मां तुम काम करो
खेत में, खलिहान में
स्कूल में, मैदान में,
दफ्तर में , दुकान में,
तुम्हारा काम, हमारा विश्वास
पढने का, आगे बढने का
अच्छा सीखने का, अच्छा कमाने का
तुम काम करो मां!
रोती तो पक ही जाएगी,
भात भी सिंझ ही जाएगा,
फर्श भी साफ हो ही जाएगा
जाले- धूल भी निकल ही जाएंगे
राधा मौसी, रम्भा काकी
सरला दीदी, शांति मौसी बनने से बचने के लिए
तुम काम करो मां!
होते रहेंगे विधवाघर आबाद
बनती रहेंगी यातना घर की जीवंत दास्तान
छेदते रहेंगे लोग आंखों से घर के दरवाज़े, खिडकियां
गढते रहेंगे किस्से कहानियों की झालरें, बंदनवार
हम एक समोसे, एक जामुन, एक अमरूद के लिए
ताकते रहेंगे चचेरे –ममेरे भाई-बहनों को
पडोस के चाचाओं, ताउओं को
डिवोर्सी होना इतना आसान नहीं होता मां
मेरे कल के कॉल लेटर के लिए
तुम आज काम करो मां!
किसी के सामने हाथ न फैलाने के लिए
किसी को दान देने के लिए
किसी के इलाज के लिए
किसी की मदद के लिए
किसी बच्चे को पढाने के लिए
किसी बिटिया को सजाने के लिए
किसी का घर बसाने के लिए
किसी का वर सजाने के लिए
तुम काम करो मां!
अपनी आज़ादी के लिए
चार पैसे बिना पूछे खर्चने के लिए
मनपसंद कपडे या चप्पल खरीदने के लिए
होटल बिल खुद से चुकाने के लिए
सबकुछ ठीक रहने पर भी
अपने ज़िंदा रहने के लिए
अपने होने के अहसास के लिए
तुम काम करो मां!
Tensions in life leap our peace. Chhammakchhallo gives a comic relief through its satire, stories, poems and other relevance. Leave your pain somewhere aside and be happy with me, via chhammakchhallokahis.
Friday, August 6, 2010
Thursday, July 29, 2010
कुछ कविताएं - इस बार.
कोई जंगल बचा रहा है, कोई पहाड,
कोई पेड तो कोई नदी,
कोई लडकी तो कोई बच्चा.
नहीं है किसी का ध्यान, छीजती इंसानियत पर.
कोई आओ, बचाओ उसे.
वह बच गई तो सब बच जाएंगे,
पेड, पहाड,धरती, स्त्री, बच्चे, खेत- सबकुछ.
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कैंसर (1)
सिगरेट का धुआं
धुएं में भविष्य
भविष्य में वर्तमान,
वर्तमान में अतीत
कोई पेड तो कोई नदी,
कोई लडकी तो कोई बच्चा.
नहीं है किसी का ध्यान, छीजती इंसानियत पर.
कोई आओ, बचाओ उसे.
वह बच गई तो सब बच जाएंगे,
पेड, पहाड,धरती, स्त्री, बच्चे, खेत- सबकुछ.
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कैंसर (1)
सिगरेट का धुआं
धुएं में भविष्य
भविष्य में वर्तमान,
वर्तमान में अतीत
सिगरेट का धुआं
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कैंसर (2)
एक निरंतर् पीडा
आस की धुंआती गन्ध
दवाओं के काले मेघ
इलाज की गूंज
लुका छिपी,लुका छिपी
कैंसर ,कैंसर ! ###
ताकत
हम समझदार हैं,
वर्तमान हमसे कांपता है,
भविष्य हम पर इतराता है,
अतीत मुंह चुराता है,
वक्त के जबडे में हम
हमारी हथेली में सिगरेट, धुंआ, शराब,
तम्बाकू, गुटखा और अपने होने का ताकतमय एहसास,
अदम्य है आकर्षण
नीति सोभती हैं किताबों में
हम हैं अविरल,अविकल,अविचल!
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पापा,छोड दो शराब हमारे लिए,
पापा,छोड दो गुटखा हमारे लिए,
पापा,छोड दो तम्बाकू हमारे लिए,
पापा,मत करो फिक्स्ड डिपॉजिट हमारे लिए,
पापा,मत बनाओ घर हमारे लिए
पापा,मत खरीदो गाडी हमारे लिए
पापा, बस तुम रहो हमारे सामने घने छतनार पेड की तरह
पापा, बस, इतना ही करो हमारे लिए!
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Wednesday, July 21, 2010
प्रेम भी करोगे और जान भी नहीं लेंगे?
छम्मकछल्लो को आजकल शोले के संवाद बडे याद आ रहे हैं- “ये हाथ मुझे दे दे ठाकुर.” देने से लेने की परम्परा में बदलता हमारा समाज. छम्मकछल्लो बहुत खुश है. भले हमारा हिंदू धर्म कहे कि हाथ देने के लिए होते हैं, शरीर परमार्थ के लिए होता है. दधीचि ने परमार्थ अस्थि दान दे दिया. रामचंद्र ने पिता की वचन की खातिर राजपाट भाई को दे दिया. कुंती ने माता बनने के लिए मंत्र सिद्धि का दान अपनी सौत माद्री को दे दिया. उर्मिला ने अपने नव विवहित जीवन की परवाह ना करके अपने पति लक्ष्मण को रामचंद्र के साथ वन जाने दे दिया. त्याग यानी देने की मिसाल अपने हिंदू धर्म में कूट कूट कर भरी है. यहां तक कि मृत्यु शय्या पर पडे रावण ने नीति का उपदेश लक्ष्मण को दे दिया. देने से अर्थ है दान देना. इस ‘दे’ में अपना स्वार्थ नहीं देखा जाता.
मगर छम्मकछल्लो क्या करे कि वह अपने महान हिंदू धर्म के पालन में अपने ही लोगों द्वारा कोताही बरती जाते देखकर दुखी पर दुखी हुई जा रही है. भाई लोग नाम लेते हैं हिंदू धर्म का और मानने से इंकार कर देते हैं इसी धर्म की बातों को. अब देखिए ना, हाथ का धर्म है देना, मगर हम ‘शोले’ के गब्बर सिंह की तरह कहते हैं- “ये हाथ मुझे दे दे ठाकुर.” इस तरह से गब्बर ठाकुर से हाथ मांगता नहीं, छीन लेता है. हम भी जान मांगते नहीं, छीन लेते हैं. प्रेम से जान मांगिए, लोग हथेली पर ले कर आपके सामने आ जाएंगे. मगर यही प्रेम तो सभी की जान का जंजाल बना है. इसलिए इस प्रेम की बात करेंगे तो आपकी भी जान ले ली जाएगी, सावधान!
