-कूटकर भरा हुआ था। सो बर्तन मलने,झाड़ू-पोछा करने,पानी भरने से लेकर खाना बनाने की जिम्‍मेदारी सुजाता पर थी। ऊपर से पढ़ाई की भी। भले भाइयों का मन पढ़ने में नहीं लगता था, मगर सुजाता को तो किताबों के सफेद पन्‍ने और उनपर मोती के दानों की तरह तरतीबवार सजे अक्षर और उनसे बने शब्‍द, वाक्‍य, अनुच्‍छेद इतने आकर्षित करते कि वह उनमें डूब जाती,खो जाती। कागद कारे, मनवा गोरे, प्रेम की चितवन लागी रे, पिया बावरे, मैं सांवरी, नैना, मेघा कारे रे!
पर अभी तो सुजाता परेशान थी- छोटू, जल्‍दी आटा लेकर आ। पर यह क्‍या? छोटू ने कूडेदान से आटा निकालकर बाहर रखा कि सामने कटकर आती पतंग पर नजर गई। चार बार रसोई का चक्‍कर लगा चुके छोटू बाबू कटकर गिरती पतंग को देखकर ऐसे सम्‍मोहित हुए कि बस! आटा वाला अखबार वहीं पटका और दौड़ पड़े कटी पतंग की ओर। लात से लगकर अखबार खिसका, अखबार खिसकने से आटा बिखरा, कुछ छोटू के पैरों पर, कुछ उनके पैरों के नीचे। अखबार पर उनके चरण चिह्न राम की पादुका की तरह विराजमान हो गए –‘प्रविसि नगर कीजै सब काजा, हृदय राखी कोसलपुर राजा। 
पर यहां किसी भी मोड़ पर कुछ भी शुभ नहीं हो रहा था। चली सुजाता बाहर को। अखबार के बाहर बिखरा आटा,आटे पर छोटू के चरण चिह्न। पीछे से आती बाउजी की आवाज –‘बिट्टो, खाना बन गया क्‍या?
हड़बड़ाई सुजाता,घबड़ाई सुजाता। दौड़ पड़ी बाउजी की ओर आटा वहीं छोड़ -अभी बन जाता है बाउजी। कहकर फिर लौटी सुजाता आगे का दृश्‍य और भी गतिमान था, पूर्ण मतिमान था जन्‍म-जन्‍म की दुश्‍मनी भूल कालू कुत्ता और भूरी मौसी एक-एक कोने से आटे को अपने पैरों से बिखेरने में मग्न थे। रोटी की आस उनको भी थी, रोटी की जगह मिले आटे का क्रोध उनमें भी था देर इतनी हो गई? नहीं बनी रोटी अभी तक? कालू और भूरी मौसी भी घुडके- चल सुजाता रोटी पका!
सुजाता रोटी कैसे पकाए? उसके पास सवाल तो थे, जवाब नहीं। जवाब उसे खोजना था, रोटी उसे पकानी थी, दुर-दुर! भाग-भाग! हट हट! की हल्‍की ध्‍वनि से कालू भाई और भूरी मौसी को परे किया। आवाज ऊंची करने पर बाउजी पूछते –‘क्‍या हुआ बिट्टो? खाने के इन्‍तजार में रेडियो से दिल बहलाता बड़ा और कर्नल रंजीत के जासूसी पढ़ता मंझला भाई आ जाते। आटे की वह गत देखते। रोटी तो खाते ही नहीं। मम्‍मी से शिकायत भी करते। बाउजी फिर भूखे रह जाते।
धूल से सनी, मक्खियों से भिनभिनाती जगह पर कुत्ते-बिल्‍ली के मुंहों से बचाती, छोटू के चरण-चिह्नों को झाड़ती सुजाता उठ खड़ी हुई बचे-खुचे आटे के साथ। रसोई में आई सुजाता, आंख में पानी भर लाई सुजाता। पानी में आंसूओं का खारापन मिलाकर गूंथा आटा, पर नमकीन ना हुआ आटा। नारियल की रस्‍सी के सहारे खींचे पानी ने सारा स्‍वाद फीका कर दिया तो क्‍या हुआ? तू चल सुजाता, रोटी पका।
और पहली बार दिखाया सुजाता ने अपनी पाक-कला का हुनर। दाल ऐसी कि मकान मालकिन फर्क भूल जाए सुजाता की दाल और अपने पानी का। सब्‍जी में घर के सारे मिर्च-मसाले डाले और रोटियां तो इतनी पतली-इतनी पतली कि नाइलॉन के दुपट्टे की तरह हवा में उड़-उड़ जाए। पूरी के नन्हें आकार की लोई को रोटी के बडे आकार में तब्‍दील करना मामूली बात तो नहीं थी. वैसे मामूली बात तो यह भी नहीं थी कि उस दिन सुजाता ने रोटी पकाई। बाउजी ने पूछा -बिट्टो, इतनी पतली-पतली चपाती?
जल्‍दी हजम होने के लिए बाउजी।
और सब्‍जी इतनी तीखी? अच्‍छा, मटन नहीं बना है क्‍या? एक टुकड़ा भी मिल जाता तो...
