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Thursday, June 24, 2010

समलैंगिकता, शादी और ऑनर किलिंग

अभी समलैंगिकता पर बहस चल रही है. कानूनी मान्यता के बावज़ूद हमारा मन इसे स्वीकार नहीं कर पा रहा है. देश के लडके अब क्या करें? ऐसे ही गर्भ में या जनमते ही बेटियों को मार दिए जाने के कारण बेटियों की संख्या हज़ार लडकों पर 833 हो गई है. मां-बाप की गलती का खामियाज़ा वे भुगतेंगे कि हर हज़ार में से 167 लडके बिन ब्याहे ही रह जाएंगे. समलैंगिकता उनके लिए एक वरदान है, यह लोगों की समझ में नहीं आ रहा. हम शिखंडी जैसे महाभारत को चरित्र को भूल जाते हैं, विष्णु के मोहिनी रूप को दरकिनार कर देते हैं. द्रौपदी और उनके पांच पतियों को नकार देते हैं. आप धर्म को जितना नकारेंगे, उसके मूल रूप के साथ छेडछाड करेंगे, लोग उतने ही उसको नकारते हुए अपने लिए अलग अलग राहें बनाते चले जाएंगे. धर्म के नाम पर आखिर कबतक आप लोगों को गुमराह करते रहेंगे?

अभी दो-चार दिन पहले किसी ने यूं ही छम्मकछल्लो पर अंधेरे का तीर छोड दिया कि सुना कि उसकी बेटी ने शादी कर ली है. छम्मकछल्लो ने उन्हें समझाया कि उसकी बेटी अपने से शादी नही करेगी, क्योंकि उसे अपने मां-बाप की ओर से इसकी आशंका नहींहै कि वह जिस लडके को पसंद करेगी, वह उसके मां-बाप को पसंद आएगा कि नहीं. छम्मकछल्लो ने अपने मित्र को आश्वस्त किया कि वे घबडाएं नहीं. छम्मकछल्लो अपनी बेटी की शादी बेटी की मर्ज़ी से ही करेगी और उन्हें भी शादी में ज़रूर बुलाएगी. छम्मकछल्लो को अपनी बेती पर भरोसा है और बेटी को भी अपनी मां पर. दूसरे छम्मकछल्लो बेटी की शादी की आज़ादी में कभी कोई बाधक नहीं बनेगी. यह मां की तरफ से बेटी को उपहार है, ऑनर किलिंगका डर नहीं.

ऑनर किलिंग एक नया रूप है लोगों की आज़ादी छीनने का. हम बचपन से अपने बच्चों को उनकी इच्छा के अनुसार खाने देते हैं, पहनने देते हैं, उनको अपना कैरियर चुनने देते हैं, मगर उन्हें अपना जीवन साथी चुनने की इज़ाज़त नहीं देते. जिस जीवन साथी के बल पर उनकी पूरी ज़िंदगी की खुशहाली या बदहाली टिकी होती है, उसी पर हम कुंडली मारकर बैठ जाते हैं और सगर्व कहते हैं कि हम उनके मां-बाप हैं. छम्मकछल्लो मां-बाप के रूप में बैठे ऐसे सांपरूपी मां-बाप को सिरे से खारिज करती है और भगवान बुद्ध का पूछा सवाल ही दुहराती है कि किसी को जीवन जब दे नहीं सकते तो उसे छीनने का अधिकार तुम्हें कहां से मिल गया? मां-बाप या समाज के रूप में बैठे देश के इन सपूतों के साथ क्या सुलूक हो, देश के सपूत ही बताएं. हर बात में युवा वर्ग को ही दोषी देनेवाले ज़रा कभी इस पर सोचने की ज़हमत उठाएंगे?

अपने आप को बुद्धिमान, सयाना कहनेवाले इस देश के लोग अब क्या हर बात के लिए कोर्ट कचहरी का ही मुंह देखेंगे? क्या अदालत ही सबकुछ तय करती रहेगी? क्या हमलोग बुद्धि या सम्वेदना से बिलकुल शून्य हो गए हैं?
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