खाप, मर्यादा, जाति, धर्म, प्रतिष्ठा और ना जाने किस किस नाम पर जान ले लेने की परम्परा बन गई है. कृष्ण के देश में प्रेम पर इतना बडा व्यभिचारी आरोप! ज़रा कुंती के पुत्र जन्म की बात सोच लीजिए. ज़रा माता सत्यवती के आग्रह पर वेदव्यास के कर्तव्य का स्वरूप सोच लीजिए, जिसके कारण धृतराष्ट्र और पांडु का और फिर माता सत्यवती के ही आग्रह पर वेदव्यास के पुण्य प्रताप से विदुर का जन्म हुआ. स्वयं माता सत्यवती से ही वेदव्यास के ही जन्म की गाथा जान लीजिए. ज़रा अर्जुन और सुभद्रा के विवाह के पहले के रिश्ते की जांच कर लीजिए. ज़रा अहिल्या के साथ इंद्र के और वृन्दा के साथ विष्णु के कारनामे की बात पर गौर कर लीजिए और फिर अपने महान धर्म का झंडा उठाकर गौरव से चलिए और प्रेम की राह चलते लोगों की जानें लेते रहिए.
कोई कहे इन वीर-बांकुरों से कि हे इस महान धरती के महान सपूत, इस तथाकथित जाति, गौरव, धर्म और गोत्र के नाम पर तुम ही अपनी जान दे दो, तो वे उछल कर चार मील दूर जा गिरेंगे और वहीं से आपकी जान लेने का फर्मान भी निकाल देंगे, जिस पर तुरंत ही कोई दूसरा अमल भी कर देगा. और वे तो चैतन्य चूर्ण और अमिय हलाहल मद भरे, स्वेत स्याम रतानार पर वारी वारी जाते हुए तनिक नखरीले नाजुक स्वर में कहते रहेंगे कि ना जी ना. हम जान देने के लिए थोडे ना बने हैं.
फिर उनका वीर रस जागेगा और वे हुंकारा भरेंगे कि “रामपुर के वासियो!” (यह भी गब्बर का सम्वाद है) हम तो लेने के लिए बने हैं. यही हमारी ताकत है. इस ताकत का आधार हमारा महान धर्म है. इस महान हिंदू धर्म के वेद-पुराण, गीता, रामायण, महाभारत के संदर्भ निकालोगे तो मां कसम हमें आपको भी धर्म विरोधी कहते और आपकी जान लेते देर नहीं लगेगी.
ओये जी, छोडो बुद्ध, महावीर की इस बात को कि आप किसी को जान दे नहीं सकते, तो ले कैसे सकते हैं? उसने कह दिया और हमने मान लिया, ऐसा होता है क्या? नियम ही मानने लग जाएं तो इस देश की निरुपमाएं, बबलियां बेटियां हो कर पैदा भी होती रहेंगी और दूसरी जाति या अपने गोत्र में ब्याह कर हमारी मूंछें भी मुंडाती रहेंगी. एक करेला खुद तीता, दूजा चढा नीम पर.
हां जी हां हम माने लेते हैं कि हां, हमारी मूंछ के बाल इतने कमजोर हैं कि अपने मन की ताकत से उसे ऊंची उठाए नहीं रख सकते? हम मन से इतने कमजोर हैं कि किसी के द्वारा हम पर एक व्यंग्य बाण छोड देने से हम इतने तिलमिला जाते हैं कि हम और किसी की नहीं, अपने ही बच्चों की जान ले लेते हैं? हमारा धर्म और हमारे संत तो सहनशीलता का अमिट पाठ पढाते आए हैं. मगर हम पाठ पढ ही लें तो जी हम बडे कैसे बने रहेंगे? बडे की बात तो तब है ना, जब हम आप सबके लिए आतंक का पर्याय बने रहें. नियम को माननेवाले से कोई डरता है क्या? जो नियम कायदे कानून तोडता है, देखिए, लोग उससे कैसे डरते हैं, चाहे वह चोर हो या डाकू, या जान देने के बदले जान ले लेनेवाले हम वीर-बांकुरे. देना तो कर्तव्य भाव दिखाता है और लेना अधिकार भाव. और हम अब काहे के लिए कर्तव्य के पीछे माथापच्ची करें? हमारा अधिकार हमारा अधिकार है और जो हमें हमारा अधिकार नहीं लेने देगा, उससे हम यह छीन लेंगे, चाहे उसके लिए अपने ही बच्चों की जान क्यों न लेनी पडे? आखिर वह हमारा बच्चा है. पाल रहे थे तो पूछा कि क्यों पाल रहे हो? जान ले ली तो पूछने आ गए. चल फूट यहां से!
मगर छम्मकछल्लो क्या करे कि वह अपने महान हिंदू धर्म के पालन में अपने ही लोगों द्वारा कोताही बरती जाते देखकर दुखी पर दुखी हुई जा रही है. भाई लोग नाम लेते हैं हिंदू धर्म का और मानने से इंकार कर देते हैं इसी धर्म की बातों को. अब देखिए ना, हाथ का धर्म है देना, मगर हम ‘शोले’ के गब्बर सिंह की तरह कहते हैं- “ये हाथ मुझे दे दे ठाकुर.” इस तरह से गब्बर ठाकुर से हाथ मांगता नहीं, छीन लेता है. हम भी जान मांगते नहीं, छीन लेते हैं. प्रेम से जान मांगिए, लोग हथेली पर ले कर आपके सामने आ जाएंगे. मगर यही प्रेम तो सभी की जान का जंजाल बना है. इसलिए इस प्रेम की बात करेंगे तो आपकी भी जान ले ली जाएगी, सावधान!
खाप, मर्यादा, जाति, धर्म, प्रतिष्ठा और ना जाने किस किस नाम पर जान ले लेने की परम्परा बन गई है. कृष्ण के देश में प्रेम पर इतना बडा व्यभिचारी आरोप! ज़रा कुंती के पुत्र जन्म की बात सोच लीजिए. ज़रा माता सत्यवती के आग्रह पर वेदव्यास के कर्तव्य का स्वरूप सोच लीजिए, जिसके कारण धृतराष्ट्र और पांडु का और फिर माता सत्यवती के ही आग्रह पर वेदव्यास के पुण्य प्रताप से विदुर का जन्म हुआ. स्वयं माता सत्यवती से ही वेदव्यास के ही जन्म की गाथा जान लीजिए. ज़रा अर्जुन और सुभद्रा के विवाह के पहले के रिश्ते की जांच कर लीजिए. ज़रा अहिल्या के साथ इंद्र के और वृन्दा के साथ विष्णु के कारनामे की बात पर गौर कर लीजिए और फिर अपने महान धर्म का झंडा उठाकर गौरव से चलिए और प्रेम की राह चलते लोगों की जानें लेते रहिए.
कोई कहे इन वीर-बांकुरों से कि हे इस महान धरती के महान सपूत, इस तथाकथित जाति, गौरव, धर्म और गोत्र के नाम पर तुम ही अपनी जान दे दो, तो वे उछल कर चार मील दूर जा गिरेंगे और वहीं से आपकी जान लेने का फर्मान भी निकाल देंगे, जिस पर तुरंत ही कोई दूसरा अमल भी कर देगा. और वे तो चैतन्य चूर्ण और अमिय हलाहल मद भरे, स्वेत स्याम रतानार पर वारी वारी जाते हुए तनिक नखरीले नाजुक स्वर में कहते रहेंगे कि ना जी ना. हम जान देने के लिए थोडे ना बने हैं.