पतंग तो मोहल्‍ले के चार बच्‍चों के बीच फट-चिटकर अपनी अंतिम गत में पहुंच चुकी थी, मगर घुटने छिल-छिला कर आ गया था भाई छोटू बाबू। बड़ा भाई किसी भी रेडियो के किसी भी स्‍टेशन से किसी भी तरह के फिल्‍मी गाने की आस में वेव पर वेव बदल रहा था। मंझला कर्नल रंजीत की सोनिया और उसके मद्धम मोटे संतरे के फांक जैसे होठों की मोटाई में डूबा हुआ था।
सुजाता के जीवन का वह ऐतिहासिक क्षण! चार-चार चपातियां सभी को। दो चपाती मां के लिए भी रखी। शाम में जबरन खिला देगी। एक फिर भी बच गई थी। सुजाता ने सोचा, उसे खा ले, मगर चपाती बनने से पूर्व आटे की उस प्रयाग और काशी यात्रा से वह साक्षात मोक्ष की अवस्‍था में आ गई। उसने सबसे नीचेवाली भाप से गीली-गीली हो आई रोटी उठाई और बाहर निकल आई।
बाहर कालू मामा और भूरी मौसी को लग गई गंध। आए वे मैराथन के धावक की तरह। सुजाता ने आधी-आधी रोटी दोनों के सामने डाल दी। दोनों ने आधी-आधी रोटी लपक ली। सुजाता की आंखों के पानी के सालन की उनको जरूरत नहीं थी। बड़ा भाई फिर से रेडियो घुमा रहा था। मंझला फिर से सोनिया के मद्धम मोटाईवाले होठों की कल्‍पना में डूब गया था। छोटू ने निकर उतारकर फुलपैंट पहन ली। मम्‍मी को पता नहीं चलेगा घुटना फूटने का। बाउजी ने पूछा -बिट्टो, तुमने खाना खाया?
बोली सुजाता -आज सुबह से मेरे पेट में बहुत दर्द है बाउजी।
यह बोलते-बोलते सुजाता को चक्‍कर आया,अंदर से हूल उठी। वह लपक कर बाथरूम में भागी। आटे की प्रयाग और काशी यात्रा का सारा दृश्‍य पेट से निकल-निकलकर बाथरूम के फर्श पर बहने लगा।
आंखें फिर नम हो गईं सुजाता की। सांसें सर्द हो गईं, पेट की मरोड़ शांत हो गई।
आंखें फिर नम हो गईं सुजाता की। सांसें सर्द हो गईं, पेट की मरोड़ शांत हो गई।
……..आज सुजाता पचास की है। फिल्मों की सफल अभिनेत्री और निर्देशक है. आज सुजाता का अपना घर है. आज सुजाता की अपनी गाडियां हैं. आज सुजाता की अपनी तीन-तीन कुतिया है. आज सुजाता के अपने कबूतर हैं। उसके पास कौए तक आते हैं.वह उन्हें प्रेम से मलाई पनीर खिलाती है- अपने हाथों से. धोखे से पनीर की जगह भात खिला दे तो अपनी कानी, तिरछी नजरों से सुजाता को ऐसे घूरते हैं कि बस! थिएटर के दिनों के एक मामा हैं, जीवन के अंतिम चरण में पहुंचे. उनकी सेवा के लिए भी दो नौकर हैं. बस, नहीं है तो सुजाता का वैसा कोई, जिसके लिए वह बेकल होकर रोटी पकाए,कचरे में से आटा उठाए। अब न तो है ऐसी निर्धनता ही कि हिलक हिलक कर आंसू बहाए। आज तो उसके चेहरे पर सफलता की भरपूर मुस्‍कान है, होठों पर बचपन का सोज़ भरा गान है- बचपन के दिन भुला न देना। आज का भी गीत उसके होठों पर है- “दिल में जागे धडकन ऐसे, पहला पहला पानी जैसे....”
फिर भी, अटल सत्‍य तो अटल ही है कि पेट पैसेवाला हो या कंगालवाला उसका मुंह तो हमेशा खुला ही रहता है. भूख सभी को लगती है, रोटी सभी को छकाती है। दूसरों के लिए हो या खुद के लिए, रोटी तो चाहिए ही चाहिए! इसलिए ऐ सुजाता, चल रोटी पका।
पर, आज सुजाता रोटी नहीं पकाती। जरूरत ही नहीं. उसकी कुतियाओं की देखरेख के लिए अलग से विष्‍णु है, बर्तन खंगालने के लिए लक्ष्‍मी है, रोटी पकाने के लिए सरस्वती है। बाउजी सिधार गए, मम्‍मी सिधार गई, बड़ा नाटक करता है. मंझला फिल्म और टीवी का जाना-माना कलाकार है, तीन-तीन शादियां कर चुका है. छोटा रेकॉर्डिंग और फिल्म मेकिंग की क्लास और वर्कशॉप में व्यस्त है.मसलन कि सभी अपनी-अपनी दुनिया में मगन-छगन-जगन है। बस, सुजाता का कोई नहीं है,जिसके लिए वह बेकल होकर रोटी पकाए। शादी और तलाक की याद को वह अपने मन के बक्से में और शादी और पति की तस्वीरों को काठ के बक्से में बंद कर चुकी है.ये यादें उसकी आत्मा को छीलती हैं. बचपन की यादें उसे अधिक सुहानी लगती है. जब-तब उसकी आंखें छलका देती है और वह बुदबुदा उठती है -चल सुजाता, रोटी पका।

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