फिर उनका वीर रस जागेगा और वे हुंकारा भरेंगे कि “रामपुर के वासियो!” (यह भी गब्बर का सम्वाद है) हम तो लेने के लिए बने हैं. यही हमारी ताकत है. इस ताकत का आधार हमारा महान धर्म है. इस महान हिंदू धर्म के वेद-पुराण, गीता, रामायण, महाभारत के संदर्भ निकालोगे तो मां कसम हमें आपको भी धर्म विरोधी कहते और आपकी जान लेते देर नहीं लगेगी.
ओये जी, छोडो बुद्ध, महावीर की इस बात को कि आप किसी को जान दे नहीं सकते, तो ले कैसे सकते हैं? उसने कह दिया और हमने मान लिया, ऐसा होता है क्या? नियम ही मानने लग जाएं तो इस देश की निरुपमाएं, बबलियां बेटियां हो कर पैदा भी होती रहेंगी और दूसरी जाति या अपने गोत्र में ब्याह कर हमारी मूंछें भी मुंडाती रहेंगी. एक करेला खुद तीता, दूजा चढा नीम पर.
हां जी हां हम माने लेते हैं कि हां, हमारी मूंछ के बाल इतने कमजोर हैं कि अपने मन की ताकत से उसे ऊंची उठाए नहीं रख सकते? हम मन से इतने कमजोर हैं कि किसी के द्वारा हम पर एक व्यंग्य बाण छोड देने से हम इतने तिलमिला जाते हैं कि हम और किसी की नहीं, अपने ही बच्चों की जान ले लेते हैं? हमारा धर्म और हमारे संत तो सहनशीलता का अमिट पाठ पढाते आए हैं. मगर हम पाठ पढ ही लें तो जी हम बडे कैसे बने रहेंगे? बडे की बात तो तब है ना, जब हम आप सबके लिए आतंक का पर्याय बने रहें. नियम को माननेवाले से कोई डरता है क्या? जो नियम कायदे कानून तोडता है, देखिए, लोग उससे कैसे डरते हैं, चाहे वह चोर हो या डाकू, या जान देने के बदले जान ले लेनेवाले हम वीर-बांकुरे. देना तो कर्तव्य भाव दिखाता है और लेना अधिकार भाव. और हम अब काहे के लिए कर्तव्य के पीछे माथापच्ची करें? हमारा अधिकार हमारा अधिकार है और जो हमें हमारा अधिकार नहीं लेने देगा, उससे हम यह छीन लेंगे, चाहे उसके लिए अपने ही बच्चों की जान क्यों न लेनी पडे? आखिर वह हमारा बच्चा है. पाल रहे थे तो पूछा कि क्यों पाल रहे हो? जान ले ली तो पूछने आ गए. चल फूट यहां से!
Tuesday, July 20, 2010
ये क्या? आदमी पूरे कपडे में और औरतें आधे- अधूरे में?
छम्मकछल्लो से नाराज रहनेवाले भाई लोगो, इस बार आप उससे नाराज़ होने का कोई सबब न पा सकेंगे. बडे दिनों से छम्मकछल्लो अपने भाई लोगों की नसीहतों पर ध्यान दे रही थी. एक दिन अचानक उसे भी बिना किसी पेड के नीचे बैठे ही और बिना किसी के हाथ की खीर खाए ही दिव्य ज्ञान मिल गया. निस्संदेह यह ज्ञान उसे आप भाई लोगों से ही मिला है. इसलिए सारा श्रेय आप भाई लोगों को ही जाता है, सो जानिएगा और इसका मान रखिएगा.
अब इस दिव्य ज्ञान की बात आपको बताई जाए. हुआ यों कि छम्मकछल्लो एक दिन एक सेमिनार में भाग लेने गई. सेमिनार था न, सो बडे बडे लोग बुलाए गए थे. सो भैया, ये बडे बडे लोग वो सूट-बूट और टाई में थे कि क्या कहें! उन लोगों की कंठलंगोट रोबदारी देख कर तो छम्मकछल्लो के होश ही फाख़्ता हो गए. फिर भी होशो-हवास को अपने काबू में रखकर वह वहां के सारे तामझाम देखती रही. अचानक उसके दिमाग़ की घंटी टनटना उठी, जब उसने देखा कि ये सारे के सारे स्वनाम धन्य तो ऊपर से नीचे तक गलेबंद कपडों मे बंद हैं. छम्मकछल्लो को दिव्यज्ञान इसी में मिला कि इसीलिए तो ये सभी के सभी हम औरतों को सात सात कपडों के भीतर रहने की बराबरी की बात करते हैं.
अब आप ही देखिए न! आदमी सूट, टाई से लेकर जूते मोजे तक में सम्पूर्ण रूप से बंधा रहता है. टाई के कारण तो उसका गला ऐसा बंधा रहता है कि जब वे शाम में टाई से मुक्त होते हैं तो राहत की लम्बी सांस छोडते हैं. आप गौर से देखेंगे तो पाएंगे कि वह गरदन से लेकर पैर तक ढंका हुआ है. उसके शरीर में केवल सर और हथेलियां खुले हैं. अब महिलाएं ज़रा सोचें. वे जब कपडे पहनती हैं, तब उनके शरीर के कितने हिस्से खुले रहते हैं? लोग कहते हैं कि आदमी औरतों को बराबरी का दर्ज़ा देना नं का. सरासर ग़लत है. वह तो सदा से उसे अपनी बराबरी का दरज़ा देते हुए उसके पूरे कपडे में रहने की चाहत रखता है. और अब शोले के गब्बर सिंह की तरह छम्मकछल्लो का भी सवाल है कि ‘अगर वह ऐसा चाहता है तो क्या गुनाह करता है?” और छम्मकछल्लो कहती है कि नहीं, वह कोई गुनाह नहीं करता.
इसलिए हे इस देश की तमाम देवियो! पुरुषोंकी बराबरी करना चाहती हो तो पहले उनके शरीर ढंकने के रिवाज में ही उनकी बराबरी में आ जाओ. पूरे कपडे में रहो. यह दीगर बात है कि तुम पूरे कपडे में भी रहोगी, तब भी उनमें से कितनों की बेधक नज़रें कपडों की उन सात सात तहों के भीतर भी जा पहुंचेंगी, जिधर आमतौर पर औरतों की नज़रें नहीं जातीं. पर यह तो नज़र और नज़रिया का मामला है. कपडों का उससे क्या लेना-देना!
अब इस दिव्य ज्ञान की बात आपको बताई जाए. हुआ यों कि छम्मकछल्लो एक दिन एक सेमिनार में भाग लेने गई. सेमिनार था न, सो बडे बडे लोग बुलाए गए थे. सो भैया, ये बडे बडे लोग वो सूट-बूट और टाई में थे कि क्या कहें! उन लोगों की कंठलंगोट रोबदारी देख कर तो छम्मकछल्लो के होश ही फाख़्ता हो गए. फिर भी होशो-हवास को अपने काबू में रखकर वह वहां के सारे तामझाम देखती रही. अचानक उसके दिमाग़ की घंटी टनटना उठी, जब उसने देखा कि ये सारे के सारे स्वनाम धन्य तो ऊपर से नीचे तक गलेबंद कपडों मे बंद हैं. छम्मकछल्लो को दिव्यज्ञान इसी में मिला कि इसीलिए तो ये सभी के सभी हम औरतों को सात सात कपडों के भीतर रहने की बराबरी की बात करते हैं.
अब आप ही देखिए न! आदमी सूट, टाई से लेकर जूते मोजे तक में सम्पूर्ण रूप से बंधा रहता है. टाई के कारण तो उसका गला ऐसा बंधा रहता है कि जब वे शाम में टाई से मुक्त होते हैं तो राहत की लम्बी सांस छोडते हैं. आप गौर से देखेंगे तो पाएंगे कि वह गरदन से लेकर पैर तक ढंका हुआ है. उसके शरीर में केवल सर और हथेलियां खुले हैं. अब महिलाएं ज़रा सोचें. वे जब कपडे पहनती हैं, तब उनके शरीर के कितने हिस्से खुले रहते हैं? लोग कहते हैं कि आदमी औरतों को बराबरी का दर्ज़ा देना नं का. सरासर ग़लत है. वह तो सदा से उसे अपनी बराबरी का दरज़ा देते हुए उसके पूरे कपडे में रहने की चाहत रखता है. और अब शोले के गब्बर सिंह की तरह छम्मकछल्लो का भी सवाल है कि ‘अगर वह ऐसा चाहता है तो क्या गुनाह करता है?” और छम्मकछल्लो कहती है कि नहीं, वह कोई गुनाह नहीं करता.
इसलिए हे इस देश की तमाम देवियो! पुरुषोंकी बराबरी करना चाहती हो तो पहले उनके शरीर ढंकने के रिवाज में ही उनकी बराबरी में आ जाओ. पूरे कपडे में रहो. यह दीगर बात है कि तुम पूरे कपडे में भी रहोगी, तब भी उनमें से कितनों की बेधक नज़रें कपडों की उन सात सात तहों के भीतर भी जा पहुंचेंगी, जिधर आमतौर पर औरतों की नज़रें नहीं जातीं. पर यह तो नज़र और नज़रिया का मामला है. कपडों का उससे क्या लेना-देना!
Thursday, June 24, 2010
समलैंगिकता, शादी और ऑनर किलिंग
अभी समलैंगिकता पर बहस चल रही है. कानूनी मान्यता के बावज़ूद हमारा मन इसे स्वीकार नहीं कर पा रहा है. देश के लडके अब क्या करें? ऐसे ही गर्भ में या जनमते ही बेटियों को मार दिए जाने के कारण बेटियों की संख्या हज़ार लडकों पर 833 हो गई है. मां-बाप की गलती का खामियाज़ा वे भुगतेंगे कि हर हज़ार में से 167 लडके बिन ब्याहे ही रह जाएंगे. समलैंगिकता उनके लिए एक वरदान है, यह लोगों की समझ में नहीं आ रहा. हम शिखंडी जैसे महाभारत को चरित्र को भूल जाते हैं, विष्णु के मोहिनी रूप को दरकिनार कर देते हैं. द्रौपदी और उनके पांच पतियों को नकार देते हैं. आप धर्म को जितना नकारेंगे, उसके मूल रूप के साथ छेडछाड करेंगे, लोग उतने ही उसको नकारते हुए अपने लिए अलग अलग राहें बनाते चले जाएंगे. धर्म के नाम पर आखिर कबतक आप लोगों को गुमराह करते रहेंगे?
अभी दो-चार दिन पहले किसी ने यूं ही छम्मकछल्लो पर अंधेरे का तीर छोड दिया कि सुना कि उसकी बेटी ने शादी कर ली है. छम्मकछल्लो ने उन्हें समझाया कि उसकी बेटी अपने से शादी नही करेगी, क्योंकि उसे अपने मां-बाप की ओर से इसकी आशंका नहींहै कि वह जिस लडके को पसंद करेगी, वह उसके मां-बाप को पसंद आएगा कि नहीं. छम्मकछल्लो ने अपने मित्र को आश्वस्त किया कि वे घबडाएं नहीं. छम्मकछल्लो अपनी बेटी की शादी बेटी की मर्ज़ी से ही करेगी और उन्हें भी शादी में ज़रूर बुलाएगी. छम्मकछल्लो को अपनी बेती पर भरोसा है और बेटी को भी अपनी मां पर. दूसरे छम्मकछल्लो बेटी की शादी की आज़ादी में कभी कोई बाधक नहीं बनेगी. यह मां की तरफ से बेटी को उपहार है, ऑनर किलिंगका डर नहीं.
ऑनर किलिंग एक नया रूप है लोगों की आज़ादी छीनने का. हम बचपन से अपने बच्चों को उनकी इच्छा के अनुसार खाने देते हैं, पहनने देते हैं, उनको अपना कैरियर चुनने देते हैं, मगर उन्हें अपना जीवन साथी चुनने की इज़ाज़त नहीं देते. जिस जीवन साथी के बल पर उनकी पूरी ज़िंदगी की खुशहाली या बदहाली टिकी होती है, उसी पर हम कुंडली मारकर बैठ जाते हैं और सगर्व कहते हैं कि हम उनके मां-बाप हैं. छम्मकछल्लो मां-बाप के रूप में बैठे ऐसे सांपरूपी मां-बाप को सिरे से खारिज करती है और भगवान बुद्ध का पूछा सवाल ही दुहराती है कि किसी को जीवन जब दे नहीं सकते तो उसे छीनने का अधिकार तुम्हें कहां से मिल गया? मां-बाप या समाज के रूप में बैठे देश के इन सपूतों के साथ क्या सुलूक हो, देश के सपूत ही बताएं. हर बात में युवा वर्ग को ही दोषी देनेवाले ज़रा कभी इस पर सोचने की ज़हमत उठाएंगे?
अपने आप को बुद्धिमान, सयाना कहनेवाले इस देश के लोग अब क्या हर बात के लिए कोर्ट कचहरी का ही मुंह देखेंगे? क्या अदालत ही सबकुछ तय करती रहेगी? क्या हमलोग बुद्धि या सम्वेदना से बिलकुल शून्य हो गए हैं?
अभी दो-चार दिन पहले किसी ने यूं ही छम्मकछल्लो पर अंधेरे का तीर छोड दिया कि सुना कि उसकी बेटी ने शादी कर ली है. छम्मकछल्लो ने उन्हें समझाया कि उसकी बेटी अपने से शादी नही करेगी, क्योंकि उसे अपने मां-बाप की ओर से इसकी आशंका नहींहै कि वह जिस लडके को पसंद करेगी, वह उसके मां-बाप को पसंद आएगा कि नहीं. छम्मकछल्लो ने अपने मित्र को आश्वस्त किया कि वे घबडाएं नहीं. छम्मकछल्लो अपनी बेटी की शादी बेटी की मर्ज़ी से ही करेगी और उन्हें भी शादी में ज़रूर बुलाएगी. छम्मकछल्लो को अपनी बेती पर भरोसा है और बेटी को भी अपनी मां पर. दूसरे छम्मकछल्लो बेटी की शादी की आज़ादी में कभी कोई बाधक नहीं बनेगी. यह मां की तरफ से बेटी को उपहार है, ऑनर किलिंगका डर नहीं.
ऑनर किलिंग एक नया रूप है लोगों की आज़ादी छीनने का. हम बचपन से अपने बच्चों को उनकी इच्छा के अनुसार खाने देते हैं, पहनने देते हैं, उनको अपना कैरियर चुनने देते हैं, मगर उन्हें अपना जीवन साथी चुनने की इज़ाज़त नहीं देते. जिस जीवन साथी के बल पर उनकी पूरी ज़िंदगी की खुशहाली या बदहाली टिकी होती है, उसी पर हम कुंडली मारकर बैठ जाते हैं और सगर्व कहते हैं कि हम उनके मां-बाप हैं. छम्मकछल्लो मां-बाप के रूप में बैठे ऐसे सांपरूपी मां-बाप को सिरे से खारिज करती है और भगवान बुद्ध का पूछा सवाल ही दुहराती है कि किसी को जीवन जब दे नहीं सकते तो उसे छीनने का अधिकार तुम्हें कहां से मिल गया? मां-बाप या समाज के रूप में बैठे देश के इन सपूतों के साथ क्या सुलूक हो, देश के सपूत ही बताएं. हर बात में युवा वर्ग को ही दोषी देनेवाले ज़रा कभी इस पर सोचने की ज़हमत उठाएंगे?
अपने आप को बुद्धिमान, सयाना कहनेवाले इस देश के लोग अब क्या हर बात के लिए कोर्ट कचहरी का ही मुंह देखेंगे? क्या अदालत ही सबकुछ तय करती रहेगी? क्या हमलोग बुद्धि या सम्वेदना से बिलकुल शून्य हो गए हैं?
Sunday, June 6, 2010
क्रिश्चन हो तो क्या हुआ?
छम्मकछल्लो मुदित है, 'घर-घर देखा, एक ही लेखा' की परिपाटी से. धर्म के ठेकेदारों ने धर्म की बहुत बढिया हालत बना दी है अपने समाज मे, इस सभ्यता से भरे विश्व में. कमलेश्वर ने लिखा 'कितने पाकिस्तान'. आज ज़र्रे ज़र्रे में धर्म के ठेकेदार दीमक की तरह धर्म के तखत में इस तरह पैठ बनाए हुए है कि इंसानियत कहीं से भी अपना आसन जमा ही नही सकती.
छम्छम्मकछल्लो की एक दोस्त है. दोस्त की एक बेटी है. बेटी के हाथ में 12वीं का रिजल्ट है. रिजल्ट के साथ छुपे हैं कई कई सपने उसकी आंखों में. उनमें से एक है, मुंबई के दो बडे संस्थानों में पढने का. दोस्त की बेटी मुतमईन है कि अगर कट ऑफ से मार्क्स कम भी हुए तो उसे कोटा में तो एडमिशन मिल ही जाएगा. मुंबई में सभी शैक्षणिक संस्थानों पर उसके खोलनेवाले धर्म, सम्प्रदाय, कम्यूनिटी की प्रधानता रहती है, जिस समुदाय द्वारा उसे खोला गया है, उसके बच्चों को कम नम्बर मिलने पर भी एडमिशन मिलने की सम्भावना प्रबल रहती है.
दोस्त की बेटी जाती है, दोनों संस्थानों में. आवेदन देती है. उसे कहा जाता है-" यू विल नॉट गेट एडमिशन हेयर."
"बट व्हाइ सर?"
"बिकॉज़, यू डोंट बिलॉंग टू माइनॉरिटी."
"बट आ'म क्रिश्चय्न सर."
"सो व्हॉट! यू आ' नॉट अ कैथोलिक."
"सर. आ' मे नॉट बी ए कैथोलिक, बट आ'म अ क्रिश्च्न नो सर?"
दोस्त की बेटी लौट आती है मायूस होकर. उसकी आंखों में अब सपनों के बदले मायूसी है. मगर इसकी चिंता न तो धर्म के ठेकेदारों को है और ना ही धर्म समुदाय आदि द्वारा खोले गए शिक्षण संस्थानों के ठेकेदारों को. छम्मकछल्लो बचपन से सुनती आई है कि हिन्दू धर्म में ही इतने देवी-देवता, पंथ, सम्प्रदाय होते हैं. मुस्लिम और क्रिश्चन धर्म में ऐसा कोई भेद-भाव नहीं है. छम्मकछल्लो बचपन से देखती आई है कि सभी मुसलमान एक ही भाव से ईद की नमाज़ पढने जाते हैं, एक ही भाव से मुहर्रम के ताज़िए निकालते हैं, सभी क्रिश्चन एक ही भाव से क्रिस्मस और गुड फ्राएडे मनाते हैं. सभी मुसलमान पांचो वक़्त की नमाज़ अदा करते हैं. सभी क्रिश्चन हर रविवार की सुबह के 'संडे मास' में जाते ही जाते हैं. तो फिर यह भेद-भाव कैसा? छम्मकछल्लो को बहुत बाद में पता चला कि मुसलमान में शिया-सुन्नी होते हैं और क्रिश्चन में कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट्स. दोनों एक -दूसरे से खुद को बडा साबित करने पर तुले रहते हैं. शिया सुन्नी को और सुन्नी शिया को और कैथोलिक प्रोटेस्टेंट को और प्रोटेस्टेंट कैथोलिक को नफरत की निगाहों से देखते हैं. उनके बीच रोटी-बेटी का सम्बन्ध नहीं होने देते. छम्मकछल्लो ने एक बार इद्दत पर आधारित अपनी एक कहानी "बेमुद्दत" भोपाल में आयोजित एक अनौपचारिक गोष्ठी में सुनाई. भोपाल के बडे मशहूर लेखक वहां थे. उन्होंने कहानी को सिरे से नकार दिया यह कहकर कि यह मुसलमान के पृष्ठभूमि की कहानी नहीं है. उनमें ऐसा नहीं होता. बाद में कहा कि उन्हें मुसलमान के इस कौम बोरी मुस्लिम की जानकारी नहीं है. ए पता करेंगे और तब इसके बारे में बात करेंगे." छम्मकछल्लो ने वही कहानी पटना में अपने एक दोस्त -लेखक को दी. लेखक ने कहानी को तो नकारा ही, उन्होंने तो बोरी मुस्लिम, को ही नकार दिया यह कहते हुए कि " क्या बकवास कहानी है. और यह बोरी मुस्लिम क्या होते हैं? हम तो उनको मुसलमान मानते ही नहीं." जैसे हिन्दू धर्म के नुमाइन्दे शूद्रों को हिन्दू या मनुष्य मानते ही नहीं.
छम्मकछल्लो खुश है. धर्म-धर्म के बीच की लडाई नहीं, धर्म के भीतर की ही लडाई में हम बडे तो हम बडे, ''वो छोटा' तो 'वो घटिया", ' वो हमारे धर्म का नहीं' तो 'उसका हमारे धर्म से कोई लेना-देना नहीं" में लोग फंसे हैं. मंटो ने शिया-सुन्नी के आपसी विवादों को लेकर कई कहानियां लिखीं, दलित हिन्दुओं के खिलाफ लिखते हैं, कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट आपस में एक-दूसरे को नहीं मानते. सभी जगह धर्म की एक ही स्थिति है. वह थाली के बैगन की तरह है. जिसे जहां मर्ज़ी, वहां उसे लुढका देता है. काश कि धर्म के भी हाथ-पैर, दिल-दिमाग होते और वह एक स्वतंत्र अस्तित्व की तरह अपने बारे में अपना निर्णय ले सकता. तब शायद दोस्त की बेटी को नामांकन भी मिल जाता और छम्मकछल्लो की कहानी को कुछ सह्र्दय मुसलमान भी, खासकर मुसलमान-लेखक. मुसलमान लेखन जैसे विशेषण देते हुए छम्मकछल्लो बहुत तकलीफ महसूस कर रही है, मगर कई बार तकलीफ होते हुए भी हमें अपनी ज़बान खोलनी ही पडती है. छम्मकछल्लो के सामने उसकी दोस्त की बेटी का मायूस चेहरा है तो उसके सामने उस दोस्त का भी, जिसने अपनी 72 साला सास पर थोपे गए इद्दत की इस प्रथा पर गहरा दुख ज़ाहिर करते हुए कहा था कि अगर तुम कुछ इस पर लिख सकती हो तो लिखो.
छम्छम्मकछल्लो की एक दोस्त है. दोस्त की एक बेटी है. बेटी के हाथ में 12वीं का रिजल्ट है. रिजल्ट के साथ छुपे हैं कई कई सपने उसकी आंखों में. उनमें से एक है, मुंबई के दो बडे संस्थानों में पढने का. दोस्त की बेटी मुतमईन है कि अगर कट ऑफ से मार्क्स कम भी हुए तो उसे कोटा में तो एडमिशन मिल ही जाएगा. मुंबई में सभी शैक्षणिक संस्थानों पर उसके खोलनेवाले धर्म, सम्प्रदाय, कम्यूनिटी की प्रधानता रहती है, जिस समुदाय द्वारा उसे खोला गया है, उसके बच्चों को कम नम्बर मिलने पर भी एडमिशन मिलने की सम्भावना प्रबल रहती है.
दोस्त की बेटी जाती है, दोनों संस्थानों में. आवेदन देती है. उसे कहा जाता है-" यू विल नॉट गेट एडमिशन हेयर."
"बट व्हाइ सर?"
"बिकॉज़, यू डोंट बिलॉंग टू माइनॉरिटी."
"बट आ'म क्रिश्चय्न सर."
"सो व्हॉट! यू आ' नॉट अ कैथोलिक."
"सर. आ' मे नॉट बी ए कैथोलिक, बट आ'म अ क्रिश्च्न नो सर?"
दोस्त की बेटी लौट आती है मायूस होकर. उसकी आंखों में अब सपनों के बदले मायूसी है. मगर इसकी चिंता न तो धर्म के ठेकेदारों को है और ना ही धर्म समुदाय आदि द्वारा खोले गए शिक्षण संस्थानों के ठेकेदारों को. छम्मकछल्लो बचपन से सुनती आई है कि हिन्दू धर्म में ही इतने देवी-देवता, पंथ, सम्प्रदाय होते हैं. मुस्लिम और क्रिश्चन धर्म में ऐसा कोई भेद-भाव नहीं है. छम्मकछल्लो बचपन से देखती आई है कि सभी मुसलमान एक ही भाव से ईद की नमाज़ पढने जाते हैं, एक ही भाव से मुहर्रम के ताज़िए निकालते हैं, सभी क्रिश्चन एक ही भाव से क्रिस्मस और गुड फ्राएडे मनाते हैं. सभी मुसलमान पांचो वक़्त की नमाज़ अदा करते हैं. सभी क्रिश्चन हर रविवार की सुबह के 'संडे मास' में जाते ही जाते हैं. तो फिर यह भेद-भाव कैसा? छम्मकछल्लो को बहुत बाद में पता चला कि मुसलमान में शिया-सुन्नी होते हैं और क्रिश्चन में कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट्स. दोनों एक -दूसरे से खुद को बडा साबित करने पर तुले रहते हैं. शिया सुन्नी को और सुन्नी शिया को और कैथोलिक प्रोटेस्टेंट को और प्रोटेस्टेंट कैथोलिक को नफरत की निगाहों से देखते हैं. उनके बीच रोटी-बेटी का सम्बन्ध नहीं होने देते. छम्मकछल्लो ने एक बार इद्दत पर आधारित अपनी एक कहानी "बेमुद्दत" भोपाल में आयोजित एक अनौपचारिक गोष्ठी में सुनाई. भोपाल के बडे मशहूर लेखक वहां थे. उन्होंने कहानी को सिरे से नकार दिया यह कहकर कि यह मुसलमान के पृष्ठभूमि की कहानी नहीं है. उनमें ऐसा नहीं होता. बाद में कहा कि उन्हें मुसलमान के इस कौम बोरी मुस्लिम की जानकारी नहीं है. ए पता करेंगे और तब इसके बारे में बात करेंगे." छम्मकछल्लो ने वही कहानी पटना में अपने एक दोस्त -लेखक को दी. लेखक ने कहानी को तो नकारा ही, उन्होंने तो बोरी मुस्लिम, को ही नकार दिया यह कहते हुए कि " क्या बकवास कहानी है. और यह बोरी मुस्लिम क्या होते हैं? हम तो उनको मुसलमान मानते ही नहीं." जैसे हिन्दू धर्म के नुमाइन्दे शूद्रों को हिन्दू या मनुष्य मानते ही नहीं.
छम्मकछल्लो खुश है. धर्म-धर्म के बीच की लडाई नहीं, धर्म के भीतर की ही लडाई में हम बडे तो हम बडे, ''वो छोटा' तो 'वो घटिया", ' वो हमारे धर्म का नहीं' तो 'उसका हमारे धर्म से कोई लेना-देना नहीं" में लोग फंसे हैं. मंटो ने शिया-सुन्नी के आपसी विवादों को लेकर कई कहानियां लिखीं, दलित हिन्दुओं के खिलाफ लिखते हैं, कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट आपस में एक-दूसरे को नहीं मानते. सभी जगह धर्म की एक ही स्थिति है. वह थाली के बैगन की तरह है. जिसे जहां मर्ज़ी, वहां उसे लुढका देता है. काश कि धर्म के भी हाथ-पैर, दिल-दिमाग होते और वह एक स्वतंत्र अस्तित्व की तरह अपने बारे में अपना निर्णय ले सकता. तब शायद दोस्त की बेटी को नामांकन भी मिल जाता और छम्मकछल्लो की कहानी को कुछ सह्र्दय मुसलमान भी, खासकर मुसलमान-लेखक. मुसलमान लेखन जैसे विशेषण देते हुए छम्मकछल्लो बहुत तकलीफ महसूस कर रही है, मगर कई बार तकलीफ होते हुए भी हमें अपनी ज़बान खोलनी ही पडती है. छम्मकछल्लो के सामने उसकी दोस्त की बेटी का मायूस चेहरा है तो उसके सामने उस दोस्त का भी, जिसने अपनी 72 साला सास पर थोपे गए इद्दत की इस प्रथा पर गहरा दुख ज़ाहिर करते हुए कहा था कि अगर तुम कुछ इस पर लिख सकती हो तो लिखो.
Friday, May 21, 2010
हिंदुओं, पहले अपना ही हिंदुपन तो तय कर लो!
http://www.janatantra.com/news/2010/05/19/a-comment-on-hinduism-of-hindus/#comments
छम्मकछल्लो की समझ में नहीं आता कि वह अपने ही धर्म के भाई लोगों को क्या कहे? भाई लोग कहते हैं कि वे सच्चे हिंदू हैं, नारे भी देते हैं कि “गर्व से कहो, हम हिंदू हैं” और अपने इसी गौरवांवित धर्म की ऐसी की तैसी कर देते हैं।
हिंदू धर्म कहता है, “कर्मण्येवाधिकारस्ते…” और हिंदू भाई लोग अपने ही इस मंत्र के विरुद्ध चले जाते हैं। धर्मकहता है, ‘कर्म किये जाओ, फल की चिंता मत करो’ और मानने की बात पर हिंदू भाई लोग अपने जन्म पर आधारित धर्म और जाति की बात करने लगते हैं। यह इन पढे-लिखे, उच्च विचार वाले हिंदुओं से कैसे कहा जाए कि हिंदू होना अपने कर्म के ऊपर नहीं है। जिस तरह से अपने मां बाप को चुनना किसी के बस में नहीं है, उसी तरह किसी धर्म विशेष में जन्म लेना भी। हमने-आपने जिस मां-बाप के यहां जन्म ले लिया, ले लिया, इसी तरह जिस धर्म या देश के परिवार में पैदा हो गए, हो गए। उस लिहाज़ से छम्मकछल्लो भी एक हिंदू घर में पैदा हो गई, इसलिए वह भी हिंदू हो गई। और छम्मकछल्लो को अपने हिंदू होने पर गर्व है, जब वह अपने ही धार्मिक ग्रंथों में इतनी इतनी प्रगतिशील बातें पाती हैं।
लेकिन, हिंदू भाई लोग धर्म की बात आने पर राधा-कृष्ण को पूजेंगे और अपने बच्चों के प्रेम की बात आने पर उसे धमकी देंगे और निरुपमा पाठक की तरह उसे जान से भी मार देंगे।
देखिए न, सभी धर्म-परायण हिंदू भाई लोग अपने यहां की स्त्रियों से साल में एक दिन हरतालिका व्रत करने की बात करते हैं। जो इस व्रत को जानते हैं, उन्हें पता है कि हिमराज ने जब अपने पुत्री पार्वती का ब्याह विष्णु के साथ तय कर दिया तो शिव को चाहनेवाली पार्वती तुरंत घर छोडकर चली जाती है। देवी-देवताओं की उम्र शायद हज़ारों-लाखों साल की होती है, इसलिए पार्वती हज़ारों–हज़ारो साल तपस्या करके शिव को प्राप्त करती है- पति रूप में। छम्मकछल्लो अपनी मां से पूछती थी कि अगर आज कोई लडकी ऐसे अपने पति या प्यार को पाने के लिए घर छोडकर चली जाए तो? मां तो मुस्कुरा कर रह जाती थी, मगर आज छम्मकछल्लो के सामने जवाब के रूप में है- निरुपमा पाठक जैसी कई-कई लडकियां। छम्मकछल्लो ने भी अपने शिव को पाने के लिए क्या-क्या नहीं झेला. शुक्र था कि वह निरुपमा बनने से बच गई.
आज लडकियां बिन ब्याहे मां बन जाए तो भूचाल आ जाता है। मगर हिंदू धर्मवाले जानते हैं कुंती को, वेदव्यास की माता सत्यवती को। सत्यवती ने बाद में अपनी ही बहुओं को वेदव्यास के पास भेजा, संतान प्राप्ति के लिए। बहुओं से बात नहीं बनने पर दासी को भेज दिया। बहुओं ने धृतराष्ट्र और पांडु दिए तो दासी ने विदुर। अब कोई बताए कि जाति या पद से ओछा होने से क्या संतान निर्बुद्धि पैदा होता है, क्या विदुर बेवकूफ थे? लोग कहते हैं दूसरी जाति में ब्याह करने पर संतान वर्ण संकर होता है। इस वर्ण संकर के भी बडे लफडे हैं भाई। इस पर फिर कभी।
पांडु-पत्नी कुंती कुंवारी मां बनी और ब्याह के बाद भी अन्य पुरुषों के संसर्ग से संतान पैदा किए। यही नहीं, मन में कहीं कोई चोर बैठा होगा, इसलिए अपनी सौत माद्री को भी दूसरे पुरुषों के संसर्ग से संतान उत्पन्न करवाए और अपनी बहू द्रौपदी को भी अपने पांच बेटों में बांट दिया। द्रौपदी आजन्म कृष्ण को अपना सखा मानती रही। आज कोई ब्याहता किसी अन्य पुरुष के लिए ऐसा सोचे तो उसका अपना ही पति उसे सबसे पहले दुश्चरित्र ठहराएगा।
श्री राम रावण के मरने के बाद मंदोदरी का ब्याह विभीषण से और बाली के मरने के बाद उसकी पत्नी तारा का ब्याह उसके देवर सुग्रीव से करवा देते हैं और भाई लोग कहते हैं कि अपने हिन्दू धर्म में विधवा ब्याह वर्जित है। इंद्र द्वारा गौतम पत्नी अहिल्या से व्यभिचार करने के बाद श्रीराम अहिल्या को व्यभिचारिणी और दुश्चरित्रता के आरोप से मुक्त कराते हैं। यहां किसी की हिम्मत नहीं कि वह ऐसा कर ले? उल्टा उस लडकी को माल समझ कर उसे भद्दे प्रस्ताव देंगे. हिन्दू धर्म के किसी भी बडे चरित्र ने याद नहीं कि कभी ऐसा किया हो.
इन सबसे यह तो पता चलता है कि समाज जिसे स्वीकार कर ले, उसपर कोई आंच नहीं उठाता। आज के हिंदू दावा तो करते हैं बडे हिंदू होने का, मगर कैसा दावा और किसका दावा यार! सच्चे हिंदू हो तो अपनी ही परम्परा का पालन करो ना। अपनी बेटियों को कुंती, अहिल्या, द्रौपदी, तारा, मंदोदरी जैसी पन्चकन्या या पार्वती जैसी प्रेम की पक्की होने तो दो। बिना ब्याह के भी वेदव्यास जैसा तपस्वी पैदा तो करने दो। अगर नहीं तो अपने हिंदूपने पर गर्व करना छोड दो। अपने इस तथाकथित हिंदुत्व को भी छोड दो। सनातन धर्म क्या कहता है, क्या पता। परंतु हिंदू ग्रंथ तो ये सब कहते ही हैं ना। अब या तो इन धर्म ग्रंथों को मिटा दो या अपनी विचारधारा में भर आए कूडे-कर्कट को साफ करके उसे स्वच्छ-शुद्ध कर लो। शास्त्रों में कुछ और, और अपनी करनी-कथनी में कुछ और! महान हिंदू धर्म यह तो कतई नहीं कहता। हिंदू धर्म की बातों को ही गलत ठहरानेवाले और उसी हिंदू धर्म पर गर्व से सर को हिमालय से भी अधिक ऊंचा करनेवाले हे तथाकथित हिंदुओ! तुम्हारी जय (?) हो!
छम्मकछल्लो की समझ में नहीं आता कि वह अपने ही धर्म के भाई लोगों को क्या कहे? भाई लोग कहते हैं कि वे सच्चे हिंदू हैं, नारे भी देते हैं कि “गर्व से कहो, हम हिंदू हैं” और अपने इसी गौरवांवित धर्म की ऐसी की तैसी कर देते हैं।
हिंदू धर्म कहता है, “कर्मण्येवाधिकारस्ते…” और हिंदू भाई लोग अपने ही इस मंत्र के विरुद्ध चले जाते हैं। धर्मकहता है, ‘कर्म किये जाओ, फल की चिंता मत करो’ और मानने की बात पर हिंदू भाई लोग अपने जन्म पर आधारित धर्म और जाति की बात करने लगते हैं। यह इन पढे-लिखे, उच्च विचार वाले हिंदुओं से कैसे कहा जाए कि हिंदू होना अपने कर्म के ऊपर नहीं है। जिस तरह से अपने मां बाप को चुनना किसी के बस में नहीं है, उसी तरह किसी धर्म विशेष में जन्म लेना भी। हमने-आपने जिस मां-बाप के यहां जन्म ले लिया, ले लिया, इसी तरह जिस धर्म या देश के परिवार में पैदा हो गए, हो गए। उस लिहाज़ से छम्मकछल्लो भी एक हिंदू घर में पैदा हो गई, इसलिए वह भी हिंदू हो गई। और छम्मकछल्लो को अपने हिंदू होने पर गर्व है, जब वह अपने ही धार्मिक ग्रंथों में इतनी इतनी प्रगतिशील बातें पाती हैं।
लेकिन, हिंदू भाई लोग धर्म की बात आने पर राधा-कृष्ण को पूजेंगे और अपने बच्चों के प्रेम की बात आने पर उसे धमकी देंगे और निरुपमा पाठक की तरह उसे जान से भी मार देंगे।
देखिए न, सभी धर्म-परायण हिंदू भाई लोग अपने यहां की स्त्रियों से साल में एक दिन हरतालिका व्रत करने की बात करते हैं। जो इस व्रत को जानते हैं, उन्हें पता है कि हिमराज ने जब अपने पुत्री पार्वती का ब्याह विष्णु के साथ तय कर दिया तो शिव को चाहनेवाली पार्वती तुरंत घर छोडकर चली जाती है। देवी-देवताओं की उम्र शायद हज़ारों-लाखों साल की होती है, इसलिए पार्वती हज़ारों–हज़ारो साल तपस्या करके शिव को प्राप्त करती है- पति रूप में। छम्मकछल्लो अपनी मां से पूछती थी कि अगर आज कोई लडकी ऐसे अपने पति या प्यार को पाने के लिए घर छोडकर चली जाए तो? मां तो मुस्कुरा कर रह जाती थी, मगर आज छम्मकछल्लो के सामने जवाब के रूप में है- निरुपमा पाठक जैसी कई-कई लडकियां। छम्मकछल्लो ने भी अपने शिव को पाने के लिए क्या-क्या नहीं झेला. शुक्र था कि वह निरुपमा बनने से बच गई.
आज लडकियां बिन ब्याहे मां बन जाए तो भूचाल आ जाता है। मगर हिंदू धर्मवाले जानते हैं कुंती को, वेदव्यास की माता सत्यवती को। सत्यवती ने बाद में अपनी ही बहुओं को वेदव्यास के पास भेजा, संतान प्राप्ति के लिए। बहुओं से बात नहीं बनने पर दासी को भेज दिया। बहुओं ने धृतराष्ट्र और पांडु दिए तो दासी ने विदुर। अब कोई बताए कि जाति या पद से ओछा होने से क्या संतान निर्बुद्धि पैदा होता है, क्या विदुर बेवकूफ थे? लोग कहते हैं दूसरी जाति में ब्याह करने पर संतान वर्ण संकर होता है। इस वर्ण संकर के भी बडे लफडे हैं भाई। इस पर फिर कभी।
पांडु-पत्नी कुंती कुंवारी मां बनी और ब्याह के बाद भी अन्य पुरुषों के संसर्ग से संतान पैदा किए। यही नहीं, मन में कहीं कोई चोर बैठा होगा, इसलिए अपनी सौत माद्री को भी दूसरे पुरुषों के संसर्ग से संतान उत्पन्न करवाए और अपनी बहू द्रौपदी को भी अपने पांच बेटों में बांट दिया। द्रौपदी आजन्म कृष्ण को अपना सखा मानती रही। आज कोई ब्याहता किसी अन्य पुरुष के लिए ऐसा सोचे तो उसका अपना ही पति उसे सबसे पहले दुश्चरित्र ठहराएगा।
श्री राम रावण के मरने के बाद मंदोदरी का ब्याह विभीषण से और बाली के मरने के बाद उसकी पत्नी तारा का ब्याह उसके देवर सुग्रीव से करवा देते हैं और भाई लोग कहते हैं कि अपने हिन्दू धर्म में विधवा ब्याह वर्जित है। इंद्र द्वारा गौतम पत्नी अहिल्या से व्यभिचार करने के बाद श्रीराम अहिल्या को व्यभिचारिणी और दुश्चरित्रता के आरोप से मुक्त कराते हैं। यहां किसी की हिम्मत नहीं कि वह ऐसा कर ले? उल्टा उस लडकी को माल समझ कर उसे भद्दे प्रस्ताव देंगे. हिन्दू धर्म के किसी भी बडे चरित्र ने याद नहीं कि कभी ऐसा किया हो.
इन सबसे यह तो पता चलता है कि समाज जिसे स्वीकार कर ले, उसपर कोई आंच नहीं उठाता। आज के हिंदू दावा तो करते हैं बडे हिंदू होने का, मगर कैसा दावा और किसका दावा यार! सच्चे हिंदू हो तो अपनी ही परम्परा का पालन करो ना। अपनी बेटियों को कुंती, अहिल्या, द्रौपदी, तारा, मंदोदरी जैसी पन्चकन्या या पार्वती जैसी प्रेम की पक्की होने तो दो। बिना ब्याह के भी वेदव्यास जैसा तपस्वी पैदा तो करने दो। अगर नहीं तो अपने हिंदूपने पर गर्व करना छोड दो। अपने इस तथाकथित हिंदुत्व को भी छोड दो। सनातन धर्म क्या कहता है, क्या पता। परंतु हिंदू ग्रंथ तो ये सब कहते ही हैं ना। अब या तो इन धर्म ग्रंथों को मिटा दो या अपनी विचारधारा में भर आए कूडे-कर्कट को साफ करके उसे स्वच्छ-शुद्ध कर लो। शास्त्रों में कुछ और, और अपनी करनी-कथनी में कुछ और! महान हिंदू धर्म यह तो कतई नहीं कहता। हिंदू धर्म की बातों को ही गलत ठहरानेवाले और उसी हिंदू धर्म पर गर्व से सर को हिमालय से भी अधिक ऊंचा करनेवाले हे तथाकथित हिंदुओ! तुम्हारी जय (?) हो!
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